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बिहार झारखंड के कालाहांडी समान पलामू की कथा व्यथा धपेल

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नवंबर 19, 2013



वाड्.मय : जुलाई 2013 के आदिवासी विशेषांक- 1 में श्याम बिहारी श्यामल के राजकमल प्रकाशन से वर्ष 1998 में छपे महत्वपूर्ण उपन्यास धपेल पर डा. दया दीक्षित का एक आलेख प्रकाशित हुआ है। आईये पढ़ते हैं यह आलेख 'जंगल की गुहार : धपेल'

दया दीक्षित

    श्याम बिहारी श्यामल का उपन्यास ‘धपेल’ पढ़ने के बाद याद आता है उत्तरांचल के कृतिकार विद्यासागर नौटियाल का उपन्यास ‘मेरा जामक वापस दो’। विद्यासागर नौटियाल ‘जामक वापसी’ के जरिये पिछले पन्ने के लोगों या पृष्ठभूमि के लोगों की आवाज़ बनकर फ़रियाद करते हैं देश के लोकतंत्रा की वापसी’ की। अजीब इसलिये नहीं लगेगी लोकतंत्र में लोकतंत्र की वापसी’ की फरियाद, क्योंकि कुछ ‘घरानों’ की घेरेबंदी की गिरफ्त में फँसे हम सब, इस अलोकतांत्रिक शासनिक षड्यंत्र से मुक्त होना चाहते हैं! लोकतंत्र किस तरह से अलोकतंत्र में तब्दील हो रहा है, किस तरह से विचारधाराएँ मर रही हैं, किस तरह से वास्तविक नेतृत्वकर्ता भुखमरी की कगार पर अंतिम सांसे ले रहे हैं, इस सबका आँखों देखा- सा हाल मिलता है-‘धपेल’ उपन्यास में!

उपन्यास का शीर्षक ‘धपेल’ प्रतीक है मनुष्य की ‘हवस’…

नौटंकी

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मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से 'सुल्ताना डाकू' नामक मशहूर नौटंकी के एक प्रदर्शन में देवेन्द्र शर्मा और पलक जोशी एक और नौटंकी का नज़ारा नौटंकी (نوٹنکی, Nautanki) उत्तर भारत, पाकिस्तान और नेपाल के एक लोक नृत्य और नाटक शैली का नाम है। यह भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीनकाल से चली आ रही स्वांग परम्परा की वंशज है और इसका नाम मुल्तान (पाकिस्तानी पंजाब) की एक ऐतिहासिक 'नौटंकी' नामक राजकुमारी पर आधारित एक 'शहज़ादी नौटंकी' नाम के प्रसिद्ध नृत्य-नाटक पर पड़ा।[1][2] नौटंकी और स्वांग में सबसे बड़ा अंतर यह माना जाता है कि जहाँ स्वांग ज़्यादातर धार्मिक विषयों से ताल्लोक रखता है और उसे थोड़ी गंभीरता से प्रदर्शित किया जाता है वहाँ नौटंकी के मौज़ू प्रेम और वीर-रस पर आधारित होते हैं और उनमें व्यंग्य और तंज़ मिश्रित किये जाते हैं। पंजाब से शुरू होकर नौटंकी की शैली तेज़ी से लोकप्रीय होकर पूरे उत्तर भारत में फैल गई। समाज के उच्च-दर्जे के लोग इसे 'सस्ता' और 'अश्लील' समझते थे लेकिन यह लोक-कला पनपती गई।[3]
अनुक्रम 1इतिहास और विकास2कविता2.1उच्चारण3इन्हें भी देखें4बाहरी कड़ि…

देव सूर्य मंदिर ने जब बदल डाली अपनी दिशा

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खुद को बचाने के लिए देव सूर्य मंदिर ने बदल ली थी दिशा

अमरेन्द्र किशोर


बिहार के औरंगाबाद जिले के देव स्थित ऎतिहासिक त्रेतायुगीन पश्चिमाभिमुख सूर्य मंदिर अपनी विशिष्ट कलात्मक भव्यता के साथ साथ अपने इतिहास के लिए भी विख्यात है। कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने स्वयं अपने हाथों से किया है। इस मंदिर के बाहर संस्कृत में लिखे श्लोक के अनुसार 12 लाख 16 हजार वर्ष त्रेतायुग के गुजर जाने के बाद राजा इलापुत्र पुरूरवा ऐल ने इस सूर्य मंदिर का निर्माण प्रारम्भ करवाया था। शिलालेख से पता चलता है कि सन् 2014 ईस्वी में इस पौराणिक मंदिर के निर्माण काल को एक लाख पचास हजार चौदह वर्ष पूरे हो गए हैं।विश्व का एकमात्र पश्चिमाभिमुख सूर्यमंदिर हैदेव मंदिर में सात रथों से सूर्य की उत्कीर्ण प्रस्तर मूर्तियां अपने तीनों रूपों उदयाचल (प्रात:) सूर्य, मध्याचल (दोपहर) सूर्य, और अस्ताचल (अस्त) सूर्य के रूप में विद्यमान है। पूरे देश में यही एकमात्र सूर्य मंदिर है जो पूर्वाभिमुख न होकर पश्चिमाभिमुख है। करीब एक सौ फीट ऊंचा यह सूर्य मंदिर स्थापत्य और वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण है। बि…