पोस्ट

सुंदत कांड के लाभ

 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 सुंदरकाण्ड का पाठ करने के चमत्कारिक 10 फायदे* महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण पर आधारित तुलसीकृत महाकाव्य रामचरित मानस का पंचम सोपान है सुंदरकाण्ड। सुंदरकाण्ड में रामदूत, पवनपुत्र हनुमान का यशोगान किया गया है। आओ जानते हैं सुंदरकाण्ड का पाठ करने के चमत्कारिक लाभ।   1. सुंदरकाण्ड का पाठ सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला माना गया है। किसी भी प्रकार की परेशानी या संकट हो, सुंदरकाण्ड के पाठ से यह संकट तुरंत ही दूर हो जाता है।   2. सुंदरकांड के पाठ से भूत, पिशाच, यमराज, शनि राहु, केतु, ग्रह-नक्षत्र आदि सभी का भय दूर हो जाता है।   3. हनुमानजी के सुंदर काण्ड का पाठ सप्ताह में एक बार जरूर करना चाहिए। ज्योतिष शास्त्र, ज्योतिष के अनुसार भी विषम परिस्थितियों सुंदरकांड पाठ करने की सलाह दी जाती है। 4. जीवन में किसी प्रकार की समस्या उत्पन्न होती है तो आप संकल्प लेकर लगातार सुंदरकांड का पाठ करें। सुंदरकांड पाठ से एक नहीं बल्कि अनेक सैकड़ों समस्याओं का समाधान तुरंत मिलने लगता है।   5. श्रीराम चरित्र मानस को रचने वाले गोस्वामी तुलसीदास के अनुसार हनुमान जी को जल्द प्रस

ख़ुशी की तलाश

 *मुस्कुराइए* / मनोज कुमार एक औरत बहुत महँगे कपड़े में अपने मनोचिकित्सक के पास गई और बोली "डॉ साहब ! मुझे लगता है कि मेरा पूरा जीवन बेकार है, उसका कोई अर्थ नहीं है। क्या आप मेरी खुशियाँ ढूँढने में मदद करेंगें?" मनोचिकित्सक ने एक बूढ़ी औरत को बुलाया जो वहाँ साफ़-सफाई का काम करती थी और उस अमीर औरत से बोला - "मैं इस बूढी औरत से तुम्हें यह बताने के लिए कहूँगा कि कैसे उसने अपने जीवन में खुशियाँ ढूँढी। मैं चाहता हूँ कि आप उसे ध्यान से सुनें।" तब उस बूढ़ी औरत ने अपना झाड़ू नीचे रखा, कुर्सी पर बैठ गई और बताने लगी - "मेरे पति की मलेरिया से मृत्यु हो गई और उसके 3 महीने बाद ही मेरे बेटे की भी सड़क हादसे में मौत हो गई। मेरे पास कोई नहीं था। मेरे जीवन में कुछ नहीं बचा था। मैं सो नहीं पाती थी, खा नहीं पाती थी, मैंने मुस्कुराना बंद कर दिया था।" मैं स्वयं के जीवन को समाप्त करने की तरकीबें सोचने लगी थी। तब एक दिन,एक छोटा बिल्ली का बच्चा मेरे पीछे लग गया जब मैं काम से घर आ रही थी। बाहर बहुत ठंड थी इसलिए मैंने उस बच्चे को अंदर आने दिया। उस बिल्ली के बच्चे के लिए थोड़े से दूध का इंत

चिट्ठियाँ...! / मनोहर बिल्लोरे

 चिट्ठियाँ...! / मनोहर बिल्लोरे  -------------  चिट्ठियाँ लिखना-पढ़ना अब,   भूल गये  बहुत सारे लोग  पढ़ने-लिखने वालों की संख्या में  जबकि, हुआ है बेतहाशा इज़ाफा  सिर झुकाये तरह-तरह के कामों में  दिन भर डूबे रहने वाले व्यस्त-पस्त,  सनकी-सिरफिरे-से वे डाक-बाबू,  अब नहीं रहे...  सनसनी सी फैलाती, प्रतीक्षा की बेचैनी वह – बनी रहती थी जो – कहाँ बची अब  पाई-पठाई, लिखीं-पढ़ीं जातीं और  घर-घर में, चर्चा में रहती थीं,  जब – चिट्ठियाँ...! जो पढ़ा-लिखा नहीं था  वह भी  दूसरों से पढ़वा-लिखवा लेता था  अपने दुख-दर्द, भाव-अभाव,  हर्षोल्लास, अपनी आशा-निराशाएँ,  चिंताएँ, दिल्लगी, हास-परिहास,  ठिठोली, प्रेम-तरंगें, आलिंगन,  और ज्वार--भाटे सब समां जाते  इन दो पैसों की चिट्ठियों में… अनपढ़ डाकिया भी -   दूसरों से पढ़वा कर पते -  बाँट देता था  घर-घर में   तय समय पर  सही जगह     सही-सही डाक...   अब तो इस समय -   पुश किये जाते हैं चट-पट-पट…  मनचाहे नंबर और कर ली जाती  बातें, झट-पट जी भर-भर… चाहें जब,   जहाँ चाहें और हो इच्छा तो  चेहरे पर चमकने वाले हाव-भाव भी  देख सकते हैं  आमने-सामने अंतर्जाल के ज़रिये,  रेडियो-तरंगों

जय महावीर ज्ञान गुण सागर / कृष्ण मेहता

 *हनुमानजी के जीवन में ज्ञान, कर्म* *और भक्ति की समग्रता विद्यमान है।*    °" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "°       रामराज स्थापना पश्चात श्री हनुमानजी को वापस भेजने की आवश्यकता भगवान् राम नहीं समझते हैं। उनके संदर्भ में प्रभु दूसरी बात सोचते हैं। *कई लोग ऐसे होते हैं कि जिनमें सामीप्य के कारण रस का अभाव हो जाता है। अधिक पास रहने से उन्हें बहुत लाभ नहीं होता। क्योंकि पास रहने से लाभ उठाने वाले मैंने बिरले ही व्यक्ति देखे हैं, बहुधा हानि उठाने वाले ही अधिक देखे हैं। लोग बहुधा आश्चर्य करते हैं कि बड़े-बड़े महात्माओं के अत्यन्त पास रहने वाले व्यक्तियों का स्वभाव बड़ा विचित्र होता है। बड़े-बड़े तीर्थों में रहने वाले व्यक्तियों का आचरण तीर्थ के आदर्श से बिल्कुल भिन्न होता है। इसका रहस्य यही है कि जैसे कोई व्यक्ति प्रतिदिन किसी एक ही वस्तु का भोजन करे तो धीरे-धीरे उसे उस वस्तु का स्वाद आना बन्द हो जाता है। इसी प्रकार से कोई व्यक्ति अगर बहुत लम्ब

मेरी प्यारी दोनों माताएं/ विजय केसरी

 "मातृ दिवस' पर गुरुदेव भारत यायावर  की 'मां' शीर्षक  कविता पढ़ कर अपनी दोनों माताएं याद आ गईं। अब दोनों माताएं स शरीर इस दुनिया में नहीं हैं। फिर भी हम सभी भाई-बहन उनके होने का एहसास हमेशा महसूस करते हैं। जब भी हम सब भाई बहन किसी मुसीबत में होते हैं , तो हमारी दोनों माताएं पीठ पीछे खड़ी होती है। गुरुदेव की कविता की पंक्तियां मन को छूती है। उनकी कविता पढ़ने के बाद कुछ पंक्तियां दोनों माताओं के श्री चरणों में अर्पित है। मेरी प्यारी दोनों  माताएंv यह ईश्वर की कृपा है, मुझे एक नहीं, दो - दो माताओं का, प्यार मिला। सर आप ट्यूशन पढ़ाने, हमारे घर आते थे, दोनों माताओं से मिलते थे, मेरी दोनों  माताओं का स्नेह प्राप्त करते थे। एक मां ने मुझे जन्म दिया, दूसरी मां ने लालन-पालन किया, दोनों माताओं की कृपा सदा, मुझ पर बनी रही। सिर्फ मुझ पर ही नहीं, बल्कि सभी भाई - बहनों पर, दोनों माताओं की कृपा, सदा समान बनी रही। समय के साथ दिन बीतते गए, हम बच्चे बड़े होते गए, दोनों माताओं की उम्र बढ़ती गई, मां - मां बनती गई । दोनों माताओं के आंचल में, हम बच्चे बसते  गए, जरा सी नजरों से दूर होते, मात

सलाह नहीं साथ चाहिए

 *प्रेरक कहानी*        एक बार एक पक्षी समुंदर में से चोंच से पानी बाहर निकाल रहा था। दूसरे ने पूछा भाई ये क्या कर रहा है। पहला बोला समुंदर ने मेरे बच्चे डूबा दिए है अब तो इसे सूखा कर ही रहूँगा। यह सुन दूसरा बोला भाई तेरे से क्या समुंदर सूखेगा। तू छोटा सा और समुंदर इतना विशाल। तेरा पूरा जीवन लग जायेगा। पहला बोला *देना है तो साथ दे*। सिर्फ़ *सलाह नहीं चाहिए*। यह सुन दूसरा पक्षी भी साथ लग लिया। ऐसे हज़ारों पक्षी आते गए और दूसरे को कहते गए *सलाह नहीं साथ चाहिए*। यह देख भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ जी भी इस काम के लिए जाने लगे। भगवान बोले तू कहा जा रहा है तू गया तो मेरा काम रुक जाएगा। तुम पक्षियों से समुंदर सूखना भी नहीं है। गरुड़ बोला *भगवन सलाह नहीं साथ चाहिए*। फिर क्या ऐसा सुन भगवान विष्णु जी भी समुंदर सुखाने आ गये। भगवान जी के आते ही समुंदर डर गया और उस पक्षी के बच्चे लौटा दिए।  आज इस संकट के समय में भी देश को हमारी सलाह नहीं साथ चाहिए। आज सरकार को कोसने वाले नहीं समाज के साथ खड़े हो कर सेवा करने वाले लोगों की आवश्यकता है ।इसलिए सलाह नहीं साथ दें।  *जो साथ दे दे सारा भारत, तो फिर से मुस्क

कोरोना : पांच ग़ज़ले / डॉ. वेद मित्र शुक्ल

 कोरोना: पाँच ग़ज़लें / डॉ. वेद मित्र शुक्ल     -     1. माना मुश्किल घड़ी आज, फिर भी हिम्मत बड़ी आज।   घर में रहकर भजन करें, छोड़ें हम हेकड़ी आज।   लक्ष्मणरेखा खिंची हुई, करना मत गड़बड़ी आज।   खतरे की जंजीर अगर, तोड़ें इक-इक कड़ी आज।   कट जायेगा कठिन समय, काहे की हड़बड़ी आज।   “खट्टे हैं अंगूर” कहे- कोरोना लोमड़ी आज।   2. समय बख्शा है कुदरत ने आओ घर को बनाएं घर अगर मुश्किल तो भी ठानें चाहे हो जो बनाएं घर।   सुनामी हो या कोरोना ये आखिर बीत जाते हैं, बिगाड़े मत धीरज खोकर, आओ, आओ बनाएं घर।   महामारी या कोई जंग मनुष्य जीता, जीतेगा, जहाँ भी हैं, चाहे बंकर या झोपड़ हो बनाएं घर।   प्यार, जज़्बातीपन, सपने औ एकजुटता इनसे हम- चलो भीतर अंतर्मन में आओ यारो! बनाएं घर।   खिंची है लक्ष्मण रेखा आज फिर से, गलती मत करना, शेष जो भी है अब चिंता छोड़ो हम तो बनाएं घर।   3. कौन पढ़े अखबार आज जग झूठा लागे, बेमतलब के राज-काज जग झूठा लागे।   इनकी-उनकी इधर-उधर की कौन सुने अब, भीटर यों है बजा साज जग झूठा लागे।   देह दे रही धोखा, बेबस साँसें उखड़ी,  किस पर यारा! करें नाज जग झूठा लागे।    इतना भी क्यों दुनियादारी में खोए हम, कोरो