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बेचन मामा

 कहानी -बेचन मामा / सीमा. मधुरिमा  मुन्नी पॉँच साल की होगी ज़ब पहली बार अपने मामा के घर गयी या यूँ कहे उसे मामा के घर भेज दिया गया उसकी माँ द्वारा l ज़ब वो तीन साल की थी तभी उसे उसके दो और बड़े भाईयों  के साथ अपनी बड़ी अम्मा के यहाँ पढ़ने के उद्देश्य से भेज दिया गया था ....या कहा जा सकता है कि उसके माता पिता कि मजबूरी थी क्योंकि उसके पिता वन विभाग में नौकरी करते थे तो उनका सरकारी आवास भी लखीमपुर स्थिति खटीमा रेंज में सुरई नामक स्थान पर था जहाँ मुन्नी के अब दो जुड़वे भाई बहन भी हो गए थे जिससे मुन्नी की माँ का ध्यान मुन्नी पर कम ही हो पाता ऐसे में मुन्नी एक बार जंगल में खोते खोते बची l माँ बिलकुल ही डर गयीं और पिता ने मुन्नी के दोनों बड़े भाईयों सँग मुन्नी को अपने बड़े भाई भाभी के घर शहर में पढ़ने के उद्देश्य से भेज दिया l मुन्नी तीन साल में ही माँ से दूर हो गयी l बड़ी अम्मा के घर में कई और चचेरे भाई बहन थे l मुन्नी को भी एक स्कूल में दाखिला दे दिया गया l मुन्नी अक्सर माँ के प्रेम को तरस जाती l स्कूल जाती तो अक्सर अपने साथियों के टिफिन चुरा के खा जाती l मुन्नी शायद चोरी का मतलब तो उस उम्र में जानत

समय के साथ बदलाव

 एक रशियन यहूदी को इजरायल में बसने का परमिशन मिला मॉस्को हवाई अड्डे पर कस्टम अधिकारियों ने उसके थैले में लेनिन की मूर्ति देखी तो पूछ बैठा, 'ये क्या है ? उसने कहा, 'ये क्या है ?, कॉमरेड ये गलत सवाल है, आपको पूछना चाहिये था कि ये कौन है, ये कॉमरेड लेनिन हैं जिन्होंने सोशलिज्म की बुनियाद रखी और रूस के लोगो का भविष्य उज्ज्वल किया, मैं इसे अपने साथ, अपने "यादगार हीरो" की तरह ले जा रहा हूं  रशियन कस्टम अधिकारी थोड़ा शर्मिंदा हुये और आगे बगैर किसी जांच के उसे जाने दिया .... तेल अवीव एयरपोर्ट पर इजरायल के कस्टम अधिकारी ने पूछा, 'ये क्या है ?' उसने कहा, 'ये क्या है ? ये गलत सवाल है श्रीमान, आपको पूछना चाहिये था, ये कौन है ? ये लेनिन है, ऐसा हरामखोर दोगला का औलाद जिसने मुझे यहूदी होने के कारण,रूस छोड़ने पर मजबूर कर दिया। मैं अपने साथ उसकी मूर्ति इसलिये लाया ताकि रोज, जब भी इस चूतिये पर नजर पड़े, इसकी मां-बहन एक कर सकूं'' इजरायली कस्टम अधिकारी ने कहा, 'आपको मैंने कष्ट दिया उसके लिये माफी चाहता हूं, आप इसे अपने साथ ले जा सकते हैं' इजरायल में जब वो अपने नय

धूमिल नहीं हो सकती धूमिल की यादें / कबीर up

 यादों में धूमिल धूमिल का आज जन्म दिन है । उन्होंने निराला और मुक्तिबोध की तरह केवल अभिव्यक्ति के खतरे नही  उठाये , कविता को साहसिक बनाया । उन्होंने कविता में लोक मुहावरों और खाटी भाषा का उपयोग किया । आम आदमी की आवाज में कविताएं लिखी ।   धूमिल की कविता हिंदी कविता का प्रस्थान बिंदु है । उन्होंने हिंदी कविता के सौंदर्यबोध को बदलने की कोशिश की है । उनके बाद के कवियों ने उनकी कविता की खूब नकल की , और पकड़े भी गए । उन्होंने प्रजातन्त्र की विफलताओं और अंतर्विरोध को उजागर किया ।   उनकी कविता आज के समय में ज्यादा प्रासंगिक है ।  उनकी कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि वे अभी लिखी गयी है ।  उनकी बहुपठित कविता को ही देखिए -एक आदमी रोटी बेलता है /एक आदमी रोटी खाता है /एक तीसरा आदमी भी है / जो न रोटी बेलता है न रोटी खाता है / वह सिर्फ रोटी के साथ खेलता है /यह तीसरा आदमी कौन है?/ मेरे देश की संसद मौन है ।     यह आकस्मिक नही है कि उनके कविता संग्रह का नाम संसद से सड़क तक , है । उनकी कविताएं संसद में बैठे हुए विधाताओं को चुनौती देती है , उनसे प्रश्न पूछती हैं ।   धूमिल ने उस समय जिस तीसरे आदमी की बात कही

*ब्रह्मांड* / दिनेश श्रीवास्तव

 दिनेश-दोहावली /                *ब्रह्मांड* यहाँ सकल ब्रम्हांड का,निर्माता है कौन? तर्कशास्त्र ज्ञाता सभी, हो जाते हैं मौन।।-१ वेदशास्त्र गीता सभी,अलग-अलग सब ग्रंथ। परिभाषा ब्रह्मांड की,देते हैं सब पंथ।।-२ सकल समाहित है जहाँ,पृथ्वी,गगन समीर। वही यहाँ ब्रह्मांड है,बतलाते मति-धीर।।-३ परमब्रह्म को जानिए, निर्माता ब्रह्मांड। बतलाते हमको यही,पंडित परम प्रकांड।।-४ पंचभूत निर्मित यथा,काया सुघर शरीर। काया ही ब्रह्मांड है,जो समझे वह धीर ।।-५ पंचभूत विचलित जहाँ, पाता कष्ट शरीर। इसी भाँति ब्रह्मांड भी,पाता रहता पीर।।-६ ग्रह तारे गैलेक्सियाँ, सभी खगोली तत्त्व। अंतरिक्ष ब्रह्मांड का, होता परम महत्व।।-७ गूँजे जब ब्रह्मांड में,'ओम' शब्द का नाद। सभी चराचर जीव के,मिट जाते अवसाद।।-८ नष्ट न हो पर्यावरण,करें संवरण लोभ। होगा फिर ब्रह्मांड में,कभी नहीं विक्षोभ।।-९ देवत्रयी ब्रह्मांड के,ब्रह्मा,विष्णु महेश। ब्रह्मशक्ति की साधना,करता सदा 'दिनेश'।।-१०                  दिनेश श्रीवास्तव                  ग़ाज़ियाबाद

आज का दिन मंगलमय हो

 प्रस्तुति - कृष्ण  मेहता  🌞 ~ *आज का हिन्दू पंचांग* ~ 🌞 ⛅ *दिनांक 22 अक्टूबर 2020* ⛅ *दिन - गुरुवार* ⛅ *विक्रम संवत - 2077 (गुजरात - 2076)* ⛅ *शक संवत - 1942* ⛅ *अयन - दक्षिणायन* ⛅ *ऋतु - हेमंत* ⛅ *मास - अश्विन* ⛅ *पक्ष - शुक्ल*  ⛅ *तिथि - षष्ठी रात्रि 07:39 तक तत्पश्चात सप्तमी* ⛅ *नक्षत्र - पूर्वाषाढा 23 अक्टूबर रात्रि 01:00 तक तत्पश्चात उत्तराषाढा* ⛅ *योग - सुकर्मा 22 अक्टूबर रात्रि 02:37 तक तत्पश्चात धृति* ⛅ *राहुकाल - दोपहर 01:48 से शाम 03:14 तक*  ⛅ *सूर्योदय - 06:38*  ⛅ *सूर्यास्त - 18:07*  ⛅ *दिशाशूल - दक्षिण दिशा में* ⛅ *व्रत पर्व विवरण - सरस्वती पूजन, हेमंत ऋतु प्रारंभ*  💥 *विशेष - षष्ठी को नीम की पत्ती, फल या दातुन मुँह में डालने से नीच योनियों की प्राप्ति होती है।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)*                🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞 🌷 *दाँतों में से खून निकलता हो तो* 🌷 🍋 *नीबूं का रस मसूड़ों को रगड़ने से आराम होगा ।* 🙏🏻 *- पूज्य बापूजी Jodhpur 4th Sep, 2011*            🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞 🌷 *वास्तु शास्त्र* 🌷 🏡 *किचन में दवाईयां रखने की आदत वास्

अपनों का साथ

 *पिता की चारपाई* पिता जिद कर रहे थे कि उसकी चारपाई गैलरी में डाल दी जाये। बेटा परेशान था। बहू बड़बड़ा रही थी..... कोई बुजुर्गों को अलग कमरा नहीं देता, हमने दूसरी मंजिल पर ही सही एक कमरा तो दिया.... सब सुविधाएं हैं, नौकरानी भी दे रखी है। पता नहीं, सत्तर की उम्र में सठिया गए हैं? निकित ने सोचा पिता कमजोर और बीमार हैं.... जिद कर रहे हैं तो उनकी चारपाई गैलरी में डलवा ही देता हूँ। पिता की इच्छा पू्री करना उसका स्वभाव भी था। अब पिता की चारपाई गैलरी में आ गई थी। हर समय चारपाई पर पडे रहने वाले पिता अब टहलते टहलते गेट तक पहुंच जाते। कुछ देर लान में टहलते। लान में खेलते नाती - पोतों से बातें करते , हंसते , बोलते और मुस्कुराते। कभी-कभी बेटे से मनपसंद खाने की चीजें लाने की फरमाईश भी करते। खुद खाते , बहू - बेटे और बच्चों को भी खिलाते ....धीरे-धीरे उनका स्वास्थ्य अच्छा होने लगा था। दादा मेरी बाल फेंको... गेट में प्रवेश करते हुए निकित ने अपने पाँच वर्षीय बेटे की आवाज सुनी तो बेटे को डांटने लगा...  अंशुल बाबा बुजुर्ग हैं उन्हें ऐसे कामों के लिए मत बोला करो। पापा! दादा रोज हमारी बॉल उठाकर फेंकते हैं..

झारखण्ड के पलामू वाला काजर

 #ठेठ_पलामू:- #जड़ी-बूटी और #काजर ------------------------------------------------------- पिछला साल इहे दशहरा टाईम का बात है, भोरे-भोरे उठे तो आदत के अनुसार आँख मइसत उठ के ऐनक देखने गए कि खूबसूरती तनी-मानी बचल है अगुआ लोग के लिए कि सब साफ हो गया। तो अपन चेहरा देख के डेरा गए। पूरा आँख के नीचे करिया हो गया था। जब हाथ से छुए तो पता चला कि काजर लगा हुआ था। फिर याद आया कि #जा_सार_के दशहरा न स्टार्ट हो गया, तो वही माई लगा दी थी। रात में सुतला घरी कि रात के कोई डायन बिसाहिन के नज़र न लगे। अब बड़े हो गए थे, तो सोचे अब न तो बच्चा हैं न ही #सुनर हैं, तो नजर थोड़े लगेगा, पर बात का है न कि माई के लिए बेटा भले 2 लईका के बाप बन जाए, लेकिन उ बच्चा ही रहता है और दुनिया में सबसे सुंदर दिखता है। सो ज़ाहिर सी बात है, नजर से बचाना था तो काजर तो लगाना था। लईका में दशहरा के ठीक एक दिन पहिले बड़की फुआ के ड्यूटी रहता था। एगो थरिया में बालू आऊ करिया कपड़ा सुई डोरा लेके बैठ जाती थी और सब के लिए छोटा-छोटा चरखूँट आकार में कपड़ा के थैली बना-बना के ओकरा में बालू भर के सी देती थी। अब जे बड़हन लईका रहे उ बाँह पर बाँधे, न त