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रश्मि शर्मा की कहानी 'निर्वसन'*

 *कथा-संवेद – 12* भारत और दुनिया के साहित्येतिहास में मिथकों के पुनर्लेखन की एक सुदीर्घ परंपरा रही है। *‘निर्वसन’* के केंद्र में सीता द्वारा दशरथ के पिंडदान की कथा है। फल्गू नदी के किनारे घटित इस कथा में सीता और राम पौराणिक या पारलौकिक पात्रों की तरह नहीं, बल्कि सामान्य स्त्री-पुरुष की तरह परस्पर बर्ताव करते हैं। स्त्री-पुरुष के बीच घटित होनेवाली स्वाभाविक परिस्थितियों के रेशे से निर्मित यह कहानी मिथकीय कथा-परिधि का अतिक्रमण कर बहुत सहजता से समकालीन यथार्थ के धरातल पर अपना आकार ग्रहण करती है। मिथक की जादुई संरचना में स्मृति, भ्रम, संभावना और पूर्वदीप्ति के उपकरणों से प्रवेश करती यह कहानी आधुनिक लैंगिक विमर्श का एक व्यावहारिक और विश्वसनीय पाठ तो रचती ही है, हमेशा से कही-सुनी गई मिथकीय कथा के छूट गये या कि छोड़ दिये गये पक्षों को भी संभाव्य की तरह प्रस्तुत करती है। नदी, वनस्पति और मानवेतर प्राणियों की सजीव उपस्थिति के बीच इस कहानी के चरित्र जिस तरह अपने मौलिक और आदिम स्वरूप में आ खड़े होते हैं, उसी में इसके शीर्षक की सार्थकता सन्निहित है। एक ऐसे समय में जब मिथकों की पुनर्प्रस्तुति के बहाने

बांग्ला साहित्य पर केंद्रित निकट का एक संग्रहणीय अंक / सुभाष नीरव अंक

 निकट : बांग्ला साहित्य पर केंद्रित अंक / सुभाष नीरव  ======================== इसमें कोई दो राय नहीं कि भारतीय भाषाओं का साहित्य बहुत समृद्ध और अमीर रहा है। इसकी झलक अनुवाद के माध्यम से हिन्दी पाठकों को मिलती रही है। हिन्दी की छोटी-बड़ी पत्रिकाओं और अखबारों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता जो समय समय पर भारतीय भाषाओं में लिखे जा रहे श्रेष्ठ साहित्य को अनुवाद के जरिये अपने पाठकों से रू-ब-रू करवाती रहती हैं। कोई भी व्यक्ति सभी भाषाओँ को नहीं सीख सकता है। उसे अन्य भाषाओं के साहित्य को पढ़ने, जानने-समझने के लिए अनुवाद पर ही आश्रित रहना पड़ता है। मैंने स्वयं विश्व का क्लासिक साहित्य ही नहीं, अपितु भारतीय भाषाओं के श्रेष्ठ साहित्य को अनुवाद के माध्यम से ही पढ़ा है। अनुवाद की महत्ता को समझते हुए बहुत सी पत्र पत्रिकाएं अनूदित रचनाएं अब स्थायी तौर पर नियमित छापने लगी हैं। पर दूसरी भाषाओं का साहित्य अभी हिन्दी पाठकों के सम्मुख टुकड़े टुकड़े रूप में आता है। ऐसे में हिन्दी की कुछ पत्रिकाओं ने भारतीय भाषाओं के साहित्य पर केंद्रित विशेषांक प्रकाशित कर बड़े काम भी किये हैं जिससे हिंदी के साहित्यप्रेमी पाठक क

अच्छी आदतें कैसे डाली जाय-

आदतें  ही मनुष्यता की पहचान है प्रस्तुति -  अनिल कुमार चंचल  बिना मनोयोग के कोई काम नहीं होता है। मन के साथ काम का सम्बन्ध होते ही चित्त पर संस्कार पड़ना आरंभ हो जाते हैं और ये संस्कार ही आदत का रूप ग्रहण कर लेते हैं। मन के साथ काम के सम्बन्ध में जितनी शिथिलता होती है, आदतों में भी उतनी ही शिथिलता पाई जाती है। यों शिथिलता स्वयं एक आदत है और मन की शिथिलता का परिचय देती है। असल में मन चंचल है। इसलिए मानव की आदत में चंचलता का समावेश प्रकृति से ही मिला होता है। लेकिन दृढ़ता पूर्वक प्रयत्न करने पर उसकी चंचलता को स्थिरता में बदला जा सकता है। इसलिए कैसी भी आदत क्यों न डालनी हो, मन की चंचलता के रोक थाम की अत्यन्त आवश्यकता है और इसका मूलभूत उपाय है- निश्चय की दृढ़ता। निश्चय में जितनी दृढ़ता होगी, मन की चंचलता में उतनी ही कमी और यह दृढ़ता ही सफलता की जननी है। जिस काम को आरम्भ करो, जब तक उसका अन्त न हो जाय उसे करते ही जाओ। कार्य करने की यह पद्धति चंचलता को भगाकर ही रहती है। कुछ समय तक न उकताने वाली पद्धति को अपना लेने पर फिर तो मनोयोग पूर्वक कार्य में लग जाने की आदत हो जाती है। तब मन अपनी आदत को

राधेसाम जी का तमगा / आलोक यात्री

 राधेसाम जी का तमगा / आलोक यात्री   हुआ यूं के... एम.ए. अंतिम वर्ष की परीक्षा देने से पहले ही मैं एक्सिडेंटल जर्नलिस्ट हो गया। कॉलेज से लौटते हुए एक दिन प्रलयंकर अखबार के मालिक संपादक श्री तेलूराम कांबोज जी ने हाथ पकड़ कर मुझे भाई श्री विनय संकोची के हवाले कर दिया। जर्नलिज्म में सलीके से एडजेस्ट हो पाता उससे पहले ही प्रलयंकर से मेरा डेरा-तंबू उखड़ गया। मेरा नया ठिकाना बना लखनऊ। जहां मुझे देश की नामी गिरामी दवा कंपनी में मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव का ओहदा मिल गया। लखनऊ लखनऊ ठहरा। नवाबों का शहर। मेरी ननिहाल और पिताश्री की ससुराल। भला हम से बड़ा नवाब कौन था?   एक उल्ट बात यह हुई कि भाई संकोची जी लखनऊ से गाजियाबाद पहुंचे थे और मैं वहां से लखनऊ। संकोची जी अखबार में "कह संकोची सकुचाए" कॉलम लिखा करते थे। अखबार में छपने से पहले प्रूफ रीडिंग में ही मैं संकोची जी के सकुचाने का रसानंद ले लिया करता था। इस कॉलम के मुख्य पात्र फुल्लू जी थे और हैं। संकोची जी जिस खूबसूरती से कॉलम लिखते हैं मैं उनका आज भी कायल हूं। उत्सुकतावश मैं उनसे लिखे कॉलम की सच्चाई पूछता रहता था और संकोची जी लखनऊ के अमीनाबाद

सोशल मीडिया और कामायनी / डॉ सकन्द शुक्ला

 जयशंकर प्रसाद की कामायनी का प्रथम पुरुष हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर बैठा भीगे नयनों से प्रलय-प्रवाह देख रहा है। वह नीचे कूद भी सकता है तैरने के लिए और गिर भी। गिरने और तैरने में किन्तु अन्तर बहुत बड़ा है। वैसे ही , जैसे अकेलेपन और एकान्त में।  सोशल मीडिया ग्लोबलाइज़ेशन की पुत्री है। स्थानीयता की जगह वैश्विकता जाति-धर्म-लिंग-नस्ल के बन्धनों को नहीं मानती। वह सबसे जुड़ना चाहती है और जुड़ती जाती है। उसके पास सबके लिए खुली बाँहें हैं : आओ और साथ मिल-बैठो यार !  लेकिन स्थानीयता के पास एक गुण था , जिससे वैश्विकता महरूम है। स्थानीयता के पास क्वॉलिटी थी। वैश्विकता के पास क्वॉन्टिटी चाहे जितनी हो , क्वॉलिटी का उसके पास टोटा है। सोशल मीडिया पर मित्र हज़ारों हैं, किन्तु वे सब आभासी दुनिया की ही हैं। वास्तविक मित्रों का प्रतिशत उनमें से बहुत न्यून ही पाया जाता है।  वह व्यक्ति जो दिनभर फ़ेसबुक पर रहता है , नितान्त अकेला है। वह एकान्तिक नहीं है , एकान्त में चुनाव का भाव जो होता है। एकान्त व्यक्ति स्वयं चुनता है , उसे किसी पर थोपा नहीं जाता। अकेलापन थोपा जाता है , वह एक प्रकार का अवांछित आरोपण ही है। एकान्

गीताश्री की नौ कविताएं

  गीताश्री  की कुछ कविताएं  ============================ पत्थर पर चोट करता है पत्थर  पत्थर पर चोट करता है पत्थर दोनों टूटते हैं थोड़े थोड़े दोनों चनक जाते हैं कई जगह से चोट करने वाला पत्थर क्यों नहीं समझता कि चोट करने से पहले ही टूट जाती है उसकी लय उसके भीतर का जीवन जिसमें जंगल उगाने की अपार ताक़त और संभावनाएँ होती हैं सूखा और निर्मम पत्थर सिर्फ़ चोट करना जानता है स्थिर , अपने भाग्य से जूझता हुआ निश्चेष्ट पत्थर एक दिन पूरा जंगल आयात कर लेता है. उसकी सुरक्षा वाहिनियों में तैनात हो जाते हैं कई कई ऐरावत अपनी सूँड़ों में भर कर आबे जम जम छिड़कते हैं वृक्षों पर पत्तों का हरापन धूप का उधार है मेघों के ज़रिये चुकाता है जंगल हर बरस , बरस बरस कर ... !! 2 खुद को थोड़ा छोड आई हूँ वहाँ /थोड़ा तुम संभाल लेना / मैं खुद को थोड़ा छोड आई हूँ वहाँ /थोड़ा तुम संभाल लेना / कुछ ले आई हूँ अपने साथ / जैसे कोई स्त्री ले जाती है अपने साथ लोकगीतों की कॉपी/  ब्याह के बाद उसका सबकुछ दूसरे तय करते हैं / कॉपी ले जाना वो खुद तय करती है / कि दर्ज होता है उसका समय /उसका उत्सव और उल्लास/ थोड़े दुख - दर्द...थोड़ा शुरु हो

साहित्यिक सफर पे गीताश्री का आत्मकथ्य

2013 से सीरियसली साहित्य का सफ़र शुरु हुआ था... उसी साल पहला कहानी संग्रह आया था. उसके पहले तीन किताबें आईं थीं जो कथेतर थीं.  पहली कहानी -2009 में लिखी. हंस में छपी. फिर कुछ दिन का विराम.  कहानियाँ लिख लिख कर रखती रही. कभी छपने भेज देती थी. कहीं से कोई कहानी लौटी नहीं. ज़्यादा पत्रिकाओं में भेजी भी नहीं. छपने की बहुत ख़्वाहिश इसलिए नहीं कि हम तो दूसरों को छापते रहे पच्चीस साल.  खुद भी छपते रहे. देश के नामी अख़बार, बेल पोर्टल और पत्रिका में काम किया. जो चाहिए.. सब हासिल किया. साहित्य की ओर लौटना था. कॉलेज के दिनों से साहित्यिक संस्था “ साहित्य कुंज “ चलाती थी. उस समय के साथी गवाह हैं. हमारी संस्था से जुड़े कई साथी आज स्थापित लेखक हैं.  हाँ तो...  कहानी लिखने लगी...गति तेज रखी. लोग अपनी किताबों और कहानियों की संख्या दिखाते थे, गिनाते थे. मुझे लगता था... उम्र इतनी हुई, कुछ न लिखा. गहरी हताशा होती थी. अपने नाकारेपन पर कोफ़्त.  फिर तेज दौड़ना शुरु किया...  सब काम छोड़ कर ...  पत्रिका बंद होने के बाद भी डिजीटल संपादक के रूप में साल भर काम किया. वहाँ मन न लगा. तब से खाली...  स्वतंत्र पत्रकार