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आओ फिर लौट चले

 *थोड़ा हटके.…* *"यदि जीवन के 50 वर्ष पार कर लिए है तो अब लौटने की तैयारी प्रारंभ करें.... इससे पहले की देर हो जाये... इससे पहले की सब किया धरा निरर्थक हो जाये....."* ✍️ *लौटना क्यों है*❓ *लौटना कहाँ है*❓ *लौटना कैसे है*❓ इसे जानने, समझने एवं लौटने का निर्णय लेने के लिए आइये टॉलस्टाय की मशहूर कहानी आज आपके साथ साझा करता हूँ : *"लौटना कभी आसान नहीं होता"* एक आदमी राजा के पास गया कि वो बहुत गरीब था, उसके पास कुछ भी नहीं, उसे मदद चाहिए... राजा दयालु था.. उसने पूछा कि "क्या मदद चाहिए..?" आदमी ने कहा.."थोड़ा-सा भूखंड.." राजा ने कहा, “कल सुबह सूर्योदय के समय तुम यहां आना.. ज़मीन पर तुम दौड़ना जितनी दूर तक दौड़ पाओगे वो पूरा भूखंड तुम्हारा। परंतु ध्यान रहे,जहां से तुम दौड़ना शुरू करोगे, सूर्यास्त तक तुम्हें वहीं लौट आना होगा, अन्यथा कुछ नहीं मिलेगा...!"   आदमी खुश हो गया... सुबह हुई..  सूर्योदय के साथ आदमी दौड़ने लगा... आदमी दौड़ता रहा.. दौड़ता रहा.. सूरज सिर पर चढ़ आया था.. पर आदमी का दौड़ना नहीं रुका था.. वो हांफ रहा था, पर रुका नहीं था... थोड़ा औ

महाभारत के नौ सूत्र सार

महाभारतो इस तरह पढ़े   यदि "महाभारत" को पढ़ने का समय न हो तो भी इसके नौ सार- सूत्र हमारे जीवन में उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं:- कौरव  1.संतानों की गलत मांग और हठ पर समय रहते अंकुश नहीं लगाया गया, तो अंत में आप असहाय हो जायेंगे कर्ण  2.आप भले ही कितने बलवान हो लेकिन अधर्म के साथ हों, तो आपकी विद्या, अस्त्र-शस्त्र-शक्ति और वरदान सब निष्फल हो जायेगा अश्वत्थामा  3.संतानों को इतना महत्वाकांक्षी मत बना दो कि विद्या का दुरुपयोग कर स्वयंनाश कर सर्वनाश को आमंत्रित करे.  भीष्म पितामह  4.कभी किसी को ऐसा वचन मत दो  कि आपको अधर्मियों के आगे समर्पण करना पड़े.  दुर्योधन  5.संपत्ति, शक्ति व सत्ता का दुरुपयोग और दुराचारियों का साथ अंत में स्वयंनाश का दर्शन कराता है.  धृतराष्ट्र  6.अंध व्यक्ति- अर्थात मुद्रा, मदिरा, अज्ञान, मोह और काम ( मृदुला) अंध व्यक्ति के हाथ में सत्ता भी विनाश की ओर ले जाती है.  अर्जुन  7.यदि व्यक्ति के पास विद्या, विवेक से बंधी हो तो विजय अवश्य मिलती है.  शकुनि  8. हर कार्य में छल, कपट, व प्रपंच रच कर आप हमेशा सफल नहीं हो सकते  युधिष्ठिर  9.यदि आप नीति, धर्म, व कर्म का सफलता

लघुकथा के साहनी / सुभाष नीरव

लघुकथा संसार   कथाकार मित्र सुकेश साहनी मुझसे बेशक आयु में तीन वर्ष छोटे हों, पर लेखक के तौर पर मेरे अग्रज और वरिष्ठ हैं। मुझे साहनी जी की लघुकथाएं प्रारम्भ से प्रभावित करती रही हैं और मैं इनकी अनेक लघुकथाओं को लघुकथा के मानक के रूप में  लेता रहा हूं। लघुकथा में  बारीकी और उसकी गुणवत्ता को कैसे अपने रचनात्मक कौशल से रचा - बुना जा सकता है, यह मैंने सुकेश साहनी की लघुकथाओं से सीखने की कोशिश की। कुछ नाम और हैं जैसे रमेश बतरा,  भगीरथ, सूर्यकांत नागर, बलराम अग्रवाल जिनकी लघुकथाओं ने मुझे सीखने - समझने की भरपूर ज़मीन दी। सुकेश भाई की न केवल लघुकथाएं, बल्कि इनकी कहानियां भी मुझे उद्वेलित और प्रेरित करती रही हैं। इनके भीतर का कथाकार ' कहानी ' और ' लघुकथा ' दोनों को साधने में सिद्धहस्त है। यही कारण है कि सुकेश मुझसे उम्र में छोटे होने के बावजूद मुझसे बड़े हैं। इनकी विनम्रता का तो मैं कायल हूं। बहुत से लघुकथा सम्मेलनों में मिलने और एक साथ मंच साझा करने का मुझे अवसर मिला है।  इनकी नई आलोचना पुस्तक "लघुकथा : सृजन और रचना - कौशल" कल मुझे डाक में मिली।     इसमें लघुकथाओं, ल

🙏 दाता की दया है 🙏

  *हे मेरे मालिक मैं तेरे चरणों का आशिक़ ‌हो गया हूं ।*  *इस  संसार के हालातों से तेरे सत्संग का दास हो गया हूं।।*  सुन रहा हूं सत्संग आपकी दया व मेहर से । उठा रहा हूं रुहानी लाभ इन बंदिशों में भी।। अविष्कारों  का उपयोग करना तो अब सीख रहा हूं । मगर तेरे दर्शन के वियोग में सब बेरंग महसूस  किये जा रहा हूं ।। हे मेरे दाता अब और सहा नही  जाता । तेरे दर्शन के बिना मेरा मन बार बार बेचैनी से भर जाता ।। मिल रही है भरपूर दया ई सत्संग शब्द सुनने की । मगर पूरी नहीं होती हसरत तुझसे मिलने की ।। मुझे अपने चरणों में लगा लें दाता । मैं तेरा दास हूं मुझे बुला ले दाता ।। दाता तेरे दर्शन को मैं तरस गया हूं । मैं सत्संग रोज सुनकर अपने आप को रोक रहा हूं ।। दिल करता है कि तेरे दर पे दौड़ आऊं, सब बंधन तोड़कर । मगर तेरे आदेशों का पालन कर अपने आप को रोक रहा हूँ ।। *हे मेरे मालिक मैं तेरे चरणों का आशिक़ ‌हो गया हूं।* *इस संसार के हालात से तेरे सत्संग का दास हो गया हूं।।* प्राथना कुल मालिक के चरणों में (SANT ADHAR BARODA BRANCH) *दाता जी की दया है* दाता जी की दया है कि हम सब बेख़ौफ़ जुड़े हैं  सत्संग  सुनने को मि

प्रेम उपदेश

 प्रेम उपदेश:-(परम गुरु हुज़ूर महाराज) 19. जिस किसी सच्चे प्रेमी का यह हाल है कि जब किसी की भक्ति की बढ़ती का हाल सुनता है, तब ही अपनी ओछी हालत से मिला कर सुस्त और फ़िक्रमंद हो जाता है, सो यह बहुत अच्छा है और यह निशान दया का है। इसी तरह इस जीव को ख़बर पड़ती है और अपनी हालतों को देखता है और अपने मत को चित्त से सुनता है और विचारता है। ग़रज़ कि इसमें सब तरह की गढ़त है, इसको दया समझो। 20. जो वक्त़ ध्यान और भजन के बजाय स्वरूप सतगुरु के कुटुम्बी और मित्रों की सूरतें नज़र आवें, उसका सबब यह है कि वह स्वरूप अभी हिरदे में धरे हैं, आहिस्ता आहिस्ता निकल जावेंगे। हुज़ूर राधास्वामी दयाल अपनी दया से सब तरह सफ़ाई करते हैं। 21. हुज़ूर राधास्वामी दयाल सब तरह से जीवों पर दया कर रहे हैं। और दया के भी अनेक रूप हैं, जैसे उदासी तबीयत की भी एक तरह की दया है। हर एक को यह उदासीनता नहीं मिलती। इसमें भी कुछ भेद है। ऐसा नहीं होता कि हर वक्त़ तबीयत सुस्त रहे, पर किसी क़दर सुस्ती और उदासीनता रहने से बड़े फ़ायदे हैं।       22. हुज़ूर राधास्वामी दयाल आप सबको अंतर में सँभालते हैं, पर एक सतसंगी दूसरे सतसंगी का हाल देख कर जो अपनी समझ के

आजकल में नवल की आलोचना

 रेणु  की यादों में नवल  नंदकिशोर नवल अगर हमारे बीच होते तो आज हम उनका 83 वां जन्मदिन मना रहे होते। बीती लगभग आधी सदी तक हिंदी साहित्य, खासकर कविता आलोचना के वे न केवल साक्षी रहे बल्कि उसके सक्रिय मार्ग-निर्धारक भी बने रहे। उन्होंने अपने आलोचकीय लेखन की शुरुआत छायावाद और उत्तर छायावाद से की। इसके बाद राजकमल चौधरी के प्रभाव में अकविता तथा अन्य प्रयोगवादी  कविता धाराओं के  वे प्रशंसक रहे और उनपर धाराप्रवाह लिखा।  राजकमल चौधरी की लंबी कविता 'मुक्ति प्रसंग' की उनकी व्याख्या कविता आलोचना के क्षेत्र में महत्वपूर्ण है। इसके जरिये वे 'मुक्ति प्रसंग' को 'अंधेरे में' के बाद हिंदी कविता की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में स्थापित करते हैं।      आगे चलकर नवलजी नक्सलवाद से भी प्रभावित हुए और उसके प्रभाव में आकर लिखी गई रचनाओं की व्याख्या और मीमांसा की। फिर वे मार्क्सवाद की ओर प्रवृत्त हुए और प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़कर प्रगतिशील और मार्क्सवादी  चिंतन से जुड़ी आलोचना की। इस दौरान प्रगतिशील चेतना वाले कवि मुक्तिबोध, नागार्जुन, त्रिलोचन, शमशेर आदि उनके प्रिय रचनाकार बने रहे।