पोस्ट

सितंबर, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हिन्दी लोकोक्तियां

जिसकी बंदरी वही नचावे और नचावे तो काटन धावे : जिसकी जो काम होता है वही उसे कर सकता है. जिसकी बिल्ली उसी से म्याऊँ करे : जब किसी के द्वारा पाला हुआ व्यक्ति उसी से गुर्राता है। जिसकी लाठी उसकी भैंस : शक्ति अनधिकारी को भी अधिकारी बना देती है, शक्तिशाली की ही विजय होती है. जिसके पास नहीं पैसा, वह भलामानस कैसा : जिसके पास धन होता है उसको लोग भलामानस समझते हैं, निर्धन को लोग भलामानस नहीं समझते. जिसके राम धनी, उसे कौन कमी : जो भगवान के भरोसे रहता है, उसे किसी चीज की कमी नहीं होती. जिसके हाथ डोई (करछी) उसका सब कोई : सब लोग धनवान का साथ देते हैं और उसकी खुशामद करते हैं. जिसे पिया चाहे वही सुहागिन : जिस पर मालिक की कृपा होती है उसी की उन्नति होती है और उसी का सम्मान होता है. जी कहो जी कहलाओ : यदि तुम दूसरों का आदर करोगे, तो लोग तुम्हारा भी आदर करेंगे. जीभ और थैली को बंद ही रखना अच्छा है : कम बोलने और कम खर्च करने से बड़ा लाभ होता है. जीभ भी जली और स्वाद भी न पाया : यदि किसी को बहुत थोड़ी-सी चीज खाने को दी जाये. जीये न मानें पितृ और मुए करें श्राद्

पिंगला

चित्र
पिंगला पूरा नाम रानी पिंगला पति/पत्नी राजा भर्तृहरि विवरण उज्जैन के शासक राजा भर्तृहरि की रूपवान पत्नी थी जिसे वे अत्यन्त प्रेम करते थे, जबकि वह महाराजा से अत्यन्त कपटपूर्ण व्यवहार करती थी। पिंगला उज्जैन के शासक राजा भर्तृहरि की रूपवान पत्नी थी जिसे वे अत्यन्त प्रेम करते थे, जबकि वह महाराजा से अत्यन्त कपटपूर्ण व्यवहार करती थी। भर्तृहरि के छोटे भाई विक्रमादित्य ने राजा भर्तृहरि को अनेक बार सचेष्ट किया था तथापि राजा ने उसके प्रेम जाल में फंसे होने के कारण उसके क्रिया-कलापों पर ध्यान नहीं दिया था। एक दिन जब उन्हें पूर्ण रूप से पता चला कि जिस रानी पिंगला को वह अपने प्राणों से भी प्रिय समझते थे, वह कोतवाल के प्रेम में डूबी है, उन्हें वैराग्य हो गया। वह अपार वैभव का त्याग करके अपने भाई विक्रमादित्य को राज्य देकर उसी क्षण राजमहल से बाहर निकल पड़े। लोककथा/अनुश्रुति एक समय श्री गुरु गोरखनाथ जी अपने शिष्यों के साथ भ्रमण करते हुए उज्जयिनी (वर्तमान में उज्जैन) के राजा श्री भर्तृहरि महाराज के

अल्मोड़ा

चित्र
मुख्य लेख : लोककथा संग्रहालय, भारतकोश अल्मोड़ा का एक दृश्य अल्मोड़ा से जुड़ी एक लोककथा भी है जिसके अनुसार- "छह सौ साल पुरानी बात है। उत्तराखण्ड में कुमाऊँ का एक राजा था। वह एक बार शिकार खेलने अल्मोड़ा की घाटी में गया। वहाँ घना जंगल था। शिकार की टोह लेने के दौरान वहीं झाड़ियों में से एक खरगोश निकला। राजा ने उसका पीछा किया। अचानक वह खरगोश चीते में बदल गया और फिर दृष्टि से ओझल हो गया। इस घटना से स्तब्ध हुये राजा ने पंडितों की एक सभा बुलाई और उनसे इसका अर्थ पूछा। पंडितों ने कहा इसका अर्थ है कि जहाँ चीता दृष्टि से ओझल हो जाय, वहाँ एक नया नगर बसना चाहिए, क्योंकि चीते केवल उसी स्थान से भाग जाते हैं, जहाँ मनुष्यों को एक बड़ी संख्या में बसना हो। नया शहर बसाने का काम शुरू हुआ और इस प्रकार छह सौ साल पहले अल्मोड़ा नगर की नींव पडी। इन्हें भी देखें : लोककथा संग्रहालय, मैसूर पन्ने की प्रगति अवस्था आधार प्रारम्भिक माध्यमिक पूर्णता शोध टीका टिप्पणी और संदर्भ संबंधित लेख भारतकोश में संकलित लोककथाऐं

लोककथाएँ 3

      श्रेणी:लोककथाएँ   "लोककथाएँ" श्रेणी में पृष्ठ इस श्रेणी में निम्नलिखित 45 पृष्ठ हैं, कुल पृष्ठ 45 अ अल्मोड़ा की लोककथा च चतुराई की लोककथा चन्द्रावल ज जनश्रुति झ झारखण्ड की लोककथा त तमिलनाडु की लोककथा-1 प पंजाब की लोककथा ब बुद्धि की लोककथा र राजस्थान की लोककथा ल लक्ष्मी माता की लोककथा लोककथा लोककथा संग्रहालय, भारतकोश लोहड़ी की लोककथा स सिंहासन बत्तीसी अट्ठाईस सिंहासन बत्तीसी अठारह स आगे. सिंहासन बत्तीसी आठ सिंहासन बत्तीसी इकत्तीस सिंहासन बत्तीसी इक्कीस सिंहासन बत्तीसी उनतीस सिंहासन बत्तीसी उन्नीस सिंहासन बत्तीसी एक सिंहासन बत्तीसी ग्यारह सिंहासन बत्तीसी चार सिंहासन बत्तीसी चौदह सिंहासन बत्तीसी चौबीस सिंहासन बत्तीसी छ: सिंहासन बत्तीसी छब्बीस सिंहासन बत्तीसी तीन सिंहासन बत्तीसी तीस सिंहासन बत्तीसी तेईस स आगे. सिंहासन बत्तीसी तेरह सिंहासन बत्तीसी दस सिंहासन बत्तीसी दो सिंहासन बत्तीसी नौ सिंहासन बत्तीसी पंद्रह सिंहासन बत्तीसी

लोककथा 2

चित्र
लोककथा से तात्पर्य किसी क्षेत्र विशेष में जनश्रुतियों के माध्यम से चली आ रही कथाएं हैं। इनका अस्तित्व पुरानी पीढ़ी से नयी पीढ़ी तक किंवदंती जनश्रुतियों के माध्यम से ही पहुंचता है। ये कथाएँ वे कहानियाँ हैं जो मनुष्य की कथा प्रवृत्ति के साथ चलकर विभिन्न परिवर्तनों एवं परिवर्धनों के साथ वर्तमान रूप में प्राप्त होती हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि कुछ निश्चित कथानक रूढ़ियों और शैलियों में ढली लोककथाओं के अनेक संस्करण, उसके नित्य नई प्रवृत्तियों और चरितों से युक्त होकर विकसित होने के प्रमाण है। एक ही कथा विभिन्न संदर्भों और अंचलों में बदलकर अनेक रूप ग्रहण करती हैं। लोकगीतों की भाँति लोककथाएँ भी हमें मानव की परंपरागत वसीयत के रूप में प्राप्त हैं। दादी अथवा नानी के पास बैठकर बचपन में जो कहानियाँ सुनी जाती है, चौपालों में इनका निर्माण कब, कहाँ कैसे और किसके द्वारा हुआ, यह बताना असंभव है। उदाहरणार्थ सिंहासन बत्तीसी , वेताल पच्चीसी , पंचतंत्र भारतकोश में संकलित ल

लोककथा 1

चित्र
छत्तीसगढ़ Chhattisgarh बकरी और बाघिन देही तो कपाल, का करही गोपाल महुआ का पेड़ बकरी और सियार चम्पा और बाँस कौआ - अनोखा दोस्त बकरी और बाघिन बहुत पुरानी बात है। एक गाँव में एक बुढ़ा और बुढिया रहते थे। वे दोनो बड़े दुखी थे क्योंकि उनके बच्चे नहीं थे। दोनों कभी-कभी बहुत उदास हो जाते थे और सोचते थे हम ही हैं जो अकेले जिन्दगी गुजार रहे हैं। एक बार बुढे से बुढिया से कहा - "मुझे अकेले रहना अच्छा नहीं लगता है। क्यों न हम एक बकरी को घर ले आये? उसी दिन दोनो हाट में गये और एक बकरी खरीदकर घर ले आये। चार कौरी में वह बकरी खरीद कर आये थे इसीलिये वे बकरी को चारकौरी नाम से पुकारते थे। बुढिया माई बहुत खुस थी बकरी के साथ। उसे अपने हाथों से खिलाती, पिलाती। जहाँ भी जाती चारकौटि को साथ ले जाती। पर थोड़े ही दिन में बकरी बहुत ही मनमानी करने लगी। किसी के भी घर में घुस जाती थी, और