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नाटक / कर्पूर मंजरी - सट्टक / भारतेंदु हरिश्चंद्र

प् रस्तुति-  राजेश सिन्हा दोहा भरित नेह नव नीर नित, बरसत सुरस अथोर। जयति अपूरब घन कोऊ, लखि नाचत मन मोर । प्रथम अंक (सूत्रधार आता है) सूत्रधार: (घूमकर) हैं क्या हमारे नट लोग गाने बजाने लगे? यह देखो कोई सखी कपड़े चुनती है, कोई माला गूंधती है, कोई परदे बांधती है, कोई चन्दन घिसती है; यह देखो बंसी निकली, यह बीन की खोल उतरी, यह मृदंग मिलाए गए, यह मंजीरा झनका, यह धुरपद गाया गया। (कुछ ठहर कर) किसी को बुलाकर पूछे तो (नेपथ्य की ओर देख कर) अरे कोई है? पारिपाश्र्वक आता है। पारि.: कहो, क्या आज्ञा है? सूत्र.: (सोच कर) क्या खेलने की तैयारी हुई? पारि.: हां, आज सट्टक न खेलना है। सूत्र.: किस का बनाया? पारि.: राज्य की शोभा के साथ अंगों की शोभा का; और राजाओं में बड़े दानी का अनुवाद किया। सूत्र.: (विचार कर) यह तो कोई कूट सा मालूम पड़ता है (प्रगट) हां हां राजशेखर का और हरिश्चन्द्र का। पारि.: हां, उन्हीं का। सूत्र.: ठीक है, सट्टक में यद्यपि विष्कम्भक प्रवेशक नहीं होते तब भी यह नाटकों में अच्छा होता है। (सोच कर) तो भला कवि ने इस को संस्कृत ही में क्यों न बनाया, प्राकृत में क्यो

जयशंकर प्रसाद की ऐतिहासिक कहानियां

चयन-संकलन-संपादन ममता शरण Asb.deo@gmail.com कथाक्रम 1-          तानसेन 2-          सिकंदरकी शपथ 3-          रसिया बालक 4-          चितौड़ ऊद्वार 5-          असोक 6-          जहांआरा 7-          देवदासी जयशंकर प्रसाद जयशंकर प्रसाद ( ३० जनवरी १८८९ - १४ जनवरी १९३७ ) हिन्दी के महानतम कवि , नाटकार , कथाकार , उपन्यासकार तथा निबन्धकारों में एक शिखर पुरूष थे। वे हिन्दी के   छायावादी युग   के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। उन्होंने हिंदी काव्य में छायावाद   की स्थापना की जिसके द्वारा   खड़ी बोली   के काव्य में कमनीय माधुर्य की रससिद्ध धारा प्रवाहित हुई और वह काव्य की सिद्ध भाषा बन गई। आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास में इनके कृतित्व का गौरव बेजोड़ है। वे एक युगप्रवर्तक लेखक थे जिन्होंने एक ही साथ कविता , नाटक , कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में हिंदी को गौरव करने लायक कृतियाँ दीं। कवि के रूप में वे निराला , पन्त , महादेवी के साथ छायावाद के चौथे स्तंभ के रूप में प्रतिष्ठित हुए है ; तो   नाटक लेखन में भारतेंदु   के बाद