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हिन्दी व्याकरण

प्रस्तुति-- डा. ममता शरण मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से हिंदी व्याकरण हिंदी भाषा को शुद्ध रूप से लिखने और बोलने संबंधी नियमों का बोध कराने वाला शास्त्र है। यह हिंदी भाषा के अध्ययन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसमें हिंदी के सभी स्वरूपों को चार खंडों के अंतर्गत अध्ययन किया जाता है। इसमें वर्ण विचार के अंतर्गत वर्ण और ध्वनि पर विचार किया गया है तो शब्द विचार के अंतर्गत शब्द के विविध पक्षों से संबंधित नियमों पर विचार किया गया है। वाक्य विचार के अंतर्गत वाक्य संबंधी विभिन्न स्थितियों एवं छंद विचार में साहित्यिक रचनाओं के शिल्पगत पक्षों पर विचार किया गया है। अनुक्रम 1 वर्ण विचार 1.1 वर्ण 1.2 स्वर 2 शब्द विचार 3 शब्द 3.1 संज्ञा 3.2 सर्वनाम 3.3 विशेषण 3.4 क्रिया 3.5 क्रिया विशेषण 3.6 समुच्चय बोधक 3.7 विस्मयादि बोधक 3.8 पुरुष 3.9 वचन 3.10 लिंग 3.11 कारक 3.12 उपसर्ग 3.13 प्रत्यय 3.14 संधि 3.15 समास 4 वाक्य विचार 4.1 वाक्य 4.2 काल 4.3 पदबंध 5 छन्द विचार 6 यह भी देखे 7 बाहरी कड़ियाँ वर्ण विचार मुख्य लेख : व

वाक्यविन्यास

प्रस्तुति-- ममता शरण किसी भाषा में जिन सिद्धान्तों एवं प्रक्रियाओं के द्वारा वाक्य बनते हैं, उनके अध्ययन को भाषा विज्ञान में वाक्यविन्यास , 'वाक्यविज्ञान' या सिन्टैक्स (syntax) कहते हैं। वाक्य के क्रमबद्ध अध्ययन का नाम 'वाक्यविज्ञान' कहते हैं। वाक्य विज्ञान, पदों के पारस्परिक संबंध का अध्ययन है। वाक्य भाषा का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग है। मनुष्य अपने विचारों की अभिव्यक्ति वाक्यों के माधयम से ही करता है। अतः वाक्य भाषा की लघुतम पूर्ण इकाई है। वाक्यविज्ञान का स्वरूप वाक्य विज्ञान के अन्तर्गत निम्नलिखित बातों का विचार किया जाता है- वाक्य की परिभाषा, वाक्यों और भाषा के अन्य अग् का सम्बन्धा, वाक्यों के प्रकार, वाक्यों में परिवर्तन, वाक्यों में पदों का क्रम, वाक्यों में परिवर्तन के कारण आदि। वाक्य विज्ञान के स्वरूप के विषय में डॉ॰ कपिलदेव द्विवेदी ने विस्तार से विवेचन किया है। उनका मत इस प्रकार हैः- वाक्य-विज्ञान में भाषा में प्रयुक्त विभिन्न पदों के परस्पर संबन्ध का विचार किया जाता है। अतएव वाक्य-विज्ञान में इन सभी विषयों का समावेश हो जाता है- वाक्य

प्रेमचंद / और इस तरह बन गए मुंशी प्रेमचंद

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डॉ. जगदीश व्योम प्रेमचंद जी के नाम के साथ 'मुंशी' कब और कैसे जुड़ गया? इस विषय में अधिकांश लोग यही मान लेते हैं कि प्रारम्भ में प्रेमचंद अध्यापक रहे। अध्यापकों को प्राय: उस समय मुंशी जी कहा जाता था। इसके अतिरिक्त कायस्थों के नाम के पहले सम्मान स्वरूप 'मुंशी' शब्द लगाने की परम्परा रही है। सुप्रसिद्ध साहित्यकारों के मूल नाम के साथ कभी-कभी कुछ उपनाम या विशेषण ऐसे घुल-मिल जाते हैं कि साहित्यकार का मूल नाम तो पीछे रह जाता है और यह उपनाम या विशेषण इतने प्रसिद्ध हो जाते हैं कि उनके बिना कवि या रचनाकार का नाम अधूरा लगने लगता है। साथ ही मूल नाम अपनी पहचान ही खोने लगता है। भारतीय जनमानस की संवेदना में बसे उपन्यास सम्राट 'प्रेमचंद' जी भी इस पारंपरिक तथ्य से अछूते नहीं रह सके। उनका नाम यदि मात्र प्रेमचंद लिया जाय तो अधूरा सा प्रतीत होता है। उपनाम या तख़ल्लुस से तो बहुत से कवि और लेखक जाने जाते हैं, किन्तु 'मुंशी' प्रेमचंद का उपनाम या तखल्लुस नहीं था। ऐसी स्थिति में प्रश्न यह उठता है कि 'प्रेमचंद' के नाम के साथ 'मुंशी' का क्या स

सुशीला दीदी

प्रस्तुति-- उपेन्द्र कश्यप राहुल मानव मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से सुशीला दीदी (५ मार्च १९०५ - १३ जनवरी १९६३) भारत के स्वतंत्रता संग्राम की एक क्रांतिकारी महिला थीं। जीवन वृत्त सुशीला दीदी का जन्म पञ्जाबराज्य के गुजरातमण्डल के दन्तो चुहाड़ में ५ मार्च १९०५ को हुआ था। १९२६ में जब वह कॉलेज की पढ़ाई कर रहीं थी, उनमें देश्प्रेम की भावना प्रबल हुई। इसके बाद वे भारत की स्वाधीनता के लिए काम करने वाले क्रांतिकारीी दल में शामिल हो गईं। क्रांतिकारी गतिविधियाँ १९२६ ई. में बिस्मिल, रोशन सिंह और राजेन्द्र लाहिड़ी को फाँसी दिये जाने की घटना ने सुशीला को क्रांतिकारी गतिविधियों की ओर मोड़ दिया। वे भगवती चरण बोहरा के साथ हिन्दुस्तान शोसलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन में शामिल हो गईं। सान्डर्स की हत्या के बाद उन्होने भगत सिंह के छिपकर रहने के लिये कोलकाता में एक घर की व्यवस्था की। असेम्बली पर बम फेकने के बाद जब भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त पकड़े गये तो सुशीला दीदी और दुर्गा भाभी ने मिलकर अन्य क्रांतिकारियों को भाग जाने में सहायता की। १ अक्टूबर १९३१ को उन्होने अन्य के साथ मिलकर

त्र्यंबक रघुनाथ देवगिरिकर

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प्रस्तुति--- नीलेश कुमार रानू, रुपेश कुमार  भारत डिस्कवरी प्रस्तुति लेख ♯ (प्रतीक्षित) गणराज्य कला पर्यटन दर्शन इतिहास धर्म साहित्य सम्पादकीय सभी विषय ▼ इस लेख का पुनरीक्षण एवं सम्पादन होना आवश्यक है। आप इसमें सहायता कर सकते हैं। "सुझाव" त्र्यंबक रघुनाथ देवगिरिकर महाराष्ट्र के प्रसिद्ध गांधीवादी नेता थे। इनका जन्म 25 नवंबर , 1896 ई. को हुआ था। इन्होंने देश-प्रेम की भावना से प्रेरित होकर देश की बहुमूल्य सेवा की। त्र्यंबक रघुनाथ ने एक पत्रकार के रूप में अपने व्यावसायिक जीवन की शुरुआत की थी। इनकी गिनती महाराष्ट्र के प्रमुख राजनीतिक कार्यकर्ताओं में की जाती है। त्र्यंबक रघुनाथ एक अच्छे लेखक के रूप में भी प्रसिद्ध थे, जिनकी रचनाएँ मुख्य रूप से मराठी में हैं। गाँधी जी का प्रभाव त्र्यंबक रघुनाथ देवगिरिकर ने 1920 ई. में पुणे से स्नातक करने के बाद अपना पूरा जीवन राष्ट्र की सेवा में समर्पित कर दिया। आरंभ में उन पर लोकमान्य तिलक और गोपालकृष्ण गोखले के विचारों का प्रभाव था। 1920 ई. में ही असहयोग आंदोलन आरंभ होने के बा