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समीक्षा -किताब गली / चंडीदत्त शुक्ला

किताब गली हरिंदर सिक्का का उपन्यास ‘कॉलिंग सहमत’ प्रेम और जुनून का अलहदा दस्तावेज है, जिसमें सच्चाई की खुशबू है और कल्पना की उड़ान भी है। जिन पाठकों को फिल्म ‘राजी’ अच्छी लगी हो, वे उपन्यास जरूर पढ़ सकते हैं... सिनेमा जैसी रोचक कथा कॉलिंग सहमत उपन्यासकार – हरिंदर सिक्का प्रकाशक – पेंगुइन बुक्स, दिल्ली मूल्य – 199 रुपए मेघना गुलज़ार निर्देशित ‘राजी’ ने दर्शकों का भरपूर प्यार हासिल किया। चुस्त स्क्रीनप्ले और सधे निर्देशन की खूब तारीफ हुई और फिल्म सफल रही। हरिंदर सिक्का की किताब ‘कॉलिंग सहमत’ पर ही ये फिल्म आधारित है। मूल किताब पढ़ना कई मायनों में दिलचस्प है। सबसे पहले तो यही कि जिन लोगों ने फिल्म देखी है, वे किताब के उन हिस्सों का आनंद भी ले सकेंगे, जिनका सिनेमा में जिक्र तक नहीं है। लेखक ने ‘कॉलिंग सहमत’ में शब्दों के जरिए जिस तरह दृश्यों के कोलाज बनाए हैं, वे अपने आप में अनूठा चलचित्र गढ़ते हैं। उपन्यास की कहानी फिल्म की कथा से भिन्न नहीं है, इसलिए उसका जिक्र करना पाठकों और दर्शकों, दोनों के लिए खुलासे और रसभंग जैसा होगा। मोटे तौर पर एक मासूम लड़की की दास्ता

रवि अरोड़ा की नजर से

जाएँगे कहाँ सूझता नहीं रवि अरोड़ा चलिये आज आपको एक पुराने गाने की कुछ पंक्तियाँ सुनाता हूँ । काग़ज़ के फूल फ़िल्म के इस ख़ूबसूरत गीत को कैफ़ी आज़मी ने लिखा और गीता दत्त ने गाया था । गीत के बोल थे- वक़्त ने किया क्या हसीं सितम ...जाएंगे कहाँ सूझता नहीं ,चल पड़े मगर रास्ता नहीं, क्या तलाश है कुछ पता नहीं, बुन रहे हैं दिल ख़्वाब दम-ब-दम...वक़्त ने किया...। अब आप पूछ सकते हैं कि आज यह गाना क्यों ? दरअसल सुबह श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के समाचार नेट पर  देख रहा था और पाया कि एक दो नहीं वरन दर्जनों ट्रेनें जानी कहीं होती हैं और पहुँच कहीं रही हैं । जी हाँ पूरी इकहत्तर श्रमिक ट्रेनें अनजाने शहरों में पहुँच गईं हैं। यही नहीं दो दिन में पहुँचने वाली ट्रेन को नौ नौ दिन लगे हैं । अब आप स्वयं ही तय करें कि एसे में भला किसे यह गीत याद नहीं आएगा- जाएँगे कहाँ सूझता नहीं । बेशक मोदी सरकार की ट्रेनें भी वैसी ही चल रही हैं जैसी ख़ुद सरकार चल रही है अथवा जैसा कैफ़ी साहब ने उपरोक्त गीत में बरसों पहले लिखा था । जैसे सरकार रोज़ अपना रूट बदलती है और जाना था जापान पहुँच गए चीन वाली स्थिति में है , कमोवेश

लघुकथा -मेरी ढाल / सीमा मधुरिमा

मेरी ढाल .... ऑफिस में सभी उसके बारे में बातें करते थे ...अक्सर लोगों की काना फूसि होने लगती जहाँ से वह गुजर जातीं ...पर पूजा को जाने ये सब क्यों अच्छा नहीं लगता था ...पहले ही दिन से वो उसके प्रति आकर्षित होने लगी थी शायद ईश्वरीय इक्षा होंगी ....जल्द ही दोनों बहुत अंतरंग सहेली बन गयीं l तीन महीने बीत गए थे पूजा उससे वो बात पूछने से कतराती रही पर उसके मन में पूछने का ज्वार हमेशा उठता ही रहता था l वो आपने नाम रूपा की तरह ही बेहद खूबसूरत थी और किसी भी उर्वशी और मेनका को सुंदरता में टक्कर देती थी उम्र से चौतीस पैतीस साल की होंगी l अपने अधिकारी की भी उस पर विशेष कृपा थी जो प्रत्यक्षतः समझ में भी आती थी ...एक दिन हिम्मत करके पूजा ने उससे पूछ ही लिया , " देख रूपा अगर बुरा न मान तो एक बात पूछना था तुझसे .....पर तू भरोसा रख बात मुझ तक ही रहेगी ," रूपा बड़े ही बिंदास लहजे में सतर्क होकर बोली , " हाँ तो पूछ न क्या पूछना हैं ....और तू निश्चिन्त रह तुझे सब बतायुंगी , " पूजा धीमे स्वर में बोली , " असल में ऑफिस में सबसे सुना हैं वही तुझसे कन्फर्म करना चाहती थी ....मैं

लघुकथा / सीमा मधुरिमा

लघुकथा समाज बड़ा की माँ का प्रेम "ये क्या कह रही हो माँ , मैं तुम्हारा रामु बोल रहा हूँ ....वही रामु जिसको एक नजर देखने के लिए कितनी मिन्नतें करती हो ...आज ज़ब मै पांच सौ किलोमीटर इस पैर से पैदल चलकर आया हूँ  ..भूखा भी हूँ और प्यासा भी तुम्हारे पास आना चाहता हूँ तुम्हारे गोद में सर रखकर बहुत रोना चाहता हूँ और तुमसे क्षमा माँगना चाहता हूँ तुम्हारे कितना मना करने पर भी मैं शहर के चमक के आगे नहीं माना और दर दर की ठोकरे खाने चला गया .....बहुत भूखा हूँ माँ सबसे ज्यादा तो तेरे प्यार का भूखा हूँ  ....ऐसे में तुम इतनी कठोर कैसे हो गयी माँ बताओ ..  बताओ न माँ , " उधर से माँ की आवाज आयी , " बेटे मेरे लाल ....मेरे जिगर के टुकड़े  ...तू मुझे गलत मत समझ ...आज जो विकट परिस्थिति आन पड़ी हैं यही तेरे माँ की और तेरी भी असली परीक्षा की घड़ी हैं ....आज माँ बेटे के प्यार से बढ़कर धरती माँ का प्यात हैं हमारी इस गावं का प्यार हैं ....तेरे अपने लिए भी यही ठीक हैं .  ...देख हमारी यशस्वी मुख्यमंत्री जी ने जो सेंटर बनवाया हैं वही चौदह दिन का समय बीता ले तब ही गावं में पैर रखना .....देख प्रभु श

वेश्या व्यथा / महाकवि फेसबुकिया बाबा

कोरोना काल में वेश्या व्यथा —————————————— इस जिंदगी से अच्छी तो बिकी जिंदगी थी साठ दिन से ग्राहकों का नाज़ुक इंतजार बिक्री बाकी है मेरे बिकने में शामिल है मेरी भूख उम्मीदों की साँसें मेरे बिकने में शामिल है मेरा गरीब बाप मेरी मजबूर माँ मेरे बिकने में शामिल है शहर कोतवाल वो सभी रईस जिनकी आदमियत फना हो गई है मेरे बिकने में शामिल है वो  ठेकेदार जिसने मुझे बच्ची से नगर वधू बना दिया मेरे बिकने से मिलती है मेरे परिवार को रोटी मेरी माँ को दवाई मेरी बहन को कपड़े और मुझे मिलती है तसल्ली झूठी ही सही।

क्या कहूँ / महाकवि वाट्स एप्प महाराज

*तुझे क्या कहूं ?* *बीमारी कहूं कि बहार कहूं* *पीड़ा कहूं कि त्यौहार कहूं* *संतुलन कहूं कि संहार कहूं* *कहो तुझे क्या कहूं* मानव जो उदंड था पाप भी  प्रचंड था सामर्थ का घमंड था प्रकृति को करता खंड खंड नदियां सारी त्रस्त थी सड़के सारी व्यस्त थी जंगलों में आग थी हवाओं में राख थी कोलाहल का स्वर था खतरे  मे हर जीवो का घर था फिर अचानक तू आई ? मृत्यु का खौफ लाई ? मानवों को डराया विज्ञान भी घबरा गया  ? लोग यूं मरने लगे ? खुद को घरों में भरने लगे इच्छा  को सीमित करने लगे प्रकृति से डरने लगे अब लोग सारे बंद है नदियां भी स्वच्छंद है हवाओं में सुगंध है वनों में आनंद है जीव सारे मस्त हैं वातावरण भी स्वस्थ है पक्षी स्वरों में गा रहे तितलियां इतरा रही *अब तुम ही कहो तुझे क्या कहूं?* *बीमारी कहूं कि बहार कहूं* *पीड़ा कहूं कि त्यौहार कहूं* *संतुलन कहूं कि संहार कहूं* *कहो तुझे क्या कहूं.?*

बिहारी होने पर गर्व है क्योंकि.......

प्रस्तुति - अमिताभ सिंह बिहार -जहाँ भगवान राम की पत्नी सीता का जन्म हुआ बिहार -जहाँ महाभारत के दानवीर करण का जन्म हुआ बिहार - जहाँ सबसे पहले महाजनपद बना! बिहार - जहा बुद्ध को ज्ञान मिला बिहार -जहाँ भगवान महावीर का जन्म हुआ बिहार -जहाँ सिखों के गुरु गोविंद सिंह जी का जन्म हुआ बिहार - जहाँ के राजा चन्द्रगुप्त मौर्या से लड़ने की हिम्मत सिकंदर को भी नही हुई बिहार - जहाँ के राजा महान अशोक ने अरब तक हिंदुस्तान का पताका फहराया बिहार - राजा जराशंध,पाणिनि(ज िसने संश्कृत व्याकरण लिखा ) आर्यभट, चाणक्य(महान अर्थशात्री ) रहीम, कबीर का जन्म हुआ ! बिहार - जहाँ के ८० साल के बूढ़े ने अंग्रेजो के दांत खट्टे कर दिए (बाबु वीर कुंवर सिंह ) बिहार - जिसने देश को पहला राष्ट्रपति दिया बिहार - जहाँ के गोनू झा के किस्से पुरे हिंदुस्तान में प्रशिद्ध है ! बिहार - जहाँ महान जय प्रकाश नारायण का जन्म हुआ ! बिहार - जहाँ भिखारी ठाकुर (विदेशिया) का जन्म हुआ ! बिहार - जहाँ शारदा सिन्हा जैसी महान भोजपुरी गायिका का जन्म हुआ ! बिहार - जहाँ - स्वामी सहजानंद सरस्वती, राम शरण शर्मा, राज कमल झा , विद्

मुन्नवर राणा की गजल

बादशाहों को सिखाया है क़लंदर होना आप आसान समझते हैं मुनव्वर होना एक आँसू भी हुकूमत के लिए ख़तरा है तुम ने देखा नहीं आँखों का समुंदर होना सिर्फ़ बच्चों की मोहब्बत ने क़दम रोक लिए वर्ना आसान था मेरे लिए बे-घर होना हम को मा'लूम है शोहरत की बुलंदी हम ने क़ब्र की मिट्टी का देखा है बराबर होना इस को क़िस्मत की ख़राबी ही कहा जाएगा आप का शहर में आना मिरा बाहर होना सोचता हूँ तो कहानी की तरह लगता है रास्ते से मिरा तकना तिरा छत पर होना मुझ को क़िस्मत ही पहुँचने नहीं देती वर्ना एक ए'ज़ाज़ है उस दर का गदागर होना सिर्फ़ तारीख़ बताने के लिए ज़िंदा हूँ अब मिरा घर में भी होना है कैलेंडर होना                                  #  मुनव्वर राना. .

साजन घर नहीं आए /सुरेन्द्र ग्रोस - मुंबई

बरसन  लागे  कारे  बदरवा। मोरे  साजन  घर  नहीं आए।। रात  अंधेरी  बिजुरी  चमके मोरा रह रह  जीया  घबराए मोरे साजन  घर  नहीं  आए।। उन  बिन  रैना काटन  लागे मोहे   कैसन  नींदिया  आए‌ मोरे  साजन  घर नहीं  आए।। जागत   सारी  रतिया   बीती  मैं   बैठी  रही   दीप  जलाए मोरे  साजन  घर  नहीं  आए।। जा  बदरा जा  उनसे कहियो अब  और  ना   मोहे  सताये मोरे  साजन  घर  नहीं  आए।। बरसन  लागे   कारे   बदरवा मोरे  साजन  घर  नहीं  आए।। - सुरेन्द्र ग्रोस मुंबई।। ।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।

रवि अरोड़ा की नजर में

न ज्ञान न बुद्धिमत्ता रवि अरोड़ा पता नहीं किसने बताई थी मगर यह बात बचपन से ही दिमाग़ में बैठ गई कि ज्ञान नहीं भी हासिल कर सको तो कोई बात नहीं मगर बुद्धिमत्ता का दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिये । सामने वाले को परखने का अपना पैमाना भी यही रहता है कि उसके पास नॉलेज अधिक है या विस्डम । कोरोना संकट के इस काल में मैं शर्त लगा कर कह सकता हूँ कि हमारे सत्तानशीं लोगों के पास न तो नॉलेज है और न ही विस्डम । नॉलेज यानी ज्ञान होता तो उन्हें पता होता कि यूँ रातों रात लॉकडाउन लगाने से करोड़ों ग़रीब गुरबा लोगों के लिये नारकीय हालात पैदा हो जाएँगे और यदि उनके पास विस्डम यानी बुद्धिमत्ता होती तो उन्हें दो महीने नहीं लगते इस करोड़ों लोगों की सुध लेने में । मेरे शहर के घंटाघर रामलीला मैदान में न जाने कहाँ कहाँ से आज दस हज़ार से अधिक प्रवासी आ जुटे । प्रदेश सरकार को अब इनकी सुध आई है और उन्हें स्पेशल ट्रेन से उनके जनपद भेज रही है । रामलीला मैदान की जो भी ख़बरें दिन भर मिलीं वह हिला देने वाली थीं । किसी ने बताया कि वहाँ आदमी पर आदमी चढ़ा हुआ है तो किसी ने बताया कि लॉकडाउन और सोशल डिसटेंसिंग की एसी धज्ज

कवि कविताएं और कोरोना काल / संजय कुंदन

कई लोग परेशान हैं कि कोरोना संकट के इस दौर में इतनी कविताएं क्यों लिखी जा रही हैं। ऐसा सोचने वालों के भीतर कहीं न कहीं यह भाव है कि कविता लिखना कोई दोयम दर्जे का काम है। यह तो कोई हल्की-फुल्की चीज है, मनोरंजन की चीज । बताइए, एक तरफ लोग इतनी मुश्किलें झेल रहे हैं और आप कविता लिख रहे हैं! ऐसा कहने वालों को यह नहीं मालूम कि संकट के दौर में ही सबसे ज्यादा कविताएं लिखी गई हैं। आपातकाल में सत्ता की तानाशाही के खिलाफ धर्मवीर भारती, रघुवीर सहाय और नागार्जुन जैसे प्रतिष्ठित कवि तो लिख ही रहे थे प्रायः हर शहर में कवियों की एक जमात खड़ी हो गई थी। बिहार में रेणु की अगुआई में सत्यनारायण, गोपीवल्लभ सहाय और परेश सिन्हा  जैसे कवि लगातार लिखकर आपातकाल का विरोध कर रहे थे। इसके अलावा कितने ही ऐसे कवि लिख रहे थे, जिनके नाम कोई नहीं जानता। नक्सलबाड़ी आंदोलन के समय भी यही हाल था, जिसने हिंदी को वेणु गोपाल, कुमार विकल और आलोकधन्वा जैसे कवि दिए। आंदोलन में शामिल हर दूसरा व्यक्ति आंदोलन में अपनी भूमिका निभाने के साथ कविता भी जरूर लिख रहा था। थोड़ा पीछे चलें तो 1962 में भारत पर चीन आक्रमण के समय तो गांव-गां

दिनेश श्रीवास्तव की दो दर्जन कविताएं

दिनेश श्रीवास्तव: दिनेश की कुण्डलिया -------------------------         विषय- "योद्धा''                         (१) कहलाता योद्धा वही,तरकस में हों तीर। धीर वीर गंभीर हो,जैसे थे रघुबीर।। जैसे थे रघुबीर,राक्षसी वंश विनाशा। उनसे ही तो आज,देश ने की है आशा।। कहता सत्य दिनेश,न्याय का पाठ पढ़ाता। सद्गुण से हो युक्त,वही योद्धा कहलाता।।                          (२) आओ अब तो राम तुम,योद्धा बनकर आज। यहाँ'कॅरोना'शत्रु को,मार बचाओ लाज।। मार बचाओ लाज,किए संग्राम बहुत हो। वीरों के हो वीर,किए तुम नाम बहुत हो।। करता विनय दिनेश,शत्रु से हमे बचाओ। मेरे योद्धा राम!आज धरती पर आओ।।                          (३) करना होगा आपको,बनकर योद्धा वीर। एक 'वायरस' शत्रु से,युद्ध यहाँ गंभीर।। युद्ध यहाँ गंभीर,हराना होगा उसको। एक विदेशी शत्रु,यहाँ भेजा है जिसको।। 'घरबंदी' का शस्त्र, हाथ मे होगा धरना। लेकर मुँह पर मास्क,युद्ध को होगा करना।।                        (४) बनकर योद्धा राम ने,रावण का संहार। जनक नंदिनी का किया,लंका से उद्धार। लंका से उद्

सवाल बना हुआ है / रिफ़त शाहीन

कहानी सवाल बना हुआ है सिंक में पड़े ढ़ेर सारे बर्तनों ने नीलिमा को आज फिर मुँह चिढ़ाया ... पिछले एक महीने से वो इन कलमुंहे बर्तनों दो दो हाथ कर रही थी .... मगर बर्तन थे कि उसके सब्र का इम्तेहान लेने से बाज़ ही नही आ रहे थे | जितनी बार उन्हे धो कर रखो अगली सुबह फिर एक ढ़ेर इकट्ठा ... थक गई थी नीलिमा .... इस लॉकडाउन ने उसे एक ऐसे इम्तेहान में ड़ाल रखा था कि उसे कुछ अच्छा ही नही लग रहा था | ऊपर से पतिदेव का ये जुमला .... दो चार बरतन ही तो धोने पड़ते हैं तुमको ,खाना तो मैं ही बना लेता हूँ ... औरत हो क्या इतना भी नही कर सकती? वो तुनक कर कहती | तो तुम ही धो लिया करो दो चार बरतन ...? ओके चलो मैं धो लेता हूँ.... आज से ड्यूटी चेंज , तुम खाने कि ज़िम्मेदारी लो मैं बरतन धो लेता हूँ | वो इस डील पर इसलिए तयार नही थी कि बरतन तो केवल सुबह धोने पड़ते हैं मगर खाना तो तीनों समय बनता है ... खाना बनाना मतलब सारे दिन कि आहुती ... वो पति को घूरती... कोरोना को कोसती ... भुनभुनाती हुयी किचन में जाती और अपना सारा गुस्सा उन बरतनो पर निकालती जिसे कभी बड़े चाव से ख़रीद कर लाई थी और इन्ही बरतनो के कारण महरी को हर रो

सरकारी कहानी / अपर्णा

_सरकारीकहानी_           🔛                प्रस्तुत है एक कहानी जिसके सभी पात्र और घटनाएं काल्पनिक है और किसी व्यक्ति या घटना से इसका मेल संयोग मात्र नहीं है...                    एक स्कूल है सरकारी......अध्यापक है, अध्यापिकाएं है,बाबू है,चपरासी है,छात्र है,और एक हेड मास्टर साहब है।              अब होता ये है कि ये हेडमास्टर साहब बहुत काबिल आदमी हैं , सर्व गुण संपन्न,और अपार बल शाली (हालांकि ऐसा वो खुद ही कहते फिरते है) पूरे गांव में धौंस है उनकी कि वहीं है जो इस खस्ताहाल सरकारी स्कूल की हेडमास्टरी कर रहे हैं ,और वहीं है जो इस स्कूल बेड़ा पार लगाएंगे, कोई भी उनकी तनख्वाह, भत्ते और अन्य सुविधाओं के विषय में कुछ बात नहीं करता, इतने बड़े व्यक्ति को ऐसे तुच्छ प्रश्नों में उलझाना लोग ठीक नहीं मानते।                        तो रोज़ ये होता है कि सुबह स्कूल खुलते ही हेडमास्टर साहेब छात्रों को उच्च नैतिक आदर्श, राष्ट्र प्रेम, सार्वभौमिक छवि, शिक्षा के महत्व,और रोज़गार के विषय पर पूरा लबालब करके, तालियां बाजवा के अपने काम पर लगते हैं, छात्र भी गदगद, स्टाफ भी गदगद, और स्वयं हेडमास्टर साहे

कविता रायजादा की कुछ रचनाएँ

*साधना* मै कल्पना करती हूं , ऐसे जीवन की जो। सहज हो, सरल हो, निश्चल हो और सुखमय हो। मै कामना करती हूं एसे जगत की जो वास्तविकता से परे हो अतीत से अनभिज्ञ हो। मै वर्तमान की उपेक्षा करके स्वप्नलोक में विचरण करने लगती हूं। किसी के सुंदर भवन को देखकर उसकी छवि को अंतर मे बैठा लेती हूं और जब कोई वस्तु पसंद आ जाती है तो उसे उस भवन में लाकर सजा देती हूं। आहिस्ता आहिस्ता भवन मै भीड़ इकट्ठी हो जाती है और मै स्वयं को विस्मृत कर बैठती हूं। फिर सोचने लगती हूं की शायद उस विस्मृति को खोजने का नाम ही साधना है। डॉ कविता रायजादा लघु कथा *मालकिन* पांच साल की सोमा घर के एक कोने में छिपी रोज़ देखती थी अपनी माँ को मालकिन से पीटते हुए।उसकी मालकिन की यातनाये मा के प्रति इतनी बढ़ गई थी कि वह देख नही पाती थी,सहम जाती थी, डर के मारे एक कोने में छिप जाती थी वह यह समझ ही नही पाती थी कि उसकी इतनी अच्छी माँ को मालकिन आखिर क्यों सताती है। रात में जब वह माँ के पास सोती थी तो देखती थी कि उसकी माँ के काम कर करके पूरे घर के बर्तन राख से मांज माज़कर हाथों की रेखायें तो मानो जैसे गायब सी

सबकी कसौटी पर हरदम खरा रहे नवल जी

संजय कुंदन कल रात जब मेरे गुरु और हिंदी के वरिष्ठ आलोचक नंदकिशोर नवल के निधन की खबर आई तो मुझे अपने छात्र जीवन के उन दिनों की याद आई जब हम मानते थे कि नवल जी तो कभी बूढ़े भी नहीं हो सकते। उनका व्यक्तित्व ही ऐसा था। उन दिनों वह किसी हीरो की तरह दिखते थे। वैसे भी वे विद्यार्थियों के लिए हीरो ही थे। खासकर उनके लिए जो मार्क्सवादी थे और साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय होना चाहते थे। ...अभी लॉकडाउन से कुछ ही दिनों पहले अचानक उनका फोन आया। उन्होंने कहा-पहचानो मैं कौन हूं। मैं भला उनकी आवाज कैसे नहीं पहचानता। मैंने उन्हें प्रणाम किया। उन्होंने कहा-अभी-अभी तुम्हारा काव्य संग्रह तनी हुई रस्सी पर पढ़कर खत्म किया है। मैंने उसके अंतिम पृष्ठ पर लिखा है-वंडरफुल। वे बहुत खुश लग रहे थे। उन्होंने कहा-मुझे खुशी है कि तुम्हारा लगातार विकास हो रहा है। उन्होंने मेरी पत्नी और बेटे का हालचाल पूछा। और कहा कि अगली बार पटना आना तो जरूर मिलना। मुझे पता नहीं था कि यह मेरी उनसे आखिरी बातचीत है। मेरे जीवन पर जिन कुछ लोगों ने बहुत गहरा असर डाला उनमें नवल जी भी थे। विश्वविद्यालय में मैं उनका छात्र तो बहु

विवाह ?? / अजय श्री

विवाह..! वन में विचरण करते हुए ,दो सुन्दर युवा राजकुमारों राम और लक्ष्मण को देखती है तो मोहित हो जाती है |मायावी होने के कारण सुन्दर स्त्री का रूप धारण कर एवं भाई रावण के बल अहंकार में ,उसे लगता है कि दोनों राजकुमारों में से कोई न कोई तो उससे विवाह कर लेगा !आश्वस्त हो वह उनकी कुटिया में पहुँच जाती है |राम और लक्ष्मण को अपने सम्मुख पाकर मंत्रमुग्द्ध हो राम से अपने सौन्दर्य का वर्णन कर विवाह प्रस्ताव देती है | श्रीराम मंद-मंद मुस्कुराते हुए निश्क्षल भाव से कहते है :–देवी मेरा विवाह हो चुका है ,और माता सीता को बुलाते हैं  |आवाज सुन कर वो बाहर आती हैं | एक दूसरे से परिचय उपरान्त ,माता सीता सुपर्न्खा को प्रणाम कर मुस्कुराती हैं | यह दृश्य देख वह व्यथित हो उठती है और श्री राम से कहती है –यदि तुम विवाह नहीं कर सकते तो अपने भाई से कहो वह मुझसे विवाह कर ले !लक्ष्मण बिना देर किये बोल उठते हैं –नहीं देवी कदापि नहीं ,असंभव |सूपर्णखा क्रोधित हो चीख पड़ती है: –“मैं राक्षस कुल से हूँ ,मेर भ्राता प्रकाण्ड पंडित और महाबली लंकेश हैं ;तुम वनवासीयों का इतना दुस्साहस ,मेरे जैसे रूपवान और महाबलशाली

राकेश रेणुका की काव्यात्मक अभिव्यक्ति

लाक डाऊन में हमारे कवि : राकेशरेणु 🍂☘️🍂☘️🍂☘️🍂☘️🍂☘️🍂☘️           बिहार के सीतामढी में सत्रह अगस्‍त उन्‍नीसौ त‍िरसठ को जन्मे कवि राकेशरेणु भारतीय सूचना सेवा से सम्बद्व है । सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा प्रकाशित साहित्य  संस्कृति पत्रिका आजकल के वरिष्ठ  संपादक है । इस नाते दिल्ली में नौकरी करते है और केन्द्रीय बिहार नोएडा में रहते है किन्तु  राकेशरेणु इतने साल दिल्ली नोएडा में रहने के बावजूद भी दिल्लीयन या नोएडेयन नही हो पाये है । सीतामढी उनमें रचता बसता है । सरल, सहज स्वभाव के राकेशरेणु चकाचौध से दूर रह सादा जीवन जीने वाले और काव्य साधना करने वाले कवि है।            ख्यात लेखक प्रभात रंजन,जो सीतामढी के ही है, बताते है कि  शायद इस बात को राकेश जी भी न जानते हों कि सीतामढ़ी में रहते हुए अपने शहर के जिस बड़े लेखक-कवि की तरह मै बनना चाहता था वे राकेशरेणु ही थे । राकेशरेणु की कविताएं , लेख देश भर के तमाम पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है । अभी तक उनके दो कविता संग्रह रोजनामजा और इसी से बचा जीवन प्रकाशित हो चुके है । राकेशरेणु के संपादन में समकालीन हिन्दी  कहानियॉ, समकालीन

सुबह को आंखों में जगाये रखना / सुरेन्द्र सिंघल

अभी तो रात की स्याही को और बढ़ना है  और भी वहशी अभी होगा सिरफिरा साया रगों में और अभी दौड़ न पायेगा लहू रगों में और अभी जमता चला जाएगा खौफ अभी तो गाड  खुदा ईश्वर भी खुद डर कर मंदिरों मस्जिदों गिरजों में ही रहेंगे बंद रहेंगे बैठे ख़ज़ानों पे कुंडली मारे अभी तो मजहबी उत्पात मचायेंगे और अभी तो और जमातें निकल के आयेंगी सिर्फ तबलीगी नहीं श्रद्धालु भी नहीं पीछे  अभी तो भूख भी सड़कों पे करेगी तांडव अभी बदन का पसीना भी होगा बेइज्जत अभी जो घर से हैं बाहर घरों को तरसेंगे  अभी जो घर में हैं उन पे भी घर की दीवारें तंग होती ही चली जाएंगीं सांस लेने को छटपटाएंगे वे अभी तो ख़्वाब भी आंखों में तोड़ देंगे दम अभी तो और लगाएंगी घात छिपकलियाँ अभी तो और नहाएगा रक्त में बिस्तर भूमिगत हैं जो अभी तक निकल के आएंगे और तिलचट्टे रेंगने तन पर और तिलचट्टे रेंगने मन पर  अभी से कांप उठे सिर्फ शुरुआत है ये अभी अंधेरे के उस पार भी अंधेरा है अभी तो लंबी लड़ाई है सबको लड़नी है और इसके लिए तैयार करना है खुद को अभी है दूर बहुत दूर बहुत दूर सुबह अभी सुबह की तरफ लालसा से मत देखो टूट जाओगे चांद

तुझे क्या कहूँ

*तुझे क्या कहूं* *बीमारी कहूं कि बहार कहूं* *पीड़ा कहूं कि त्यौहार कहूं* *संतुलन कहूं कि संहार कहूं* *कहो तुझे क्या कहूं* . *मानव जो उदंड था* *पाप का प्रचंड था* *सामर्थ्य का घमंड था* *मानवता खंड-खंड था* . *नदियां सारी त्रस्त थी* *सड़के सारी व्यस्त थी* *जंगलों में आग थी* *हवाओं में राख थी* *कोलाहल का स्वर था* *खतरे में जीवो का घर था* *चांद पर पहरे थे* *वसुधा के दर्द बड़े गहरे थे* *फिर अचानक तू आई* *मृत्यु का खौफ लाई* *मानवों को डराई* *विज्ञान भी घबराई* . *लोग यूं मरने लगे* *खुद को घरों में भरने लगे* *इच्छाओं को सीमित करने लगे* *प्रकृति से डरने लगे* . *अब लोग सारे बंद है* *नदिया स्वच्छंद है* *हवाओं में सुगंध है* *वनों में आनंद है* . *जीव सारे मस्त हैं* *वातावरण भी स्वस्थ है* *पक्षी स्वरों में गा रहे* *तितलियां इतरा रही* . *अब तुम ही कहो तुझे क्या कहूं* *बीमारी कहूं कि बहार कहूं* . *पीड़ा कहूं कि त्यौहार कहूं* *संतुलन कहूं कि संहार कहूं* *कहो तुझे क्या कहूं* . 🙏🏼🌹
[17/04, 19:48] Ds दिनेश श्रीवास्तव: कुण्डलिया छंद --- विषय- नटखट            "मेरे नटखट लाल"              ---------------------                       (१) नटखट माखन लाल ने,फिर चोरी की आज। सुनकर यशुमति को लगी,फिर से थोड़ी लाज।। फिर से थोड़ी लाज,मातु को गुस्सा आया। बाँध लला को आज,छड़ी को उन्हें दिखया।। कहता सत्य दिनेश,बाँध दे जग को चटपट। बँधे स्वयं भगवान,आज वो कैसे नटखट।।                        (२) जागो नटखट लाल अब,देखो!हो गई भोर। गायें भी करने लगीं,तुम बिन अब तो शोर।। तुम बिन अब तो शोर,बड़ी व्याकुल लगती हैं। सुनकर मुरली तान,सदा सोती जगती हैं।। कहता सत्य दिनेश, कर्म-पथ पर तुम भागो। आलस को तुम छोड़,नींद से अब तो जागो।।                     (  ३) राधा ने चोरी किया,मुरली नटखट लाल। बतियाने की लालसा,समझ गए वह चाल।। समझ गए वह चाल,माँगते कृष्ण-कन्हैया। मुस्काती यह देख,लला की यशुमति मैया।। कहता सत्य दिनेश,कृष्ण तो केवल आधा। तभी बनेंगे पूर्ण,मिलेंगी उनको राधा।।                       (४) आए नटखट लाल जब,यमुना जी के तीर। चढ़े पेड़ ले वस्त्र को,गोपी भईं अधीर।।