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कुछ भूल तो है मेरी…/ ऐश्वर्य मोहन गहराना

New post on गहराना by AishMGhrana महीनों पहले लंबी सड़क के बीच दरख्तों के सहारे चलते चलते तुमने कहा था भूल जाओगे एक दिन . . . याद आते हो आज भी साँसों में सपनों में गलीचों में पायदानों में रोटी के टुकड़ों में चाय की भाप में . . . तुम आज भी हर शाम कहते हो भूल गया हूँ मैं तुम्हें हर रात गुजर जाती है मेरे शर्मिंदा होने में . . . हर सुबह याद आता है तुम्हें भूल चूका हूँ मैं . . कुछ भूल तो है मेरी.. ऐश्वर्य मोहन गहराना (१८ जनवरी २०१३ – सुबह जागने से कुछ पहले अचानक मन उदास सा था करवटें बदलते बदलते तुम्हारी याद में)

उसका सच: / अरविंद कुमार सिंह

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11 जुलाई, 1962 को बरवारीपुर, सुल्‍तानपुर में जन्‍में युवा कथाकार अरविंद‍ कुमार सिंह की कहानी- धूलभरी सड़क पर हिचकोले खाती हुई बस अपने आखिरी मुकाम पर पहुँच चुकी थी। कंडक्टर की आवाज के साथ ही झपकियाँ लेती आँखें खुल गयीं। हड़बड़ी, उत्सुकता और उत्साह के साथ यात्री अपने-अपने थैले और गठरियाँ सँभालते हुए दरवाजे की तरफ लपके। बस से बाहर रात ज्यादा गहरी दिखाई दी। आसमान में तारे अभी चमक रहे थे। पर चाँदनी का पसरा हुआ रूप कुछ झीना हो चला था- सफेद बादलों पर जैसे कोई हल्की चादर डालता जा रहा हो। फिर भी,  सब कुछ साफ देखा जा सकता था। छिटपुट पेड़, ऊँचे-नीचे खेत। टीले-भाटों से घिरा यह सिपाह गाँव- जिले का पिछड़ा और अति उपेक्षित हिस्सा। आगे नदी तक जाने के लिए सड़क नहीं,  सिर्फ पगडंडियाँ थीं। पगडंडियों के किनारे-किनारे सरपतों के झुरमुट तथा भटकइया और मदार के पौधे थे। तीन मील पैदल चलना होगा- बहुत खराब रास्ता है। लोग आपस में बतियाते दिखे। तीर्थयात्रियों में खुशी और उमंग के साथ चिंता,  बेचैनी और शोर का अद्भुत मेल था। कई एक अपने साथियों का नाम ले पुकारते और उन्हें खोजते फिर रहे थे। किसी क

प्रेमचंद को गुलज़ार ने कैसे जाना

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मंगलवार, 30 अगस्त, 2005 को 12:11 GMT तक के समाचार मित्र को भेजें कहानी छापें एक समारोह में प्रेमचंद पर अपनी कविता पढ़ी गुलज़ार ने गुलज़ार ने हाल ही में  दूरदर्शन के लिए प्रेमचंद की   बीसियों कहानियों को एक श्रंखला के तौर पर फ़िल्माया है. उन कहानियों के संवाद और स्क्रिप्ट लिखने के साथ साथ उन्होंने इन का निर्देशन भी किया है. प्रेमचंद की 125वीं जयंती वर्ष के मौक़े पर आयोजित एक समारोह के दौरान मिर्ज़ा एबी बेग ने गुलज़ार से मुलाक़ात की और प्रेमचंद से जुड़ी उनकी यादों को उन्ही की ज़ुबानी सुना. 'प्रेमचंद से जीवन में मेरी मुलाक़ात तीन बार हुई है, एक बार उस समय जब मैं ने अपने पिता को देखा कि वह मेरी तीसरी क्लास की उर्दू की किताब से माँ को एक कहानी सुना रहे हैं और दोनों रो रहे है.  ईदगाह पढ़ी तो लगा कि यह तो अपनी ज़िंदगी से बहुत क़रीब है, उसे पढ़ के एसा लगा कि अगर हम भी मेले गए होते तो मैंने भी हामिद की तरह चिमटा ही खरीदा होता. गुलज़ार वह कहानी प्रेमचंद की ‘हज्जे अकबर’ थी. उसके बाद मेरी माँ मुझे हमेशा वह कहानी पढ़ के सुनाने को