पोस्ट

2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

शेरजंग गर्ग की कविताएं

चित्र
                           View in English क्या हो गया कबीरों को / शेरजंग गर्ग                                     View in English क्या हो गया कबीरों को / शेरजंग गर्ग ग़लत समय में सही बयानी / शेरजंग गर्ग खुद से रूठे हैं हम लोग / शेरजंग गर्ग आदमी हर तरह लाचार है / शेरजंग गर्ग सतह के समर्थक समझदार निकले / शेरजंग गर्ग आदमी की अज़ीब सी हालत है / शेरजंग गर्ग हौंसलों में फ़कत उतार सही / शेरजंग गर्ग आवाज़ आ रही है / शेरजंग गर्ग मत पूछिए क्यों / शेरजंग गर्ग कोई शहर गुमशुदा है / शेरजंग गर्ग काफ़ी नहीं तुम्हारा / शेरजंग गर्ग दर्द की चाशनी है / शेरजंग गर्ग मेरे समाज की हालत / शेरजंग गर्ग स्वच्छ, सजग अधिकार कहाँ / शेरजंग गर्ग सब करार को तरसे / शेरजंग गर्ग काँच निर्मित घरों के / शेरजंग गर्ग ऐसी हालत मे क्या किया जाए / शेरजंग गर्ग हम क्यों न सबको ठीक तरज़ू पे तोलते / शेरजंग गर्ग बुझ गई रोशनी / शेरजंग गर्ग चोटियों में कहाँ गहराई है / शेरजंग गर्ग खुश हुए मार कर ज़मीरों को / शेरजंग गर्ग जब पूछ लिया उनसे / शेरजंग गर्ग न पूछिए हम कहाँ से / शेरजंग गर

अदम गोंडवीकी कविता

चित्र
Hindi Literature On the Wiki Wiki Activity किसी एक लेख पर जाएं Videos Photos Recent blog posts Contribute Share मेरी ध्यानसूची किसी एक लेख पर जाएं हाल में हुए बदलाव मैं चमारों की गली में ले चलूंगा आपको / अदम गोंडवी संपादन Talk 0 १२,२१६ pages on this wiki CHANDER आइए महसूस करिए जिन्दगी के ताप को मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर मर गई फुलिया बिचारी की कुएं में डूब कर है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा कैसी यह भयभीत है हिरनी सी घबराई हुई लग रही जैसे क

कबीर का ब्राह्मण से संवाद / कॅंवल भारती

चित्र
About Contact Us OUR Team Your Profile Products Page » वैधानिक September 4, 2012 | Filed under बहस | Posted by hastakshep 9 बुद्ध और ब्राह्मण का संघर्ष ‘वर्ण-संघर्ष’ के सिवा कुछ नहीं था कॅंवल भारती ब्राह्मण गुरु जगत का, साधु का गुरु नाहिं। उरझि-पुरझि करि मरि रह्या, चारिउ वेदा माँहि।। (क.ग्र. पृष्ठ 28) कहु पाँडे कैसी सुचि कीजै।         सुचि कीजै तौ जनम न लीजै।। (वही, पृष्ठ 129) ब्राह्मण के साथ कबीर का अत्यन्त तीखा संवाद है। उसे देखकर ऐसा लगता है, जैसे एक महासंग्राम था कबीर और ब्राह्मण के बीच। क्या यह महासंग्राम नेतृत्व को लेकर था? यदि हाँ, तो नेतृत्व की यह लड़ाई किस क्षेत्र में थी? ब्राह्मण हिन्दू धर्म, समाज और सत्ता तीनों का अगुवा था। क्या कबीर उससे यह अगुवाई छीनना चाहते थे? अवश्य ही ऐसा नहीं था। ‘ना हिन्दू और ना मुसलमान’ चेतना के कबीर को ब्राह्मण के हिन्दुओं का नेतृत्व करने पर कोई ऐतराज नहीं था। वह शाक्तों, शैवों, वैष्णवों, सिद्ध – योगियों का भी नेतृत्व कर रहा था, इससे भी उन्हें कोई समस्या नहीं थी। उन्हें समस्या इस बात को लेकर थी

कामशास्त्र की भारतीय परंपरा में सेक्‍स

चित्र
       शुक्रवार, 20 नवम्बर 2009 कामसूत्र की उत्पत्ति की शास्त्रकथा बड़ी रोचक है। इस कथा का भी यदि देरीदियन मूल्यांकन किया जाए तो अनेक नए पक्षों पर रोशनी पड़ती है। पहली बात यह निकलती है कि कामशास्त्र , अर्थशास्त्र और आचार शास्त्र का हिस्सा है। आरंभ में ब्रह्मा ने एक लाख अध्यायों का एक विशाल ग्रंथ बनाया।उस शास्त्रार्णव का मंथन कर मनु ने एक पृथक आचार शास्त्र बनाया।जो मनुसंहिता या धर्मशास्त्र के नाम से विख्यात है। ब्रह्मा के ग्रंथ के आधार पर बृहस्पति ने ब्रार्हस्पत्यम् अर्थशास्त्र की रचना की। ब्रह्मा के ग्रंथ के आधार पर ही महादेवजी के अनुचर नंदी ने एक हजार अध्यायों के कामशास्त्र की रचना की। उसी संस्करण के आधार पर श्वेतकेतु ने पांच सौ अध्यायों का संक्षिप्त संस्करण तैयार किया। श्वेतकेतु की रचना के आधार पर बाभ्रव्य ने डेढ सौ अध्यायों का संस्करण तैयार किया। यही वह बिन्दु है जहां से कामशास्त्र की नयी परंपरा सामने आती है। बाभ्रव्य के पहले कामशास्त्र वाचिक परंपरा का अंग था , बाभ्रव्य ने ही उसे शास्त्र का रूप दिया। कालान्तर में बाभ्रव्य के