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जून, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हिंदी के उपयोगी प्रयोग

*हिन्दी के कुछ महत्त्वपूर्ण प्रयोग* ======================== हिन्दी लिखने वाले अक़्सर 'ई' और 'यी' में, 'ए' और 'ये' में और 'एँ' और 'यें' में जाने-अनजाने गड़बड़ करते हैं...। कहाँ क्या इस्तेमाल होगा, इसका ठीक-ठीक ज्ञान होना चाहिए...। जिन शब्दों के अन्त में 'ई' आता है वे संज्ञाएँ होती हैं, क्रियाएँ नहीं। जैसे: मिठाई, मलाई, सिंचाई, ढिठाई, बुनाई, सिलाई, कढ़ाई, निराई, गुणाई, लुगाई, लगाई-बुझाई...। इसलिए 'तुमने मुझे पिक्चर दिखाई' में 'दिखाई' ग़लत है... इसकी जगह 'दिखायी' का प्रयोग किया जाना चाहिए...। इसी तरह कई लोग 'नयी' को 'नई' लिखते हैं...। 'नई' ग़लत है , सही शब्द 'नयी' है... मूल शब्द 'नया' है , उससे 'नयी' बनेगा...। ● क्या तुमने क्वेश्चन-पेपर से आंसरशीट मिलायी...? ( 'मिलाई' ग़लत है...।) आज उसने मेरी मम्मी से मिलने की इच्छा जतायी...। ( 'जताई' ग़लत है...।) उसने बर्थडे-गिफ़्ट के रूप में नयी साड़ी पायी...। ('पाई' ग़लत है...।) ● अब आइए '

बेटी की विदाई

माँ अब मैं विदा हो रही हूं ये न समझो जुदा हो रही हूँ मैं हूँ बेटी बहु बन रही हूँ हाँ तेरी हू-ब-हू बन रही हूं रीतियों के चलन चल रही हूं हां माँ ! बिछिया पहन चल रही हूँ नाक नथिया पहन चल रही हूँ माँ ! क्या सच मे ? दुल्हन बन रही हूँ थाम दामन सजन चल रही हूँ झुमके कंगना पहन चल रही हूं माँ ! थाम मुझको किधर जा रही हूँ तू भी चल मैं जिधर जा रही हूँ माँ ! पापा किस बात पे रो रहे हैं बोलो किस दर्द में खो रहे हैं तुम भी कुछ क्यों नही कह रही हो ऐसे चुप चाप क्यों रो रही हो माँ ! देख भैया उधर रो रहा है जानें किस बात से डर रहा है डर भी डरता है जिससे उसे भी देखो खंभा पकड़ रो रहा है माँ ! मेरी किस्मत की रेखा जो तेरी हाथ होकर गुजरती टूटने ना तू देना कभी भी थाम लेना अगर कुछ हुआ तो प्रार्थना तुझसे मैं कर रही हूँ माँ अब मैं विदा हो रही हूँ ये न समझो जुदा हो रही हूँ i     #Shubhu😭😭😭

साथ साथ

सुबह सुबह एक जाहिल किस्म का मित्र आ गया। कुछ देर बात करते करते बात चाइना और चाइनीज सामान के बहिष्कार पर आ गई। उसने भी बाकी सारे जाहिल मूर्खो की तरह एक ही कुतर्क दिया - सरकार से कहो आयत बंद कर दो, हमको सस्ता मिलेगा तो हम लेंगे, जब इतना ही बुरा है तो बाजार में बिकता क्यों है ? मैं जवाब देने के बदले मुस्कुराया और बोला चल हल्दी राम का समोसा खिलाता हूँ गाडी में बिठाया और एक बहुत छोटे से खोमचे/ ठेले के सामने गाड़ी रोक दिया। वहां की गंदगी देख कर वो भिनभिनाने लगा। मित्र - ये कहा ले आया, चल हल्दी राम के यहाँ चल न.... मैं - भाई ये सस्ता है, यहाँ समोसा 5 रुपये में मिलता है। मित्र ने कहा - सस्ता है तो क्या हुआ भाई, देख नहीं रहा कितनी गंदगी है, तबियत ख़राब हो जाएगी। मैंने कहा - भाई अगर इतना बुरा है तो नगरपालिका / खाद्य विभाग वाले बंद क्यों नहीं कराते। मित्र - भाई कोई किसी को अपना ठेला लगाने से कैसे रोक सकता है, अपनी सेहत का ख्याल तो खुद को ही रखना होगा न। मैंने भी फाइनली वाला ज्ञान दिया - वाह बेटा अपनी सेहत की बारी आई तो लगभग आधी कीमत में मिल रहे समोसे से इंकार , और देश की अर्

संस्कृत के रोचक प्रसंग तथ्य

#संस्कृत_के_बारे_में_रोचक_तथ्य 1. मात्र 3,000 वर्ष पूर्व तक भारत में संस्कृत बोली जाती थी तभी तो ईसा से 500 वर्ष पूर्व पाणिणी ने दुनिया का पहला व्याकरण ग्रंथ लिखा था, जो संस्कृत का था। इसका नाम ‘अष्टाध्यायी’ है। 2. संस्कृत, विश्व की सबसे पुरानी पुस्तक (ऋग्वेद) की भाषा है। इसलिये इसे विश्व की# प्रथम भाषा मानने में कहीं किसी संशय की संभावना नहीं है। 3. इसकी सुस्पष्ट व्याकरण और वर्णमाला की वैज्ञानिकता के कारण सर्वश्रेष्ठता भी स्वयं सिद्ध है। 4. संस्कृत ही एक मात्र साधन हैं जो क्रमशः अंगुलियों एवं जीभ को लचीला बनाते हैं। 5. संस्कृत अध्ययन करने वाले छात्रों को गणित, विज्ञान एवं अन्य भाषाएँ ग्रहण करने में सहायता मिलती है। 6. संस्कृत केवल एक मात्र भाषा नहीं है अपितु संस्कृत एक विचार है संस्कृत एक संस्कृति है एक संस्कार है संस्कृत में विश्व का कल्याण है शांति है सहयोग है वसुदैव कुटुम्बकम् कि भावना है।! 7. नासा का कहना है की 6th और 7th generation super computers संस्कृत भाषा पर आधारित होंगे। 8. संस्कृत विद्वानों के अनुसार सौर परिवार के प्रमुख सूर्य के एक ओर से 9 रश्मियां(B

माँ की सीख - सबक

मां की सीख . सुबह के चार बजे थे, अचानक बज रही फ़ोन की घंटी ने मेरी नींद को तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, सुबह के चार बजे फ़ोन आना किसी अनहोनी घटना के होने की और हमेशा इशारा होता है। पापा का फ़ोन.. इस टाइम.. मेरे हाथ एक दम से सुन्न हो गये थे। कई दिनों से मां की तबियत ठीक नहीं चल रही थी। फ़ोन तो उठाओ.. मेरे पति राहुल ने कहा, हेलो पापा.. बेटा जितनी जल्दी हो सके आ जाओ... क्या हुआ पापा... मां ठीक तो है... मैंने नम आँखों से कहा, आ जाओ... पापा ने ये कहते हुए फ़ोन रख दिया था, मैं फूट फूट कर रोने लगी। पागल मत बनो.. सम्भालो अपने आप को... जल्दी करो घर चलना है। राहुल ने मेरी ओर देखते हुए कहा। . करीब 1 घंटे के सफर के बाद मैं घर पहुंची, मां मैं आ गई.. मां ने मुश्किल से आंखें खोल कर मेरी ओर देखा, बेटा तू ठीक तो है.. ये मां ही पूछ सकती है। खुद जिंदगी और मौत से जूझ रही है और अब भी अपनी औलाद की चिंता है। मां मैं ठीक हूं। तुम परेशान मत हो। जल्दी ठीक हो जाओ, फिर बाहर चलेंगे। बेटा मुझको पता है मेरे पास ज्यादा समय नहीं है। ये बोलते हुए मां ने मेरी ओर एक लेटर बढ़ा दिया। ये क्या है... मैंने नम आं

कालिदास सच सच बतलाना / नागार्जुन

कालिदास! सच-सच बतलाना इन्दुमती के मृत्युशोक से अज रोया या तुम रोये थे? कालिदास! सच-सच बतलाना! शिवजी की तीसरी आँख से निकली हुई महाज्वाला में घृत-मिश्रित सूखी समिधा-सम कामदेव जब भस्म हो गया रति का क्रंदन सुन आँसू से तुमने ही तो दृग धोये थे कालिदास! सच-सच बतलाना रति रोयी या तुम रोये थे? वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका प्रथम दिवस आषाढ़ मास का देख गगन में श्याम घन-घटा विधुर यक्ष का मन जब उचटा खड़े-खड़े तब हाथ जोड़कर चित्रकूट से सुभग शिखर पर उस बेचारे ने भेजा था जिनके ही द्वारा संदेशा उन पुष्करावर्त मेघों का साथी बनकर उड़ने वाले कालिदास! सच-सच बतलाना पर पीड़ा से पूर-पूर हो थक-थककर औ' चूर-चूर हो अमल-धवल गिरि के शिखरों पर प्रियवर! तुम कब तक सोये थे? रोया यक्ष कि तुम रोये थे! कालिदास! सच-सच बतलाना! ~~~~नागार्जुन~~~~ https://youtu.be/r0FBhLcD24M

डॉ. हरी ओम पवार

डाँ हरी ओम पवार ने रायपुर कविसम्मेलन आज चंद्रशेखर आज़ाद पे कविता सुनाइ जो उन्होने मायावती द्वारा चंद्रशेखर आज़ाद का अपमान करने पर लिखी थी…और विडम्ब्ना देखिये उस समय मायावती की सरकार बीजेपी के समर्थन पे बनी थी, और बीजेपी के किसी नेता ने उसका विरोध नही किया…कवि की हिम्मत देखो उन्होने ये कविता डाँ रमन सिंग के सामने कहि… “मन तो मेरा भी करता है झूमूँ , नाचूँ, गाऊँ मैं आजादी की स्वर्ण-जयंती वाले गीत सुनाऊँ मैं लेकिन सरगम वाला वातावरण कहाँ से लाऊँ मैं मेघ-मल्हारों वाला अन्तयकरण कहाँ से लाऊँ मैं मैं दामन में दर्द तुम्हारे, अपने लेकर बैठा हूँ आजादी के टूटे-फूटे सपने लेकर बैठा हूँ घाव जिन्होंने भारत माता को गहरे दे रक्खे हैं उन लोगों को z सुरक्षा के पहरे दे रक्खे हैं जो भारत को बरबादी की हद तक लाने वाले हैं वे ही स्वर्ण-जयंती का पैगाम सुनाने वाले हैं आज़ादी लाने वालों का तिरस्कार तड़पाता है बलिदानी-गाथा पर थूका, बार-बार तड़पाता है क्रांतिकारियों की बलि वेदी जिससे गौरव पाती है आज़ादी में उस शेखर को भी गाली दी जाती है राजमहल के अन्दर ऐरे- गैरे तनकर बैठे हैं बुद्धिमान स

मैं भारत का वोटर मीनाक्षी

मैं भारत का वोटर हूँ, मुझे लड्डू दोनों हाथ चाहिये -बिजली मैं बचाऊँगा नहीं, बिल मुझे कम चाहिये, -पेड़ मैं लगाऊँगा नहीं, मौसम मुझको नम चाहिये, -शिकायत मैं करूँगा न हीं, कार्रवाई तुरंत चाहिये -बिना लिए कुछ काम न करूँ, भ्रष्टाचार का अंत चाहिये -पढ़ने को मेहनत न बाबा, नौकरी लालीपाॅप चाहिये -घर-बाहर कूड़ा फेकूं, शहर मुझे साफ चाहिये -काम करूँ न धेले भर का, वेतन लल्लनटाॅप चाहिये -एक नेता कुछ बोल गया सो, मुफ्त में पंद्रह लाख चाहिये -लाचारों वाले लाभ उठायें फिर भी ऊँची साख चाहिये -लोन मिले बिल्कुल सस्ता, बचत पर ब्याज बढ़ा चाहिये -धर्म के नाम रेवडियां खाएँ पर देश धर्मनिरपेक्ष चाहिये -जाती के नाम पर वोट दे अपराध मुक्त राज्य चाहिए -मैं भारत का वोटर हूँ मुझे लड्डू दोनों हाथ चाहिये।' #मिनाक्षी

सरल बनो स्मार्ट नहीं / महाकवि व्हट्सप्प

A Very Beautiful Message              मिठास              〰〰〰〰         चाय का कप लेकर आप         खिड़की के पास बैठे हों     और बाहर के सुंदर नज़ारे का आनंद लेते हुए चाय की चुस्की लेते हैं .....अरे चीनी डालना तो भूल ही गये..;   और तभी फिर से किचन मेँ जाकर    चीनी डालने का आलस आ गया....     आज फीकी चाय को जैसे तैसे       पी गए,कप खाली कर दिया      तभी आपकी नज़र कप के तल       में पड़ी बिना घुली चीनी पर                 पडती है..!!   मुख पर मुस्कुराहट लिए सोच में पड     गये...चम्मच होता तो मिला लेता    हमारे जीवन मे भी कुछ ऐसा ही है...        सुख ही सुख बिखरा पड़ा है             हमारे आस पास...                     लेकिन,      बिन घुली उस चीनी की तरह !!            थोड़ा सा ध्यान दें-  किसी के साथ हँसते-हँसते उतने ही    हक से रूठना भी आना चाहिए !        अपनो की आँख का पानी      धीरे से पोंछना आना चाहिए !      रिश्तेदारी और दोस्ती में कैसा               मान अपमान ?       बस अपनों के दिल मे रहना              आना चाहिए...!  जितना हो सके.... "सरल&q

मधुर कुशल व्यवहार की भाषा है हिंदी / शेखर

हिंदी दिवस पर विशेष अपनत्व ,शिष्टाचार की भाषा है हिंदी मधुर कुशल व्यवहार की भाषा है हिंदी मातृ पिता हैं परम पूजनीय, गुरु शिक्षक सदा आदरणीय, भेद भाव न करे किसी में धनी निर्धन दोनों माननीय , आदर और सत्कार की भाषा है हिंदी मधुर कुशल व्यवहार की भाषा है हिंदी, राष्ट्र प्रेम की जगे भावना, जन गण की है यही कामना , एक सूत्र में बंधे भारती वर्षों इस ने की आराधना, समता के आधार की भाषा है हिन्दी मधुर कुशल व्यवहार की भाषा है हिंदी, नित नवीन शब्दों को लाती, स्वयं में समाहित उन्हें कराती, बहुत विशाल ह्रदय है इसका, हर परिवेश में घुल मिल जाती, भाषा के विस्तार की भाषा है हिंदी, मधुर कुशल व्यवहार की भाषा है हिंदी, ज्ञान विज्ञान भाग्य कर्म है साहित्य संस्कृति और धर्म है इस में पुट आधुनिकता का रीति परंपरा का भी मर्म है उत्सव और त्यौहार की भाषा है हिंदी मधुर कुशल व्यवहार की भाषा है हिंदी, चलो गर्व से इसको बोलें, द्वार इसकी प्रगति के खोलें, विश्व पटल के शीर्ष पे पहुंचे, इसकी मिठास हर देश में घोलें, अब समस्त संसार की भाषा है हिंदी, मधुर कुशल व्यवहार की भाषा है ह

जय जवान जय किसान जय हो जय हिंदुस्तान

भारत के   चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ  विपिन रावत  ने कहा  है कि भारत का हर व्यक्ति भारतीय सेना के बारे में नीचे लिखे वाक्यों को अवश्य पढ़े। भारतीय सेना के 10 सर्वश्रेष्ठ अनमोल वचन: अवश्य पढें। इन्हें पढकर सच्चे गर्व की अनुभूति होती है... 1. " *मैं तिरंगा फहराकर वापस आऊंगा या फिर तिरंगे में लिपटकर आऊंगा, लेकिन मैं वापस अवश्य आऊंगा।*" - कैप्टन विक्रम बत्रा,   परम वीर चक्र 2. " *जो आपके लिए जीवनभर का असाधारण रोमांच है, वो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी है।* " - लेह-लद्दाख राजमार्ग पर साइनबोर्ड (भारतीय सेना) 3. " *यदि अपना शौर्य सिद्ध करने से पूर्व मेरी मृत्यु आ जाए तो ये मेरी कसम है कि मैं मृत्यु को ही मार डालूँगा।*" - कैप्टन मनोज कुमार पाण्डे, परम वीर चक्र, 1/11 गोरखा राइफल्स 4. " *हमारा झण्डा इसलिए नहीं फहराता कि हवा चल रही होती है, ये हर उस जवान की आखिरी साँस से फहराता है जो इसकी रक्षा में अपने प्राणों का उत्सर्ग कर देता है।*" - भारतीय सेना 5. " *हमें पाने के लिए आपको अवश्य ही अच्छा होना होगा, हमें पकडने के लिए आपको तीव्र होन

करमा के ठाकुर जी

*करमा रो खिचड़ो* e5 राजस्थान के मारवाड़ इलाके का एक जिला है नागौर। नागौर जिले में एक छोटा सा शहर है... "मकराणा"। यूएन ने मकराणा के मार्बल को विश्व की ऐतिहासिक धरोहर घोषित किया हुआ है .... ये क्वालिटी है यहां के मार्बल की। लेकिन क्या मकराणा की पहचान सिर्फ वहां का मार्बल है। "जी नहीं" मारवाड़ का एक सुप्रसिद्ध भजन है .... *थाळी भरकर ल्याई रै खीचड़ो,* *ऊपर घी री बाटकी...* *जिमों म्हारा श्याम धणी,* *जिमावै करमा बेटी जाट की...* *बापू म्हारो तीर्थ गयो है,* *ना जाणै कद आवैलो...* *उण़क भरो़स बैठ्यो बैठ्यो, भुखो ही मर जावलो।* *आज जिमाऊं त़न खिचड़ो,* *का़ल राबड़ी छाछ री...* *जिमों म्हारा श्याम धणी,* *जिमावै बेटी जाट री...* मकराणा तहसील में एक गांव है कालवा .... कालूराम जी डूडी (जाट) के नाम पे इस गांव का नामकरण हुआ है कालवा।कालवा में एक जीवणराम जी डूडी (जाट) हुए थे, भगवान कृष्ण के भक्त। जीवणराम जी की काफी मन्नतों के बाद भगवान के आशीर्वाद से उनकी पत्नी रत्नी देवी की कोख से वर्ष 1615 AD में एक पुत्री का जन्म हुआ नाम रखा.... "करमा"। करमा का ला

व्याकरण इतिहास

हिन्दी व्याकरण का संक्षिप्त इतिहास ---------------------------------- मेरे शोध-लेख "हिन्दी व्याकरण का संक्षिप्त इतिहास" को यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं - https://drive.google.com/file/d/1VlJEBdp7EKjvxn_Vg6KIsYSXV9BJg3tl/view?usp=sharing विकिपीडिया पर "हिन्दी व्याकरण का इतिहास" लगभग पूरा का पूरा मेरे इसी शोध-लेख पर आधारित है।

पारिभाषिक शब्द

व्याकरण के पारिभाषिक शब्द "गुण" और "वृद्धि" - भाग-2 ------------------------------------------------------------- भाग-1 में पारिभाषिक शब्द "गुण" की चर्चा की गई। अब पारिभाषिक शब्द "वृद्धि" पर आते हैं। निम्नलिखित धातु और प्रातिपदिक (शब्द) से बने कृत् प्रत्ययान्त एवं तद्धित प्रत्ययान्त शब्दों पर विचार करें। त्यज् - त्याग पठ् - पाठक वच् - वाचक वर्ष - वार्षिक धर्म - धार्मिक इह - ऐहिक दिन - दैनिक किरात - कैरात (किरात जाति या देश से संबंध रखनेवाला) केकय - कैकेयी उचित - औचित्य उज्ज्वल - औज्ज्वल्य उत्सुक - औत्सुक्य उदार - औदार्य उद्योग - औद्योगिक उपमा - औपम्य (सादृश्य, समता) सुन्दर - सौन्दर्य कुमार - कौमार्य भूत - भौतिक कृ - कारक मृज् - मार्जक ऋषि - आर्ष मृज् - मार्जन (धो-माँजकर साफ करना, शोधन) उपर्युक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि कृत् या तद्धित प्रत्यायान्त शब्दों में धातु या प्रातिपदिक के आदि अच् (स्वर) के स्थान में आ, ऐ, औ, आर् कर दिए गए हैं। आ, ऐ, औ, आर् - इन्हें वृद्धि संज्ञक कहते हैं। नोटः कुछ ऐसे शब्द हैं, जिनमें

भूख कचोटे पेट को / रा. हि. ब......

रा हि ब - - - दुनिया में सबसे अधिक , भ्रष्ट हिंद की प्रेस । कहां वसूली हो सके ,  दिन भर ढूँढ़े केस ॥ भूख कचोटे पेट को , धूप ओढ़ रह जायं । दुखिया को इस  हाल में , कैसे बुद्ध सुहांय॥ क्या पाए की शायरी , क्या  लहज़ा अंदाज़ । ग़ालिब मोमिन जौक ने , रखा मीर सर ताज॥ फंसा पंच स्कन्ध में , सुख से वंचित होय  । नाम रूप रस राग में , जीवन  मकसद खोय  ॥ ख़बर सितारों की धरो , लेकिन  पांव ज़मीन । ये खिसकी तो सब गया ,व्यर्थ पड़ी  दुरबीन ॥   सारी बुद्धि उधार की , बुद्धिवाद कहलाय   । बिन अनुभव कोई कहां , बुद्ध  घटित हो पाय  ॥ राहिब क्यों पीछे चले  , अब तो आँखें खोल । स्वानुभूति के सत्य पर  , सारी बातें तोल ॥ राम रहीमा एक हैं  , कविता रही बताय  । कुफ़्र और इस्लाम का , अंतर ग़ज़ल मिटाय  ॥ सब सुविधाएं भोग के , उनको कुफ्र बतांय  । कठमुल्लों का ढोंग ये , काश समझ हम पांय  ॥ खोज ख़बर कागज़ क़लम  , नोंक झोंक रंग ढंग । हिंदी अरबी फारसी , जमा हिंदवी रंग ॥ लाख बरस की सभ्यता,  इक क़िताब में आय  । खरबों मानुष आ चुके , पन्नों ज्ञान समाय  ॥ नेत्र कर्ण अनुभव करें ,इसमें  ढेरों लोच । स

बेमिसाल ईमानदारी का नायाब मिशाल

लाल बहादुर शास्त्री जी को ज़ब  b रेल मंत्री बनाया गया तो उन्होंने माँ को नहीं बताया था कि वो अब रेलमंत्री हैं। कहा था, ''मैं रेलवे में नौकरी करता हूँ।'' वो एक बार किसी कार्यक्रम मे आए थे जब उनकी माँ भी वहाँ पूछते पूछते पहुची कि मेरा बेटा भी आया हैं वो भी रेलवे में हैं। लोगों ने पूछा क्या नाम है तो उन्होंने जब नाम बताया तो सब चौक गए बोले, ''ये झूठ बोल रही है।'' पर वो बोली, ''नहीं वो आए है।'' लोगो ने उन्हें लाल बहादुर शास्त्री के सामने ले जाकर पूछा, ''क्या वहीं हैं ?'' तो माँ बोली, ''हाँ, वो मेरा बेटा है।'' लोग, मंत्री जी से दिखा कर बोले, ''वो आपकी माँ है।'' तो उन्होंने अपनी माँ को बुला कर पास बैठाया और कुछ देर बाद घर भेज दिया। तो पत्रकारों ने पुछा, ''आप ने, उनके सामने भाषण क्यों नहीं दिया।'' ''मेरी माँ को नहीं पता कि मैं मंत्री हूँ। अगर उन्हें पता चल जाय तो लोगों की सिफारिश करने लगेगी और मैं मना भी नहीं कर पाउंगा। ...... ....... और उन्हें अहंकार भी हो

नज़्म / सुरेन्द्र सिंघल

हवाएं शांत पड़ी सो रहीं हैं बिस्तर पर और हम झेल रहे हैं घुटन  वो घुटन जिसकी कोई सीमा नहीं  आओ जाकर इन्हें जगाएं तो इनसे कुछ छेड़छाड़ करे  जिससे ये करवटें बदलें पहले ऊं ऊं भी करें  किंतु फिर बाद में ले अंगड़ाई  जाग उठ्ठें ये आंख मलती हुईं  और फिर इनके दुपट्टे फड़कें  इनके कांधों से फिसल  उड़ चलें चारों दिशाओं में  एक उन्माद सा बिखर जाए  दिल दिमाग देह की शिराओं में  जागना इनका बहुत ज़रूरी है यह घुटन वरना मार डालेगी

सिंहासन खाली करो की जनता आती हैँ / दिनकर

सिंहासन खाली करो कि जaनता आती है: रामधारी सिंह “दिनकर”  दिनकर ने ये कविता हमारे पहले गणतंत्र दिवस के अवसर पर लिखी थी|  फिर ये १९७४ के संपूर्ण-क्रांति का भी नारा बनी|चलिए आज फिर दोहराते हैं: सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी, मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है; दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। जनता?हां,मिट्टी की अबोध मूरतें वही, जाडे-पाले की कसक सदा सहनेवाली, जब अंग-अंग में लगे सांप हो चुस रहे तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहनेवाली। जनता?हां,लंबी – बडी जीभ की वही कसम, “जनता,सचमुच ही, बडी वेदना सहती है।” “सो ठीक,मगर,आखिर,इस पर जनमत क्या है?” ‘है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है?” मानो,जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं, जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में; अथवा कोई दूधमुंही जिसे बहलाने के जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में। लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं, जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढाती है; दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती, सांसों के बल से ताज हवा म

चाँद का कुर्ता / रामधारी सिंह दिनकर

आज राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' जी  का जन्मदिन है। दिनकर जी का जन्म २३ सितंबर १९०८ में बिहार के सिमरिया ग्राम में हुआ था।  बचपन से वो मेरे सबसे प्रिय कवि रहे हैं। मुझे याद है कि छठी से दसवीं तक जब भी हिंदी की नई पाठ्य पुस्तक मिलती थी, तो सबसे पहले मैं ये देखता था कि कविता वाले भाग में दिनकर की कोई कविता है या नहीं। उनकी कविता को कभी मन ही मन नहीं पढ़ा जाता था। बार बार पढ़ते और वो भी जोर जोर से बोल के जैसे खुद की ही कविता हो। जयशंकर प्रसाद और महादेवी वर्मा के छायावादी रहस्यों को समझने की उम्र नहीं थी पर दिनकर की पंक्तियाँ ना केवल बड़ी आसानी से कंठस्थ हो जाती थीं बल्कि वे मन में एक ऐसा ओज भर देती थीं जिसका प्रभाव कविता की आवृति के साथ बढ़ता चला जाता था। पहली बार छठी कक्षा में उनका किया इस प्रश्न ने मन में हलचल मचा दी थी दो में से तुम्हें क्या चाहिए ? कलम या कि तलवार मन में ऊँचे भाव या तन में शक्ति अजय आपार ! तो वहीं सातवीं या आठवीं में शक्ति और क्षमा पढ़ने के बाद उनकी काव्य शैली ने मुझे पूरी तरह मोहित कर दिया था क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो उसको क्या

राम धारी सिंह दिनकर

रोटी और स्वाधीनता / रामधारी सिंह "दिनकर" (1) आजादी तो मिल गई, मगर, यह गौरव कहाँ जुगाएगा ? मरभुखे ! इसे घबराहट में तू बेच न तो खा जाएगा ? आजादी रोटी नहीं, मगर, दोनों में कोई वैर नहीं, पर कहीं भूख बेताब हुई तो आजादी की खैर नहीं। (2) हो रहे खड़े आजादी को हर ओर दगा देनेवाले, पशुओं को रोटी दिखा उन्हें फिर साथ लगा लेनेवाले। इनके जादू का जोर भला कब तक बुभुक्षु सह सकता है ? है कौन, पेट की ज्वाला में पड़कर मनुष्य रह सकता है ? (3) झेलेगा यह बलिदान ? भूख की घनी चोट सह पाएगा ? आ पड़ी विपद तो क्या प्रताप-सा घास चबा रह पाएगा ? है बड़ी बात आजादी का पाना ही नहीं, जुगाना भी, बलि एक बार ही नहीं, उसे पड़ता फिर-फिर दुहराना भी।. 

मस्यूर पंख / हरे धानी

🦃  मयूर  पंख  🦃                 वनवास के दौरान माता सीताजी को पानी की प्यास लगी, तभी श्रीरामजी ने चारों ओर देखा, तो उनको दूर-दूर तक      जंगल ही जंगल दिख रहा था.  कुदरत से प्रार्थना करी ~ हे जंगलजी !      आसपास जहाँ कहीं पानी हो,   वहाँ जाने का मार्ग कृपया सुझाईये.       तभी वहाँ एक मयूर ने आकर  श्रीरामजी से कहा कि आगे थोड़ी दूर पर     एक जलाशय है. चलिए मैं आपका       मार्ग पथ प्रदर्शक बनता हूँ,  किंतु       मार्ग में हमारी भूल चूक होने की                  संभावना है.      श्रीरामजी ने पूछा ~ वह क्यों ?       तब मयूर ने उत्तर दिया कि ~    मैं उड़ता हुआ जाऊंगा और आप    चलते  हुए आएंगे, इसलिए मार्ग में  मैं अपना एक-एक पंख बिखेरता हुआ      जाऊंगा. उस के सहारे आप    जलाशय तक पहुँच ही जाओगे.   इस बात को हम सभी जानते हैं कि   मयूर के पंख, एक विशेष समय एवं     एक विशेष ऋतु में ही बिखरते हैं.      अगर वह अपनी इच्छा विरुद्ध          पंखों को बिखेरेगा, तो         उसकी मृत्यु हो जाती है.     और वही हुआ. अंत में जब मयूर    अपनी अंतिम सांस ले रहा होता है,  

हिन्दू शब्द का कब हुआ प्रयोग?

*जानिए किस ग्रन्थ में प्रयुक्त हुआ है हिन्दू शब्द* पश्चिमी देशों में भूख मिटाने, नींद लाने, यहां तक कि खुशी महसूस करने के लिए भी दवा का प्रयोग किया जाता है, जबकि भारत में मानसिक और ज्यादातर शारीरिक रोगों का समाधान ध्यान और योग में तलाशने की परंपरा है। सनातन धर्म में ईश्वर को पाने का एक मार्ग ध्यान और योग भी बताया गया है। इसलिए यह मात्र धर्म ही नहीं है, बल्कि जीने की कला है,सनातन धर्म का अर्थ होता है-जीवन जीने की शाश्वत शैली। सनातन को मानने वाले ‘हिन्दू’ कहलाये, हिन्दू शब्द को लेके स्वयं हिन्दू ही नहीं अपुती दूसरे मतों के लोगो का भी यही मानना है की “हिन्दू’ शब्द ईरानियों की देन है | ये भ्रान्ति प्रचलित है की ”हिन्दू’ शब्द सनातन के किसी भी शास्त्र में नहीं है, हिदुत्व कोई धर्म नहीं है, भोगोलिक स्थिति के कारण इसका नाम हिंदुस्तान रखा गया है, हिंदुस्तान में रहने वाले सब धर्म के लोग हिन्दू हैं…. इत्यादि| परन्तु क्या ये सच है ? क्या ‘हिन्दू’ शब्द विदेशियों का दिया हुआ नाम है? क्या हिन्दू नाम का कोई धर्म नहीं? इन्ही सब प्रश्नों के उत्तर खोजते हुए कुछ तथ्य प्रस्तुत हैं जो ये दर्शा

इंटरव्यू लेने वाले पत्रकार का साक्षात्कार

*1 मिनिट👇* *न्यूयार्क में एक बड़े पत्रकार एक साधु का* *इंटरव्यू ले रहे थे....* पत्रकार- सर, आपने अपने लास्ट लेक्चर में *संपर्क* (Contact) और  *संजोग* (Connection) पर स्पीच दिया लेकिन यह बहुत कन्फ्यूज करने वाला था..। क्या आप इसे समझा सकते हैं..? साधु मुस्कराये और उन्होंने कुछ अलग... पत्रकारों से ही पूछना शुरू कर दिया। "आप न्यूयॉर्क से हैं"...? पत्रकार: "Yeah"... सन्यासी: "आपके घर मे कौन कौन हैं"...? पत्रकार को लगा कि.. साधु उनका सवाल टालने की कोशिश कर रहे है क्योंकि उनका सवाल बहुत व्यक्तिगत और उसके सवाल के जवाब से अलग था। फिर भी पत्रकार बोला : मेरी "माँ अब नही हैं, पिता हैं तथा 3 भाई और एक बहिन हैं...। सब शादीशुदा हैं " साधू ने चेहरे पे एक मुस्कान के साथ पूछा:  "आप अपने पिता से बात करते हैं..?" पत्रकार चेहरे से गुस्से में लगने लगा... साधू ने पूछा, "आपने अपने फादर से last कब बात की"...? पत्रकार ने अपना गुस्सा दबाते हुए जवाब दिया : *"शायद एक महीने पहले".* साधू ने पूछा: "

दिनेश श्रीवास्तव की रचनाएँ

 अलविदा सुशांत -------------------- टूटा फिर से एक सितारा, कैसे वह जीवन से हारा। मुस्काता चेहरा तो देखो, कितना सुंदर कितना प्यारा।। कैसा दुख उसको था घेरा, छाया इतना जल्द अँधेरा। गहरी चिर निद्रा क्यों आई, क्या प्यारा था नहीं सबेरा? मानव क्यों विचलित होता है, बाहर खुश अंदर रोता है। पता नहीं चल पाता इतना, पाता क्या है क्या खोता है।।?? यदि जीवन,संघर्ष वहीं है, मगर पलायन सत्य नहीं है। आत्म-हन्त बनना मानव का, बोलो! क्या यह सत्य कहीं है? कितना प्यारा एक सितारा, सबकी आँखों का था तारा। इतनी जल्दी टूट गया वह, गम से अपने हारा- मारा।। जो लगते हैं सबको न्यारे, ईश्वर को भी होते प्यारे। नहीं भूल सकता है कोई, तुमको मेरे राज दुलारे।।             दिनेश श्रीवास्तव😢             ग़ाज़ियाबाद [6/18, 18:16] DS दिनेश श्रीवास्तव: गीत- हमको रहना है तैयार। होगा युद्ध आर या पार।। क्यों कहते हो बात करेंगे? सैनिक मेरे रोज मरेंगे! सोचो फिर हम जिंदा क्यों हैं, ऐसे जीवन पर धिक्कार। हमको रहना है तैयार। होगा युद्ध आर या पार।। बुद्ध और गांधी का देश, पर सुभाष का सैनिक वेश

शोध लेख अनुस्यूत / डाक्टर बहादुर मिश्रा

*अनुस्यूत बनाम अनुस्युत* यह विषय मेरी प्राथमिकता सूची में नहीं था। एक दिन मैं पी-एच्.-डी. संचिका निबटा रहा था। एक विश्वविख्यात विश्वविद्यालय के ख्यात प्राचार्य का प्रतिवेदन पढ़ रहा था। उसमें एक स्थल पर ‘अनुस्युत’ का प्रयोग देखकर हतप्रभ रह गया; क्योंकि छात्र और शिक्षक- दोनों रूपों में उनकी यशस्विता असंदिग्ध रही है। पहले सोचा कि दूरभाष पर ही उनका भ्रम-निवारण कर दूँ। फिर विचार आया कि ‘पोस्ट’ ही डाल देता हूँ। इससे अन्य पाठक भी लाभान्वित हो जाएँगे। अन्यत्र इसके अनियंत्रित प्रयोग देख-देख कुढ़ ही रहा था कि उक्त महाशय की इस भाषिक विच्युति ने एतद्विषयक विमर्श के लिए तत्क्षण विवश किया। यह शब्द-विमर्श उसी चिन्ता की प्रसूति है।    अनु+षिवु(तन्तुसन्ताने) >सिवु (आदेश)> सि (व् >ऊ) सि+ऊ (यण् सन्धि)= स्य् +ऊ = स्यू+ क्त > त = अनुस्यूत का अर्थ होता है-- अच्छी तरह सिला हुआ/ गज्झिन बुना हुआ/ सुशृंखलित/ सुषक्त/ नियमित तथा अबाध रूप से सटा-सटाकर बुना हुआ/well woven/well fabricated/well knitted ।  निवेदन कर दूँ कि ‘अनुस्यूत’ मूलतः बुनकरी-क्षेत्र (weaving field) का शब्द है। भाषा में यह वहीं

पातालगंगा से फूटी जलधारा / उमाशंकर पाण्डेय

फूट पड़ी पातालगंगा -उमाशंकर पांडेय  फूट पड़ी पातालगंगा सांसद, पत्रकारों, स्थानीय नागरिकों ने, उठाया जल संरक्षण के लिए फावड़ा, तसला, शायद विश्वास ना हो सूखे बुंदेलखंड में जलधारा अपने आप ही निकलने लगी है जमीनी सतह से, सामूहिक प्रयास से।  बांदा से चित्रकूट रोड पर अतर्रा 7 किलोमीटर दूरी पर यह स्थान है। जो तुर्रा ग्राम पंचायत ब्लाक नरैनी के अंतर्गत आता है विषहर नदी के किनारे बुंदेलखंड ही नहीं शायद भारत का यह पहला ऐसा स्थान है जहां पर 100 वर्ष से अधिक समय से अपने आप जमीन से पानी सदैव बहता रहा है। लेकिन किसी कारण बस पिछले 4 वर्ष से यह पूरी तरह से सूख गया था, कई दिनों के प्रयास के बाद सामूहिक योजना बनी बगैर किसी सरकारी सहायता के सर्वोदय विचारधारा को साथ लेकर इस स्थान की सफाई शुरू की गई 100 लोगों के सामूहिक प्रयास से, एक नहीं, दो धाराएं अचानक पाताल से पानी निकालने लगे यह चमत्कार कहा जाए या समूहिक प्रयास।  इस समूहिक प्रयास में सांसद बांदा चित्रकूट भैरव प्रसाद मिश्रा, अतर्रा तहसील के वरिष्ठ पत्रकारों ने खुद मिट्टी खोदी फावड़ा चलाया स्थानीय नागरिकों ने अपनी नैतिक जिम्मेदारी मानते हु

काश ....... हम पंछी होते..... / लेखक का नाम नहीं दर्ज था.

काश हम पंछी होते ! उषाकाल में जब आकाश धीरे-धीरे आलोकित हो रहा हो ,पक्षियों की गुंजार सुनने का अनुभव बहुत आनंद दायक होता है. ऐसे समय में ,छत के एक कोने में बैठ अपने हाथ पैर हिलाते(योगासन)समय मेरी दृष्टि बार  बार मुँडेर की ओर जाती है जहां कटोरा भर दाना पानी रखना मेरी बरसों से चली आरही दिनचर्या है. वहाँ एक एक दो दो पक्षियों को क्रमशः आता देख मेरा मन होता है कहूँ-               राम राम गौरय्या !                राम राम मैना रानी !                राम राम मिट्ठू मियाँ! पर वो कब सुनेंगे? चोंच भर पानी पिया ,उड़े और पेड़ पर बैठ कर चहचहाने लगे. आज भी मेरी दृष्टि वहीं लगी थी, पहले दो कबूतर आए ,बैठकर सशंकित हो इधर-उधर गर्दन मटकायी,पानी पिया और उड़ गए.मैना आयी  मुँडेर पर इधर-उधर फुदकी फिर फुदक कर कटोरे पर बैठी ,चोंच भर पानी पिया और उड़ गई. कुछ देर बाद आया कौआ,उसकी उड़ान सीधी कटोरे पर उतरी .पानी पीने के बाद गर्दन उठा कर देखा और मालुम नहीं कैसे उसकी दृष्टि सीधी मेरे पर आकर रुक गई. धृष्ट एकटक मुझे देख रहा था मानो कह रहा हो -उड़ाओगी ?उड़ा कर देखो . मैं बुदबुदायीं-मैं क्यों उड़ाऊँगी भय्या

सुरेंद्र ग्लोश की रचनाएँ

/ सुरेन्द्र  ग्लोश   एक दिल था शाम को सौंप दिया अब   दुजा  कहां   से  लाएं  हंम बंसी   धुन   कान‌   में    बैठ  गई अब और  क्या  उसे सु नाएं  हंम एक दिल था शाम को सौंप दिया आंखों   में  शाम   हैं   आन  बसें कुछ   और   देख  ना   पाएं  हंम इस  तन  पे  शाम  का  राज‌ चले अब   खुद  कैसे   चल  पायें‌  हम बंसी   धुन    कान   में   बैठ   गई अब  और  क्या  उसे  सुनाएं  हंम जब   शाम  शाम   रंग  डाल  गये किसी  और  ना रंग  रंग पायें  हंम बैठा    है   लबों   पे    शाम   नाम कुछ   और   बोल  ना   पायें   हम  बंसी    धुन   कान   में   बैठ   गई अब  और  क्या  उसे  सुनाएं   हंम उदौ ‌ उस   शाम  का  क्या  कहना हैं   उस    की   आस   लगाए  हंम अब    रो   रो    ‌आंसू    सूख   गए दिल   ही   दिल   घुटते  जायें   हम  बंसी  ‌  धुन   कान    में   बैठ   गई अब  और   क्या  उसे  सुनाएं   हंम उस   बिरहा  जल जल  खाक  हुए अब  किस  को  और  जलांयें‌   हंम अगर   कांटा  भी  चुभ  जाये‌  उन्हें यहां   लहू   लुहान   हो  जायें   हम बंसी   ‌ धुन     कान    में   बैठ  गई अब   और   क्या  उसे 

सीमा मधुरिमा की कुछ रचनाएँ

पत्रकार .. पिछले तीन हफ्ते से वो सड़को पर लगातार पैदल चल रहे मजदूरों का दर्द शूट कर रहा था ....रोज ही नई नई खबरें ...उसके भेजे गए वीडियो और तस्वीरों से उसके समाचार की माँग बढ़ने लगी l आज ही उसके एक उच्च अधिकारी ने बताया की उसके प्रमोशन की बात चल रही l वो बहुत खुश हुआ और चल दिया इस ख़ुशी को बांटने अपनी सबसे नई महिला मित्र के पास l रास्ते में उसे कुछ रोते हुए लोग मिले ....वो अपनी बड़ी गाड़ी से निचे उतरा और उनका हाल पूछा ..पता चला तीन दिनों से रोटी का एक भी टुकड़ा नहीं मिला ....अब और पैदल नहीं चला जाता इसलिए वो वहीं बैठ गए ....उसने अपना कैमरा निकाला कुछ तस्वीरें खींची एक दो लोगों का इंटरव्यू लिया और अपने बड़े अफसरों को भेज दिया l  उसका मन तो हुआ की कुछ मदद कर दे इनलोगों की ...लेकिन तभी उसे याद आया कि वो पत्रकार है और जो इनलोगों के लिए कर सकता था वो उसने कर लिया है l  तभी उसे याद आया कि वो तो अपनी नई महिला मित्र के यहाँ जा रहा था ...वो अपनी बड़ी गाड़ी में दाखिल हुआ और बढ़ गया l उसकी बड़ी गाड़ी के चारों तरफ स्टिकर लगे थे कोरोना आपातकाल सेवा पत्रकार !!" कुछ स्त्रियाँ ऐसी भी होती हैँ -

रामधारी सिंह दिनकर की एक चर्चित कविता

ओज गुण के पुरोधा,अपनी कविताओं से सत्ता के सिंहासन तक को हिलाने की क्षमता रखने वाले हिंदी भाषा के महाकवि रामधारी सिंह दिनकर जी को उनके जन्मदिन पर कोटि कोटि नमन। आज पढ़िए उनकी सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में से एक कृष्ण की चेतावनी। वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम, सह धूप-घाम, पानी-पत्थर, पांडव आये कुछ और निखर। सौभाग्य न सब दिन सोता है, देखें, आगे क्या होता है। मैत्री की राह बताने को, सबको सुमार्ग पर लाने को, दुर्योधन को समझाने को, भीषण विध्वंस बचाने को, भगवान् हस्तिनापुर आये, पांडव का संदेशा लाये। ‘दो न्याय अगर तो आधा दो, पर, इसमें भी यदि बाधा हो, तो दे दो केवल पाँच ग्राम, रक्खो अपनी धरती तमाम। हम वहीं खुशी से खायेंगे, परिजन पर असि न उठायेंगे! दुर्योधन वह भी दे ना सका, आशीष समाज की ले न सका, उलटे, हरि को बाँधने चला, जो था असाध्य, साधने चला। जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है। हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप-विस्तार किया, डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान् कुपित होकर बोले- ‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे, हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।

चुनाव सबसे बड़े मुर्ख का / सुभाषचंदर

जनसंदेश टाइम्स के शनिवार के व्यंग्य स्तंभ में पढ़िए "चुनाव सबसे बड़े मूर्ख का ' चुनाव सबसे बड़े मूर्ख का  सुभाष चंदर आओ मित्रों, आज आपको एक ऐसे सम्मेलन  में लिए चलता हूँ जहाँ सबसे बड़े मूर्ख का चुनाव होने वाला है l  इस सम्मेलन में दूर दूर से मूर्ख लोगों की सवारियां आईं हुई हैं। चलिए आपका परिचय सभी सहभागियों से करा दूं जो इस चुनाव में हिस्सा लेने आये हैं l उनसे मिलिए l वह जिनके भारी व्यक्तित्व का  खमियाजा उनकी कुर्सी भुगत रही है , वह हमारे  देश के उद्योगपति हैं l  इनके बराबर वाली कुर्सी पर कुर्ता-धोती की राष्ट्रीय पोशाक में नेताजी विद्यमान है जो आसमान को ऐसे घूर रहे हैं जैसे उसके कुछ तारे झपट लेंगे l नेताजी की बगल में खाकी वर्दी में थानेदार जी बैठे हैं जो  कुर्सी पर बैठे- बैठे भी जमीन पर ठोकरे मार रहे हैं  । उधर कोने में चेहरे पर मनहूसियत का स्थायी भाव लिए जो सज्जन शून्य में निहार रहे हैं ,वह हिंदी के साहित्यकार हैं । उधर एकदम कोने में एक साहब शर्माने का लगातार  अभ्यास कर रहे है ।वह कभी  पैर के नाखूनों से जमीन कुदेरते हैं तो  कभी सीट छोडकर जमीन पर बैठने की कोशिश करते

सर्वेपल्लि राधाकृष्णन

सर्वेपल्लि राधाकृष्णन प्रसिद्ध शिक्षाविद एवं भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन (तमिल: சர்வபள்ளி ராதாகிருஷ்ணன்; 5 सितम्बर 1888 – 17 अप्रैल 1975) भारत के प्रथम उप-राष्ट्रपति (1952 - 1962) और द्वितीय राष्ट्रपति रहे। वे भारतीय संस्कृति के संवाहक, प्रख्यात शिक्षाविद, महान दार्शनिक और एक आस्थावान हिन्दू विचारक थे। उनके इन्हीं गुणों के कारण सन् 1954 में भारत सरकार ने उन्हें सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से अलंकृत किया था। उनका जन्मदिन (5 सितम्बर) भारत में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत के तीसरे राष्ट्रपति कार्यकाल १३ मई, १९६२ – १३ मई, १९६७ प्रधान  मंत्री गुलजारी लाल नंदा (प्रथम कार्यावधि) लाल बहादुर शास्त्री गुलजारीलाल नंदा (द्वितीय कार्यावधि) उपराष्ट्रपति डॉ॰ ज़ाकिर हुसैन पूर्व अधिकारी राजेंद्र प्रसाद उत्तराधिकारी डॉ॰ ज़ाकिर हुसैन प्रथम भारत के उपराष्ट्रपति कार्यकाल १३ मई, १९५२ – १२ मई, १९६२ राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद पूर्व अधिकारी कार्यालय आरम्भ उत्तराधिकारी डॉ॰ ज़ाकिर हुसैन जन्म ५ सितम्बर १८८८ तिरुट्टनी, तमिल नाडु, भारत मृत्यु