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बर्फ़ में फंसी मछली / दयानंद पांडेय

  यह उस के लिए कोई नया अनुभव नहीं था। पर अनुभव तो था ही। प्रेम उस ने कई बार किया था। जो लोग कहते हैं कि प्रेम सिर्फ एक बार होता है , उसे उन लोगों पर तरस आता है। उस का मानना है कि जैसे किसी का एक बार खाना खाने से पेट नहीं भर सकता , वैसे ही किसी की जिंदगी सिर्फ़ एक प्रेम से नहीं चल सकती , हां यह जरूर हो सकता है कि किसी एक प्रेम की तासीर ज्यादा हो , तो किसी और प्रेम की तासीर कम। उसे याद है कि उस का पहला प्रेम रिश्ते की एक लड़की से हुआ। कायदे से वह रिश्ते में भी नहीं थी। बल्कि रिश्तेदार के गांव से थी। वह पहले भी उस से मिला था। पर पहली मुलाकात में उसे उस से प्यार नहीं हुआ था। एक बार तो वे दिन-रात शहर में साथ रहे , तब भी प्यार नहीं हुआ। एक शादी में जब वह घाघरा-शमीज पहन कर आई तो उस के दिल की घंटियां बज गईं। वह अचानक धक से रह गया। ‘ दिल तो लई गवा , अब का होगा रे! ’ फिल्मी गाना उस की जबान पर खट से आ गया। पर अब वह कुछ कर नहीं सकता था सिवाय प्यार के। लेकिन तब वह उस से कुछ कह भी नहीं पाया। सिर्फ प्यार करता रहा। एक तरफा। बिना कुछ बोले। बस देखता रहा। उस बार उस रिश्तेदार के यहां से