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देव सूर्य मंदिर ने जब बदल डाली अपनी दिशा

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खुद को बचाने के लिए देव सूर्य मंदिर ने बदल ली थी दिशा अमरेन्द्र किशोर बिहार के औरंगाबाद जिले के देव स्थित ऎतिहासिक त्रेतायुगीन पश्चिमाभिमुख सूर्य मंदिर अपनी विशिष्ट कलात्मक भव्यता के साथ साथ अपने इतिहास के लिए भी विख्यात है। कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने स्वयं अपने हाथों से किया है। इस मंदिर के बाहर संस्कृत में लिखे श्लोक के अनुसार 12 लाख 16 हजार वर्ष त्रेतायुग के गुजर जाने के बाद राजा इलापुत्र पुरूरवा ऐल ने इस सूर्य मंदिर का निर्माण प्रारम्भ करवाया था। शिलालेख से पता चलता है कि सन् 2014 ईस्वी में इस पौराणिक मंदिर के निर्माण काल को एक लाख पचास हजार चौदह वर्ष पूरे हो गए हैं।विश्व का एकमात्र पश्चिमाभिमुख सूर्यमंदिर हैदेव मंदिर में सात रथों से सूर्य की उत्कीर्ण प्रस्तर मूर्तियां अपने तीनों रूपों उदयाचल (प्रात:) सूर्य, मध्याचल (दोपहर) सूर्य, और अस्ताचल (अस्त) सूर्य के रूप में विद्यमान है। पूरे देश में यही एकमात्र सूर्य मंदिर है जो पूर्वाभिमुख न होकर पश्चिमाभिमुख है। करीब एक सौ फीट ऊंचा यह सूर्य मंदिर स्थापत्य और वास्तुकला का अ

प्रेम / ओशो

    ओशो की नजर में प्रेम / प्रेम की नजर में ओशो   प्रेम, संबंध नहीं है <<Back प्रेम शब्द जितना मिसअंडरस्टुड है, जितना गलत समझा जाता है, उतना शायद मनुष्य की भाषा में कोई दूसरा शब्द नहीं! प्रेम के संबंध में जो गलत-समझी है, उसका ही विराट रूप इस जगत के सारे उपद्रव, हिंसा, कलह, द्वंद्व और संघर्ष हैं। प्रेम की बात इसलिए थोड़ी ठीक से समझ लेनी जरूरी है। जैसा हम जीवन जीते हैं, प्रत्येक को यह अनुभव होता होगा कि शायद जीवन के केंद्र में प्रेम की आकांक्षा और प्रेम की प्यास और प्रेम की प्रार्थना है। जीवन का केंद्र अगर खोजना हो, तो प्रेम के अतिरिक्त और कोई केंद्र नहीं मिल सकता है। समस्त जीवन के केंद्र में एक ही प्यास है, एक ही प्रार्थना है, एक ही अभीप्सा है--वह अभीप्सा प्रेम की है। और वही अभीप्सा असफल हो जाती हो तो जीवन व्यर्थ दिखायी पड़ने लगे--अर्थहीन, मीनिंगलेस, फस्ट्रेशन मालूम पड़े, विफलता मालूम पड़े, चिंता मालूम पड़े तो कोई आश्चर्य नहीं है। जीवन की केंद्रीय प्यास ही सफल नहीं हो पाती है! न तो हम प्रेम दे पाते हैं और न उपलब्ध कर पाते हैं। और प्रेम जब असफ

अवतार सिंह पाश

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प्रस्तुति- मनीषा यादव अवतार सिंह संधू पाश जन्म 09 सितम्बर 1950 निधन 23 मार्च 1988 उपनाम पाश जन्म स्थान तलवंडी सलेम, तहसील नकोदर, जिला जालंधर, पंजाब कुछ प्रमुख कृतियाँ लौहकथा (1970), उड्ड्दे बाजाँ मगर (1974), साडे समियाँ विच (1978), लड़ांगे साथी (1988), खिल्लरे होए वर्के (1989) विविध सिआड़ (1972-73), हेम ज्योति (1974-75) और हस्तलिखित 'हाक'(1982) नामक पत्रिकाओं का सम्पादन। जीवन परिचय पाश / परिचय ।अंग्रेज़ीनाम=Avtar Singh Sandhu "Pash" पाश के रचना संग्रह लौहकथा / पाश (कविता-संग्रह) उड्ड्दे बाजाँ मगर / पाश (कविता-संग्रह) साडे समियाँ विच / पाश (कविता-संग्रह) लड़ांगे साथी / पाश (कविता-संग्रह) खिल्लरे होए वर्के / पाश (कविता-संग्रह) पाश की कुछ रचनाएँ क़ैद करोगे अंधकार में / पाश सबसे ख़तरनाक / पाश घास / पाश सपने / पाश 23 मार्च / पाश हम लड़ेंगे साथी / पाश मैं पूछता हूँ/ पाश अब विदा लेता हूँ / पाश सपने / पाश आधी रात में / पाश मैं पूछता हूँ आसमान में उड़ते हुए सूरज से / पाश तुम्हारे रुक-रु

होली की रंगोली

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होली    प्रस्तुति--- कृति शरण / होली अन्य नाम डोल यात्रा या डोल पूर्णिमा ( पश्चिम बंगाल ), कामन पोडिगई ( तमिलनाडु ), होला मोहल्ला ( पंजाब ), कामना हब्बा ( कर्नाटक ), फगुआ ( बिहार ), रंगपंचमी ( महाराष्ट्र ), शिमगो ( गोवा ), धुलेंडी ( हरियाणा ), गोविंदा होली ( गुजरात ), योसांग होली ( मणिपुर ) आदि। अनुयायी हिन्दू , भारतीय, भारतीय प्रवासी उद्देश्य धार्मिक निष्ठा, सामाजिक एकता, मनोरंजन प्रारम्भ पौराणिक काल तिथि फाल्गुन पूर्णिमा उत्सव रंग खेलना, हुड़दंग, मौज-मस्ती अनुष्ठान होलिका दहन प्रसिद्धि लट्ठमार होली (बरसाना) संबंधित लेख ब्रज में होली , होलिका , होलिका दहन , कृष्ण , राधा , गोपी , हिरण्यकशिपु , प्रह्लाद , गुलाल , दाऊजी का हुरंगा , फालेन की होली , रंगभरनी एकादशी आदि। वर्ष 2016 23 मार्च को होलिका दहन एवं 24 मार्च को होली ( धुलेंडी ) अद्यतन‎ 18:14, 17 मार्च 2016 (IST) होली भारत का प्रमुख त्योहार है। होली जहाँ एक ओर सामाजिक एवं धार्मिक त्योहार है, वहीं रंगों का भी त्योहार है। बाल-वृद्ध, नर-नार