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रसभरी प्रेम कविताओं में कतरा कतरा दर्द

अनमी शरण बबल कैसे एक दर्द / किसी की   खुशियों और उम्मीदों पर अमरबेल सा पसर जाता है अब वो पहाड़ और मैं / एक ही दर्द के साझीदार है / अनंतकाल तक के लिए।     नागपुर की चर्चित कवयित्री अर्चना राज के पहल काव्य संकलन कतरा कतरा दर्द की अंतिम कविता पहाड़ की आखिरी चार पंक्तियां है। मैं इसका इसलिए खासतौर उल्लेख कर रहा हूं कि इनकी कविताओं में प्रेम केंद्रीय भाव है। मगर उसके प्रति मरने जीने मदहोश रहने और झूठे कसमें वादों मे ही सिमटे रहने की लालसा भर   की ये कविताएं नहीं है। इसमें प्रेम के साथ आत्मसंघर्ष की पीड़ा और सामाजिक नियति से टकराने या विद्रोह करने का हौसला भी है। काव्य संकलन की भूमिका लिखते हुए ओम प्रकाश नौटियाल नें आरंभ में ही लिखा है कि जीवन के विषाद निराशा टीस कसक क्षोभ प्रेम की उहापोह की संवेदना भाव प्रस्फुटन से ये कवितएं पाठकों के मन को झंकृत करने में सामर्थ्थ रखती है। कतरा कतरा दर्द में छोटी बड़ी 83 छंदमुक्त कविताएं है । जिसको पढ़ना यदि काव्य सौंदर्य के साथ भावों के विराट सागर में पाठक आनंदित महसूसेगा। कहा जाता है कि संक्षेप में लिखना या भावों की

मधुकर शाह बुंदेला 1857 नहीं 1842 में हुआ था पहला विद्रेह

1842 में बुंदेलखंड में वीर मधुकर शाह ने किया था अंग्रेजों के खिलाफ पहला विद्रोह प्रस्तुति-  शैलेन्द्र किशोर फिल्म अभिनेता गोविंद नामदेव के निर्देशन में होगा नाटक का मंचन 30 एवं 31 दिसंबर और 1 जनवरी को होगी नाटक की प्रस्तुति संदीप तिवारी -!- सागर देश के स्वाधीनता संग्राम की बात आती है, तो सभी को 1857 की क्रांति याद आ जाती है। देश की पहली क्रांति इसे ही माना जाता है। यह बात शायद चंद लोग ही जानते होंगे कि अंग्रेजी हुकूमत के  खिलाफ पहला विद्रोह 1857 की क्रांति से भी करीब 15 साल पहले हो चुका था। वर्ष 1842 में बुंदेलखंड के मधुकर शाह बुंदेला ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका था। इसे ‘बुंदेला विद्रोह’ कहा जाता है। ‘सागर गजेटियर’ में भी इसका उल्लेख है। सीधी सी बात है 1857 की क्रांति इसके बाद ही हुई। इस पर केंद्रित नाटक का मंचन 30 एवं 31 दिसंबर को शाम 7 बजे से एवं 1 जनवरी 2014 को दोपहर 1 और शाम 7 बजे से डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय के स्वर्ण जयंती सभागार में होगा। नाटक के माध्यम से समझ सकेंगे लोग : वीर मधुकर शाह बुंदेला के गौरवपूर्ण कार्य

गरीब भारत की कथा व्यथा

अनामी शरण बबल हिन्दुस्तान यानी भारत को आमतौर पर दो नाम से जाना जाता है भारत और   इंडिया के रूप में यही दो चेहरा जगत विख्यात है। मॉल मेट्रो मोबाइल मल्टीप्लेक्स मल्टीनेशनल कंपनियां मल्टीस्टोरी अपार्टमेंट मनी मैनेजमेंट मल्टी मोटर हैबिट   और मल्टी जॉब के साथ साथ मल्टी रिलेशन का जमाना है। जिसकी चमक दमक और रौनक से पूरा इंड़िया गुलजार है। महज 10 फीसदी अमीरों के वैभवपूर्ण रहन सहन और जीवन शैली से अपना इंडिया भी किसी विकसित देश से कहीं कम नहीं दिखता है। मगर गांवो गलियों और गरीबों के इस भारत में 40 फीसदी लोग आज भी बुनियादी जरूरतों और दो जून की रोटी के लिए भी दूसरों पर मोहताज है।   एकदम युवा कथाकार भरत प्रसाद का ताजा कहानी संग्रह चौबीस किलो का भूत सबसे पहले अपने नाम के अनोखेपन से सहसा अपनी तरफ ध्यान खिंचता है।   कथाका भरत प्रसाद की कहानियों में कई तरह के नयापन का प्रयोग है, मगर मुझे लगता है कि कहानियों पर बात करने से पहले इसके कथाकार पर बात करन भी जरूरी है। भारत के सबसे आधुनिक विवि के रूप में विख्यात जवाहरलाल नेहरू विवि में पढ़े और वहीं से पीएचडी करने वाले भरत बड़ी आसानी से

यादों के चिराग / अनामी शरण बबल

  यादों के केंचुल या  केंचुल में यादें / अनामी शरण बबल 1 a मैं किसी की याद के केंचुल   में हूं अस बस , लस्त पस्त चूर किसी मोहक सुगंध से नशा सा है इस केंचुल का निकल नहीं पा रहा यादों के रौशन सुरंग से जाग जाती है यादे मेरे जागने से पहले और सो नहीं पाती है तमाम यादें   मेरे सोने के बाद भी मोहक अहसास के केंचुल से नहीं चाहता बाहर आना इन यादों को खोना जो वरदान सा मिला है मुझे अपलक महसूसने को । b केंचुल में यादें नहीं नहीं सब कुछ  उतर जाता है एक समय के बाद पानी का वेग हो या आंधी तूफान सागर का सुनामी लगातार उपर भागता तेज बुखार आग बरसाता सूरज हो चांदनी रात की शीतलता कुछ भी तो नहीं ठहरता सदा -सदा के लिए केंचुल से भी तो एक दिन  हो जाएगी बाहर सर्पीली यादें हवा में बेजान खाली केंचुल भी              यादों पर बेमानी है। नहीं उतरेगा मेरा खुमार दिन रात धरती पहाड़ की तरह चमकता रहेगा यादों का अमरप्रेम सूरज चांद की तरह कोई रहे ना रहे क्या फर्क पड़ता है   हवाओं में गूंजती रहेगी प्रेम की खुश्बू खंडहर घाटियों म