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अप्रैल, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सुरेन्द्र सिंघल की दो गजलें

मैं कि अब ख़ुद को समंदर में डुबोना चाहता हूं  यानि खु़द में ही समंदर को समोना चाहता हूं मुझको खुद पर तो नहीं विश्वास तुमसे पूछता हूं मैं तुम्हारा ही कि या अपना भी होना चाहता हूं खूंटियों पर टांग सारा बोझ दिन भर की थकानें निर्वसन हो फर्श पर कमरे के सोना चाहता हूं  अब कि जब तेरे बदन की आग भी धुंधुआ रही है घुट न जाए दम धुएं के पार होना चाहता हूं मुझको अब मेरे अंधेरों में भटकने दो अजीज़ो बात ये है रोशनी के दाग़ धोना चाहता हूं              2 गर नहीं बस में मेरे तेज हवाएं रोकूं  जिस तरह भी हो मगर बुझने से शमऐं रोकूं मुझको दीवार समझ पीठ टिकाली उसने अब मेरा फ़र्ज़ है गिरती हुई ईंटें रोकूं दफ़्न जिंदा ही मुझे करने चली है ये सदी कैसे ताबूत में ठुकती हुई कीलें रोकूं रोज़ कुछ और सिमट जाती है तेरी दुनिया रोज़ कुछ कितना सिमट जाऊं कि सांसें रोकूं               सुरेंद्र सिंघल

बार बार बीमार क्यों?

*क्या वाकई इंसान बार बार बीमार होता है ?* सभी अस्पतालों की OPD बन्द है,  आपातकालीन वॉर्ड में कोई भीड़ नही है। कोरोना बाधित मरीजों के अलावा कोई नए मरीज नही आ रहे हैं। सड़कों पर वाहन ना होने से दुर्घटनाएं नही हैं। हार्ट अटैक, ब्लड प्रेशर, ब्रेन हैमरेज के मामले अचानक बहुत कम हो गए हैं। अचानक ऐसा क्या हुआ है, की बीमारियों की केसेस में इतनी गिरावट आ गई ? यहाँ तक कि श्मशान में आनेवाले मृतको की संख्या भी घट गई हैं। क्या कोरोना ने सभी अन्य रोगों को नियंत्रित या नष्ट कर दिया है? नही ? बिल्कुल नही ? दरअसल अब यह वास्तविकता सामने आ रही है, की जहाँ गंभीर रोग ना हो, वहाँ पर भी डॉक्टर उसे जानबूझ कर गंभीर स्वरूप दे रहे थे और डॉ विश्वरूप राय चौधरी की बाते सही साबित हो रही कि अस्पताल से जिंदा कैसे लौटे ? जब से भारत में कॉर्पोरेट हॉस्पिटल्स, टेस्टिंग लॅब्स की  बाढ आई, तभी से यह संकट गहराने लगा था। मामूली सर्दी, जुकाम और खांसी में भी हजारों रुपये की टेस्ट्स करनें के लिए लोगों को मजबूर किया जा रहा था। छोटी सी तकलीफ में भी धड़ल्ले से ऑपरेशन्स किये जा रहे थे। मरीजों को यूँ ही ICU में रखा जा रहा

राधास्वामी

: 🙏🌹🙏 *धन*         की              भूख                     *भिखारी*                                    बना                                           देती                                                    है !                      और *'नाम'*           की                भूख                      *बादशाह*                                      बना                                            देती                                                    है !!      🙏🙏 *- फैसला आपका -* 🙏🙏 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 🙏🙏🙏🙏 *राधास्वामी* 🙏🙏🙏🙏 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 राधास्वामी दयाल की दया राधास्वामी सहाय राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी राधास्वामी ।।।।।।।।।।। 

विनोद सिंह की हिंदी और भोजपुरी रचनाएं

V विनोद सिंह आरा: भोजपुरी व्यंग      रउए बचाँई मोदी जी   ***************** बाहर बेमारी घर में नारी, कहाँ लुकांई मोदी जी। आपन हारल मेहरी के मारल,कहां सुनांई मोदी जी।। जसहीं राउर लाँक डाउन के,टी.वी.प एलान भइल, पतनी परायण हम पतिययन के,बहुत बड़ा नोकसान भईल। कड़ी मोछ पर आफत के, अइसन अजगुत पाला पड़ल, पलक झपकते खतम भईल,अपना मन के गामा बनल।। मउराइल बैगन जस मुँखड़ा,कहाँ देखांई मोदीजी, आपन हारल मेहरी के मारल,कहां सुनांई मोदीजी।। दिन बड़ेड़ी प जढ़ जाला,झड़ू पोंछां आँटा चालत, ठेहुना भर बरतन बेसिन में,रहेला असहीं झाँकत। तबहुं भृकुटि तनल रहेला,जरत आग के शोला जस, बोली इनकर घाव करेला,बम बरुद के गोला अस। आगे कुँईया पीछे खाई, कहाँ पराईं मोदी जी, आपन हारल मेहरी के मारल कहाँ सुनाइ मोदी जी।। जरला में खोड़े खातिर सुजनी सुतार भईल बाऊर। भइया इनकर घेरा के एहिजे,बढ़ा देलन दुखड़ा आउर।। घर हमार देखते-देखते बा कुरुक्षेत्र मैदान बनल, शर सय्या पर भीष्म नियर,असहीं बानी लाचार पड़ल।। अहो नाथ कछु बाकी नाहीं,अबहुं बचाईं मोदी जी, आपन हारल मेहरी के मारल, कहाँ सुनाईं मोदी जी।        आम आदम

यानी के / आलोक यात्री

📎📎 यानी के... ... मौजूदा दौर के आदमी की बेबसी का ग़ालिब साहब को डेढ़ सदी पहले ही अहसास हो गया था मियां की बानगी देखिए... हर शेर बोलता हुआ... हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी के हर ख्वाहिश पे दम निकले बहुत निकले मेरे अरमां लेकिन फिर भी कम निकले डरे क्यूं मेरा क़ातिल क्या रहेगा उसकी गरदन पर वो ख़ूं जो चश्म ए तर से उम्र भर यूं दमबदम निकले निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन बहुत बेआबरू होकर तेरे कूंचे से हम निकले भरम खुल जाए ज़ालिम तेरे क़ामत की दराज़ी का अगर उस तुररा ए पुरपेचोख़म का पेचोख़म निकले मगर लिखवाए कोई उसको ख़त तो हम से लिखवाए हुई सुबह और घर से कान पर रखकर क़लम निकले हुई इस दौर में मनसूब मुझसे बादा आशामी फिर आया वो ज़माना जो जहां में जामेजम निकले हुई जिनसे तवक़्क़ो ख़स्तगी की दाद पाने की वो हमसे भी ज़्यादा ख़स्ता ए तेग ए सितम निकले मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का उसी को देख के जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले कहां मैख़ाने का दरवाज़ा ग़ालिब और कहां वाइज़ पर इतना जानते हैं कल वो जाता था के हम निकले 📎📎 यानी के.... बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकल

आगरा में कोरोना और राधास्वामी संतमत दयालबाग

प्रस्तुति - स्वामी शरण / आत्म स्वरूप /संत शरण *Coronavirus in Agra:*  *पढ़िए अंदर की बात :* - (वरिष्ठ पत्रकार बृजेन्द्र पटेल की फेसबुक वॉल से साभार) *Agra (Uttar Pradesh, India)।*             जब नासमझ अफसरों के हाथ में आगरा जैसे शहर की कमान सौंप दी जाएगी तो आगरा को बुहान बनने से हुकूमत को क्या ईश्वर भी नहीं रोक सकता। यकीनन कोरोना संक्रमण की जैसी महामारी आगरा में फैली है, कुछ वक्त बीतने के बाद यहां चारो तरफ हाहाकार होगी। इसका अंदाजा इस बात से लगाइए, शहर के डाक्टर घर बैठ गए हैं। प्राइवेट हो या सरकारी अस्पतालों में कोरोना तो दूर दीगर रोगों का इलाज भी बंद हो गया है। ऐसे बद से बदतर हालात आजादी के सात दशक में किसी ने कभी नहीं देखे। *"सत्संगी जागते रहे",*                    *हुकूमतें सोती रहीं*            जनवरी माह में कोरोना संक्रमण को लेकर मुल्क की हुकूमतें कुंभकरणी नींद सो रही थीं तब *आध्यामिक केंद्र दयालबाग में सत्संगी जाग रहे थे। राधास्वामी सत्संग सभा के धर्म गुरू प्रो. पी एस सत्संगी साहब ने जनवरी माह में एक दिन सत्संग में सिर पर हेलमेट, मास्क, दस्ताने पहने

रवि अरोड़ा की दो रचनाएं

1 हे ईश्वर अब तू ही इन्हें समझा रवि अरोड़ा अब इसे आप संस्कार कहें अथवा परिवार का माहौल मगर यह सत्य है कि देश के अधिकांश धार्मिक स्थल पर मैं माथा टेक आया हूँ । इस मामले में मैंने मंदिर, गुरुद्वारे , चर्च और दरगाहें सब जगह समभाव से शीश नवाया । यदि सच कहूँ तो हमारे देश के धार्मिक स्थलों पर जाकर आप कुछ और पायें अथवा नहीं मगर थोड़ी देर को ही सही मगर अपने अहंकार से तो बरी हो ही जाते हैं । जी नहीं मैं आध्यात्मिकता के परिप्रेक्ष्य में यह नहीं कह रहा । मैं तो पीछे खड़ी बेतहाशा भीड़ और आराध्य देव के सामने पहुँचने पर पंडे-पुजारी द्वारा ख़ुद को आगे ठेले जाने के बाबत बात कर रहा हूँ । अक्सर एसा हुआ है कि ढंग से मूर्ति को देख भी नहीं पाये और किसी ने धकिया कर आगे बढ़ा दिया । अब मामला भगवान के दरबार का होता है सो अहंकार का सवाल ही नहीं , मान-अपमान का कोई मुद्दा ही नहीं , बस यही संतोष रहता है कि चलो जैसे तैसे दर्शन तो हो ही गए । उधर, सभी धार्मिक स्थलों पर एक ख़ास बात मुझे दिखी । अपने मोहल्ले के मंदिर-गुरुद्वारे में जो लोग खरीज चढ़ाते हैं , वहाँ बड़े बड़े नोट निकालते हैं । नोटों वाले सोने का क

दिनेश श्रीवास्तव के दोहे - कविताएं

दिनेश श्रीवास्तव: दिनेश की कुण्डलिया -------------------------         विषय- "योद्धा''                         (१) कहलाता योद्धा वही,तरकस में हों तीर। धीर वीर गंभीर हो,जैसे थे रघुबीर।। जैसे थे रघुबीर,राक्षसी वंश विनाशा। उनसे ही तो आज,देश ने की है आशा।। कहता सत्य दिनेश,न्याय का पाठ पढ़ाता। सद्गुण से हो युक्त,वही योद्धा कहलाता।।                          (२) आओ अब तो राम तुम,योद्धा बनकर आज। यहाँ'कॅरोना'शत्रु को,मार बचाओ लाज।। मार बचाओ लाज,किए संग्राम बहुत हो। वीरों के हो वीर,किए तुम नाम बहुत हो।। करता विनय दिनेश,शत्रु से हमे बचाओ। मेरे योद्धा राम!आज धरती पर आओ।।                          (३) करना होगा आपको,बनकर योद्धा वीर। एक 'वायरस' शत्रु से,युद्ध यहाँ गंभीर।। युद्ध यहाँ गंभीर,हराना होगा उसको। एक विदेशी शत्रु,यहाँ भेजा है जिसको।। 'घरबंदी' का शस्त्र, हाथ मे होगा धरना। लेकर मुँह पर मास्क,युद्ध को होगा करना।।                        (४) बनकर योद्धा राम ने,रावण का संहार। जनक नंदिनी का किया,लंका से उद्धार। लंका से उद

जटायु की आवाज

✍🏻अंतिम *सांस* गिन रहे *जटायु* ने कहा कि मुझे पता था कि मैं *रावण* से नही *जीत* सकता लेकिन तो भी मैं *लड़ा* ..यदि मैं *नही* *लड़ता* तो आने वाली *पीढियां* मुझे *कायर* कहती  🙏जब *रावण* ने *जटायु* के *दोनों* *पंख* काट डाले... तो *काल* आया और जैसे ही *काल* आया ... तो *गिद्धराज* *जटायु* ने *मौत* को *ललकार* कहा, -- " *खबरदार* ! ऐ *मृत्यु* ! आगे बढ़ने की कोशिश मत करना... मैं *मृत्यु* को *स्वीकार* तो करूँगा... लेकिन तू मुझे तब तक नहीं *छू* सकता... जब तक मैं *सीता* जी की *सुधि* प्रभु " *श्रीराम* " को नहीं सुना देता...!  *मौत* उन्हें *छू* नहीं पा रही है... *काँप* रही है खड़ी हो कर...  *मौत* तब तक खड़ी रही, *काँपती* रही... यही इच्छा मृत्यु का वरदान *जटायु* को मिला। किन्तु *महाभारत* के *भीष्म* *पितामह* *छह* महीने तक बाणों की *शय्या* पर लेट करके *मौत* का *इंतजार* करते रहे... *आँखों* में *आँसू* हैं ... रो रहे हैं... *भगवान* मन ही मन मुस्कुरा रहे हैं...! कितना *अलौकिक* है यह दृश्य ... *रामायण* मे *जटायु* भगवान की *गोद* रूपी *शय्या* पर लेटे हैं... प्रभु " *श्रीराम* &qu

दुर्लभ ग्रंथ उल्टा सीधा में राम कृष्ण कथा

*अति दुर्लभ एक ग्रंथ ऐसा भी है हमारे सनातन धर्म मे* इसे तो सात आश्चर्यों में से पहला आश्चर्य माना जाना चाहिए --- *यह है दक्षिण भारत का एक ग्रन्थ* क्या ऐसा संभव है कि जब आप किताब को सीधा पढ़े तो राम कथा के रूप में पढ़ी जाती है और जब उसी किताब में लिखे शब्दों को उल्टा करके पढ़े तो कृष्ण कथा के रूप में होती है । जी हां, कांचीपुरम के 17वीं शदी के कवि वेंकटाध्वरि रचित ग्रन्थ "राघवयादवीयम्" ऐसा ही एक अद्भुत ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ को ‘अनुलोम-विलोम काव्य’ भी कहा जाता है। पूरे ग्रन्थ में केवल 30 श्लोक हैं। इन श्लोकों को सीधे-सीधे पढ़ते जाएँ, तो रामकथा बनती है और विपरीत (उल्टा) क्रम में पढ़ने पर कृष्णकथा। इस प्रकार हैं तो केवल 30 श्लोक, लेकिन कृष्णकथा (उल्टे यानी विलोम)के भी 30 श्लोक जोड़ लिए जाएँ तो बनते हैं 60 श्लोक। पुस्तक के नाम से भी यह प्रदर्शित होता है, राघव (राम) + यादव (कृष्ण) के चरित को बताने वाली गाथा है ~ "राघवयादवीयम।" उदाहरण के तौर पर पुस्तक का पहला श्लोक हैः वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः । रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये

रामावतार त्यागी / मौत से ज्यादा क्या है.......

रामावतार त्यागी रामावतार त्यागी पर जितना जानने का प्रयास किया जाए उतना कम ही है। उनका एक प्रसिद्ध गीत है - एक हसरत थी कि आंचल का मुझे प्यार मिले। मैंने मंजिल को तलाशा मुझे बाजार मिले।। जिंदगी और बता तेरा इरादा क्या है? तेरे दामन में बता मौत से ज्यादा क्या है? जिंदगी और बता तेरा इरादा क्या है? इस गीत को बचपन से सुनता आ रहा हूँ। कितनी ही बार इस गीत को सुनो मन ही नहीं भरता है। वेदना का यह गीत घोर निराशा से आशा की ओर ले जाता है।  काल की बात करें तो यह वह समय था जब सिनेमा में निराशा भरे जीवन में साहस का संचार करने वाले कई गीत लिखे गए थे, जिन्होंने दर्शकों और श्रोताओं में नया उत्साह उत्पन्न किया। फिल्म ‘जिंदगी और तूफान’ (1975) के इस गीत में विशेष बात यह रही कि इसमें कवि रामावतार त्यागी ने जीवन की उस सच्चाई का प्रदर्शन किया है जिसे स्वीकारने से तत्कालीन समाज डरता रहा है। यह विशेष प्रकार का और निडर प्रयोग था। उन्होंने समाज के तथाकथित सभ्य समाज की आँखों में आँखें डाल कर बात की। अवैध संतान पैदा करने वालों और फिर उस संतान को सभ्य समाज द्वारा ठोकरे मारने वालों को कटघरे में खड़ा कर

कायस्थों का खानपान जाने सारा हिन्दुस्तान / अखिलेश श्रीवास्तव

कायस्थों का खाना-पीना –  कड़ी नंबर 1 -- बनारस के अर्दली बाजार में काफी बड़ी संख्या में कायस्थ रहते हैं. अगर आप रविवार को यहां के मोहल्लों से दोपहर में निकलें तो हर घर के बाहर आती खाने की गंघ बता देगी कि अंदर क्या पक रहा है. ये हालत पूर्वी उत्तर प्रदेश के तकरीबन उन सभी जगहों की है, जहां कायस्थ अच्छी खासी तादाद में रहते हैं. बात कुछ पुरानी है. अर्दली बाजार में एक दोस्त के साथ घूम रहा था. पकते लजीज मीट की खुशबु बाहर तक आ रही थी.  दोस्त ने मेरी ओर देखा,  तपाक से कहा, "ललवन के मुहल्लवां से जब संडे में निकलबा त पता लग जाई कि हर घर में मटन पकत बा." हकीकत यही है. उत्तर भारत में अब भी अगर आप किसी कायस्थ के घर संडे में जाएं तो किचन में मीट जरूर पकता मिलेगा. पूर्वी उत्तर प्रदेश में कायस्थों को लाला भी बोला जाता है. देशभर में फैले कायस्थों की खास पहचान का एक हिस्सा उनका खान-पान है. संडे में जब कायस्थों के घर जब मीट बनता है तो अमूमन बनाने का जिम्मा पुरुष ज्यादा संभालते हैं. पिछले शनिवार और रविवार जब मैं किताबों और कागजों से कबाड़ हल्का कर रहा था, तब फ्रंटलाइन में छपा एक रिव्यू हाथ

दौलत / कवि - अनाम गुमनाम

अख़बार बेचने वाला 10 वर्षीय बालक एक मकान का गेट बजा रहा है। मालकिन - बाहर आकर पूछी क्या है ? बालक - आंटी जी क्या मैं आपका गार्डेन साफ कर दूं ? मालकिन - नहीं, हमें नहीं करवाना है, और आज अखबार नही लाया । बालक - हाथ जोड़ते हुए दयनीय स्वर में.. "प्लीज आंटी जी करा लीजिये न, अच्छे से साफ करूंगा,आज अखबार नही छपा,कल छुट्टी थी दशहरे की ।" मालकिन - द्रवित होते हुए "अच्छा ठीक है, कितने पैसा लेगा ?" बालक - पैसा नहीं आंटी जी, खाना दे देना।" मालकिन- ओह !! आ जाओ अच्छे से काम करना । (लगता है बेचारा भूखा है पहले खाना दे देती हूँ..मालकिन बुदबुदायी।) मालकिन- ऐ लड़के..पहले खाना खा ले, फिर काम करना । बालक -नहीं आंटी जी, पहले काम कर लूँ फिर आप खाना दे देना। मालकिन - ठीक है, कहकर अपने काम में लग गयी। बालक - एक घंटे बाद "आंटी जी देख लीजिए, सफाई अच्छे से हुई कि नहीं। मालकिन -अरे वाह! तूने तो बहुत बढ़िया सफाई की है, गमले भी करीने से जमा दिए। यहां बैठ, मैं खाना लाती हूँ। जैसे ही मालकिन ने उसे खाना दिया, बालक जेब से पन्नी निकाल कर उसमें खाना रखने लगा। मालकिन - भ

मेरा इंडिया भारत बन रहा है / कवि अनाम

*_मेरा इंडिया भारत बन रहा है।_* _सुबह डीजे नही रामधुन सुन रहा है, मेरा इंडिया भारत बन रहा है।_ _हाथ मिलना और हेलो हाय भूल नमस्ते कर रहा है, मेरा इंडिया भारत बन रहा है।_ _मेड कल्चर ख़त्म हो गया घर में सबका काम बंट रहा है, मेरा इंडिया भारत बन रहा है।_ _पिज़्ज़ा बर्गर सब छोड़ के दाल रोटी चुन रहा है, मेरा इंडिया भारत बन रहा है।_ _प्रदुषण भी कम हो गया खुला आसमान दिख रहा है, मेरा इंडिया भारत बन रहा है।_ _बिगबॉस देखना बंद है हर घर में रामायण चल रहा है, मेरा इंडिया भारत बन रहा है।_ _भागती हुई ज़िन्दगी में जैसे अब हर कोई रुक रहा है, मेरा इंडिया भारत बन रहा है।_ _जरूरत सारी सिमट गई है थोड़े में भी काम चल रहा है, मेरा इंडिया भारत बन रहा है।_ _लौटा है किस्से कहानी का दौर बड़ों के साथ बचपन खेल रहा है, मेरा इंडिया भारत बन रहा है।_ _अपने घर के साथ साथ दूसरों के  लिए भी दीप जल रहा है, मेरा इंडिया भारत बन रहा है।_ _नई पीढी में संस्कार दिख रहे गली गली जरूरी सामान पहुंच रहा है, मेरा इंडिया भारत बन रहा है।_ _दर्द सबका एक है भूखा रहे न कोई सनातन धर्म की सुन रहा है, मेरा इंडिया भारत बन

संवाद : अपने आप से / रश्मि

लॉकडाउन में संवाद , संवाद -अपने आप से.  वैशाख शुरू हो गया है.धूप में ताप बढ़ गया है.हवा कुछ गर्म और धूल भरी हो गई है . क्यारी में गुलाब जल्द कुम्हला जाते हैं,पॉपी की पौध भी सूख गई है.लिली शर्माती सी खिल रही है.   छोटी सूरजमुखी के फूल शान से गर्दन उठा कर खिलखिला रहे हैं. सदाबहार के सफ़ेद,गुलाबी फूलों के गुच्छे मुस्करा रहे हैं. मौसम होली के बाद से ही बदलना प्रारंभ होगया था .कोरोना की आहट भी आने लगीथी. मेरे पीछे के आगंन में लगे अमरूद के वृक्ष से पत्तियाँ झड़ झड़ कर यहाँ वहाँ दौड़ने लगी थीं. इस वृक्ष को लेकर जगवीरी बीस दिन पहले बड़बड़ा रही थी -इसबार खूब अमरूद लगा है ,आप देखभाल करो तब ना खाने को मिलें.     कच्चे पक्के अमरूद रोज़ धरती पर पड़े मिलते और सफ़ाई करते उसका दिल जलता .  अब मै क्या कहूँ ? पेड़ पर बंदर होते तो लाठी लेकर भगाए जा सकते हैं .इस बार तोते थे.हरे हरे पत्तों के बीच बैठे तोतों का फ़ोटो लेने केलिए मैं सुबह से रेलिंग पर झुकी रहती ,कहाँ ले पायी ?कभी शैतान सी गोल आँख दिखाई देती तो कभी लम्बी पूछँ.मेरा प्रयास अधिक उतावला होते ही झट सारे उड़ जाते. पत्तियाँ अब भी झड़ रही

एडजस्ट / विजय केसरी

कहानी एडजस्ट / विजय केसरी श्रेया बचपन से ही सबकी दुलारी रही थी। उसका रूप भी बड़ा ही लुभावना था, जो भी उसे एक बार देखता, बस देखता ही रह जाता था। उसके रुप के समान ही उसकी वाणी में मिठास थी। श्रेया अपनी तोतली बोली से घर के सभी लोगों के चेहरे पर मुस्कान ला देती थी। घर के सभी सदस्य श्रेया को बहुत चाहते थे। समय के साथ अब श्रेया चार वर्षों की हो गई थी।  आकाश और रीता ने श्रेया का दाखिला रांची के एक सबसे बड़े स्कूल में करवा दिया था।  समय के साथ दिन बीतते चले गए। इस दरम्यान आकाश और रीता के जीवन में दो और नन्हें बच्चें सुशांत एवं प्रवीण आ गए थे। तीनों बच्चें एक साथ बड़े हो रहे थें। पांच जनों का यह परिवार अब एक नए मकान में शिफ्ट कर गए थे इस नए मकान (वसंत विहार) को आकाश और रीता ने बड़े ही अरमानों से बनाया था। तीनों बच्चें नए मकान में आकर बहुत खुश थें। श्रेया अब दसवीं कक्षा में पढ़ रही थी। नए मकान में श्रेया के लिए एक अलग से कमरा बनवाया गया था। स्कूल से आने के बाद वह उसी कमरे में ज्यादातर समय बीताती थी। होमवर्क भी उसी कमरे में करती थी। पुराना मकान से नए मकान में शिफ्ट होने से श्रेया बहु

कोई है जिसे हमारे शब्द छूते हैं / प्रज्ञा रोहिणी

लेखन में एक ही गहरा सन्तोष मिलता है कि कोई है जिसे हमारे शब्द छू रहे हैं। वो समय और हमें हमारी ही तरह महसूस कर रहा है । और इस तरह अपनी  दुनिया न सिर्फ बड़ी लगती है बल्कि लगातार अकेले कर दिए जाने वाले इस निर्मम समय में हम किसी को साथ खड़ा पाते हैं। लगता है समय की हिमशिलायें पिघलकर नदी होंगी। शुक्रिया हफ़ीज़ भाई। कहानियों में संसार  इक्कीसवीं सदी की दूसरी दहाई में जिन तरक़्क़ी याफ़्ता और मुखतलिफ़ मौज़ुआत (विषय) पर लिखने वाली महिला साहित्यकारों के नाम ज़हन में उभरते हैं उन में प्रज्ञा रोहिणी का नाम सरे फेहरिस्त (टॉप लिसटेड) है । प्रज्ञा रोहिणी आज हमारे दौर की एक अहम कहानीकार हैं । इन की ज़्यादतर कहानियाँ घरेलू और समाजी ताने बने से तयार होती हैं । बल्कि अर्थव्यवस्था , सांप्रदायिकता और समसामयिक विषयों पर लिख कर प्रज्ञा रोहिणी नें अपने को फ़ेमिनिस्म का ठप्पा लाग्ने से बचा लिया , जिस की वजह से फ़िकशन पढ़ने वाले हर हलक़े और तबक़े में उनका इस्तिक़बाल (स्वागत) किया गया ।  ज़मीनी रिश्तों से ताल्लुक़ रखने वाले साहित्यकार उन साहित्यकारों से ज़्यादा अहमियत रखते हैं जो ड्राइंग रूम में बैठ कर मीडिया और मुखतलिफ़ ज़र

राहु बाबा के संग कदमताल करती सोनिया

प्रस्तुति - शिशिर सोनी लगता है सोनिया गांधी पर भी अब राहुल गांधी का असर होने लगा है। तभी वो राहुल गांधी जैसी बहकी बहकी बातें कर रही हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कहा है कि मीडिया को दिया जाने वाला विज्ञापन कोरोना से लड़ने के लिए दो साल के लिए बंद किया जाए। मीडिया के बुनियाद पर वो चोट करने को क्यों कह रही हैं? जाहिर है कि उनका गुस्सा राहुल गांधी को लेकर मीडिया के ठंडे रवैये से होगा। गोया कि राहुल गांधी में दम नहीं तो उस बेदम में दम मीडिया कैसे फूंक दे? सोनिया गांधी की इस मांग का खूब मान मर्दन हो रहा है। होना भी चाहिए। आईएएनएस, ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन सहित सभी मीडिया संगठनों ने सोनिया गांधी की इस मांग को अनुचित बताया है। समूची मीडिया को हर साल तकरीबन 2 हजार करोड़ रुपए का विज्ञापन केंद्र सरकार और विभिन्न पब्लिक सेक्टर यूनिट्स से रीलीज होता है। उसमें भी मोदी सरकार के केंद्र में आने के बाद कई तरह की बंदिशें लगी हैं। भरी बैठीं सोनिया गांधी को ज्ञान आया है कि मीडिया को विज्ञापन बंद कर दिया जाए। यानि मीडिया का गला घोट दिया जाए। ये लोकतंत्र के प्रहरी पर अंतिम प्रहार होगा।

जटायु बनाम भीष्मपितामह

प्रस्तुति - स्वामी शरण /आत्म स्वरूप / संत शरण अंतिम *सांस* गिन रहे *जटायु* ने कहा कि मुझे पता था कि मैं *रावण* से नही *जीत* सकता लेकिन तो भी मैं *लड़ा* ..यदि मैं *नही* *लड़ता* तो आने वाली *पीढियां* मुझे *कायर* कहती  🙏जब *रावण* ने *जटायु* के *दोनों* *पंख* काट डाले... तो *काल* आया और जैसे ही *काल* आया ... तो *गिद्धराज* *जटायु* ने *मौत* को *ललकार* कहा, -- " *खबरदार* ! ऐ *मृत्यु* ! आगे बढ़ने की कोशिश मत करना... मैं *मृत्यु* को *स्वीकार* तो करूँगा... लेकिन तू मुझे तब तक नहीं *छू* सकता... जब तक मैं *सीता* जी की *सुधि* प्रभु " *श्रीराम* " को नहीं सुना देता...!  *मौत* उन्हें *छू* नहीं पा रही है... *काँप* रही है खड़ी हो कर...  *मौत* तब तक खड़ी रही, *काँपती* रही... यही इच्छा मृत्यु का वरदान *जटायु* को मिला। किन्तु *महाभारत* के *भीष्म* *पितामह* *छह* महीने तक बाणों की *शय्या* पर लेट करके *मौत* का *इंतजार* करते रहे... *आँखों* में *आँसू* हैं ... रो रहे हैं... *भगवान* मन ही मन मुस्कुरा रहे हैं...! कितना *अलौकिक* है यह दृश्य ... *रामायण* मे *जटायु* भगवान की *गोद* रूपी

लघुकथा - - नि:शब्द / श्याम सुंदर भाटिया

                                                                    नि:शब्द                                                  हिंदी के प्रो. राम नारायण त्रिपाठी को उनके सहपाठी और चेले पीठ पीछे प्रो.बक - बक त्रिपाठी कहते ... प्रो.त्रिपाठी के समृद्ध शब्दों के भंडार का कोई सानी नहीं था...लेकिन सवालों का पिटारा शब्द भंडार से भी संपन्न... कोरोना के चलते लाकडाउन तो बहाना था...बतियाने को किसी न किसी की रोज दरकार रहती... श्रीमती के इशारे पर तपाक से प्रो. त्रिपाठी मास्क लगाकर सब्जी खरीदने पहुंच गए...सोशल   डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए व्हाइट सर्किल में अनुशासित मुद्रा में खड़े होकर अपनी बारी का इंतज़ार करने लगे...नंबर आते ही बाबू ने सवाल दागा...क्या - क्या दे दें प्रोफेसर साहिब... सवाल पूर्ण होने से पहले ही धारा प्रवाह  बोलना शुरु कर दिया... गोभी क्या रेट है...खराब तो नहीं...नहीं साहिब...बाबू ने रिस्पॉन्ड  किया... प्रो. त्रिपाठी बोले,क्या गारंटी है...बताओ... टमाटर, आलू,प्याज, लौकी से लेकर बैंगन,धनिया, पोधीना होते हुए खरबूजे और तरबूज तक पहुंच गए... प्रो. आदतन दो ही सवाल करते ...क्या रेट...और