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ज्ञान का धंधा

ज्ञान को धंधा बना लें तो...   Posted by  अनिल रघुराज  at 21:06   Add comments May 02 2010 आप मानें या न मानें, हमारे पूरे हिंदी समाज में ज्ञान का डेफिसिट, ज्ञान का घाटा पैदा हो गया है। सरकार घाटे को उधार लेकर पूरा करती है। लेकिन ज्ञान का घाटा केवल उधार लेकर पूरा नहीं किया जा सकता। उधार के ज्ञान से प्रेरणा भर ली जा सकती है। उसका पुनर्सृजन तो अपने ही समाज और अपनी ही मिट्टी व भावभूमि से करना पड़ता है। हिंदी में लोगबाग कविताएं ठोंक कर लिखते हैं। लेकिन जहां गद्य लिखना होता है तो भाई लोगों के पांव कांपने लगते हैं। यहां से, वहां से उठाकर लिख मारते हैं। बड़े दिग्गज कहानीकार भी कहानियां तक चुराकर लिख मारते हैं। फिल्मी जगत में 99.99 फीसदी कहानियां कहीं न कहीं से ‘प्रेरित’ होती हैं। दिक्कत यह भी है कि हिंदी के बुद्धिजीवी के सामने जीवन-यापन की ऐसी कठिन-कठोर शर्तें पेश कर दी गई हैं कि उसे रचनाकर्म के लिए जरूरी फुरसत ही नहीं मिलती। उसे अपने पंख कुतर-कुतर कर देने होते हैं, तब जाकर उसका घर-परिवार चलता है। ऐसे में पहचान के संकट से निपटने और दुकानदारी चलाने के लिए वे जंग खा चुकी वाम या अतिवाम विचारधार

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