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राही मासूम रज़ा का साहित्य और बहुत कुछ

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              ( RAHI MASOOM RAZA ) Tuesday, December 28, 2010 यादों के दायरे राही मासूम रजा यादों के इस सफ़र में शामिल होने के लिए जब बात राही साहब से हुई तो उन्होंने कहा, मेरी झोली में भी कुछ लोग ऐसे हैं जिनसे मैं लोगों को मिलाना चाहता हू, क्योंकि उन लोगों को जानने से जि+न्दगी भरी-भरी दिखाई देने लगती है।'' आधा गांव', टोपी शुक्ला', हिम्मत जौनपुरी' ओस की बूंद', दिल एक सादा कागज' और सीनः ७५' के कविमन रचनाकार डॉ० राही मासूम रजा की कलम से उनकी व्यक्तिगत जिंदगी के उन्हीं भरे-भरे अरसों की खूबसूरत यादें। हर आदमी के पास लिखने के लिए एक जीवनी होती है, पर हर आदमी वह जीवनी लिख नहीं पाता... हर आदमी लिखना चाहता भी नहीं क्योंकि कुछ यादें इतनी निजी होती हैं कि उनमें किसी को शरीक करने को जी नहीं चाहता। मेरे पास ऐसी यादें ज्यादा हैं। इसलिए मैं कभी अपनी जीवनी नहीं लिखूंगा परंतु मेरी झोली में भी कुछ लोग ऐसे हैं जिनसे मैं लोगों को मिलाना चाहता हू क्योंकि उन लोगों को जानने से जिंदगी भरी-भरी दिखाई देने लगती है। मैं तो बंबई महानगर में जब अपने आप स