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दो लघुकथाएँ

 मेरी दो लघुकथाएं रोटी । मार्स स्टूडियो ने स्वरबद्ध की है। दोनों लघुकथाएं लॉकडाउन के दौरान मजदूर पलायन के समय व्याप्त माहौल पर लिखी गई थी। प्रस्तुत है।  कथा  एक।  : रात गहरा गई थी। सड़क पर चलते-चलते बहुत दिन हो गए थे। कुछ पक्का पता भी नहीं था। बस यही याद है कि चलते  समय रात को चांद इतना बड़ा नजर नहीं आता था। पर अब तो आसमान पर थाली सा, गोलाकार उदास चांद अटका हुआ था।  घर अभी दूर था। रास्ते समझ में भी नहीं आ रहे थे। बस सर्पीली सड़कें जिधर मुड़ती थी, वे मुड़ जाते थे। दिन में भी शहर और गाँव,  सोए-सोए लगते थे। पर एक सैलाब साथ था। उन्हीं की तरह आंशकित और सहमा हुआ, उसी से थोड़ी हिम्मत मिलती थी।                         वो अकेली नहीं थी। साथ में पति और छोटा बच्चा भी था। रात को चलते-चलते, सड़क के किनारे एक पेड़ से साईकिल टिकाकर वहीं जमीन पर लेट गए थे। साइकल के पीछे गृहस्थी का सामान बंधा हुआ था। खाने को आज कुछ नहीं था। पति को कुछ देर भूख लगी। पर फिर थकान ने भूख पर विजय पाई और वो सो गया। बच्चा, दिन भर साईकिल के डंडे पर बैठा रहता था। सो उतना नहीं थका था। उसे भूख लग रही थी। ‘माँ, भूख लग रही है। रोटी दे न।’  

जो हरि इच्छा

🌳🦚आज की कहानी🦚🌳/💐 हरि_इच्छा*💐💐 प्रस्तुति - कृष्णा  मेहता  एक बार भगवान विष्णु गरुड़जी पर सवार होकर कैलाश पर्वत पर जा रहे थे। रास्ते में गरुड़जी ने देखा कि एक ही दरवाजे पर दो बारातें ठहरी थीं। मामला उनके समझ में नहीं आया, फिर क्या था, पूछ बैठे प्रभु को।  गरुड़जी बोले ! प्रभु ये कैसी अनोखी बात है कि विवाह के लिए कन्या एक और दो बारातें आई हैं। मेरी तो समझ में कुछ नहीं आ रहा है, प्रभु बोले- हाँ एक ही कन्या से विवाह के लिए दो अलग-अलग जगह से बारातें आई हैं।  एक बारात पिता द्वारा पसन्द किये गये लड़के की है, और दूसरी माता द्वारा पसन्द किये गये लड़के की है। यह सुनकर गरुड़जी बोले- आखिर विवाह किसके साथ होगा ?  प्रभु बोले- जिसे माता ने पसन्द किया और बुलाया है उसी के साथ कन्या का विवाह होगा, क्योंकि कन्या का भाग्य किसी और के साथ जुड़ा हुआ है,,,, भगवान की बातें सुनकर गरुड़जी चुप हो गए और भगवान को बैकुंठ पर पहुँचाकर कौतुहल वश पुनः उसी जगह आ गए जहाँ दोनों बारातें ठहरी थीं।            गरुड़जी ने मन में विचार किया कि यदि मैं माता के बुलाए गए वर को यहाँ से हटा दूँ तो कैसे विवाह संभव होगा, फिर क्य

कुछ कविताएं

 उसने फैला ली ना सनसनी , /.विवेक रंजन श्रीवास्तव  उत्तेजना और उन्माद ! एक ही धर्मस्थल पर  हरे और भगवे झंडे  लहराकर !  पता नही इससे ,   मिले कुछ वोट या नही !   पर हाँ  आम आदमी की सुरक्षा और समाज में शांति व्यवस्था के नाम पर  हमारी मेहनत के करोड़ो रुपये  व्यर्थ बहाये हैं  , तुम्हारे इस जुनून के एवज में ! बंद रहे हैं स्कूल और कालेज  और नही मिल पाई उस दिन  गरीब को रोजी ,  क्योकि ठप्प थी प्रशासनिक व्यवस्था ! टीवी चैनल इस आपाधापी को  ब्रेकिंग न्यूज बनाकर , विज्ञापनो के जरिये  रुपयो में तब्दील कर रहे थे . मेरी अलमारी में रखी  कुरान , गीता और बाइबिल  पास पास यथावत साथ साथ शांति से रखी थीं .  सैनिको के बैरक में बने एक कमरे के धर्मस्थल में  विभिन्न धर्मो के प्रतीक भी , सुबह वैसे ही थे , जैसे रात में थे .   पर इस सबमें  सबसे बड़ा नुकसान हुआ मुझे  जब मैंने अपने किशोर बेटे  की फेसबुक पोस्ट देखी  जिसमें उसने  उलझे हुये नूडल्स को  धर्म निरूपित किया , और लिखा  कि उसकी समझ में धर्म ऐसा है , क्या फिर भी हमें   धार्मिक होना चाहिये ?  मैं अपने बेटे को धर्म की  व्याख्या समझा पाने में असमर्थ हूं ! तुमने धर्म

रॉन्ग नंबर/ चित्रगुप्त

 रॉन्ग नंबर / चित्रगुप्त  ********** ट्रेंग ट्रेंग..... अननोन नंबर देखकर थोड़ा सोचा फिर फोन उठा लिया।  "हेलो...." "इत्ती देर से फोन कर रही हूँ आखिर उठा काहे नहीं रहे थे? किसी नजारे को देखने में मगन थे क्या?" "अनजान नंबर से काल आ रही थी तो......"  बात पूरी होने से पहले ही काट दी गई-- "इसका मतलब मेरा नंबर भी सेव नहीं है क्या तुम्हारी मोबाइल में...? तुम्हें क्या तुम्हें तो अपनी सीता गीता रीता से फुरसत मिले तब न...जनाब के मोबाइल में दुनिया जहान का नंबर सेव रहता है बस बीवी का ही नंबर नहीं रहता.... तुम बाकी छोड़ो ये तो घर आओ फिर निपट लूँगी... सामान नोट करो वो लेकर आ जाना" मैडम  का जोश मिनट दर मिनट बढ़ता ही जा रहा था। "जी बोलिये..." "बड़ा जी जी कर रहे हैं आज फिर चढ़ा ली क्या..." इस बार तिलमिलाहट में दांत पीसने की आवाज भी सुनी जा सकती थी। "जी..." " रहोगे अपनी मां की तरह ढपोरशंख ही, जैसे वो दिन भर राम राम करती फिरती हैं लेकिन खटमल की तरह खून पीने का एक भी मौका नहीं छोड़ती...हुंह तुम सामान लिखो और लेकर घर आओ फिर बताती हूँ।"

संजीव शुक्ला का एक व्यंग्य

 अपना एक व्यंग्य निवाण टाइम्स में।/ संजीव शुक्ला  जुझारूलाल प्रवक्ता बनना चाह रहे थे। यह उनकी दिली तमन्ना थी, बल्कि उनका तो खुला मानना था कि क्षेत्र की जनता और पार्टी का बहुमत भी उनको प्रवक्ता के रूप में देखना चाहता है। इस पद के लिए वह अपने को सर्वथा उपयुक्त व्यक्ति मानते थे, पर उनका दुर्भाग्य देखिये कि पार्टी के शीर्ष गुट में उनके सब विरोधी जमे थे। क्या जीवन व्यर्थ ही जायेगा यह चिंता उन्हें दिन-रात खाए डाल रही थी। प्रवक्ताई का आकर्षण उन्हें तबसे अपने में दबोचे हुए है जबसे उन्होंने मीडिया वालों को प्रवक्ता से महज एक बाइट के लिए माइक और कैमरे के साथ गिरते-पड़ते दौड़ते देखा है। पत्रकारों-मीडियाकर्मियों का प्रवक्ता से साक्षात्कार हेतु घण्टों राह तकना और फ़िर अचानक उनके कार्यालय से प्रकट होने का अंदाज़ उन्हें घायल कर जाता!! यह पद उन्हें पार्टी के शीर्ष-नेतृत्व से भी ज़्यादा आकर्षित करता। कारण वह किसी पचड़े में .....…...  नेतृत्व की जिम्मेदारी सबको साथ लेकर के चलने की होती है। वह अपनी ऊर्जा सबको मनाकर साथ रखने में नहीं खर्च करना चाहते थे।  उनका स्पष्ट मानना था कि वह इसके लिए नहीं बने हैं। उनकी मे

सुरेश कांत की नजर में व्यंग्य

 दोस्तो, हास्य और व्यंग्य के संबंध में बहुत-से विचार आए। उनमें कुछ व्यवस्थित और मौलिक भी थे, जैसे जयप्रकाश पांडेय जी के विचार। मेरे भी इस संबंध में कुछ विचार हैं, जिनसे आपका सहमत होना बिलकुल भी आवश्यक नहीं है। मेरे लिए तो इतना ही काफी है कि फेसबुक पर आते ही मेरे विचारों को व्यंग्यकार विभिन्न मंचों पर अपने विचारों के रूप में प्रस्तुत करने लगते हैं। इससे मुझे अपने विचारों के सही होने की पुष्टि मिलती है।    बहरहाल, अपने विचार प्रस्तुत करने से पहले मैं उनकी पूर्वपीठिका या नींव के रूप में कुछ बिंदु प्रस्तुत करूँगा। 1. हास्य व्यंग्य का सहोदर है। ‘सहोदर’ का मतलब ‘भाई’ होता है, लेकिन सिर्फ ‘भाई’ नहीं होता, बल्कि एक ही माता के उदर को साझा करने वाला (सह+उदर) ‘सगा भाई’ होता है। इसीलिए दोनों में कुछ साम्य मिलते हैं, जिनसे भ्रमित होकर कुछ लोग दोनों को एक ही समझने तक की गलती कर बैठते हैं। आखिर, जुड़वाँ न होने पर भी भाइयों की शक्ल आपस में काफी मिलती-जुलती है। एक माँ की संतान जो ठहरे!    2. हास्य व्यंग्य का सगा भाई ही नहीं है, बल्कि उसका ‘अग्रज’ भी है, इसलिए वह व्यंग्य पर अकसर हावी होने, उस पर अपना

पहले मैं.....

 "पहले मैं ही जाऊंगी" सुनो, हर वक्त,  पहले तुम पहले तुम करते हो ना, जब जिंदगी साथ छोड़ेगी ना, तब भी पहले मैं ही जाऊंगी.... मुझे आदत नहीं बिल्कुल, तुम बिन रहने की... जिंदगी के सारे दर्द, अकेले सहने की.... सुनो, हर सांस  साथ निभाया है ना तुमने.. जब सांस टूटने लगे ना, तो पहले मैं ही जाऊंगी... जब जिंदगी साथ छोड़ेगी ना, तब भी पहले मैं ही जाऊंगी... सुनो, इस आंगन में,  तुम ही लेकर आए थे.. इस आंगन से, तुम ही लेकर जाना.... साथ निभाया तो, है अब तक तुमने... अंत तक तुम ही साथ निभाना... तेरे साथ ही,  इस आंगन में आई थी... तेरे साथ ही,  इस आंगन से जाऊंगी..... जब जिंदगी साथ छोड़ेगी ना, तब भी पहले मैं ही जाऊंगी... जिंदगी बाहों में ही गुजारी है तेरे, मौत भी बाहों में ही आएगी... पहली बार तुमने ही मांग भरी थी ना, अंतिम बार भी, तेरे हाथों से ही भरी जाएगी... सुनो, हर बात तुम्हारी मानी है, इसमें एक भी नहीं मानूंगी.... जब जिंदगी साथ छोड़ेगी ना, तब भी पहले मैं ही जाऊंगी....        रीना झा शर्मा ©®.

पहले सी बात नहीं / महाकवि अज्ञात

जाने क्यूँ,* *अब शर्म से,* *चेहरे गुलाब नहीं होते।* *जाने क्यूँ*, *अब मस्त मौला *मिजाज नहीं होते।* *पहले बता दिया करते थे*,  *दिल की बातें*, *जाने क्यूँ,अब चेहरे,* *खुली किताब नहीं होते।* *सुना है,बिन कहे,* *दिल की बात, समझ लेते थे* *गले लगते ही,* *दोस्त,* *हालात समझ लेते थे।* *तब ना फेस बुक था,* *ना स्मार्ट फ़ोन*, *ना ट्विटर अकाउंट,* *एक चिट्टी से ही,* *दिलों के जज्बात, समझ लेते थे।* *सोचता हूँ,* *हम कहाँ से कहाँ*  *आ गए,* *व्यावहारिकता सोचते सोचते,* *भावनाओं को खा गये।* *अब भाई भाई से*, *समस्या का *समाधान,कहाँ पूछता है,* *अब बेटा बाप से,* *उलझनों का निदान,* *कहाँ पूछता है* *बेटी नहीं पूछती,* *माँ से गृहस्थी के सलीके,* *अब कौन गुरु के*, *चरणों में बैठकर*, *ज्ञान की परिभाषा सीखता है।* *परियों की बातें,* *अब किसे भाती है,* *अपनों की याद*, *अब किसे रुलाती है,* *अब कौन,* *गरीब को सखा बताता है,* *अब कहाँ,* *कृष्ण सुदामा को गले लगाता है* *जिन्दगी में,* *हम केवल *व्यावहारिक हो गये हैं,* *मशीन बन गए हैं हम सब,*   *इंसान जाने कहाँ खो गये हैं!....*             🙏 😊😊😊