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बेचन मामा

 कहानी -बेचन मामा / सीमा. मधुरिमा  मुन्नी पॉँच साल की होगी ज़ब पहली बार अपने मामा के घर गयी या यूँ कहे उसे मामा के घर भेज दिया गया उसकी माँ द्वारा l ज़ब वो तीन साल की थी तभी उसे उसके दो और बड़े भाईयों  के साथ अपनी बड़ी अम्मा के यहाँ पढ़ने के उद्देश्य से भेज दिया गया था ....या कहा जा सकता है कि उसके माता पिता कि मजबूरी थी क्योंकि उसके पिता वन विभाग में नौकरी करते थे तो उनका सरकारी आवास भी लखीमपुर स्थिति खटीमा रेंज में सुरई नामक स्थान पर था जहाँ मुन्नी के अब दो जुड़वे भाई बहन भी हो गए थे जिससे मुन्नी की माँ का ध्यान मुन्नी पर कम ही हो पाता ऐसे में मुन्नी एक बार जंगल में खोते खोते बची l माँ बिलकुल ही डर गयीं और पिता ने मुन्नी के दोनों बड़े भाईयों सँग मुन्नी को अपने बड़े भाई भाभी के घर शहर में पढ़ने के उद्देश्य से भेज दिया l मुन्नी तीन साल में ही माँ से दूर हो गयी l बड़ी अम्मा के घर में कई और चचेरे भाई बहन थे l मुन्नी को भी एक स्कूल में दाखिला दे दिया गया l मुन्नी अक्सर माँ के प्रेम को तरस जाती l स्कूल जाती तो अक्सर अपने साथियों के टिफिन चुरा के खा जाती l मुन्नी शायद चोरी का मतलब तो उस उम्र में जानत

समय के साथ बदलाव

 एक रशियन यहूदी को इजरायल में बसने का परमिशन मिला मॉस्को हवाई अड्डे पर कस्टम अधिकारियों ने उसके थैले में लेनिन की मूर्ति देखी तो पूछ बैठा, 'ये क्या है ? उसने कहा, 'ये क्या है ?, कॉमरेड ये गलत सवाल है, आपको पूछना चाहिये था कि ये कौन है, ये कॉमरेड लेनिन हैं जिन्होंने सोशलिज्म की बुनियाद रखी और रूस के लोगो का भविष्य उज्ज्वल किया, मैं इसे अपने साथ, अपने "यादगार हीरो" की तरह ले जा रहा हूं  रशियन कस्टम अधिकारी थोड़ा शर्मिंदा हुये और आगे बगैर किसी जांच के उसे जाने दिया .... तेल अवीव एयरपोर्ट पर इजरायल के कस्टम अधिकारी ने पूछा, 'ये क्या है ?' उसने कहा, 'ये क्या है ? ये गलत सवाल है श्रीमान, आपको पूछना चाहिये था, ये कौन है ? ये लेनिन है, ऐसा हरामखोर दोगला का औलाद जिसने मुझे यहूदी होने के कारण,रूस छोड़ने पर मजबूर कर दिया। मैं अपने साथ उसकी मूर्ति इसलिये लाया ताकि रोज, जब भी इस चूतिये पर नजर पड़े, इसकी मां-बहन एक कर सकूं'' इजरायली कस्टम अधिकारी ने कहा, 'आपको मैंने कष्ट दिया उसके लिये माफी चाहता हूं, आप इसे अपने साथ ले जा सकते हैं' इजरायल में जब वो अपने नय

धूमिल नहीं हो सकती धूमिल की यादें / कबीर up

 यादों में धूमिल धूमिल का आज जन्म दिन है । उन्होंने निराला और मुक्तिबोध की तरह केवल अभिव्यक्ति के खतरे नही  उठाये , कविता को साहसिक बनाया । उन्होंने कविता में लोक मुहावरों और खाटी भाषा का उपयोग किया । आम आदमी की आवाज में कविताएं लिखी ।   धूमिल की कविता हिंदी कविता का प्रस्थान बिंदु है । उन्होंने हिंदी कविता के सौंदर्यबोध को बदलने की कोशिश की है । उनके बाद के कवियों ने उनकी कविता की खूब नकल की , और पकड़े भी गए । उन्होंने प्रजातन्त्र की विफलताओं और अंतर्विरोध को उजागर किया ।   उनकी कविता आज के समय में ज्यादा प्रासंगिक है ।  उनकी कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि वे अभी लिखी गयी है ।  उनकी बहुपठित कविता को ही देखिए -एक आदमी रोटी बेलता है /एक आदमी रोटी खाता है /एक तीसरा आदमी भी है / जो न रोटी बेलता है न रोटी खाता है / वह सिर्फ रोटी के साथ खेलता है /यह तीसरा आदमी कौन है?/ मेरे देश की संसद मौन है ।     यह आकस्मिक नही है कि उनके कविता संग्रह का नाम संसद से सड़क तक , है । उनकी कविताएं संसद में बैठे हुए विधाताओं को चुनौती देती है , उनसे प्रश्न पूछती हैं ।   धूमिल ने उस समय जिस तीसरे आदमी की बात कही

*ब्रह्मांड* / दिनेश श्रीवास्तव

 दिनेश-दोहावली /                *ब्रह्मांड* यहाँ सकल ब्रम्हांड का,निर्माता है कौन? तर्कशास्त्र ज्ञाता सभी, हो जाते हैं मौन।।-१ वेदशास्त्र गीता सभी,अलग-अलग सब ग्रंथ। परिभाषा ब्रह्मांड की,देते हैं सब पंथ।।-२ सकल समाहित है जहाँ,पृथ्वी,गगन समीर। वही यहाँ ब्रह्मांड है,बतलाते मति-धीर।।-३ परमब्रह्म को जानिए, निर्माता ब्रह्मांड। बतलाते हमको यही,पंडित परम प्रकांड।।-४ पंचभूत निर्मित यथा,काया सुघर शरीर। काया ही ब्रह्मांड है,जो समझे वह धीर ।।-५ पंचभूत विचलित जहाँ, पाता कष्ट शरीर। इसी भाँति ब्रह्मांड भी,पाता रहता पीर।।-६ ग्रह तारे गैलेक्सियाँ, सभी खगोली तत्त्व। अंतरिक्ष ब्रह्मांड का, होता परम महत्व।।-७ गूँजे जब ब्रह्मांड में,'ओम' शब्द का नाद। सभी चराचर जीव के,मिट जाते अवसाद।।-८ नष्ट न हो पर्यावरण,करें संवरण लोभ। होगा फिर ब्रह्मांड में,कभी नहीं विक्षोभ।।-९ देवत्रयी ब्रह्मांड के,ब्रह्मा,विष्णु महेश। ब्रह्मशक्ति की साधना,करता सदा 'दिनेश'।।-१०                  दिनेश श्रीवास्तव                  ग़ाज़ियाबाद

आज का दिन मंगलमय हो

 प्रस्तुति - कृष्ण  मेहता  🌞 ~ *आज का हिन्दू पंचांग* ~ 🌞 ⛅ *दिनांक 22 अक्टूबर 2020* ⛅ *दिन - गुरुवार* ⛅ *विक्रम संवत - 2077 (गुजरात - 2076)* ⛅ *शक संवत - 1942* ⛅ *अयन - दक्षिणायन* ⛅ *ऋतु - हेमंत* ⛅ *मास - अश्विन* ⛅ *पक्ष - शुक्ल*  ⛅ *तिथि - षष्ठी रात्रि 07:39 तक तत्पश्चात सप्तमी* ⛅ *नक्षत्र - पूर्वाषाढा 23 अक्टूबर रात्रि 01:00 तक तत्पश्चात उत्तराषाढा* ⛅ *योग - सुकर्मा 22 अक्टूबर रात्रि 02:37 तक तत्पश्चात धृति* ⛅ *राहुकाल - दोपहर 01:48 से शाम 03:14 तक*  ⛅ *सूर्योदय - 06:38*  ⛅ *सूर्यास्त - 18:07*  ⛅ *दिशाशूल - दक्षिण दिशा में* ⛅ *व्रत पर्व विवरण - सरस्वती पूजन, हेमंत ऋतु प्रारंभ*  💥 *विशेष - षष्ठी को नीम की पत्ती, फल या दातुन मुँह में डालने से नीच योनियों की प्राप्ति होती है।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)*                🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞 🌷 *दाँतों में से खून निकलता हो तो* 🌷 🍋 *नीबूं का रस मसूड़ों को रगड़ने से आराम होगा ।* 🙏🏻 *- पूज्य बापूजी Jodhpur 4th Sep, 2011*            🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞 🌷 *वास्तु शास्त्र* 🌷 🏡 *किचन में दवाईयां रखने की आदत वास्

अपनों का साथ

 *पिता की चारपाई* पिता जिद कर रहे थे कि उसकी चारपाई गैलरी में डाल दी जाये। बेटा परेशान था। बहू बड़बड़ा रही थी..... कोई बुजुर्गों को अलग कमरा नहीं देता, हमने दूसरी मंजिल पर ही सही एक कमरा तो दिया.... सब सुविधाएं हैं, नौकरानी भी दे रखी है। पता नहीं, सत्तर की उम्र में सठिया गए हैं? निकित ने सोचा पिता कमजोर और बीमार हैं.... जिद कर रहे हैं तो उनकी चारपाई गैलरी में डलवा ही देता हूँ। पिता की इच्छा पू्री करना उसका स्वभाव भी था। अब पिता की चारपाई गैलरी में आ गई थी। हर समय चारपाई पर पडे रहने वाले पिता अब टहलते टहलते गेट तक पहुंच जाते। कुछ देर लान में टहलते। लान में खेलते नाती - पोतों से बातें करते , हंसते , बोलते और मुस्कुराते। कभी-कभी बेटे से मनपसंद खाने की चीजें लाने की फरमाईश भी करते। खुद खाते , बहू - बेटे और बच्चों को भी खिलाते ....धीरे-धीरे उनका स्वास्थ्य अच्छा होने लगा था। दादा मेरी बाल फेंको... गेट में प्रवेश करते हुए निकित ने अपने पाँच वर्षीय बेटे की आवाज सुनी तो बेटे को डांटने लगा...  अंशुल बाबा बुजुर्ग हैं उन्हें ऐसे कामों के लिए मत बोला करो। पापा! दादा रोज हमारी बॉल उठाकर फेंकते हैं..

झारखण्ड के पलामू वाला काजर

 #ठेठ_पलामू:- #जड़ी-बूटी और #काजर ------------------------------------------------------- पिछला साल इहे दशहरा टाईम का बात है, भोरे-भोरे उठे तो आदत के अनुसार आँख मइसत उठ के ऐनक देखने गए कि खूबसूरती तनी-मानी बचल है अगुआ लोग के लिए कि सब साफ हो गया। तो अपन चेहरा देख के डेरा गए। पूरा आँख के नीचे करिया हो गया था। जब हाथ से छुए तो पता चला कि काजर लगा हुआ था। फिर याद आया कि #जा_सार_के दशहरा न स्टार्ट हो गया, तो वही माई लगा दी थी। रात में सुतला घरी कि रात के कोई डायन बिसाहिन के नज़र न लगे। अब बड़े हो गए थे, तो सोचे अब न तो बच्चा हैं न ही #सुनर हैं, तो नजर थोड़े लगेगा, पर बात का है न कि माई के लिए बेटा भले 2 लईका के बाप बन जाए, लेकिन उ बच्चा ही रहता है और दुनिया में सबसे सुंदर दिखता है। सो ज़ाहिर सी बात है, नजर से बचाना था तो काजर तो लगाना था। लईका में दशहरा के ठीक एक दिन पहिले बड़की फुआ के ड्यूटी रहता था। एगो थरिया में बालू आऊ करिया कपड़ा सुई डोरा लेके बैठ जाती थी और सब के लिए छोटा-छोटा चरखूँट आकार में कपड़ा के थैली बना-बना के ओकरा में बालू भर के सी देती थी। अब जे बड़हन लईका रहे उ बाँह पर बाँधे, न त

गीत

 *भारत का नया गीत* ×××××××××××××××× *आओ बच्चों तुम्हे दिखायें,  शैतानी शैतान की... ।* *नेताओं से बहुत दुखी है,  जनता हिन्दुस्तान की...।।* *बड़े-बड़े नेता शामिल हैं,   घोटालों की थाली में ।* *सूटकेश भर के चलते हैं,  अपने यहाँ दलाली में ।।* *देश-धर्म की नहीं है चिंता,  चिन्ता निज सन्तान की ।* *नेताओं से बहुत दुखी है,  जनता हिन्दुस्तान की...।।* *चोर-लुटेरे भी अब देखो,  सांसद और विधायक हैं।* *सुरा-सुन्दरी के प्रेमी ये,  सचमुच के खलनायक हैं ।।* *भिखमंगों में गिनती कर दी,  भारत देश महान की ।* *नेताओं से बहुत दुखी है,  जनता हिन्दुस्तान की...।।* *जनता के आवंटित धन को,  आधा मंत्री खाते हैं ।* *बाकी में अफसर ठेकेदार,  मिलकर मौज उड़ाते हैं ।।* *लूट खसोट मचा रखी है,  सरकारी अनुदान की ।* *नेताओं से बहुत दुखी है,  जनता हिन्दुस्तान की...।।* *थर्ड क्लास अफसर बन जाता,  फर्स्ट क्लास चपरासी है, *होशियार बच्चों के मन में,  छायी आज उदासी है।।* *गंवार सारे मंत्री बन गये,  मेधावी आज खलासी है।* *आओ बच्चों तुम्हें दिखायें,  शैतानी शैतान की...।।* *नेताओं से बहुत दुखी है,  जनता हिन्दुस्तान की. *please share in otha

गुड़ुप ! ( लघुकथा )/ सुभाष नीरव

 लेखनी लघुकथा मैरेथन 2020 ================ मित्रो, यू.के. निवासी हिन्दी साहित्यकार और 'लेखनी' पत्रिका की संपादिका शैल अग्रवाल जी  द्वारा प्रारंभ की गई 'लेखनी लघुकथा मैरेथन, 2020' के लिए कल उन्होंने मुझे नामित किया। मैं उनका आभारी हूँ। इसके तहत मुझे पाँच दिन तक प्रतिदिन अपनी एक लघुकथा पोस्ट करनी है और किसी एक लघुकथा लेखक को नामित करना है। आज मेरा पहला दिन है। मैं अपने कथाकार मित्र बलराम अग्रवाल को इस 'लेखनी लघुकथा मैरेथन 2020' के लिए नामित करता हूँ और अपनी एक लघुकथा आपसे साझा करता हूँ। -सुभाष नीरव 5 अक्तूबर 2020 लघुकथा गुड़ुप ! -------- सुभाष नीरव दिन ढलान पर है और वे दोनों झील के किनारे कुछ ऊँचाई पर बैठे हैं। लड़की ने छोटे-छोटे कंकर बीनकर बाईं हथेली पर रख लिए हैं और दाएं हाथ से एक एक कंकर उठाकर नीचे झील के पानी में फेंक रही है, रुक रुककर। सामने झील की ओर उसकी नजरें स्थिर हैं। लड़का उसकी बगल में बेहरकत खामोश बैठा है। "तो तुमने क्या फैसला लिया?" लड़की लड़के की ओर देखे बगैर पूछती है। "किस बारे में?" लड़का भी लड़की की तरफ देखे बिना गर्दन झुकाए पैर

आओ फिर लौट चले

 *थोड़ा हटके.…* *"यदि जीवन के 50 वर्ष पार कर लिए है तो अब लौटने की तैयारी प्रारंभ करें.... इससे पहले की देर हो जाये... इससे पहले की सब किया धरा निरर्थक हो जाये....."* ✍️ *लौटना क्यों है*❓ *लौटना कहाँ है*❓ *लौटना कैसे है*❓ इसे जानने, समझने एवं लौटने का निर्णय लेने के लिए आइये टॉलस्टाय की मशहूर कहानी आज आपके साथ साझा करता हूँ : *"लौटना कभी आसान नहीं होता"* एक आदमी राजा के पास गया कि वो बहुत गरीब था, उसके पास कुछ भी नहीं, उसे मदद चाहिए... राजा दयालु था.. उसने पूछा कि "क्या मदद चाहिए..?" आदमी ने कहा.."थोड़ा-सा भूखंड.." राजा ने कहा, “कल सुबह सूर्योदय के समय तुम यहां आना.. ज़मीन पर तुम दौड़ना जितनी दूर तक दौड़ पाओगे वो पूरा भूखंड तुम्हारा। परंतु ध्यान रहे,जहां से तुम दौड़ना शुरू करोगे, सूर्यास्त तक तुम्हें वहीं लौट आना होगा, अन्यथा कुछ नहीं मिलेगा...!"   आदमी खुश हो गया... सुबह हुई..  सूर्योदय के साथ आदमी दौड़ने लगा... आदमी दौड़ता रहा.. दौड़ता रहा.. सूरज सिर पर चढ़ आया था.. पर आदमी का दौड़ना नहीं रुका था.. वो हांफ रहा था, पर रुका नहीं था... थोड़ा औ

महाभारत के नौ सूत्र सार

महाभारतो इस तरह पढ़े   यदि "महाभारत" को पढ़ने का समय न हो तो भी इसके नौ सार- सूत्र हमारे जीवन में उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं:- कौरव  1.संतानों की गलत मांग और हठ पर समय रहते अंकुश नहीं लगाया गया, तो अंत में आप असहाय हो जायेंगे कर्ण  2.आप भले ही कितने बलवान हो लेकिन अधर्म के साथ हों, तो आपकी विद्या, अस्त्र-शस्त्र-शक्ति और वरदान सब निष्फल हो जायेगा अश्वत्थामा  3.संतानों को इतना महत्वाकांक्षी मत बना दो कि विद्या का दुरुपयोग कर स्वयंनाश कर सर्वनाश को आमंत्रित करे.  भीष्म पितामह  4.कभी किसी को ऐसा वचन मत दो  कि आपको अधर्मियों के आगे समर्पण करना पड़े.  दुर्योधन  5.संपत्ति, शक्ति व सत्ता का दुरुपयोग और दुराचारियों का साथ अंत में स्वयंनाश का दर्शन कराता है.  धृतराष्ट्र  6.अंध व्यक्ति- अर्थात मुद्रा, मदिरा, अज्ञान, मोह और काम ( मृदुला) अंध व्यक्ति के हाथ में सत्ता भी विनाश की ओर ले जाती है.  अर्जुन  7.यदि व्यक्ति के पास विद्या, विवेक से बंधी हो तो विजय अवश्य मिलती है.  शकुनि  8. हर कार्य में छल, कपट, व प्रपंच रच कर आप हमेशा सफल नहीं हो सकते  युधिष्ठिर  9.यदि आप नीति, धर्म, व कर्म का सफलता

लघुकथा के साहनी / सुभाष नीरव

लघुकथा संसार   कथाकार मित्र सुकेश साहनी मुझसे बेशक आयु में तीन वर्ष छोटे हों, पर लेखक के तौर पर मेरे अग्रज और वरिष्ठ हैं। मुझे साहनी जी की लघुकथाएं प्रारम्भ से प्रभावित करती रही हैं और मैं इनकी अनेक लघुकथाओं को लघुकथा के मानक के रूप में  लेता रहा हूं। लघुकथा में  बारीकी और उसकी गुणवत्ता को कैसे अपने रचनात्मक कौशल से रचा - बुना जा सकता है, यह मैंने सुकेश साहनी की लघुकथाओं से सीखने की कोशिश की। कुछ नाम और हैं जैसे रमेश बतरा,  भगीरथ, सूर्यकांत नागर, बलराम अग्रवाल जिनकी लघुकथाओं ने मुझे सीखने - समझने की भरपूर ज़मीन दी। सुकेश भाई की न केवल लघुकथाएं, बल्कि इनकी कहानियां भी मुझे उद्वेलित और प्रेरित करती रही हैं। इनके भीतर का कथाकार ' कहानी ' और ' लघुकथा ' दोनों को साधने में सिद्धहस्त है। यही कारण है कि सुकेश मुझसे उम्र में छोटे होने के बावजूद मुझसे बड़े हैं। इनकी विनम्रता का तो मैं कायल हूं। बहुत से लघुकथा सम्मेलनों में मिलने और एक साथ मंच साझा करने का मुझे अवसर मिला है।  इनकी नई आलोचना पुस्तक "लघुकथा : सृजन और रचना - कौशल" कल मुझे डाक में मिली।     इसमें लघुकथाओं, ल

🙏 दाता की दया है 🙏

  *हे मेरे मालिक मैं तेरे चरणों का आशिक़ ‌हो गया हूं ।*  *इस  संसार के हालातों से तेरे सत्संग का दास हो गया हूं।।*  सुन रहा हूं सत्संग आपकी दया व मेहर से । उठा रहा हूं रुहानी लाभ इन बंदिशों में भी।। अविष्कारों  का उपयोग करना तो अब सीख रहा हूं । मगर तेरे दर्शन के वियोग में सब बेरंग महसूस  किये जा रहा हूं ।। हे मेरे दाता अब और सहा नही  जाता । तेरे दर्शन के बिना मेरा मन बार बार बेचैनी से भर जाता ।। मिल रही है भरपूर दया ई सत्संग शब्द सुनने की । मगर पूरी नहीं होती हसरत तुझसे मिलने की ।। मुझे अपने चरणों में लगा लें दाता । मैं तेरा दास हूं मुझे बुला ले दाता ।। दाता तेरे दर्शन को मैं तरस गया हूं । मैं सत्संग रोज सुनकर अपने आप को रोक रहा हूं ।। दिल करता है कि तेरे दर पे दौड़ आऊं, सब बंधन तोड़कर । मगर तेरे आदेशों का पालन कर अपने आप को रोक रहा हूँ ।। *हे मेरे मालिक मैं तेरे चरणों का आशिक़ ‌हो गया हूं।* *इस संसार के हालात से तेरे सत्संग का दास हो गया हूं।।* प्राथना कुल मालिक के चरणों में (SANT ADHAR BARODA BRANCH) *दाता जी की दया है* दाता जी की दया है कि हम सब बेख़ौफ़ जुड़े हैं  सत्संग  सुनने को मि

प्रेम उपदेश

 प्रेम उपदेश:-(परम गुरु हुज़ूर महाराज) 19. जिस किसी सच्चे प्रेमी का यह हाल है कि जब किसी की भक्ति की बढ़ती का हाल सुनता है, तब ही अपनी ओछी हालत से मिला कर सुस्त और फ़िक्रमंद हो जाता है, सो यह बहुत अच्छा है और यह निशान दया का है। इसी तरह इस जीव को ख़बर पड़ती है और अपनी हालतों को देखता है और अपने मत को चित्त से सुनता है और विचारता है। ग़रज़ कि इसमें सब तरह की गढ़त है, इसको दया समझो। 20. जो वक्त़ ध्यान और भजन के बजाय स्वरूप सतगुरु के कुटुम्बी और मित्रों की सूरतें नज़र आवें, उसका सबब यह है कि वह स्वरूप अभी हिरदे में धरे हैं, आहिस्ता आहिस्ता निकल जावेंगे। हुज़ूर राधास्वामी दयाल अपनी दया से सब तरह सफ़ाई करते हैं। 21. हुज़ूर राधास्वामी दयाल सब तरह से जीवों पर दया कर रहे हैं। और दया के भी अनेक रूप हैं, जैसे उदासी तबीयत की भी एक तरह की दया है। हर एक को यह उदासीनता नहीं मिलती। इसमें भी कुछ भेद है। ऐसा नहीं होता कि हर वक्त़ तबीयत सुस्त रहे, पर किसी क़दर सुस्ती और उदासीनता रहने से बड़े फ़ायदे हैं।       22. हुज़ूर राधास्वामी दयाल आप सबको अंतर में सँभालते हैं, पर एक सतसंगी दूसरे सतसंगी का हाल देख कर जो अपनी समझ के

आजकल में नवल की आलोचना

 रेणु  की यादों में नवल  नंदकिशोर नवल अगर हमारे बीच होते तो आज हम उनका 83 वां जन्मदिन मना रहे होते। बीती लगभग आधी सदी तक हिंदी साहित्य, खासकर कविता आलोचना के वे न केवल साक्षी रहे बल्कि उसके सक्रिय मार्ग-निर्धारक भी बने रहे। उन्होंने अपने आलोचकीय लेखन की शुरुआत छायावाद और उत्तर छायावाद से की। इसके बाद राजकमल चौधरी के प्रभाव में अकविता तथा अन्य प्रयोगवादी  कविता धाराओं के  वे प्रशंसक रहे और उनपर धाराप्रवाह लिखा।  राजकमल चौधरी की लंबी कविता 'मुक्ति प्रसंग' की उनकी व्याख्या कविता आलोचना के क्षेत्र में महत्वपूर्ण है। इसके जरिये वे 'मुक्ति प्रसंग' को 'अंधेरे में' के बाद हिंदी कविता की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में स्थापित करते हैं।      आगे चलकर नवलजी नक्सलवाद से भी प्रभावित हुए और उसके प्रभाव में आकर लिखी गई रचनाओं की व्याख्या और मीमांसा की। फिर वे मार्क्सवाद की ओर प्रवृत्त हुए और प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़कर प्रगतिशील और मार्क्सवादी  चिंतन से जुड़ी आलोचना की। इस दौरान प्रगतिशील चेतना वाले कवि मुक्तिबोध, नागार्जुन, त्रिलोचन, शमशेर आदि उनके प्रिय रचनाकार बने रहे।

ज्ञान प्रकाश विवेक की ग़ज़लें

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ज्ञान  प्रकाश  विवेक की ग़ज़लें   Tuesday, September 15, 2009 ज्ञान प्रकाश विवेक की ग़ज़लें और परिचय 30 जनवरी 1949 को हरियाणा मे जन्में  ज्ञान प्रकाश विवेक  चर्चित ग़ज़लकार हैं । इनके प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह हैं " प्यास की ख़ुश्बू "," धूप के हस्ताक्षर " और " दीवार से झाँकती रोशनी ", " गुफ़्तगू आवाम से " और " आँखों मे आसमान "। ये ग़ज़लें जो आपके लिए हाज़िर कर रहे हैं ये उन्होंने द्विज जी को भेजीं थीं । एक उदासी, दर्द, हैरानी इधर भी है उधर भी है अभी तक बाढ़ का पानी इधर भी है उधर भी है वहाँ हैं त्याग की बातें, इधर हैं मोक्ष के चर्चे ये दुनिया धन की दीवानी इधर भी है उधर भी है क़बीले भी कहाँ ख़ामोश रहते थे जो अब होंगे लड़ाई एक बेमानी इधर भी है उधर भी है समय है अलविदा का और दोनों हो गए गुमसुम ज़रा-सा आँख में पानी इधर भी है उधर भी है हुईं आबाद गलियाँ, हट गया कर्फ़्यू, मिली राहत मगर कुछ-कुछ पशेमानी इधर भी है उधर भी है हमारे और उनके बीच यूँ तो सब अलग-सा है मगर इक रात की रानी इधर भी है उधर भी है (बहरे-हज़ज मसम्मन सालिम) मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ

कुछ कविताएं

  कुछ कविताएं   अवसाद / डिप्रेशन  आज हावी है हर किसी पर  किसी न किसी रूप में ---- इसने नहीं छोड़ा बच्चों को भी  और न ही घर के बुजुर्गो को --- कारण साफ़ है --- आधुनिकता की भाग दौड़  जिसने पीछे छोड़ दिया है  हर रिश्ते को --- जिसने किया है कुठाराघात --- हर किसी के कोमल मन पर  आज कोमलता खत्म हो गयी मन की -- सभी बेबस हैँ ---. पर आज भी अवसाद को बीमारी की तरह  नहीं लेते लोग . . नहीं करते आंकलन  नहीं करते और नहीं करवाते किसी प्रकार का चिकित्सीय विमर्श --- जिसके कारण --- आज हरपल खतरा मंडरा रहा है  हर रिश्ते में  एक अज़ीब सा डर बैठ गया है  जाने कब और कैसे कौन सा रिश्ता  कर देगा तार तार संबंधों को !!! #सीमा [8/31, 14:46] +91 97600 07588: 9760007588              सुरेंद्र सिंघल                      सुनो              1 गुजरती रहेगी  मेरे और तुम्हारे  बीच में से  जब तक हवा  खिलते ही रहेंगे  रंग बिरंगे फूल  अपनी अपनी खुशबू  बिखेरते हुए  मुझ में  तुम में  और हमारे चारों ओर  सुनो  इस तरह मत जकड़ो  अपनी बाहों में मुझे               2 ऐसा भी क्या  गुजर जाएं  मेरे और तुम्हारे  बीच में से  हवा के साथ साथ  जहर भर

खतरनाक समय से जिरह करती कविताएँ-/ रंजीता सिंह फलक

 खतरनाक समय से जिरह करती कविताएँ---- ********************* हम विडम्बनाओं से भरे खतरनाक समय से गुजर रहें हैं,यह समय बगीचे से फूल तोड़कर माला बनाने का नहीं है,न ही किसी सुंदर चित्र में कृत्रिम रंग भरने का समय है,यह समय है,समझने और समझाने का,  "रंजिता सिंह फ़लक" की कविताएं इसी खतरनाक समय से मनुष्य को बचाने की कोशिश करती हैं,इनकी यह कोशिश है कि विडम्बनाओं से भरे समय को लोग समझे औऱ अपने हक के लिए लड़ने के लिए जागरूक हों,अपने आसपास के लोगों को सतर्क औऱ सचेत करे. कविता हर मनुष्य के भीतर रहती है और उसकी अनुभूतियों को भीतर ही भीतर बहाती रहती है जो इस बहती धारा को शब्दों में बांधकर कागज में उतार देता है वह कवि कहलाने लगता है. "रंजिता सिंह" अपने भीतर बहती अनुभूतियों को आंदोलन की तरह लेती हैं और इसे प्रभावी तरह से शब्दों के माध्यम से व्यक्त करती हैं,वह चाहती हैं कि हर मनुष्य इस खतरनाक समय से बहस करे, अपनी आवाज उठाये औऱ एक संवेदनशील समाज का निर्माण करें,औऱ अपने भीतर बह रही अनुभूतियों को रचनात्मक साहस के साथ व्यक्त करे,क्योंकि कविता में इसे सरलता से व्यक्त किया जा सकता है.  "रं

Kavita Raizaada

 एक चूहा घर में बिल बना कर रहता था। एक दिन चूहे ने देखा कि उस घर में उसकी पत्नी एक थैले से कुछ निकाल रहे हैं। चूहे ने सोचा कि शायद कुछ खाने का सामान है। उत्सुकतावश देखने पर उसने पाया कि वो एक चूहेदानी थी। ख़तरा भाँपने पर उस ने पिछवाड़े में जा कर कबूतर को यह बात बताई कि घर में चूहेदानी आ गयी है। कबूतर ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि मुझे क्या? मुझे कौनसा उस में फँसना है? निराश चूहा ये बात मुर्गे को बताने गया। मुर्गे ने खिल्ली उड़ाते हुए कहा : जा भाई, ये मेरी समस्या नहीं है। हताश चूहे ने बाड़े में जा कर बकरे को ये बात बताई… और बकरा हँसते हँसते लोटपोट होने लगा। उसी रात चूहेदानी में खटाक की आवाज़ हुई, जिस में एक ज़हरीला साँप फँस गया था। अँधेरे में उसकी पूँछ को चूहा समझ कर उस कसाई की पत्नी ने उसे निकाला और साँप ने उसे डस लिया। तबीयत बिगड़ने पर उस व्यक्ति ने हकीम को बुलवाया। हकीम ने उसे कबूतर का सूप पिलाने की सलाह दी। कबूतर अब पतीले में उबल रहा था। खबर सुनकर उस कसाई के कई रिश्तेदार मिलने आ पहुँचे जिनके भोजन प्रबंध हेतु अगले दिन उसी मुर्गे को काटा गया। कुछ दिनों बाद उस कसाई की पत्नी सही हो गयी, तो

ऊर्जा का अर्थ / रंजन कुमार सिंह

 ऊर्जा / रंजन कुमार सिंह  ऊर्जा का निर्माण या विनाश नहीं हो सकता, आइंस्टीन ने कहा था, और कृष्ण ने कहा, मैं ही क्यों, तुम और ये तमाम राजा-महाराजा अब से पहले भी थे और अब के बाद में भी होंगे। आत्मचिन्तन की सातवीं कड़ी आपके ध्यानार्थ  https://youtu.be/94nRyBcPD_A

मुक्ति की कामना / रंजन कुमार सिंह

   रंजन कुमार सिंह  मुक्ति की कामना किसे न होगी। आदि शंकराचार्य ने कहा है कि जब हम रस्सी को साँप समझ लेते हैं तो उससे डर जाते हैं। जी  हां, हमारा डर रस्सी को साँप मान लेने में है। साँप है नहीं, पर हम रस्सी में साँप देख लेते हैं और उससे डर जाते हैं। शंकराचार्य जी कहते हैं, रस्सी में साँप का विभ्रम ही माया है। और इस सत्य की पड़ताल कर के ही हम स्वयं को माया से मुक्त कर सकते हैं। यानी जब हमें रस्सी की सच्चाई का पता चलता है तो हमारा डर आप से आप चला जाता है और हम डर से मुक्त हो जाते हैं। आतम्चिन्तन की आठवीं कड़ी में लेखक एवं चिन्तक रंजन कुमार सिंह कहते हैं, लोगों को डराकर रखना बेहद आसान है और उनमें विश्वास भरना उतना ही मुश्किल। आज के संदर्भ में बात करें तो सभी धर्म हमें डराकर ही मंदिर, मस्जिद या गिरजाघर तक पहुंचाने की कोशिशों में लगे हैं। जबकि धर्म तो वह है जो हममें विश्वास जगाकर हमें ईश्वर तक पहुंचाए। डर कर रहने से क्या डर से मुक्ति संभव है? https://youtu.be/TJEDJ7Cbx_Q

कुण्डलिया /दिनेश श्रीवास्तव

 कृष्ण कन्हैया  / दिनेश श्रीवास्तव: (कुण्डलिया)                     *कृष्ण-कन्हैया*                         (१) कृष्ण-कन्हैया प्रगट हों,पुनः हमारे धाम। विपदा यहाँ अपार है,संकट यहाँ तमाम।। संकट यहाँ तमाम,बचा लो धरती प्यारे। तुम्हीं हमारे देव,आज हे!नंददुलारे।। धरती के सब लोग,पुकारें दैया-दैया। हमे बचा लो श्याम!,हमारे कृष्ण-कन्हैया।।                      (२) आया ऐसा शुभ दिवस, टूटा कारागार। भाद्र माह की अष्टमी,लिए कृष्ण अवतार। लिए कृष्ण अवतार,चतुर्दिक बजी बधाई। देवों ने भी देख,पुष्प वर्षा बरसाई।। वासुदेव ने लाल,यशोदा अंक बिठाया। अद्भुत यह सौभाग्य,नंद के द्वारे आया।।                       (३) होते हैं संसार मे,जब जब पापाचार। तभी यहाँ इस अवनि पर,प्रभु लेते अवतार।। प्रभु लेते अवतार,दुष्ट मर्दन हैं करते। भक्त जनों के कष्ट, सदा प्रभुवर हैं हरते।। कहता सत्य दिनेश,अधर्मी निश्चित रोते। राम कृष्ण के रूप,अवतरित जब प्रभु होते।।                       दिनेश श्रीवास्तव                       ग़ाज़ियाबाद [8/11, 17:23] DS दिनेश श्रीवास्तव: गीत           *कृष्ण लिए अवतार*           चमत्कार ऐसा हुआ,          

जारुहार (जारूआर ) खासघर कथा

जारुहार (जारुआर) खासघर कुल वाले कृपया ध्यान दे, आपके खासघर से इंगित होने वाला मूल गांव "जारु" वर्तमान जहानाबाद जिला अन्तर्गत हुलासगंज ब्लॉक के अन्दर, फल्गु नदी से पूरब में स्थित है। यह गांव, अम्बा-कुटुम्बा और प्राचीन राजगीर को जोडने वाली सीधी सरल रेखा के समीप है, फल्गु नदी के पूर्वी तट के समीप है और गया जिला तथा जहानाबाद जिला की सीमा के निकट है। जारु गांव के आसपास कुछ ऐतिहासिक महत्व के स्थल हैं। इनमें से, सबसे महत्वपूर्ण स्थल है बराबर पहाडियों की गुफाएं जो सम्राट अशोक से भी जुडा हुआ है। ये गुफाएं, जारु से पश्चिम दिशा में समीप है। जारु गांव के समीप एक दूसरा गांव दप्थु (Dapthu) है जो दफ्तुआर खासघर वालों का मूलगांव है। दप्थु अपने ब्लॉक मुख्यालय हुलासगंज से 03 मील की दूरी पर है। दप्थु में  finely carved images और सनातन धर्म मंदिर के अवशेष भी हैं। इस दप्थु गांव के समीप "लाठ" गांव भी है। लाठ के दक्षिण में, खुले मैदान में जो कभी बडा जलाशय  रहा होगा, एक ग्रेनाइट पत्थर का लाठ है जो आधा जमीन में गडा हुआ है। A large monolith granite piller 53 feet 03 inch long having an averag

प्रेमचंद की लुप्त कहानिया

प्रेमचन्द की दुष्प्राप्य किंतु विवादित और बहुचर्चित हिन्दी कहानी है ‘सम्पादक मोटेराम जी शास्त्री’ जो ‘प्रहसन’ शीर्षक से ‘माधुरी’ के अगस्त-सितम्बर, १९२८ के अंक में दूसरी बार फिर छपी थी। यह एक हास्य-प्रधान कहानी थी, किंतु इसके प्रकाशन ने साहित्य-जगत में एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था और मामला न्यायालय तक जा पहुँचा। बीसवीं सदी के सर्वश्रेष्ठ हिन्दी कथाकार प्रेमचन्द की मृत्यु के पैंसठ वर्ष बाद भी अभी तक उनके समग्र कथा-साहित्य का सही आकल्पन नहीं हो पाया है। यह कार्य जटिल है और इस दिशा में गहन खोजबीन और प्रयास की आवश्यकता है। इसका मुख्य कारण यह है कि प्रेमचन्द द्विभाषी कथाकार थे, हिन्दी और उर्दू दोनों ही भाषाओं में मौलिक लेखन करते थे। कभी पहले हिन्दी में तो कभी उर्दू में कहानियाँ लिखते थे। मूलत: हिन्दी में लिखी गई कहानी का उर्दू रूपांतरण वह बाद में सुविधानुसार करते थे, किंतु यह विशुद्ध अनुवादन होकर मौलिक रचना होती थी। इसी प्रकार पहले उर्दू में लिखी गई कहानी को बाद में स्वतंत्र हिन्दी रूप प्रदान करते थे। कभी-कभी समयाभाव के कारण एक भाषा से दूसरी भाषा में रूपांतरण की प्रक्रिया में कुछ अंतराल

माया महामाया नारी

नारी मात्र महामाया का स्वरुप है। यही उद्भव है,विकास है,संहार भी है। नारी के बिना नर का अस्तित्व ही क्या है ? शिवा रहित शिव शव हैं—यह केवल शिव के लिए ही नहीं कहा गया है।नारी नव दलकमला है जबकि पुरुष अष्ठ दल कमल युक्त है।पुरुष नारी संभव है नारी पुरुष संभव नहीं है अब हम उसके समर्पण-भाव की बात करते हैं। सच पूछा जाय तो एक स्त्री जितना सहज समर्पति हो सकती है,पुरुष कदापि नहीं। पुरुष के अहं के विसर्जन में बहुत समय लगता है,जब कि स्त्रियां मौलिक रुप से समर्पित होती है। यही कारण है कि स्त्रियों के लिए शास्त्र के बहुत से नियम ढीले हैं। उन्हें न उपवीती होने की आवश्यकता है और न गायत्री दीक्षा की । वे तो साक्षात महामाया की परम चैतन्य-जाग्रत विभूति हैं, फिर वाह्याडम्बर क्यों ! पवित्री धारण भी उनके लिए नहीं है। जवकि पुरुष की क्रिया उपवीत,गायत्री और पवित्री के वगैर अधूरा है। वह विविध मन्त्रों के बन्धन में बन्धा हुआ है। पुरुष के लिए बात-बात में नियम-आचार-विचार है और वाध्यता भी है। पुरुष के लिए मुण्डन अनिवार्य है- मरणाशौच में और जननाशौच में भी। अन्यान्य लौकिक-पारलौकिक क्रियाकलापों में भी मुण्डन को अत्य