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प्रेमचंद की लुप्त कहानिया

प्रेमचन्द की दुष्प्राप्य किंतु विवादित और बहुचर्चित हिन्दी कहानी है ‘सम्पादक मोटेराम जी शास्त्री’ जो ‘प्रहसन’ शीर्षक से ‘माधुरी’ के अगस्त-सितम्बर, १९२८ के अंक में दूसरी बार फिर छपी थी। यह एक हास्य-प्रधान कहानी थी, किंतु इसके प्रकाशन ने साहित्य-जगत में एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था और मामला न्यायालय तक जा पहुँचा। बीसवीं सदी के सर्वश्रेष्ठ हिन्दी कथाकार प्रेमचन्द की मृत्यु के पैंसठ वर्ष बाद भी अभी तक उनके समग्र कथा-साहित्य का सही आकल्पन नहीं हो पाया है। यह कार्य जटिल है और इस दिशा में गहन खोजबीन और प्रयास की आवश्यकता है। इसका मुख्य कारण यह है कि प्रेमचन्द द्विभाषी कथाकार थे, हिन्दी और उर्दू दोनों ही भाषाओं में मौलिक लेखन करते थे। कभी पहले हिन्दी में तो कभी उर्दू में कहानियाँ लिखते थे। मूलत: हिन्दी में लिखी गई कहानी का उर्दू रूपांतरण वह बाद में सुविधानुसार करते थे, किंतु यह विशुद्ध अनुवादन होकर मौलिक रचना होती थी। इसी प्रकार पहले उर्दू में लिखी गई कहानी को बाद में स्वतंत्र हिन्दी रूप प्रदान करते थे। कभी-कभी समयाभाव के कारण एक भाषा से दूसरी भाषा में रूपांतरण की प्रक्रिया में कुछ अंतराल

माया महामाया नारी

नारी मात्र महामाया का स्वरुप है। यही उद्भव है,विकास है,संहार भी है। नारी के बिना नर का अस्तित्व ही क्या है ? शिवा रहित शिव शव हैं—यह केवल शिव के लिए ही नहीं कहा गया है।नारी नव दलकमला है जबकि पुरुष अष्ठ दल कमल युक्त है।पुरुष नारी संभव है नारी पुरुष संभव नहीं है अब हम उसके समर्पण-भाव की बात करते हैं। सच पूछा जाय तो एक स्त्री जितना सहज समर्पति हो सकती है,पुरुष कदापि नहीं। पुरुष के अहं के विसर्जन में बहुत समय लगता है,जब कि स्त्रियां मौलिक रुप से समर्पित होती है। यही कारण है कि स्त्रियों के लिए शास्त्र के बहुत से नियम ढीले हैं। उन्हें न उपवीती होने की आवश्यकता है और न गायत्री दीक्षा की । वे तो साक्षात महामाया की परम चैतन्य-जाग्रत विभूति हैं, फिर वाह्याडम्बर क्यों ! पवित्री धारण भी उनके लिए नहीं है। जवकि पुरुष की क्रिया उपवीत,गायत्री और पवित्री के वगैर अधूरा है। वह विविध मन्त्रों के बन्धन में बन्धा हुआ है। पुरुष के लिए बात-बात में नियम-आचार-विचार है और वाध्यता भी है। पुरुष के लिए मुण्डन अनिवार्य है- मरणाशौच में और जननाशौच में भी। अन्यान्य लौकिक-पारलौकिक क्रियाकलापों में भी मुण्डन को अत्य

प्रेमचंद विशेष

बर्थडे स्पेशल: नाम बदलकर रखा 'प्रेमचंद' यूं तो प्रेमचंद की हर रचना बहुमूल्य है जो अपने समय की सच्चाई को बयां करती हैं और उनकी ख़ासियत है कि वे आज भी प्रासंगिक हैं। प्रेमचंद की कहानी ईदगाह आपने भी शायद ज़रूर पढ़ी होगी। हामिद को मेला घूमने के लिए उसकी दादी अमीना ने तीन पैसे दिए। मेले में किस्म-किस्म की मिठाईयां, झूले और तोहफ़े बिक रहे थे। जहां दूसरे बच्चों ने मेले से अपने लिए खिलौने, भिश्ती और मिठाइयां ख़रीदी, वहीं चार या पांच साल के हामिद ने दादी के लिए चिमटा खरीदा। 6 पैसे के चिमटे को मोलभाव कर 3 पैसे में ख़रीद लेता है। क्योंकि रोटियां सेकते समय दादी का हाथ तवे से जल जाता था और पैसों की कमी की वजह से दादी चिमटा नहीं ख़रीद पा रही थी। हामिद ने अपने बचपन की ख़्वाहिशों को भुलाकर अपनी उम्र से बड़ा हो गया। गरीबी कैसे इंसान को उम्र से पहले बड़ा बना देती है, इस मनोविज्ञान को ईदगाह की कहानी खोल कर रख देती है। प्रेमचंद को हिंदी और उर्दू के महानतम लेखकों में शुमार किया जाता है। प्रेमचंद की रचनाओं को देखकर बंगाल के विख्यात उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने उन्हें 'उपन्यास सम्राट

दयानंद पाण्डेय /अपने अपने युद्ध का सारांश

खिन्न था वह महेंद्र मधुकर के सम्मान समारोह में जाते हुए। मधुकर जो सिरे से फ्राड था। संजय ने महेंद्र मधुकर को पहली बार अपने शहर के एक रेस्टोरेंट में देखा था। तब वह पढता था, तभी एक लड़की से प्यार में मुब्तिला उसे कविता से भी मुहब्बत हो गई थी। वह कविताएं तो लिखने ही लगा था, बातचीत भी वह कविताओं, शेर और मुक्तकों में करता था। कविताओं का जुनून सा सवार था उस पर उन दिनों। वह इमर्जेंसी के दिन थे। इमर्जेंसी के दिनों में आलम यह था कि कवि अपनी घुटन और हताशा साफ-साफ बयान करने के बजाय प्रेम कविताओं की शरण लेते थे। इमर्जेंसी की ज्यादतियों को बिंबों में बांधकर वह प्रेमिका की ज्यादतियों ढालते और प्रतीकात्मक विरोध दर्ज करते। यह जैसे उन दिनों की कविताओं की परंपरा हो गई थी। कवि, प्रेमिका की आंखों में प्यार, उपेक्षा, उदासी, खुशी देखने के बजाय उसकी आखों के अंगार, अहंकार और फट पड़ने वाला आसमान देखते और आह भरते हुए उसे ऐसे दुत्कारते जैसे व्यवस्था को, इमर्जेंसी को ललकार रहे हो। पर सब कुछ बिंबों, प्रतीकों में। साफ-साफ कुछ भी नहीं। उन दिनों विशुद्ध प्रेम कविताएं लिखने वालों की भी इस चक्कर में दुर्गति हो जाती।

सावन में ज़ब याद आये / सुधेन्दु ओझा

यूँ ही........(सावन में जब याद तुम्हारी आई) &&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&& यूँ ही....सावन में जब याद तुम्हारी आई बेताबी थी तुम आओगी बढ़ती गई परछाईं तुम नहीं आई । एक सुगंध जो पहचानी थी मिलने हम से आई तुम नहीं आई । आम्र पत्तियां द्वारे लटकीं वन्दनवार पर आंखें अटकीं अभिनन्दन की ऋचा भी गाई तुम नहीं आई । विस्मृतियों के पृष्ठों पर बिखरी छवि सामने फिर से उतरी मन प्रांतर में झंकृत हो गई मीठी सी शहनाई तुम नहीं आई । तुलसी हँसी नीम हर्षाया प्रथम प्रहर कागा चिल्लाया दांयीं पलक लेती रह गई बार-बार अंगड़ाई तुम नहीं आई । पाहुन घर आएगा अपने आंखों में उतरे सब सपने मरी पड़ी आशाओं में चेतनता लहराई तुम नहीं आई । विश्वास नहीं कि छल जाओगी बोला था कि कल आओगी बुरा समय आया तुम नहीं पड़ीं दिखलाई तुम नहीं आई!!!! सुधेन्दु ओझा 9868108713/7701960982

सपने / डॉ. प्रियंका सोनी प्रीत

🌹 नाबालिग सपने🌹 अंगों के थिरकन की भाषा ये मौन है, अधरों के कंपन को समझे वो कौन है। डरती हूं इस धड़कन की धड़क से, प्रेम हुआ मुझको ये समझेगा कौन है। बचपन की देहरी पर आ गई जवानी है अल्हड़ नदी से मुझमें आई रवानी है। बह जाऊं संग तेरे मन यही चाहे रे, यौवन का पंछी अब करता किल्लोल है। अधरों के कंपन को समझे वो कौन है। सांसों की कोयलियां प्रीत गीत गाए रे, सोंधी- बयार मुझे हर पल महकाए रे। बाहों में तेरी बिन पंख उड़े जाती हूं, सतरंगी सपने सजे मेरे रोम रोम है। अधरों के कंपन को समझे वो कौन है। भंवरों की गुनगुन अब रस घोले कान में, मस्ती में झूंमू जब मिल के आऊं जान से। कैसे खोल दूं मैं दिल के गहरे सारे भेद रे, मीठे लगे आलिंगन बाकी सब गौड़ है। अधरों के कंपन की भाषा ये मौन है। नाबालिग सपने हैं प्यार बहुत गहरा, प्राण हुए बगिया कांटो का इसपें पहरा। मनभावन पिया संग फूलों में बस जाऊं, शहद जैसे लगने लगे प्रेम भरे बोल हैं। प्रेम हुआ मुझको यह समझेगा कौन है। नर्तकी सा नाचे मन जब से छुआं ये तन, जेठ की दुपहरियां में भी खिल गया यौवन। सपनों की सेज सजी मिलन अब पास है, साजन क

भले दिनों की बात हैं / अहमद फ़राज़

'भले दिनों की बात है ,भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो , न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उसकी छब , फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी, वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे , न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद , न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ , कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी , कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम , कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी , कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की , कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन , कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी , कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ , कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है , मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या,फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ ,वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ ,वो मेरी ज़िद से चिढ़ गई मैं इश्क़ का असीर था ,वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को ,वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं

एक दुर्लभ संवाद

प्रख्यात आलोचक एवं कवि विजय कुमार की वाल से साभार । तीन रचनाकारों के बीच एक दुर्लभ संवाद                      * विजय कुमार क्या  साहि्त्य की अन्दरूनी राजनीति , गॉसिप , शिविर बंदियां,  छोटी मोटी सफलताएं , उपलब्धियां,  यश , पुरस्कार , सम्मान , आत्म -तुष्टियाँ  , गुरुडम  आदि कभी भी साहित्य का अंतिम सच बन सकते  हैं ? या फिर इनके  बरक्स एक कृतिकार का परिवेश, उसका प्रेरणाएं , उसका  आत्म -संघर्ष  , उसके असंतोष और विकलताएं और इस सबसे होकर गुज़रती उसकी कला के   विकास की चर्चाएं  कोई वास्तविक अर्थ रखती हैं ?     जब भी प्रतिभशाली रचनाकारों के बीच सृजन की दुनिया को लेकर   कोई आपसी ,ईमानदार और अंतरंग बातचीत हुई हैं , उसने  हमें मथा है। बहुत सारे विचार सूत्रों ,  किसी मूलगामी खोज और भटकन  में डूबी हुई ऐसी चर्चाएं ही कोई अर्थ रखती  है। ‘ पल प्रतिपल ‘ का ‘का नया अंक   तीन कथाकारों पर केन्द्रित एक अनूठा विशेषांक है , जिसमें समकालीन कहानी के तीन महत्वपूर्ण हस्ताक्षर मनोज रूपड़ा,  योगेंद्र आहूजा और ओमा शर्मा अपनी एक आपसी लंबी बातचीत में अपने अपने  जिए हुए जीवन ,  अनुभवों के कच्चे माल ,अपने परिव

जोकर काम पर / देवेंद्र कुमार

(—कहानी-) ===== सड़क पर काम चल रहा है।  सड़क का एक हिस्सा नीचे धंस गया है।  शायद नीचे पानी की पाइप लाइन फट गई है।  गड्ढा खोदकर उसे घेर दिया गया है।  लोहे के बोर्ड लगा दिए हैं, जिन पर लिखा है-‘ सावधान, आदमी काम पर हैं। ’ इसलिए वहां सड़क संकरी हो गई है।  ट्रैफिक को नियंत्रित करने के लिए वहां सिपाही रामभज की ड्यूटी लगा दी गई है। दोपहर में एक घंटा काम बंद रहता है।  एक दोपहर वह लौटा तो देखा एक मजदूर बोर्ड पर कुछ लिख रहा है-‘ आदमी’ शब्द पर कागज चिपका कर उस पर ‘जोकर’ लिख दिया गया था।  रामभज ने पढ़ा –‘जोकर काम पर’ – ‘’यह क्या है?’’ उसने पूछा।  जवाब में एक मजदूर ने कहा- ‘’मैने सही ही तो लिखा है, हमारे बीच एक जोकर मौजूद है। ‘’ और उसने अपने एक साथी की ओर इशारा किया। जिसे जोकर कहा गया था वह उठ कर रामभज के पास आ खड़ा हुआ।  उसने कहा- ‘’जी, पेशे से मैं जोकर हूँ।  लेकिन सर्कस बंद हो गया और मैं बेरोजगार।  जब जहाँ जो भी काम मिलता है वही कर लेता हूँ। ’’  छोटे कद और दुबले शरीर वाला वह आदमी कहीं से भी तो सर्कस के जोकर जैसा नहीं लग रहा था।  रामभज ने फिर पूछा –‘’ क्या तुम सच में सच कह रहे हो!’’ “जी। -“-- ज़व

जिंदगी मिले ना दोबारा

एक सहेली ने दूसरी सहेली से पूछा:- बच्चा पैदा होने की खुशी में तुम्हारे पति ने तुम्हें क्या तोहफा दिया ? सहेली ने कहा - कुछ भी नहीं! उसने सवाल करते हुए पूछा कि क्या ये अच्छी बात है ? क्या उस की नज़र में तुम्हारी कोई कीमत नहीं ? *लफ्ज़ों का ये ज़हरीला बम गिरा कर वह सहेली दूसरी सहेली को अपनी फिक्र में छोड़कर चलती बनी।।* थोड़ी देर बाद शाम के वक्त उसका पति घर आया और पत्नी का मुंह लटका हुआ पाया।। फिर दोनों में झगड़ा हुआ।। एक दूसरे को लानतें भेजी।। मारपीट हुई, और आखिर पति पत्नी में तलाक हो गया।। *जानते हैं प्रॉब्लम की शुरुआत कहां से हुई ? उस फिजूल जुमले से जो उसका हालचाल जानने आई सहेली ने कहा था।।* रवि ने अपने जिगरी दोस्त पवन से पूछा:- तुम कहां काम करते हो? पवन- फला दुकान में।। रवि- कितनी तनख्वाह देता है मालिक? पवन-18 हजार।। रवि-18000 रुपये बस, तुम्हारी जिंदगी कैसे कटती है इतने पैसों में ? पवन- (गहरी सांस खींचते हुए)- बस यार क्या बताऊं।। *मीटिंग खत्म हुई, कुछ दिनों के बाद पवन अब अपने काम से बेरूखा हो गया।। और तनख्वाह बढ़ाने की डिमांड कर दी।। जिसे मालिक ने रद्द कर दिया