सोमवार, 6 अप्रैल 2020

तुलसीदास कृत रामायण में




प्रस्तुति - डा. ममता शरण


🏹रामचरित मानस के कुछ रोचक तथ्य🏹

1:~लंका में राम जी = 111 दिन रहे।
2:~लंका में सीताजी = 435 दिन रहीं।
3:~मानस में श्लोक संख्या = 27 है।
4:~मानस में चोपाई संख्या = 4608 है।
5:~मानस में दोहा संख्या = 1074 है।
6:~मानस में सोरठा संख्या = 207 है।
7:~मानस में छन्द संख्या = 86 है।

8:~सुग्रीव में बल था = 10000 हाथियों का।
9:~सीता रानी बनीं = 33वर्ष की उम्र में।
10:~मानस रचना के समय तुलसीदास की उम्र = 77 वर्ष थी।
11:~पुष्पक विमान की चाल = 400 मील/घण्टा थी।
12:~रामादल व रावण दल का युद्ध = 87 दिन चला।
13:~राम रावण युद्ध = 32 दिन चला।
14:~सेतु निर्माण = 5 दिन में हुआ।

15:~नलनील के पिता = विश्वकर्मा जी हैं।
16:~त्रिजटा के पिता = विभीषण हैं।

17:~विश्वामित्र राम को ले गए =10 दिन के लिए।
18:~राम ने रावण को सबसे पहले मारा था = 6 वर्ष की उम्र में।
19:~रावण को जिन्दा किया = सुखेन बेद ने नाभि में अमृत रखकर।

श्री राम के दादा परदादा का नाम क्या था?
नहीं तो जानिये-
1 - ब्रह्मा जी से मरीचि हुए,
2 - मरीचि के पुत्र कश्यप हुए,
3 - कश्यप के पुत्र विवस्वान थे,
4 - विवस्वान के वैवस्वत मनु हुए.वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था,
5 - वैवस्वतमनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था, इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुलकी स्थापना की |
6 - इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुए,
7 - कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था,
8 - विकुक्षि के पुत्र बाण हुए,
9 - बाण के पुत्र अनरण्य हुए,
10- अनरण्य से पृथु हुए,
11- पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ,
12- त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार हुए,
13- धुन्धुमार के पुत्र का नाम युवनाश्व था,
14- युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए,
15- मान्धाता से सुसन्धि का जन्म हुआ,
16- सुसन्धि के दो पुत्र हुए- ध्रुवसन्धि एवं प्रसेनजित,
17- ध्रुवसन्धि के पुत्र भरत हुए,
18- भरत के पुत्र असित हुए,
19- असित के पुत्र सगर हुए,
20- सगर के पुत्र का नाम असमंज था,
21- असमंज के पुत्र अंशुमान हुए,
22- अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए,
23- दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए, भागीरथ ने ही गंगा को पृथ्वी पर उतारा था.भागीरथ के पुत्र ककुत्स्थ थे |
24- ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए, रघु के अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी नरेश होने के कारण उनके बाद इस वंश का नाम रघुवंश हो गया, तब से श्री राम के कुल को रघु कुल भी कहा जाता है |
25- रघु के पुत्र प्रवृद्ध हुए,
26- प्रवृद्ध के पुत्र शंखण थे,
27- शंखण के पुत्र सुदर्शन हुए,
28- सुदर्शन के पुत्र का नाम अग्निवर्ण था,
29- अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग हुए,
30- शीघ्रग के पुत्र मरु हुए,
31- मरु के पुत्र प्रशुश्रुक थे,
32- प्रशुश्रुक के पुत्र अम्बरीष हुए,
33- अम्बरीष के पुत्र का नाम नहुष था,
34- नहुष के पुत्र ययाति हुए,
35- ययाति के पुत्र नाभाग हुए,
36- नाभाग के पुत्र का नाम अज था,
37- अज के पुत्र दशरथ हुए,
38- दशरथ के चार पुत्र राम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न हुए |
इस प्रकार ब्रह्मा की उन्चालिसवी (39) पीढ़ी में श्रीराम का जन्म हुआ | शेयर करे ताकि हर हिंदू इस जानकारी को जाने..।

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नाव डूबी क्यों?? / अनाम- गुमनाम



😷😷

नाव डूबने के बाद नाविक और पांच-सात कुशल तैराक नदी में तैरकर अपनी-अपनी जान बचाये. उधर नाव, सबको नदी में छोड़.. खुद आगे निकल गई.

बचे हुए लोग राजा के दरबार में पेश किये गये - राजा ने नाविक से पूछा-
नाव कैसे डूबी!
नाव में छेद था क्या?

नाविक- नहीं महाराज! नाव बिल्कुल दुरुस्त थी.

महाराज- इसका मतलब, तुमने सवारी अधिक बिठाई!

नाविक- नहीं महाराज! सवारी नाव की क्षमतानुसार ही थे और न जाने कितनी बार मैंने उससे अधिक सवारी बिठाकर नाव पार लगाई है.

राजा- आंधी, तूफान जैसी कोई प्राकृतिक आपदा भी तो नहीं थी!
नाविक- मौसम सुहाना तथा नदी भी बिल्कुल शान्त थी महाराज.

राजा- मदिरा पान तो नहीं न किया था तुमने.

नाविक- नहीं महाराज! आप चाहें तो इन लोगों से पूछ कर संतुष्ट हो सकते हैं यह लोग भी मेरे साथ तैरकर जीवित लौटे हैं.

महाराज- फिर, क्या चूक हुई? कैसे हुई इतनी बड़ी दुर्घटना?

नाविक- महाराज! नाव हौले-हौले, बिना हिलकोरे लिये नदी में चल रही थी. तभी नाव में बैठे एक आदमी ने नाव के भीतर ही थूक दिया. मैंने पतवार रोक के उसका विरोध किया और पूछा कि "तुमने नाव के भीतर क्यों थूका?"
उसने उपहास में कहा कि "क्या मेरे नाव थूकने से नाव डूब जायेगी."

मैंने कहा- "नाव तो नहीं डूबेगी लेकिन तुम्हारे इस निकृष्ट कार्य से हम शर्म से डूब रहें हैं.. बताओ!जो नाव तुमको अपने सीने पर बिठाकर इस पार से उस पार ले जा रही है तुम उसी में थूक रहे हो.

राजा- फिर?

नाविक- महाराज मेरी इतनी बात पर वो तुनक गया बोला पैसा देते हैं नदी पार करने के. कोई एहसास नहीं कर रहे तुम और तुम्हारी नाव.

राजा (विस्मय के साथ)- पैसा देने का क्या मतलब! नाव में थूकेगा? अच्छा! फिर क्या हुआ?

नाविक- महाराज वो मुझसे बहस करने लगा.

राजा-नाव में बैठे और लोग क्या कर रहे थे? क्या उन लोगों ने उसका विरोध नहीं किया?

नाविक- महाराज ऐसा नहीं था.. नाव के बहुत से लोग मेरे साथ उसका विरोध करने लगे.

राजा- तब तो उसका मनोबल टूटा होगा. उसको अपनी गलती का एहसास हुआ होगा.

नाविक- ऐसा नहीं था महाराज! नाव में कुछ लोग ऐसे भी थे जो उसके साथ खड़े हो गये तथा नाव के भीतर ही दो खेमे बंट गये. बीच मझधार में ही यात्री आपस में उलझ पड़े.

राजा- चलती नाव में ही मारपीट! तुमने उन्हें समझाया तथा रोका  नहीं..

नाविक- रोका महाराज, हाथ जोड़कर विनती भी की. मैने कहा " नाव इस वक्त अपने नाजुक दौर में है. इस वक्त नाव में तनिक भी हलचल हम-सबकी जान का खतरा बन जायेगी" लेकिन कौन मेरी सुने! सब एक दूसरे पर टूट पड़े.  तथा नाव न बीच धारा में ही संतुलन खो दिया महाराज.

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लघु कथा                                             लॉकडाउन - 0000021                                 ममा के सांझ से पहले ही बैंक ड्यूटी से घर आने पर गोलू बेइंतहा खुश था... गोलू की ब्रीड को सब फैमिली लविंग के तौर पर जानते हैं...गोलू की बेपनाह खुशी को या तो उसके बाबा या परिजन या माई ...सहजता से समझ सकते हैं या डॉगी लविंग...बार - बार पूछ हिलाना फ्रेंडशिप या हैप्पीनेस का प्रतीक होता है... ये सभी लेब्रा की बॉडी लैंग्वेज को खूब पहचानते हैं... यूनिवर्सिटी क्यों बंद है...दीदी दिल्ली क्यों नहीं गई... मम ही ऑफिस क्यों जाती हैं...ये सारे सवाल उसके लिए बेमानी थे...कोरोना वायरस... जनता कर्फ्यू... लॉक डाउन... नाकेबंदी ... कर्फ्यू...सरीखे कानूनी शब्द अब तक उसकी डिक्शनरी में नहीं थे...बाबा और दीदी 72 घंटे से घर में हैं...मानो साईं राम ने उसके अकेलेपन के दंश को छूमंतर कर दिया है ....राष्ट्र के नाम संदेश सुनकर सभी ने बिना तर्क - वितर्क के संकल्प ले लिया... मानो इस लोकतांत्रिक देश में फिलहाल रुलिंग और अपोजिशन पार्टियों का एक ही एजेंडा है... विजयी भव...  रात के 12 बजे का इंतजार क्यों ...लक्ष्मण रेखा जान गए थे...सो सभी घर के अंदर ही खाना खाने के बाद टहलने लगे... सारे परिजन खामोश थे... लेकिन मम के गोलू...बाबा के कालू...दीदी के गोली की खुशी का ठिकाना न था... ज़ोर... ज़ोर से पूछ हिलाना...कभी किसी के पीछे तो कभी किसी के पीछे चिपकना...तीन साल में उसने पहली बार संग - संग...और लक्ष्मण रेखा लांघते हुए नहीं देखा...       

                         
0 श्याम सुंदर भाटिया                          विभागाध्यक्ष - पत्रकारिता कॉलेज, तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद (यूपी)     7500200085

रविवार, 5 अप्रैल 2020

आओ एक दीया जलाएं /कवि अनाम




एक दिन दिया जलाने
की घोषणा से हैरान हैं !
कुछ अतिरिक्त बुद्धिमान
लगते बहुत ही परेशान हैं !

पूछते हैं ,  लौजिक क्या है
इससे तो क्या हो जाएगा..?
क्या इन व्यर्थ के कृत्यों से
कोरोना खत्म हो जाएगा ?

क्यो भोर में उठना लगता अच्छा
सुन-सुन चिड़ियों की बोली से,
इसका  लौजिक क्या सिद्ध करें,
क्यों बच्चा सोए लोरी से..?

 जब कोई बोझ उठाते हैं,
मजदूर भला मिल कर सारे,
 "दम लगा कर हईशा "
क्यों बार बार सब हुंकारे,

अब कैसे सिद्घ करें इससे,
कोई हाथ नहीं बढ़ जाता है..!
हुंकार से आता जोश, और
भारी सामान उठ जाता है।

घनघोर उछलती लहरो पर,
मांझी जब नाव चलाते हैं...
"हई रे , हई रे और "ओ  हा हा"
जब गीत निरंतर गाते हैं।

कैसे साबित करें इन गीतों से ,
क्या पतवारें बढ़ जाती हैं ?
जब हाथ हैं अक्सर थक जाते,
हिम्मत से नौका चलती है।

क्या तोप भला थामे है ये,
संगीनें क्या चलवाती है
वंदे मातरम की पुकार फिर
रण में नजर क्यों आती है।

झंडा टुकड़ा है कपड़े का ,
क्यों इसके लिए मर जाते हैं।
दस रुपये का ध्वज प्रतीक,
जब गर्व समझ फहराते हैं।

कमजोरी हो या ताकत हो ,
रहती इंसा के मन में हैं...!
सामूहिकता से सब कष्ट मिटे,
आते जो भी जीवन में हैं।

सूरज की किरणें कभी कभी
कपड़े भी नही सूखा पाती,
जो उनको कहीं एकत्र करो
दुनिया रोशन कर जाती है

तन की ताकत से जो काम न हों,
मन की ताकत से चल जाये,
एक साथ जब दीप प्रकाशित,
रात कहर की ढल जाये।आओ एक दिया जलाएं / 

जिंदगी की एक ही दवा है उम्मीद /मनोज कुमार





मनोज कुमार

डॉक्टर शिफा एम. मोहम्मद के लिए अपनी निकाह से ज्यादा जरूरी है कोरोना से जूझ रहे मरीजों की जिंदगी बचाना तो बैतूल के लक्ष्मी नारायण मंदिर में असंख्य लोग चुपके से अनाज रख जाते हैं. कहीं छोटे बच्चे अपने गुल्लक में रखे बचत के पैसे संकट से निपटने के लिए खुले दिल से दे रहे हैं तो कहीं लगातार ड्यूटी करने के बाद भी थकान को झाड़ कर कोरोना से बचाव के लिए सिलाई मशीन पर महिला आरक्षक सृष्टि श्रोतिया मास्क बना रही हैं. होशंगाबाद में अपने हाथ गंवा चुके उस जाबांज व्यक्ति की कहानी भी कुछ ऐसी है जो शारीरिक मुश्किल को ठेंगा दिखाते हुए रोज 200 सौ मास्क बनाकर मुफ्त में बांट रहे हैं. इंदौर की वह घटना तो आप भूल नहीं सकते हैं जिन डॉक्टरों पर पत्थर बरसाये गए थे, वही अगले दिन उन्हीं के इलाज करने पहुंच गए. ये थोड़ी सी बानगी है. हजारों मिसालें और भी हैं. दरअसल इसे ही जिंदगी की दवा कहते हैं. इसे आप और हम उम्मीद का नाम देते हैं यानि जिंदगी की दवा उम्मीद है.

उम्मीद जिंदगी की इतनी बड़ी दवा है कि उसके सामने दवा फेल हो जाती है. एक पुरानी कहावत है कि जब दवा काम ना करे तो दुआ कारगर होती है और आज हम जिस संकट से जूझ रहे हैं, वहां दवा, दुआ के साथ उम्मीद हमारा हौसला बढ़ाती है. नोएडा की रहने वाली एकता बजाज की कहानी इस उम्मीद से उपजे हौसले की कहानी है. एकता के मुताबिक वायरस ने उसे घेर लिया था लेकिन उम्मीद के चलते उसका हौसला बना रहा. मध्यप्रदेश के जबलपुर में अग्रवाल परिवार की भी ऐसी ही कहानी है. पिता समेत पत्नी और बच्ची कोरोना के शिकार हो गए थे. पिता की हालत तो ज्यादा खराब थी लेकिन तीनों आज सुरक्षित घर पर हैं. भोपाल के सक्सेना परिवार में पिता और पुत्री सही-सलामत अपने घरों पर हैं. ऐसी ही खुशखबर ग्वालियर से, इंदौर से और ना जाने कहां कहां से आ रही हैं. सलाम तो मौत के मुंह में जाती उस विदेशी महिला को भी करना होगा जिसने अपनी परवाह किए बिना डॉक्टरों से कहा कि जवानों को बचाओ, मैंने तो अपनी जिंदगी जी ली है. थोड़े समय बाद वह उम्रदराज महिला दम तोड़ देती है. उम्मीद ना हो तो जिंदगी खत्म होने में वक्त नहीं लगता है लेकिन उम्मीद हो तो दुनिया की हर जंग जीती जा सकती है.

यह कठिन समय है. यह सामूहिकता का परिचय देने का समय है. एक-दूसरे को हौसला देने और सर्तकता, सावधानी बरतने का समय है. हम में से हजारों लोग ऐसे हैं जिनके लिए अपने जीवन से आगे दूसरों कीiसांसों को बचाना है. डॉक्टर्स की टीम दिन-रात देखे बिना मरीजों की सेवा में जुटी हुई हैं. पुलिस का दल छोटे से सिपाही से लेकर आला अफसर मैदान सम्हाले हुए हैं. मीडिया के साथी दिन-रात एक करके अपनी जान की बाजी लगाकर लोगों तक सूचना पहुंचाने में जुटे हुए हैं. डॉक्टर, पुलिस और मीडिया के साथियों का परिवार है. उनके घर वालों को भी चिंता है लेकिन जिस तरह सीमा पर जाने से जवान को कोई मां, पत्नी या बहन नहीं रोकती है. लगभग वही मंजर देखने का आज मिल रहा है. यह विभीषिका एक दिन टल जाना है. पल्लू में आंखों की कोर को पोंछती मां, दिल को कड़ा कर पति को अपनी जिम्मेदारी के लिए भेजती पत्नी का दुख वही जान सकती हैं. ऐेस में किसी डॉक्टर, पुलिस या मीडिया साथी की छोटी बच्ची टुकूर टुकूर निहारती है तो जैसे कलेजा मुंह पर आ जाता है.

समय गुजर जाता है, यह भी गुजर जाएगा लेकिन यह समय अनुभव का होगा. उस पीड़ा का भी होगा जिनका साथ ना मिले तो ठीक था लेकिन जिन्होंने जो उपत किया और कर रहे हैं, समय उन्हें माफ नहीं करेगा. इस कठिन दौर में संयम का इम्तहान था लेेकिन हम इस इम्तहान में तीसरे दर्जे में पास हुए हैं. उम्मीद थी कि हम संयमित रहेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ. प्रधानमंत्री सेवा में जुटे लोगों के लिए ताली-थाली बजाकर आभार जताने की अपील करते हैं तो हम उसे उत्सव में बदल देते हैं. मोमबत्ती और दीया जलाकर एकजुटता का परिचय देने की उनकी दूसरी अपील को खारिज करते हुए फिर जश्र मनाने सडक़ पर उतर आते हैं. सोशल डिस्टेंसिग की सारी मर्यादा भंग हो जाती है. संयम को तोडक़र बाधा पैदा करने वाले लोग ना केवल अपने लिए बल्कि बड़ी मेहनत से बीमारों की सेवा में लगे लोगों का हौसला तोड़ते हैं. पुलिस की पिटाई का जिक्र करते हैं, आलोचना होती है. लेकिन कभी देखा है कि ये लोग हमारे लिए कहीं फुटपाथ पर सिर्फ पेट भरने का उपक्रम करते हैं. इनका भी घर है. मजे से खा सकते हैं लेकिन हम सुरक्षित रहें, इसके लिए वे घर से बाहर हैं. क्या हम इतना भी संयम बरत कर उन्हें सहयोग नहीं कर सकते हैं. ये जो सूचनाएं आप और हम तक पहुंच रही है, उन मीडिया के साथियों का परिश्रम है. उनकी कोशिश है कि आप बरगालये ना जाएं. आप तक सही सूचना पहुंचे. आपके भीतर डर नहीं, हौसला उपजे लेकिन एक वर्ग ने फैला दिया कि अखबारों से संक्रमण होता है. इन सेवाभावी लोगों की हम और किसी तरह से मदद ना कर पाएं लेकिन दिशा-निर्देशों का पालन कर हम उनका सहयोग तो कर सकते हैं ना? उम्मीद से लबरेज इस जिंदगी की एक और खूबसूरत सुबह होगी, इसमें कोई शक नहीं. वो सुबह हम सबके हौसले की होगी. इस उम्मीद को, हौसले को ही हम हलो, जिंदगी कहते हैं.

लेखक भोपाल में वरिष्ठ पत्रकार हैं.
मोबाइल :
9300469918



कथा और उपदेश









: *सतसंग के उपदेश*
भाग-2
*(परम गुरु हुज़ूर साहबजी महाराज)*
बचन (41)
*बन्धन व फ़र्ज़ में बड़ा फ़र्क़ है।*
             *दुनिया का अजीब इन्तिज़ाम है। इधर तो क़ुदरत ने माँ बाप के दिल में औलाद की चाह धर दी है, उधर यह क़ायदा कर रक्खा है कि बहुत से वाल्दैन के क़तई औलाद (सन्तान) नहीं होती और जिनके होती है तो अक्सर छोटी उम्र में या कुछ बड़ी हो कर मर जाती है। जिन शख़्सों के औलाद नहीं होती वे उसके लिये जहान भर की कोशिशें करते हैं। कोई दवा दारू ऐसी नहीं जिसे वे खाने के लिये तैयार न हों, कोई हकीम डाक्टर ऐसा नहीं जिसके दरवाजे़ की हाज़िरी से उन्हें इन्कार हो और मालिक से लेकर भूत पलीत तक कोई ऐसी गुप्त शक्ति नहीं जिसका दरवाज़ा खटखटाने में उन्हें शर्म हो। "बेचारे ग़रज़बस बावले" होकर तरह तरह की मुसीबतें व नुक़्सान उठाते हैं और जब तक उनका मनोरथ पूरा नहीं हो जाता अपनेतईं जीते जी मरा समझते हैं। दवा इलाज या पूजा पाठ कराने पर जब किसी ग़रीब की आरज़ू पूरी हो जाती है तो बेतरह ख़ुशियाँ मनाता है और जिस देवता की पूजा करते करते औलाद हुई है उसी को सच्चा करतार और कुल मालिक समझने लगता है। अर्से तक उसके ख़ान्दान में बल्कि उसके जुम्ला संगी साथियों के घर में उसी देवता का सेवन रहता है और इस तरह समझ बूझ का कहना एक तरफ़ रख कर लोग क़िस्म क़िस्म के इष्ट धारण करते हैं और जब कुछ अर्से बाद उनकी औलाद मर जाती है तो जो कष्ट उनको होता है उसका अन्दाज़ा लगाना हर इन्सान के लिये कठिन है। ऐसे शख़्सों के अलावा बहुत से ऐसे लोग भी हैं जिनके औलाद मामूली तौर से हो जाती है और वे लड़का या लड़की के मर जाने पर सख़्त दुख महसूस करते हैं। ख़ास कर बुढ़ापे की उम्र में औलाद का सदमा सख़्त रंज का बायस होता है।*
            आज कल इस मुल्क़ में, जहाँ बच्चों की मौतों की तादाद बहुत ज़्यादा है, क़रीबन् हर वाल्दैन को इस मुसीबत का सामना करना पड़ता है। क्या यह इन्सान पर सरासर ज़ुल्म नहीं है कि पहले उसके दिल में औलाद की ख़्वाहिश डालना, फिर उसे औलाद न देना और अगर देना तो अचानक उससे रोते पीटते और चिल्लाते बिल्लाते छीन लेना? ज़ाहिरन् ज़ुल्म ज़रूर है मगर ग़ौर करो कि इन्सान को किसने कहा था कि औलाद में मोह व ममता क़ायम करो। शादी की ख़्वाहिश ज़रूर क़ुदरत ने उसके अन्दर पैदा की मगर इसलिये कि दूसरी सुरतों (आत्माओं) को इन्सानी चोले में अवतार लेने का मौक़ा मिले। लेकिन इसकी वजह से सिर्फ़ इस क़दर इजाज़त है कि इन्सान बख़ुशी शादी करें और जिस वाल्दैन के घर औलाद पैदा हो वे उसकी मुनासिब पर्वरिश करें लेकिन यह इजाज़त नहीं है कि जिनके घर औलाद पैदा न हो वे उसके लिये हद से ज़्यादा कोशिशें करें या अगर बावजूद हर तरह की ख़बरगीरी के औलाद मर जाय तो नाहक़ परेशान ख़ातिर हों। इन्सान ख़ुद ही मोह व ममता में पड़कर अपने लिये आयन्दा मुसीबत के सामान इकट्ठा करता है और क़ुदरत को इलज़ाम लगाता है। छोटी उम्र में बच्चे की भोली सूरत और सादे बोल चाल से माँ बाप के दिल में गहरी मोहब्बत क़ायम हो जाती है और बड़े होने पर उससे उम्मीदें बाँध लेने से ज़बरदस्त ग़रज़मन्दी पैदा हो जाती है और नतीजा यह होता है कि औलाद के गुज़र जाने पर माँ बाप दोनों की ज़िन्दगी तलख़ हो जाती है। *काश जिस क़दर मोहब्बत इन्सान अपनी औलाद के साथ करता है उसका आठवाँ हिस्सा भी सच्चे मालिक के चरणों में करे तो न सिर्फ़ दुनियवी दुख सुख उसके नज़दीक फटकने न पावेंगे बल्कि वह हँसता खेलता हुआ जन्म मरण के चक्र से बाहर हो कर अमर व अविनाशी आनन्द को प्राप्त होगा।*
राधास्वामी




: 🙏🕉 *ईश्वर का गणित*


🤝🤝🤝🤝🤝🤝🤝
      *_त्याग !!_*



_एक बार दो आदमी एक मंदिर के पास बैठे गपशप कर रहे थे । वहां अंधेरा छा रहा था और बादल मंडरा रहे थे ।_
_थोड़ी देर में वहां एक आदमी आया और वो भी उन दोनों के साथ बैठकर गपशप करने लगा ।_

_कुछ देर बाद वो आदमी बोला उसे बहुत भूख लग रही है, उन दोनों को भी भूख लगने लगी थी ।
पहला आदमी बोला मेरे पास 3 रोटी हैं, दूसरा बोला मेरे पास 5 रोटी हैं, हम तीनों मिल बांट कर खा लेते हैं।_
_उसके बाद सवाल आया कि 8 (3+5) रोटी तीन आदमियों में कैसे बांट पाएंगे ??_
_पहले आदमी ने राय दी कि ऐसा करते हैं कि हर रोटी के 3 टुकडे करते हैं, अर्थात 8 रोटी के 24 टुकडे (8 X 3 = 24) हो जाएंगे और हम तीनों में 8 - 8 टुकड़े बराबर बराबर बंट जाएंगे।_
    _तीनों को उसकी राय अच्छी लगी और 8 रोटी के 24 टुकडे करके प्रत्येक ने 8 - 8 रोटी के टुकड़े खाकर भूख शांत की और फिर बारिश के कारण मंदिर के प्रांगण में ही सो गए ।_
_सुबह उठने पर तीसरे आदमी ने उनके उपकार के लिए दोनों को धन्यवाद दिया और प्रेम से 8 रोटी के टुकड़ों के बदले दोनों को उपहार स्वरूप 8 सोने की गिन्नी देकर अपने घर की ओर चला गया ।_
_उसके जाने के बाद दूसरे आदमी ने  पहले आदमी से कहा हम दोनों 4 - 4 गिन्नी बांट लेते हैं ।_
_पहला आदमी बोला नहीं मेरी 3 रोटी थी और तुम्हारी  5 रोटी थी, अतः मैं 3 गिन्नी लुंगा, तुम्हें 5 गिन्नी रखनी होगी ।_
_इस पर दोनों में बहस होने लगी ।_
_इसके बाद वे दोनों समाधान के लिये मंदिर के पुजारी के पास गए और उन्हें  समस्या बताई तथा  समाधान के लिए प्रार्थना की ।_
_पुजारी भी असमंजस में पड़ गया, दोनों  दूसरे को ज्यादा  देने के लिये लड़ रहे है ।  पुजारी ने कहा तुम लोग ये 8 गिन्नियाँ मेरे पास छोड़ जाओ और मुझे सोचने का समय दो, मैं कल सवेरे जवाब दे पाऊंगा ।_
_पुजारी को दिल में वैसे तो दूसरे आदमी की 3-5 की बात ठीक लग रही थी पर फिर भी वह गहराई से सोचते-सोचते गहरी नींद में सो गया।_
_कुछ देर बाद उसके सपने में भगवान प्रगट हुए तो पुजारी ने सब बातें बताई और न्यायिक मार्गदर्शन के लिए प्रार्थना की और बताया कि मेरे ख्याल से 3 - 5 बंटवारा ही उचित लगता है ।_

_भगवान मुस्कुरा कर बोले- नहीं,
पहले आदमी को 1 गिन्नी मिलनी चाहिए और दूसरे आदमी को 7 गिन्नी मिलनी चाहिए ।_
_भगवान की बात सुनकर पुजारी अचंभित हो गया और अचरज से पूछा- *प्रभु, ऐसा कैसे  ?*_

_भगवन फिर एक बार मुस्कुराए और बोले :_

_इसमें कोई शंका नहीं कि पहले आदमी ने अपनी 3 रोटी के 9 टुकड़े किये परंतु उन 9 में से उसने सिर्फ 1 बांटा और 8 टुकड़े स्वयं खाया अर्थात उसका *त्याग* सिर्फ 1 रोटी के टुकड़े का था इसलिए वो सिर्फ 1 गिन्नी का ही हकदार है ।_
    _दूसरे आदमी ने अपनी 5 रोटी के 15 टुकड़े किये जिसमें से 8 टुकड़े उसने स्वयं खाऐ और 7 टुकड़े उसने बांट दिए । इसलिए वो न्यायानुसार 7 गिन्नी का हकदार है .. ये ही मेरा गणित है और ये ही मेरा न्याय है  !_

_ईश्वर की न्याय का सटिक विश्लेषण सुनकर पुजारी  नतमस्तक हो गया।_

_इस कहानी का सार ये ही है कि हमारी वस्तुस्थिति को देखने की, समझने की दृष्टि और ईश्वर का दृष्टिकोण एकदम भिन्न है । हम ईश्वरीय न्यायलीला को जानने समझने में सर्वथा अज्ञानी हैं ।_
   _हम अपने त्याग का गुणगान करते है, परंतु ईश्वर हमारे त्याग की तुलना हमारे सामर्थ्य एवं भोग तौर कर यथोचित निर्णय करते हैं ।_

*_यह महत्वपूर्ण नहीं है कि हम कितने धन संपन्न है, महत्वपूर्ण यहीं है कि हमारे सेवाभाव कार्य में त्याग कितना है।

राधास्वामी
राधास्वामी
🙏🙏_*
राधास्वामी
राधास्वामी
राधास्वामी
।।।।।।।।।।





एक दीप देश के नाम पर




प्रस्तुति - आत्म स्वरूप:

एक दिन दिया जलाने की घोषणा से हैरान हैं कुछ अतिरिक्त बुद्धिमान लगते बहुत ही परेशान हैं। पूछते हैं ,लोजिक क्या है इससे तो क्या हो जाएगा क्या इन व्यर्थ के कृत्यों से कोरोना क्या खत्म हो जाएगा? क्यो सुबह सुबह उठना लगता अच्छा सुन-सुन चिड़ियों की बोलियों से, इसका लोजिक कैसे सिद्ध करें, कि बच्चा ,सोये क्यों माँ की लोरियों से। बहस से ,न तर्कों से, ना विद्वानों के विचारों से, कितने फांसी पे झूल गए आज़ादी के बस नारों से। जब कोई बोझ उठाते हैं मजदूर भला मिल कर सारे "दम लगा कर हईशा "क्यों बार बार सब भरे हुंकारे, अब कैसे सिद्घ करें इससे, कोई हाथ नहीं छुटता है हुंकार से आता जोश,फिर भारी सामान उठता है। घनघोर उछलती लहरो पर मांझी जब नाव चलाते हैं "हई रे ,हई रे ओ हा" का जब मिल कर गीत निरंतर गाते हैं। कैसे साबित करें इन गीतों से ,क्या पतवारें भी संभलती है? पर हाथ तो अक्सर थक जाते,हिम्मत से नौका चलती है। क्या तोप भला थामे है ये,संगीनें क्या चलवाती है वंदे मातरम की पुकार फिर रण में नजर क्यों आती है। झंडा टुकड़ा है कपड़े का ,क्यों इसके लिए मर जाते हैं। दस रुपये का ध्वज प्रतीक,देश का गर्व समझ फहराते हैं। कमजोरी हो या ताकत हो ,रहती इंसा के मन में हैं, सामूहिकता से सब कष्ट मिटे,आते जो भी जीवन में हैं। सूर्य की किरणें कभी कभी कपड़े भी नही सूखा पाती, उनको लेंस से जो एकत्र करो आग कहीं भी लगा जाती। तन की ताकत से जो काम न हों,मन की ताकत से चल जाये, सब एक साथ खड़े प्रकाशित हों ,रात कहर की ढल जाये ! [05/04, 18:49] +91 85390 46852: *किसी के गुजर जाने के बाद शहर बंद होते, हमने बहुत बार देखा हैं* *मगर कोई गुजर न जाए इसलिए शहर को बंद होते, पहली बार देखा हैं* [05/04, 18:49] +91 85390 46852: *हम दीप अवश्य जलायेंगे* *एक " दीप "आशा का* *एक " दीप " विश्वास का* *एक " दीप " ज्ञान का* *एक " दीप " प्रकाश का* *एक " दीप "तम में उजाले का* *एक " दीप "भूखे के निवाले का* *एक "दीप "बेसहारे के सहारे का* *एक " दीप "डूबते के किनारे का* *एक " दीप "जन-जन की वाणी का* *एक "दीप "मानव की नादानी का* *"भारत प्रेम" को जन-मन में जगायेंगे"हाँ"* *हम "दीप" अवश्य जलायेंगे* *👉" 05/04" - 9.00pm- "9" min.* 🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔 [05/04, 19:59] Swami Sharan: *वास्तव में वह 21 सत्य जो लॉकडाऊन के दौरान सीखा...* 1. आज अमेरिका अग्रणी देश नहीं है। 2. चीन कभी विश्व कल्याण की नही सोच सकता। 3. यूरोपीय उतने शिक्षित नहीं जितना उन्हें समझा जाता था। 4. हम अपनी छुट्टियॉ बिना यूरोप या अमेरिका गये भी आनन्द के साथ बिता सकते हैं। 5. भारतीयों की रोग प्रतिरोधक क्षमता विश्व के लोगों से बहुत ज्याद है। 6. कोई पादरी, पुजारी, ग्रन्थी,मौलवी या ज्योतिषी एक भी रोगी को नहीं बचा सका। 7. स्वास्थ्य कर्मी,पुलिस कर्मी, प्रशासन कर्मी ही असली हीरो हैं ना कि क्रिकेटर ,फिल्मी सितारे व फुटबाल प्लेयर । 8. बिना उपभोग के विश्व में सोना चॉदी व तेल का कोई महत्व नहीं। 9. पहली बार पशु व परिन्दों को लगा कि यह संसार उनका भी है। 10. तारे वास्तव में टिमटिमाते हैं यह विश्वास महानगरों के बच्चों को पहली बार हुआ। 11. विश्व के अधिकतर लोग अपना कार्य घर से भी कर सकते हैं। 12. हम और हमारी सन्तान बिना 'जंक फूड' के भी जिन्दा रह सकते है। 13. एक साफ सुथरा व शालीन जीवन जीना कोई कठिन कार्य नहीं है। 14. भोजन पकाना केवल स्त्रियां ही नहीं जानती। 15. मीडिया केवल झूठ और बकवास का पुलन्दा है। 16. अभिनेता केवल मनोरंजनकर्ता हैं जीवन में वास्तविक नायक नहीं। 17.भारतीय नारी कि वजह से ही घर मंदिर बनता है। 18. पैसे की कोई वैल्यू नही है क्योंकि आज दाल रोटी के अलावा क्या कर सकते हैं। 19. भारतीय अमीरों मे मानवता कुट-कुट कर भरीं हुईं है एक दो को छोड़कर। 20. विकट समय को सही तरीक़े से भारतीय ही संभाल सकता है। 21. सामुहिक परिवार एकल परिवार से अच्छा होता है.... *(इसे ज़रूर पढ़ें एक अच्छे भविष्य की परिकल्पना के निम्मित ही सही)*

कूट नीति

 *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...