शनिवार, 2 अप्रैल 2022

डबराल डंगवाल और खरे का काव्यात्मक त्रिकोण / पंकज़ चतुर्वेदी

 कवि-आलोचक पंकज चतुर्वेदी जी ने वरिष्ठ हिन्दी कवि आलोक धन्वा के हवाले से समकालीन हिन्दी कविता के सबसे बड़े कवियों में शुमार मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल और विष्णु खरे को लेकर कुछ महत्त्वपूर्ण बातें अपनी हालिया फ़ेसबुक पोस्ट में प्रस्तुत की हैं :


"जिन अख़बारों से मंगलेश जुड़े, वे उनके संपादन के कारण मशहूर हो गये--जिस स्तर के वह कवि हैं, उसी स्तर के पत्रकार और संपादक थे। उनका एक बहुत बड़ा संसार था, जिसमें कोई भी जाना पसंद करता। नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, राजेन्द्र यादव, विष्णु खरे, वीरेन डंगवाल या मैं। मंगलेश किसी से शास्त्रीय बहस नहीं करते थे, लेकिन उनका लिखा हुआ ख़ुद एक 'क्लासिक' है। पहाड़ से महानगर आए हुए एक इनसान का संघर्ष उन्होंने दिखाया और वह अनवरत 'ग्रो' करनेवाले कवि थे। उनके पास जो 'डायवर्सिटी' थी कविता की, वह बहुत बड़ी बात है। 


मंगलेश अपनी रचना से कभी संतुष्ट नहीं होते थे। कविता का कोई एक साँचा नहीं था उनके पास। उन पर रघुवीर सहाय का आम तौर पर और ख़ासकर इस बात का प्रभाव था :


'अपनी एक मूर्ति बनाता हूँ और ढहाता हूँ

और आप कहते हैं कि कविता की है'


वाक्य-रचना को मंगलेश अपने समय के किसी कवि से ज़्यादा समझते थे। जिस सामाजिक अनुभव या आलोचनात्मक यथार्थ को वह लिखते, उसकी बहुत समर्थ काव्य-भाषा उनके पास थी। वह दुर्लभ है। बहुत ही दुर्लभ। बेहद जटिल और संश्लिष्ट अनुभवों को उन्होंने सर्वथा नयी भाषा दी। उनके यहाँ अंतर्वस्तु और भाषा, दोनों का बहुत प्रसार और विविधता है। वह कहीं-कहीं स्वतःस्फूर्त कवि हैं, मगर ज़्यादातर कविता को रचते थे।


मंगलेश के यहाँ चिंतन का गद्य बहुत ज़्यादा है--नयी चीज़ों को समझने, उनकी सचाई तक पहुँचने का सौंदर्य। वह अपनी कविता को लेकर इतने 'कमांडिंग' थे कि जो शब्द इस्तेमाल करते, उन्हें बिलकुल बदला नहीं जा सकता, उनके अलावा किन्हीं और शब्दों से उतनी बात नहीं कही जा सकती। 


उनके समय की अच्छी कवयित्रियों-लेखिकाओं ने मिलकर--उनकी विदाई से विचलित होकर--एक पूरी किताब ही लिखी, जिसमें उनका यह मंतव्य मूल्यवान है कि 'मंगलेश स्त्री-हृदय के कवि हैं।'


विष्णु खरे और वीरेन डंगवाल की कविता को मंगलेश ने एक चुनौती की तरह लिया।"


मैंने पूछा : 'कुछ लोग यह मानते हैं कि विष्णु खरे की बनिस्बत मंगलेश जी में कविता ज़्यादा है ?'


आलोक जी जवाब देते हैं : "कविता बचे या न बचे, लेकिन जो सामाजिक विडम्बनाएँ और 'क्राइसिस' है, उसे विष्णु खरे बराबर 'कैरी' करते थे। एक 'कैथार्सिस' है, जो उनके यहाँ ही मिलेगी। इसलिए वह चुनौती हैं सब कवियों के लिए।


महत्त्वपूर्ण कवि जो संवेदनाएँ लाते हैं, हम उनसे पहले से परिचित नहीं होते। जैसे :


'तरु गिरा जो

झुक गया था

गहन छायाएँ लिये'


शमशेर की इन पंक्तियों में जो घनीभूत बोध है, वह कल्पना से तो नहीं आ सकता। वस्तु की सत्ता या उसका जो असर पड़ रहा है कवि पर--उससे यह भाषा तय होती है। 'रामदास' को मार दिये जाने की परिस्थितियों में रघुवीर सहाय ने कितनी सरल भाषा में कविता लिखकर कितनी पीड़ा पैदा की और एक बहुत बड़े सत्य को सामने रखा--उस भयावह यथार्थ को, जो आज और नृशंसता से घटित हो रहा है।


'संगतकार' और 'गुजरात के मृतक का बयान'--मंगलेश डबराल की दो कविताएँ ऐसी थीं, जिन्होंने पूरे देश को झकझोर दिया। उन्होंने 'पागलों का एक वर्णन' शीर्षक कविता लिखी, जिसमें वह पूछते हैं कि पागल जो दिन-भर भटकते हैं, रात में कहाँ शरण पाते होंगे और उन्हें 'रोज़मर्रा के काम पर निकलने से पहले सिर्फ़ एक कप चाय' कहाँ नसीब होती होगी ?' कल्पना यहाँ आती है, मगर बहुत कम आती है। ऐसे अनुभव को व्यक्त करने के लिए उस भयावहता तक आपको जाना होता है, जैसे अमरकांत की 'डिप्टी-कलक्टरी' और 'ज़िन्दगी और जोंक' कहानियाँ दिखाती हैं कि हम कैसे नरक में जी रहे हैं !"


(समकालीन कविता के इन तीनों स्तम्भों ने पिछले 7 सालों में एक-एक कर हिन्दी जगत् को अलविदा कह दिया।)

पुराने लेखक-नए लेखक / सुभाष नीरव

 पुराने लेखक-नए लेखक 

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(पंजाबी की प्रख्यात लेखिका अजीत कौर की रेखा-चित्रों की किताब ‘तकिये का पीर’ से एक छोटा-सा अंश। इसमें अजीत कौर पंजाबी के प्रसिद्ध प्रकाशक भापा प्रीतम सिंह से बात कर रही हैं जिनके नवयुग पब्लिशर्ज को दर्जनभर से ज्यादा नेशनल अवार्ड मिले)


(पढ़ें और बताएँ  कि ऐसी स्थिति क्या हिंदी या अन्य भारतीय भाषा के लेखकों में भी है? –सुभाष नीरव)


“भापा जी, आपका वास्ता तो पिछली आधी सदी से लेखकों के साथ पड़ता आ रहा है। पहले पै्रसों में अक्षर के साथ अक्षर जोड़कर आप उन्हें छापते रहे, अब आप ‘तकिये’ पर बैठे बैठे माथा टिकवाते हो, साथ ही उनकी किताबें छापते हो। लेखकों की एक पूरी की पूरी पुरानी पीढ़ी आपके सामने धीरे-धीरे ख़त्म हुई है। लेखकों की एक बिलकुल नई पीढ़ी आपके हाथों में पलकर जवान हुई है। अब तो उस पीढ़ी के भी बाल सफ़ेद हो गए हैं और अब तीसरी पीढ़ी की नई-नरम पौध को आप सींच रहे हों। लेखकों की इन तीनों पीढ़ियों में कोई बड़ा अंतर आपको नज़र आता है? इसी से हवा का रुख पता चलेगा कि पंजाबी साहित्य किधर को जा रहा है।“

 वह कुछ देर चुप बैठे सोचते रहे। समाधि में लीन! मैं जानती थी, उनकी आँखों के आगे उस समय के पंजाबी अदब का पूरा कारवां गुज़र रहा था : सरदार नानक सिंह, चरन सिंह ‘शहीद’, प्रिंसीपल जोध सिंह, धनीराम ‘चात्रिक’, भाई वीर सिंह, सरदार गुरबख़्श सिंह, प्रोफेसर मोहन सिंह, अमृता प्रीतम, करतार सिंह दुग्गल, बलवंत गार्गी, कुलवंत सिंह विर्क, डॉ. हरभजन सिंह, गुलजार सिंह संधू, मोहन सिंह जोश, देवेन्द्र सत्यार्थी, रंधावा साहब, नवतेज, सहिराई जी, तारा सिंह कामल, और अन्य सैकड़ों लेखक जिनके साथ भापा जी का पिछले पचास-पचपन सालों में वास्ता रहा है।

 वह कुछ देर ख़ामोश रहे, फिर कहने लगे, “यह बात तो बहुत लंबी हो जाएगी। मुख़्तसर-सी बात सिर्फ़ इतनी कह सकता हूँ कि पुरानी पीढ़ी के लेखक अलमस्त फ़कीरी के आलम में रहते थे। मेहनत करके, रियाज़ करके लिखते थे। लिखे हुए को काटते-छाँटते रहते थे। और सुच्ची-सच्ची मेहनत के बाद जब उनकी कोई किताब छपती थी, वे सिर्फ़ सयाने पाठकों की राय जानने के लिए उत्सुक रहते थे। कभी धनीराम ‘चात्रिक’ ने,  या सरदार नानक सिंह ने,  या गुरबख़्श सिंह ने किसी आलोचक को अपनी कोई किताब रिव्यू करने के लिए नहीं दी थी। और न ही कहा था। कभी आवश्यकता ही महसूस नहीं होती थी उन्हें। आज का लेखक समीक्षाओं के लिए उतावला पड़ा रहता है। विशेष रूप से टेलीफोन करता है, चिट्ठियाँ लिखता रहता है। दो शब्द कोई तारीफ़ के लिख दे तो सोचता है, एवरेस्ट पर चढ़ गए। दो शब्द किसी ने खिलाफ़ लिख दिए तो इसी बात का रोना रोये जाता है कि फलांने ने कोई व्यक्तिगत दुश्मनी निकाली है उसके साथ और फिर जहाँ भी दाँव लगे, उसकी टाँग तोड़ने के लिए तत्पर रहता है।“

 “इसका परिणाम यह हुआ कि आज मोगे से लेकर दिल्ली तक आलोचक ही आलोचक पैदा हो गए हैं। हर लड़का-लड़की जो पंजाबी में एम.ए. कर लेता है, वह समझता है कि मैं तो आलोचक बना ही बना। और हर लड़की-लड़का जो अपने महबूब को पंजाबी में ख़त लिख लेता है, या उसके हुस्न की तारीफ़ में या बेवफ़ाई के दर्द में एक-आधी कविता लिख लेता है, वह अपने आप को वारिस शाह बना समझ लेता है। नतीजा यह है कि मशरूमों की तरह हज़ारों लेखक उठ खड़े हुए हैं। तू हैरान होगी कि ‘पंजाबी केन्द्रीय लेखक सभा’ के आज हज़ार से ऊपर सदस्य हैं, सब के सब लेखक!“

 “हज़ार से ऊपर लेखक? पंजाबी के लेखक?“

 “हाँ! तू बेशक खुद पता कर लेना।“

 “हज़ार यदि पंजाबी के पाठक ही हो जाते...।“

 “पाठकों को कौन पूछता है! परवाह किसे है पाठकों की! लेखक को आलोचक चाहिए और आलोचक को उसका पानी भरने वाला लेखक। बस, बन गई बात।“

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रात का (के) रिपोर्टर निर्मल वर्मा /


प्रस्तुति - हिंदी विभाग

मगध विवि, गया  बिहार


कल 3 अप्रैल को हिन्दी के महान रचनाकार निर्मल वर्मा का जन्मदिन है। इस अवसर पर शिमला में जन्मे  इस लेखक पर देश में कई स्थानों पर कार्यक्रम आयोजित होने हैं। पहाड़, एकांत, यूरोप, भारतीय संस्कृति और दर्शन का जैसा गहरा और अनोखा वितान हमें निर्मल जी के यहाँ नज़र आता है, वह दुर्लभ है। इस वितान को वे जिस सहज, प्रवाहमय और काव्य रूपी गद्यभाषा में अभिव्यक्त करते हैं, वह  अद्वितीय है। मार्क्सवाद से लेकर भारतीय संस्कृति के गहन आख्यान तक, उनकी विचारधारा निरन्तर संशोधित और संवर्धित होती रही है।


नई कहानी आंदोलन के संदर्भ में उनकी कहानी 'परिंदे' मील का पत्थर मानी जाती है। 'माया दर्पण' कहानी पर इसी नाम से 1972 में एक फ़िल्म बनी जिसे फ़िल्मफ़ेअर का सर्वश्रेष्ठ क्रिटिक्स चॉइस पुरस्कार मिला। 'डायरी का खेल', 'लन्दन की एक रात', 'सितंबर की एक शाम' जैसी कहानियां हों या 'लाल टीन की छत', 'अंतिम अरण्य' और 'वे दिन' जैसे तमाम उपन्यास, कथा कहने के ढंग को निर्मल जी ने अभूतपूर्व रूप से बदला। प्रतीक और वातावरण की आधुनिक हिन्दी कथा-साहित्य में भूमिका सम्बन्धी कोई भी अध्ययन निर्मल के बिना पूरा नहीं होगा। उनके निबन्ध, रिपोर्ताज और यात्रा-संस्मरण भी एक अनिवार्य अध्ययन की मांग करते हैं।


हिन्दी खड़ी बोली के वैभव को कम समय में प्रतिष्ठित करने में निर्मल वर्मा का नाम हमेशा अग्रगण्य रहेगा। साहित्य अकादमी, ज्ञानपीठ, पद्म भूषण, Lettre Ulysses (Berlin) और Chevalier de l'ordre des arts et des lettres (France) जैसे तमाम पुरस्कार उनकी अंतरराष्ट्रीय छाप को अभिव्यक्त करते हैं। बारम्बार नमन।

प्रस्तुति - हिंदी विभाग

मगध विवि, गया  बिहार


शुक्रवार, 1 अप्रैल 2022

आलमशाह‌ खान का भूत / आलोक यात्री

 तराना परवीन जी की 

फेसबुक वॉल से पता चला कि आज 

सुप्रसिद्ध कहानीकार श्री आलमशाह‌ खान जी का जन्मदिन है


पराई प्यास का सफर उनकी एक यादगार रचना है

जिसे स्कूली दिनों में कई बार पढ़ा था

वह कहानी आज भी दिमाग में जस की तस बसी हुई है

यह कहानी पढ़ते हुए मंटो की -खोल दो भी याद आई थी

वह दौर भी क्या दौर था...

आलमशाह खान, पानू खोलिया, गुलशेर खान शानी, ब्रजेश्वर मदान, सुदीप, नवीन सागर, चित्रा मुद्गल, रमेश बतरा, महेश दर्पण, बलराम, प्रियंवद, हरि भटनागर और भी न जाने कितने लेखकों की एक से एक बेहतरीन रचनाएं पाठकों के सामने आ रहीं थीं

यहां एक वाकया आप लोगों से शेयर करना चाहुंगा 

पिताश्री से. रा. यात्री जी से

आलमशाह खान जी की कहानियों पर लंबा विमर्श होता था

यह वह दौर था जब हम जैसे न जाने कितने पाठक आलमशाह खान की रचनाओं को ओढ़ते-बिछाते थे

तो हुआ यूं कि...

एक सुबह आलमशाह खान जी की कहानी पर

पिताश्री से कुछ लंबा विमर्श हो गया

मेरी बी.ए. की परिक्षाएं चल रहीं थीं

पिताश्री ने नसीहत दी कि दो-चार दिन कोर्स की किताबें पढ़ लो फिर आलमशाह खान को फुर्सत से पढ़ लेना

जून की तपती दुपहरी में मैं ड्राइंग रूम की खिड़की में दीवान पर टिका कोर्स की किताब में लीन था

अचानक सड़क पर एक व्यक्ति सफेद बुशर्ट और सफ़ेद पतलून में किसी की तलाश में भटकता हुआ दिखाई दिया

मैंने उस व्यक्ति को गौर से देखा

मुझे लगा वह आलमशाह खान हैं

मैंने तत्काल भीतर के कमरे में सो रहे पिताश्री को जगाकर कर कहा कि लगता है आलमशाह खान आए हैं

कच्ची नींद से जागे पिताश्री ने चौंकते हुए कहा

-कहां हैं आलमशाह खान

मैंने बताया कि मैंने उन्हें सड़क से जाते हुए देखा है

मेरे इतना कहते ही पिताश्री ने जरा रोष से कहा

"आलमशाह खान... आलमशाह खान... आलमशाह खान दिमाग में घुस गया है तुम्हारे... वह क्या तुम्हारी तरह सिरफिरा है जो इस तपती दुपहर में भटकेगा... ध्यान किताबों में लगाओ..." कहते हुए उन्होंने चद्दर तान ली

मैंने मन में सोचा लग तो आलमशाह खान ही रहे थे... 

दूसरा ख्याल यह आया कि भले ही कोई भी हो दोपहर के ढ़ाई तीन बजे किसी का पता तलाशते व्यक्ति की मदद जरूर की जानी चाहिए

यह सोच कर मैं सड़क पर उतर आया

लेकिन सुनसान सड़क पर आदमजात तो क्या चिड़ी का बच्चा तक दिखाई नहीं दे रहा था

एक दो सड़क पर तलाशने के बाद मुझे वह सज्जन नज़र आ गए

उनके निकट जाकर मैंने अभिवादन कर उनसे पूछा -आलमशाह खान...

-वही तो... हाथ में थामे रूमाल से पसीना पोंछते हुए उन्होंने कहा

-आइए

वह मेरे साथ घर आ गए, मैंने उन्हें ड्राइंग रूम में बैठाया, पानी पिलाया और ड्राइंग रूम और पिताश्री के बैडरूम का पर्दा हटा दिया

पिताश्री को हिलाते हुए मैंने कहा -आलमशाह खान आए हैं

-आलमशाह खान... आलमशाह खान... आलमशाह खान का भूत उतरेगा सर से कि नहीं... पिताश्री झुंझलाते हुए बोले

मैंने कहा -वह बैठे सोफे पर...

पिताश्री ने चादर में से चेहरा निकाल कर ड्राइंग रूम में झांका और यह कहते हुए चादर फेंक कर उठ बैठे -यार न कोई खबर न इत्तिला...


अब मसला यह कि... आलमशाह खान को पहचाना कैसे?

इस सवाल का ज़वाब तो मुझे भी आजतक नहीं मिला

शायद पाठक के मन में अपने चहेते रचनाकार की छवि बन ही जाती है...

आलमशाह खान जी को नमन

रवि अरोड़ा की नजर से.....

 बात बुरांश की /:रवि अरोड़ा



पिछले दो दिन से फिर पहाड़ों पर हूं । इस बार ऋषिकेश, चंबा, कान्हा ताल, धनौल्टी और मसूरी जाना हुआ। पहाड़ पर इस बार कुछ ऐसा देखा जो संभवत पहले नहीं देखा था अथवा देखा भी होगा तो इसका संज्ञान नहीं लिया। दरअसल पांच हजार फुट से अधिक की ऊंचाई वाली तमाम जगह चटक लाल रंग वाले बुरांश के फूलों से लदे पेड़ नज़र आईं । शायद ही कोई ऐसा स्थान रहा हो जहां बुरांश के दीदार न हुए हों । टूट कर गिरी फूलों की पत्तियां सड़कों को लाल रंग देने पर ही जैसी आमादा थीं मगर फूल थे कि फिर भी कम होने का नाम ही नहीं ले रहे थे । ये फूल पहले कभी क्यों नहीं दिखे ? यह समझने बैठा तो पता चला कि ये फूल फागुन की समाप्ति पर ही पेड़ों पर आते हैं और चैत माह में अपने चरम पर होते हैं । बैसाख आते आते ये आखों से ओझल हो जाते हैं । यानि कुल मिला कर मार्च और अप्रैल ही इनका सीजन है और आमतौर पर बच्चों की परीक्षाओं के चलते इन महीनों में प्लेन एरिया के हम जैसे लोग पहाड़ों पर नही जाते और यही कारण है कि कुदरत के इस नजारे से महरूम ही रह जाते हैं ।


बुरांश पर निगाह जाने की एक प्रमुख वजह यह भी रही कि कोरोना संकट के दौरान ऐसी खबरें आईं थीं कि बुरांश के फूल से कोरोना का इलाज हो सकता है । खुद इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी मंडी और इंटरनेशनल सेंटर फॉर जेनेटिक इंजीनियरिंग एंड बायोटेक्नोलॉजी ने भी इसकी तस्दीक की थी । वैसे यह तो हम लोग पहले से ही जानते थे कि इस फूल में एंटी ऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में होता है और पहाड़ पर रहने वाले लोग इससे सर दर्द , बदन दर्द , ब्लड प्रेशर, हृदय रोग और मधुमेह जैसे तमाम रोगों का इलाज कर लेते हैं । एक पेड़ के नीचे गिरे फूलों को एकत्र करती वृद्धा से जब पूछा कि वह इनका क्या करेगी तो उसने बताया कि इसकी चटनी बहुत स्वादिष्ट बनती है । वैसे इन फूलों का जूस निकाल कर पेय पदार्थ भी लोग बना लेते हैं । इस पेय पदार्थ का स्वाद जब सैलानियों को भी लग गया तो लोकल बाशिंदों ने इन्हे बोतलों में भर कर बेचना भी शुरू कर दिया और अब पहाड़ की तमाम छोटी बड़ी दुकानों पर यह जूस मिलता है । खास बात यह है कि बुरांश हिमालय का ही फूल है और आमतौर पर अन्य जगहों पर नहीं मिलता । 


हालांकि ग्लोबल वार्मिंग से अब बुरांश के समक्ष भी खतरा उत्पन्न हो गया है और बेवक्त की गर्मी सर्दी से फूल भी असमंजस में हैं कि कब खिलना है और कब नहीं । इस बार भी वह फागुन में वृक्षों पर आ जमा जबकि उसे चैत का इंतजार करना चाहिए था । हो सकता है कि अपनी विदाई के लिए वह बैसाख का इंतजार भी न करे । चलिए ग्लोबल वार्मिंग तो बड़ा मसला है और हम लोग इसमें बहुत कुछ कर भी नहीं सकते मगर जब तक भी बुरांश जैसी कुदरती नेमतें हमारे पास हैं , हम उनका इस्तेमाल क्यों नहीं करते ? जब रिसर्चों से पता चल गया है कि इस फूल में बेपनाह औषधीय गुण हैं तो हम उनका उपयोग क्यों नहीं करते ? बुरांश के फूलों से जब लाखों करोड़ों हिमालय वासी अपनी तमाम बीमारियां ठीक कर सकते हैं तो क्यों सरकार इस ओर ध्यान नहीं देती ? चलिए यह भी माना कि मुल्क का दवा उद्योग निजी हाथों में है और सरकार की इस और रुचि क्यों कर होगी मगर बेरोजगारी से त्रस्त उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और नॉर्थ ईस्ट की बड़ी आबादी को इसके जूस, जैम और चटनी बना कर बेचने के लिए प्रोत्साहित तो किया ही जा सकता है ? सरकार ने कुटीर उद्योगों और माइक्रो स्केल इंडस्ट्रीज के लिए इतने विभाग क्यों खोल रखे हैं ? क्यों नहीं सरकार निर्यातकों को भी इस दिशा में लगाती ? सच बताऊं तो सड़कों पर बिखरे हजारों बुरांश के फूल देख कर ऐसा लगा कि जैसे कुदरत की कोई अमूल्य दौलत बिखरी पड़ी है और ऐसा कोई दीदावर इर्द गिर्द नहीं है जो उसके नूर की कद्र कर सके ।

आलोक तोमर का शांत हो जाना / हरीश पाठक

 हर साल 20 मार्च आती है,उसे आना ही है और उसके उगते और डूबते ही एक भय मेरे चारों ओर पसर जाता है।इस भय में शोकगीत का वह मुखड़ा दर्ज है जो तुम्हारी यादों का जलसा घर है।

      उस दिन भी 20 मार्च थी।साल था 2011 ।समय था 11 बजकर,10 मिनट जब दिल्ली के बत्रा अस्पताल में टूटी थी तुम्हारी साँस मेरे अजीज,मेरे दुख,सुख के साथी,साक्षी प्रिय आलोक तोमर।उस दिन भी आज की ही तरह इतवार था।

     मौसम में होली गीत थे पर मन में क्रंदन था।तुम्हारा, मेरा 33 साल का साथ एक झटके में टूटा था।तब मैं पटना में 'राष्ट्रीय सहारा' का स्थानीय संपादक था और होली मनाने मुम्बई आया था।अटैची दरवाजे पर ही रखी थी कि राहुल  देव के फोन ने यह बुरी खबर दी थी।

   तत्काल दिल्ली पहुँचा था और सोमवार की सुबह 10 बजे लोदी रोड के श्मसान में तुम हम सबके देखते देखते धुआँ धुआँ हो गये थे।

        आज तुम्हारे बगैर 11 साल बीत गये।

        अब तक रुलाता है वह पल।रुलाता ही रहेगा।पिछले 11सालों से कोई दिन ऐसा नहीं बीता जब तुम्हारी याद मन को व्यथित और आंखों को नम न करती हो।

        आज (20 मार्च) को सुबह से ही मन उदास है।आज तुम्हारी पुण्यतिथि है यानी वह दिन जिसे किसी ने कभी नहीं चाहा था पर स्वीकारना पड़ा-भारी

 मन से।

      क्या कर सकते थे?क्या कर सकते हैं?

      नमन मेरे हमदम,मेरे दोस्त।

सुदीप की बात निराली / हरीश पाठक

 सुदीप

       जन्म:1 अप्रैल,1942 गोजरा मंडी,          फैसलाबाद(पाकिस्तान)

       मृत्यु:25 जून,2020 (मुम्बई)


गुलशन अरोड़ा (सुदीप) हिंदी कहानी के वे अप्रतिम कथाकार थे जहाँ जीवन अपनी कुरूपता और सुंदरता दोनों रँगों में धड़कता था।वे समानान्तर कहानी आंदोलन के केंद्रीय पात्र थे।

     वे हिंदी के महत्वपूर्ण संपादक थे।सारिका,धर्मयुग,रविवार, शिक,सन्डे मेल,हमारा महानगर और अमर उजाला के संपादकीय विभाग से सम्बद्ध रहे सुदीप के अंतहीन,तीये से अट्ठा, लँगड़े कहानी संग्रह व साधु सिंह परचारी ,नीड़ व मिट्टी के पाँव जैसे बहुचर्चित उपन्यास आज भी हिंदी साहित्य में अपनी अलग जमीन रखते हैं।

      हिंदी के इस बेहतरीन कथाकार,उपन्यासकार,सम्पादक की आज जयंती है।यदि वे होते तो हम आज उनका 80वां जन्मदिन मना रहे होते।

      जयंती पर सादर नमन मेरे प्रिय कथाकार और मेरे पथ प्रदर्शक।आपको हर पल,हर क्षण याद करते हैं,करते रहेंगे-हम लोग।



कूट नीति

 *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...