सोमवार, 29 मई 2017

नौटंकी




मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
'सुल्ताना डाकू' नामक मशहूर नौटंकी के एक प्रदर्शन में देवेन्द्र शर्मा और पलक जोशी
एक और नौटंकी का नज़ारा
नौटंकी (نوٹنکی, Nautanki) उत्तर भारत, पाकिस्तान और नेपाल के एक लोक नृत्य और नाटक शैली का नाम है। यह भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीनकाल से चली आ रही स्वांग परम्परा की वंशज है और इसका नाम मुल्तान (पाकिस्तानी पंजाब) की एक ऐतिहासिक 'नौटंकी' नामक राजकुमारी पर आधारित एक 'शहज़ादी नौटंकी' नाम के प्रसिद्ध नृत्य-नाटक पर पड़ा।[1][2] नौटंकी और स्वांग में सबसे बड़ा अंतर यह माना जाता है कि जहाँ स्वांग ज़्यादातर धार्मिक विषयों से ताल्लोक रखता है और उसे थोड़ी गंभीरता से प्रदर्शित किया जाता है वहाँ नौटंकी के मौज़ू प्रेम और वीर-रस पर आधारित होते हैं और उनमें व्यंग्य और तंज़ मिश्रित किये जाते हैं। पंजाब से शुरू होकर नौटंकी की शैली तेज़ी से लोकप्रीय होकर पूरे उत्तर भारत में फैल गई। समाज के उच्च-दर्जे के लोग इसे 'सस्ता' और 'अश्लील' समझते थे लेकिन यह लोक-कला पनपती गई।[3]

अनुक्रम

इतिहास और विकास

अधिकतर समीक्षकों का मानना है कि 'नौटंकी स्वांग शैली का ही एक विकसित रूप है'।[4] नौटंकी कि कथाएँ अक्सर किसी व्यक्ति पर या महत्वपूर्ण विषय पर होती हैं, मसलन आल्हा-ऊदल की नौटंकी। इसी तरह, 'सुल्ताना डाकू' की नौटंकी इसी नाम के उत्तर प्रदेश के बिजनौर ज़िले में हुए एक डाकू की कहानी बताती है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उस विषय पर बहुत सी नौटंकियां हुईं थी जिन्होनें जन-साधारण को इस संग्राम में शामिल होने की प्रेरणा दी। आजकल दहेज़-कुप्रथा, आतंकवाद और साम्प्रदायिक लड़ाई-झगड़ों के विरुद्ध नौटंकियाँ देखी जा सकती हैं।[1] दर्शकों की रूचि बनाए रखने के लिए नौटंकियों में अक्सर प्रेम-सम्बन्ध के भी कुछ तत्व होते हैं जिनका प्रयोग अश्लीलता के लिए भी किया जा सकता है। इसलिए बहुत सी अश्लील नौटंकियाँ भी डेढ़-सौ साल से चलती आ रहीं हैं, जिस से अक्सर नौटंकी की शैली बदनाम भी होती आई है।[1] पारम्परिक रूप से नौटंकियों में पैसा बनाने के लिए यह ज़रूरी था कि दर्शकों को कभी भी ऊबने न दिया जाए, इसलिए अधिकतर नौटंकियों में १० मिनट या उस से कम अवधि की घटनाओं को एक सिलसिले में जोड़कर बनाया जाता है जिसमें हर भाग में दर्शकों की रूचि बनाए रखने की कोशिश की जाती है। कहानी दिलचस्प रखने के लिए वीरता, प्रेम, मज़ाक़, गाने-नाचने और धर्म को मिलाया जाता है और कथाकार प्रयास करता है की दर्शकों की भावनाएँ लगातार ऊपर-नीचे हों और बदलती रहें।

कविता

नौटंकी में कविता और साधारण बोलचाल को मिलाने की प्रथा शुरू से रही है। पात्र आपस में बातें करते हैं लेकिन गहरी भावनाओं और संदेशों को अक्सर तुकबंदी के ज़रिये प्रकट किया जाता है। गाने में सारंगी, तबले, हारमोनियम और नगाड़े जैसे वाद्य इस्तेमाल होते हैं।[5] मिसाल के लिए 'सुल्ताना डाकू' के एक रूप में सुल्ताना अपनी प्रेमिका को समझाता है कि वह ग़रीबों की सहायता करने के लिए पैदा हुआ है और इसीलिए अमीरों को लूटता है।[6] उसकी प्रेमिका (नील कँवल) कहती है कि उसे सुल्ताना की वीरता पर नाज़ है (इसमें रूहेलखंड की कुछ खड़ी-बोली है):
सुल्ताना
प्यारी कंगाल किस को समझती है तू?
कोई मुझ सा दबंगर न रश्क-ए-कमर
जब हो ख़्वाहिश मुझे लाऊँ दम-भर में तब
क्योंकि मेरी दौलत जमा है अमीरों के घर
नील कँवल
आफ़रीन, आफ़रीन, उस ख़ुदा के लिए
जिसने ऐसे बहादुर बनाए हो तुम
मेरी क़िस्मत को भी आफ़रीन, आफ़रीन
जिस से सरताज मेरे कहाए हो तुम
सुल्ताना
पा के ज़र जो न ख़ैरात कौड़ी करे
उन का दुश्मन ख़ुदा ने बनाया हूँ मैं
जिन ग़रीबों का ग़मख़्वार कोई नहीं
उन का ग़मख़्वार पैदा हो आया हूँ मैं
सुल्ताना
प्यारी कंगाल किस को समझती है तू?
कोई मुझ-सा दबंग नहीं
जब मेरी मर्ज़ी हो एक सांस में ला सकता हूँ
क्योंकि अमीरों की दौलत पर मेरा ही हक़ है
नील कँवल
वाह, वाह, उस ख़ुदा के लिए
जिसने ऐसे बहादुर बनाए हो तुम
मेरी क़िस्मत को भी वाह, वाह
जिस से सरताज मेरे कहाए हो तुम
सुल्ताना
पा के सोना जो कौड़ी भी न दान करे
ख़ुदा ने मुझे उनका दुश्मन बनाया है
जिन ग़रीबों का दर्द बांटने वाला कोई नहीं
उन का दर्द हटाने वाला बनकर मैं पैदा हुआ हूँ

उच्चारण

कृपया ध्यान दीजिये कि नौटंकी में अक्सर हिंदी-उर्दू के पारम्परिक शब्दों का प्रयोग होता है। 'ख़ैरात' और 'ख़ुदा' जैसे शब्दों में बिंदु-वाले 'ख़' का उच्चारण बिंदु-रहित 'ख' से ज़रा अलग है और 'ख़राब' और 'ख़रीद' जैसे शब्दों से मिलता-जुलता है। इसी तरह 'ग़रीब' और 'ग़म' जैसे शब्दों में बिंदु-वाले 'ग़' का उच्चारण बिंदु-रहित 'ग' से थोड़ा अलग है और 'ग़लत' और 'ग़ायब' जैसे शब्दों से मिलता है।

इन्हें भी देखें

बाहरी कड़ियाँ

सन्दर्भ


  • The world encyclopedia of contemporary theatre, Volume 3, Don Rubin, Taylor & Francis, 2001, ISBN 978-0-415-26087-9, ... The nautanki, performed in Uttar Pradesh, Punjab and Rajasthan, is an operatic drama which also belongs to the swang tradition. It has a limited dance content, and combines it with elements of singing, recitation, storytelling ...

  • Ideals, images, and real lives: women in literature and history, Alice Thorner, Sameeksha Trust (Bombay, India), Orient Blackswan, 2000, ISBN 978-81-250-0843-9, ... Perhaps the most striking instance is the story of Nautanki Shahzadi, The Princess Nautanki', whose name came to signify this theatre genre. 'Nautanki' means a woman whose weight is nine tanks (a tank equals four grams), implying that she was very delicate ...

  • The Politics of the Urban Poor in Early Twentieth-Century India, Nandini Gooptu, Cambridge University Press, 2001, ISBN 978-0-521-44366-1, ... Nautanki was the object of elite disapproval, being regarded as `low' or `lewd' in character and essentially a form of entertainment for the lower classes. In face, in urban areas, the main clientele of nautanki came from the bazar poor ...

  • अभिव्यक्ति, नारायण भक्त, ... यह कहना कठिन है कि नौटंकी का मंच कब स्थापित हुआ और पहली बार कब इसका प्रदर्शन हुआ, किंतु यह सभी मानते हैं कि नौटंकी स्वांग शैली का ही एक विकसित रूप है। भरत मुनि ने नाट्य शास्त्र में जिस सट्टक को नाटक का एक भेद माना है, इसके विषय में महाकवि एवं नाटककार जयशंकर प्रसाद तथा हज़ारी प्रसाद द्विवेदी का कहना है कि सट्टक नौटंकी के ढंग के ही एक तमाशे का नाम है।..'

  • Musical heritage of India, Manorma Sharma, APH Publishing, 2007, ISBN 978-81-313-0046-6, ... Nautanki is a highly musical play of western Uttar Pradesh. The music of Nautanki is not classical though based on the classical ragas. Nagara is the main musical instrument. Sarangi, Harmonium, Dholak and Dholaki are the other ...

    1. Grounds for Play: The Nautanki Theatre of North India, Kathryn Hansen, pp. 139, University of California Press, 1991, ISBN 978-0-520-07273-2, ... The opening chaubola states: 'It was his job to loot the treasuries of the rich / And always bring relief to the poor and helpless.' Somewhat later Sultana declares his mission to be that of an equalizer sent by God: 'For those who have found wealth and given not a penny to charity, God has made me the enemy. / For those who are poor and have no consoler, I have been born to share their sorrows.' ...

    शनिवार, 25 मार्च 2017

    देव सूर्य मंदिर ने जब बदल डाली अपनी दिशा







    खुद को बचाने के लिए देव सूर्य मंदिर ने बदल ली थी दिशा

    अमरेन्द्र किशोर


    बिहार के औरंगाबाद जिले के देव स्थित ऎतिहासिक त्रेतायुगीन पश्चिमाभिमुख सूर्य मंदिर अपनी विशिष्ट कलात्मक भव्यता के साथ साथ अपने इतिहास के लिए भी विख्यात है। कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने स्वयं अपने हाथों से किया है। इस मंदिर के बाहर संस्कृत में लिखे श्लोक के अनुसार 12 लाख 16 हजार वर्ष त्रेतायुग के गुजर जाने के बाद राजा इलापुत्र पुरूरवा ऐल ने इस सूर्य मंदिर का निर्माण प्रारम्भ करवाया था। शिलालेख से पता चलता है कि सन् 2014 ईस्वी में इस पौराणिक मंदिर के निर्माण काल को एक लाख पचास हजार चौदह वर्ष पूरे हो गए हैं।विश्व का एकमात्र पश्चिमाभिमुख सूर्यमंदिर हैदेव मंदिर में सात रथों से सूर्य की उत्कीर्ण प्रस्तर मूर्तियां अपने तीनों रूपों उदयाचल (प्रात:) सूर्य, मध्याचल (दोपहर) सूर्य, और अस्ताचल (अस्त) सूर्य के रूप में विद्यमान है। पूरे देश में यही एकमात्र सूर्य मंदिर है जो पूर्वाभिमुख न होकर पश्चिमाभिमुख है। करीब एक सौ फीट ऊंचा यह सूर्य मंदिर स्थापत्य और वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण है। बिना सीमेंट अथवा चूना-गारा का प्रयोग किए आयताकार, वर्गाकार, आर्वाकार, गोलाकार, त्रिभुजाकार आदि कई रू पों और आकारों में काटे गए पत्थरों को जोड़कर बनाया गया यह मंदिर अत्यंत आकर्षक एवं विस्मयकारी है।
    शिलालेख से पता चलता है कि पूर्व 2007 में इस पौराणिक मंदिर के निर्माणकाल का एक लाख पचास हजार सात वर्ष पूरा हुआ। पुरातत्वविद इस मंदिर का निर्माण काल आठवीं-नौवीं सदी के बीच का मानते हैं। मंदिर का शिल्प उड़ीसा के कोणार्क सूर्य मंदिर से मिलता है। देव सूर्य मंदिर दो भागों में बना है। पहला गर्भ गृह जिसके ऊपर कमल के आकार का शिखर है और शिखर के ऊपर सोने का कलश है। दूसरा भाग मुखमंडप है जिसके ऊपर पिरामिडनुमा छत और छत को सहारा देने के लिए नक्काशीदार पत्थरों का बना स्तम्भ है। तमाम हिन्दू मंदिरों के विपरीत पश्चिमाभिमुख देव सूर्य मंदिर देवार्क माना जाता है जो श्रद्धालुओं के लिए सबसे ज्यादा फलदायी एवं मनोकामना पूर्ण करने वाला है। जनश्रुतियों के आधार पर इस मंदिर के निर्माण के संबंध में कई किंवदतियां प्रसिद्ध है जिससे मंदिर के अति प्राचीन होने का स्पष्ट पता तो चलता है।सूर्य पुराण में भी है इस मंदिर की कहानीसूर्य पुराण के अनुसार ऎल एक राजा थे, जो किसी ऋषि के शापवश श्वेत कुष्ठ रोग से पीडित थे। वे एक बार शिकार करने देव के वनप्रांत में पहुंचने के बाद राह भटक गए। राह भटकते भूखे-प्यासे राजा को एक छोटा सा सरोवर दिखाई पडा जिसके किनारे वे पानी पीने गए और अंजुरी में भरकर पानी पिया। पानी पीने के क्रम में वे यह देखकर घोर आश्चर्य में पड़ गए कि उनके शरीर के जिन जगहों पर पानी का स्पर्श हुआ उन जगहों के श्वेत कुष्ठ के दाग जाते रहे। इससे अति प्रसन्न और आश्चर्यचकित राजा अपने वस्त्रों की परवाह नहीं करते हुए सरोवर के गंदे पानी में लेट गए और इससे उनका श्वेत कुष्ठ रोग पूरी तरह जाता रहा।शरीर में आशर्चजनक परिवर्तन देख प्रसन्नचित राजा ऎल ने इसी वन में रात्रि विश्राम करने का निर्णय लिया।
    रात्रि में राजा को स्वप्न आया कि उसी सरोवर में भगवान भास्कर की प्रतिमा दबी पड़ी है। प्रतिमा को निकालकर वहीं मंदिर बनवाने और उसमे प्रतिष्ठित करने का निर्देश उन्हें स्वप्न में प्राप्त हुआ। कहा जाता है कि राजा ऎल ने इसी निर्देश के मुताबिक सरोवर से दबी मूर्ति को निकालकर मंदिर में स्थापित कराने का काम किया और सूर्य कुंड का निर्माण कराया लेकिन मंदिर यथावत रहने के बावजूद उस मूर्ति का आज तक पता नहीं है। जो अभी वर्तमान मूर्ति है वह प्राचीन अवश्य है, लेकिन ऎसा लगता है मानो बाद में स्थापित की गई हो।देवशिल्पी विश्वकर्मा ने एक ही रात में बनाया था सूर्य मंदिरमंदिर निर्माण के संबंध में एक कहानी यह भी प्रचलित है कि इसका निर्माण एक ही रात में देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने अपने हाथों किया था। कहा जाता है कि इतना सुंदर मंदिर कोई साधरण शिल्पी बना ही नहीं सकता।
    कहा जाता है कि सूर्य मंदिर के पत्थरों में विजय चिन्ह व कलश अंकित हैं। विजय चिन्ह यह दर्शाता है कि शिल्प के कलाकार ने सूर्य मंदिर का निर्माण कर के ही शिल्प कला पर विजय प्राप्त की थी। देव सूर्य मंदिर के स्थापत्य कला के बारे में कई तरह की किंवदंतियाँ है। मंदिर के स्थापत्य से प्रतीत होता है कि मंदिर के निर्माण में उड़िया स्वरूप नागर शैली का समायोजन किया गया है। नक्काशीदार पत्थरों को देखकर भारतीय पुरातत्व विभाग के लोग मंदिर के निर्माण में नागर एवं द्रविड़ शैली का मिश्रित प्रभाव वाली वेसर शैली का भी समन्वय बताते है। इसके काले पत्थरों की नक्काशी अप्रतिम है और देश में जहां भी सूर्य मंदिर है, उनका मुंह पूर्व की ओर है, लेकिन यही एक मंदिर है जो सूर्य मंदिर होते हुए भी प्रात:कालीन सूर्य की रश्मियों का अभिषेक नहीं कर पाता वरन अस्ताचलगामी सूर्य की किरणें ही मंदिर का अभिषेक करती हैं।
    जनश्रुति है कि एक बार बर्बर लुटेरा काला पहाड़ मूर्तियों एवं मंदिरों को तोड़ता हुआ यहां पहुंचा तो देव मंदिर के पुजारियों ने उससे काफी विनती की कि इस मंदिर को न तोडें क्योंकि यहां के भगवान का बहुत बड़ा महात्म्य है। इस पर वह हंसा और बोला यदि सचमुच तुम्हारे भगवान में कोई शक्ति है तो मैं रात भर का समय देता हूं तथा यदि इसका मुंह पूरब से पश्चिम हो जाए तो मैं इसे नहीं तोडूंगा। पुजारियों ने सिर झुकाकर इसे स्वीकार कर लिया और वे रातभर भगवान से प्रार्थना करते रहे। सबेरे उठते ही हर किसी ने देखा कि सचमुच मंदिर का मुंह पूरब से पश्चिम की ओर हो गया था और तब से इस मंदिर का मुंह पश्चिम की ओर ही है।
    हर साल चैत्र और कार्तिक के छठ मेले में लाखों लोग विभिन्न स्थानों से यहां आकर भगवान भास्कर की आराधना करते हैं भगवान भास्कर का यह त्रेतायुगीन मंदिर सदियों से लोगों को मनोवांछित फल देने वाला पवित्र धर्मस्थल रहा है। यूं तो सालों भर देश के विभिन्न जगहों से लोग यहां मनौतियां मांगने और सूर्यदेव द्वारा उनकी पूर्ति होने पर अर्ध्य देने आते हैं।
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    गुरुवार, 23 मार्च 2017

    प्रेम / ओशो



     

     

    ओशो की नजर में प्रेम / प्रेम की नजर में ओशो

     

    प्रेम, संबंध नहीं है

    प्रेम शब्द जितना मिसअंडरस्टुड है, जितना गलत समझा जाता है, उतना शायद मनुष्य की भाषा में कोई दूसरा शब्द नहीं! प्रेम के संबंध में जो गलत-समझी है, उसका ही विराट रूप इस जगत के सारे उपद्रव, हिंसा, कलह, द्वंद्व और संघर्ष हैं। प्रेम की बात इसलिए थोड़ी ठीक से समझ लेनी जरूरी है। जैसा हम जीवन जीते हैं, प्रत्येक को यह अनुभव होता होगा कि शायद जीवन के केंद्र में प्रेम की आकांक्षा और प्रेम की प्यास और प्रेम की प्रार्थना है। जीवन का केंद्र अगर खोजना हो, तो प्रेम के अतिरिक्त और कोई केंद्र नहीं मिल सकता है।

    समस्त जीवन के केंद्र में एक ही प्यास है, एक ही प्रार्थना है, एक ही अभीप्सा है--वह अभीप्सा प्रेम की है।

    और वही अभीप्सा असफल हो जाती हो तो जीवन व्यर्थ दिखायी पड़ने लगे--अर्थहीन, मीनिंगलेस, फस्ट्रेशन मालूम पड़े, विफलता मालूम पड़े, चिंता मालूम पड़े तो कोई आश्चर्य नहीं है। जीवन की केंद्रीय प्यास ही सफल नहीं हो पाती है! न तो हम प्रेम दे पाते हैं और न उपलब्ध कर पाते हैं। और प्रेम जब असफल रह जाता है, प्रेम का बीज जब अंकुरित नहीं हो पाता, तो सारा जीवन व्यर्थ-व्यर्थ, असार-असार मालूम होने लगता है।

    जीवन की असारता प्रेम की विफलता का फल है।
    जब प्रेम सफल होता है, तो जीवन सार बन जाता है। प्रेम विफल होता है तो जीवन प्रयोजनहीन मालूम होने लगता है। प्रेम सफल होता है, जीवन एक सार्थक, कृतार्थता और धन्यता में परिणित हो जाता है।

    लेकिन यह प्रेम है क्या? यह प्रेम की अभीप्सा क्या है? यह प्रेम की पागल प्यास क्या है? कौन-सी बात है, जो प्रेम के नाम से हम चाहते हैं और नहीं उपलब्ध कर पाते हैं?

    जीवन भर प्रयास करते हैं? सारे प्रयास प्रेम के आसपास ही होते हैं। युद्ध प्रेम के आसपास लड़े जाते हैं। धन प्रेम के आसपास इकट्ठा किया जाता है। यश की सीढ़ियां प्रेम के लिए पार की जाती हैं। संन्यास प्रेम के लिए लिया जाता है। घर-द्वार प्रेम के लिए बसाये जाते हैं और प्रेम के लिए छोड़े जाते हैं। जीवन का समस्त क्रम प्रेम की गंगोत्री से निकलता है।

    जो लोग महत्वाकांक्षा की यात्रा करते हैं, पदों की यात्रा करते हैं, यश की कामना करते हैं, क्या आपको पता है, वे सारे लोग यश के माध्यम से जो प्रेम से नहीं मिला है, उसे पा लेने की कोशिश करते हैं! जो लोग धन की तिजोरियां भरते चले जाते हैं, अंबार लगाते जाते हैं, क्या आपको पता है, जो प्रेम से नहीं मिला, वह पैसे के संग्रह से पूरा करना चाहते हैं! जो लोग बड़े युद्ध करते हैं और बड़े राज्य जीतते हैं, क्या आपको पता है, जिसे वे प्रेम में नहीं जीत सके, उसे भूमि जीतकर पूरा करना चाहते हैं!

    शायद आपको खयाल में न हो, लेकिन मनुष्य-जीवन का सारा उपक्रम, सारा श्रम, सारी दौड़, सारा संघर्ष अंतिम रूप से प्रेम पर ही केंद्रित है। लेकिन यह प्रेम की अभीप्सा क्या है? पहले इसे हम समझें तो और बात समझी जा सकेगी।

    जैसा मैंने कल कहा, मनुष्य का जन्म होता है, मां से टूट जाता है संबंध शरीर का। अलग एक इकाई अपनी यात्रा शुरू कर देती है। अकेली एक इकाई जीवन के इस विराट जगत में अकेली यात्रा शुरू कर देती है! एक छोटी-सी बूंद समुद्र से छलांग लगा गयी है और अनंत आकाश में छूट गयी है। एक छोटे-से रेत का कण तट से उड़ गया है और हवाओं में भटक गया है। मां से व्यक्ति अलग होता है। एक बूंद टूट गयी सागर से और अनंत आकाश में भटक गयी है। वह बूंद वापस सागर से जुड़ना चाहती है। वह जो व्यक्ति है, वह फिर समष्टि के साथ एक होना चाहता है। वह जो अलग हो जाना है, वह जो पार्थक्य है, वह फिर से समाप्त होना चाहता है।

    प्रेम की आकांक्षा--एक हो जाने की, समस्त के साथ एक हो जाने की आकांक्षा है।
    प्रेम की आकांक्षा, अद्वैत की आकांक्षा है।
    प्रेम की एक ही प्यास है, एक हो जाये सबसे; जो है, समस्त से संयुक्त हो जाये।

    जो पार्थक्य है, जो व्यक्ति का अलग होना है, वही पीड़ा है व्यक्ति की। जो व्यक्ति का सबसे दूर खड़े हो जाना है, वही दुख है, वही चिंता है। वापस बूंद सागर के साथ एक होना चाहती है।

    प्रेम की आकांक्षा समस्त जीवन के साथ एक हो जाने की प्यास और प्रार्थना है। प्रेम का मौलिक भाव एकता खोजना है।

    लेकिन जिन-जिन दिशाओं में हम यह एकता खोजते हैं, वहीं-वहीं असफल हो जाते हैं। जहां-जहां यह एकता खोजी जाती है, वहीं-वहीं असफल हो जाते हैं। शायद जिन मार्गों से हम एकता खोजते हैं, वे मार्ग ही अलग करने वाले मार्ग हैं, एक करने वाले मार्ग नहीं। इसलिए प्रेम के नाम से झूठे सिक्के प्रचलित हो गये हैं।

    मनुष्य जो एकता खोजता है, वह शरीर के तल पर खोजता है। लेकिन शायद आपको पता नहीं, पदार्थ के तल पर जगत में कोई भी एकता संभव नहीं है। शरीर के तल पर कोई भी एकता संभव नहीं है। पदार्थ अनिवार्य रूप से एटामिक है, आणविक है और एक-एक अणु अलग-अलग है। दो अणु पास तो हो सकते हैं, लेकिन एक नहीं हो सकते। निकट हो सकते हैं, लेकिन एक नहीं हो सकते। दो अणुओं के बीच अनिवार्य रूप से जगह शेष रह जायेगी, फासला, डिस्टेंस शेष रह जायेगा।

    पदार्थ की सत्ता एटामिक है, आणविक है। प्रत्येक अणु दूसरे अणु से अलग है। हम लाख उपाय करें तो भी दो अणु एक नहीं हो सकते। उनके बीच में फासला है, उनके बीच में दूरी शेष रह ही जायेगी। ये हाथ हम कितने ही निकट ले आयें, ये हाथ हमें जुड़े हुए मालूम पड़ते हैं, लेकिन ये हाथ फिर भी दूर हैं। इनके जोड़ में भी फासला है। इन दोनों हाथ में बीच में दूरी है, वह दूरी समाप्त नहीं हो सकती।

    प्रेम में हम किसी को हृदय से लगा लेते हैं। दो देह पास आ जाती हैं, लेकिन दूरी बरकरार रहती है, दूरी मौजूद रह जाती है। इसलिए हृदय से लगाकर भी किसी को पता चलता है कि हम अलग-अलग हैं, पास नहीं हो पाये हैं, एक नहीं हो पाये हैं। शरीर को निकट लेने पर भी, वह जो एक होने की कामना थी, अतृप्त रह जाती है। इसलिए शरीर के तल पर किये गये सारे प्रेम असफल हो जाते हों, तो आश्चर्य नहीं। प्रेमी पाता है कि असफल हो गये। जिसके साथ एक होना चाहा था, वह पास तो आ गया; लेकिन एक नहीं हो पाये। लेकिन उसे यह नहीं दिखायी पड़ता कि यह शरीर की सीमा है कि शरीर के तल पर एक नहीं हुआ जा सकता, पदार्थ के तल पर एक नहीं हुआ जा सकता, मैटर के तल पर एक नहीं हुआ जा सकता। यह स्वभाव है पदार्थ का कि वहां पार्थक्य होगा, दूरी होगी, फासला होगा।

    लेकिन प्रेमी को यह नहीं दिखायी पड़ता है! उसे तो यह दिखायी पड़ता है कि शायद जिसे मैंने प्रेम किया है, वह मुझे ठीक से प्रेम नहीं कर पा रहा है, इसलिए दूरी रह गयी है। शरीर के तल पर एकता खोजना नासमझी है, यह उसे नहीं दिखायी पड़ता! लेकिन दूसरा--प्रेमी दूसरी तरफ जो खड़ा है, जिससे उसने प्रेम की आकांक्षा की थी, वह शायद प्रेम नहीं कर रहा है, इसलिए एकता उपलब्ध नहीं हो पा रही। उसका क्रोध प्रेमी पर पैदा होता है, लेकिन दिशा ही गलत थी प्रेम की, यह खयाल नहीं आता! इसलिए दुनिया भर में प्रेमी एक-दूसरे पर क्रुद्ध दिखायी पड़ते हैं। पति-पत्नी एक-दूसरे पर क्रुद्ध दिखायी पड़ते हैं!

    सारे जगत में प्रेमी एक-दूसरे के ऊपर क्रोध से भरे हुए हैं, क्योंकि वह आकांक्षा जो एक होने की थी, वह विफल हो गयी है, असफल हो गयी है। और वे सोच रहे हैं कि दूसरे के कारण असफल हो गयी है! प्रत्येक यही सोच रहा है कि दूसरे के कारण असफल हो गया हूं, इसलिए दूसरे पर क्रोध कर रहा है! लेकिन मार्ग ही गलत था। प्रेम शरीर के तल पर नहीं खोजा जा सकता था, इसका स्मरण नहीं आता है।

    इस एकता की दौड़ में, जिसे हम प्रेम करते हैं, उसे हम "पजेस' करना चाहते हैं, उसके हम पूरे मालिक हो जाना चाहते हैं! कहीं ऐसा न हो कि मालकियत कम रह जाये, पजेशन कम रह जाये तो एकता कम रह जाये। इसलिए प्रेमी एक-दूसरे के मालिक हो जाना चाहते हैं। मुट्ठी पूरी कस लेना चाहते हैं। दीवाल पूरी बना लेना चाहते हैं कि प्रेमी कहीं दूर न हो जाये, कहीं हट न जाये, कहीं दूसरे मार्ग पर न चला जाये, किसी और के प्रेम में संलग्न न हो जाये। तो प्रेमी एक-दूसरे को पजेस करना चाहते हैं, मालकियत करना चाहते हैं।

    और उन्हें पता नहीं कि प्रेम कभी मालिक नहीं होता। जितनी मालकियत की कोशिश होती है, उतना फासला बड़ा होता चला जाता है, उतनी दूरी बढ़ती चली जाती है; क्योंकि प्रेम हिंसा नहीं है, मालकियत हिंसा है, मालकियत शत्रुता है। मालकियत किसी की गर्दन को मुट्ठी में बांध लेना है। मालकियत जंजीर है। लेकिन प्रेम भयभीत होता है कि कहीं मेरा फासला बड़ा न हो जाये, इसलिए निकट, और निकट, और सब तरफ से सुरक्षित कर लूं ताकि प्रेम का फासला नष्ट हो जाये, दूरी नष्ट हो जाये। जितनी यह चेष्टा चलती है दूरी नष्ट करने की, दूरी उतनी बड़ी होती चली जाती है। विफलता हाथ लगती है, दुख हाथ लगता है, चिंता हाथ लगती है।

    फिर आदमी सोचता है कि यह प्रेम शायद इस व्यक्ति से पूरा नहीं हो पाया है, इसलिए दूसरे व्यक्ति को खोजूं। शायद यह व्यक्ति ही गलत है। तब आंखें दूसरे प्रेमियों की खोज में भटकती हैं, लेकिन बुनियादी गलती वहीं की वहीं बनी रहती है। शरीर के तल पर एकता असंभव है, यह ख्याल नहीं आता! यह शरीर और वह शरीर का सवाल नहीं है। सभी शरीर के तल पर एकता असंभव है।

    आज तक मनुष्य-जाति शरीर के तल पर एकता और प्रेम को खोजती रही है, इसलिए जगत में प्रेम जैसी घटना घटित नहीं हो पायी।
    जैसा मैंने आपसे कहा, यह जो पजेशन और मालकियत की चेष्टा चलती है, स्वभावतः उसके आसपासर् ईष्या का जन्म होगा।
    जहां मालकियत है, वहांर् ईष्या है। जहां पजेशन है, वहां जेलसी है।
    इसलिए प्रेम के फूल के आसपासर् ईष्या के बहुत कांटे, बहुत बागुड़ खड़े हो जाते हैं औरर् ईष्या की आग के बीच प्रेम कुम्हला जाता हो, तो आश्चर्य नहीं। वह जन्म भी नहीं पाता है कि जलना शुरू हो जाता है! जन्म भी नहीं हो पाता कि चिता पर सवारी शुरू हो जाती है!

    जैसे किसी बच्चे को पैदा होते ही हमने चिता पर रख दिया हो, ऐसे ही प्रेमर् ईष्या की चिता पर रोज चढ़ जाता है।र् ईष्या वहां पैदा होती है, जहां मालकियत हैं। जहां मैंने कहा, "मैं', "मेरा', वहां डर है कि कहीं कोई और मालिक न हो जाये।र् ईष्या शुरू हो गयी, भय शुरू हो गया, घबराहट शुरू हो गयी, चिंता शुरू हो गयी, पहरेदारी शुरू हो गयी। और ये सारे के सारे मिलकर प्रेम की हत्या कर देते हैं। प्रेम को किसी पहरे की कोई जरूरत नहीं। प्रेम का,र् ईष्या से कोई नाता नहीं है।

    जहांर् ईष्या है, वहां प्रेम संभव नहीं है। जहां प्रेम है, वहांर् ईष्या संभव नहीं है।

    लेकिन प्रेम है ही नहीं। प्रेम के किनारे जाकर आदमी की नौका टूट जाती है। जो नौका बननी चाहिए थी, जिस पर हम यात्रा करते, वह टूट जाती है; क्योंकि हमने प्रेम को बिलकुल ही गलत प्रारंभ से शुरू किया है।

    पहली बात आपसे यह कहना चाहता हूं, पदार्थ के तल पर कोई प्रेम संभव नहीं है। वह इम्पासीबिलिटी है। वह मेरी और आपकी असफलता नहीं है, वह मनुष्य-जाति, जीवन के लिए, असंभावना है। पदार्थ के तल पर कोई एकता उपलब्ध नहीं हो सकती।

    जब तक यह एकता उपलब्ध नहीं होती, सब तरफ चिंता और विफलता दिखायी पड़ती है, तो कुछ शिक्षक यह कहने लगते हैं कि यह प्रेम ही गलत है, यह प्रेम की बात ही गलत है, प्रेम का विचार ही गलत है! छोड़ो प्रेम के भाव को, उदासीन हो जाओ! जीवन को उदासी से भर लो, जीवन से प्रेम की सब जड़ें काट दो! यह दूसरी गलती है।

    प्रेम गलत दिशा में गया था, इसलिए असफल हुआ है। प्रेम असफल नहीं हुआ, गलत दिशा असफल हुई है। लेकिन कुछ लोग इसका अर्थ लेते हैं कि प्रेम असफल हो गया है!

    तो अप्रेम की शिक्षाएं हैं--अपने प्रेम को सिकोड़ लो, बंद कर लो, अपने से बाहर मत जाने दो! अपने से बाहर तो बंधन बनेगा, मोह बनेगा, आसक्ति बनेगा! अपने भीतर बंद कर लो! प्रेम को बाहर मत बहने दो! उदासीन जीवन के प्रति हो जाओ! प्रेम की खोज ही बंद कर दो! एक यह दिशा पैदा होती है। यह विफलता का ही परिणाम है, यह रिएक्शन है फस्ट्रेशन का।

    प्रेम की तरफ पीठ करके जाने वाले लोग उसी गलती में हैं, जिस गलती में प्रेम को शरीर के तल पर खोजने वाले लोग थे।

    दिशा गलत थी, प्रेम की खोज गलत नहीं थी। लेकिन दिशा गलत है, यह नहीं दिखायी पड़ा! दिखायी पड़ा कि प्रेम की खोज ही गलत है। तो प्रेम से उदासीन शिक्षकों का जन्म हुआ, जिन्होंने प्रेम की निंदा की, प्रेम को बुरा कहा, प्रेम को बंधन बताया, प्रेम को पाप कहा; ताकि व्यक्ति अपने में बंद हो जाये। लेकिन उन्हें इस बात का पता न रहा कि व्यक्ति जब प्रेम की संभावना छोड़ देगा, तो उसके पास सिर्फ अहंकार की संभावना शेष रह जाती है, और कुछ भी शेष नहीं रह जाता। प्रेम अकेला तत्व है, जो अहंकार को तोड़ता है और मिटाता है। प्रेम अकेला रसायन है, जिसमें अहंकार गलता है और पिघलता है और बह जाता है। जो लोग प्रेम से वंचित अपने को कर लेंगे, वे सिर्फ ईगोइस्ट हो सकते हैं, सिर्फ अहंकारी हो सकते हैं और कुछ भी नहीं। उनके पास अहंकार को गलाने और तोड़ने का कोई उपाय न रहा, कोई मार्ग न रहा।

    प्रेम स्वयं के बाहर ले जाता है। प्रेम अकेला द्वार है, जिससे हम अपने बाहर निकलते हैं और अनंत की यात्रा पर चरण रखते हैं। प्रेम जो अनन्य है, जो जगत है, जो जीवन है, उससे जोड़ता है।

    लेकिन जो प्रेम की यात्रा बंद कर देते हैं, वे टूटकर सिर्फ अपने "मैं' में, अपने अहंकार में, अपने ईगो में कैद हो जाते हैं, बंद हो जाते हैं। एक तरफ विफल प्रेमी हैं, दूसरी तरफ अहंकार से भरे हुए साधु और संन्यासी हैं! अहंकार इस बात की स्वीकृति है जैसा मैंने कहा। प्रेम इस बात की खोज है कि मैं सबके साथ एकता खोज लूं, समष्टि के साथ एक हो जाऊं। अहंकार इस बात का निर्णय है कि मैंने एकता खोजनी बंद कर दी।

    "मैं' मैं हूं। मैं अलग ही रहूंगा। मैं अपनी सत्ता से निश्चिंत हो गया हूं। मैंने मान लिया कि "मैं' मैं हूं। बूंद ने स्वीकार कर लिया कि सागर से मिलना असंभव है या मिलने की कोई जरूरत नहीं है! यह बूंद जो अपने में बंद हो गयी, यह भी आनंद को उपलब्ध नहीं हो सकती। यह सिकुड़ गयी, बहुत छोटी हो गयी, बहुत क्षुद्र हो गयी।

    अहंकार क्षुद्र कर देता है, सिकोड़ देता है, बहुत छोटा बना देता है।
    जहां सीमा है, वहां अंत है, वहां मृत्यु है। जहां सीमा नहीं है, वह अनंत है, वहां अमृत है। क्योंकि जहां सीमा नहीं, वहां अंत नहीं, वहां मृत्यु नहीं। अहंकारी क्षुद्र के साथ जुड़ जाता है। अपने को अलग मानकर ठहर जाता है; रुक जाता है, पिघलने से, बह जाने से, मिट जाने से; सबके साथ एक हो जाने से अपने को रोक लेता है!

    मैंने सुना है, एक नदी समुद्र की तरफ यात्रा कर रही थी, जैसे कि सभी नदियां समुद्र की तरफ यात्रा करती हैं। भागी चली जा रही थी नदी समुद्र की तरफ। कौन खींचे लिए जाता था?

    मिलन की कोई आशा, एक हो जाने की, विराट के साथ संयुक्त हो जाने की कोई कामना, किनारों को तोड़ देने की, सीमाओं को तोड़ देने की, तटहीन सागर के साथ एक हो जाने की--कोई प्यास नदी को भगाये ले जा रही थी। नदियां भाग रही हैं। वह नदी भी भाग रही थी--कोई प्रेम।

    जैसे प्रत्येक मनुष्य की चेतना भाग रही है, भाग रही है, अनंत के सागर के साथ एक होने को, वैसी वह नदी भी भाग रही थी। लेकिन बीच में आ गया मरुस्थल। बड़ा था मरुस्थल। नदी उसमें खोने लगी। नदी दौड़ने लगी तेजी से--संघर्ष करने लगी! तोड़ देगी! उसने पहाड़ तोड़े थे, उसने घाट तोड़े थे, उसने मार्ग बनाये थे। वह इस मरुस्थल में भी मार्ग बना लेगी। लेकिन महीनों बीत गये, सालों बीतने लगे, मार्ग नहीं बन पाया। नदी मरुस्थल में खोती चली जाती है, रेत उसे पीती चली जाती है! राह नहीं बनती। और तब नदी घबरायी और रोने लगी।

    उस मरुस्थल की रेत ने कहा, अगर हमारी सुनो तो एक बात स्मरण रखो। मरुस्थल को केवल वे ही नदियां पार कर सकती हैं, जो हवाओं के साथ एक हो जाती हैं, जो अपने को खो देती हैं और हवाओं के साथ एक हो जाती हैं। जो अपने को मिटा देती हैं। जैसे ही वे अपने को मिटाती हैं, हवाएं उन्हें अपने कंधों पर उठा लेती हैं और फिर मरुस्थल पार हो जाता है। मरुस्थल से लड़कर कोई कभी पार नहीं होता। मरुस्थल के ऊपर उठकर पार होता है। बहुत नदियां आयी हैं इस मरुस्थल को पार करने, वे खो गयीं। केवल वे ही नदियां उठ पायी हैं, जिन्होंने अपने को खो दिया, भाप हो गयीं, हवाओं के कंधों पर उठ गयीं, मरुस्थल को पार गयीं।

    लेकिन वह नदी कहने लगी, मैं मिट जाऊंगी? मैं मिटना नहीं चाहती हूं। मैं बनी रहना चाहती हूं।

    तो सागर की रेत ने कहा कि अगर बनी रहना चाहोगी तो मिट जाओगी। और अगर मिट जाओगी, तो बनी भी रह सकती हो!

    पता नहीं, उस नदी ने उस सागर की रेत की बात सुनी या नहीं। जरूर सुन ली होगी, क्योंकि नदियां आदमियों जैसी नासमझ नहीं होतीं। वह सवार हो गयी होगी हवाओं के ऊपर। पार कर गयी होगी, बादल बन गयी होगी, उठ गयी होगी ऊपर, उसने नयी दिशा में यात्रा कर ली होगी।

    लेकिन आदमी का अहंकार लड़-लड़ कर टूट जाता है, लेकिन मिटने को राजी नहीं होता। लड़ता है, टूटता है, लेकिन मिटने को राजी नहीं होता! जितना लड़ता है, उतना ही टूटता है, उतना ही नष्ट होता है। क्योंकि किससे हम लड़ रहे हैं? स्वयं की जड़ों से! किससे हम लड़ रहे हैं? स्वयं के ही विराट रूप से! किससे हम लड़ रहे हैं? स्वयं की ही सत्ता से! टूटेंगे, मिटेंगे, नष्ट होंगे--दुखी होंगे, पीड़ित होंगे, प्रेम से जो बचता है।

    स्मरण रहे, प्रेम, मैंने कहा, एक हो जाने की आकांक्षा है। और एक वही हो सकता है, जो मिटने को राजी हो। एक वही हो सकता है, जो मिटने को राजी हो। जो मिटने को राजी नहीं होता, उसके लिए दूसरी दिशा खुल जाती है। वह अहंकार की दिशा है। तब वह अपने को बनाने को, मजबूत करने को, पुष्ट करने को, ज्यादा सख्त अपने आसपास दीवाल उठाने को, किला बनाने को उत्सुक हो जाता है! अपने "मैं' को मजबूत करने की यात्रा में संलग्न हो जाता है।

    प्रेमी असफल हो गये, क्योंकि शरीर के तल पर एकता खोजी। संन्यासी असफल हो जाते हैं, क्योंकि अहंकार के तल पर अलग होने का निर्णय करते हैं। क्या कोई तीसरा मार्ग नहीं है?

    उसी तीसरे मार्ग की आपसे बात कहना चाहता हूं।
    अहंकार तो कोई मार्ग नहीं है। अहंकार तो दुख की दिशा है, अहंकार तो भ्रांति है। "मैं' जैसी कोई चीज ही नहीं है भीतर, सिवाय शब्द के। जब सब शब्द छूट जाते हैं और आदमी मौन होता है तो पाता है कि वहां कोई "मैं' नहीं है।

    कभी मौन होकर देखें। कभी चुप होकर देखें, कभी शांत होकर देखें, वहां फिर कोई "मैं' नहीं पाया जाता। वहां कोई "मैं' नहीं है। वहां एक्जिसटेंस है, वहां सत्ता है, अस्तित्व है। लेकिन "मैं' नहीं है।

    "मैं' मनुष्य की ईजाद है। "मैं' मनुष्य का आविष्कार है। बिलकुल झूठा। उतना ही झूठा, जैसे हमारे नाम झूठे हैं। क्यों?

    कोई आदमी किसी नाम को लेकर पैदा नहीं होता। लेकिन जन्म के बाद हम नाम दे देते हैं, ताकि दूसरे लोग उसे पुकार सकें, बुला सकें। नाम की उपयोगिता है, युटिलिटी है, लेकिन नाम की कोई सत्ता नहीं, कोई अस्तित्व नहीं। दूसरे लोग नाम लेकर बुलाते हैं, मैं खुद क्या कहकर अपने को बुलाऊं? मैं अपने को "मैं' कहकर बुलाता हूं। "मैं' खुद के लिए, खुद को पुकारने के लिए दिया गया नाम है। और नाम दूसरों को पुकारने के लिए दिये गये नाम हैं।

    नाम भी उतना ही असत्य है, जितना "मैं' का भाव असत्य है।

    लेकिन इसी "मैं' को हम--इसी "मैं' को मजबूत करते चले जाते हैं! "मैं' को मोक्ष चाहिए, "मैं' को परमात्मा चाहिए --इसी "मैं' को सुख चाहिए! लेकिन "मैं' को कुछ भी नहीं मिल सकता है, क्योंकि "मैं' बिलकुल झूठ है, "मैं' असत्य है। जो असत्य है, उसे कुछ भी नहीं मिल सकता है।

    "मैं' भी असफल हो जाता है और प्रेम भी असफल हो जाता है। और दो ही दिशाएं है--एक प्रेम की दिशा है और एक अहंकार की दिशा है। मनुष्य के जगत में दो मार्गों के अतिरिक्त कोई तीसरा मार्ग नहीं है--एक "मैं' का, एक प्रेम का।

    प्रेम असफल होता है, क्योंकि हम शरीर के तल पर खोजते हैं।
    "मैं' असफल होता हैं, क्योंकि असत्य है।
    तीसरा क्या हो सकता है? तीसरा यह हो सकता है कि हम "मैं' की सम्यक दिशा खोजें, प्रेम की सम्यक दिशा खोजें, और "मैं' की असम्यक दिशा से बचें।

    प्रेम शरीर के तल पर नहीं, चेतना के तल पर घटने वाली घटना है।

    शरीर के तल पर जब प्रेम को हम घटाने की कोशिश करते हैं, तो प्रेम आब्जेक्टिव हो जाता है। कोई पात्र होता है प्रेम का, उसकी तरफ हम प्रेम को बहाने की कोशिश करते हैं। वहां से प्रेम वापस लौट आता है, क्योंकि पात्र शरीर होता है, जो दिखायी पड़ता है, जो स्पर्श में आता है।

    लेकिन प्रेम को अगर आत्मिक घटना बनानी है, अगर प्रेम की कांशसनेस बनाना है, चेतना बनाना है तो प्रेम आब्जेक्टिव नहीं रह जाता, सब्जेक्टिव हो जाता है। तब प्रेम एक संबंध नहीं, चित्त की एक दशा है, स्टेट आफ माइंड है।

    बुद्ध एक सुबह बैठे हैं और एक आदमी आ गया है। वह बहुत क्रोध में है। उसने बुद्ध को बहुत गालियां दी हैं और फिर इतने क्रोध से भर गया है कि उसने बुद्ध के मुंह के ऊपर थूक दिया है! बुद्ध ने अपने चादर से वह थूक पोंछ लिया और उससे कहा, मित्र, कुछ और कहना है? भिक्षु आनंद बुद्ध के पास बैठा है। वह क्रोध से भर गया है। और बुद्ध की यह बात सुनकर कि वे कहते हैं कि कुछ और कहना है, वह और हैरान हो गया है। और उसने कहा, "आप क्या कहते हैं? यह आदमी थूक रहा है और आप पूछते हैं, कुछ और कहना है!'

    बुद्ध ने कहा, "मैं समझ रहा हूं, शायद क्रोध इतना भारी हो गया है कि शब्द कहने में असमर्थ मालूम होते होंगे, इसलिए उसने थूककर कोई बात कही है। मैं समझ गया हूं, उसने कुछ कहा है। अब मैं पूछता हूं, और कुछ कहना है?

    वह आदमी उठ गया है, लौट गया है। पछताया है, रात भर सो नहीं सका है। दूसरे दिन सुबह क्षमा मांगने आया है। बुद्ध के चरणों में उसने सिर रख दिया। सिर उठाया, बुद्ध ने कहा, और कुछ कहना है?

    वह आदमी कहने लगा, कल भी आप यही कहते थे! बुद्ध ने कहा, आज भी वही कहता हूं। शायद कुछ कहना चाहते हो। शब्द कहने में असमर्थ थे, इसलिए सिर पैरों पर रखकर कह दिया है। कल थूक कर कहा था। पूछता हूं, कुछ और कहना है?

    वह आदमी बोला, कुछ और नहीं, क्षमा मांगने आया हूं। रात भर सो नहीं सका। मन में यह ख्याल हुआ, आज तक आपका प्रेम मिला मुझे, आज थूक आया हूं आपके ऊपर, अब शायद वह प्रेम मुझे नहीं मिल सकेगा। बुद्ध खूब हंसने लगे और उन्होंने कहा, सुनते हो आनंद, यह आदमी कैसी पागलपन की बातें कहता है! यह कहता है कि कल तक मुझे आपका प्रेम मिला और कल मैंने थूक दिया तो अब प्रेम नहीं मिलेगा! तो शायद यह सोचता है कि यह मेरे ऊपर नहीं थूकता था, इसलिए मैं इसे प्रेम करता था, जो थूकने से प्रेम बंद हो जायेगा! पागल है तू! मैं प्रेम इसलिए करता हूं कि मैं प्रेम ही कर सकता हूं और कुछ नहीं कर सकता हूं। तू थूके, तू गाली दे, तू पैरों पर सिर रखे, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता । मैं प्रेम ही कर सकता हूं। मेरे भीतर प्रेम का दीया जल गया। अब मेरे पास से जो भी निकले, उस पर प्रेम पड़ेगा। कोई न निकले तो एकांत में प्रेम का दीया जलता रहेगा। अब इसका किसी से कोई संबंध न रहा। अब यह कोई संबंध न रहा, यह मेरा स्वभाव हो गया है।

    प्रेम जब तक किसी से संबंध है, तब तक, आप शरीर के तल पर प्रेम खोज रहे हैं, जो असफल हो जायेगा। प्रेम जब जीवन के भीतर, स्वयं के भीतर जला हुआ एक दीया बनता है--रिलेशनशिप नहीं, स्टेट आफ माइंड--जब किसी से प्रेम एक संबंध नहीं है, बल्कि मेरा प्रेम स्वभाव बनता है, तब, तब जीवन में प्रेम की घटना घटती है। तब प्रेम का असली सिक्का हाथ में आता है। तब यह सवाल नहीं है कि किससे प्रेम, तब यह सवाल नहीं है कि किस कारण प्रेम। तब प्रेम अकारण है, तब प्रेम इससे-उससे नहीं है, तब प्रेम है। कोई भी हो तो प्रेम के दीये का प्रकाश उस पर पड़ेगा। आदमी हो तो आदमी, वृक्ष हो तो वृक्ष, सागर हो तो सागर, चांद हो तो चांद, कोई न हो तो फिर एकांत में प्रेम का दीया जलता रहेगा। प्रेम परमात्मा तक ले जाने का द्वार है। लेकिन जिस प्रेम को हम जानते हैं, वह सिर्फ नर्क तक ले जाने का द्वार बनता है। जिस प्रेम को हम जानते हैं, वह पागलखानों तक ले जाने का द्वार बनता है। जिस प्रेम को हम जानते हैं, वह कलह, द्वंद्व, संघर्ष, हिंसा, क्रोध, घृणा, इन सबका द्वार बनता है। वह प्रेम झूठा है।

    जिस प्रेम की मैं बात कर रहा हूं, वह प्रभु तक ले जाने का मार्ग बनता है, लेकिन वह प्रेम संबंध नहीं है। वह प्रेम स्वयं के चित्त की दशा है, उसका किसी से कोई नाता नहीं, आपसे नाता है। इस प्रेम के संबंध में थोड़ी बात समझ लेनी, और इस प्रेम को जगाने की दिशा में कुछ स्मरणीय बातें समझ लेनी जरूरी हैं।

    पहली बात, जब तक आप प्रेम को एक संबंध समझते रहेंगे, एक रिलेशनशिप, तब तक आप असली प्रेम को उपलब्ध नहीं हो सकेंगे। वह बात ही गलत है। वह प्रेम की परिभाषा ही भ्रांति है।

    जब तक मां सोचती है कि बेटे से प्रेम, मित्र सोचता है मित्र से प्रेम, पत्नी सोचती है पति से प्रेम, भाई सोचता है बहन से प्रेम, जब तक संबंध की भाषा में कोई प्रेम को सोचता है, तब तक उसके जीवन में प्रेम का जन्म नहीं हो सकता है।

    संबंध की भाषा में नहीं, किससे प्रेम नहीं; मेरा प्रेमपूर्ण होना है। मेरा प्रेमपूर्ण होना अकारण, असंबंधित, चौबीस घंटे मेरा प्रेमपूर्ण होना है। किसी से बंधकर नहीं, किसी से जुड़कर नहीं, मेरा अपने आपमें प्रेमपूर्ण होना हैं। यह प्रेम मेरा स्वभाव, मेरी श्वास बने। श्वास आये, जाये, ऐसा मेरा प्रेम--चौबीस घंटे सोते, जागते, उठते हर हालत में। मेरा जीवन प्रेम की भाव-दशा, एक लविंग एटिटयूड, एक सुगंध, जैसे फूल से सुगंध गिरती है।

    किसके लिए गिरती है? राह से जो निकलते हैं, उनके लिए? फूल को शायद पता भी न हो कि कोई राह से निकलेगा। किसके लिए, जो फूल को तोड़कर माला बना लेंगे और भगवान के चरणों में चढ़ा देंगे, उनके लिए? किसके लिए--फूल की सुगंध किसके लिए गिरती है? किसी के लिए नहीं। फूल के अपने आनंद से गिरती है। फूल के अपने खिलने से गिरती है। फूल खिलता है, यह उसका आनंद है। सुगंध बिखर जाती है।

    दीये से रोशनी बरसती है, किसके लिए? कोई अंधेरे रास्ते पर न भटक जाये इसलिए? किसी को रास्ते के गङ्ढे दिखायी पड़ जायें इसलिए?

    दिखायी पड़ जाते होंगे, यह दूसरी बात है; लेकिन दीये की रोशनी अपने लिए, अपने आनंद से, अपने स्वभाव से, गिरती और बरसती है।

    प्रेम भी आपका स्वभाव बने--उठते, बैठते, सोते, जागते; अकेले में, भीड़ में, वह बरसता रहे फूल की सुगंध की तरह, दीये की रोशनी की तरह, तो प्रेम प्रार्थना बन जाता है, तो प्रेम प्रभु तक ले जाने का मार्ग बन जाता है, तो प्रेम जोड़ देता है समस्त से, सबसे, अनंत से।

    इसका यह अर्थ नहीं है कि प्रेम तब संबंध नहीं बनेगा। वैसा प्रेम चौबीस घंटे संबंध बनेगा, लेकिन संबंधों पर सीमित नहीं होगा। उसके प्राण संबंधों के ऊपर से आते होंगे। गहरे से आते होंगे। तब भी पत्नी पत्नी होगी, पति पति होगा, पिता पिता होगा, मां मां होगी। तब भी बेटे पर प्रेम गिरेगा। लेकिन बेटे के कारण नहीं, मां के अपने प्रेम के कारण। तब भी पत्नी का प्रेम चलेगा, बहेगा; लेकिन पति के कारण नहीं, अपने कारण। क्वालिटी भीतर होगी, भीतर से आयेगी और बहेगा। बाहर से कोई खींचेगा और बहेगा नहीं, भीतर से आयेगा और बहेगा। वह अंतरभाव होगा, बाहर से खींचा गया नहीं।

    अभी हम सब बाहर से खींचे गये प्रेम पर जी रहे हैं, इसलिए वह प्रेम कलह बन जाता है। जो भी चीज जबरदस्ती खींची गयी है, वह दुख और पीड़ा बन जाती है। जो भीतर से स्पॉनटेनियस, सहज प्रकट हुई है, वह बात और हो जाती है। वह बात ही और हो जाती है। तब जीवन बहुत प्रेमपूर्ण होगा, लेकिन प्रेम एक संबंध नहीं होगा। साधक को स्मरण रखना है कि प्रेम उसकी चित्त दशा बने तो ही प्रभु के मार्ग पर, सत्य के मार्ग पर यात्रा की जा सकती है, तो ही उसके मंदिर तक पहुंचा जा सकता है।

    पहली बात, संबंध में प्रेम के भाव को भूल जायें। वह परिभाषा गलत है, वह प्रेम को देखने का ढंग गलत है। जब कोई गलत ढंग गलत दिखायी पड़ जाये, तो फिर ठीक ढंग देखा जा सकता है। तो पहली बात है, जो "फाल्स लव' है, वह जो झूठा प्रेम है, जो संबंध को प्रेम समझता है, उसकी व्यर्थता को समझ लें। वह सिवाय असफलता के और चिंता के कहीं भी नहीं ले जायेगा।

    फिर दूसरी बात है। वह दूसरी बात यह है कि क्या आपके भीतर से प्रेम का जन्म हो सकता है? भीतर से! बाहर कोई भी न हो तो भी? हो सकता है। जब भी प्रेम का जन्म हुआ है तो वैसे ही हुआ है।

    हमारे भीतर वह छिपा है बीज, जो फूट सकता है, लेकिन हमने कभी उस पर ध्यान नहीं दिया! हम संबंध वाले प्रेम पर ही जीवन भर संघर्ष करते रहे हैं। हमने कभी ध्यान नहीं दिया उसके--उसके पार भी कोई प्रेम की संभावना है, कोई रूप है। हम हमेशा रेत से तेल निकालने की कोशिश करते रहे हैं। रेत से तो तेल नहीं निकला, निकल नहीं सकता था, लेकिन रेत से तेल निकालने में हम भूल ही गये कि ऐसे बीज भी थे, जिनसे तेल निकल सकता था।

    हम सब संबंध वाले प्रेम से जीवन को निकालने की कोशिश कर रहे हैं! वहां से नहीं निकला है, नहीं निकलेगा, लेकिन समय खोता है, शक्ति खोती है। और जहां से निकल सकता था, उस तरफ ध्यान भी नहीं जाता है!

    प्रेम चित्त की एक दशा की तरह पैदा होता है। बस वैसा ही पैदा होता है। जब भी होता है, वैसा ही पैदा होता है। उसे कैसे पैदा करें, वह कैसे जन्म ले ले, वह बीज कैसे टूट जाये और अंकुरित हो जाये? तीन बातें, तीन सूत्र इस संबंध में स्मरण रख लेने चाहिए।

    पहली बात, जब अकेले में हों तब--तब भीतर खोज करें, क्या मैं प्रेमपूर्ण हो सकता हूं? जब कोई न हो, तब खोज करें, क्या मैं प्रेमपूर्ण हो सकता हूं? क्या अकेले में लविंग--क्या अकेले में, एकांत में भी आंखें ऐसी हो सकती हैं, जैसे प्रेम-पात्र मौजूद हो? क्या अकेले में, शून्य में, एकांत में, खाली में भी मेरे प्राणों से प्रेम की धाराएं उस रिक्त स्थान को भर सकती हैं, जहां कोई नहीं, कोई पात्र नहीं, कोई आब्जेक्ट नहीं? क्या वहां भी प्रेम मुझसे बह सकता है? इसको ही मैं प्रार्थना कहता हूं। उसको नहीं प्रार्थना कहता कि हाथ जोड़े मंदिरों में बैठे हैं! एकांत में जो प्रेम को बहाने में सफल हो रहा है, कोशिश कर रहा है, वह प्रार्थना में है, वह प्रेयरफुल मूड में है। तो अकेले में बैठकर देखें कि क्या मैं प्रेमपूर्ण हो सकता हूं? लोगों के साथ प्रेमपूर्ण होकर बहुत देख लिया होगा आपने। अब अकेले में थोड़ी खोज करें, क्या मैं प्रेमपूर्ण हो सकता हूं?

    पहला सूत्र, एकांत में प्रेमपूर्ण होने का प्रयोग करें, खोजें, टटोलें अपने भीतर। हो जायेगा, होता है, हो सकता है। जरा भी कठिनाई नहीं है। कभी प्रयोग ही नहीं किया उस दिशा में, इसलिए ख्याल में बात नहीं आ पायी है। निर्जन में भी फूल खिलते हैं और सुगंध फैला देते हैं। निर्जन में, एकांत में प्रेम की सुगंध को पकड़ें। जब एक बार एकांत में प्रेम की सुगंध पकड़ जायेगी तो आपको खयाल आ जायेगा कि प्रेम कोई रिलेशनशिप नहीं, कोई संबंध नहीं।

    प्रेम स्टेट आफ माइंड है, स्टेट आफ कांशसनेस है, चेतना की एक अवस्था है।
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    कूट नीति

     *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...