तू इस तरह से मेरी ज़िंदग़ी में शामिल है


माशूका की मौत ने बनाया था शायर, पिता के जनाजे में नहीं गए थे,
शायर निदा फाजली नहीं रहे। मुंबई में दिल का दौरा पड़ने से 78 साल की उम्र में 8 फरवरी को उनका इंतकाल हो गया। निदा को प्‍यार ने शायर बनाया था। कॉलेज में उनके आगे की पंक्ति में एक लड़की बैठा करती थी। उससे उन्‍हें लगाव महसूस होने लगा था। पर एक दिन नोटिस बोर्ड पर […]Author जनसत्ता ऑनलाइन February 8, 2016 19:33 pm
4 1 G+0
दंगों से तंग आ कर निदा फाजली के माता-पिता पाकिस्तान जा के बस गए थे।
शायर निदा फाजली नहीं रहे। मुंबई में दिल का दौरा पड़ने से 78 साल की उम्र में 8 फरवरी को उनका इंतकाल हो गया। निदा को प्‍यार ने शायर बनाया था। कॉलेज में उनके आगे की पंक्ति में एक लड़की बैठा करती थी। उससे उन्‍हें लगाव महसूस होने लगा था। पर एक दिन नोटिस बोर्ड पर पढ़ने को मिला, “Miss Tondon met with an accident and has expired”। निदा का दिल रोने लगा। पर उन्‍हें महसूस हुआ कि उन्‍होंने अब तक कुछ भी ऐसा नहीं लिखा जो उनका यह गम बयां कर सके।
एक सुबह वह एक मंदिर के पास से गुजर रहे थे। वहां उन्होंने किसी को सूरदास का भजन मधुबन तुम क्यौं रहत हरे? बिरह बियोग स्याम सुंदर के ठाढ़े क्यौं न जरे? गाते सुना। इसमें कृष्ण के मथुरा से द्वारका चले जाने पर उनके वियोग में डूबी राधा और गोपियां फुलवारी से पूछ रही होती हैं ऐ फुलवारी, तुम हरी क्यों बनी हुई हो? कृष्ण के वियोग में तुम खड़े-खड़े क्यों नहीं जल गईं? निदा को लगा कि उनके अंदर दबा गम का सागर बांध तोड़ कर निकल पड़ा है। फिर उन्होंने कबीरदास, तुलसीदास, बाबा फ़रीद आदि को पढ़ा। उनसे प्रेरित होकर सरल-सपाट शब्‍दों में लिखना सीखा। फिर, जब‍ लिखने लगे तो वह बेजोड़ होता। निदा ने अपने अब्‍बा के इंतकाल पर जो नज्‍म लिखी, वह शायद इसकी इंतहा थी। इसे पढ़‍िए और पिता की मौत पर एक बेटे की भावनाएं समझिए:
तुम्हारी कब्र पर मैं
फ़ातेहा पढ़ने नही आया,
मुझे मालूम था, तुम मर नही सकते
तुम्हारी मौत की सच्ची खबर
जिसने उड़ाई थी, वो झूठा था,
वो तुम कब थे?
कोई सूखा हुआ पत्ता, हवा मे गिर के टूटा था ।
मेरी आँखे
तुम्हारी मंज़रो मे कैद है अब तक
मैं जो भी देखता हूँ, सोचता हूँ
वो, वही है
जो तुम्हारी नेक-नामी और बद-नामी की दुनिया थी ।
कहीं कुछ भी नहीं बदला,
तुम्हारे हाथ मेरी उंगलियों में सांस लेते हैं,
मैं लिखने के लिये जब भी कागज कलम उठाता हूं,
तुम्हे बैठा हुआ मैं अपनी कुर्सी में पाता हूं |
बदन में मेरे जितना भी लहू है,
वो तुम्हारी लगजिशों नाकामियों के साथ बहता है,
मेरी आवाज में छुपकर तुम्हारा जेहन रहता है,
मेरी बीमारियों में तुम मेरी लाचारियों में तुम |
तुम्हारी कब्र पर जिसने तुम्हारा नाम लिखा है,
वो झूठा है, वो झूठा है, वो झूठा है,
तुम्हारी कब्र में मैं दफन तुम मुझमें जिन्दा हो,
कभी फुरसत मिले तो फ़ातेहा पढनें चले आना |
निदा के माता-पिता पाकिस्‍तान जाकर बस गए थे। पर वह भारत में ही रहे। उनका जन्‍म 1938 में 12 अक्‍तूबर (सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक) दिल्ली में हुआ था। पिता मुर्तुज़ा हसन और मां जमील फ़ातिमा के घर में वह तीसरी संतान थे। मां-बाप ने उनका नाम मुक़्तदा हसन रखा था। पिता खुद शायर थे। बचपन में वह ग्‍वालियर में रहे। वहीं पढ़ाई हुई। 1958 में वहीं से पीजी किया।
दंगों से तंग आ कर उनके माता-पिता पाकिस्तान जा के बस गए, लेकिन निदा नहीं गए। कॉलेज के बाद नौकरी के लिए संघर्ष शुरू हुआ। 1964 में मुंबई चले गए। वहां पत्र-पत्रिकाओं में लिखने के साथ शुरुआत की। जल्‍द ही पहचान मिली। नाम मिला। 1969 में उर्दू कविता का पहला संग्रह भी आया। फिर बॉलीवुड में भी सफर शुरू हुआ।
बॉलीवुड में पहला मौका किस्‍मत लेकर आई थी। फ़िल्म प्रोड्यूसर-निर्देशक-लेखक कमाल अमरोही उन दिनों फ़िल्म रज़िया सुल्ताना (हेमा मालिनी, धर्मेन्द्र अभिनीत) बना रहे थे। इस फिल्‍म के गीत लिखने की जिम्‍मेदारी जाँनिसार अख़्तर को दी गई थी। लेकिन एक दिन अचानक अख्‍तर साहब दुनिया को अलविदा कह गए। वह ग्वालियर से ही थे और निदा की कलम की ताकत से वाकिफ थी। उन्‍होंने इसका जिक्र कमाल अमरोही से भी कर रखा था। कमाल को निदा की यादा आई। उन्‍होंने फ़िल्म के बाकी दो गाने लिखने की जिम्‍मेदारी निदा फाजली को दे दी। इस तरह जब बॉलीवुड में निदा की शुरुआत हुई। और खूब शुरुआत हुई। उनके लिखे कुछ गाने ये हैं-
तेरा हिज्र मेरा नसीब है, तेरा गम मेरी हयात है (फ़िल्म रज़िया सुल्ताना)। यह उनका लिखा पहला फ़िल्मी गाना था।
आई ज़ंजीर की झन्कार, ख़ुदा ख़ैर कर (फ़िल्म रज़िया सुल्ताना)
होश वालों को खबर क्या, बेखुदी क्या चीज है (फ़िल्म सरफ़रोश)
कभी किसी को मुक़म्मल जहाँ नहीं मिलता (फ़िल्म आहिस्ता-आहिस्ता)
तू इस तरह से मेरी ज़िंदग़ी में शामिल है (फ़िल्म आहिस्ता-आहिस्ता)
चुप तुम रहो, चुप हम रहें (फ़िल्म इस रात की सुबह नहीं)
दुनिया जिसे कहते हैं, मिट्टी का खिलौना है (ग़ज़ल)
हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी (ग़ज़ल)
अपना ग़म लेके कहीं और न जाया जाये (ग़ज़ल)
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निदा फाजली: माशूका की मौत ने बनाया था शायर, पिता के जनाजे में नहीं गए थे, शेर लिख दी थी श्रद्धांजलि
शायर निदा फाजली नहीं रहे। मुंबई में दिल का दौरा पड़ने से 78 साल की उम्र में 8 फरवरी को उनका इंतकाल हो गया। निदा को प्‍यार ने शायर बनाया था। कॉलेज में उनके आगे की पंक्ति में एक लड़की बैठा करती थी। उससे उन्‍हें लगाव महसूस होने लगा था। पर एक दिन नोटिस बोर्ड पर […]
Author जनसत्ता ऑनलाइन February 8, 2016 19:33 pm
4 1 G+0
दंगों से तंग आ कर निदा फाजली के माता-पिता पाकिस्तान जा के बस गए थे।
शायर निदा फाजली नहीं रहे। मुंबई में दिल का दौरा पड़ने से 78 साल की उम्र में 8 फरवरी को उनका इंतकाल हो गया। निदा को प्‍यार ने शायर बनाया था। कॉलेज में उनके आगे की पंक्ति में एक लड़की बैठा करती थी। उससे उन्‍हें लगाव महसूस होने लगा था। पर एक दिन नोटिस बोर्ड पर पढ़ने को मिला, “Miss Tondon met with an accident and has expired”। निदा का दिल रोने लगा। पर उन्‍हें महसूस हुआ कि उन्‍होंने अब तक कुछ भी ऐसा नहीं लिखा जो उनका यह गम बयां कर सके।
एक सुबह वह एक मंदिर के पास से गुजर रहे थे। वहां उन्होंने किसी को सूरदास का भजन मधुबन तुम क्यौं रहत हरे? बिरह बियोग स्याम सुंदर के ठाढ़े क्यौं न जरे? गाते सुना। इसमें कृष्ण के मथुरा से द्वारका चले जाने पर उनके वियोग में डूबी राधा और गोपियां फुलवारी से पूछ रही होती हैं ऐ फुलवारी, तुम हरी क्यों बनी हुई हो? कृष्ण के वियोग में तुम खड़े-खड़े क्यों नहीं जल गईं? निदा को लगा कि उनके अंदर दबा गम का सागर बांध तोड़ कर निकल पड़ा है। फिर उन्होंने कबीरदास, तुलसीदास, बाबा फ़रीद आदि को पढ़ा। उनसे प्रेरित होकर सरल-सपाट शब्‍दों में लिखना सीखा। फिर, जब‍ लिखने लगे तो वह बेजोड़ होता। निदा ने अपने अब्‍बा के इंतकाल पर जो नज्‍म लिखी, वह शायद इसकी इंतहा थी। इसे पढ़‍िए और पिता की मौत पर एक बेटे की भावनाएं समझिए:
तुम्हारी कब्र पर मैं
फ़ातेहा पढ़ने नही आया,
मुझे मालूम था, तुम मर नही सकते
तुम्हारी मौत की सच्ची खबर
जिसने उड़ाई थी, वो झूठा था,
वो तुम कब थे?
कोई सूखा हुआ पत्ता, हवा मे गिर के टूटा था ।
मेरी आँखे
तुम्हारी मंज़रो मे कैद है अब तक
मैं जो भी देखता हूँ, सोचता हूँ
वो, वही है
जो तुम्हारी नेक-नामी और बद-नामी की दुनिया थी ।
कहीं कुछ भी नहीं बदला,
तुम्हारे हाथ मेरी उंगलियों में सांस लेते हैं,
मैं लिखने के लिये जब भी कागज कलम उठाता हूं,
तुम्हे बैठा हुआ मैं अपनी कुर्सी में पाता हूं |
बदन में मेरे जितना भी लहू है,
वो तुम्हारी लगजिशों नाकामियों के साथ बहता है,
मेरी आवाज में छुपकर तुम्हारा जेहन रहता है,
मेरी बीमारियों में तुम मेरी लाचारियों में तुम |
तुम्हारी कब्र पर जिसने तुम्हारा नाम लिखा है,
वो झूठा है, वो झूठा है, वो झूठा है,
तुम्हारी कब्र में मैं दफन तुम मुझमें जिन्दा हो,
कभी फुरसत मिले तो फ़ातेहा पढनें चले आना |
निदा के माता-पिता पाकिस्‍तान जाकर बस गए थे। पर वह भारत में ही रहे। उनका जन्‍म 1938 में 12 अक्‍तूबर (सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक) दिल्ली में हुआ था। पिता मुर्तुज़ा हसन और मां जमील फ़ातिमा के घर में वह तीसरी संतान थे। मां-बाप ने उनका नाम मुक़्तदा हसन रखा था। पिता खुद शायर थे। बचपन में वह ग्‍वालियर में रहे। वहीं पढ़ाई हुई। 1958 में वहीं से पीजी किया।
दंगों से तंग आ कर उनके माता-पिता पाकिस्तान जा के बस गए, लेकिन निदा नहीं गए। कॉलेज के बाद नौकरी के लिए संघर्ष शुरू हुआ। 1964 में मुंबई चले गए। वहां पत्र-पत्रिकाओं में लिखने के साथ शुरुआत की। जल्‍द ही पहचान मिली। नाम मिला। 1969 में उर्दू कविता का पहला संग्रह भी आया। फिर बॉलीवुड में भी सफर शुरू हुआ।
बॉलीवुड में पहला मौका किस्‍मत लेकर आई थी। फ़िल्म प्रोड्यूसर-निर्देशक-लेखक कमाल अमरोही उन दिनों फ़िल्म रज़िया सुल्ताना (हेमा मालिनी, धर्मेन्द्र अभिनीत) बना रहे थे। इस फिल्‍म के गीत लिखने की जिम्‍मेदारी जाँनिसार अख़्तर को दी गई थी। लेकिन एक दिन अचानक अख्‍तर साहब दुनिया को अलविदा कह गए। वह ग्वालियर से ही थे और निदा की कलम की ताकत से वाकिफ थी। उन्‍होंने इसका जिक्र कमाल अमरोही से भी कर रखा था। कमाल को निदा की यादा आई। उन्‍होंने फ़िल्म के बाकी दो गाने लिखने की जिम्‍मेदारी निदा फाजली को दे दी। इस तरह जब बॉलीवुड में निदा की शुरुआत हुई। और खूब शुरुआत हुई। उनके लिखे कुछ गाने ये हैं-
तेरा हिज्र मेरा नसीब है, तेरा गम मेरी हयात है (फ़िल्म रज़िया सुल्ताना)। यह उनका लिखा पहला फ़िल्मी गाना था।
आई ज़ंजीर की झन्कार, ख़ुदा ख़ैर कर (फ़िल्म रज़िया सुल्ताना)
होश वालों को खबर क्या, बेखुदी क्या चीज है (फ़िल्म सरफ़रोश)
कभी किसी को मुक़म्मल जहाँ नहीं मिलता (फ़िल्म आहिस्ता-आहिस्ता)
तू इस तरह से मेरी ज़िंदग़ी में शामिल है (फ़िल्म आहिस्ता-आहिस्ता)
चुप तुम रहो, चुप हम रहें (फ़िल्म इस रात की सुबह नहीं)
दुनिया जिसे कहते हैं, मिट्टी का खिलौना है (ग़ज़ल)
हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी (ग़ज़ल)
अपना ग़म लेके कहीं और न जाया जाये (ग़ज़ल)
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