ग़ुस्से और नाराज़गी की आवाज़ थे दुष्यंत / निदा फाजली








एक महान शायर निदा फाजली द्वारा हिन्दी के पहले शायर गजलकार के तौर पर स्थापित और सर्वमान्य दुष्यंत कुमार की रचनाधर्मिता का मूल्यांकन





दुष्यंत कुमार ने उसी आम आदमी की बात कही जिसकी बात कबीर और नज़ीर करते रहे। भारत में उत्तर प्रदेश हिंदी-उर्दू साहित्य की दृष्टि से बड़ा अमीर प्रांत है.
इसके हर नगर की मिट्टी में वह इतिहास सोया हुआ है, जिसको जाने बग़ैर न देश की सियासत को समझा जा सकता है और न इसकी संस्कृति विरासत को समझा जा सकता है.
राही मासूम रज़ा ने इसे 52 बेटों की माँ की उपमा से याद किया है. 52 कस्बों के इस प्रांत के एक नगर में कुछ दिन पहले मेरा जाने का इत्तिफाक़ हुआ था. शहरनुमा इस छोटी सी बस्ती बिजनौर में मुशायरा था. मुशायरे से पहले बस्ती में मुझे इधर-उधर धुमाया जा रहा था. मैं बातों में व्यस्त था-आँखें सुनने वालों के चेहरे पर थी और ज़मीन पर चल रहे थे पाँव.
रास्ता उत्तरप्रदेश के हर नगर की तरह मजनूँ के रेगिस्तान जैसा था जिस पर चलना आसान नहीं था. अचानक ठोकर लगी, पत्थर ने रोक कर चलते हुए क़दमों से मेरा नाम पूछा था. पैरों में जुबान नहीं थी...वे खामोश रहे. बस पत्थर मियाँ नाराज़ हो गए...मैं लड़खड़ा गया तो साथ वाले ने सहारा दिया और मुस्कुराते हुए कहा, "हुज़ूर यह बिजनौर है...यहाँ हर चीज़ क़ाबिले गौर है."
इस पत्थर की नाराज़गी पर मुझे अपना एक शेर याद आया,
पत्थरों की भी जुबाँ होती हैं दिल होते हैं
अपने घर के दरो-दीवार सजा कर देखो
सर सैयद अहमद खाँ के साथी शिब्ली नौमानी ने इस्लाम के पैगम्बर हज़रत मोहम्मद की आत्मकथा की पहली किताब, 'सीरतुन्नबी' के नाम से लिखी थी. इस किताब के चौथे संकलन में एक हदीस के हवाले से लिखा है, "हज़रत मोहम्मद ने एक शाम की यात्रा में एक पत्थर को देखकर फरमाया था-मैं इस पत्थर को पहचानता हूँ जो पैगम्बरी से पहले मुझे सलाम किया करता था."
बिजनौर के रास्ते के पत्थर ने मुझसे भी बात की थी. लेकिन मैं ठहरा एक साधारण इंसान. उसकी बात पर ध्यान नहीं दे पाया और उसने क्रोध में आकर मुझे ठोकर मार दी...ख़ैर मैंने उस पत्थर को मुआफ़ कर दिया क्योंकि वह उस नगर का पत्थर था जहाँ कभी मिर्ज़ा ग़ालिब के प्रख्यात आलोचक अब्दुर्रहमान बिजनौरी रहते थे.
ग़ालिब के संबंध में उनका एक वाक्य काफ़ी मशहूर हुआ, "भारत में दो ही महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं, वेद मुकद्दस (पावन) और दूसरा दीवाने ग़ालिब." पता नहीं अब्दुर्रहमान बिजनौरी को वेदों की संख्या का ज्ञान था या नहीं. लेकिन एक पुस्तक की चार ग्रंथों से तुलना तर्क संगत नहीं लगती. फिर भी यह वाक्य बिजनौर के एक क़लमकार की कलम से निकला था और पूरे उर्दू-संसार में मशहूर हुआ.
ग़ज़ल का संसार
इस नगर के साथ दूसरा नाम जो याद आता है वह हिंदी ग़ज़लकार दुष्यंत कुमार का है.
दुष्यंत नाम के दर्शन पहली बार महान नाटककार कालीदास की नाट्य रचना 'शाकुंतलम' में होते हैं. उसमें यह नाम एक राजा का था, जो शकुंतला को अपने प्रेम की निशानी के रूप में एक अंगूठी देकर चला जाता है. और शकुंतला की जीवन यात्रा इसी अंगूठी के खोने और पाने के इर्द-गिर्द धूमती रहती है, उज्जैन नगरी के राजा दुष्यंत के सदियों बाद बिजनौर की धरती ने एक और दुष्यंत कुमार को जन्म दिया.
इस बार वह राजा नहीं थे, त्यागी थे. दुष्यंत कुमार त्यागी. इस दुष्यंत कुमार त्यागी के पास न राजा का अधिकार था, न अंगूठी का उपहार और न ही पहली नज़र में होने वाला प्यार था. 20वीं सदी के दुष्यंत को कालीदास के युग की विरासत में से बहुत कुछ त्यागना पड़ा. इस नए जन्म में वह आम आदमी थे. आम आदमी का समाज उनका समाज था. आम आदमी की लड़ाई में शामिल होना उनका रिवाज़ था. आम आदमी की तरह उनकी मंजिल भी सड़क, पानी और अनाज था.
इस आम आदमी का रूप उनके शेरों में कुछ इस तरह है-
हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
अब हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
इस नुमाइश में मिला वह चीथड़े पहने हुए
मैंने पूछा कौन, तो बोला कि हिंदुस्तान हूँ.
यहाँ तक आते-आते सूख जाती है कई नदियाँ
हमें मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा
कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हरेक घर के लिए
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए
ये सारे शेर उन ग़ज़लों के हैं जो उनकी ग़ज़लों के संग्रह ‘साए में धूप’ में है.
यह पुस्तक उनके जीवन (जन्म-1933, मृत्यु-1975) की आख़िरी पुस्तक है. इन ग़ज़लों तक आते-आते वह नई कविता, नाटक और उपन्यासों की कई कृतियों से गुज़र चुके थे. इन कृतियों में 'एक कंठ विषपायी', 'सूर्य का स्वागत', 'आवाज़ों के घेरे', 'जलते हुए वन का बसंत', 'छोटे-छोटे सवाल' और दूसरी गद्य तथा कविता की किताबें शामिल हैं.
हैदराबाद के लोकप्रिय प्रगतिशील शायर मख़दूम मुहउद्दीन ने कहा था, "शायर को ग़ज़ल उम्र के कम से कम 40 साल पूरे करके शुरू करनी चाहिए." मख़दूम ने इशारे में ग़ज़ल विधा के संबंध में बहुत अहम बात कही है. इसके द्वारा उन्होंने ग़ज़ल में ख़याल की खपत, इस खपत में शब्दों की बुनत और इस बुनत में ध्वनियों की चलत को आईना दिखाया गया है. ग़ज़ल विचार भी है और अभिव्यक्ति का मैयार भी.

दुष्यंत की नज़र उनके युग की नई पीढ़ी के ग़ुस्से और नाराज़गी से सजी बनी है. यह ग़ुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मो के ख़िलाफ़ नए तेवरों की आवाज़ थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमानंदगी करती है

दुष्यंत साहित्य में बहुत कुछ कर के और जीवन की बड़ी धूप-छाँव से गुज़र के ग़ज़ल विधा की ओर आए थे. दुष्यंत जिस समय ग़ज़ल संसार में दाखिल हुए उस समय भोपाल प्रगतिशील शायरों-ताज भोपाली और कैफ भोपाली की ग़ज़लों से जगमगा रहा था, इनके साथ हिंदी में जो आम आदमी अज्ञेय के ड्राइंगरूम से और मुक्तिबोध की काव्यभाषा से बाहर कर दिया गया था. बड़ी खामोशी से नागार्जुन और धूमिल की 'संसद से सड़क तक' की कविताओं में मुस्कुरा रहा था. इसी जमाने में फ़िल्मों में एक नए नाराज़ हीरो का आम आदमी के रूप में उदय हो रहा था.
दुष्यंत की ग़ज़ल के इर्द-गिर्द के समाज को जिन आँखों से देखा और दिखाया जा रहा था वह वही आदमी था जो पहले कबीर, नज़ीर और तुकाराम के यहाँ नज़र आया था, जिसने नागार्जुन और धूमिल के शब्दों को धारदार बनाया था. उसी ने दुष्यंत की ग़ज़ल को चमकाया था.
दुष्यंत की नज़र उनके युग की नई पीढ़ी के ग़ुस्से और नाराज़गी से सजी बनी है. यह ग़ुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मो के ख़िलाफ़ नए तेवरों की आवाज़ थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमानंदगी करती है.
विषय की तब्दीली के कारण, उनकी ग़ज़ल के क्राफ्ट में भी तब्दीली नज़र आती जो कहीं-कहीं लाउड भी महसूस होती है. लेकिन इस तब्दीली ने उनके ग़ज़ल को नए मिज़ाज के क़रीब भी किया है.
दुष्यंत ने केवल देश के आम आदमी से ही हाथ नहीं मिलाया उस आदमी की भाषा को भी अपनाया और उसी के द्वारा अपने दौर का दुख-दर्द गाया...
जिएँ तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए

निदा फ़ाज़ली
शायर और लेखक

दुष्यंत कुमार
दुष्यंत कुमार ने उसी आम आदमी की बात कही जिसकी बात कबीर और नज़ीर करते रहे
भारत में उत्तर प्रदेश हिंदी-उर्दू साहित्य की दृष्टि से बड़ा अमीर प्रांत है.
इसके हर नगर की मिट्टी में वह इतिहास सोया हुआ है, जिसको जाने बग़ैर न देश की सियासत को समझा जा सकता है और न इसकी संस्कृति विरासत को समझा जा सकता है.
राही मासूम रज़ा ने इसे 52 बेटों की माँ की उपमा से याद किया है. 52 कस्बों के इस प्रांत के एक नगर में कुछ दिन पहले मेरा जाने का इत्तिफाक़ हुआ था. शहरनुमा इस छोटी सी बस्ती बिजनौर में मुशायरा था. मुशायरे से पहले बस्ती में मुझे इधर-उधर धुमाया जा रहा था. मैं बातों में व्यस्त था-आँखें सुनने वालों के चेहरे पर थी और ज़मीन पर चल रहे थे पाँव.
रास्ता उत्तरप्रदेश के हर नगर की तरह मजनूँ के रेगिस्तान जैसा था जिस पर चलना आसान नहीं था. अचानक ठोकर लगी, पत्थर ने रोक कर चलते हुए क़दमों से मेरा नाम पूछा था. पैरों में जुबान नहीं थी...वे खामोश रहे. बस पत्थर मियाँ नाराज़ हो गए...मैं लड़खड़ा गया तो साथ वाले ने सहारा दिया और मुस्कुराते हुए कहा, "हुज़ूर यह बिजनौर है...यहाँ हर चीज़ क़ाबिले गौर है."
इस पत्थर की नाराज़गी पर मुझे अपना एक शेर याद आया,
पत्थरों की भी जुबाँ होती हैं दिल होते हैं
अपने घर के दरो-दीवार सजा कर देखो
सर सैयद अहमद खाँ के साथी शिब्ली नौमानी ने इस्लाम के पैगम्बर हज़रत मोहम्मद की आत्मकथा की पहली किताब, 'सीरतुन्नबी' के नाम से लिखी थी. इस किताब के चौथे संकलन में एक हदीस के हवाले से लिखा है, "हज़रत मोहम्मद ने एक शाम की यात्रा में एक पत्थर को देखकर फरमाया था-मैं इस पत्थर को पहचानता हूँ जो पैगम्बरी से पहले मुझे सलाम किया करता था."
बिजनौर के रास्ते के पत्थर ने मुझसे भी बात की थी. लेकिन मैं ठहरा एक साधारण इंसान. उसकी बात पर ध्यान नहीं दे पाया और उसने क्रोध में आकर मुझे ठोकर मार दी...ख़ैर मैंने उस पत्थर को मुआफ़ कर दिया क्योंकि वह उस नगर का पत्थर था जहाँ कभी मिर्ज़ा ग़ालिब के प्रख्यात आलोचक अब्दुर्रहमान बिजनौरी रहते थे.
ग़ालिब के संबंध में उनका एक वाक्य काफ़ी मशहूर हुआ, "भारत में दो ही महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं, वेद मुकद्दस (पावन) और दूसरा दीवाने ग़ालिब." पता नहीं अब्दुर्रहमान बिजनौरी को वेदों की संख्या का ज्ञान था या नहीं. लेकिन एक पुस्तक की चार ग्रंथों से तुलना तर्क संगत नहीं लगती. फिर भी यह वाक्य बिजनौर के एक क़लमकार की कलम से निकला था और पूरे उर्दू-संसार में मशहूर हुआ.
ग़ज़ल का संसार
इस नगर के साथ दूसरा नाम जो याद आता है वह हिंदी ग़ज़लकार दुष्यंत कुमार का है.
दुष्यंत नाम के दर्शन पहली बार महान नाटककार कालीदास की नाट्य रचना 'शाकुंतलम' में होते हैं. उसमें यह नाम एक राजा का था, जो शकुंतला को अपने प्रेम की निशानी के रूप में एक अंगूठी देकर चला जाता है. और शकुंतला की जीवन यात्रा इसी अंगूठी के खोने और पाने के इर्द-गिर्द धूमती रहती है, उज्जैन नगरी के राजा दुष्यंत के सदियों बाद बिजनौर की धरती ने एक और दुष्यंत कुमार को जन्म दिया.
इस बार वह राजा नहीं थे, त्यागी थे. दुष्यंत कुमार त्यागी. इस दुष्यंत कुमार त्यागी के पास न राजा का अधिकार था, न अंगूठी का उपहार और न ही पहली नज़र में होने वाला प्यार था. 20वीं सदी के दुष्यंत को कालीदास के युग की विरासत में से बहुत कुछ त्यागना पड़ा. इस नए जन्म में वह आम आदमी थे. आम आदमी का समाज उनका समाज था. आम आदमी की लड़ाई में शामिल होना उनका रिवाज़ था. आम आदमी की तरह उनकी मंजिल भी सड़क, पानी और अनाज था.
इस आम आदमी का रूप उनके शेरों में कुछ इस तरह है-
हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
अब हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
इस नुमाइश में मिला वह चीथड़े पहने हुए
मैंने पूछा कौन, तो बोला कि हिंदुस्तान हूँ.
यहाँ तक आते-आते सूख जाती है कई नदियाँ
हमें मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा
कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हरेक घर के लिए
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए
ये सारे शेर उन ग़ज़लों के हैं जो उनकी ग़ज़लों के संग्रह ‘साए में धूप’ में है.
यह पुस्तक उनके जीवन (जन्म-1933, मृत्यु-1975) की आख़िरी पुस्तक है. इन ग़ज़लों तक आते-आते वह नई कविता, नाटक और उपन्यासों की कई कृतियों से गुज़र चुके थे. इन कृतियों में 'एक कंठ विषपायी', 'सूर्य का स्वागत', 'आवाज़ों के घेरे', 'जलते हुए वन का बसंत', 'छोटे-छोटे सवाल' और दूसरी गद्य तथा कविता की किताबें शामिल हैं.
हैदराबाद के लोकप्रिय प्रगतिशील शायर मख़दूम मुहउद्दीन ने कहा था, "शायर को ग़ज़ल उम्र के कम से कम 40 साल पूरे करके शुरू करनी चाहिए." मख़दूम ने इशारे में ग़ज़ल विधा के संबंध में बहुत अहम बात कही है. इसके द्वारा उन्होंने ग़ज़ल में ख़याल की खपत, इस खपत में शब्दों की बुनत और इस बुनत में ध्वनियों की चलत को आईना दिखाया गया है. ग़ज़ल विचार भी है और अभिव्यक्ति का मैयार भी.

दुष्यंत की नज़र उनके युग की नई पीढ़ी के ग़ुस्से और नाराज़गी से सजी बनी है. यह ग़ुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मो के ख़िलाफ़ नए तेवरों की आवाज़ थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमानंदगी करती है

दुष्यंत साहित्य में बहुत कुछ कर के और जीवन की बड़ी धूप-छाँव से गुज़र के ग़ज़ल विधा की ओर आए थे. दुष्यंत जिस समय ग़ज़ल संसार में दाखिल हुए उस समय भोपाल प्रगतिशील शायरों-ताज भोपाली और कैफ भोपाली की ग़ज़लों से जगमगा रहा था, इनके साथ हिंदी में जो आम आदमी अज्ञेय के ड्राइंगरूम से और मुक्तिबोध की काव्यभाषा से बाहर कर दिया गया था. बड़ी खामोशी से नागार्जुन और धूमिल की 'संसद से सड़क तक' की कविताओं में मुस्कुरा रहा था. इसी जमाने में फ़िल्मों में एक नए नाराज़ हीरो का आम आदमी के रूप में उदय हो रहा था.
दुष्यंत की ग़ज़ल के इर्द-गिर्द के समाज को जिन आँखों से देखा और दिखाया जा रहा था वह वही आदमी था जो पहले कबीर, नज़ीर और तुकाराम के यहाँ नज़र आया था, जिसने नागार्जुन और धूमिल के शब्दों को धारदार बनाया था. उसी ने दुष्यंत की ग़ज़ल को चमकाया था.
दुष्यंत की नज़र उनके युग की नई पीढ़ी के ग़ुस्से और नाराज़गी से सजी बनी है. यह ग़ुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मो के ख़िलाफ़ नए तेवरों की आवाज़ थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमानंदगी करती है.
विषय की तब्दीली के कारण, उनकी ग़ज़ल के क्राफ्ट में भी तब्दीली नज़र आती जो कहीं-कहीं लाउड भी महसूस होती है. लेकिन इस तब्दीली ने उनके ग़ज़ल को नए मिज़ाज के क़रीब भी किया है.
दुष्यंत ने केवल देश के आम आदमी से ही हाथ नहीं मिलाया उस आदमी की भाषा को भी अपनाया और उसी के द्वारा अपने दौर का दुख-दर्द गाया...
जिएँ तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले
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