व्यावहारिक पत्रकारिता


           पत्रकारिता सीखें
व्यावहारिक   पत्रकारिता        
 
दिल से कलम तक
कुछ बातें ऐसी होती हैं जो जेहन में तब तक फंसी रहती हैं जब तक उन्हें कागज पर उतार न दिया जाए। कलम और कागज के पेशे में पिछले इक्कीस साल से हूं। जब शुरुआत की थी, तब शायद यह सपना भी नहीं था कि कोई किताब लिखने का प्रयास भी करने के लायक हो सकता हूं। पर समय बहुत बलवान है। संघर्ष की भट्टी में तपने वाले दौर के दौरान जो चीजें कठिन लगती हैं, बाद में जाकर वही अनुभव का रुप ले जाती हैं। उस दौर में कुछ लोग विरोध की मुद्रा में होते हैं जिन्हें संघर्ष कर रहा व्यक्ति दुश्मन की श्रेणी में गिन लेता है। पर उस दौर के बीत जाने के बाद किया गया आत्म मंथन कहता है कि यदि कोई रुकावट बना ही न होता तो उन रुकावटों से निपटने का अनुभव कहां से आता?
कुछ व्यक्तित्व होते हैं जिनकी छाप अंतर्मन में इतनी गहराई तक पैवस्त होती है कि सोते जागते उन्ही के ख्याल आते हैं। मुझे पत्रकारिता में हिंदी मिलाप के संपादक आदरणीय यश जी लाए थे। पहली बार जब कलम पकड़ी तो उनका स्नेहमय हाथ मेरे सर पर था। कलम चलाना पंजाब केसरी के सहायक संपादक परम आदरणीय विजय निर्बाध जी ने सिखाया। उन्होंने मेरे भीतर के डर को समाप्त किया व बिना हिचक लिखने के असंख्य गुर सिखाए। गुरु जी ने एक कवि होने के चलते मानवीय संवेदनाओं पर जिस प्रकार के दृष्टिकोण अपनाने की सीख मुझे दी उसने मेरी कलम को जीवन दिया। बदकिस्मती से आज ये दोनों महानुभाव परमपिता परमात्मा के चरणों में लीन हो चुके हैं। यदि आज ये संसार में होते तो बहुत कुछ नया सीखने को मिलता।  इन सालों के दौरान मुझे विभिन्न समाचारपत्रों में पत्रकारिता सीखने का मौका मिला। पंजाब केसरी जालंधर के प्रधान संपादक आदरणीय विजय चोपड़ा जी से मुझे व्यवहारिकता का सबक मिला,जबकि उनके सपुत्र व पंजाब केसरी के संयुक्त संपादक अविनाश चोपड़ा से उत्साह मिला। खास तौर पर साहित्य संपादक अमित चोपड़ा ने मुझे 1992 में ही कम्प्यूटर पर हाथ चलाने की सलाह देते हुए बताया था कि आने वाले दौर में पत्रकारिता करने के लिए कम्प्यूटर एक लाजमी चीज होगा,वो उनकी तकनीकी दूरदर्शिता थी। उनका सलाह का बाद में काफी लाभ हुआ। उत्तम हिंदू के संपादक श्री इरविन खन्ना जी ने मेरे अंदर के पत्रकार को बाहर निकालने में काफी मदद की जिसका लाभ मुझे आजीवन होता रहेगा। नवभारत टाइम्स के संपादकीय विभाग से श्री राम कृपाल सिंह जी का बड़ा आशीर्वाद रहा। उनसे, एक जिला स्तरीय समाचार को राष्टï्रीय स्तरीय बनाने का गुर सीखने को मिला। दिव्य हिमाचल जब शुरु हुआ तब मुझे शिमला के ब्यूरो का संस्थापक प्रभारी बनने का मौका मिला। दिव्य हिमाचल के कार्यकारी संपादक श्री अनिल सोनी,मुख्य संपादक श्री बी.आर जेतली,संपादकीय सलाहकार श्री राधे श्याम शर्मा जी से तो राज्य स्तरीय ब्यूरों के संचालन के नित नए गुर सीखे जबकि चेयरमैन श्री भानू धमीजा जी व डायरैक्टर मार्केटिंग श्री प्रमोद कृष्ण खुराना जी से अखबारी दुनिया में मैनेजमेंट की सीख मिली जिसके चलते मेरे नजरिए में नया व लाभप्रद अध्य्याय जुड़ा। वहां से वापसी हुई तो अमर उजाला में गया। सही मायनों में वहां जाकर मुझे प्रोफैशनल जर्नलिज्म के दर्शन हुए। खास तौर पर माननीय युसूफ किरमानी जी से मैने डेढ़ साल में इतना कुछ सीखा जितना शायद ग्याराह साल में भी नहीं सीख पाया था। इस किताब को लिखने का आधार किरमानी जी की योग्यता से ही हासिल कर पाया। किरमानी साहिब के अलावा इंटरनैशनल इंस्टीच्यूट आफ जर्नलिज्म, बर्लिन(जमर्नी) के सीनियर प्रोफैसर पीटर मेय जी ने भी मेरे ज्ञान चक्षु खोलने में बहुत मदद की। दैनिक जागरण के समाचार संपादक कमलेश रघुवंशी,फीचर प्रभारी श्रीमति गीता डोगरा व स्थानीय संपादक श्री निशिकांत ठाकुर जी का भी बड़ा योगदान रहा। इस किताब में प्रकाशित लेख,विश्लेषण,फीचर व खबरों में से ज्यादातर सामग्री दैनिक जागरण,अमर उजाला,नवभारत टाइम्स, दिव्य हिमाचल व पंजाब केसरी में प्रकाशित हुई है इनके अलावा मेरे बड़े भाई आलोक तोमर से भी बहुत सारी सामग्री उधार लेकर इस किताब में डाली गई है। इस मामले में यदि अपने बड़े भाई सरीखे शैलेन्द्र सहगल जी को याद न करूं तो गुस्ताखी होगी। पत्रकारिता के सफर के दौरान जब भी मुझे अपना हौसला डोलता दिखा, मुझमें हमेशा जोश भर कर,अर्जुन बन कर लडऩे की शक्ति को जागृत करने वाली हस्तियों में से जतिंदर पन्नू जी की भूमिका को भी सलाम करना चाहूंगा। नवां जमाना के इस जेहादी समाचार संपादक से आतंकवाद के विषय पर लिखने के असंख्य गुर व तौर तरीके सीखे,पन्नू जी का मुझे पत्रकार बनाने के मामले में बड़ा योगदान रहा।     
जब पत्रकारिता में आया था,तब अरुण शौरी साहिब की तूती बोलती थी। उनको व उनके बारे में पढऩे का मौका मिला और बस उन्हीं को अपनी प्रेरणा मान बैठा। तब मेरी हालत एकलव्य जैसी थी। शौरी साहिब द्वारा अखबारों में लिखे गए असंख्य लेखों की कतरनें मेरी रैफरेंस लायब्रेरी की आज भी शोभा बनी हुई हैं। उन्हीं को पढ़ कर व देख कर काफी कुछ सीखने को मिला। मगर उनसे मुलाकात का सौभाग्य तब मिला जब पत्रकारिता में मेरी आयू सात वर्ष की हो चुकी थी। मिलने पर लगा कि  सब कुछ मिल गया। एकलव्य व द्रोणाचार्य का वो मिलाप बड़ा विचित्र था। उस मुलाकात के लिए सेतू बने, हिंद समाचार पत्र समूह के संपादक श्री विजय चोपड़ा के उस सिफारिशी पत्र की फोटो कापी आज भी मेरे पास सुरक्षित है जिसके आधार पर शौरी साहिब से मुलाकात का संयोग हुआ। रोजाना सैंकड़ो सिफारशी पत्र जारी करने वाले चोपड़ा जी को यह याद भी होगा या नहीं,कह नहीं सकता। जिस अरुण शौरी की कलम से निकलती आग सरकारों में झुलसन पैदा करती थी उनकी विनम्रता और सौम्यता का मैं कायल हो गया। यह रिश्ता आज भी जारी है। मैं खुशकिस्मत हूं कि द्रोणाचार्य ने मुझे एकलव्य न मानते हुए अर्जुन के रुप में कबूल किया।
पत्रकारिता के पेशे में संयम व सकारात्मक नजरिया बड़ा अहम है। मेरे सबसे प्यारे मित्र व धर्म के भाई श्री हंसराज हंस से जो गुण सीखने को मिला वो था संयम व सकारात्मक नजरिया अपनाने का। देश विदेश में अपनी सुरीली आवाज का जादू बिखेरने वाले हंस जितने बाहरी तौर पर खूबसूरत है,उनकी सोच व नजरिया भी उतना ही हसीन है। पत्रकारिता के पन्द्रह वर्षीय सफर के दौरान मुझे विभिन्न समाचार पत्रों में काम करने का मौका मिला जिसके चलते मुझे काफी कुछ नया सीखने का मौका मिला।
इस दौरान असंख्य पत्रकारों से मुलाकातें हुईं। मेरा मानना है कि पत्रकारिता में आज जिस बात का सबसे ज्यादा अभाव है वह है व्यवहारिकता। इस किताब के माध्यम से मेरा प्रयास है कि पत्रकारिता के इस पक्ष को उबारा जा सके। शायद यही कारण है कि इस किताब में पत्रकारिता के थ्योरी पक्ष की एक लाईन भी नहीं,क्योंकि मैं जानता हूं कि थ्योरी पर आधारित किताबों का बहुत बड़ा व उबाऊ लगने वाला ढेर पहले से ही मौजूद है। सभी स्नेहियों के प्रेम व आशीर्वाद के चलते ही इस किताब की रुपरेखा तैयार हो सकी है जिसके लिए मैं सबका आभारी हूं।
   
 

              
 अर्जुन शर्मा  
      


 कुछ बातें किताब के बारे में
पत्रकारिता जैसे महत्वपूर्ण विषय पर किताब लिखना कोई आसान काम नहीं, इस बात का पता तब चला जब इस विषय पर हिंदी में लिखी गई किताबें ढूंढने के लिए दिल्ली गया। काफी भटकने के बाद भी हिंदी में उपलब्ध पुस्तकों में से एक भी पुस्तक नज़र में नहीं आई जिसमें किताबी ज्ञान के बजाए पूरे तौर पर व्यवहारिक ज्ञान से संबंधित सामग्री हो और जो मौजूदा दौर की पत्रकारिता पर ही आधारित हो।
परिवेश में आए बदलाव से पत्रकारिता भी अछूती नहीं रही। तेज रफ्तार दौर,इलैक्ट्रानिक मीडिया के बढ़ते कदम व प्रिंट मीडिया में हो रहा फैलाव इसके उदाहरण हैं। खास तौर पर हिंदी के प्रिंट मीडिया में बेहद विस्तार आ चुका है। दैनिक जागरण,दैनिक भास्कर,हिंदुस्तान व अमर उजाला ने देखते ही देखते कई नए संस्करण शुरु किए है। और भी कई हिंदी के अखबार विस्तार की संभावनाओं पर तेजी से विचार कर रहे हैं। मौजूदा परिदृष्य में एक-एक प्रकाशन केन्द्र से शहर स्तर के कई संस्करण प्रकाशित हो रहे हैं जिसके चलते राज्य स्तरीय पत्रकारिता में बदलाव हुआ है। अब अखबारों का लक्ष्य शहर स्तरीय पाठक वर्ग है। जहां तीन-चार साल पहले किसी बड़े शहर को कवर करने के लिए एक या ज्यादा से ज्यादा दो संवाददाता पर्याप्त माने जाते थे उनके स्थान पर अब दर्जन से भी ज्यादा संवाददाताओं की उपयोगिता हो गई है। इसे हिंदी पत्रकारिता के युग का क्रांतिकारी परिवर्तन कहा जा सकता है। आज जिस प्रकार के संवाददाताओं की जरुरत महसूस की जा रही है उसका केन्द्र बिंदू उनका व्यवहारिक पक्ष है। उदंड मार्तण्ड का इतिहास जानने या बंगाल गजट की व्याख्या को समझने में सर खपाने के बजाए यदि कोई पत्रकार न्यूज सोर्स को डिवेलप करने की विधि सीख ले तो वो आज के युग में ज्यादा उपयोगी है,ऐसी मेरी मान्यता है। भारी-भरकम थ्योरी पढ़े पर व्यहारिक पक्ष से कोरे पत्रकार के बजाए यदि कोई कम पढ़ा संवाददाता किसी घटना के तथ्यों का संकलन कर कम्पयूटर पर खबर बनाने की क्षमता रखता है तो अखबार के लिए उसका ज्यादा महत्व है। हिंदी पत्रकारिता में जिस प्रकार पत्रकारों की गुंजायश दस गुणा बढ़ गई है उसे देखते हुए नए लोगों के लिए संभावनाओं के द्वार खुले हैं।
यह बात निजी अनुभव के आधार पर लिखना चाहता हूं कि उत्तर भारत के कुछ राज्यों,खास तौर पर पंजाब,हरियाणा,हिमाचल व जम्मू-कश्मीर में कार्यरत ज्यादातर पत्रकारों के पास काम का विधिवत अनुभव नहीं है। इन हालात के चलते अमर उजाला व दैनिक जागरण जैसे समाचार पत्रों ने जब पंजाब व हरियाणा में प्रकाशन केन्द्र खोले तो उन्हें ज्यादातर अनुभवी पत्रकारों को बाहर के राज्यों से लाने को मजबूर होना पड़ा। इस दशा के लिए कौन जिम्मेवार है इस बहस में पड़े बिना केवल इतना कहना चाहूंगा कि इन प्रदेशों के वरिष्ठ पत्रकारों ने यदि अपने अनुभव,पेशे में आने वाले नए लोगों के साथ बांटे होते व उन्हें सिखाने के गंभीर प्रयास किए होते तो शायद हालात इस प्रकार के न होते। यही कारण रहा कि अपने समस्त अनुभव व दोस्तों की सलाह के सदके यह किताब तैयार हो गई। चूंकि मैं भी पिछले इक्कीस सालों से पंजाब(थोड़ा सा समय शिमला व चंडीगढ़) में पत्रकारिता कर रहा हूं व शायद उन वरिष्ठ लोगों में मैं भी शामिल हूं जिन पर मैने उपर कटाक्ष किया है। सो अपनी जिम्मेवारी मानते हुए इस किताब के माध्यम से जो प्रयास किया गया है उससे मेरी आत्मा पर पड़ा यह अदृष्य बोझ कम होगा।   
इस किताब को लिखने का मकसद उन नए लोगों को सहज व सरल तरीके से उस प्रकार की पत्रकारिता के कुछ नुक्ते बताना है जो रोजमर्रा के काम में महत्वपूर्ण हैं। मुझे लगता है कि यह किताब जहां कस्बा व शहर स्तर के उन पत्रकारों के लिए काफी मुफीद हो सकती है जिन्हें पत्रकारिता का विधिवत प्रशिक्षण नहीं मिला वहीं थ्योरी पढ़ कर आए पत्रकारों को भी काम शुरु करने के मामले में सहायक होगी। ऐसी मेरी मान्यता है। कर्म करना व्यक्ति का धर्म है। इस किताब के माध्यम से मैने अपना धर्म निभाने की कोशिश की है। फिर भी कुछ त्रुटियां रह गई हो सकती हैं। उनको भी सुधारने का प्रयास करुंगा।
मुझे आशा है कि इस प्रयास की सफलता के लिए परमपिता परमात्मा व मेरे वरिष्ठ साथी मुझे आशीर्वाद देंगे।
                    
पत्रकार व पाठक में अंतर



पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए यह सवाल सबसे अहम होना चाहिए कि आखिरकार एक सामान्य पाठक व पत्रकार में कौन सा बुनियादी अन्तर है जिसके चलते पत्रकार को समाज में ज्यादा रुतबा व मान्यता मिल जाती है। इस सवाल का दायरा हालांकि काफी विस्तार मांगता है पर पहली प्रतिक्रिया कुछ इस प्रकार की हो सकती है कि पत्रकार व आम पाठक में एक दिन का अन्तर होता है। पत्रकार जिस जानकारी के लिए सारा दिन जूझता है,दूसरे दिन की अखबार में आम जनसाधारण को वह जानकारी सहज ही उपलब्ध हो जाती है। पर इस एक दिन के अन्तर को बनाए रखने के पीछे बड़ी कठिन तपस्या व कड़े अभ्यास का इतिहास होता है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि व्यवसाय होते हुए भी पत्रकारिता सामान्य कामों के मुकाबले में काफी अलग है। हालांकि पत्रकारिता के सिद्वांत व व्याख्या की बात करें तो इस एक छोटे से शब्द की व्याख्या में कई किताबें लिखी जा चुकी हैं। यदि सामान्य भाषा व कम शब्दों में कहा जाए तो पत्रकारिता एक ललित कला है। इसे सीखना आसान है बशर्ते कि लग्र व मेहनत भरे जज्बे के साथ-साथ आदमी सामान्य ज्ञान रखता हो। दुनिया में कुछ भी ऐसा नहीं जिसे सीखने की ठान ली जाए और वो सीखा न जा सके। यह भी माना जा सकता है कि पत्रकारिता एक जीवन शैली यानि लाइफ-स्टाईल का नाम है। बच्चा जब छोटा होता है तो वो चलना सीखने के लिए सबसे पहले कुर्सी-मेज व दीवार का सहारा लेता हुआ लडख़ड़ाते हुए कुछ कदम चलता है। जबकि वही बच्चा कुछ साल बाद दौड़ता हुआ देखा जा सकता है। इस प्रक्रिया में सबसे बड़ा महत्व लगातार चलने का है। याद रखे जाने लायक बात है कि फिल्मी दुनिया में अपना विशेष स्थान रखने वाले अभिनेता अमिताभ बच्चन को पहले पहल जिस प्रकार की फिल्मों में काम करने का मौका मिला था उसमें एक फिल्म ऐसी भी थी जिसमें अमिताभ को गूंगे का रोल दिया गया था।
जबकि बाद में उसी अमिताभ की खनकती आवाज ही कई सालों से फिल्म इंडस्ट्री में छाई हुई है । पत्रकारिता के क्षेत्र में भी ऐसी कई मिसालें भरी पड़ी हैं जिनके चलते कई नामवर पत्रकारों का शुरुआती दौर काफी संघर्ष वाला रहा। पत्रकारिता में सफलता के लिए कई तरह के गुर हैं जिन्हें सीखने व अपने व्यवहार में शामिल करने से शुरुआती समय में आने वाली समस्याओं से निपटा जा सकता है। इस किताब में जिन बातों को शामिल किया गया है वो कई वरिष्ठ पत्रकारों के निजी तजुर्बे पर आधारित हैं। 

  
सफलता के अचूक नुस्खे
पत्रकारिता का बुनियादी पहलू संवाद स्थापित करना है। समाज में घटने वाली घटनाओं की सूचना अखबार व अन्य संचार माध्यमों द्वारा समाज को देने के मामले में पत्रकार पुल की भूमिका निभाता है। चूंकि पत्रकारिता अन्य किस्म के सामान्य कार्यों से बिल्कुल भिन्न है। इसलिए यह काम बेहद संजीदगी व जिम्मेवारी से किया जाने वाला है क्योंकि अन्य साधारण कार्यों व पत्रकारिता में बुनियादी अंतर है। किसी फैक्ट्री में काम कर रहे व्यक्ति से यदि कोई गलती हो जाए तो उससे फैक्ट्री का काम प्रभावित हो सकता है पर यदि पत्रकार से कोई गलती हो जाए तो उसका प्रभाव समाज पर पड़ता है। विद्यार्थी की परीक्षा एक साल बाद होती है परन्तु पत्रकार की परीक्षा रोज होती है व उसका नतीजा भी रोज निकलता है। सफल पत्रकार बनने के लिए कुछ बुनियादी बातें ध्यान में रखी जाने वाली हैं।

भाषा ज्ञान
 
जिस भाषा को पत्रकारिता के लिए माध्यम बनाना हो उस भाषा का ज्ञान होना आवश्यक है। मिसाल के लिए हिंदी भाषा में ही पत्रकारिता करनी हो तो इस भाषा की बारीकियों के साथ-साथ पत्रकार का निजी शब्दकोष (वोकैबलरी) काफी मजबूत होना चाहिए। खास तौर पर अखबारी भाषा की जानकारी बेहद जरुरी है। इस प्रकार की जानकारी को प्राप्त करने के लिए किसी किताब की जरुरत नहीं होती। अलबत्ता रोजाना प्रकाशित होने वाली अखबारें ही ध्यान से पढ लेने से इस योग्यता को विकसित किया जा सकता है। पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश करने के इच्छुक लोगों के लिए भाषा का ज्ञान बढ़ाने के लिए सबसे पहले उस भाषा में बातचीत करने की शुरुआत करना पहला चरण माना जाएगा। याद रहे कि आजकल अखबारी दुनिया में लिखी जाने वाली भाषा की ज्यादातर शब्दावली आम बोल-चाल वाली ही है। इसके साथ यह कला विकसित करने के लिए विभिन्न टी.वी.चैनेलों पर प्रसारित होने वाले उन कार्यक्रमों को देखने की आदत डाली जाए जो सामयिक विषयों पर होने वाली चर्चा पर आधारित होते हैं। मसलन भारत पाक शिखर वार्ता के मौके पर तीन दिन तक चले सीधे प्रसारण के दौरान इस विषय से जुड़े असंख्य विशेषज्ञों के साथ बातचीत का दौर लगातार चला। जिस व्यक्ति ने यह कार्यक्रम देखा होगा उसे भारत पाक संबंधों के संदर्भ में कई नई बातों व तथ्यों की जानकारी हुई होगी। अमेरिका के वल्र्ड ट्रेड सेंटर व पैंटागन पर हुए हमलों के बाद लगातार एक महीने तक आतंकवाद के बढ़ते दायरे व दुनिया के बदलते नजरिए पर चर्चा का दौर चौबीसों घंटे चला। जाहिर है, इस प्रकार के कार्यक्रम रोचक होने के साथ-साथ ज्ञानवर्धक भी होते हैं। अमेरिका द्वारा जवाबी कार्रवाई करते हुए अफगानिस्तान पर जो हमला किया उसके आधार पर विश्लेषण, बातचीत व बहस के जितने कार्यक्रम प्रसारित हुए, इस प्रकार के कार्यक्रम देख कर ही जहां साधारण आदमी में पत्रकार के आधे गुण शामिल हो जाते हैं वहीं उसे पत्रकारिता में प्रयोग होने वाली भाषा का भी ज्ञान होने लगता है। यह तय है कि यदि आम बोलचाल की भाषा में आपका हाथ तंग नहीं तो भाषा आपके लिए कोई चुनौती नहीं है। अखबारी भाषा से तो आप तभी से जुड़ जाएंगे जब रोजाना दो-तीन अखबारें पढऩे की आदत आपको हो जाएगी। जहां तक नए-नए शब्द सीखने का प्रश्र है तो उसके लिए एक विधि काफी मुफीद है। कई बार अकेले शब्द का अर्थ पता नहीं चल पाता परन्तु जब वो वाक्य में पिरोया हुआ दिख जाए तो सारे संदर्भ के चलते उसका अर्थ पता चल जाता है। रोज अखबार पढ़ते समय जो भी नया शब्द मिले, उसे एक कापी में नोट करते जाएं। मान लीजिए कि रोजाना दस नए शब्द आप नोट करते हैं तो महीने में आपने तीन सौ नए शब्द सीख भी लिए व उनका संकलण भी कर लिया। तीन महीने में आपको लगने लगेगा कि आपके पास शब्दों का खजाना जमा हो गया है।


लेखन कला


भाषा का ज्ञान होना व उसे कागज पर उतारना हालांकि आपस में जुड़ी हुई बातें हैं। पर भाव व्यक्त करना एक कला है। लेकिन यह भी नहीं कहा जा सकता कि यह कला जानना बहुत कठिन है। इसके लिए यदि नियमित रुप से अभ्यास किया जाए तो यह सब सीखना बेहद आसान है।
स्कूल कालिज की पढाई के दौरान परीक्षा में बैठने वाले मुख्यत दो तरह के परीक्षार्थी होते हैं। पहले वो जिन्होंने सहायता गाईडों के माध्यम से प्रश्रों के उत्तर रटे हुए होते हैं व प्रश्रपत्र देखते ही रटे हुए प्रश्रों में से परीक्षा में पूछे गए सवालों के  जवाब लिखना शुरु कर देते हैं। उनकी शब्दावली गाईडों वाली होती है व जहां कुछ लाईनें भूल जाएं वहीं से उनकी तार टूट जाती है। दूसरी श्रेणी में वो परीक्षार्थी होतें हैं जिन्होंने सिलेबस के विषय वस्तू को समझा होता है। क्योंकि उनको विषय का ज्ञान होता है इसलिए वो प्रश्नों के उत्तर अपनी भाषा में देते हैं। मिसाल के लिए हिंदी की उच्च शिक्षा के दौरान मुंशी प्रेमचंद के जीवन व लेखन से संबंधित कुछ सवाल आते हैं। जिन विद्यार्थियों ने गाईड की सहायता से प्रश्रों को रटा होता है उनके मुकाबले जिन विद्यार्थियों ने मुंशी प्रेम चंद की जीवनी को समझा होता है, वो विद्यार्थी उत्तर लिखने के समय ज्यादा सहज होते हैं। अक्सर परीक्षाओं में अव्वल आने वाले छात्र दूसरी श्रेणी वाले होते हैं क्योंकि पेपर चैक करने वाला अच्छी तरह से जानता होता है कि किस परीक्षार्थी की भाषा सहज है व किसने कौन सी गाईड से रट कर परीक्षा देने की औपचारिकता पूरी की है।
दूसरी श्रेणी से संबंधित छात्रों में सफल पत्रकार बनने की संभावनाएं ज्यादा होती हैं क्योंकि वे अपनी भाषा में भाव व्यक्त करने की कला को बुनियादी तौर पर जानते होते हैं। अब पत्रकार बनने के बुनियादी आधार को पुख्ता करने के लिए कुछ नुक्तों की तरफ आते हैं। पहले चरण में अपनी योग्यता को मापने के लिए संपादक के नाम पत्र लिखने से शुरुआत की जानी चाहिए। अपने क्षेत्र की समस्याएं, समाज में पनप रही बुराईयों की तरफ ध्यान आकर्षित करते हुए उनसे निपटने के सुझाव, लिखे गए संपादकीय लेख व अन्य महत्वपूर्ण सामग्री पर अपने विचार लिख कर भेजने से काम की शुरुआत की जाए। इसके लिए करीब तीन समाचारपत्रों का चयन करें। उनमें प्रकाशित हो रहे संपादक के नाम पत्रों का स्तर व प्रकाशन के मामले में कौन सा समाचारपत्र किस नीति के तहत किन-किन विषयों को ज्यादा प्रमुखता से छापता है, इसका अध्य्यन करके शुरुआत कर दें। आदत बना लें कि तीनों समाचारपत्रों को हर हफ्ते एक-एक पत्र लिखना है। पत्र लिखते समय कुछ सावधानियां भी जरुरी हैं। मसलन फुल स्केप कागज पर हाशिया छोड़ कर खुला खुला व सुंदर लिखावट में लिखें। जो भी पत्र भेजें उसके नीचे अपना नाम व पता जरुर लिखें। पत्र की भाषा सहज हो जो किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाने वाली न होते हुए व्यवस्थागत कमी पर केन्द्रित हो।  भेजे जाने वाले पत्र की कापी अपने पास जरुर रखें व उसकी बाकायदा एक फाईल तैयार करें। जब आपका भेजा गया गया पत्र अखबार में छप जाए तो उसकी कटिंग करके रिकार्ड में रखें। भेजे गए पत्र से प्रकाशित पत्र का मिलान करके देखें कि प्रकाशित पत्र में से क्या-क्या काटा गया है। इस प्रक्रिया से आपको पता चल जाएगा कि आप कितने सफल हुए हैं व कहां-कहां आपमें कमी है। चूंकि यह पहला चरण होगा इसलिए आपको यह विवेचना करने का मौका भी मिल जाएगा कि आपमें कमियां क्या-क्या हैं। यदि आपके द्वारा भेजे गए पत्र के छपने के बाद संबंधित समस्या हल हो जाए तो समाचारपत्र को धन्यवाद के नजरिए से पत्र जरुर लिखें। समाचारपत्र इस प्रकार के पत्र लिखने वाले पाठकों के बारे में अक्सर अच्छी राय बना लेते हैं। इस प्रकार अखबार को लगेगा कि फलां इलाके में उनका जागरुक पाठक उन्हें क्षेत्र से संबंधित फीडबैक देता है जबकि अखबारी लेखन में आपके पहले चरण की ट्रेनिंग भी हो जाएगी। इससे मिलती-जुलती मिसाल के लिए यह संदर्भ दिलचस्प रहेगा। अजीत समाचार अखबार के एक पाठक जगवीर गोयल ने अपने क्षेत्र की समस्याओं को संपादक के नाम पत्र वाले फार्मूले के तहत इतने अच्छे ढंग से अखबार के माध्यम से उठाया कि समाचारपत्र प्रबंधन ने फैसला किया कि उक्त पाठक से कालम लिखवाया जाए। आजकल उस व्यक्ति द्वारा लिखा कालम आम आदमी की डायरी अजीत समाचार में हर सप्ताह प्रकाशित हो रहा है।
इसके अलावा पत्रकारिता की भाषा शैली व बात को लिखने के बेहतरीन ढंग को सीखने के लिए कुछ पत्रिकाएं भी पढें। इंडिया टुडे की भाषा शैली व प्रस्तुतिकरण बेहद रोचक व सशक्त है। कुछ नामवर कालमनवीसों को भी नियमित पढ़े जिनके लेखन में रोचकता,जीवटता व बेहतरीन भाषा शैली का समावेश होता है।
इसके अलावा अच्छा साहित्य पढऩा भी लेखन शक्ति को मजबूत करता है। नए नए शब्द पढऩे को मिलते हैं। जितना हो सके अधिक से अधिक तार्किक सामग्री पढ़े। इससे लेखन में धार व पैनापन आता है। मिसाल के लिए आचार्य रजनीश जिन्हें ओशो के नाम से भी जाना जाता है, उनके क्रांतिकारी प्रवचनों पर आधारित कुछ छोटी-छोटी किताबें बाजार में उपलब्ध हैं। जिनमें, भारत के जलते प्रश्र, अस्वीकृ ति में उठा हाथ, गांधी पर पुर्नविचार, शिक्षा और क्रांति, नई क्रांति की रुपरेखा, चेति सकै तो चेति, मैं मृत्यु सिखाता हूं नामक पुस्तकें प्रस्तावित हैं। इन किताबों में जो कुछ कहा गया है उसके साथ बेहद सटीक तर्क दिए गए हैं। इन्हें पढऩे के बाद कई नई बातों का पता चलता है। खास तौर पर लेखन के संदर्भ में यह किताबें पढऩा बेहद उपयोगी हो सकता है।

कम्प्यूटर  ज्ञान-एक बुनियादी जरूरत


जिस तरह जीवन के हर क्षेत्र, हर व्यवसाय में कम्प्यूटर ने घुसपैठ कर ली है, पत्रकारिता पर भी इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। कम्प्यूटर क्रांति के बाद अखबार निकालना बेहद सहज हो गया है। वो दौर तो कब का बीत गया जब सिक्कों के बने अक्षरों को जोड़ कर समाचार तैयार किया जाता था व जिसका स्थान कम्प्यूटर द्वारा होने वाली कंपोजिंग ने ले लिया था। जबकि इस प्रसार का ताजा स्वरुप यह है कि अखबारों के दफ्तर आन लाईन हो चुके हैं। प्रत्येक प्रमुख नगर में अखबार के रिपोर्टर, दफ्तर से कम्प्यूटर में ही खबरें फीड करते हैं। इस नई व्यवस्था के चलते हालात यह बन गए हैं कि अपने आप में पूर्ण व अनुभवी रिपोर्टर भी यदि कम्प्यूटर पर काम करना नहीं जानते तो उन्हें रखने से पहले बड़े अखबार यह शर्त रखते हैं कि उन्हें कम्प्यूटर पर काम करना सीखना होगा। इन परिस्थितियों का व्यहारिक पहलू यह है कि पत्रकारिता में प्रवेश करने से पहले कम्प्यूटर की जानकारी व उसका इस्तेमाल बेहद जरुरी हो गया है। चाहे काम फील्ड में करना हो या डेस्क पर संपादन कार्य में रुचि हो, कम्प्यूटर दोनों परिस्थितियों में बेहद जरुरी है। क्योंकि रिपोर्टिंग के क्षेत्र में तैनात किए गए पत्रकारों को अपनी खबरें खुद कंपोज करनी पड़ती है। जहां पहले यह व्यवस्था होती थी कि रिपोर्टर लोग हाथ से खबर लिख कर संपादकीय केन्द्र को फैक्स द्वारा भेजा करते थे,जहां कम्पोजिंग विभाग द्वारा उन समाचारों को कम्पोज किया जाता था। फिर उसकी प्रूफ रीडिंग होती थी। फिर जाकर उप संपादक कम्प्यूटर द्वारा कंपोज की गई खबर को कापी पेस्टर के माध्यम से पेज पर जुड़वाता था। हालांकि कई छोटे समाचार पत्रों में आज भी यही व्यवस्था काम करती है। जबकि बड़े समाचार पत्र समूह पूरे तौर पर आन लाईन हैं। इस व्यवस्था के चलते रिपोर्टर को कम्पोजीटर व प्रूफ रीडर की भूमिका भी खुद ही निभानी पड़ती है। जिन अखबारों ने नई व्यवस्था को अपनाया है उनके खर्च में जहां कमी आई है वहीं काम में बेहद तेजी भी आ गई है। जाहिर है कम्पोजीटर व प्रूफ रीडर का काम सीमित हो गया है व कम्प्यूटर में बनी खबर को माडम के माध्यम से कुछ सैकेडों में ही प्रकाशन केन्द्र को भेजा जाने लगा है। जहां एक पेज फैक्स करने में जितना समय लगता था वहां तैयार हुआ पूरा पेज भेजने में उससे से भी कम समय लगता है। हालांकि कस्बे स्तर पर काम करने वाले रिपोर्टर अभी भी अपने समाचार जिला मुख्यालय में बने ब्यूरो को फैक्स द्वारा ही भेजते हैं जहां से कम्पोज करके वो केन्द्र को भेजे जाते हैं। पर आने वाले समय में कस्बा स्तरीय रिपोर्टरों को भी कम्प्यूटर वाले सिस्टम के तहत आना पड़ेगा।
इसलिए पत्रकारिता में प्रवेश करने से पहले ही कम्प्यूटर की बुनियादी जानकारी हासिल करना बेहद जरुरी है। मिसाल के लिए हिंदी में पत्रकारिता करने के चाहवान सबसे पहले हिंदी की टाइप सीखें। की-बोर्ड रैमिंग्टन हो या फेनेटिक, कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि कम्प्यूटर में दोनो प्रकार की कमांड मौजूद होती हैं। कम्प्यूटर की बुनियादी जानकारी के लिए बेसिक सीखना जरुरी है। कम्प्यूटर की जितनी जानकारी पत्रकार को होनी चाहिए उतनी एक सप्ताह में सीखी जा सकती है। कम्प्यूटर के संबंध में एक और प्रचलित धारणा को साफ करना चाहूंगा कि कुछ लोगों की मान्यता है कि यह यंत्र सीखना मुश्किल व पेचीदा है जबकि हकीकत यह है कि इसे सीखना बेहद आसान व सहज है। मात्र कुछ कमांड ही याद रखनी पड़ती हैं,बाकी का काम कम्प्यूटर खुद ही कर लेता है।
व्यवहार कुशलता
पत्रकारिता के लिए व्यवहार कुशलता सबसे अहम है। देखने में यह एक  भारी भरकम शब्द लगता है पर यदि इसकी गहराई में जाएं तो हर व्यक्ति अपने-अपने क्षेत्र में व्यवहार कुशल होता है। स्कूल के दिनों में जब किसी कडक़ अध्यापक का होम वर्क करने से चूक हो जाए तो विद्यार्थी की कोशिश होती है कि सर को ठंडा पानी पिला कर उनका समर्थन हासिल करने का प्रयास करके सज़ा से बचा जाए। किसी व्यक्ति की बीवी व मां में झगड़ा हो जाए तो आदमी बीवी के साथ एकांत में मां की हल्की फुल्की भी बुराई किए बिना बीवी की हल्की सी खुशामद कर देता है और साथ ही मां को अकेले पाकर अपनी बीवी को गलत  बताए बिना अपने वाक्-चातुर्य से मां को भी संतुष्ट कर लेता है,यही व्यवहार कुशलता है। व्यवहार कुशलता से ही जुड़ा हुआ दूसरा गुण,शांत स्वभाव का होना भी बेहद अहम है। मिसाल के लिए पत्रकार के खाने-पीने,सोने-जागने का कोई निश्चित समय नहीं होता। इन हालात के चलते परिवारिक संतुलन बनाने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। आखिरकार जो लोग सामान्य रूटीन में बंधे होते हैं उनके साथ गैर-सामान्य कार्यशैली वाले व्यक्ति द्वारा कदमताल करना काफी चुनौती भरा काम है। यह बाल पल्ले बांध लेने वाली है कि किसी भी हाल में अधीर नहीं होना। यदि ऐसी परिस्थितियां आती हैं तो उसका असर परिवारिक जीवन से लेकर रिपोर्टिंग पर न पड़े,ऐसा हो ही नहीं सकता। खुद को संयम में रखना भी एक कला है,जिसका सीधा संबंध व्यवहार कुशलता के साथ है। आगे चल कर यही कला काफी काम आती है। 




जिला प्रशासन व वी.आई.पी बीट

इस बीट में काम करने के लिए रिपोर्टर का व्यवहार कुशल,चौकन्ना व जानकारी के मामले में अप-डेट होना बेहद जरुरी है। क्योंकि रिपोर्टर का वास्ता भांति भांति के लोगों से पडऩा होता है। जिला प्रशासन में आईएएस अधिकारियों के अलावा राज्य प्रशासनिक सेवाओं से आए अधिकारियों का दबदबा होता है। जहां जिला प्रशासन का मुखिया यानि डीसी(डी.एम) आई.ए.एस अधिकारी होता है वहीं नए भर्ती हुए आईएएस अधिकारी ट्रेनिंग के लिए कई पदों पर काम करते हैं जबकि प्रदेश प्रशासनिक सेवा से पीसीएस अधिकारी तैनात होते हैं। यह वो जमात मानी जाती है जो देश व प्रशासन पर असली राज करते हैं। इन लोगों के बीच रहते हुए खबर निकाल कर लाना बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य होता है। इसके अलावा प्रशासन में छोटे स्तर के कर्मचारी जैसे सुप्रिटेडेंट,सहायक व कलर्क की श्रेणी वाले होते हैं जिनके बारे में आम मान्यता है कि यह अमला काम करने के बजाए टरकाने में माहिर होता है। पर सारे लोग एक जैसे नहीं होते क्योंकि कहावत भी है कि सभी उंगलियां एक जैसी नहीं होतीं। रिपोर्टर को इसी अमले में अपने सूत्रों का जाल बिछाना होता है ताकि किसी भी तरह की हिलजुल या घटना का पता उसे चल सके। वैसे समाचारों को प्राप्त करने के मामले में बांध से निकल कर जाने वाले पानी के चैनेलों का फार्मूला समझना जरुरी है। यदि रिपोर्टर अपनी बीट में इस फार्मूले के तहत सूत्र बनाने की जमीन तैयार कर ले तो उसके बीट की खबर छूटना असंभव जैसा हो जाता है। यहां उस फार्मूले को बताया जाना आवश्यक है। बांध लगा कर रोका गया पानी जब बिजली बनाने की प्रक्रिया पूरी करने के बाद छोड़ा जाता है तो सिंचाई के लिए बनी नहरों की तरफ उसका रुख मोड़ा जाता है। पर जितनी रफ्तार से वो पानी आता है,यदि उसी रफ्तार से सीधा नहरों में चला जाए तो नहरों में उफान आकर स्थिति बाढ़ वाली हो सकती है। इस स्थिति से बचने के लिए पानी को नियंत्रण करने वाले चैनल बनाए जाते हैं। उन चैनेलों की उंचाई आगे के आगे घटती जाती है व अंतत नहर तक  जाते समय पानी पूरे तौर पर नियंत्रण में होता है। प्रशासन की रिपोर्टिंग के संदर्भ में इस चैनेल वाले फार्मूले की व्याख्या कुछ इस तरह है। जिला प्रशासन के मुखिया के तौर पर तैनात डीसी (डी.एम) जिला स्तर पर हुए प्रशासनिक फैसले की सूचना देने वाला सबसे बड़ा स्रोत्र होता है। उसके बाद डीसी का सामान्य सहायक व एडीसी, प्रशासन के फैसलों के जानकार होतें है क्योंकि डीसी की हर बैठक में उनकी मौजूदगी जरुरी होती है। उसके बाद डीसी के स्टैनों को भी हर फैसले की जानकारी होती है,क्योंकि बैठक की कार्रवाई के नोट्स वही तैयार करता है। डीसी से संबंधित सुप्रिटैंडेट को भी फैसले की जानकारी होती है। क्योंकि यदि वो बैठक में शामिल न भी हो तो स्टैंनों द्वारा तैयार किए जाने वाले नोट्स की कापी सुप्रिटैंडेट को भी भेजी जाती है। अब चैनेल के फार्मूले के तहत बात करें तो यदि रिपोर्टर डीसी से सूचना प्राप्त करने में असफल रहता है तो सामान्य सहायक से सूचना ली जा सकती है। वो भी हाथ न आए तो स्टैनों से खबर ली जा सकती है,सुप्रिटैंडेट से जानकारी मिल सकती है। कहने का मतलब कि यदि रिपोर्टर ने इन अधिकारियों के साथ तालमेल रखा हो तो सूचना एक से न मिले तो दूसरे से मिलने वाली बात बन जाती है। यदि इन सारे सूत्रों से भी समाचार न मिल सके तो रिपोर्टर को यह पता लगा लेना आसान जरुर है कि बैठक किस एजैंडे पर हुई है। यह पक्की बात है कि जिला स्तर के किसी भी प्रशासनिक फैसले के संदर्भ में होने वाली बैठक का नेतृत्व डीसी केवल इस लिए करता है क्योंकि वो जिले का प्रशासनिक मुखिया है जबकि फैसला किसी न किसी विभाग से संबंधित होता है। इसके चलते जिस भी विभाग के संदर्भ में बैठक होती है उस विभाग का जिला स्तरीय अधिकारी भी उस बैठक में शामिल होता है। जैसे यदि ग्रामीण विकास के संदर्भ में कोई बैठक है तो एडीसी(विकास) जरुर होंगे। यदि मामला जिले की खजाना व्यवस्था से जुड़ा है तो जिला खजाना अधिकारी का उस बैठक में मौजूद होना जरुरी है। कहने का मतलब कि चैनेल व्यवस्था के अलावा भी खबर लेने का साधन संबंधित विभाग का जिला प्रमुख होता है। यह तो बात थी चैनेल की, अब आते है जिला प्रशासन व वीआईपी बीट में काम करने की शुरुआत करने व उसके साथ ही इस बीट से निकलने वाली खबरों की किस्मों पर। इससे पहले कि काम की शुरुआत की जाए,सबसे पहले तो इस बीट  व प्रशासनिक मशीनरी का काम काज समझना जरुरी है।
हमारे देश की प्रशासनिक व्यवस्था अंग्रेजों के जमाने से जस की तस चल रही है। मामूली फेरबदल हुए भी हैं तो उसका पूरे प्रशासनिक ढांचे पर कोई लंबा चौड़ा असर नहीं पड़ा। व्यवस्था नीचे से लेकर उपर तक लगभग एक ही तबीयत की है। राज्य का प्रशासनिक मुखिया मुख्य सचिव होता है। सभी विभागों के सचिव व जिला स्तरीय प्रशासनिक अमला प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रुप से उसके अधीन होता है। प्रदेश की प्रशासनिक बांट डिवीजन स्तर पर होती है,हालांकि कुछ प्रदेशों में डिवीजन व्यवस्था समाप्त कर दी गई है पर उन प्रदेशों की गिनती कम है। डिवीजन स्तर का मुखिया डिवीजनल कमिश्रर होता है जो कि वरिष्ठ आईएएस अधिकारी होता है। डिवीजन में जितने भी जिले होते हैं उनके डीसी सीधे तौर पर कमिश्रर को जवाबदेह होते हैं व अपने काम काज की सरकार को भेजने वाली रिपोर्ट डिवीजनल कमिश्रर के माध्यम से भेजते हैं। डिवीजनल कमिश्रर एक प्रकार से जिला प्रशासन व प्रदेश की प्रशासनिक मशीनरी में पुल का काम करता है। यह जिलों के काम-काज की समीक्षा भी करता है व डिवीजन के राजस्व से संबंधित मामलों का मुखिया भी होता है।
प्रशासन की बीट में यदि रिपोर्टर की तैनाती डिवीजन हैडक्वार्टर पर हो तो उसकी बीट में डिवीजनल कमिश्रर के कार्यलय से संपर्क बनाए रखना भी जरुरी होता है क्योंकि वहां बैठा अधिकारी डिवीजन स्तर के काम-काज की समीक्षा करता है व गाहे-बगाहे सरकार से मिलने वाले आदेशों को जिला स्तर पर जारी करता है। जिन लोगों ने बी.ए या एम.ए में लोक प्रशासन पढ़ा है वो इस व्यवस्था के भली भांति जानकार होंगे।
जिला प्रशासन में डीसी प्रशासनिक मुखिया होता है। जिले को आगे उप-मंडल स्तर पर बांटा होता है जिनके मुखिया एस.डी.एम यानि उप-मंडल मैजिस्ट्रेट होते हैं। वे उसी तर्ज पर अपने काम-काज की रिपोर्ट डीसी को भेजते हैं जैसे डीसी अपनी रिपोर्ट डिवीजनल कमिश्रर को भेजता है। यह था प्रशासनिक ढांचे का संक्षिप्त परिचय। अब जिला प्रशासन में होने वाले काम-काज को समझा जाना जरुरी है ताकि उस व्यवस्था से खबर निकालने के काम में आसानी हो सके। जिला प्रशासन को सिविल प्रशासन भी कहा जा सकता है। हालांकि पुलिस विभाग भी सिविल प्रशासन के ही अधीन होता है पर व्यवहारिक तौर पर कानून व्यवस्था लागू करने के मामले में पुलिस की अपने तौर पर अलग व्यवस्था है जिसमें सिविल प्रशासन की भूमिका यदि है तो उपरी स्तर तक।
जिला प्रशासन कवर करने वाले रिपोर्टर के लिए हर वो बैठक खबर है जिसमें डीसी ने शिरकत की है। सामान्य काम-काज के दिनों में डीसी दो से तीन बैठकें कर ही लेता है। सामान्यता इस बीट में खबरों की शुरुआत डीसी की बैठक से होती है। बैठक किस विभाग से संबंधित थी? कौन-कौन अधिकारी शामिल हुए? बैठक का एजैंडा क्या था? क्या फैसला हुआ? कब से फैसले पर अमल शुरु होगा व जिस काम को करने का निश्चय किया गया उसे पूर्ण करने की समय सीमा क्या तय की गई? इन सवालों के जवाब जान लेने के बाद बैठक की खबर तैयार हो जाती है। विभिन्न मामलों को लेकर कई प्रकार के प्रतिनिधि मंडल डीसी को अपना ज्ञापन देने भी आते हैं। वो ज्ञापन प्रदेश के राज्यपाल,मुख्यमंत्री अथवा प्रदेश पुलिस के मुखिया के नाम पर भी हो सकता है अथवा देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री व ग्रहमंत्री के नाम पर भी हो सकता है। चूंकि डीसी जिले में प्रदेश सरकार से लेकर केन्द्र सरकार का भी नुमायंदा होता है इसलिए यह ज्ञापन डीसी के माध्यम से ही उपर तक जाते हैं। यह भी अपने आप में खबर होती है। असल में शहर में घटी किसी बड़ी घटना की जांच से असंतुष्ट समाज सेवी संगठन या राजनीतिक दल ही आम तौर पर इस प्रकार के ज्ञापन देते हैं। ज्ञापन के महत्व के अनुसार खबर छोटी-बड़ी तो हो सकती है पर डीसी को ज्ञापन दिया जाना अपने आप में खबर जरुर है।    
जिला स्तरीय मामलों से लेकर राष्ट्र में घटी किसी संगीन घटनाओं को लेकर राजनीतिक दल भी डीसी दफतर के बाहर अक्सर ही धरना-प्रदर्शन करते रहते हैं। जैसे मजदूरों के भत्ते बढ़वाने की मांग करते मजदूर संगठन धरना लगाते हैं। जम्मू-कश्मीर में होने वाली हिंसा के चलते एक ही समुदाय के लोगों के हत्याकांड के विरोध में केन्द्र सरकार के नाम ज्ञापन देकर व धरना लगा कर विभिन्न राज्यों के लोग अपना विरोध प्रकट करते हैं। शहर में हुए किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति के अपहरण का सुराग लगाने में विफल रही पुलिस की कार्यशैली का विरोध करने के लिए राजनीतिक व गैर राजनीतिक संगठन धरना प्रदर्शन करते हैं। इस प्रकार के सैंकड़ों मामले होते हैं जिनमें आम जनमानस न्याय के लिए डीसी से गुहार करते हैं। अक्सर यह देखा जाता है कि डीसी के दफ्तर के बाहर फरियादी किस्म के लोगों की भीड़ होती है जो अपनी-अपनी समस्याओं के चलते टाईप किए हुए आवेदन पत्र हाथों में लिए डीसी से मिलने के लिए बैठे होते हैं। उनमें से ज्यादातर आवेदनकर्ता  नासमझ वाली श्रेणी के होते हैं जिन्हें न तो डीसी की शक्तियों का कुछ पता होता है और न ही उसके अधिकारों का। कुछ लोग आवेदन लाते हैं कि उन्हें सरकारी नौकरी दी जाए। इतना ही नहीं उन्हें यह विश्वास होता है कि यदि साहिब से मिलने का मौका मिल गया व उनका मूड़ अच्छा हुआ तो वो उनकी अर्जी पर हस्ताक्षर कर देंगे जिससे उन्हें तुरंत नौकरी मिल जाएगी। जबकि डीसी को यह अधिकार नहीं है कि किसी को अपनी मर्जी से सरकारी नौकरी दे सके। इसी प्रकार कुछ लोग यह आवेदन लाते हैं कि उनके पास रहने को मकान नहीं है। किसी की जमीन का झगड़ा है जिसके चलते वो डीसी से यह आस लेकर आता हैं कि उनका कब्जा दिलाने डीसी खुद साथ चल पड़ेगा। जबकि यह मामला अदालत के अधिकार क्षेत्र का है। इस प्रकार के दर्जनों मामले होते हैं जिन पर अधिकारी कुछ भी नहीं कर सकते। पर आवेदनों में कई मामले काफी रोचक व तथ्यात्मक होते हैं जिनमें प्रशासन कोई भूमिका निभा सकता है। जैसे किसी गांव के दलित निवासियों को मिलने वाले पानी की सुविधा के मामले में जाति विशेष से संबंध रखने वाले लोग समस्या खड़ी कर रहे हैं व पानी की सप्लाई के लिए अंडर-ग्रांउड जाने वाली पाईपें जो कि उंची जाति वालों की जमीन से होकर जाती है,उसे डालने देने में वो अड़ंगे ले रहे हैं। इसी प्रकार किसी क्षेत्र में बने दो धार्मिक स्थलों की बाहरी दीवारों की मिलकीयत को लेकर विवाद उत्पन होने से तनाव की आशंका पैदा होना। किसी शिक्षण संस्थान द्वारा गलत तथ्य बता कर छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने का प्रयास किया जाना। इस प्रकार की मिलती जुलती कई शिकायतें भी जिला प्रशासन के पास आती हैं जिन पर अच्छी खबरें लिखी जा सकती हैं। इस प्रकार की शिकायतों के आधार पर यदि मौके पर जाकर तफ्तीश कर ली जाए तो अच्छी खासी खोजी खबर बन जाती है। ऐसे मामलों का महत्वपूर्ण आधार यह होता है कि किसी व्यक्ति या प्रतिनिधि मंडल या संस्था ने फलां मामले की तरफ जिला प्रशासन काध्यान दिलाया है। उक्त मामले पर प्रशासन के संबंधित अधिकारी का पक्ष भी लिया जाना जरुरी है क्योंकि खबर की विश्वसनीयता के लिए यह महत्वपूर्ण है। इस प्रकार की सूचना का स्रोत डीसी दफ्तर में न्याय की गुहार करने आए वो आवेदनकर्ता होते हैं जो अपनी समस्या अधिकारियों के पास लेकर आते हैं व अक्सर ही अधिकारी लोग इस प्रकार के फरियादियों को लंबा इंतजार करवाने के आदी होते हैं। इस मौके पर बाहर इंतजार करने वाले उन लोगों के साथ रिपोर्टर को बातचीत करने का काफी समय होता है। अक्सर देखा गया है कि वो लोग जो आवेदन कचहरी परिसर के बाहर से टाईप करवा कर लाते हैं वह किसी साधारण टाईपिस्ट से ड्राफट करवाई होती है। उस आवेदन की भाषा लगभग एक जैसी होती है जिसमें आवेदनकर्ता की तरफ से की जाने वाली गुजारिश का तो विस्तार होता है पर टाईपिस्ट आवेदनकर्ता से कई ठोस तथ्य पूछ नहीं पाता। इसलिए यदि पत्रकार खुद आवेदनकर्ता से बात करे तो वो कई नए तथ्य जान सकता है जिसकी पुष्टि करके अच्छी खासी एक्सकल्यूसिव स्टोरी बन सकती है।
इसके अलावा प्रदेश के कई विभागों से ऐसे सर्कुलर जारी होते हैं जो रुटीन के तौर पर जिला मुख्यालयों में तैनात डीसी,एडीसी,एसडीएम वगैराह को भेजे जाते हैं। उनमें कई प्रकार की खबरों की संभावना होती है। हांलांकि अधिकारियों के लिए यह रुटीन का मैटर होता है इसलिए उन्हें इस प्रकार के पत्राचार से खबरों की संभावना का पता नहीं चलता व कई बार अधिकारी लोग इस बात का भी परहेज करते हैं कि उनके दफ्तर में आने वाला हर दस्तावेज खबर न बने। पर यह रिपोर्टर की सूझ-बूझ पर निर्भर करता है कि इस प्रकार के पत्राचार तक आसान पहुंच बनाने के लिए अधिकारियों से किस प्रकार के रिश्ते बनाने हैं। मिसाल के लिए एक समाचार का उदाहरण दिया जा रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक ने देश व्यापी करवाए गए सर्वे के आधार पर प्रत्येक राज्य में रिपोर्ट भेजी जिसमें संदिग्ध किस्म के आचरण वाली फाईनांस कंपनियों का विवरण था। बैंक की इस हिदायत को कि इन कंपनियों के कामकाज पर नजर रखी जाए,प्रदेश सचिवालय ने हर जिले के प्रशासन को यह सूचना भेज दी जिसमें पूरे प्रदेश की संदिग्ध कंपनियों की लिस्ट व विवरण मौजूद है। जिला प्रशासन के लिए इस प्रकार के सर्कुलर रुटीन के हैं। पर एक सजग रिपोर्टर ने उन दस्तावेजों को देख उससे खबर निकाल ली। पहली बात,यही अपने आप में बड़ी खबर है कि रिजर्व बैंक ने प्रदेश की कुछ फाईनांस कंपनियों को नजर रखने के लायक माना है। उन कंपनियों की सूचि अखबार में छपने के बाद आम जनमानस तक सीधा संदेश पहुंचता है कि उक्त कंपनियों से लेन-देन करना रिस्की है क्योंकि उन कंपनियों के आचार व्यवहार पर रिजर्व बैंक ने भी संदेह व्यक्त किया है। दूसरी बात संदिग्ध कंपनियों के विस्तार देख कर ही कई बार नई चीजें मिल जाती हैं जिससे खबर का महत्व बढ़ जाता है। मसलन एक शहर के संदिग्ध आचरण वाली बारह कंपनियों में से दस के पते एक जैसे हैं व निदेशक मंडल में कई नाम कामन हैं। इसके चलते शक की गुंजायश बढ़ जाती है। इस समाचार का स्रोत्र मात्र एक सर्कुलर है जो खबर छपने के बाद पुष्ठï सनसनीखेज सूचना का माध्यम बन जाता है। इसके साथ-साथ जहां प्रशासन इस सूचना को महज रुटीन मान कर चल रहा था, उसे भी पता चलता है कि यह एक महत्वपूर्ण बात है जिस पर नजर रखी जानी चाहिए।
 रिपोर्टर को यह नहीं भूलना चाहिए कि उसका स्रोत्र ही उसकी जीवन रेखा है। प्रशासन की बीट में खबर के लिए स्रोत्र ज्यादातर अधिकारी लोग होते हैं। अक्सर देखने में आता है कि कुछ रिपोर्टर आदतन सनसनी पसंद होते हैं। कई बार छोटी सी अपुष्टï सूचना के आधार पर निगेटिव स्टोरी लिख देते हैं जिनमें तथ्यों का अभाव भी होता है व बात भी छोटी सी होती है। कामयाब रिपोर्टर को इस प्रकार की मानसिकता से बचना चाहिए। यह बात लंबे अनुभव के आधार पर कही जा रही है कि जब किसी निगेटिव स्टोरी के संदर्भ में रिपोर्टर के पास ठोस तथ्य होते हैं तो अधिकारी उस समाचार के छपने का ज्यादा नोटिस लेते हैं व उनके रिपोर्टर से संबंध भी अच्छे बने रहते हैं। पत्रकारिता का यह बुनियादी असूल है कि कोई भी खबर एक पक्षीय नहीं होनी चाहिए। इसलिए संबंधित अधिकारी से खबर के संबंध में उनका पक्ष जानना बेहद जरुरी है। प्रशासन की रिपोर्टिंग के लिए दो तरह के समाचार कवर करने होते हैं।

1. रुटीन के समाचार
2. रुटीन से हट कर विशेष समाचार

इन दो तरह के समाचारों में विविधता भी होती है व एक दूसरे से इनका संबंध भी काफी गहरा होता है। इसकी व्याख्या से पता चलेगा कि इन दो तरह के समाचारों में क्या भिन्नता होती है तथा इनमें कौन-कौन से तत्व महत्वपूर्ण होते हैं जिनका दोहन करने की विधियां कौन-कौन सी हैं।
रुटीन समाचार

                यह समाचार प्रशासन में रोजमर्रा की गतिविधियों से संबंधित होते हैं जिनमें से कुछ खबरें छोटी होती है व कुछ बड़ी भी बनती हैं। मसलन जिला प्रशासन के मुखिया द्वारा की जाने वाली बैठकें रुटीन की खबरें होती हैं। पर एक बैठक किसी गांव के हुए विकास की समीक्षा पर आधारित है इसलिए वो छोटी खबर होगी। जबकि आने वाले किसी त्योहार के दौरान संभावित गडबड़ी के उपायों के संबंध में कोई बैठक होती है तो वो बड़ी खबर का दर्जा पा जाएगी। इस प्रकार डीसी द्वारा समय-समय पर जारी किए जाने वाले निर्देश जैसे सर्दी बढऩे व धुंध की अधिकता के कारण स्कूल-कालिजों के समय में बदलाव करना। किसी स्थानीय त्योहार के चलते जिले में छुट्टी की घोषणा करना,लाउड़ स्पीकर बजाने पर पाबंदी लगाना। यह रुटीन की खबरों की श्रेणी में आती हैं जो छोटी होने के बावजूद सूचनात्मक होती हैं। इसके अलावा जनगणना की तैयारी के लिए ट्रेनिंग का दौर,धरना-प्रदर्शन,जिला शिकायत निवारण समिति की बैठक तथा अन्य किस्म की बैठकें,अधिकारियों का फील्ड में दौरा,पटवारियों को मिलने वाली हिदायतें, प्रदेश की राजधानी से यदा कदा आने वाले निर्देश व जिला प्रशासन की जवाबदेही, यह खबरें रुटीन की श्रेणी वाली हैं। इस प्रकार की सूचनाएं जिला प्रशासन की रिपोर्टिंग करने वाले रिपोर्टर के पास होनी चाहिएं। खबरों के एकत्रित करने के लिए सूत्रों का जाल बिछाने के कुछ फार्मूले पीछे बताए जा चुके हैं।


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