श्यामा : एक वैवाहिक विडंबना --- भुवनेश्वर





पात्र
अमरनाथ पुरी : आयु 30 वर्ष
श्यामा : मिसेज पुरी
अप्पी : मिस्टर पुरी का सहायक
मनोज : 19 वर्ष का लड़का
हीरा : अधेड़ बेयरा
( जॉर्ज टाउन में मिस्टर पुरी के भव्य बँगले का एक सुसज्जित कमरा। कमरे के दाहिनी ओर दीवार में एक द्वार है, जिस पर लाल साटिन का परदा पड़ा है, औरों में चिकें। सलीब पर चढ़ा हुआ ईसा का भव्य चित्र। बार्इं ओर, उसके नीचे ही उमर खय्याम की रुबाइयों के दो चित्र। दाहिनी ओर द्वार के इधर एक अर्द्ध अश्लील बेडरूम चित्र और कई इटालियन लैंडस्कोप शोभित हैं। समय नवंबर का एक मेघाच्छादित प्रातः और सूरज की कोई आवश्यकता नहीं। बीसवीं सदी का कोई दिन अंधकार में नहीं रह सकता। मिस्टर अमरनाथ पुरी, आयु लगभग तीस वर्ष, गोरे-चिट्टे, आँखों पर चश्मा, हाथों में चमड़े के ग्लब्स, आकृति में वैमनस्य, वाणी में रुचि वैचित्र्य। काला सर्ज का सूट पहने एक सोफे पर बैठे हुए निर्विकार रूप से हीटिंग स्टोव की ओर देख रहे हैं।)
मिस्टर पुरी : (सहसा) बेयरा! बेयरा! हीरा!

( हरी सर्ज की अचकन में शीत से काँपते हुए एक अधेड़ मनुष्य का प्रवेश। सिर पर साफा, पैर नग्न, पाजामे में उन्हें बराबर छिपाने की चेष्टा करता है)
हीरा : हुजूर
मिस्टर पुरी : बाहर भी इतनी सर्दी है?
हीरा : (मतलब न समझ कर) जी नहीं, हाँ पानी बरसने ही वाला है। मिस्टर पुरी : मेम साहब कहाँ हैं?
हीरा : (और भी अधिक नम्र हो कर) चाय पी रही हैं हुजूर, उन्हें मालूम है आप यहाँ हैं।
मिस्टर पुरी : (रुक कर) और वह बाबू, जो कल आए हैं?
हीरा : उन्हें बहू रानी ने अभी जगाया है।
( हँसने की चेष्टा करता है; पर मिस्टर पुरी की ओर देख कर सहसा गंभीर हो जाता है)
मिस्टर पुरी : हूँ।
हीरा : क्या उन्हें यहाँ भेज दूँ सरकार?
( मिस्टर पुरी एक अनिश्चित इंगित करके ध्यान-मग्न हो जाते हैं। हीरा दो क्षण रुक कर चला जाता है। मिस्टर पुरी उठ कर टहलने लगते हैं। मिस्टर अप्पी का प्रवेश। मिस्टर अप्पी चींटी-से मेहनती, कौवे-से चतुर, मृत्यु से भी अधिक व्यस्त और गंभीर देखने का प्रयत्न करते हैं)
मिस्टर अप्पी : आज राजा सरीलिया की अपील है।
मिस्टर पुरी : हूँ।
मिस्टर अप्पी : वह मर्डर अपील भी तो आज दाखिल होगी।
(मिस्टर पुरी हाथों से अनिश्तिता का इंगित करते हैं)
मिस्टर अप्पी : आज साँझ को...
मिस्टर पुरी : (सहसा उद्विग्न हो कर) आज साँझ को, कल साँझ को, परसों कभी मैं कुछ न कर सकूँगा।
मिस्टर अप्पी : (कुछ रुक कर और स्तंभित हो कर, मेसर्स शापुरजी के रुपए भेज दीजिए।
मिस्टर पुरी : मेम साहब को दे दीजिए।
( मिस्टर अपी कुछ कहना चाहते हैं; पर सहसा रुक जाते हैं और सहसा जैसे कोई उन्हें बाहर बुला रहा हो, चले जाते हैं। मिस्टर पुरी उसी अनिश्चित-अस्थिर भाव से टहलते हैं)
मिस्टर पुरी : हीरा!
हीरा : (बाहर से) हुजूर!
मिस्टर पुरी : कुछ नहीं
( लाल साटिन के परदेवाले द्वार से मिसेज पुरी का प्रवेश। गोल, हँसमुख, लापरवाह चेहरा; पर आँखों में विषाद की बुद्धिमत्ता। आयु प्राय, २३ वर्ष, अधरों पर विलास की सजीवता, खद्दर की साड़ी पारसी ढंग से पहने, ऊपर से एक काला ओवरकोट)
मिस्टर पुरी : (हँस कर) मनोज को तो देखिए! अभी मैंने उठाया, अब मुँह फुलाए बैठा है। कहता है, तुमने मेरा बड़ा सुंदर स्वप्न भंग कर दिया।
मिस्टर पुरी : (हँसने का प्रयत्न करते हैं : पर विफलता उनके अधरों पर अंकित हो जाती है) विचित्र पुरुष है।
( मिसेज पुरी कुछ कहना चाहती हैं; पर उसके पहले ही सरोवर-सी स्वच्छ हँसी हँस देती हैं)
मिस्टर पुरी : तुमने चाय पी ली शम्मी?
मिसेज पुरी : हाँ। तुम स्वस्थ तो हो (गंभीर आकृति से)! कैसा जाड़ा पड़ रहा है, तुम ओवरकोट भी नहीं पहनते। हीरा (उत्तर की प्रतीक्षा न करके) साहब का लंबा कोट ले आओ।
मिस्टर पुरी : मनोज को चाय पिलाओ।
मिसेज पुरी : वह नहीं पिएगा, उसे अपने स्वप्न का बड़ा शौक है। (इस बार वह तनिक भी नहीं हँसती हैं)
मिस्टर पुरी : (सूखी हँसी हँस कर) मुझे इसका बालकों के समान कोरी आँखों से एक क्षण में प्रफुल्लित और शोकान्वित होना, बहुत प्रिय लगता है।
मिसेज पुरी : और उसका क्रोध! अभी मुझसे बिगड़ रहा था, मैंने मुस्कराकर उसकी ओर देखा और बस, बालिकाओं-सा लजा गया।
मिस्टर पुरी : (दो क्षण गंभीर नीरवता रहती है सहसा -) आज क्या वह जाएगा?
मिसेज पुरी : हाँ, मैंने उससे कह दिया।
मिस्टर पुरी : क्यों?
मिसेज पुरी : क्यों? (उसकी आँखों में एकटक देख कर) क्योंकि तुम उससे ईर्ष्या रखते हो।
मिस्टर पुरी : (चकित हो कर) मैं उससे ईर्ष्या रखता हूँ? (उत्तेजना के साथ) उससे, उस अर्ध बालिका से, जो हर समय अपने पुरुष होने के लिए क्षमायाचना करती है। जो केवल एक रूपहली रात्रि के रूप की भाँति है, जो जीवन या प्रेम को इतना ही कम जानता है, जितना तुम मुझे - हूँ, मैं ईर्ष्यालु नहीं हूँ, शम्मी।
मिसेज पुरी : (दृढ़ भाव से) क्यों?
मिस्टर पुरी : (उसी तेज के साथ) क्योंकि मुझे तुम पर, तुम्हारे प्रेम पर विश्वास है।
मिसेज पुरी : आपको अपने गुणों पर गर्व है, आपको अपना इतना भरोसा है!
मिस्टर पुरी : (कृत्रिम भाव से) नहीं, मुझे तुम्हारी पवित्रता, तुम्हारी महत्ता का गर्व है, उसी का भरोसा है।
मिसेज पुरी : (निर्विकार भाव से) तब आप मुझे प्रेम नहीं करते।
मिस्टर पुरी : (धीमे स्वर से) यह मत कहो शम्मी, परमात्मा के लिए एक क्षण भर को भी ऐसी बात न सोचो।
मिसेज पुरी : तुम मुझसे प्रेम भी करते हो ओर उस पुरुष से दयालु भी नहीं हो, जिसको प्रेम करना किसी भी स्त्री के लिए इतना सरल और नैसर्गिक है, जैसे बसंत का आगमन या प्रातः समीर में कलिका का खिलना! क्या तुम्हारे हृदय की भावनाएँ और वासनाएँ शरीर से विलग हैं?
मिस्टर पुरी : (कुछ देर चुप रह कर) क्या मनोज तुम्हें प्यार करता है?
मिसेज पुरी : मैं किसी के हृदय की बात क्या जानूँ!
मिस्टर पुरी : (अपने अंतर के संघर्ष से विजय पा कर) और तु...
मिसेज पुरी : यह तुम मुझसे अधिक जानते हो। समाज के सम्मुख मैं तुम्हें प्यार करने के लिए उत्तरदायिनी हूँ। और विवाह करके यदि मैंने जीविका के लिए अपने आपको नहीं बेचा है - यदि इस कठिन सत्य का सामना तुम नहीं करना चाहते - तो मुझे प्रेम चाहिए।
मिस्टर पुरी : (जैसे स्वप्न देखते हो) मैं अपना प्रेम शब्दों में नहीं व्यक्त कर सकता। तुम मेरे जीवन की उपक्रमणिका हो। तुम्हीं उसका उपसंहार हो।
मिसेज पुरी : यह सब कविता है, कोरी भावुकता है। इससे तो मुझे मनोज की उक्ति पसंद है। जब उसका नायक कहता है -
मैं उतरे मद का-सा खुमार,
तुम नयनों की मदिरा सी।'
मिस्टर पुरी : शम्मी, मेरा जीवन तुम्हारे हाथ है। मेरे पास शब्द नहीं हैं, मेरे पास उनकी आत्मा है। मेरे पास कविता नहीं; पर प्रेम में उसकी सजीवता है। तुम आज मेरे प्रेम की उपेक्षा कर सकती हो; पर एक दिन अवश्य तुम्हें उसकी आवश्यकता होगी।
मिसेज पुरी : हाँ, ठीक है, तुम्हें मेरी पवित्रता पर विश्वास नहीं है। तुम्हें अपनी महत्ता पर गर्व है। तुम्हें मनोज से ईर्ष्या नहीं है, मुझसे भय है।
मिस्टर पुरी : तुम क्या कह रही हो शम्मी, मैं एक शब्द भी नहीं समझता।
मिसेज पुरी : (अब वह मिस्टर पुरी के पास से आकर वनादी पर बैठी है। तुरंत)
तुम क्या समझ रहे हो, मैं वैसा तो एक शब्द भी नहीं कहती।
( हीरा का प्रवेश)
हीरा : मोटर तैयार है सरकार!
मिसेज पुरी : मनोज बाबू से पूछो, वह स्टेशन चलेंगे या (श्यामा की ओर देख कर) यदि तुम लोग न चाहो, तो न चलो।
मिसेज पुरी : (शंकित सी) मैं तो चलूँगी।
मिस्टर पुरी : (हीरा की ओर देख कर अपनी टाई सँभालते हुए) जाओ, मनोज बाबू को खबर कर दो।


दूसरा दृश्य
( दिन वही, समय मध्याह्न)

( मिस्टर पुरी के बँगले का दूसरा कमरा। दीवारें, सादी, कॉर्निस के ऊपर एक सुकुमार और मधुर युवक का चित्र रखा है और वैसा ही एक 19 वर्ष का युवक गले में रेशमी रूमाल लपेटे रेशमी पाजामा और कुर्ता पहने, रेशमी काले लहराते-से बालों को हाथ में समेटे, किसी की प्रतीक्षा में बैठा है।
उस युवक की दृष्टि में उन्माद, अस्थिरता और स्निग्धता का इतना विचित्र समावेश है कि कोई भी उसके प्रति आकर्षित हुए बिना नहीं रह सकता। उसमें बालिका-सी लज्जा और कविता-सी मधुरता है।
दाहिनी ओर के द्वार से - जो ठीक उससे पीछे है - मिस्टर पुरी का प्रवेश)
युवक : (कंपित कंठ से) रानी!
मिस्टर पुरी : (अपना मानसिक उद्वेग भरसक दबा कर) नहीं, मैं हूँ, मनोज, मैंने सोचा कि मैं भी तुम्हारे अप्रकाशित स्वप्न लोकों में से एक लोक छीन लाऊँ। क्या तुम वास्तव में हर समय स्वप्न ही देखा करते हो?
मनोज : (उसकी ओर देख कर) क्योंकि स्वप्न ही इस संसार की एकमात्र वास्तविकता है। यथार्थ जीवन में तो किसी रस, किसी की भावना की पुनरुक्ति असंभव है। मिस्टर पुरी, अपनी आत्मा को जान कर, मनुष्य स्वप्नों में ही रहना चाहता है (सहसा लज्जित हो कर) पर... आप बैठ जाइए।
( उठ कर खड़ा हो जाता है और पीछे एक मेज से टकरा जाता है। मिस्टर पुरी मुस्करा कर उसे सँभालते हैं और उसके कंधे पर हाथ रख कर प्रेमपूर्वक उसे अपने पास बैठा लेते हैं।)
मिस्टर पुरी : आज साँझ को मैं 'लेबर इंटेलिजेन्स ब्यूरो' में व्याख्या दूँगा, तुम चलोगे?
मनोज : (नतमस्तक) मैं व्याख्यानों में विश्वास नहीं करता।
मिस्टर पुरी : (हँस कर) मैं तुम्हारे विश्वासों में विश्वास नहीं करता।
मनोज : (सहसा उनकी ओर देख कर) यही आपकी एकमात्र सार्थकता है।
मिस्टर पुरी : (कृत्रिम प्रफुल्लता से) तो तुम व्याख्यानों में विश्वास नहीं करते?
मनोज : मैं व्याख्यानदाताओं में विश्वास नहीं करता। उनके लिए परिश्रम, तर्क, बुद्धि, ज्ञान, सामाजिक या वैयक्तिक किसी भी गुण की आवश्यकता नहीं है...
मिस्टर पुरी : (अप्रतिभ हो कर) हूँ।
( कुछ देर नीरवता रहती है)
मनोज : (सहसा) मैं आपसे एक बात कहना चाहता हूँ।
(मिस्टर पुरी त्रस्त नेत्रों से उसकी ओर देखते हैं)
मनोज : (मानसिक विप्लव को भरसक दबा कर) मैं आपकी धर्मपत्नी से प्रेम करता हूँ।
मिस्टर पुरी : (जैसे उन्हें अपने ऊपर विश्वास न हो) ठीक है, उसको सभी प्रेम करते हैं, वह ऐसी सुंदरी है, उसकी आत्मा ऐसी अपूर्व है, वह ऐसी सुंदरी है, ठीक है।
मनोज : मैं हँसी नहीं कर रहा हूँ।
मिस्टर पुरी : तब तुम मुझ पर अन्याय कर रहे हो! यदि ऐसे कठिन और विकराल सत्य को तुम हँसी में नहीं कह रहे हो। यदि तुम इसे अपनी कविता की तरलता और सरलता नहीं दे सकते, तो तुम मुझ पर अन्याय कर रहे हो। मनोज, यह तुम्हारा अन्याय है!
मनोज : यह आपका भ्रम है मिस्टर पुरी, मैं आपके ही अंतर से यह बात आपसे कहना चाहता हूँ। मैं आपके अंतस्तल में प्रविष्ट हो कर आपसे कहना चाहता हूँ कि 'श्यामा' आपकी नहीं है, वह मेरी है।
मिस्टर पुरी : तुम्हारी! तुमने अभी भी उसे मेरी धर्मपत्नी कहा है, अधर्मी निर्लज्ज!
मनोज : (व्यवस्थित) तुम मुझे केवल कटु वचन कह सकते थे और अब तुम अप-वचन भी कह रहे हो। ...पर श्यामा तुम्हारी नहीं है।
मिस्टर पुरी : (उत्तेजित स्वर में) क्यों?
मनोज : क्योंकि समाज की एक हृदयहीन लौह-विधि ने ही उसे तुम्हारी बनाया है, तुमने उसे पाने के लिए क्या त्याग किए हैं, तुम्हारा उस पर क्या स्वत्व है?
मिस्टर पुरी : (एक शहीद के स्वर में) मैं उसे प्यार करता हूँ ।
मनोज : (हँस कर) तुम उसे प्यार करते हो और तुम इस विडंबना को अपने जीवन का अंग बनाए हुए हो।
मिस्टर पुरी : (विकंपित और उत्तेजित स्वर में) मैं उससे प्रेम करता हूँ।
मनोज : तुम, जिससे उसकी एक भावना भी नहीं मिलती। तुम, जो उसे एक निर्जीव लता के समान अपने अंग में लपेटे रहना चाहते हो। तुम, जो केवल अपनी शारीरिक वासनाओं को तृप्त करना चाहते हो। तुम उसे प्यार करते हो? तुम, जो अपने सर्वोत्तम रूप में भी उसके साधारण-से-साधारण त्याग से निकृष्ट हो।
मिस्टर पुरी : (अत्यधिक उत्तेजित हो कर) मैं उसे प्रेम करता हूँ।
मनोज : ठीक है, तुम उसे प्रेम करते हो, जिसकी आशाओं और अभिलाषाओं की बलि करके तुमने अपने इस जीवन को रस दिया है। तुममें और उसमें क्या समानता है, तुम किस प्रकार उसके योग्य हो?
मिस्टर पुरी : (क्रोध से काँपते हुए) निकल जा मेरे घर से, निर्लज्ज! (उसे मारने दौड़ते हैं)
मनोज : (चीख कर) देखो, मेरे पास मत आना! मिस्टर पुरी, मैं आत्मघात कर लूँगा, अगर तुमने मुझे छुआ। मैं अपने जीवन का अंत कर दूँगा!
मिस्टर पुरी : (तनिक शांत हो कर) कायर!
मनोज : (वैसा ही अव्यवस्थित) तुम मेरी हत्या कर सकते हो। तुम, तुम, कायर तुम हो।
मिस्टर पुरी : (शांत हो कर) अच्छा आओ, मैं तुमसे शांत भाव में बातें करना चाहता हूँ। मैं... मुझे क्षमा कर दो।
मनोज : (वैसे ही) नहीं, मैं रानी से कहूँगा, तुम मेरी हत्या कर सकते हो।
मिस्टर पुरी : नहीं, इससे क्या लाभ! यहाँ आओ, मैं देखता हूँ कि मेरा-तुम्हारा केवल सैद्धांतिक मतभेद है। आओ, हम स्थिरचित्त हो कर बातें करें।
मनोज : (वैसे ही) नहीं, मैं रानी से कहूँगा, तुम मेरी हत्या कर सकते हो।
( बाहर मिसेज पुरी का कंठ स्वर सुन पड़ता है। दोनों एकाग्र हो कर उसी ओर ध्यान देते हैं)
मिस्टर पुरी : (व्यग्र हो कर) नहीं मनोज, इससे कोई लाभ नहीं। क्या तुम उसकी सहानुभूति भी मुझसे छीनना चाहते हो? क्या तुम चाहते हो कि वह मुझे एक पतित ईर्ष्यालु मनुष्य समझे? मैं तुमसे विनय करता हूँ, इसमें कोई लाभ नहीं है मनोज।
मनोज : (सहसा स्वस्थ हो कर) तब वह तुम्हारी कभी नहीं हो सकती। आह! तुम उससे अपना यथार्थ स्वरूप छिपाते हो। मैंने तुम्हारा वास्तविक रूप देखा है, और मैं तुमसे सहानुभूति करता हूँ। वह उसे नहीं जानती और तुमसे घृणा करती है।
मिस्टर पुरी : (हताश हो कर) आह!
( सहसा मिसेज पुरी का एक श्वेत साड़ी में प्रवेश। उसके केश रूखे और बिखरे हुए हैं। उसकी आकृति चाँदनी के समान सरल है। उसके आते ही मिस्टर पुरी व्यस्त दीखने का प्रयत्न करते हैं और एक क्षण चित्र की ओर देख कर गुनगुनाते हैं। दूसरे क्षण रेलवे टाइमटेबिल उठा कर पढ़ने लगते हैं)

मिसेज पुरी : (मनोज की ओर देख कर) मैं तुम्हारी कब से प्रतीक्षा कर रही हूँ मनोज!
मनोज : रानी, मैं...
(मिस्टर पुरी एक क्षण में आग्नेय और दूसरे में विनयपूर्ण नेत्रों से देखते हैं।)
मिसेज पुरी : अच्छा, अच्छा, आओ बाग में चलो, पर मैं तुम्हें तितलियाँ न पकड़ने दूँगी!
( वह उसे बाँह पकड़ कर बाहर ले जाती है। मिस्टर पुरी उनकी ओर कातर दृष्टि से देखते हैं।)
मिसेज पुरी : (द्वार के पास सहसा मुड़ कर) आप आज साँझ कहाँ भोजन करेंगे, कपूर के रेस्त्राँ में? मैं मनोज को मिसेज कौल के यहाँ ले जाऊँगी।
मिस्टर पुरी : मैं आज भोजन न करूँगा।
मिसेज पुरी : (तनिक चिंतित हो कर) क्यों, तुम्हारा स्वास्थ्य कैसा है? (सहसा लौट पड़ती है और उसके पास जा कर) देखती हूँ, तुम्हें अपनी तनिक भी चिंता नहीं है।
(मिस्टर पुरी दूसरी ओर शून्य भाव से ताकते हैं)
मिसेज पुरी : अच्छा मनोज, तुम थोड़ी देर पार्क में हो आओ। एक सिगरेट, केवल एक सिगरेट पीना।
(मनोज गुनगुनाता हुआ चला जाता है। मिसेज पुरी, मिस्टर पुरी के पास बैठ कर, उनसे बातें करने की चेष्टा करती हैं)

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