गबरघिचोर / भिखारी ठाकुर



कथा-सार


 अनिल कुमार चंचल 


भारत से सुदूर गाँव में ऐसा होता था कि युवक शादी-गवना के बाद अपनी बेरोजगारी से घबराकर काम-धंधा करके कमाने के उद्देश्‍य से नगरों, महानगरों या औद्योगिक स्‍थलों पर चले जाते हैं। वहाँ जाकर अधिक समय देकर भी कम आय होने तथा दुर्व्‍यसन में फँसकर घर की चिंता की उपेक्षा या किसी अन्‍य कारण से अपना कर्तव्‍य भूलकर अपनी ग्रामीण पत्‍नी को भी भूल जाते हैं। वैसा ही एक ग्रामीण युवक जो ऐसे गंदे विचारों का बन गया है, वह है गलीज।
इधर गाँव में अकेली पड़ी जवान महिला। पास-पड़ोस का काम या खेत-खलिहान में रोपनी, सोहनी, कटनी, पिटनी आदि का काम कर अपने लिए दोनों शाम का भोजन जुटाती है गलीज बहू। पति के घर आने की प्रतीक्षा में जी रही है।
जब से गाँव में शहरी हवा गई है और ताड़ी-दारू-शराब आदि का प्रवेश हुआ है, गाँव के वे परंपरागत संबंध चरमरा गए हैं। 'बहन, भाभी, चाची, दादी मानी जाने वाली महिलाएँ भी अब सामान्‍य नारी और भोग्‍या बन कर रह गई हैं। नारी की थोड़ी सी भी कमजोरी का लाभ ऐसे युवक उठाने में नहीं चूकते। ऐसी ही विवश नारी है - गलीज बहू, जिसका पति गलीज पंद्रह वर्ष पहले गाँव छोड़कर कमाने जाता है और पत्‍नी उपेक्षित गाँव में उसके पति-नाम के साथ विपत्ति में फँसी है और गाँव के ही एक मनचले युवक के साथ उसका अवैध संबंध हो जाता है। वह नारी इस परिस्थिति में भी स्‍वयं को नैतिक रूप से कमजोर नहीं मानती। जब इस गड़बड़ी से गड़बड़ होकर उसे पुत्र को जन्‍म देने का सौभाग्‍य मिलता है, तो वह अपने मातृत्‍व की गरिमा को समझती है और समाज की सारी लानतों के बावजूद वह अपने पुत्र का बड़े प्‍यार से लालन-पालन करती है, भले ही समाज उसके पुत्र को गबरघिचोर ही क्‍यों न कहे।
गबरघिचोर पंद्रह वर्षों का हो गया। वह अपनी माँ के साथ सुखपूर्वक रह रहा था। इस बीच गाँव का कोई व्‍यक्ति परदेश गया और वहाँ वह अचानक गलीज से मिल गया। उसने गलीज के घर, उसकी पत्‍नी और गबरघिचोर के विषय में उसे विस्‍तार से बताया। गलीज तो पहले से ही अपनी पत्‍नी को 'पागल' समझ रहा था; किंतु, उसके दिमाग में एक बात आई कि क्‍यों न वह गबरघिचोर को अपने साथ शहर ले आवे। वह कमाएगा और गलीज की आमदनी बढ़ जाएगी, वह अधिक सुख-सुविधा बटोर सकेगा।
गबघिचोर को अपने साथ शहर ले आने के उद्देश्‍य से ही गलीज अपने गाँव जाता है और अपनी पत्‍नी से ऐसा प्रस्‍ताव रखता है; किंतु वह अपने बेटे को उसके साथ शहर भेजने को तैयार नहीं होती है। वह जबर्दश्ती करता है, तब तक गड़बडी भी सारी लज्‍जा त्‍याग कर उससे उलझ जाता है; क्‍योंकि वह स्‍वयं को गबरघिचोर का वास्‍तविक पिता मानता है। बात बहुत उलझ जाती है। माँ अपने पुत्र को अपना सहारा समझती है, गड़बड़ी अपने को उसका वास्‍तविक पिता मानता है और गलीज अपनी पत्‍नी से उत्‍पन्‍न उस बालक पर अपना परंपरागत हक मानता है। विवाद आपस में सुलझता नहीं दीखता। तब पंचायत का सहारा लिया जाता है।
पहले गाँवों में जमींदार, पंडित या कुछ दबंग लोग गाँव के आपसी झगड़ों की पंचायत किया करते थे। पहले तो ऐसे पंचायत की निष्‍पक्षता और न्‍याय शंकाहीन होते थे; किंतु जैसे-जैसे ग्रामीण समाज बिगड़ता गया, उसकी विश्‍वसनीयता घटती गई और घूस लेकर या किसी अन्‍य कारण से पंचायत भी संदेह के घेरे में आने लगे।
ऐसे ही एक पंच आए गबरघिचोर के भाग्‍य का निर्णय करने कि उस पर किसका हक सबसे अधिक है। तीनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क अपने पक्ष में दिए और फिर गलीज एवं गड़बड़ी ने घूस देने की भी पेशकश की। न्‍याय प्रभावित होता रहा। निर्णय बदलते रहे। जब निर्णय को मानने के लिए कोई पक्ष तैयार नहीं हुआ, तो ग‍बरघिचोर को ही तीन हिस्‍सों में काट कर तीनों के बीच बराबर बाँट देने का भी अविवेकपूर्ण निर्णय हुआ, जैसे किसी वस्‍तु का बँटवारा हो। आदमी वस्‍तु बन गया।
जब तीन भाग में काटकर बाँट लेने की बात आई, तो गलीज एवं गड़बड़ी तो तैयार हो गए; किंतु उसकी माँ इस पर तैयार नहीं हुई। उसने पुत्र को काट कर बाँटने के बदले, उन दोनों पुरुषों में से ही किसी एक को जिंदा ही दे देने का प्रस्‍ताव रख अपनी ममता, सहृदयता और बुद्धिमत्ता का परिचय दिया।
अब गलीज एवं गड़बड़ी पंच को यह कह रहे थे कि गबरघिचोर को केवल दो टुकड़ों में काटकर एक-एक टुकड़ा दे दिया जाय।
पंच का विवेकपूर्ण गौरव जागता है। वह गलीज और गड़बड़ी की भर्त्‍सना करता है, डाँटता है और उनकी नीचता को सबके सामने रखता है और अंत में गबरघिचोर को उसकी ममतामयी असहाय माँ को सौंप देता है।
पात्र-परिचय
गलीज :      गाँव का एक परदेशी युवक।
गड़बड़ी :      गाँव का एक आवारा युवक।
घिचोर :      गलीज बहू से पैदा गड़बड़ी का बेटा।
पंच :        गाँव का एक मानिंद आदमी।
गलीज बहू :   गलीज की पत्‍नी और गबरघिचोर की माँ।
            जल्‍लाद , समाजी, दर्शक  आदि
समाजी :          (चौपाई)
सिरी गनेस पद सीस नवाऊँ। गबरघिचोरन के गुन गाऊँ॥
बहरा से गलीज घर अइलन। मुदित भइल ना दाम कमइलन॥
मेहर के ना भइलन साथी। झूमे जस मतवाला हाथी॥
एही से दुआर पर आई। निरखन लगे लोग बहूताई॥
घरनी सुनली अइलन पिया। रहि-रहि के हुलसत बा जिया॥
ले थारी जल पाँव पखारे। आजु जनम भये सुफल हमारे॥
गलीजबहू :  (गलीज से)        (कवित्‍त)
कमल उछाह (प्रसन्‍न्‍ता) जइसे सूरुज प्रकास होत, कुमुद (एक फूल) उछाह जइसे चंद्रमा परसते (स्‍पर्श होना)।
भौरन उछाह जइसे आगमन बसंत जानि, मोरन उछाह जइसे बरखा बरसते॥
हंसन उछाह जइसे मानसरोवर बीच, साधन उछाह इच्‍छा आवत अरसते॥
सबको उछाह एही भाँति उर होत अहै, हमरो उछाह स्‍वामी तोहरे दरसते।
गलीज : ई झंझट कइला के कुछ काम नइखे, जल्‍दी बतावऽ लइका कहाँ बा।
गलीज बहू :  (पति से)       (गाना - पूर्वी)
सिव-सती जी के पूत, देवन में मजगूत;
गिरत बानी तोहरे चरन में हो स्‍वामीजी!
गवना कराके गइलऽ, घर के ना सुधि कइलऽ;
मरतानी तोहरा बियोग में हो स्‍वामीजी!
हाथ-बाँहि धइला के, सादी-गवना कइला के;
आज ले ना कइलऽ निगाहवा हो स्‍वामीजी!
बबुआ भइलन पैदा, कुछ ना मिलल फैदा (फायदा, लाभ);
सब बिधि कइलऽ बेकैदा (नियम विरुद्ध) हो स्‍वामीजी!
आस मत नास करऽ, बेटा के रहे दऽ घर;
पगली के प्रान के आधार मोर हो स्‍वामीजी!
पोसत बानी बचेपन से, बबुआ के तन-मन से,
कसहूँ उपास (उपवास) आध पेट खा के हो स्‍वामीजी!
कहत ' भिखारी' नाई देहु खीस बिसराई (भूल जाना),
उजरल घर के बसा दऽ मोर हो स्‍वामीजी!
(अपना बेटा से) ए बबुआ! गोड़ पर गिरऽ, इहे तोहार बाबू हवन।
समाजी :       (चौपाई)
गिरत पुत्र पिता पग जाई। धरि के बाँह गोद बइठाई॥
गलीज : बेटा हमार चलऽ परदेस। काहे तूँ सहबऽ घरे कलेस (दुख)?
गबरघिचोर : माई के संग में लेके चलऽ , राखऽ अपने पास।
छोड़िके गइला से करिहन सब नर-नारी उपहास॥
गलीज : एह पागल के छोड़ दो बेटा , चलो हमारे साथ।
फिर ना ऐसा मोका क‍बहूँ, लगेगा तेरे हाथ॥
गलीज बहू : बबुआ के हम सोझा राखब, देख के करब सबूर।
सब बिधि से मत करऽ स्‍वामी, हमरा कर्म के चकनाचूर॥
गलीज : (बेटा के जबरदस्‍ती बाँहि धइ के झटकार के) चलऽ बेटा, तूँ चलऽ।
[ गड़बडी के आगमन आ बेटा के हाथ पकड़ के अपना ओर खिंचल]
समाजी : ( चौपाई)
तेहि अवसर गड़बड़ी तहँ आए। पुत्र मोर कहि रोब जमाए॥
तीनों में झगड़ा भये भारी। देखन लगे सकल नर-नारी॥
पंचित करन लगे सब लोगू। गबरघिचोरन केहि के जोगू॥
[ पंच आवतारन]
पंच : तीन आदमी में झगरा लागल बा, झगरा छूटत नइखे, जवना पंचाइत में हम बोलाबल गइल बानी। (गलीज का ओर देखावत) हइहे गलीज बाड़न। गलीज!
गलीज : हँ बाबा!
पंच : ईहे गलीज हवन। बिआह करके घर में जनाना बइठा देलन। अपने चल गइलन बहरा कमाए। बाहर से ना कबहीं खत (पत्र) भेजलन, ना खबर भेजलन, ना पाँच रोपेया मनिआडर भेजलन। एहिजा इसवरी (ईश्‍वरीय) माया! गलीज बो, हेने आउ। (गलीज बहू कुछ पास आवतारी) ईहे गलीज बो हऽ। एकरा एगो लइका पैदा लेले बाड़न। बबुआ गबरधिचोर होने आवऽ। (गवरधिचोर पास आवतारन) गाँव-नगर से बहरा में जाके केहू कहल ह कि गलीज तोहरा बेटा भइल बा। गलीज बहरा से आइल बाड़न कि छँबड़ा (कम उम्र का लड़का) के हम अपना जवरे (साथे) बहरा लिया जाइब। गलीज बो कहतिया कि हम असरा (आशा) लगा के जनमवलीं, पोसलीं-पललीं, छँबड़ा के काहें लिया जइबऽ? हमरो के लिया चलऽ। एही बात के दूनों बेकत में झगरा बा। एही बीच में हई गड़बड़ी कहत बाड़न कि हमार बेटा हऽ। गड़बड़ी, तू ई बतावऽ कि घिचोरवा में के हो के दावा कइले बाड़ऽ?
( चौपाई)
तुम गड़बड़ी कहहु एक बारा। कइसे बेटा भइल तुम्‍हारा॥
गड़बड़ी : घिचोरवा हमार बेटा नूँ हऽ, महारज!
पंच : का गलीजवा बो से तोहरो बिआह भइल रहे?
गड़बड़ी : ना।
पंच : माड़ो गाड़ि के ? बाजा बजा के ? नेवता नेवति के ?
गड़बड़ी : ना महराज!
पंच : तब तोर बेटा कइसे भइल रे बउराह लेके ?
गड़बड़ी : ए बाबा, हम जवन रउरा से कहत बानी, सुनी। हम रास्‍ता धइले जात रहीं, ओने से लरिकवा के मतरिया चल आवत रहे। हमरा से कुछ गलती हो गइल।
पंच : अइसे खाली गलती बात ना बोले के। राह में गलती हो जाई ?, तेसे का बेटो हो जाई? कवनो सबूत बा?
गड़बड़ी : हँ, बइठल जाव, हम साबूत देत बानी!
राह में पवलीं खाली (रुपये रखनेवाला बैग) जाली।
खोजत अइलन एगो कुचाली॥
रोपेया धइलीं लेलीं निकाल।
ले जास आपन खलिहा जाली॥
पंच : गड़बड़ी, हम तोहरा से ममिला पूछतानी, तूँ लगलऽ गीत गावे?
गड़बड़ी : हम गीत नइखीं गावत, आपन ममिले कहलीं हाँ रावाँ से।
पंच : बाकिर हमरा ना बुझाइल ह, ए बबुआ।
गड़बड़ी : हेने आईं, दू डेग बढ़ आईं, हम रावाँ के समुझा देतानी। हम रास्‍ता धइले चल जात रहीं। रास्‍ता में हमरा जाली मिलल अथवा डोंड़ा (कपड़े की रुपये रखनेवाली थैली, जिसे कमर में बांध लिया जाता है) मिलल अथवा मनीबेग मिलल। ओहमें हम आपन रोपेया-पइसा धइलीं। कुछ दिन का बाद में जाली अथवा मनीबेगवाला आपन चिन्‍ह गइल। त आपन मनीबेग ले जाई कि हमरा रोपेया-ढेबुआ (पहले का ए‍क छोटा सिक्‍का) सहिते लेले चल जाई ?
पंच : त ई बात तोहरा पहिले नूँ हमरा से कहल चाहत रहल हा। (दर्शक का ओर देखत) एह गरीब के राह में जाली मिलल अथवा डोंड़ा मिलल अथवा मनीबेग मिलल, ओह में ई आपन रोपेया-पइसा धइलस। कुछ दिन का बाद में मनीबेगवाला आपन मनीबेग चिन्‍ह गइल, त खाली आपन ऊ मनीबेग ले जइहन कि रोपेया-ढेबुआ सहिते लेले चल जइहन? बबुआ गबरघिचोर, तूँ चल जो गड़बड़ी में।
गबरघिचोर : ए बाबा, हम कुछ कहबऽ ।
पंच : का कहबऽ? कहे का बा से कहऽ, बाकी जाए के होई गड़बड़िये में।
गबरघिचोर :   सुनहूँ सभासद असल कहूँ, झूठ में लागी पाप।
             माई-बाबू छुटलन भइलन जालीवाला बाप॥
पंच : बेटा ले जो गड़बड़ी।
गलीज : हमार बेटा ह, गड़बड़ी कइसे लेके चल जइहन?
पंच : जननवाँ नूँ तोर ह, बउराह लेके।
गलीज : ऐं, छँवड़ा ह हमरा लेके।
पंच : मउगी के नूँ बाजा बजा के ले आइल बाड़ऽ। छँवड़ा के बाजा बजा के नइखऽ नूँ जनमवले? ई बतावऽ कि कतना दिन के वड़ा छँबड़ा आ भइल कितना दिन पर तूँ बहरा से आइल बाड़ऽ?
गलीज :      पंदरह बरिस भइल परदेस। ओहिजे लागल उमिर के सेस॥
           बेटा ले के बहरा जाइब। फिर ना घर में लात लगाइब॥
गलीज बहू :    तेरह बरिस के बबुआ भइलन। बेटा के खोजत बाबू अइलन॥
              लागत नइखे तनिको लाज। हँसत बाटे सकल समाज॥
गलीज : हटऽ, लाजवाली।
पंच : अइसन बेलज आदमी दुनियाँ में हम ना देखलीं। लजाए के जगहा कहीं ना मिले, त जाके समैना (शामियाना) का चोप (शामियाना का वह अंश, जहाँ बाँस या लोहे का टुकड़ा उसे सटा कर खड़ा किया जाता है) में मुँहे लगा दऽ।
गलीज : ए बाबा, रउरा बइठीं हम साबूत देतानीं।
गाछ लगवलीं कोंहड़ा के, लत्‍तर (लता) गइल पछुआर।
फरल (फलना) परोसिया के छप्‍पर पर, से हऽ माल हमार॥
पंच : गलीज! हम तोहरा से ममिला पूछतानी, तूँ लगलऽ ध्रुपद (संगीत का एक प्रकार एवं राग) गावे?
गलीज : हम आपन ममिला कहलीं हँ, ए बाबा!
पंच : यही में लपेट-लपेट कहलऽ ह, बाकी हमरा ना बुझाइल हा, ए बबुआ!
गलीज : ए बाबा हेने आईं, हम रावाँ के समुझा देतानी। हमरा कहूँ कोंहड़ा के एगो थाला (पौधा का प्रारंभिक रूप, स्‍थलीय रूप) मिल गइल। ओकरा के हम ले अइलीं। अपना अँगना में रोप (गाड़ देना) देलीं। ओकर सेवा-सजम कइलीं। ओकर लत्‍तर (बढ़ती हुई लता) बढ़त-बढ़त हमरा छप्‍पर से परोसिया के छप्‍पर पर चल गइल। एगो कोंहड़ा जाके फर गइल। त ऊ कोंहड़वा हमार ह महराज कि परोसिया के वा?
पंच : त ई बात पहिले नूँ हमरा से कहेला। (दर्शक का ओर देखत) एह गरीब का कहीं से कोंहड़ा के थाला मिलल। अपना अँगना में ले आके रोपलस। सेवा-सजम कइलस। लत्‍तर पसरत-पसरत परोसी के छप्‍पर पर जाके कोंहड़ा फर गइल। त का छप्‍पर के बदौलत (कारण) एकर कोंहड़वें तूर लीहन? जेकर थान तेकर कोंहड़ा। बबुआ गबरघिचोर, तूँ चल जो गलीजवा में।
गबरघिचोर : ए बाबा, हम कुछ कहबऽ।
पंच : का कहबऽ? कहे के बा से कहऽ, बाकी जाए के होई गलीजवे में।
गबरघिचोर : सब कहलन बाबू असल, सुनहूँ पंच दे कान।
हम बेसी कइसे कहीं, बालक अबुध नादान॥
पंच : ले जो गलीज, बेटा ले जो रे।
[ तीनों मे हल्‍ला-गुल्‍ला होता - ' बेटा हमार बा, बेटा हमार बाʼ]
गलीज बहू : (पंच से) ए बाबूजी, हमरा बबुआ के हो, बाँह उखाड़ल लोग हो दादा।
पंच : चुप रहऽ। केकर मजाल बा कि तोरा बबुआ के बाँह उखाड़ी लोग रे? मारब मूका जे पाताल में धँस जाई लोग।
गलीज बहू : बढ़नी (झाड़ू का एक प्रकार) मारो तोरा पंचाइत कइला के।
पंच : तें अनेरे नूँ हमरा पर लाल-पियर होतारिस।
गलीज बहू : लाल-पियर होखीं ना? कूदि के रावाँ हिनका के देतानी, कूदि के हुनका के देतानी। हमार बबूआ आ हमरा से कुछ पूछते नइखीं ।
पंच : नाक चुअवलू, त मारब मूका जे...। तबे से नाक चुअवले बाड़ी कि पूछते नइखीं, पूछते नइखी। तूँ केकरा से पूछ के ई सब कइले बाडू? हेने आवऽ, हेने आवऽ। तोरो से पूछब, हेने आवऽ। ई बतावऽ कि हई गड़बड़िया तोरा साथे झूठो के लंद-फंद बन्‍हले बा कि तोरा गड़बड़िया साथे कुछ बाटे?
गलीज बहू : जब रावाँ पूछत बानी, त हम कहत बानी। हइहे गड़बड़ी बाड़न, ए बाबुजी! सँझिया-बिहनियाँ रोज आवस, ए बाबूजी!
पंच : दुपहरियों मे आवत होई। कतनो गोड़ जरत होई, बाकी मानत ना होई।
गलीज बहू : कबो दुआरी पर बइठस ए बाबूजी, कबो केवारी के पाला ध के खड़ा होखस आ कइसन दोनी मुँह कइले राखस। रोज दिन के इहे दासा (स्थिति) हम देखीं, त एक दिन हम अपना मन में बिचार कइलीं आ सोचलीं कि हमरा पाले चीज बा, त हमरा छिपावल पार ना लागल ए बाबूजी !
पंच : तोरा पाले कवनो साबूत बा?
गलीज बहू : बइठीं, साबूत हम देत हईं ।
घर में रहे दूध पाँच सेर, केहू जोरन (जामन) दिहल एक धार।
का पंचाइत होखत बा, घीउ साफे भइल हमार॥
पंच : गलीज बो, हम तोरा से ममिला पूछतानी आ तें लगले झूमर गावे।
गलीज बहू : हम झूमर ना गवलीं हाँ, ए बाबुजी! हम आपन ममिला कहलीं हाँ। रावाँ नइखे समुझ में आवत, त हेने दू डेग (एक कदम से बढ़े हुए दूसरे कदम के बीच की दूरी यानि 3 फीट या 1 गज) बढ़ि आईं, हम समुझा देतानी।
पंच : कहऽ-कहऽ, ममिला में ना लजाए के। (दर्शक का ओर देखत) गलिजवा बो लाद (पेट) के साफा आदमी ह।
गलीज बहू : ए बाबूजी! पाँच सेर दूधवा अपना देहिया के मोकरर करतानी। बाकिर जोरनवाँ के कहे में लाज लागता।
पंच : कहऽ-कहऽ, ममिला में ना लजाए के, कहऽ अबगे त ममिला मोहड़ा (मुँह पर, सामनेवाली जगह, बैलगाड़ी का अगला भाग) पर आइल बा।
गलीज बहू : (गड़बड़ी का ओर इसारा करत) जोरनवाँ हिनके नूँ पसेनवाँ (पसीना) ह, बाबूजी!
पंच : ई बात तोरा पहिले नूँ हमरा से कहेला। मनलीं कि केहू के घर में दू सेर-चार सेर दूध धइल बा। ओकरा के अॅवटलस (बार-बार गर्म करना) पकवलस, टोला-महल्‍ला से तनीएसा जोरन ले आके ओकरा में लगा देलस। त का जोरन के बदौलत ओकर सउँसे करने (दही जमानेवाला मिट्टी का वर्तन) उठवले चल जइहें। जेकर दूध, तेकर घीव।
गलीज बहू : जेकर दूध, तेकर घीव काहे ना ए बाबूजी! हतने भर जोरनवाँ खातिर हमरा बबुआ पर दावा कइले बाड़न।
पंच : अरे बबुआ, तूँ चल जो अपना मतरिया में।
गबरघिचोर : बाबा ! हमहूँ कुछ कहबऽ।
पंच : कहबऽ का? कहे के बा से कह लऽ, बाकी जाए के बा मतरिये में।
गबरघिचोर : साँच बात कहली मइया , से हमरे मनमान।
झूठो झंझट लागल बा सुनहु पंच सज्ञान॥
पंच : ले जो गलीज बो! बेटा ले जो रे!
[ तीनों में फेर झगरा सुरू हो जाता। पंच के बेइमान बनावत बा लोग।]
गलीज : (उठि के पंच के धसोरत) चललऽ हा पंचायत करे कि हमनी में खून करावे?
पंच : हम का करीं? जेकर हक बा, सुपत (सच्‍चाई बना दावा) होता, तेकरा के हम देतानी।
गड़बड़ी : ए बाबा, एने आईं, सुनी।
पंच : कहे के बा से कहऽ। उठ-बइठ के ममिला ना होखे। जे देखी से कही कि बाबा बेइमान हवन।
गड़बड़ी : हेने आईं, बेइमान केहू ना कही।
पंच : (गड़बड़ी की ओर दू डेग बढ़के) का कहबे से कहऽ।
गड़बड़ी : हम रावाँ से कहतानी कि छँबड़ा के हमरा में रखवा देतीं, त रावाँ के हम दू सौ रोपेया देतीं।
पंच : कहऽ हो गड़बड़ी, आज ले बाबा का रोपेया के लोभ ना भइल, त आज तोहरा दू गो रुपली से बाबा के दिन जाए के बा?
गड़बड़ी : दू गो ना-नूँ कहली हँ?
पंच : दू सऽ कहऽ, चार सऽ। ए रोपेया कावर (की ओर) ताकेवाला बाबा के जीव हवन?
गड़बड़ी : दू गो ना कहली हँ, दू सौ देबऽ।
पंच : हमरा दुइये गो बुझाइल ह, ए बबुआ। दू सइ कहलऽ हऽ ?
गड़बड़ी : हँ, ए बाबा।
पंच : जो होने बइठ। ममिला में ना घबड़ाए के ह। गलीज-सलीज बेटा ले जइहन? तनी-मनी सवाँगन के खबर दे दीं, त इनकर चाम खींच लिहन स।
गलीज : ए बाबा, तनी हेने आईं।
पंच : कहे केबा से ओनहीं से कहऽ, ए बबुआ!
गलीज : ना, तनी दू डेग बढ़ आईं, ए बाबा! रउरा से तनी एगो भितरिया बात कहे का बा।
पंच : (गलीज का ओर दू डेग बढ़के) कहे के बा से कहऽ, ए बबुआ! जानते बाड़ऽ कि हम कतना भक्‍त आदमी ठहरलीं। बिना भोजन भइले स्‍नान ना होखे।
गलीज : छँबड़ा के कह-सुनके हमरा में रखबा देतीं, त रावाँ के हम पाँच सौ रोपेया देतीं।
पंच : तोहरा अइसन लोभी आदमी से हमरा दुख हो जाला। पाँच गो रुपली से बाबा के दिन जाए के बा?
गलीज : पाँच गो ना कहलीं हँ, ए बाबा!
पंच : पाँच गो ना- नूँ पाँच सइ कहऽ, पाँच हजार कहऽ, पाँच लाख कहऽ, रोपेया कावर ताकेवाला बाबा ना हवन।
गलीज : पाँच सौ नूँ कहतानीं।
पंच : पाँच सई? हमरा बुझाइल ह कि पाँच गों कहलऽ ह। सुनऽ ए बबुआ! रोपेया-पइसा कबनो चीज ना ह। ई त हाथ के मइल ह। आज बेटे बिहने नइखे। बाकी तोहरा घर से आ हमरा घर से तोहरा दादे का बेरा से निअराह चल आवत बा, ए बबुआ! ई निबाहे के बा। पाँच सइ नूँ कहलऽ देबे के?
गलीज : हँ, ए बाबा!
पंच : जो बइठऽ ग। गड़बड़ी कादो बेटा ले जइहन! ममिला में ना हड़बड़ाए के। (गलीज बो से) गलीज बो रे?
गलीज बहू : का ए बाबूजी!
पंच : तोर ममिला फेर से देखाई।
गलीज बहू : पहिले का देखाइल ह, ए बाबूजी!
पंच : ऊ तनी ऊपरे-ऊपरे देखाइल रहल ह।
गलीज बहू : (पंच का लगे जा के) हमरा पाले त रोपेया-पइसा नइखे, ए बाबूजी! कह-सुन के बबुआ के हमरा में रखवा देतीं, त हम राउर सेवा-सजम क देतीं, ए बाबूजी!
(गाना - पद) गलीज बहू के विलाप
ओदर (पेट) से हउअन बेटा हमार, ओदर से।
साँच बात में आँच लागत बा, पूछीं बोला के नाऊ-चमार। ओदर से...
पुत्र भइल जीभ स्‍वाद गइल सभ, तनिको ना खइलीं बेकार। ओदर से...
अब आगा पर दागा (दाग, बेईमानी) होखत बा, घेरलस ठग बटवार। ओदर से...
कहत ' भिखारी' तइयारी भइल जब, पिअला से दूध के धार। ओदर से...
(चौपाई)
चारो तरफ से उठल हावा। एह में नइखें केहू के दावा॥
बबुआ हउवन बेटा हमार। पूछीं बोला के नाऊ-चमार॥
नव महीना पेट के भीतर। रहसु त पूजलीं देवता-पितर॥
जनम के समय में दुख भइल। इहे बुझाय जे अब जीव गइल॥
होखत रहे राम से बात। असहीं होला जीव के घात॥
लालच में ना लउके जान। बेटा दिया दऽ हे भगवान॥
बबुआ भइल आसरा लागल। अब घेरले बा दू गो पागल॥
दूनों ओर के जोर बा भारी। राम-राम कहि रटत ' भिखारी'
हम अबला कछुओ ना जानी। पंच गोसइयाँ राखऽ पानी॥
झगड़ा के ना जानी भेद। होखत बा करेज में छेद॥
रो-रो कहे ' भिखारी' नाई। बेटा दिया दऽ काली माई॥
कुतुबपुर में बाटे घर। हमहीं हई बेटा के जर॥
जिला छपरा हउए खास। बबुआ में लागल बा आस॥
      (बेटा से बिलाप गान)
सिवसती गनपति, हरहु बेकार मति;
      चरन के चेरी के इयाद राखऽ हो बबुआ!
पेटवा भीतर माँही, गम कुछ रहे नाहीं;
      तबहीं से आसरा लगवलीं हो बबुआ!
बनि के तोहार कुली (बोझ ढोनेवाला मजदूर), लालच में गइलीं भूलि;
      नव मास ढोबलीं मोटरिया हो बबुआ!
दिन-रात हूल (कै) आवे, घर ना आँगन भावे;
      चलत में गोड़ भहरात (भड़कना) रहे हो बबुआ!
जब होखे लागल पीरा (प्रसव-पीड़ा), दुखवा समुझऽ हीरा;
      मुखवा से कहतानी कमती हो बबुआ!
सुनऽ दुलरू! कहीले से, चार दिन पहिले से;
      सउरी (प्रसूता गृह) में दाँत लागि जात रहे हो बबुआ!
केहू कहे हउवे दूत, केहू कहे हउवे पूत;
      केहू कहे भीमरे मुअल बा हो बबुआ!
केहू कहे मरि जाई, चुरइल धइले बा माई
      साँड़ासा (भीड़) सँघरानी (संहार करनेवाला) के खइलसि हो बबुआ!
अब-तब घरी रहे, ईहे सभ केहू कहे;
      चमइन हाथ लाके कढ़लसि हो बबुआ!
नया भइल जनम मोर, असहीं ह पैदा तोर;
      तेलवा लगाइ के अबटलीं (उबटन लगाने जैसा) हो बबुआ!
सुधि करऽ भइला के, गूह-मूत कइला के;
      माई मत जानऽ हमें दाई जानऽ हो बबुआ!
कहत ' भिखारी' नाई, कवन करीं उपाई;
      मुँहवाँ के तोहरे दुआरवा हो बबुआ!
कुतुबपुर हउवे ग्राम, रामजी सँवारऽ काम;
     जाति के हजाम जिला छपरा हो बबुआ!
पंच : रे बबुआ, तें मतरिया का रोबला से मतरिए में रहबे?
गबरघिचोर : रावां जेकरे में कहब, तेकरे में रहब।
पंच : बाह बा, रहे के बा तोहरा, बाबा काहें आपन ईमान खराब क देस? बाबा कहिहन कि तूँ इनरा में कूद जा, त कूद जइबऽ?
गब‍रघिचोर : कूद जाइब।
पंच : बाबा कहिहन कि तूँ आपन जान दे दऽ, त तूँ देबऽ ?
गबरघिचोर : दे देबऽ ।
पंच : हम कहब कि तोहरा में तीनों के हक बराबर बा। तोहरा देह नापि के काटि के तीन गो टुकड़ा कइल जाईं। तीनों में गोटी (बँटवारा का एक ग्रामीण तरीका) परी, तोरा कबूल बा ?
गबरघिचोर : हँ बाबा! क‍बूल बा ।
पंच : कबूल बा नूँ?
गबरघिचोर : कबूल बा।
पंच : जल्‍लाद के बोलावऽ रे!
समाजी : देहु खबर जल्‍लाद के जाई। सुनत बात आवत हरखाई॥
कर हथियार धार बनवाई। सभा मध्‍य में पहुँच आई॥
पंच : (गबरघिचोर से) बबुआ सूत रहऽ।
ग‍बरघिचोर : हम कुछ कहबऽ।
पंच : अच्‍छा कहऽ ।
[ पंच जल्‍लाद फरका बइठत बाड़ें]
गबरघिचोर : (रो-रो के)
अइसन लिखलन करम में बिधाता!
सुंदर नर-तन बिमल पाइ के टूटल जगत से नाता।
हीत-मित्र केहू काम न आवत, बैरी भइलन पितु-माता॥
सभा-मध्‍य में बध होखत बानी, सुनहु राम सुखदाता!
बड़ उपहास भइल घिचोर के, एको ना ' भिखारी' से कहाता॥
(चौपाई)
तीन जना में झगड़ा भइल। गबरघिचोरन के जीव गइल॥
जेकर हिस्‍सा जहाँ से होई। कोटि के बाँटि लेहु सब कोई॥
करनी के फल परल कपारा। तन पर चक्‍कू चलल हमारा॥
बड़का दुख परल जगबंदन। भइल अकाल मृत्‍यु रघुनंदन॥
जरिये चलली मइया कुचाली। छुडी का हाथे भइलि हलाली॥
रामचंद्र अवधेस कुमारा। बहे चाहत बा खून के धारा॥
लखन, भरत, सतरूधन भइया। भँवर से पार करहु मोर नइया॥
धनुस-बान धरि चारो भाई। एह अवसर पर होखऽ सहाई॥
ना कइलीं तीरथ-ब्रत-दान। बालकपन बा हे भगवान॥
माई-बाप के सेवा नाहीं। नाहक नर भइलीं जग माहीं॥
सिर पर पहुँचल तुरते काल। देरी भइल दसरथ के लाल॥
भइल सिकाइत जग में भारी। दूगो बाप एक महतारी॥
एह जीवन ले मूअल बेस (श्रेयस्‍कर)। सुभ गति दे दऽ सिरी अवधेस॥
जयति-जयति जय कौसल-किसोरा। नइखे आवत करे निहोरा॥
दाया तोर मोर अग्‍याना॥ करिहन तुरत परान पेयाना (प्रस्‍थान)॥
कुतुबपुर के कहे ' भिखारी' । जइसन मरजी होय तिहारी॥
(गाना)
धन-धन मालिक माया तेरा, लोक-बेद सब गाता है।
तीन लोक के बीच में एगो लिखनेवाला बिधाता है।
ऊँच-नीच करनी जैसा करता, वैसा फल पाता है।
माई, भाई, बाबू, कबीला झूठ जगत के नाता है।
गबरघिचोरन आज जगत से जमपुर को चल जाता है।
सभा-मध्‍य जल्‍लाद का हाथे छुड़ी गला से खाता है।
सूर्य उदय जब तक जीवन अब तुरत रात चलि आता है।
अंधकार का डर से मनुआँ रोकर के पछताता है।
कुतुबपुर के नाई ' भिखारी' तीनों झगड़ा गाता है।
महादेव के, पारबती के चरन में सीस नवाता है।
पंच : बस-बस। बस सूतऽ हेने।
[घिचोर सूत जात बाड़न। पंच देह नापके चिन्‍ह लगावतारन। जल्‍लाद के काटे के हुकुम दिआता।]
गड़बड़ी : देखिहऽ बाबा, ठीक से नपिहऽ, एने-ओने ना होखे पावे।
गलीज : हँ बाबा, ठीक से नापब।
पंच : रे बउराह सभ, जहाँ बबे बाड़न, तहाँ ऐने-ओने होई (जल्‍लाद से) रे एक छेव (कुदाल या तलवार से काटने के समय उसका प्रहार, स्‍थल) एहिजा से काटऽ, एक छेव एहिजा से काटऽ।
जल्‍लाद : ए बाबा, हम हूँ कुछ कहबऽ।
पंच : तें का कहेब, कहऽ।
जल्‍लाद : जै गो टुकड़ा करब हम! फी चवन्‍नी (रुपये के चतुर्थांश का सिक्‍का) से लेहब ना कम॥
पंच : कटइया त तोर मोनासिब बा। दऽ हो गड़बड़ी, चार आना (रुपये के सोलहवें अंश मूल्‍य का सिक्‍का) पइसा दऽ।
गड़बड़ी : लीं बाबा!
पंच : गलीज, चार आना (रुपये के सोलहवें अंश मूल्‍य का सिक्‍का) पाइस दऽ ।
गलीज : लीं, सरकार !
पंच : गलीज बो रे।
गलीज बहू : का ए बाबूजी?
पंच : चार आना पइसा दे तेहूँ।
गलीज बहू : चार आना पइसा का होई, ए बाबूजी !
पंच : तोरा छँवड़ा के कटाई देवे के बा।
गलीज बहू : ना ए बाबूजी‚ जिअते दूनों जाना में केहू के दे दीं।
पंच : देख तोरा बुझात नइखे, हम पुरान हो के तोरा के समुझा देतानीं। तोर जनमल ह, तोरो एक टुकड़ा हिस्‍सा मिल जाई, त तोर मन के अरमान रह जाई।
गलीज बहू : ना हमरा लइका के मत कटवाई, ए बाबूजी! जिअत दूनो जना में केहू एक जना के दे दीं।
गड़बड़ी : ए महराज! दुइये टुकड़ा करवाईं, ई झगरा छूटे ना दीही।
गलीज : ए महराज! दुइये टुकड़ा करवाईं।
जल्‍लाद : काटीं?
पंच : (हाथ से रोकत) रहऽ। हई गड़बड़ी कहत बाड़न - दू टुकड़ा हो जाय, हऊ गलीज कहताड़न - दू टुकड़ा हो जाव। जेकरा अपना बेटा के दाह (प्रेम, ममता, जलन) नइखे, तेकर बेटा कइसन? बेटा के दाह बा मतरिया के। उठाव बेटा, ले जो गलीज बो!
[ गलीज बो बेटा ले जा तारी]
समाजी : ज्‍यों बेटा माता के संग जाए। त्‍यों गलीज-गड़बड़ी लजाए॥
पंच : गाना ऊहे ह, जेह में मालिक के नाम होयं। नकल तमासा ऊहे चीज ह, जेह में धर्म के चर्चा होय। 'गबरघिचोर' नाटक में धर्म इहे समुझे के चाहीं, जे गबरघिचोर के मतारी कइसन दुख कहि के रोवल बाड़ी। गाना में, चौपाई में आ पूर्वी में जइसन लड़िका होखे में मतारी के दुख होला, जवना दुख में मतारी लोग के प्रान छूटि जाला, से सब बरनन करत बाड़ी। ई बात दुनियाँ में बेटा वास्‍ते उपदेस बा। गबर-घिचोर के मतारी एगो आ बाप दूगो। से बेटा पंच के तजबीज से आपन प्रान दे देबे पर तइयार बाड़न। ईश्‍वर से विनय करत बाड़न जे हम मतारी-बाप के कुछ सेवा ना कइलीं। एह बात के बेटा का मोह बा। बाकी आजकल के जो बेटा असल बा, से कह देता जे पंच के बात ना मानबऽ। खास करके उनुकरा अपने जान के फिकिर बा। माता-पिता के सेवा के फिकिर तनिको नइखे। सभा के अंदर गबरघिचोर कइसन चौपाई कहत बाड़न : -
मातृ-पिता के सेवा नाहीं। नाहक नर भइलीं जग माहीं॥

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