लघुकथा की प्रांसंगिकता पर काम हो





मॉर्टिन जॉन



बीती सदी के अस्सी /नब्बे का दशक(लघुकथा विधा के सन्दर्भ में ) हमारी स्मृति में अभी भी जीवित है जब लघुकथा विधा को समर्पित / पूर्णरूपेण केंद्रित लघुपत्रिकाएं नियमित रूप से नानाविध झंझावतों को झेलते हुए प्रकाशित होती थी ।उनमें 'लघुआघात'(संपादक :स्व.विक्रम सोनी ) और ' मिनीयुग'(संपादक :जगदीश कश्यप,कुलदीप जैन) का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है ।अलावा इसके उस दौर में अनेकानेक लघुपत्रिकाएं लघुकथा पर एकाग्र विशेषांक निकालती थी । यहाँ तक कि बहुप्रसारित , बहुपठित कथा मासिक ' सारिका' ने भी अपने एक - दो अंक लघुकथा के नाम सपर्पित किया था ।.....मौजूदा दौर में पूर्वापेक्षा भारी तादाद में लघुपत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा है । लेकिन जहाँ तक मेरी जानकारी है ,भाई बलराम अग्रवाल के अतिथि सम्पादन में 'अविराम साहित्यिकी'के लघुकथा विशेषांक के प्रकाशन के बाद भाई विकेश निझावन ने 'पुष्पगंधा' के अद्यतन अंक को गम्भीरतापूर्वक लघुकथा के नाम सपर्पित करने का श्रमसाध्य कार्य किया है । प्रस्तुत अंक में किसी न किसी रूप में लघुकथा लेखन से जुड़ी तीन पीढ़ियों को समेटने का स्तुत्य प्रयास किया गया है ।एक और जहाँ हरिशंकर परसाई (प्रख्यात व्यंग्याकार ) विष्णु प्रभाकर , चित्रा मुदगल ,हिमांशु जोशी ,सुधा ओम ढींगरा , संतोष श्रीवास्तव की लघुकथाओं ने इस अंक को गरिमामय स्वरूप प्रदान किया है वही वरिष्ठ लघुकथाकारों - कमल चोपड़ा , मधुदीप , रूप देवगुण , जयश्री रॉय , उर्मि कृष्ण , शमीम शर्मा , राज कुमार गौतम , मुकेश शर्मा , अशोक भाटिया , अशोक जैन,राम कुमार आत्रेय, पूरन सिंह , केदार नाथ सविता , राम निवास मानव , सिद्धेश्वर , फजल इमाम मल्लिक , सैली बलजीत , मृत्युंजय तिवारी , महावीर रावांल्टा , मार्टिन जॉन , डा.मुक्ता की उत्कृष्ट लघुकथाओं ने भी अंक को समृद्ध किया है ।समकालीन लघुकथा परिदृश्य में अपनी रचनात्मक ऊर्जा के साथ उपस्थिति दर्ज़ कराने वाले लघुकथाकार अरविन्द कुमार खेड़े , रणजीत टाडा , अरविन्द मुकुल , अशोक दर्द की प्रतिनिधि लघुकथाएँ भी प्रस्तुत अंक को उम्दा बनाती है ।
लब्ध प्रतिष्ठित व्यंग्याकार हरिशंकर परसाई और 'सारिका'के संपादक अवध नारायण मुदगल से लघुकथाकार मुकेश शर्मा की लघुकथा विषयक दुर्लभ बातचीत , अग्रिम पंक्ति के लघुकथाकार कमल चोपड़ा का एकमात्र सारगर्भित आलेख निश्चित रूप से इस अंक की उपलब्धि है ।
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