शनिवार, 23 दिसंबर 2023

भोजपुरी के शेक्सपियर : भिखारी ठाकुर / नलिनी वर्मा

 

भिखारी ठाकुर: भोजपुरी के 'शेक्सपियर' और भारत के जीनियस की कहानी

भिखारी ठाकुर

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  • Author,नलिन वर्मा
  • पदनाम,वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

भोजपुरी बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई इलाकों में बड़े पैमाने पर बोली और समझे जाने वाली भाषा है.

भोजपुरी फिल्म और गीत-संगीत के अलावा लोक संगीत का दायरा भी काफ़ी विस्तृत है और इसकी एक पहचान के तौर पर भिखारी ठाकुर हमेशा याद किए जाते रहेंगे.

आधुनिकतम तकनीक के दौर में लोक संस्कृति को बचाने का संकट है, ऐसे में भोजपुरी समाज के लिए भिखारी ठाकुर की विरासत को बचाने की चुनौती है.

भिखारी ठाकुर का जन्म बिहार के एक ग़रीब और उपेक्षित हजाम परिवार में 18 दिसंबर, 1887 को हुआ था.

ग़रीबी और वर्ण व्यवस्था के तहत निचली जाति में आने के चलते भिखारी ठाकुर को पढ़ने लिखने का मौका नहीं मिला.

भिखारी ठाकुर

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जानवर चराने जाना और गुनगुनाना

बचपन में वे गाय-भैंस चराने लगे थे.

जानवरों को चराने के समय ही भिखारी ठाकुर अपनी मधुर आवाज़ में गाते गुनगुनाते थे. वे पढ़ तो नहीं सकते थे लेकिन सुनकर याद करने लगे और इस दौरान उन्होंने रामचरितमानस की चौपाइयां, कबीर के निर्गुण भजन और रहीम के दोहों को कंठस्थ किया.

यहां से शुरुआत करके वे भोजपुरी गीत संगीत की दुनिया के सबसे बड़े आयकन बने.

उनका गांव कुतुबपुर पुराने शाहाबाद (अब भोजपुर ज़िला) का हिस्सा है. लेकिन गंगा नदी के रास्ता बदलने की वजह से 1926 में कुतुबपुर सारण ज़िले का हिस्सा हो गया.

बचपन में ही उनकी शादी मतुआ देवी से हो गई और जल्दी ही वे शिलानाथ के पिता भी बन गए.

जानवरों को चराने के अलावा परिवार का गुज़र बसर चलाने के लिए भिखारी ठाकुर अपने पुश्तैनी नाई का काम करने लगे थे. 1927 में आकाल के बाद वे आजीविका कमाने के लिए पहले खड़गपुर और फिर बाद में जगन्नाथपुरी गए.

भिखारी ठाकुर

दूसरे राज्य गए पर ज़िंदगी नहीं बदली

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हिंदू धर्म के रीति रिवाजों और संस्कारों के लिए हजाम, ब्राह्मणों की तरह ही महत्वपूर्ण माने जाते हैं.

उदाहरण के लिए हजाम की ज़रूरत मुंडन, जनेऊ, शादी और श्राद्ध सभी जगहों पर होती है. लेकिन सामाजिक पायदान पर उनकी हैसियत पुजारी जितनी नहीं होती है. उन्हें ‘निचली जाति’ का माना जाता है, यही वजह है कि भिखारी ठाकुर को भी अपने जीवन में ख़राब व्यवहार और अपमान का दंश झेलना पड़ा.

लेकिन उनकी गायकी ने उन्हें सामाजिक जटिलताओं और विसंगतियों की तरफ़ देखने का अवसर भी मुहैया कराया.

उन्होंने समाज को बारीक़ी से देखा और उसे लोकगीतों के माध्यम से आम लोगों के सामने रखा.

आजीविका के सिलसिले में उन्हें प्रवासी मज़दूर के तौर पर दूसरे राज्य में जाना पड़ा. वहां भी उन्होंने प्रवासी मज़दूरों के दर्द और तकलीफ़ को नज़दीक से देखा. भिखारी ठाकुर उसे विदेश (हालांकि वो देश के अंदर ही एक राज्य से दूसरे राज्य गए थे) कहते थे.

विदेश जाकर भी कमाने से उनके परिवार की हैसियत में कोई बदलाव नहीं आया.

इस दौरान वे अपने गांव के लोगों और परिवार वालों की कमी महसूस करते थे. कुछ साल बाहर रहने के बाद वे अपने गांव कुतुबपुर लौट आए थे, ताकि सुख दुख अपने परिवार और गांवों के लोगों के बीच ही मना सकें.

बिहार राष्ट्र भाषा

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जीनियस से कम नहीं थे भिखारी ठाकुर

भिखारी ठाकुर अपने समय में किसी जीनियस से कम नहीं थे. वे पढ़े लिखे नहीं थे, समाजिक हैसियत भी नहीं थी लेकिन वे लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाना जानते थे, लोगों का मनोरंजन करना जानते थे.

गायकी के अलावा अभिनय और नृत्य को भी उन्होंने साध लिया था.

वे कई तरह के वाद्य यंत्रों को भी बजाने लगे थे. इतना ही नहीं उन्होंने गांव के लोगों को इसकी ट्रेनिंग देकर एक मंडली बना ली. वे अपनी नाट्य मंडली के संगीतकार और निर्देशक भी खुद ही थे.

उन्होंने गांव के लोगों में से गायक, अभिनेता, लबार (जोकर) और संगीतकारों की टीम बनाई.

भिखारी ठाकुर के पास नाटक करने के लिए कोई मंच नहीं था. वे चौकी (लकड़ी की चारपाई) को किसी पेड़ के नीचे रखकर स्टेज बना लेते थे और ढोलक, झाल और मजीरा के साथ लोगों का मनोरंजन करते थे.

असल मायनों में भिखारी ठाकुर को भारत में ओपन एयर थिएटर का जनक माना जा सकता है.

भिखारी ठाकुर की नाट्य मंडली कजरी, होली, चैता, बिरहा, चौबोला, बारामासा, सोहार, विवाह गीत, जंतसार, सोरठी, अल्हा, पचरा, भजन और कीर्तिन हर तरह से लोगों का मनोरंजन करने लगी थी. लेकिन भिखारी ठाकुर अपने कविताई अंदाज़ में जिस तरह से सामाजिक सच्चाइयों को पेश करते थे, उसमें मनोरंजन के साथ साथ तंज़ भी होता था.

उन्होंने अपनी टीम के साथ सभी तरह की सामाजिक कुरीतियों, मतलब समाज में उपेक्षित लोगों के साथ होने वाले अत्याचार, धार्मिक रुढ़ियों, संयुक्त परिवार के घटते चलन, बाल विवाह, बेमेल विवाह, विधवाओं का दर्द, बुजुर्गों की उपेक्षा, नशाखोरी, दहेज प्रथा और साधु संतों के वेश में ठगतई जैसे तमाम मुद्दों पर लोक गीत बनाए.

भिखारी ठाकुर
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2021 में बिहार के रामचंद्र मांझी को पद्मश्री सम्मान से नवाज़ा गया था. रामचंद्र मांझी और उनकी मंडली कई सालों से भिखारी ठाकुर के नाटकों का मंचन करते आ रहे हैं.

कभी स्कूल नहीं गए पर लिखी 29 किताबें

भिखारी ठाकुर किस प्रतिभा के धनी थे, इसका अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि वे खुद स्कूल नहीं गए लेकिन उन्होंने लोकगीतों पर 29 किताब लिखीं जो कैथी लिपि में थीं.

इन किताबों को बाद में देवनागरी लिपि में बदला गया. इनका पूरा संकलन बिहार राष्ट्रभाषा परिषद ने भिखारी ठाकुर रचनावली के नाम से प्रकाशित किया है. इनमें बेटी वियोग, विदेशिया, ननद भौजाई, गबर घिचौर और कलियुग का प्रेम जैसे लोक नाटक बेहद चर्चित रहे.

बेटी वियोग, शादी के बाद घर परिवार से बेटी की विदाई के दुख पर आधारित लोक नाटक है, तो विदेशिया उस महिला के दर्द की दास्तां है जिसका पति आजीविका कमाने के लिए विदेश (दूसरे राज्य) गया हुआ है. ननद-भौजाई, एक बहन और उसके भाई की पत्नी के बीच नोंकझोंक भरे रिश्ते की कहानी है.

गबरघिचौर नाटक, एक महिला के सेक्सुअल अधिकारों पर टिप्पणी करता है.

हिंदी साहित्य में भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटकों को जागरण का वाहक माना जाता है. लेकिन उससे काफी पहले भिखारी ठाकुर ने अपने नाटकों में महिलाओं के दर्द और तकलीफ़ को बखूबी उकेरा है. विदेशिया नाटक की महिला किरदार अपने पति को याद करती है, - पिया मोरा गैलन परदेस, ए बटोही भैया. रात नहीं नीन, दिन तनी ना चैनवा.

भिखारी ठाकुर के लोक नाटकों पर महान हिंदी साहित्यकार राहुल सांकृत्यान ने लिखा है, “हमनी के बोली में कितने जो हवअ, केतना तेज़ बा, इ सब अपने भिखारी ठाकुर के नाटक में देखिला. भिखारी ठाकुर हमनी के अनगढ़ हीरा हवें.”

भिखारी ठाकुर के नाटक का मंचन
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भिखारी ठाकुर के नाटक का मंचन

सेक्सुअल अधिकारों की वकालत

भिखारी ठाकुर के एक दूसरे नाटक गबरघिचौर में महिला का पति विदेश कमाने गया हुआ है और वह गांव के किसी अन्य शख़्स के साथ संबंध बना लेती है और अपने सेक्सुअल अधिकारों की वकालत करती है, “घर में रहे दूध पांच सेर, केहू जोरन देहल एक धार. का पंचायत होकात बा, घीऊ साफे भेल हमार.”

भिखारी ठाकुर की करीब तीन चौथाई रचनाएं पद्य के तौर पर हैं जिनमें मेलोड्रामा, भक्ति और सांसारिक प्रेम, उदासी और एकजुटता की खुशी, प्रेम, घृणा और क्रोध, हास्य और तीखे व्यंग्य छंदों में लिखे गए हैं.

आमतौर पर, उनके लोक नाटकों के पात्र दलित और निचली जातियों से आते हैं, यह किरादारों के नामों से भी पता चलता है. उपदार, उदवास, झंटुल, चटक, चेथरू, अखाजो और लोभा जैसे नाम उनके किरदारों के रहे हैं.

भिखारी ठाकुर के दौर में ग्रामीण परिवेश में महिला कलाकार आसानी से नहीं मिलते होंगे, यही वजह थी कि वे पुरुषों को महिलाओं की वेशभूषा में महिला किरदार निभाने के लिए प्रेरित करने लगे थे.

इस तरकीब के ज़रिए उन्होंने महिलाओं के मुद्दों को कुशलतापूर्वक दर्शाया और मंचित किया. भिखारी ठाकुर से प्रेरणा लेते हुए दूसरे लोक कलाकारों ने भी नाच पार्टियों का गठन किया, जो टीवी और इंटरनेट के दौर से पहले ग्रामीण समाज में लोगों का मनोरंजन किया करते थे.

आज तकनीक और प्रोद्यौगिक का दौर बढ़ा है और मनोरंजन के तमाम नए विकल्प मौजूद हैं. लेकिन क्या उन सवालों का हल मिल गया है जिसे भिखारी ठाकुर ने अपने लोक नाटकों के माध्यम से उठाया था?

इसका जवाब है नहीं.

आज भी समाज में नशाखोरी और दहेज प्रथा मौजूद है. समाज में आज भी असमानता, भेदभाव और अन्याय मौजूद हैं. जाति और धर्म के नाम पर सामाजिक उत्पीड़न हो रहा है. समाचार पत्रों और समाचार चैनलों में उपेक्षित लोगों और महिलाओं पर अत्याचार की ढेरों कहानियां आती रहती हैं और सरकारें इस समस्या से उबरने के लिए नए क़ानून बनाने और उसे लागू करने में व्यस्त हैं.

Bhikhari Thakur Repertory Training & Research Centre

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भिखारी ठाकुर की विरासत बचाए रखना ज़रूरी

ऐसे में भिखारी ठाकुर की विरासत को बचाए रखना बेहद ज़रूरी है. राहुल सांकृत्यायन ने ठीक ही ज़ोर देकर कहा है, "भिखारी ठाकुर की कला और साहित्य में सभी गुण विद्यमान हैं. बस ज़रूरत इस बात की है कि उनकी कृतियों वाले सोने की खान से चमचमाते आभूषण तैयार किए जाएं."

ज़ाहिर है, राहुल सांकृत्यायन ने भिखारी ठाकुर पर और अधिक शोध और अध्ययन की ज़रूरत बताई है.

कुछ विश्लेषक शिष्टता के साथ भिखारी ठाकुर की तुलना 16वीं सदी के विख्यात नाटककार शेक्सपियर से करते हैं और उन्हें 'भोजपुरी का शेक्सपियर' के रूप में याद करते हैं. लेकिन शैक्षणिक दृष्टि से यह अधिक विवेकपूर्ण है कि भिखारी ठाकुर को भिखारी ठाकुर ही रहने दिया जाए और भारतीय संदर्भ में उनका अधिक अध्ययन किया जाए.

भिखारी ठाकुर के जीवन का बड़ा हिस्सा ग्रामीण इलाकों में आम लोगों को परेशान करने वाले मुद्दों पर जीवंत प्रस्तुतियों में गुज़रा.

उन्होंने और उनकी मंडली ने बिहार, बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और नेपाल के कुछ हिस्सों की यात्राएं भी कीं, लेकिन उनकी कला मॉरीशस, गायाना, सूरीनाम, टोबैगो और कई अन्य अफ्रीकी देशों तक पहुंची जहां भारत से गिरमिटिया मज़दूर गए थे.

भिखारी ठाकुर अपने परिवेश में रामलीला और रासलीला देखते हुए बड़े हुए थे.

जीवन के अंतिम सालों में उन्होंने अपना अधिकांश समय भगवान राम, सीता, कृष्ण और गणेश की भक्ति में बिताए. विरासत में लोक नाटक और लोक कथाओं के विशाल भंडार छोड़कर 10 जुलाई 1971 को पैतृक गांव में भिखारी ठाकुर का निधन हुआ था.

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सोमवार, 4 दिसंबर 2023

गरमाहट / गुलज़ार

 न जाने क्यों महसूस नहीं होती वो गरमाहट, 

इन ब्राँडेड वूलन गारमेंट्स में,

जो होती थी 

दिन- रात, उलटे -सीधे फन्दों से बुने हुए स्वेटर और शाल में.


आते हैं याद अक्सर 

वो जाड़े की छुट्टियों में दोपहर के आँगन के सीन,

पिघलने को रखा नारियल का तेल, 

पकने को रखा लाल मिर्ची का अचार.


कुछ मटर छीलती,

कुछ स्वेटर बुनती, 

कुछ धूप खाती

और कुछ को कुछ भी काम नहीं,

भाभियाँ, दादियाँ, बुआ, चाचियाँ.


अब आता है समझ, 

क्यों हँसा करती थी कुछ भाभियाँ ,

चुभा-चुभा कर सलाइयों की नोक इधर -उधर,

स्वेटर का नाप लेने के बहाने,


याद है धूप के साथ-साथ खटिया

और 

भाभियों और चाचियों की अठखेलियाँ.


अब कहाँ हाथ तापने की गर्माहट,

वार्मर जो है.


अब कहाँ एक-एक गरम पानी की बाल्टी का इन्तज़ार,

इन्स्टेंट गीजर जो है.


अब कहाँ खजूर-मूंगफली-गजक का कॉम्बिनेशन,

रम विथ हॉट वॅाटर जो है.


सर्दियाँ तब भी थी 

जो बेहद कठिनाइयों से कटती थीं,

सर्दियाँ आज भी हैं, 

जो आसानी से गुजर जाती हैं.


फिर भी 

वो ही जाड़े बहुत मिस करते हैं,

बहुत याद आते हैं.

                            

-गुलज़ार-

रविवार, 3 दिसंबर 2023

रंगारंग कार्यक्रम की रंगीन यादें

 प्रिय साथियो,

नमस्कार। अच्छी खासी ठंड शुरू हो गई है। आपसे २८ नवंबर, मंगलवार की एक रंगारंग शाम का अनुभव साझा कर रही हूँ जो हमारे भारतीय भाषा संस्कृति संस्थान–भाषा भवन, गुजरात विद्यापीठ का स्नेह मिलन और फूड फेस्टिवल था।

हमारे इस संस्थान में २३ भाषाएँ पढ़ाई जाती हैं जिसमें देसी और विदेशी भाषाएँ हैं। पूरे भारत में अपनी तरह का यह एक अलग ही भाषा भवन है जिसकी परिकल्पना गांधी जी ने की थी।

कार्यक्रम के अध्यक्ष डॉ.हर्षद भाई पटेल जी थे जो गुजरात विद्यापीठ के ट्रस्टी तथा मंत्री एवं आईआईटीई (IITE) और चिल्ड्रन यूनिवर्सिटी गांधीनगर के वाइस चांसलर हैं।  कार्यक्रम के अतिथि विशेष गुजराती भाषा के प्रसिद्ध कहानी लेखक तथा निवृत्त कलेक्टर श्री किरीट दुधात जी थे। 

प्राध्यापक डॉ.मिहिर उपाध्याय ने सरस्वती वंदना की और मेहमानों ने द्वीप प्रज्वलित किया। गुजरात विद्यापीठ की परंपरा के अनुसार सूत की माला के साथ महमानों का स्वागत किया गया। डॉ.सलमा शेख ने महमानों का परिचय दिया। डॉ.उषा उपाध्याय जो हिंदी भवन और भारतीय भाषा संस्कृति संस्थान की निदेशक हैं, उन्होंने स्वागत प्रवचन किया और संबोधन में कहा कि “मातृभाषा का क्या महत्व है इस बारे में गांधी जी ने ‛हरिजन’ न्यूज़लेटर में लिखा था कि हर एक व्यक्ति को अपनी भाषा पूर्ण रूप से आनी चाहिए और दूसरी भाषा के साहित्य का हिंदी के माध्यम से प्रसार होना चाहिए”।

अतिथि विशेष श्री किरीट दुधात जी ने बहुत सुंदर प्रवचन किया और मातृभाषा का क्या महत्व है उस बारे में एक छोटी सी कहानी कहकर श्रोताओं का मन जीत लिया। उन्होंने कहा “दो पड़ोसी महिलाएँ झगड़ा कर रही थीं तो एक ने दूसरी को श्राप दिया कि तेरा जो एक दांत दुखता है उसके अलावा सभी दांत गिर जाएँ, तो दूसरी ने भी क्रोध में उसे श्राप दिया कि तू अपनी मातृभाषा भूल जाए”। कोई अपनी मातृभाषा ही भूल जाए तो उसकी क्या पहचान रहेगी? क्या श्राप है!

डॉ.हर्षद पटेल जी ने नई शिक्षा नीति की चर्चा की और ‛एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की परिकल्पना में जो काम भाषा के लिए हो रहा है उसे बताया। भाषा भवन के दो प्राध्यापक - मैं, डॉ.अंजना संधीर, हिंदी और अंग्रेजी की प्राध्यापक तथा डॉ.मिहिर उपाध्याय, संस्कृत के प्राध्यापक को उनकी इस वर्ष विशेष उपलब्धियोँ के लिए सम्मानित किया गया जो हम दोनों के लिए ही आश्चर्य चकित करने वाला था क्योंकि हमें इस बारे में जरा भी जानकारी नहीं थी। यह कमाल भवन की निदेशक डॉ.उषा उपाध्याय जी का था।

तत्पश्चात छोटा सा सांस्कृतिक कार्यक्रम था जिसमें अरबी भाषा के छात्र ने सूफी गीत अरबी में सुनाया, उर्दू के विद्यार्थियों ने चार बैंत यानी अंताक्षरी के समान खेल शेर सुनाकर सबका मन जीत लिया, एक छोटी छात्रा द्वारा मलयालम भाषा में कविता सुनाई गई, फ्रेंच के छात्रों ने छोटा सा नाटक प्रस्तुत किया फ्रेंच भाषा के महत्व के बारे में, अंग्रेज़ी के छात्रों ने ‛वि शॉल ओवर कम’ (We Shall Overcome) विश्व शांति का गीत गाया जिसे मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने अंग्रेजी में लिखा है और यूएनओ (UNO) में इसे विश्व शांति का गीत माना गया है। विश्व की सारी भाषा में इसका अनुवाद हो चुका है लेकिन यह ओरिजिनल अंग्रेज़ी में ही लिखा गया था जिसे हम सब ‛हम होंगे कामयाब’ के नाम से गाते हैं। इसके बाद संस्कृत के छात्र ने वेद गान प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का सफल संचालन संस्कृत के प्राध्यापक डॉ.मिहिर उपाध्याय ने किया और आभार दर्शन डॉ.अंजना संधीर ने किया। तत्पश्चात सभी ने प्राध्यापकों द्वारा तैयार किये गए विभिन्न व्यंजनों का आनंद उठाया। कुछ पुराने छात्र भी कार्यक्रम में शामिल थे।

भाषा के साथ संस्कृति जुड़ी है और जुड़ा है उस संस्कृति का भोजन जिसका बढ़िया आयोजन था, जिसकी आयोजन व्यवस्था मुझ पर थी, आनंद आया। आप देखिए कुछ तस्वीरें और वीडियोस और आइये सीखने १३ भारतीय और १० विदेशी भाषाएँ। ‛एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की मिसाल का हिस्सा भी बने।

शुभकामनाओं सहित,

–डॉ.अंजना संधीर

गुरुवार, 23 नवंबर 2023

सच्ची दोस्ती /

 🪴"""""""”l"""🪴

     बचपन की मित्रता


🌸 जय श्री राधे  🌸_*

_उन चारों को होटल में बैठा देख,रमेश हड़बड़ा गया._


_लगभग *25 सालों* बाद वे फिर उसके सामने थे._


 _शायद अब वो बहुत बड़े और संपन्न आदमी हो गये थे!_

 _*रमेश को अपने स्कूल के दोस्तों का खाने का आर्डर लेकर परोसते समय बड़ा -अटपटा लग रहा था.*_


_उनमे से दो मोबाईल फोन पर व्यस्त थे- और दो लैपटाप पर!_


 _रमेश पढ़ाई पुरी नही कर पाया था. *उन्होंने उसे पहचानने का प्रयास भी नही किया!*_

  _वे खाना खा कर बिल चुका कर चले गये!_


          _रमेश को लगा - उन चारों ने शायद उसे *पहचाना नहीं, या उसकी गरीबी देखकर* जानबूझ कर कोशिश नहीं की._


   _*उसने एक गहरी लंबी सांस ली और टेबल साफ करने लगा।*_


_टिश्यु पेपर उठाकर कचरे मे डलने ही वाला था,_


_शायद उन्होंने उस पर कुछ जोड़-घटाया था!_


_अचानक उसकी नजर उस पर लिखे हुये शब्दों पर पड़ी!_


_लिखा था - अबे साले तू हमे खाना खिला रहा था- तो तुझे क्या लगा- हम तुझे पहचानेंगे नहीं.....?_


     _*अबे 20 साल क्या- अगले जनम बाद भी मिलता तो तुझे पहचान लेते*._


 _तुझे टिप देने की हिम्मत हममे नही थी!_


_हमने पास ही फैक्ट्री के लिये जगह खरीदी है और अब हमारा इधर आन-जाना तो लगा ही रहेगा।_


_*आज तेरा इस होटल का आखरी दिन है!*_


 _हमारे फैक्ट्री की कैंटीन कौन चलाएगा बे! तू चलायेगा ना....?_

_तुझसे अच्छा पार्टनर और कहां मिलेगा....???_

 _याद हैं न स्कुल के दिनों हम पांचो एक दुसरे का टिफिन खा जाते थे. आज के बाद रोटी भी मिल बाँट कर साथ-साथ खाएंगे._


       _*रमेश की आंखें भर आई*_


_सच्चे दोस्त वही तो होते है जो दोस्त की कमजोरी नही सिर्फ दोस्त देख कर ही खुश हो जाते है।_

_*धीरज, धर्म, मित्र, अरु नारी।*_

_*आपद काले परखिए चारी।।*_

_भगवान से अच्छा मित्र कोई नही हो सकता।_

_Friends day तो अब  कुछ और ही मकसद के लिए मनाया जाता है,ये विदेशीयों की देने है,खाओ पियो मोज करो।_

_मित्रता मनानी है,और जाननी है तो,भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा , भगवान श्रीराम और विभीषण,भगवान श्रीराम और सुग्रीव,भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन,  इत्यादि के विषय मे पढ़े।_

_मित्रता करते वक्त निष्काम  भाव होने चाहिए।_

_मित्रता में कुछ दिया जाता है, लिया नही जाता ।मित्रता में हिसाब-किताब नही होता है।_

_मित्रता तो आपद काल में ही देखी जाती है।_

कूट नीति

 *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...