मोमिन शां मोमिन 1800-1852 की गजलें





प्रस्तुति- संतशरण- रीना शरण



अगर ग़फ़लत से बाज़ आया जफ़ा की
अदम में रहते तो शाद रहते उसे भी फ़िक्र-ए-सितम न होता
असर उस को ज़रा नहीं होता
आँखों से हया टपके है अंदाज़ तो देखो
इम्तिहाँ के लिए जफ़ा कब तक
इस वुसअत-ए-कलाम से जी तंग आ गया
उल्टे वो शिकवे करते हैं और किस अदा के साथ
एजाज़-ए-जाँ-दही है हमारे कलाम को
ऐ आरज़ू-ए-क़त्ल ज़रा दिल को थामना
करता है क़त्ल-ए-आम वो अग़्यार के लिए
क़हर है मौत है क़ज़ा है इश्क़
ग़ुस्सा बेगाना-वार होना था
ग़ैरों पे खुल न जाए कहीं राज़ देखना
चल परे हट मुझे न दिखला मुँह
जलता हूँ हिज्र-ए-शाहिद ओ याद-ए-शराब में
जूँ निकहत-ए-गुल जुम्बिश है जी का निकल जाना
जो तिरे मुँह से न हो शर्मसार आईना
ठानी थी दिल में अब न मिलेंगे किसी से हम
डर तो मुझे किस का है कि मैं कुछ नहीं कहता
ता न पड़े ख़लल कहीं आप के ख़्वाब-ए-नाज़ में
तासीर सब्र में न असर इज़्तिराब में
तुम भी रहने लगे ख़फ़ा साहब
दफ़्न जब ख़ाक में हम सोख़्ता-सामाँ होंगे
दिल क़ाबिल-ए-मोहब्बत-ए-जानाँ नहीं रहा
दिल-बस्तगी सी है किसी ज़ुल्फ़-ए-दोता के साथ
दीदा-ए-हैराँ ने तमाशा किया
न इंतिज़ार में याँ आँख एक आँ लगी
महशर में पास क्यूँ दम-ए-फ़रियाद आ गया
मैं अगर आप से जाऊँ तो क़रार आ जाए
'मोमिन' ख़ुदा के वास्ते ऐसा मकाँ न छोड़
ये उज़्र-ए-इम्तिहान-ए-जज़्ब-ए-दिल कैसा निकल आया
राज़-ए-निहाँ ज़बान-ए-अग़्यार तक न पहुँचा
रोया करेंगे आप भी पहरों इसी तरह
वादा-ए-वस्लत से दिल हो शाद क्या
वादे की जो साअत दम-ए-कुश्तन है हमारा
वो कहाँ साथ सुलाते हैं मुझे
वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो
शब तुम जो बज़्म-ए-ग़ैर में आँखें चुरा गए
शोख़ कहता है बे-हया जाना
सब्र वहशत-असर न हो जाए
सौदा था बला-ए-जोश पर रात
हम समझते हैं आज़माने को
हम-रंग लाग़री से हूँ गुल की शमीम का
हुई तासीर आह-ओ-ज़ारी की
है दिल में ग़ुबार उस के घर अपना न करेंगे
हो न बेताब अदा तुम्हारी आज
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