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Matrubharti
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Anami Sharan
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ekda

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Sanjay Kundan

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to me


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धर्मग्रंथ का सदुपयोग
संत सेरोपियो मिस्र देश के निवासी थे। वह बड़े ही परोपकारी थे। दूसरों की सेवा करना, उन्हें सुकून देता था।
संत हमेशा ही मोटे कपड़े का चोगा पहनते थे। एक दिन उनके चोगे को फटा देखकर एक व्यक्ति ने उनसे कहा,
‘आपका चोगा तो फट गया है। उसके बदले नया चोगा क्यों नहीं ले लेते?’ तब संत ने कहा, ‘भाई बात यह है कि
मैं मानता हूं एक इंसान को दूसरे इंसान की मदद करनी चाहिए। इसके लिए उसे अपने शरीर का बिल्कुल ख्याल
नहीं करना करना चाहिए। यही धर्म की सीख है और आदेश भी। तुम तो वस्त्रों की बात कर रहे हो। जब धर्म
शरीर की भी चिंता न करने की सीख देता है तो मैं भला वस्त्र की चिंता क्यों करूं? ’ उस व्यक्ति ने हैरान होकर
पूछा, ‘धर्म की सीख? जरा वह ग्रंथ तो दिखाएं, जिसमें ऐसा आदेश और सीख दी हुई है।’ संत सेरोपियो बोले,
‘ग्रंथ मेरे पास नहीं है। उसे मैंने बेच दिया।’ अब उस व्यक्ति को हंसी आ गई। वह बोला, ‘पवित्र ग्रंथ भी कहीं बेचे
जाते हैं? मैं तो आपको संत समझ रहा था। कैसे संत हैं आप जो पवित्र धार्मिक ग्रंथों को भी बेच देते हैं?’ संत ने
कहा, ‘जो ग्रंथ दूसरों की सेवा करने के लिए अपनी चीजों को बेचने का उपदेश देता है, उसे बेचने में कोई हर्ज
नहीं। सबसे महत्वपूर्ण है गरीबों, जरूरतमंदों की सेवा। हमारे पास जो भी साधन हो उससे दूसरों की सेवा करें
यही उस ग्रंथ का भी मूलमंत्र था। उस ग्रंथ को बेचने पर जो रकम मिली थी, उससे मैनें जरूरतमंदों की जरूरतें
पूरीं कीं। इसमें कोई शक नहीं कि इस समय वह ग्रंथ जिसके पास होगा, वह भी उसके उपदेशों के जरिए अपने
सद्गुणों का विकास कर पाएगा। वह सेवाव्रती और परोपकारी बनेगा।’
संकलन: सुभाष बुड़ावन वाला
अंदर का नयापन
एक बौद्ध धर्मगुरु थे। उनके दर्शन के लिए लोग अक्सर आश्रम में आते थे। स्वामी जी बड़ी उदारता से सबसे
मिलते-बात करते और उनकी समस्याओं का समाधान करते। रोज स्वामी जी के पास दर्शनार्थियों की भीड़ लगी
रहती थी। लोगों के मुंह से स्वामी जी की इतनी प्रशंसा सुनकर एक साधारण ग्रामीण बहुत प्रभावित हुआ। वह
भी स्वामी जी के दर्शानार्थ आश्रम पहुंचा। स्वामी जी की अलौकिक छवि की ओर देखते हुए उसने एक प्रश्न पूछा।
स्वामी जी ने उसे उस समस्या का निराकरण बताया।
घर पहुंचकर व्यक्ति के मन में कई तरह की शंकाएं उत्पन्न होने लगीं। उन शंकाओं के निवारण के लिए वह व्यक्ति
फिर से दूसरे दिन उन्हीं स्वामी जी के पास पहुंचा। इस बार भी स्वामीजी ने शांत भाव से उस व्यक्ति को एक
समाधान बताया। वह व्यक्ति हैरान था कि यह समाधान पहले दिन के समाधान से बिल्कुल विपरीत था। इस
बात को लेकर वह व्यक्ति बहुत क्रोधित हुआ। उसने नाराजगी भरे स्वर में कहा, ‘स्वामीजी कल तो आप कुछ
और ही उपाय बता रहे थे, आज उससे उलटी बात कह रहे हैं। आप क्या हमें बेवकूफ समझते हैं? आखिर आप
ऐसा क्यों कर रहे हैं?’ स्वामी जी, उसके गुस्से से विचलित नहीं हुए। शांत भाव से मुस्कुराते हुए उन्होंने कहा,
‘जो मैं कल था आज मैं वह नहीं हूं। कल वाला मैं तो कल के साथ ही समाप्त हो गया, आज मैं आज का नया
व्यक्ति हूं। कल परिस्थितियां कुछ और थीं, आज की परिस्थितियां अलग हैं। जब आज मैं नया हूं तो कल की
समस्या का समाधान कल की ही तरह क्यों करूंगा? अगर तुम भी इस युक्ति को अपनाओ, हर दिन को नया
दिन समझ कर चलो, खुद को रोज बिल्कुल नया महसूस करो तो तुम्हारी समस्या का समाधान जल्द से जल्द हो
जाएगा।।
संकलन: सुभाष बुड़ावन वाला
यह उन दिनों की बात है जब शंकराचार्य 8 साल की उम्र में आश्रम में रहकर विद्याध्ययन कर रहे थे। प्रतिभा के
धनी शंकराचार्य से उनके गुरु और दूसरे शिष्य अत्यंत प्रभावित थे। आश्रमवासी जीवन-निर्वाह के लिए भिक्षाटन
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हेतु नगर में जाया करते थे। आश्रम का नियम था कि एक छात्र एक ही घर में भिक्षा के लिए जाएगा और उस
घर से जो मिलेगा, उसी से उसे संतोष करना होगा। एक दिन शंकराचार्य एक निर्धन वृद्धा के घर चले गए। उस
गरीब औरत के पास बस थोड़े-बहुत आंवले थे। उसने वही आंवले शंकराचार्य को दे दिए। शंकराचार्य ने वे आंवले
ले लिए। फिर वह आश्रम का नियम भंग कर पड़ोस में एक सेठ के घर चले गए। सेठानी मिठाइयों का एक बड़ा
थाल लेकर बाहर आई। पर शंकराचार्य वह भिक्षा अपनी झोली में लेने की बजाय बोले, ‘यह भिक्षा पड़ोस में
रहने वाली निर्धन वृद्धा को दे आओ।’ सेठानी ने वैसा ही किया। शंकराचार्य ने सेठानी से कहा, ‘मां, आपसे एक
और भिक्षा मुझे चाहिए। वह निर्धन वृद्धा जब तक जीवित रहे तब तक आप उनका भरण-पोषण करें। क्या आप
यह भिक्षा मुझे देंगी?’ सेठानी ने हामी भर दी। शंकराचार्य प्रसन्न मन आंवले लेकर आश्रम पहुंचे। वहां पहुंचकर
उन्होंने अपने गुरु से कहा, ‘गुरुदेव, आज मैंने आश्रम के नियम को भंग किया है। मैं आज भिक्षा के लिए दो घरों
में चला गया। मुझसे अपराध हुआ है। कृपया मुझे दंड दें।’ इस पर गुरु बोले, ‘शंकर, हमें सब पता चल चुका है।
तुम धन्य हो। तुमने आश्रम के नियम को भंग करके उस निरुपाय स्त्री को संबल दिया। तुमने कोई अपराध नहीं
किया, बल्कि पुण्य अर्जित किया है। तुम्हारे इस कार्य से आश्रम का गौरव ही बढ़ा है। तुम एक दिन निश्चय ही
महान व्यक्ति बनोगे।’ उनके गुरु की भविष्यवाणी सच साबित हुई।
संकलन: मुकेश शर्मा
सैंडो एक दुबला-पतला बालक था। जब वह 11-12 बरस का था तो उसे जुकाम रहने लगा। खांसी उसे लगातार
परेशान करती थी और लिवर भी बढ़ा हुआ था। एक दिन वह अपने पिता के साथ अजायबघर देखने गया।
अजायबघर में उसने बलिष्ठ कद-काठी की अनेक इंसानी मूर्तियां देखीं। उसने अपने पिता से पूछा, ‘ये किनकी
मूर्तियां हैं?’ पिता ने कहा, ‘इस दुनिया में हमसे पहले जो इंसान थे, ये उनकी मूर्तियां हैं।’ तब सैंडो ने अगला
सवाल किया, ‘ये जो हमारे पूर्वजों की मूर्तियां यहां रखी हुई हैं, क्या उनकी शक्लें ऐसी ही थीं? उनकी गर्दन
इसी तरह मोटी थी? क्या उनकी पेशानी और सीने इतने ही चौड़े थे?’ पिता बोले, ‘हां बेटे। वे जैसे थे, उसी
तरह उनकी मूर्तियां बनाई गई हैं।’ बच्चे ने फिर पूछा, ‘पिताजी, क्या मैं भी ऐसा बन सकता हूं?’ पिता ने उसे
दुलारते हुए कहा, ‘जरूर बन सकते हो। दुनिया का एक इंसान जो काम कर सका, उसे दूसरा इंसान भी कर
सकता है। जो रास्ता एक के लिए खुला है, वह दूसरे के लिए भी खुला है। समय ज्यादा लग जाए या कम, लेकिन
एक आदमी ने जो काम कर लिया, वह दूसरे के लिए नामुमकिन नहीं है।’
म्यूजियम से वापस आने के बाद भी सैंडो के मन से वह बात गई नहीं थी। वह पिता के पास पहुंचा और बोला,
‘बताइए, मैं कैसे पहलवान बन सकता हूं?’ पिता ने विस्तार से बताया कि तुम अपने खान-पान और दिनचर्या में
इस तरह से नियंत्रण करो, ऐसे कसरत करो, विचारों का संयम ऐसे करो।’ यह कहते हुए पिता ने एक प्रारंभिक
ढांचा बनाकर उसके सामने रख दिया। बालक ने अपनी दबी हुई सामर्थ्य को समझा और उसका ठीक प्रकार से
इस्तेमाल करते हुए आगे चलकर विश्व का नामी पहलवान डैमियन सैंडो बना।
संकलन: सभाष बुड़ावन वाला
विनम्रता और कठोरता
बहुत पहले की बात है। एक चीनी संत अपने शिष्यों के साथ रहा करते थे। वह बहुत वृद्ध हो चले थे। एक दिन
जब उन्होंने यह महसूस किया कि उनका अंतिम समय निकट आ पहुंचा है, तो उन्होंने अपने सभी साथियों और
शिष्यों को अपने पास बुला लिया। वह उन सभी को संबोधित करते हुए बोले,‘तुम लोग जरा मेरे मुंह के अंदर
झांक कर तो देखो भाई। बताओ तो, आखिर मेरे मुंह में कुल कितने दांत अब शेष रह गए हैं?’ यह सुन कर
प्रत्येक शिष्य ने मुंह के भीतर झांक कर देखा और कहा,‘आपके दांत तो कई वर्ष पहले ही समाप्त हो चुके हैं।’
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शिष्यों की यह बात सुन कर संत ने कहा-‘लेकिन जिह्वा तो विद्यमान है न।’ सभी ने कहां,'हां, वह तो साफ
नजर आ रही है।' यह सुन कर संत ने पूछा,‘फिर यह आखिर कैसे हुआ होगा? जिह्वा तो जन्म के समय भी
विद्यमान थी। दांत तो उसके बहुत बाद में ही आए। बाद में आने वाले को तो बाद में जाना चाहिए था न। ये
दांत पहले ही कैसे चले गए?’ संत की बात सुन कर अब शिष्यों के हैरान होने की बारी थी।
सभी को हैरान देख कर संत कुछ देर तक तो सोचते रहे और फिर बोले,‘यही रहस्य समझाने के लिए तो मैंने
तुम्हें आज यहां बुलाया है। देखो, जिह्वा अब तक विद्यमान है तो इसका कारण यह है कि इसमें कठोरता
बिलकुल नहीं है। ये दांत बाद में आकर भी पहले ही समाप्त होते चले गए, तो इसका कारण यह है कि इनमें
कठोरता बहुत अधिक थी। यह कठोरता ही इनकी पहले समाप्ति का कारण बनी। नम्रता का जीवन सदैव
कठोरता से अधिक होता है। इसलिए मेरे बच्चो, यदि तुम देर तक सहज जीवन जीना चाहते हो, तो नम्र बनो,
कठोर नहीं।'
संकलन: सभाष बुड़ावन वाला
3, डी.डी.ए फ्लैट्स,
खिड़की गांव,
मालवीय नगर
नई दिल्ली-110017.
मोबाइल-9971125858.
सोने और हीरे के मुकुट
एक संत हमेषा भगवान के भजन में लीन रहता था । जब उसकी आयु पूरी हो गई तो मरने के
बाद वह स्वर्ग में गया । स्वर्ग में उसे ईष्वर की आराधना करने के लिए सोने का मुकुट दिया गया । वह सोने का
मुकुट प्राप्त कर अत्यंत खुष हो गया । किंतु तभी उसने कुछ देर बाद देखा कि कुछ व्यक्तियों को जोकि संत न होते
हुए भी केवल गृहस्थ व साधारण मनुष्य थे उनके हाथों में हीरे-जवाहरात के मुकुट हैं । यह देखकर उसके
आष्चर्य की सीमा न रही । उसे यह समझ ही नहीं आ रहा था कि केवल आम व्यक्तियों को हीरे के मुकुट कैसे
दिए गए हैं जबकि उसने इतनी अधिक तपस्या कर ईष्वर की आराधना की तब भी उसे केवल सोने का मुकुट
दिया गया है । वह इस जिज्ञासा का समाधान पाने के लिए देवदूत के पास गया और उनसे इस भेदभाव का
कारण पूछा । संत की बात सुनकर देवदूत मुस्कुराते हुए बोले, ‘तुमने हीरे-जवाहरात दिए ही कहां थे जो यहां
पर मिलते ?’ देवदूत का यह जवाब संत को कुछ समझ नहीं आया । वह बोला, ‘तो क्या इन आम व्यक्तियों ने
हीरे-जवाहरात दान किए थे ?’ संत का जवाब सुनकर देवदूत बोला, ‘अरेे तुम एक विद्वान संत होकर भी इतना
नहीं समझते कि असली हीरे-जवाहरात वे आंसू हैं जो किसी की पीड़ा समझ कर, किसी के दुःख-तकलीफ
महसूस करके उसकी मदद को तत्पर आंखों से गिरते हैं । तुमने तो ऐसा एक भी आंसू अपनी आंखों से नहीं
गिराया । माना कि तुम ईष्वर आराधना में अत्यंत सुखी व खुष थे । किंतु इसमें दूसरों के आंसू पौंछने व उन्हें
खुषी देने जैसा तो तुम्हारा कोई भी कार्य नहीं था । सच्चे मन से ईष्वर की आराधना करने के कारण तुम्हें सोने
का मुकुट मिला है किंतु हीरे-जवाहरात का मुकुट तो केवल उनके लिए है जिन्होंने दूसरों के दुःख व पीड़ा को दूर
करने में अपने आंसू बहाए हैं और पीडि़तों के आंसू पौंछे हैं ।’ देवदूत की बात समझ कर संत को यह समझ आ
गया कि मानव का असली कार्य तो जरूरतमंद व असहायों की मदद करना है। ऐसा व्यक्ति ही वास्तव में स्वर्ग में
हीरे के मुकुट का हकदार हो सकता है ।
रेनू सैनी
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बापूजी ने बनाई रजाई
जाड़े के दिनों में गांधीजी एक दिन आश्रम की गोषाला में पहुंचे । वहां पर अनेक पशु थे ।
उन्होंने गायों को सहलाया और प्यार से बछड़ों को थपथपाया । गांधी जी का प्रेम भरा स्पर्ष पाकर जानवरों ने
भी गर्दन हिलाकर उनके प्रेम का जवाब दिया । वह वहां से बाहर निकल ही रहे थे कि तभी उनकी नजर समीप
ही खड़े एक गरीब लड़के पर गई । वह उसके पास पहुंचे और बोले, ‘तू रात को यहीं सोता है ।’ गांधी जी का
प्रष्न सुनकर लड़का धीमे से बोला, ‘जी बापू जी । मैं रात यहीं बिताता हूं ।’ उसका जवाब सुनकर गांधी जी
बोले, ‘बेटा, इन दिनों तो बहुत ठंड है । ऐसे में क्या तुम्हें ठंड नहीं सताती ।’ लड़का बोला, ‘बापू ठंड तो बहुत
लगती है ।’ ‘फिर तुम ठंड से बचने के लिए क्या ओढ़ते हो ?’ गांधी जी बोले । लड़के ने एक फटी चादर दिखाते
हुए कहा, ‘बापूजी, मेरे पास तो ओढ़ने के लिए मात्र एक यही चादर है ।’ लड़के की यह बात सुनकर बापू
आष्चर्य से उसे देखते रहे और तुरंत अपनी कुटिया में लौट आए । उन्होंने उसी समय बा से दो पुरानी साडि़यां
मांगी, कुछ पुराने अखबार तथा थोड़ी सी रूई मंगवाई । रूई को अपने हाथों से धुना । साडि़यों की खोली
बनाई, अखबार के कागज और रूई भरकर एक रजाई तैयार कर दी । जब रजाई पूरी तरह तैयार हो गई तो
बापूजी ने गोषाला से उस लड़के को बुलवाया । लड़का सहमता हुआ उनके पास आया तो गांधी जी ने उसके
सिर पर प्यार से हाथ रखा और रजाई उसे देते हुए बोले, ‘इसे ओढ़कर देखना कि रात में ठंड लगती है या नहीं
।’ लड़का खुषी-खुषी रजाई लेकर चला गया । अगले दिन जब गांधी जी गोषाला की ओर गए तो उन्हें वही
लड़का नजर आया । बापू ने उससे पूछा, ‘क्या तुझे कल भी ठंड लगी ।’ यह सुनकर लड़का तपाक से बोला, ‘नहीं
बापू जी, कल तो आपकी दी हुई रजाई ओढ़कर मुझे बहुत गरमाहट महसूस हुई और बड़ी मीठी नींद आई ।’
लड़के का जवाब सुनकर बापू हंस पड़े और बोले, ‘सच, तब तो मैं भी ऐसी ही रजाई ओढूंगा ।’
रेनू सैनी
संत की उदारता
संत तिरुवल्लुवर अपनी सज्जनता
व सद्व्यवहार के लिए बहुत प्रसिद्ध थे। गांव में उनकी कुटिया के नजदीक एक परिवार रहता था जिसमें एक सुंदर
युवती भी थी। एक दिन उस युवती के माता-पिता को पता चला कि उनकी अविवाहित पुत्री गर्भवती है। युवती
के माता पिता बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने अपनी पुत्री से उसके होने वाले बच्चे के पिता का नाम पूछा।
युवती ने डर के मारे अपने प्रेमी का नाम नहीं बताया। उसने संत तिरुवल्लुवर को अपने होने
वाले बच्चे का पिता बता दिया। उसने सोचा था कि संत बहुत प्रसिद्ध हैं, इसलिए उनका नाम लेने पर उसके
माता-पिता चुप हो जाएंगे, इससे न तो ये बात गांव के लोगों में फैलेगी न ही उसके प्रेमी पर कोई आंच आएगी।
परंतु हुआ इसके विपरीत। युवती के माता-पिता ने संत को काफी भला-बुरा कहा। लेकिन संत ने इतना ही कहा-
जैसी प्रभु की इच्छा। उस दिन से गांव के लोग संत को हेय दृष्टि से देखने लगे। कुछ दिनों के बाद युवती ने एक
बालक को जन्म दिया। गांव के लोग उस बालक को संत की कुटिया के बाहर छोड़ गए।
संत ने बिना लोगों की परवाह किए उसका पालन-पोषण प्रारंभ कर दिया। वह उसकी अच्छी
तरह देखभाल करते और खूब दुलार करते। वह युवती आते-जाते यह सब देखती रहती। इसी प्रकार एक वर्ष
बीत गया। एक दिन बच्चे की रोने की आवाज सुनकर मां की ममता जाग उठी। युवती ने सभी गांव वालों सहित
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अपने माता-पिता को सब कुछ सच-सच कह दिया कि उस बालक का वास्तविक पिता कौन है। युवती के माता-
पिता और गांव के अन्य लोग शर्मिंदा होकर संत के पास गए और उनसे अपने कटु वचनों और दुर्व्यवहार के लिए
क्षमा मांगी। युवती ने भी संत से अपना बालक वापस करने की प्रार्थना की। संत यह सब देखकर मुस्कुराए और
इतना ही बोले- जैसी प्रभु की इच्छा। उन्होंने युवती को उसका बच्चा लौटा दिया। सभी उनकी सहनशीलता के
आगे नतमस्तक हो गए।
यूनान में एक अत्यंत धनी व्यक्ति झांथस रहता था। उसका एक गुलाम था-ईसप। एक दिन झांथस ने ईसप से
कहा,'मुझे हौज पर स्नान करने जाना है। जरा देखकर आओ कि वहां कितने आदमी हैं।' ईसप अपने मालिक का
आदेश सुनकर हौज पर गया और वहां से लौटकर बोला,'हुजूर, वहां सिर्फ एक आदमी है।' यह सुनकर झांथस
उसके साथ स्नान करने के लिए चल पड़ा। दोनों हौज पर पहुंचे। वहां भारी भीड़ लगी हुई थी। यह देख झांथस ने
कहा,'तुमने तो कहा था कि हौज पर केवल एक आदमी है, लेकिन यहां तो भीड़ लगी हुई है।' मालिक की बात
सुनकर ईसप सिर झुकाकर बोला,'हुजूर, मैं तो अब भी कहूंगा कि यहां केवल एक आदमी है।' झांथस ने इसका
कारण जानना चाहा तो ईसप बोला,'हुजूर, जब मैं यहां आ रहा था तो रास्ते में एक बहुत भारी पत्थर पड़ा हुआ
था। हर आने-जाने वाले को उस पत्थर से चोट लग रही थी। लेकिन प्रत्येक व्यक्ति चोट खाकर भी उस पत्थर को
पार कर जाता था और उसे रास्ते से हटाने की कोशिश नहीं करता था। कुछ देर बाद एक व्यक्ति यहां पहुंचा।
उसने अपनी पूरी शक्ति लगाकर उस पत्थर को वहां से हटा दिया। बाद में वह हौज की तरफ चला गया। वह
अब भी यहां मौजूद है। यहां इतने लोग हैं, लेकिन सभी बेहद स्वार्थी लगते हैं। किसी ने भी यह नहीं सोचा कि
जैसे हमें चोट पहुंची है, वैसे ही किसी अन्य को भी पहुंच सकती है। यह विचार सिर्फ एक व्यक्ति के मन में आया।
उसने न उस पत्थर को पार करने की कोशिश की और न ही उससे चोट खाई। उसने उस पत्थर को हटाना ही
अपना फर्ज समझा। मुझे तो सिर्फ वही इंसान नजर आया। इसलिए मैंने आपसे कहा कि हौज पर केवल एक
आदमी है।'
संकलन: सुभाष बुड़ावनवाला
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