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अनामी -26-1-16













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भारतीय कहानी श्रृंखला-1
मुबीना या सकीना
कथाकार - गुरबख्श सिंह
प्रस्तुति- अनामी शरण बबल
गाँव के एकमात्र पक्के मकान के पिछवाडे से एक मर्द और औरत चोरों की तरह
आगे पीछे देखते हुये निकले. सामने सूरज ढल रहा था .उसकी सीधी किरणें उनके
मुँह पर पड़ रही थीं। मर्द देखने में युवा और बलवान था, औरत सुन्दर और पतली
पर दोनों के चेहरों पर हवाइयाँ उड़ रही थीं। एक-दो क्षण वे दूसरी ओर से आ रही
आवाजों को सुनने के लिए रुक गये। फिर वे सर-सर करते ईख के खेत में घुस
गये। इस खेत के एक ओर मुँडेर पर लसूड़े का पेड़ था।
ये जैलदार हासम अली का बेटा कासम और उसकी बहू जीनत थे। जैलदार हासम,
उसका कबीला और गाँव के बहुत-से लोग लगभग दो घंटे पहले गाँव खाली कर गये
थे।
आज तक जैलदार ने बड़े हौसले से काम लिया था। अफवाहें उड़ रही थीं कि उस
गाँव पर हमला हो गया है और इस गाँव पर हमला होने की आशंका है। एक घोड़ी

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वाला उस कुएँ पर कह रहा था कि लुहारों की सभी झुग्गियाँ जल गयी हैं। जैलदार
कहतासब अफवाहें हैं, हौसला रखो, नए नगर का बड़ा सरदार मेरा दोस्त है। वह
हमारे बच्चे-बच्चे गाँव में सुलाने के लिए तैयार है।
पर आज सुबह जब जैलदार उससे तसल्ली लेने के लिए गया तो सरदार कुछ
चिन्तित नंजर आया। उसके पास बैठे सरदार को कुछ सिख उठाकर परे ले गये।
उसके कान में भी कुछ भनक-सी पड़ गयी :
''सरदार जी धोखा नहीं खाना .भसीनो आया ने जत्था बना लिया है और वह किसी
की नहीं सुनता।''
गाँव वापस लौटकर जैलदार ने बड़ी मस्जिद में एक सभा की और गाँव खाली कर
देने का निर्णय लिया। सारे गाँव में विलाप होने लगा। रोते-धोते लोगों ने गठड़ियाँ
बाँधीं, सिख बच्चों के साथ खेलते बच्चों को डरा-धमकाकर घर वापस लाया गया।
किहरू ने शराज की बाँह पकड़ ली, ''नहीं ताई, इसको मैं नहीं जाने दूँगा।'' शराज की
माँ ने यह कहते हुए कि इस गाँव से हमारा दाना-पानी उठ गया है, बेटे की बाँह
छुड़ा ली।
अफरा-तफरी में चीजें उठा-पटककर, कुछ अपने हम-साये के सुपुर्द कर, दरवाजों को
ताले लगा, पशुओं की पीठ पर पुरानी रजाइयों को फेंक, सभी लोग अपने घरों से
निकल गलियों में इकट्ठे हो गये। गाँव की आत्मा अपना शरीर छोड़ रही थी।
अपने मकानों की दीवारों की ओर देख-देख बूढ़े विलाप कर रहे थे। हासम जैलदार
की आँखें भी भर आयी थीं। वह अपने बेटे को पीछे रहने से मना कर रहा था।
''आप बिलकुल चिन्ता न करें,'' कासम ने कहा था, ''जीनत कुछ बीमार है और बहुत
घबरायी हुई है ,मुबीना को उठाकर उससे चला नहीं जाएगा। साथ ही मैं सारी खबर

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लेकर आऊँगा। दूर से जत्था आता हुआ देखकर मैं जीनत को घोड़ी पर बैठा, नदी
पार करके आपसे आ मिलूँगा।''
कई और जवान भी पीछे रह गये थे। क्या पता जत्था न ही आये। नए नगर का
सरदार जत्थे को रोक ही ले। ऐसी स्थिति में वे सारे गाँव को वापस ले आएँगे।
वतन छूट रहा था, कुएँ-खेत छूट रहे थे। मैदान छूट रहे थे। जहाँ की मिट्टी में
बचपन के साथियों के साथ खेतों में काम करते-करते कन्धे छिल गये
थे,अविस्मरणीय यादें बन गयीं। बेर के पेड़ छूट रहे थे। बचपन में चोरी से खाये
बेरों की मिठास अब कहाँ मिलेगी!
अपने कुएँ के पास से निकलते हुए इब्राहीम की बहू की सिसकी निकल गयी:
''अभी नई रेहट की बाल्टियाँ लगवायी थीं। बीस रुपये लगाकर नई शहतीर लगवायी
थीं।''
वे बार-बार घूमकर अपने गाँव को, खेतों की मुँडेरों को, बाड़ों को देख रहे थे। उनकी
नंजर इन पर थमकर रह जाती। पलक झपकते ही सब कुछ लुप्त हो गया। परदेश
की ओर बढ़ता शोकग्रस्त काफिला गाँव की सीमा पर बैठ गया।
उधर नए नगर से खेतों में से आकर कोई उन्हें बता गया कि जत्था भट्टे तक
पहुँच गया है। कासम अपने अस्तबल की ओर भागकर गया, पर घोड़ी वहाँ नहीं
थी। और दूर से काफी दूरी से चमकती तलवारें उसे नजर आ रही थीं।
''जीनत-जीनत उठाओ मुबीना को कोई घोड़ी खोलकर ले गया है जल्दी करो घर के
पिछवाड़े ईख के खेत में छिपने के सिवाय और कोई रास्ता नहीं।''

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ईख के खेत में घुसे थे कि जत्था गाँव में पहुँच गया। मुँडेर के पास से भागते-
निकलते कई लोगों की आवांज आयी।
''ये अपने ही होंगे , नदी की ओर भागकर जा रहे हैं।'' कासम ने कहा।
इतने में गाँव से ऐसे शोर आने लगा जैसे वहाँ आसमान टूट पड़ा हो। शोर उनके
पास आता जा रहा था। ईख के खेत में बहुत उमस थी। मुबीना अभी उठी नहीं थी,
पर करवटें लेने लगी थी।
''बड़ी मुसीबत है, यह रो पड़ेगी और जत्था अब हमारे घर पहुँचा कि पहुँचा।''
धड़धड़ाते हुए दो घुड़सवार मुँडेर के पास से निकल गये, जैसे कि किसी के पीछे
भाग रहे हों।
''जीनत जागने से पहले ला मैं मुबीना को लसूड़े के नीचे लिटा आऊँ वहाँ वह सोयी
रहेगी और जब जत्था निकल जाएगा, तो उसे उठा लाऊँगा।''
''मन नहीं मानता हड्डी की तरह इसे कैसे फेंक दूँ।''
''जल्दी करो इसका और हमारा भला इसी बात में है यह अगर जाग गयी तो हम
सब मारे जाएँगे।''
गाँव में गोली चलने की ठाँय-ठाँय आवाज आयी।
''मुझे दे दो एक मिनट भी न सोचो।''
जीनत ने मुबीना का मुँह चूमा और कासम ने जल्दी से उसके हाथों से लड़की को
उठा लिया और खेत से बाहर आकर उसे लसूड़े के नीचे लिटा दिया। कासम का

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ध्यान सोने की जंजीर की तरफ गया जो कासम की माँ ने मुबीना के गले में डाली
थी। पहले उसने सोचा कि जंजीर को उतार ले, फिर खयाल आया कि यदि मुबीना
को छोड़ना पड़ा तो जिसे जंजीर सहित मुबीना मिलेगी उसके सिर पर भार नहीं
बनेगी और वह उसका अच्छी तरह खयाल रखेगा।
''खुदा हांफिंज''और कासम जीनत के पास आ गया।
उसी समय उनके घर में से आवाजें आने लगीं।
''मेरे पीछे-पीछे पौधों को बचाकर जरा भी आवाज न हो जीनत तुम चली आओ।''
आवाजों से घबराकर वे खेत के दूसरी ओर चले गये।
''हाय! बुबीना रो पड़ी होगी''जीनत रुक गयी।
''मुबीना अल्लाह को सौंपो .चलो, आओ रुकने का समय नहीं।''
वे पौधों से बचते खेत के दूसरे किनारे पर पहुँच गये। उमस से जीनत के प्राण मुँह
को आ रहे थे।
''तुम जरा यहाँ रुको मैं मुँडेर से देख आऊँ।''
अँधेरा फैलने लगा था . न जीव न जन्तु, पक्षी घोंसलों की ओर लौट रहे थे। जिस
रास्ते से वह पिछले आठ सालों से दूसरे गाँव पाठशाला जाएा करता था, वह आज
उसे मौत-सा भयानक लग रहा था। जिस कुएँ पर जीनत की डोली पिछले साल
उतरी थी, आज खाने को आ रहा था।
ऊपर से बादल गरजने लगे। भीनी-भीनी फुहार हवा से उड़ती उसके अधरों पर पड़ी।

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प्यास लगी तो उसे एहसास हुआ कि मुबीना सारी रात भूखी रोती रहेगी।
जब अँधेरा गहरा गया, जीनत और कासम नदी की ओर चल दिये। मुबीना को
लाना कठिन हो गया था। पाँच बीघे की जमीन पर उसने अपने खून-पसीने की
मेहनत से फसल बोयी थी।
नदी पर बहुत भीड़ थी। नाव एक ही थी। मल्लाह जबकि मुसलमान थे पर पार
जाने के बीस रुपयों से कम पर तैयार नहीं हो रहे थे। औरतें गहने उतार-उतार कर
दे रही थीं। दो अपने पतियों से बिछड़ी औरतें गिड़गिड़ाकर हार गयी थीं। जीनत ने
दो चूड़ियाँ बाँह से उतारकर कासम को दीं। कासम ने शेष दोनों भी उतरवाकर जेब
में डाल लीं और मल्लाह को ताकते हुए कहा :
''ओ मियाँ कुछ तो खौफ करो आपको अच्छा लगेगा यदि ये जवान औरतें दुश्मनों
के हाथ आ जाएँये दो चूड़ियाँ सौ रुपये से कम नहीं हैं।''
मल्लाह, कासम के रौब में आ गये और किश्ती को भरकर दूसरे किनारे ले गये।
वहाँ से बॉडर सवा मील थाबीच में आबादी नहीं थी।
सारी रात बरसात कभी होती, कभी थम जाती। लसूड़े के चौड़े पत्तों पर बरसात की
बूँदें इकट्ठी हो गयी थीं। हवा चलती तो बूँदें मुबीना के मुँह पर पड़तीं। रोते
अधर'लिप-लिप' करने लग पड़ते। कई बूँदें छोटे-से मुँह में चली जातीं।
कभी रोती, कभी पानी की बूँदों से 'लिप-लिप' करती, कभी थककर सो जाती ,इसी
तरह रात बीत गयी। सूरज की पहली सुनहरी किरण जब मुबीना के मुँह पर पड़ी,
उस समय वह हाथ-पैर मार रही थी। उसकी आँखें खुली हुई थीं और उसके फिरोंजी
कपड़ों पर सोने की जंजीर चमक रही थी।

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रात को जत्था बड़ी और कीमती चीजें उठाकर चला गया था। सुनसान गाँव की
भयावहता लुटेरों को भी डरा रही थी। दिन होते ही वे फिर लौट आये। उजाड़ स्थान
फिर बस गया, पर यह लोगों का बसना निराला था, सन्दूक तोड़े जा रहे थे, ताले टूट
रहे थे, नरम स्थानों को खोदा जा रहा था।
जीनत के मकान की ईख के खेत की तरफ वाली खिड़की खुली, किसी ने खिड़की
में से झाँककर देखा .सर-सर करती ईख, बरसात से नहाये लसूड़े के हरे पत्ते और
यह क्या कोई बच्चा छोटा-सा चीखता-चिल्लाता। देखने वाला जल्दी-से कोठे से उतर
लसूड़े के पास आ गया।
किसी को अपनी ओर देखता देख मुबीना एकदम चुप हो गयी, उसकी पलकों से
आँसू टपक रहे थे और कपड़ों पर जंजीर लटक रही थी।
देखने वाला बहुत खुश हुआ। उसने झुककर बाँहें फैलायीं .मुबीना ने होंठ सिकोड़
लिए जैसे उसे आदमी पर भरोसा न हो रहा हो। आदमी ने उसके होंठों पर अपनी
उँगलियों से प्यार किया मुबीना अब मुस्करा पड़ी। आदमी ने उसके गले से जंजीर
उतारकर फैंटा से बाँध ली और उसे गोद में उठा वापस आ गया।
उसका साथी भी, जो कुछ उसे मिला था उससे खुश हो रहा था। हासम का घर
भूरा-पूरा था।
''मुझे छुट्टी दे दो, सरदार जी मुझे बहुत कुछ मिल गया है।''
''क्या मिला है?'' उसने गोद में मुबीना को देख लिया, ''इससे तेरा पेट तो नहीं भरेगा
मार ले दो हाथ अब समय है फिर पछताओगे।''
''नहीं सरदार जी, आप मुझे जाने ही दें अब किसी चीज को हाथ लगाने का मन

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नहीं कर रहायह पता नहीं कब की भूखी है।''
''लड़की है।''
''जी हाँ, लड़की है।''
''तब तेरी मौज हो गयीं. जरा दिखा ,कासम की होगी।''
''मैं फिर जाऊँ?''
''तेरी मर्जी समय अच्छा था चंगड़ी के लिए कुछ कपड़े ही ले जाते।''
''मेरी चंगड़ी को तो तुम जानते ही हो मुझे तो काटकर खाती है कि मेरे ही बुरे
कर्मों के कारण उसके बच्चा नहीं हुआ। कपड़ों से वह इसको अधिक चाहेगी।''
''जाओ, इसे ले जाओ और घोड़ी हमारी हवेली में बाँध देना।''
वह चंगड़ मानाँवाल के एक जमींदार का साथी था। उसकी सहायता से जमींदार ने
कई चोरियाँ की थीं और चार दिन पहले जब सब मुसलमान उसके गाँव से चले
गये थे, उसने उसे जाने नहीं दिया था, ''कोई देखे तो सही तेरी तरफ।''
चंगड़ी ने दरवाजा खोला और बिना चंगड़ की तरफ देखे वह घूम गयी। साँकल
लगाकर चंगड़ ने कहा :
''पूछती नहीं, मैं क्या लाया हँ।''
''लाया होगा कोई बड़ा खंजाना, जिसके साथ तेरी सारी उमर गुजर जाएगी।'' चंगड़ी
ने अब भी बिना उसकी ओर देखते हुए कहा।

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''ऐसे ही बड़-बड़कर रही हो देख तो सही।'' और उसने मुबीना के मुँह से कपड़ा हटा
दिया।
''हाय! मैं मर जाऊँ।'' चंगड़ी ने दोनों हाथ मलते हुए कहा, ''इसकी गरीब माँ को
किसी अत्याचारी ने मार दिया है?''
''मुझे कुछ पता नहीं . जैलदार के घर के पिछवाड़े लसूड़े के पेड़ तले पड़ी थी।'' फिर
फैंटा से जंजीर निकालकर बोला, ''यह इसके गले में पड़ी थी देखकर कोई जले नहीं,
इसलिए इसे फैंटा में छिपा लिया था।''
चंगड़ी ने मुबीना को गोद में उठा लिया मुँह-सिर चूमा ,भगवान को लाख धन्यवाद
दिया. जंजीर उसे भूल ही गयी।
''तू भूखी होगी बहुत भूखी .सारी रात तूने कुछ नहीं पिया .थोड़ा सब्र करो तेरे
कारण ही गाय भी मिल गयी है. कल तो हाथ भी नहीं लगाने देती थी. तुम इसे
जरा पकड़ो।''
चंगड़ी ने कपड़ा भिगोकर उसके मुँह में दूध डाला .वह काफी दूध पी गयी .अपने
कपड़ों से उसका मुँह पोंछते हुए चंगड़ी ने कहा, ''नबी रसूल के मार्ग निराले हैं। मेरे
पेट को फलता था... खुदा का लाख शुक्र...अब मेरे साथ ही रहना कहीं और न
जाना।''
चंगड़ और चंगड़ी के कई दिन मुबीना को लाड़-प्यार करते बीत गये। खुदा की इस
कृपा के सामने पुराने दु:ख वे भूल गये। चंगड़ी ने चंगड़ को राजी कर लिया कि वह
अब कभी चोरी नहीं करेगा।
''दो पेट कोई भारी नहीं ,इतना तो मैं अकेली कर सकती हँ।''

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पर अभी दो हफ्ते भी नहीं बीत पाये थे कि गाँव में उनके बारे में बातें होने लगीं।
पाकिस्तान से उजड़कर आये कई लोगों ने गाँव में पनाह ली। वे किसी मुसलमान
को देखना क्या उसका नाम तक सुनने को तैयार नहीं थे।
एक दिन उनका सरदार घर आकर कहने लगा :
''मोलुआ इस बात की मुझे बहुत खुशी है...पर मेरा वश नहीं रहा आपकी जान को
खतरा बढ़ता जा रहा है .अच्छा यही है कि तुम तैयार हो जाओ .रात-रात में मैं
आपको सीमा पार करा दूँगा।''
''जैसा आप कहें...आपके आसरे ही बचे हुए हैं।''
''पानी गले से उतरता जा रहा देखकर ही मैंने ऐसा कहा है नहीं तो मोलू को क्या
मैं भेज देता...!''
''हमारे माई-बाप हैं आप।''
''आज ही चले जाओ . कल पता नहीं क्या हो जाएे .रात अँधेरी है ,नाला भी सूखा
है उसमें चलते हुए किसी को दिखेंगे भी नहीं पर यह लड़की आपको यहाँ छोड़नी
पड़ेगी।''
चंगड़ी ने मुबीना को छाती से लगा लिया। जैसे चंगड़ी की साँस रुक गयी हो, बोली
:
''न सरदार जी ऐसा न कहें जो सुगंध इसके छोटे-छोटे हाथों में है वह मेरे प्राणों में
समा गयी है।''
''आपके भले के लिए ही ऐसा कहा था .छ: मील चलना होगा किसी जगह भी अगर

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यह रो पड़ी ,बच्चा है सभी मारे जाओगे. मेरी तो कोई सुनेगा नहीं .लुटेरे तो राह ही
देख रहे हैं।''
''जो भी हो...मर गये तो मर गये .लड़की को मैं नहीं छोड़ सकती।''
''जैसी आपकी मर्जी .मैं अपनी तरफ से कोई कसर नहीं रखूँगा।''
खाने-पीने के बाद गाँव में सन्नाटा छा जाता थाकोई बाहर की तरफ देखता भी नहीं
था। सरदार और मोलू ने ठाठे बाँध लिए और लाठियाँ हाथों में ले लीं। चंगड़ी ने
मुबीना के लिए दूध बोतल में डाल लिया। नाले में वे चलते जा रहे थे। राबी के
कुछ इधर ही मुबीना रो पड़ी। उसी समय उस पार से आ रही घोड़ों की टापों की
आवांज सुनाई दी। जैसे मौत आ रही हो। मोलू और चंगड़ी घबराकर एक-दूसरे के
कन्धे से लग गये। सरदार को कुछ सूझा ,उसने झट मुबीना को चंगड़ी से ले लिया
और उन दोनों को इशारे से बैठ जाने के लिए कहा तथा खुद नाले के ऊपर चढ़
गया।
घोड़ेवालों ने ललकारा। ठाठा खोलकर सरदार ने कहा :
''कोई पराया नहीं , मैं ही हँ।''
''कौन जैलसिंह यह क्या उठाया हुआ है?''
''आया तो था किसी शिकार के पीछे .सुना था कोई मोटी आसामी भाग रही है।''
''यही सुनकर तो हम आये थे पर सीमा तक तो हमें कोई मिला नहीं।''
''गये तो जरूर हैं यह बच्चा...इसके रोने से डरते हुए फेंक गये हैं।''

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घोड़ेवाले गाँव की ओर चले गये सरदार ने चंगड़ चंगड़ी को दिलासा दिया और
कुशलता से उन्हें सीमा पार करा दी।
दूसरे दिन वे लाहौर पहुँच गये .धक्के खाते वे शरणार्थी कैम्प पहुँच गये। चारों तरफ
सिसकियाँ और आँसू थेपर चंगड़ी खुश थी कि खतरा टल गया। लड़की के माँ-बाप
बचे नहीं होंगे जीते-जी कौन माँ लड़की को इस तरह फेंकेगी।
पर उनके कैम्प से सिर्फ चार घर दूर मुबीना की माँ पागल हो रही थी। कोई डाक्टर
उसके लिए कुछ नहीं कर पा रहा था। वह अपना गला दबाती और कहती:
''माँ नहीं, मैं डायन हूँ .कहीं रो न पड़े हम मारे न जाएँ मैं उसे जिन्दा
फेंक आयी .गीदड़ खा गये होंगे .घोड़ों के पैरों के नीचे आ गयी होगी .छोटे-छोटे
खुशबूदार हाथ कुचले गये होंगे वह भूखी मर गयी होगी उसे किसने दफनाया
होगा?''
उसका विलाप किसी से सुना नहीं जा रहा था। उसका भाई सरकारी अफसर था।
उसने डिप्टी कमिश्नर से एक फौंजी ट्रक का परमिट लिया और खुद हिन्दुस्तान
जीनत के ससुराल के गाँव गया। वहाँ से इतना ही पता लगा कि मोलू चंगड़ मुबीना
को मानाँवाल ले गया था। मानाँवाल से खबर मिली कि वह शेखूपुरा अपने साढ़ू के
पास जाने की सोच रहा था।
लाहौर लौटकर उन्होंने शेखूपुरा जाने की सलाह बनायी। जीनत ने पागलों की तरह
जिद की कि वह भी साथ चलेगी। समझाने पर भी वह न समझी। आखिर उसे
साथ ही ले जाना पड़ा।
मोलू ठीक शेखूपुरा सादक के पास ही गया था। पता तो मिल गया, पर न तो

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चंगड़ी और न ही मुबीना उसके घर में मिले। उसने कहावे कहीं बाहर गये हुए हैं।
मोलू को थाने में पकड़कर लाया गया। उसने इतना ही बताया कि लड़की को वे
लाये जरूर थे पर भूखी होने और दूध न मिलने के कारण वह हिन्दुस्तान से आते
हुए रास्ते में ही मर गयी। जल्दी में वे जितनी कब्र खोद सके खोदकर उसे दफना
आये। न मार और न लालच उससे कुछ बकवा सके।
दूसरे दिन पुलिस चंगड़ी को भी पकड़कर ले आयी। चंगड़ी के चेहरे पर जरा भी
घबराहट नहीं थी। उसने भी चंगड़ वाली कहानी दुहरा दी।
चंगड़ की कहानी सुनकर जीनत का दिल टूट गया .चंगड़ी ने जबकि बात वही कही
थी, पर उसका मुँह देखकर जीनत बिलकुल निराश नहीं हुई। उसने कहा वह चंगड़ी
से अकेले में कुछ पूछना चाहती है।
कमरे में अकेले जब जीनत ने चंगड़ी के चेहरे के हाव-भाव देखे तो उसके मन में
भी वह समय याद आ गया जब मानाँवाल के सरदार ने उन्हें लड़की छोड़ जाने के
लिए कहा था। 'शायद उसके छोटे-छोटे हाथों की खुशबू इसके प्राणों में बसी हो'
चंगड़ी ने सोचा, पर अपनी कमंजोरी पर काबू पाकर वह जीनत के सवालों के झूठे
उत्तर देती गयी।
''तू सच कहती है उसे तूने अपने हाथों से दफनाया था?''
''हाँ बीबी मैंने इन्हीं पापी हाथों से उस पर मिट्टी डाली थी।''
''उसके गले में एक सोने की जंजीर थी।'' जीनत ने काँपती आवांज में पूछा।
चंगड़ी ने जेब से जंजीर निकालकर जीनत को पकड़ा दी।

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''यह आपकी अमानत है बीबी।''
जंजीर देखकर जीनत दहाड़ मारकर रोने लगी। सभी अन्दर आ गये। जंजीर जीनत
के होंठों से लगी हुई थी और वह बेहोश पड़ी थी।
अब थानेदार को भी यकीन हो गया कि चंगड़ सच्चे हैं। सोने की जंजीर से पाँच
महीने की लड़की उनके लिए कीमती नहीं थी।
दोनों को छोड़ दिया गया पर वे वहीं खड़े रहे। और सभी जीनत को होश में लाने
की कोशिश कर रहे थे।
डाक्टर भी पहुँच गया। उसे सारी कहानी सुनायी गयी। चंगड़ी का जिक्र आते ही
उसने चंगड़ी को देखना चाहा। पर चंगड़ और चंगड़ी हरेक को अपने रास्ते का काँटा
समझ चुपचाप चले गये थे।
डाक्टर ने देखा-भाला। साँस ठीक थी, नब्ज ठीक थी।
''दंदल की चिन्ता नहीं है इसी तरह कुछ देर लेटी रहने दो ,शायद अपने आप यह
कुछ बोले. उससे इलाज के लिए संकेत मिल सकता है।''
बीस मिनट वह उसी तरह पड़ी रही . बेहोशी में वह कुछ नहीं बोली। अब डाक्टर
सलाह कर रहा था कि कुछ सुँघाकर उसे होश में लाया जाएे। तभी एक तरफ से
चंगड़ी ने चुपचाप प्रवेश किया और बच्चा जीनत की छाती पर लिटा दिया। कासम
ने चीखते हुए कहा''मुबीना...।''
एकदम सन्नाटा छा गया।
मुबीना को कमर से अभी चंगड़ी ने पकड़ा हुआ था। और उसके दोनों हाथ जीनत

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के गालों पर रख दिये थे।
डाक्टर ने मुबीना को जीनत की छाती पर भार समझकर उठा लेने के लिए कहा।
''नहीं...मैंने ज्यादा भार अपने हाथों पर रखा हुआ है।'' चंगड़ी ने कहा, ''इसके हाथों
की खुशबू उसके नाक में चली जाने दो. जंजीर में से उसके गले की खुशबू सूँघकर
ही वह बेहोश हुई है।''
सचमुच जीनत ने आँखें खोल दीं और खुद पर कुछ प्यारा-सा महसूस करके वह
नीम-बेहोशी में बुदबुदायी , 'कौन...कौन...यह किसी खुशबू...यह किसके हाथ...।'
''तेरी मुबीना।'' कासम बोला।
''नहीं यह मेरी सकीना'', चंगड़ी ने कहा।
जीनत ने मुबीना का मुँह बार-बार चूमा तो वह रो पड़ी . चंगड़ी ने उसे वापस लेकर
प्यार किया और फिर वापस देते हुए कहा, ''तुम अपने आप कहो बीबी यह तेरी
मुबीना है या मेरी सकीना...तुमने जन्म दिया है मैंने इसे बचाया है मैंने इसका नाम
सकीना रखा है। यदि यह तेरी मुबीना है तो मैं इसकी मौसी बनूँगी यदि यह मेरी
सकीना है तो तुम मौसी बन जाना मैं इसे दिन-रात एक करके जैसे कहोगी वैसे
पालूँगी, जहाँ कहोगी वहाँ ही इसका विवाह करूँगी जो भी तुम कहोगी मैं मानूँगी।''
जीनत को चंगड़ी फरिश्ता लग रही थी। मुबीना पर उसका अधिकार उसे अपने
अधिकार से अधिक लग रहा था। उसने मुबीना का मुँह चूमकर, हाथ आगे करके
चंगड़ी की गोद में दे दिया
''यह तेरी ही सकीना रहेगी तुम माँ और मैं इसकी मौसी बनूँगी...पर एक बात तुम

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भी मान लो।''
चंगड़ी खुद को उस कमरे में समा नहीं पा रही थी। अब वह सकीना की माँ थी
.सरकारी अफसर, लड़की का मामा, पिता और माँ उसके सामने थे।
''हाँ...मेरी बीबी बहिन आपके मुँह से निकली बात मैं कभी नहीं ठुकराऊँगी . तुम
हुक्म करो मैं तो तुम्हारी बाँदी हँ।'' चंगड़ी ने अपने सारे जीवन में खुद को कभी
इतना नम्र, इतना अच्छा और धनी अनुभव नहीं किया था।
''वह यह कि सकीना और उसके माता-पिता आज से मेरे घर में ही रहेंगे।'' जीनत
ने चंगड़ी की तरफ अपनी बाँहें बढ़ाते हुए कहा।
चंगड़ी ने वह बाँहें अपने गले में डाल लीं। आलिंगन और आँसुओं की धारा में माँ-
मौसी का भेद भी समाप्त हो गया।।।
भारतीय कहानी श्रृंखला--2

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एक अधूरी प्रेमकथा
इला प्रसाद
प्रस्तुति- अनामी शरण बबल
मन घूमता है बार-बार उन्हीं खंडहर हो गए मकानों में, रोता-तड़पता,
शिकायतें करता, सूने-टूटे कोनों में ठहरता, पैबंद लगाने की कोशिशें करता... मैं
टुकड़ा-टुकड़ा जोड़ती हूँ लेकिन कोई ताजमहल नहीं बनता!
ये पंक्तियाँ मेरी नहीं, निमिषा की हैं। मैने जब पहली बार उसकी डायरी के
पन्ने पर ये पंक्तियाँ पढ़ीं तो चकित रह गई थी। यह लड़की इतना सुंदर
लिख सकती है! उसका उत्साह और बढ़ा था, उसने कुछ और पन्ने चुन-चुन
कर मुझे पढ़ाए थे।
हम तो डूबने चले थे मगर
सागरों में ही अब गहराइयाँ नहीं रहीं!
'कैसे लिख लेती हो तुम ऐसा?' मैने प्रशंसा की थी। उसने कुछ शरमा कर
अपनी डायरी बंद कर दी थी। लेकिन तब मैं बिल्कुल नहीं सोच पाई थी कि
किस संदर्भ में ये पंक्तियाँ उसके मन में उपजी होंगी! किसी से प्रेम किया
होगा और क्या! ऐसा ही तो हम सोच लेते हैं न! तब एक पूरा समय-चक्र
बाकी था जो मुझसे उसकी पहचान कराता।

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जब मैं हॉस्टल में उसकी रूममेट बनकर उसके कमरे में आई तो शुरू-शुरू में
बस इतना ही जान पाई थी कि वह अपनी माँ से बेहद प्यार करती है।
अपनी टेबल पर उसने माँ की तस्वीर सजा रखी थी जिसमें वह अपनी माँ के
बराबर में खड़ी हँस रही थी। उसकी शकल अपनी माँ से बेहद मिलती थी।
माँ की ही तरह सुंदर थी वो!
वह अपनी माँ से किस हद तक जुड़ी थी और अपने पिता से कितनी नफरत
रखती थी यह मैंने तब जाना जब उसने एक रात अपना अलबम मुझे
दिखाया। अजीब बात थी! उसके अलबम में उसके पिता का एक भी चित्र नहीं
था। बस माँ और वह! छोटी-सी निमी माँ की गोद में, खेलती निमी माँ के
पास बैठी, माँ के साथ किसी पिकनिट स्पाट पर, यात्रा में, कहीं भी। बस माँ
हर जगह, पिता अनुपस्थित। लेकिन वह पिता की बातें करती थी! पिता बहुत
बड़ी कंपनी में मैनेजर हैं। वह उनके साथ रही थी, दो बरस पहले। माँ की
मौत के बाद पापा साथ ही लिवा ले गए थे, हालाँकि वह बिल्कुल नहीं चाहती
थी। वह उनसे मिलने गई थी, पिछली छुट्टियों में। इसी तरह की तमाम बातें
वह करती। मैंने अनुमान लगाया कि शायद ऐसा इसलिए है कि इसकी माँ
अब दुनिया में नहीं हैं या पिता से उनका शायद डाइवोर्स हो चुका होगा।
पूछने का साहस नहीं हुआ। यूँ भी मैं उसे पूरा समय देना चाहती थी कि वह
कभी अगर खुद चाहे तो मुझे बतलाए, जैसे उस दिन उसने मुझे अपना
अलबम दिखाया था, डायरी के कुछ पन्ने पढ़ाए थे।
प्यारी-सी लड़की थी वह। कपड़ों से लेकर कमरे के रख-रखाव तक में उसके
सौंदर्य बोध की स्पष्ट छाप थी। वह क्यों बॉटनी में शोध कर रही थी, पता
नहीं। वह पूर्णतः कलाकार थी। पेंटिंग करना, कविता लिखना, अपने कपड़े खुद

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डिजाइन करना और शहर में मामा के घर जाकर मशीन पर सिलना, उन पर
कढ़ाई करना, यह सब उसकी आदतों में शुमार था। रंगों का चयन भी अद्भुत।
व्यक्तित्व में एक गरिमा। चाल में आत्मविश्वास। यह आत्मविश्वास शायद
उसके अमीर होने की वजह से है, मैं सोचती और उससे दूरी बनाए रहती।
हॉस्टल में कई लड़कियाँ उसकी जबर्दस्त फैन थीं। एक ने उस पर कविता
भी लिख डाली थी। सारे वक्त उसका हँसता चेहरा किसी को भी दोस्त बना
लेता था। और फिर साहित्य में रुचि। इसी रुचि ने उसे सेंट्रल लाइबेरी में बंटू
से मिलवाया था, जब एक दिन विभाग से लौटने के बाद उसने मुझसे अपेक्षा
की थी कि मैं उसके दोस्त से मिलूँ।
'राका दी, आप बंटू से मिलेंगी? वह मेरा दोस्त है। मेरी-आपकी तरह
साहित्यिक रुचि है उसकी। हम किताबें पढ़ते हैं और फिर उन पर चर्चा करते
हैं।'
'अच्छी बात है। लेकिन मैं क्यों मिलूँ? मुझे तुम्हारे दोस्तों से दोस्ती करने में
कोई दिलचस्पी नहीं।'
'क्या है दीदी! जरा सा नीचे चल नहीं सकतीं? एक फ्लोर ही तो है। सीढ़ियों
के नीचे वह खड़ा है।'
मैं अनिच्छा से उठी। कमरे में आने के बाद फिर नीचे जाने का मतलब
कपड़े बदलना। जाने किस-किस के मित्र, अभिभावक हॉस्टल के बरामदे या
मैदान में होते हैं और हॉस्टल का नियम भी है कि हम फार्मल ड्रेस में नजर
आएँ।
नीचे वह खड़ा था। मँझोले कद का, दुबला-पतला लड़का। बड़ी-बड़ी आँखें जो

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जाने क्यों मुझसे नजर नहीं मिला रही थीं। अतिरिक्त संकोच और लड़कों
में? नहीं, यह उसका निमिषा के प्रति आकर्षण है और पकड़े जाने का डर -
जो उसे नजरें उठाने नहीं दे रहा। मैंने सोचा और वहाँ से हट जाना उचित
समझा।
मैने औपचारिक परिचय किया और कमरे में वापस आ गई। निमी लौटी, घंटे
भर बाद। चहकती हुई, हमेशा की तरह।
'दीदी, बंटू अच्छा है न? आपको कैसा लगा?'
मैं हँसी - 'क्या मतलब?'
'आपको नहीं लगा कि वह बहुत अच्छा लड़का है?'
इच्छा हुई कहूँ, 'प्यार हो, तो साधारण चेहरा भी सुंदर हो जाता है, असाधारण
लगता है। यह तुम्हारा आकर्षण है निमी, जो उसे हैंडसम बना रहा है।' किंतु
चुप रही, मैं निमी के मामलों में दखल नहीं देती थी। उससे एक निश्चित दूरी
बना रखी थी मैंने क्योंकि उस कमरे में आए हुए मेरे बस तीन महीने हुए थे
और इतना वक्त उस लड़की को जानने के लिए काफी नहीं था।
फिर यह अक्सर ही होता, कभी विभाग जाने से पहले, कभी विश्वविद्यालय
से लौटते हुए रास्ते में और कभी हॉस्टल के ही लान में मुझे वे दोनों मिलते
- बातें करते हुए। मैं हाथ हिलाकर आगे बढ़ जाती। शायद उनके निरीक्षण का
पूरा मौका वक्त मुझे थमा रहा था और मुझे बंटू में कम और निमिषा में
दिलचस्पी ज्यादा थी।
हम दिन भर अपने अपने विभाग में होते, शाम अलग अलग कटती किंतु

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रात तो साथ ही गुजरती थी। हमारे सोने का समय एक था और खाने का
भी। हॉस्टल के मेस में भी हम साथ ही होते। वह चहकती रहती, खिलखिलाती
रहती। मेस में जैसे जान आ जाती उसकी हँसी और बातों से और मैं सोचती
कितना सुंदर होता है प्रेम!
शायद मुझे भी उससे स्नेह होता जा रहा था तभी मैं उसकी कहानियाँ सुनने
लगी थी। मन्नू भंडारी से लेकर तुर्गनेव तक की किताबों पर चर्चा करने लगी
थी और नाम सुझाने लगी थी कि अगली कौन-सी किताब उसे पढ़नी चाहिए।
वह मेरी सलाह गंभीरता से सुनती। मुझे बड़ों का सम्मान देती लेकिन जब
वह बंटू की बातें करती तो मैं चुप ही रहती थी।
यह प्यार का पहला सोपान था।
लाइब्रेरी से किताबें लाना, पढ़ना और फिर एक-दूसरे को पढ़ाना यानी कि बंटू
से मिलते रहना। लंबे वार्तालापों का सिलसिला। पचपन खंभे लाल दीवारें,
गान विद द विंड, फर्स्ट लव, अंधे मोड़ से आगे, गुनाहों का देवता, सारा
आकाश... उसके सप्ताहांत अब बंटू के लिए थे। वह उससे बातें करके कमरे
में लौटती और शुरू हो जाती -
'जानती हैं राका दी, हमारी रुचियाँ बेहद मिलती हैं! कल मैंने पीला सलवार
सूट पहना था तो उसने बताया पीला उसका भी फेवरेट कलर है।'
...
'बंटू को भी छोले-भटूरे पसंद हैं।'
...

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'बंटू के दादा जी स्वतंत्रता सेनानी थे। बनारस की वो गली उसके दादा जी
के नाम पर है। बहुत संपन्न लोग हैं वे। लेकिन तब भी देखिए, जरा भी
घमंडी नहीं है। है न?'
...
'बंटू को भी राक म्यूजिक पसंद है। वह शिवकुमार शर्मा और हरि प्रसाद
चौरसिया को भी सुनता है। आज यह कैसेट उसने मुझे दिया। बजाऊँ?'
...
'कल हमने जे कृष्णमूर्ति को पढ़ा। हम कृष्णमूर्ति फाउंडेशन, राज घाट जाने
वाले हैं।'
'सारनाथ नहीं? बुद्ध अच्छे नहीं लगते? वैराग्य हो जाएगा?' मैंने चिढ़ाया।
'आप भी न राका दी!' ...उसका मुँह फूल गया।
बंटू सारा आकाश था और वह उड़ रही थी। मैं उसे देखती और सोचती -
कहाँ जा रही है यह लड़की!
प्रेम का दूसरा सोपान
वह अब गंभीर होती जा रही थी। अंतर्मुखी, आत्मलीन-सी। मैं समझ रही थी,
बंटू को लेकर एक सपना पाल लिया है इसने। मुझे वह लड़का बिल्कुल
अच्छा नहीं लगता था। बेहद भावुक किस्म का दिखता था वह। फैसले लेने
और उन पर टिकने का माद्दा रखने वाले कुछ और होते हैं। मैं लड़कों से
कभी मित्रता न करने के बावजूद उनके हाव-भाव से इतना तो समझ ही
सकती थी।

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वह अकारण स्नेह लुटाती रहती। सब पर। अब भी। रविवार को यदि कमरे
में होती तो खाना वही पकाती यदि मेस आफ होता। 'आप बैठिए, मैं
पकाऊँगी। मैं छोटी हूँ न। आपकी छोटी बहन।'
लेकिन बंटू की बातें करने के बजाय, मुझसे बचने की कोशिश करती। कमरे
में जब हम दोनों होते और सामान्य वार्तालाप चल रहा होता तो वह जान
बूझ कर बंटू-प्रसंग वार्तालाप से बाहर रखती। मैं चाहती कि वह खुले लेकिन
वह जाने किन समस्याओं से जूझ रही थी और अपनी ही दुनिया में गुम थी!
मेरी चिंता उसे लेकर बढ़ती जा रही थी!
तीसरा सोपान
वंदना मुझे पंडित जी की चाय की दुकान पर मिली - निमी की बचपन की
सहेली और सबसे अच्छी दोस्त। बदहवास।
'राका दी, आपको कब से ढूँढ़ रही हूँ! आपके विभाग में लोगों ने बतलाया कि
आप यहाँ हैं!'
मैंने चाय का एक प्याला उसकी तरफ बढ़ाया - 'लेकिन क्यों? क्यों ढूँढ़ रही
थी मुझे?'
'आप हॉस्टल चलिए। निमिषा ने नींद की गोलियाँ खाकर आत्महत्या करने
की कोशिश की।'
'व्हाट नानसेन्स! किसने कहा तुम्हें?'
'मैंने उसे रोका, गोलियों की शीशी छीनी। वह कमरे में ही है। रो रही है!'

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'तुम हॉस्टल गई थी?' मेरी आवाज में अभी भी अविश्वास था।
'हाँ, आप चलिए तो!'
हम दोनों ने अपनी-अपनी साइकिल उठाई। मैने पंडित जी के पैसे चुकाए
और साथ-साथ पैदल चलने लगे। अब उसे भी कोई हड़बड़ी नहीं थी। हम
बातें कर सकते थे। वह यही चाहती भी थी कि मैं पूछूँ और वह बतलाए।
'निमी ने ऐसा क्यों किया, कुछ बतलाया?'
'बतलाना क्या। मैं तो डर ही रही थी कि वह ऐसा-वैसा कुछ कर न डाले।
इसीलिए तो आज हॉस्टल गई थी।'
'तुम्हे पता था?'
'वह और बंटू शादी करना चाहते हैं न। कल उसने बतलाया था कि वह बंटू
को अपने बारे में सबकुछ बतला देना चाहती है। जब वह सामने होता है तो
बोल नहीं पाती। बोल कर बतलाना यूँ भी मुश्किल है इसलिए उसने उसे
सबकुछ लिख कर दिया है। वह जानती है कि उसके जन्म की कहानी जान
लेने के बाद वह उससे कभी शादी नहीं करेगा। बहुत रो रही थी कल।'
'अच्छा।'
'आज सुबह जब मैं गई तो हॉस्टल गेट से बंटू निकल रहा था। उसने मुझे
देखा भी नहीं। नहीं तो हमेशा नमस्ते तो कर लेता था। मुझे लगा, कुछ
गड़बड़ है। आपके कमरे में पहुँची तो...'
मैने उसे बीच में रोका - 'तो क्या बतलाया उसने?'

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'बंटू आज सुबह उसे यह बतलाने आया था कि वह अब भी उससे शादी
करना चाहता है लेकिन घर में तूफान खड़ा हो गया है। वह उससे मैत्री रखेगा
लेकिन शादी किसी और से करेगा। हालाँकि उसकी निमी से मैत्री को लेकर
भी उसके घर में अब सबों को आपत्ति है।'
'लेकिन निमी में ऐसा क्या है? उसके पेरेंट्स का डाइवोर्स हुआ है, यही न?'
'उसने आपको ऐसा कहा है?'
'नहीं, मुझे ऐसा लगता है। जिस तरह से वह अपनी माँ की बातें करती है
और पापा से दूर रहती है। मैंने सोचा उनका तलाक हुआ होगा।'
'शादी ही नहीं हुई।'
'क्या मतलब?' मैं चौंक गई।
'हाँ राका दी, उसके माँ-पापा की आपस में शादी नहीं हुई थी। निमी के पापा
तब गाजीपुर में सीमेंट कंपनी में मैनेजर थे। निमी के मामा उसी कंपनी में
काम करते थे। कुछ गलत किया था कि नौकरी चली गई। उनकी शादी हो
चुकी थी। बच्चे थे। निमी की माँ तब अविवाहित थीं। स्कूल में पढ़ाती थीं।
सुंदर थीं, युवा थीं। अपनी पुनः बहाली के लिए भाई ने मैनेजर का बहन से
परिचय करा दिया।'
'उन्हें फिर से नौकरी मिल गई?'
'नहीं। निमी के पापा का जल्द ही ट्रांसफर हो गया। लेकिन निमी के पापा
और ममी आपस में मिलते रहे। दूसरे शहर में भी। भाई के परिवार का खर्च

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निमी की माँ ही चलाती थीं इसलिए गाजीपुर की नौकरी छोड़ नहीं सकती थीं।
लेकिन उनके संबंध बने रहे।'
'और निमी आ गई!'
'हाँ!'
'तो शादी क्यों नहीं की?'
'निमी के पापा पहले से शादीशुदा थे। उनके बड़े-बड़े बच्चे हैं। उनकी पत्नी
को जब पता चल गया तो उन्होंने निमी को तो स्वीकार लिया लेकिन कसम
दिलवा कर उसके पापा-मम्मी के संबंध खत्म करवा दिए। निमी की माँ को
उस घर में कोई जगह नहीं मिली। कभी भी नहीं।'
'मुझे निमी ने एक बार कहा था, "मैं पापा को कभी माफ नहीं कर सकती।
माँ आखिरी समय में पापा को देखना चाहती थीं। मैने खबर भेजी थी।
लेकिन वे ट्रेन से आए, प्लेन से नहीं। माँ की आखिरी इच्छा भी उन्होंने नहीं
रखी। माँ उन्हें बिना मिले ही चली गईं। वो चाहते तो आ सकते थे!" '
'आखिरी दिनों में उनके संबंध पूरी तरह खत्म हो गए थे।'
'वह टेंथ क्लास में थी न, जब उसकी माँ की मृत्यु हुई? उसने बतलाया था।
उन्हें कैंसर था। अभी उसके खर्चे कौन देता है?'
'उसकी माँ सारी संपत्ति उसके नाम छोड़ गईं है न। उसके पास एक मकान है
और बैंक बैलेंस। वह पापा से कुछ नहीं लेती। बस मिल लेती है, कभी-कभी।
उस घर में अपने भाइयों से भी। उसके पापा के एक बेटे की तो शादी भी हो

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चुकी है।'
'हूँ। लेकिन वह काफी खुश मिजाज है। कोई सोच भी नहीं सकता...'
'आप भी राका दी... खुशमिजाज है वह? नाटक करती है। कहती है, मैं जानती
हूँ मुझे जिंदगी में कुछ नहीं मिलनेवाला। मेरे हिस्से में बस रेत ही रेत आई
है। आएगी। मैं रेत को मुट्टियों में भरती हूँ। पलों में जीती हूँ। पलों में मिली
खुशी समेटती हूँ और मस्त रहती हूँ। अंदर-अंदर रोती हूँ, ऊपर-ऊपर हँसती हूँ।
कौन झेलेगा मेरा रोना! मुझे तो अकेले ही रहना है।'
'किसे मिलती है जिंदगी भर की खुशी? कोई न कोई अभाव सबके जीवन में
होता है।'
'लेकिन उसका अभाव बहुत गहरा है। माँ-बाप के रिश्ते को कोई नाम न दे
पाने का एहसास उसे छीलता रहता है। इसीलिए वह इतना हँसती है, घूमती
है, लड़कों से फ्लर्ट करती है।'
'बंटू से तो फ्लर्ट नहीं कर रही थी।'
'बहुत भावुक है उसे लेकर। इसीलिए तो मरने जा रही थी।'
हॉस्टल सामने था। मैने वंदना से कहा वह वापस जाए। मैं अकेले कमरे में
जाउँगी। 'मैने उसे कह दिया था कि आज मैं राका दी को सब बता दूँगी।'
इतना कहकर वंदना चली गई।
दुपहर हो रही थी जब मैं हॉस्टल में घुसी।
यह प्रेम का आखिरी पायदान है, मैंने सोचा। क्लाइमेक्स!

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प्रेम के आखिरी सोपान पर
कमरे का दरवाजा उढ़का हुआ था। अगल-बगल के सारे कमरों के दरवाजे पर
ताले लटक रहे थे। दोपहर के भोजन में अभी देर थी। मैं चुपचाप अंदर घुसी।
वह बिस्तर पर मुँह के बल लेटी थी। दुबली-पतली काया। गोरे चेहरे पर बिखरे
हुए उसके कटे हुए छोटे बाल। रुलाई को घोंटने की कोशिश में रह-रहकर
काँपता उसका पूरा शरीर...
मैंने उसे देखा और फट पड़ी -
'मरना ही है तो कहीं और जाकर मरो। मुझे क्यों हथकड़ियाँ लगवाना चाहती
हो? गाजीपुर जाकर मरो। मामा के घर में। पापा के पास। हॉस्टल का कमरा
ही मिला था? क्या बिगाड़ा है मैंने तुम्हारा? किस बात का बदला ले रही हो?
एक तुम्हारे होने न होने से इस इतनी बड़ी दुनिया में कोई अंतर नहीं पड़ने
वाला। शौक से मरो। अपनी मर्जी से आई थी न दुनिया में, अपनी मर्जी से
जाओगी!'
फिर मैने चौंक कर महसूसा कि ऐसा कुछ तो मैंने नहीं सोचा था। कमरे में
घुसने के पहले मेरे मन में कुछ भी स्पष्ट नहीं था। कैसा व्यवहार करना है
इसकी कोई निश्चित रूपरेखा नहीं थी। क्या कर रही हूँ मैं? क्या कह रही हूँ?
लेकिन मैं क्या कहना चाहती हूँ, मुझे खुद भी नहीं मालूम था। मुझे उस पर
बेहद गुस्सा आ रहा था। वह गुस्सा इसलिए नहीं था कि उसने उस कमरे में
यह कोशिश की थी। वह कहीं और जाकर मरती तो क्या मैं निर्लिप्त रहती?
मैंने खुद से पूछा।
मैं न तो अपने गुस्से को पहचान पा रही थी न उस वक्त किसी आत्म-

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विश्लेषण के लिए तैयार थी। मैं बस उस पर बरस रही थी। जो जी में आए
कहे जा रही थी। उसका रोना तेज होता जा रहा था। अब वह फूट-फूट कर रो
रही थी। आवाज भींच कर। उसने सुबह से कुछ खाया नहीं था। वंदना ने
बतलाया था। वह नहाई नहीं थी। अनवरत रोने से सूजी हुई आँखें और दुबला
चेहरा लिए वह मासूम बच्ची-सी लग रही थी, अपनी उम्र से बहुत छोटी।
मैंने उसे बहुत प्यार किया था। छोटी बहन थी वह मेरी। अनचाहे ही मैं
शायद बहुत गहरे जुड़ गई थी उससे। यह जुड़ना बहुत समय से हो रहा था,
मैने आज पहचाना था।
वह सहसा उठ कर बैठ गई। दीवार से पीठ टिका ली। तकिया गोद में। आँखें
झुकीं। मुँह से पहली बार बोल फूटे -
'माँ के मरने के बाद बहुत अकेली हो गई थी मैं। कोई मुझे डाँटता नहीं था।
मैं जान-बूझकर गलतियाँ करती, तब भी... कोई डाँटता नहीं था। आज पहली
बार किसी ने मुझे इतना डाँटा है। थैंक्यू दीदी!'
मैं स्तब्ध थी।

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भारतीय कहानी श्रृखंला- 3
उस स्त्री का नाम
इला प्रसाद
प्रस्तुति- अनामी शरण बबल
फिल्म सचमुच बहुत अच्छी थी।
'इतनी छोटी-सी फिल्म और इतनी बड़ी बात कह डाली, वो भी कितने
खूबसूरत तरीके से; मानो फिल्म न हुई कविता हो गई।' शालिनी बोल ही
पड़ी।
'अब घर जाकर तुम भी कोई कविता लिख लेना।' राजेश मुसकराया।
भीड़ छँट रही थी।
सहसा एक स्त्री सामने आ गई, 'तुम लोग किधर जा रहे हो?'
'हमें नार्थ जाना है, नार्थवेस्ट।' राजेश ने स्पष्ट किया।

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'तो फिर इन्हें राइड दे दो। इनको पता नहीं था कि फिल्म इतनी छोटी है।
इन्होंने मेट्रो को साढ़े नौ बजे का टाइम दे दिया था।'
शालिनी ने मुड़कर देखा। बगल में एक वृद्धा चमकती हुई काली छड़ी का
सहारा लिए खड़ी थी।
राजेश ने हामी भर दी। न कहना यूँ भी अनुचित होता और लोगों की
सहायता करना तो राजेश की आदतों में शुमार है।
'आप कहाँ से हैं? दिल्ली से?' अब वह वृद्धा, शालिनी के बगल में चल रही
थी।
'नहीं, मैं तो पटने की हूँ। मेरे पति दिल्ली से हैं।'
'तब तो दिल्ली आना जाना होता होगा।'
'हाँ, बिल्कुल।'
'मेरी बेटी के लिए लड़का बताना, बेटी। शादी ही नहीं करती। कहती है मेरा
भाई अमेरिका में है। मुझे तो वहीं जाना है।'
'हाँ, और आप भी तो यहाँ हैं। अमेरिका में।' शालिनी मुसकराई। इन वृद्धों को
सारे समय बाल-बच्चों की पड़ी रहती है। चाहे वे परवाह करें न करें। मिलते
ही शुरू हो गईं।
उसने कार का पीछे का दरवाजा खोल दिया।
वृद्धा अंदर जा बैठी।

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राजेश जैसे इंतजार ही कर रहा था। शालिनी के बैठते ही उसने कार स्टार्ट
कर दी।
'बहुत अच्छी फिल्म थी। मैं भी ऐसी ही थी। अपने बच्चों के लिए किसी से
भी जाकर लड़ लेती। मेरे बच्चे हैं भी बहुत प्यारे। मैं तो दिल्ली में नौकरी
कर रही थी। पढ़ाती थी स्कूल में। वहाँ तो रिटायरमेंट 58 साल में हो जाती है।'
'हाँ, हाँ, जानती हूँ मैं।' अगली सीट से शालिनी ने हामी भरी।
'आपके पास सेल फोन होगा। मैं मेट्रो को इन्फार्म कर दूँ कि मेरी राइड
कैन्सिल कर दे। अरे, आपका नाम तो पूछा ही नहीं।'
'मैं शालिनी हूँ और यह राजेश।' शालिनी ने अपना सेल फोन पीछे हाथ
बढ़ाकर दे दिया।
'बड़ा अच्छा नाम है। आपके पति हैं भी बड़े सुंदर। नाम तो आपका भी बड़ा
सुंदर है।'
'शालिनी ने राजेश को देखा। आँखों ही आँखों में बोली, 'मस्का लगा रही हैं।'
राजेश ने उसका हाथ दबा दिया। शालिनी ने आँखों ही आँखों और इशारों से
नाराजगी व्यक्त की, 'तुम सुंदर हो, मैं नहीं।' राजेश ने मुश्किल से हँसी रोकी।
वृद्धा व्यस्त थी, 'यस, माई नंबर इज एट वन थी टू एट सिक्स नाइन। यस।
आइ हैव गौट अ राइड। प्लीज कैन्सल माई नेम। थैंक यू। थैंक यू।'
सेल फोन शालिनी को वापस हो गया।
यह सुविधा है अमेरिका में। बूढ़े, बीमार-अपाहिज लोगों के लिए अलग बस

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सर्विस है। बस, पहले से बुक करना होता है। बस आपको आपके बतलाए गए
स्थान तक आकर ले जाएगी और फिर नियत समय पर, जो आपने तय किया
है, आपके घर वापस छोड़ जाएगी। वैसे अपने कई वृद्ध परिचितों के अनुभव
से शालिनी जानती है कि यह हमेशा सच नहीं होता। कई बार घंटों का इंतजार
भी इस व्यवस्था में शामिल है। अंततः थक हार कर न जाने का फैसला भी।
ऐसे में कई बार राजेश ने सहायता की है। कई लोगों की। कभी हास्पिटल
जैसी जरूरी जगहों तक ले जाना, ले आना भी हुआ है और घर पर बैठी
शालिनी अपनी अनभिज्ञता में कुढ़ती रही है। जब राजेश का स्वतंत्र व्यवसाय
नहीं था, तब वह खुद भी समस्या के इस पहलू से अनभिज्ञ था। तब न वे
ज्यादा मंदिर जाते थे, न पिक्चर। राजेश सप्ताह के पाँच दिन सुबह सात बजे
घर से बाहर हो जाता और रात आठ बजे ड्राइव वे में कार की रोशनी शालिनी
को देखने को मिलती। उन पाँच दिनों में शालिनी घर के काम देखती। बच्चों
को घर पर ट्यूशन पढ़ाती और घर-बाजार के बीच समय निकल जाता।
सप्ताहांत में राजेश सोना चाहता। यह कुछ गलत भी नहीं था। फिर किसी का
जन्मदिन, किसी की कोई और पार्टी। समय बस यूँ... निकल रहा था।
लेकिन अब उनके पास अपने लिए वक्त है।
'तुम्हारे बच्चे कितने हैं?' कार की पिछली सीट से सवाल उभरा।
'हमारे बच्चे नहीं हैं।' शालिनी ने जवाब दिया।
'कितने बरस हो गए शादी को?'
'तीन साल।'

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'अभी ज्यादा समय नहीं हुआ। हो जाएँगे। शुरू में सब लाइफ इन्ज्वाय करते
हैं।'
शालिनी को कुछ अच्छा नहीं लगा। दूसरों के फटे में पैर अड़ाना इन बूढ़ियों
की आदत होती है। वह चुप रही।
'मैं आशीर्वाद देती हूँ। तुम्हारे बच्चे हों।' वे अब आशीर्वाद पर उतर आई थीं।
'थैंक यू।' - और क्या कहे कोई!
शायद राजेश को जरूरी लगा कि वह भी इनका हिसाब करे।
'आपका बेटा यहाँ रहता है?' राजेश ने पूछा।
'हाँ, हाँ, मेरे दो बेटे हैं। दोनों यहीं सैन ऐंटोनियो में। तुमने सोमेंद्र कपूर का
नाम सुना है?'
'नहीं।'
'अरे बहुत बड़ा बिजनेस है उसका। रियल इस्टेट का। सँभाल नहीं पाता। सारे
वक्त उसी में लगा रहता है। कहता है, माँ इतना काम मुझसे सँभाले नहीं
सँभलता।'
तुम भी तो रियल इस्टेट बिजनेस में हो न? नहीं जानते?'
'नहीं।' राजेश ने ईमानदारी से स्वीकार किया।
'बहुत बड़ा बिजनेस है।'

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शालिनी ने सिर घुमा कर पीछे नहीं देखा किंतु आवाज में तृप्ति का भाव
स्पष्ट था। उसे यह बहुत सहज लगा। भारत में माता-पिता बच्चों के लिए ही
तो जीते हैं और उनकी सफलता/समृद्धि में सुखी होते हैं। सुखी हैं यह भी...!
'अरे, मैं तो भारत में थी। वालंटरी रिटायरमेंट लिया। सोमेंद्र रोने लगा। माँ, तू
यहीं आ जा मेरे पास।'
'अच्छा।'
शालिनी को फिर से फिल्म याद आने लगी थी। बेटा स्कूल से पिट कर आया
है। अपने कमरे में जाकर रो रहा है। माँ देखती है, बेटे ने खाना नहीं खाया।
जाकर पूछती है। नहीं बतलाता। वह उसके चेहरे को देखकर समझ जाती है
और फिर निकल पड़ती है, बेटे के साथ हुए अन्याय का प्रतिकार करने।
नादिरा बब्बर ने क्या खूब ऐक्टिंग की है।
क्या तेवर थे। लगता था सारी दुनिया को आग लगा देगी। काली माँ !
आँखों के आगे फिल्म की माँ नादिरा बब्बर का चेहरा घूम गया।
'सोमेंद्र को फुरसत ही नहीं। सारे वक्त लगा रहता है। कारोबार तो जितनी
मेहनत करोगे, बढ़ेगा। आक्शन में घर खरीदता है, फिर रेनोवेट करके बेच देता
है। मुझे भी ले गया कई बार आक्शन में। बोली लगाने। फिर मैंने कहा, मैं
नहीं जाने वाली। तू ही जाया कर।'
शालिनी समझ गई। रियल इस्टेट उसकी समझ में आता है। उसने भी यहाँ
अमेरिका आने के बाद एक कोर्स किया ताकि राजेश का काम समझ सके

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बल्कि टाँग अड़ा सके। कमसे कम राजेश यही कहता है। 'करती-धरती तो हो
नहीं कुछ, बिना माँगे सलाह देनी है बस। जब मन आया टाँग अड़ा दी।'
तो इनका बेटा बड़ा बिजनेसमैन है। शादीशुदा? बाल-बच्चों वाला? इस क्षेत्र में
जो जमे हुए लोग हैं कई सालों से, वे सचमुच अमीर हैं। टेक्सास, जो अमेरिका
का सबसे बड़ा राज्य है, में अब भी खाली जमीन बहुत है और जैसे-जैसे
आबादी बढ़ रही है, विभिन्न व्यवसायों से जुड़े लोग यहाँ आकर बस रहे हैं, पूरे
राज्य में ही छोटी-बड़ी इमारतों की संख्या बढ़ रही है। इस शहर में भी बड़ी
तेजी से जंगल कट रहे हैं और उनकी जगह ईंट गारे के जंगल उग रहे हैं।
लेकिन इतना फर्क तो तब भी है कि सबकुछ बड़े सुनियोजित तरीके से होता
है यहाँ। कोई नया सबडिवीजन बनता है तो हरियाली बनाए रखने के लिए हर
घर के सामने एक पेड़ होता है। सड़क के किनारे पेड़ होते हैं। यानी कि कुछ
ऐसा कि पेड़ों को भी तब इनसान की मर्जी से उगना होता है। वे यूँ ही अपनी
मर्जी से कहीं भी नहीं उग सकते। नहीं रोक सकते आपके हिस्से की धूप या
रोशनी बल्कि उसके हिस्से की धूप या रोशनी आप तय कर रहे हैं। सिर्फ
उनके हिस्से की ही नहीं, सबके हिस्से की। इनसान खुदा हो गया है यहाँ। तब
भी कितना असंतुष्ट है अपने अंदर!
'पैसे का क्या है बेटा। जितना भी कमा लो। क्या फायदा। लाइफ इन्जाय भी
करनी चाहिए।' वे कह रही थीं।
'हाँ, ये तो है।'
'तुम तो घर पर ही रहती हो। कभी मुझे भी कॉल कर लिया करना।' वह
शालिनी से कहने लगीं।

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इस बीच राजेश ने वालमार्ट में कार रोक दी थी। गैस लेनी थी। वे कार्ड
बनवाने अंदर चले गए थे।
'नहीं, मैं बहुत व्यस्त रहती हूँ। एक आनलाइन कोर्स कर रही हूँ। फिर योगा
क्लासेज लेती हूँ। घर के काम। यहाँ तो कोई हेल्प नहीं होती। सबकुछ
आपको ही करना है।'
'तुम योगा सिखाती हो। तुममें क्वालिटी है। बड़ी अच्छी लड़की हो तुम।'
शालिनी ने सोचा, राजेश को वापस आने पर चिढ़ाएगी। तुम देखने में अच्छे
हो। क्वालिटी तो मुझमें है!
'आराम से, आराम से। मुझे कोई हड़बड़ी नहीं है। जितनी देर, जहाँ रुकना हो,
रुक सकते हो।' वे राजेश से वापस आने पर बोलीं।
'नहीं, बस हो गया। कार में गैस लेनी थी। आपको शुगरलैंड की तरफ जाना है
न?
'हाँ, मैं रास्ता बताती चलूँगी। हमेशा आती-जाती हूँ न। इतने सालों से इधर हूँ।
सोमेंद्र ने कहा, जब मैं नई अमेरिका आई तो बहुत बार कहा, माँ तुम कार
चलाना सीख लो। मैं तुमको नई कार खरीद कर दूँगा। तुम सीखो तो। लेकिन
मैं नहीं कर पाई।'
'हाँ, एक उम्र के बाद मुश्किल होती है।'
'लेकिन मैं नौकरी करती थी। एक बार गिर गई आफिस में। तो जाँच हुई।
फिर पता चला कि खड़ी नहीं हो सकती। तो तब से रिटायर हो गई। यही एक

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बीमारी है। लगातार खड़ी नहीं रह सकती देर तक।'
शालिनी चुप रही। लेकिन उन्हें जैसे बोलने का मर्ज था। फिर शुरू हो गईं -
'बेटी, तू मेरी बेटी के लिए लड़का बतलाना।'
'हाँ, जरूर।'
'किसी को बहुत सुंदर लड़की चाहिए तो मेरी बेटी से शादी करे। दिल्ली में
अच्छी नौकरी है उसकी। बाइस हजार कमाती है। बहुत अच्छा गाती भी है।
घर के सारे काम आते हैं। बस एक ही बात है पाँच फुट एक इंच की हाइट है।
पैंतालिस साल की हो गई। कोई लड़का ही पसंद ना आए उसे।'
'आप इंडिया अब्रोड या भारत मैट्रीमोनियल में विज्ञापन दे दीजिए। हमारी
शादी भी विज्ञापन से ही हुई थी।'
'अरे दिया था न। बहुत रिश्ते आए। उसको कोई लड़का ही पसंद नहीं आया।'
तो शालिनी का सुझाया लड़का पसंद आ जाएगा, इसकी क्या गारंटी। वह क्यों
इस पचड़े में पड़े। मुँह से बोली, 'हाँ जरूर।'
मन में सोच रही थी। एक उम्र के बाद शायद सब ऐसे ही हो जाते हैं। वह
भी बूढ़ी होने पर क्या इसी तरह हर किसी से बोलती रहेगी। इतना अकेलापन
लगेगा कि किसी को जाने बिना, पहली मुलाकात में ही अपनी कहानी सुनाने
लगेगी! भगवान न करे, ऐसा हो। या कि शायद वह कुछ ज्यादा ही
आत्मकेंद्रित है जो इस तरह सोच रही है। यहाँ आकर असामाजिक हो गई है।
वरना, अगर बेटी अधिक उम्र तक बिन ब्याही रहे तो हर माँ-बाप को चिंता
होती है! हो सकता है, बेटे लापरवाह हों इस बारे में। कुछ भी हो सकता है।

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उसे क्या? इन्हें इनके घर तक छोड़ दो, छुट्टी पाओ। कायदे से तो इनके बेटे
को आना चाहिए था इन्हें लेने...!
किधर टर्न लेना है? राइट या लेफ्ट? फॉंड्रेन ड्राइव तो आ गया। सिगनल पर
गाड़ी रोक कर राजेश ने पूछा।
'राइट ले लेना, बेटा।'
सिगनल अभी लाल ही था।
'तुम पत्रिकाएँ पढ़ती हो?
'हाँ, मैं पत्रिकाएँ बहुत पढ़ती हूँ।' शालिनी ने स्वीकार किया।
'मेरे पास ढेरों पड़ी हैं सरिता, मनोहर कहानियाँ। मैं बहुत पढ़ती हूँ। मुझसे ले
लेना।'
'मेरे पास भी कई पत्रिकाएँ आती हैं। भारत से, दूसरे देशों से भी।'
'अच्छा।'
'आपके बेटे की उम्र कितनी है? राजेश की उत्सुकता उनके बेटे में बनी हुई
थी।
'वह पचपन का हो गया। अब तो उसके बच्चे भी बड़े हो गए। कॉलेज में
पढ़ते हैं सब। बड़ा बेटा डाक्टर है। बहू भी डाक्टर। इन डाक्टरों की भी क्या
लाइफ है। डाक्टर को तो डाक्टर से ही शादी करनी ठीक है। समय ही नहीं
होता इनके पास किसी के लिए।

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'हाँ, ये तो है।'
'पैसा कमाने की मशीन बन जाते हैं। कोई लाइफ ही नहीं।'
फिर रुककर बोली, 'मेरी शादी तो चौदह साल की उम्र में हो गई थी। ससुराल
में सब बड़ा लाड़ करते। नाम लेकर तो कोई बुलाता ही नहीं था। राणो ही
बुलाते। मेरे पति बहुत सुंदर थे। एक्दम गोरे। रशियन लगते थे। बहुत बड़ी
नौकरी थी। रेलवे में।'
'आप अमेरिका कब आईं?
'बताया न, बेटे ने बुला लिया। मैं तो उनकी मौत के बाद भी दिल्ली में
नौकरी कर रही थी। अब बस बेटी है वहाँ। उसी के लिए चिंता है। शादी हो
जाए तो वो भी यहीं आ जाए।
'हाँ, सो तो है।'
उनका घर पास आने लगा था।
'मुझे बेटा डिप्रेशन की बीमारी है। योगा करने से ठीक होता है क्या? लेकिन मैं
तो खड़ी नहीं रह सकती। देर तक बैठ नहीं पाऊँगी। आसन लगाना होगा
नहीं।'
'सत्संग में जाया कीजिए।
'हर सप्ताह जाती हूँ। मेट्रो से।'
'आपका बेटा नहीं आता?

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उसको कहाँ फुरसत है। काम ही काम है।
'तब भी, बहू होगी न?'
'अरे नहीं। सब बिजी हैं। ये अमेरिका की लाइफ ही ऐसी है।'
शालिनी ने मन ही मन समर्थन किया। किंतु, बहू-बेटा कभी-कभी तो साथ दे
ही सकते हैं। कौन जाने उन्हें मंदिर जाना ही पसंद न हो। बहुत सारे नास्तिक
भरे पड़े हैं दुनिया में। खुद वह भी ऐसी कोई ईश्वर भक्त नहीं है। मंदिर में
मित्रों से मिलना-जुलना हो जाता है और दर्शन-प्रसाद पाकर संतुष्ट हुए लोग
घर लौटकर भोजन बनाने की चिंता से भी मुक्त रहते हैं। आए दिन एक एक
मित्र से उसके घर जाकर मिलना संभव होता नहीं, न ही हर सप्ताहांत में वह
ही सबको अपने घर बुला सकती है। तो मंदिर मिलन- स्थल है। लेकिन इनके
बहू-बेटे के लिए शायद ऐसा कोई कारण भी न हो!
अमेरिका ही ऐसा देश है जहाँ अपनी मर्जी से जीता है हर कोई। इन्हें देखो,
मेट्रो लेकर कहाँ कहाँ चली जाती हैं। सत्संग, सिनेमा। इनके बेटे-बहू को तो
क्या फर्क पड़ता होगा? वे अपनी दुनिया में। माता जी अपनी दुनिया में। और
राजेश तो सीधे-सीधे कहता है, 'हम यंग हैं, हम आशा भोंसले शो में जाएँगे।
इन बूढ़ों को मंदिर जाने दो।' वही प्लान बनाती है दोस्तों के साथ तो कभी-
कभी मंदिर जाना भी हो जाता है।
सेल फोन की घंटी बजी। शालिनी ने देखा, रेडियो शो के प्रायोजक का फोन
था।
'नहीं, इस सप्ताह तो मैं व्यस्त रहूँगी।'

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संक्षिप्त बातचीत और उसने फोन बंद कर दिया।
'बेटा, तुम रेडियो में प्रोग्राम देती हो?'
तो ये सुन रही थीं। समझ गईं। शालिनी मन में मुसकराई।
'हाँ देती हूँ, कभी-कभी।'
'मुझे भी बताया कर। मैं भी सुन सकती हूँ, तुम्हारा प्रोग्राम।'
'जरूर।'
मन में सोचा, जबरदस्ती दोस्ती लगाने की कोशिश में हैं। शायद कोई बात
करने को नहीं मिलता। राजेश फिर रुका, अगला दिशा निर्देश पाने के लिए।
'बस इसी गली में। वो जो ऊँची बिल्डिंग देख रहे हो ना बेटा, पता है वो एक
वकील की है। सारे दिन कारों की भीड़ लगी रहती है। पार्किंग को जगह नहीं
होती तो लोग सड़क पर पार्क करते हैं। बहुत कमाता होगा। क्या करेगा इतना
कमा कर!'
'बहुत कमाता है या फ्री कंसल्टिंग देता है?' राजेश हँसा, 'हो सकता है, फ्री
एडवाइज देता हो, इसी लिए सब चले आते हों।'
'अरे नहीं। मेरी बिल्डिंग ठीक इसके पीछे है ना। मेरी खिड़की से दीखता है।
मैं जानती हूँ। फ्री कुछ नहीं।'
'अच्छा।'
'इतना कमाता है। क्या करेगा इतना कमा कर। पैसा कमाने की मशीन हैं

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सब।'
बुड्ढों की यही प्राब्लम है। सारी दुनिया का हिसाब रखेंगे। इन्हें क्या पड़ी है?
कुछ भी करे वकील। कोई लाइफ इन्जाय करे न करे, आपको क्या। आपने तो
अपनी जिंदगी जी ली न। अब बुढ़ापे में भगवान का नाम लो। शांति से
जियो। नाती-पोते भरा संसार है आपका। शालिनी ने भन्नाकर सोचा।
'बस इधर गेट से अंदर ले लेना। छह माले की बिल्डिंग है ना वो सामने।
उसी में।' वह कह रही थीं।
शालिनी ने चौंक कर देखा। यह किसी के घर जैसा तो नहीं लगता। अपार्टमेंट
हैं। इनका अमीर बेटा अपार्टमेंट में रहता है!
'कोंडो हैं। गवर्नमेंट सारा खर्चा देती है। रिटायर हुई जब नौकरी से तब से यहीं
रहती हूँ। बस 33% मुझे भरना है। बिजली, पानी सब फ्री। ओल्ड एज लोगों
का जो रिटायरमेंट होम होता है न। वही है। यहीं रहती हूँ। यहाँ सामने किनारे
करके रोक दो।' वे बतला रही थीं।
शालिनी जैसे किसी रहस्यलोक से वापस आई।
'आप ऊपर कैसे जाएँगी? राजेश ने पूछा।
'लिफ्ट है। तुम लोग भी आओ। थोड़ा साथ बैठेंगे।
'नहीं, फिर कभी। आज देर हो गई है।' राजेश ने थोड़ी आजिजी से कहा।
'माफ करना, मैंने तुम लोगों को देर करा दी।'

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'नहीं, ऐसी कोई बात नहीं। हमें फियेस्टा जाना है। ग्रोसरी करनी है।' शालिनी
ने बात सँभाली।
अब इतनी रात गए सप्ताहांत में फियेस्टा के सिवा कुछ और तो खुला होगा
नहीं। सब्जियों के लिए वह वालमार्ट जाना पसंद नहीं करती, भले ही वह
चौबीस घंटे खुला रहता हो। शालिनी ने झूठ नहीं बोला था। और अपने बारे में
यही बात उसे पसंद है। वह कभी भी झूठ नहीं बोलती।
बिल्डिंग के नीचे पोर्टिको में कुछ स्पैनिश, चाइनीज, मेक्सिकन वृद्धाएँ बैठी
थीं। एक युवा लड़का भी जो शायद उनमें से किसी से मिलने आया था। उन्हें
कार से उतरते देख वे मुसकराईं। शालिनी ने उनकी छड़ी उन्हें पकड़ा दी।
सहारा दिया और पोर्टिको तक छोड़ आई।
वापस आकर राजेश से बोली, 'ये यहाँ रहती हैं!'
'इसीलिए तो तुम्हें कॉल करने को कह रही थीं।'
'लेकिन मैंने तो उनका फोन नंबर लिया ही नहीं।'
'दिया तो है न अपना।'
'लेकिन मुझे भी कहाँ समय है कि सबका दुख बाँटूँ। इनके बेटे बहू ने जब
बुलाया तो खयाल रखें।'
'होगा कुछ, खुद ही आई होंगी।'
'क्या पता ...आकर तो नौकरी कर रही थीं।'

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'कब शुरू की नौकरी, तुम्हें क्या पता।'
लौटते हुए शालिनी सोच रही थी। जिंदगी और कहानी के बीच की सीमा रेखा
कहाँ है? फिल्म अच्छी थी। सच्ची लगी। माँ का संतान के प्रति सुरक्षात्मक
रवैया, उसकी सुख- सुविधा की चिंता करती माँ। कभी काली, कभी अन्न्पूर्णा!
...लेकिन उसके बाद? जब बच्चे बड़े हो जाते हैं, अपनी दुनिया बसा लेते हैं,
उसके बाद की कहानी तो कही ही नहीं गई। बहुत छोटी थी फिल्म। कितना
कुछ तो अनकहा रह गया उस फिल्म में।
उस फिल्म का आखिरी दृश्य शालिनी लिखेगी। फिर से। उस फिल्म को वहाँ
पर खतम नहीं होना चाहिए था। वह एक बड़ी फिल्म बनाएगी। कितने नाम
नारी के। सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा, काली... क्षमा, स्वाहा, स्वधा... लेकिन बुढ़ापे में
बच्चों को सारी सुख- सुविधा देने के लिए ओल्ड एज होम चली जाने
वाली/भेज दी जाने वाली स्त्री के इस रूप का नाम क्या है? उसे डिप्रेशन की
बीमारी है। वह खड़ी नहीं रह सकती देर तक। असहाय, लाचार वह अपनी
खिड़की से वकील को पैसे कमाते देखती है। बेटे के फोन का इंतजार करती
है। परिचित-अपरिचित की सहायता लेती है और बतला भी नहीं पाती कायदे
से अपनी कहानी। देवी के इस रूप का नाम क्या है? दुर्गा सप्तशती में कहीं
लिखा है क्या? शालिनी ढूँढ़ेगी। ।।

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भारतीय कहानी श्रृंखला-4
गुडिया की शादी
इला प्रसाद

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प्रस्तुति- अनामी शरण बबल
उस दिन अचानक ही हमें मालूम हुआ कि हमारी गुड़िया अब बड़ी हो गई है और
हमें उसकी शादी कर देनी चाहिए। हमें समझ में भी नहीं आता अगर दीदी ने
बतलाया न होता। गुड़िया दीदी ने ही बनाकर दी थी। लाल होंठ और काली पहुँचने
वाली कपड़े की सफेद गुड़िया जिसे हम बडे चाव से कभी साड़ी तो कभी फ्राक
पहनाते। वह इतनी सुंदर थी कि किसी भी ड्रेस में अच्छी लगती। कभी हम उसके
लंबे काले बालों की चोटियाँ बना देते जब फ्राक पहनाते और उन्हीं बालों का जूड़ा
बन जाता साड़ी पर। लेकिन, उसकी शादी का खयाल कभी हमारे मन में नहीं आया।
हम तो हर रोज की तरह स्कूल से लौटकर अपनी किताबों की अलमारी के निचले
खाने में बैठी गुड़िया से बातें कर रहे थे। उस छोटे-से घर में और जगह थी भी नहीं।
एक कोने में हमारी आलमारी, दूसरे में दीदी की। बाकी जो जगह बची वहाँ हमारे
बिस्तर। दीदी बड़ी थीं, उन्हें बहुत पढना होता था, इसलिए उनके लिए एक टेबल
कुर्सी भी थी। हम तो यूँ ही पढ़ लेते थे। ज्यादा पढ़ना भी नहीं था। सुबह सात बजे
से दस बजे तक का स्कूल फिर घर आकर थोड़ा होमवर्क और बाकी समय गुड़िया
का। उस दिन भी यही हुआ। हमने किताबें कोने में डालीं, खाना खाया और गुड़िया
से बातें करने लगे।
दीदी अपनी कुर्सी पर बैठी परीक्षा की तैयारी में व्यस्त थीं कि अचानक उन्होंने सिर
घुमाया और बोलीं 'सुधा, नीलू! मुझे लगता है तुमलोगों की गुड़िया अब बड़ी हो गई

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है। उसकी शादी कर तुमलोगों को उसे ससुराल भेज देना चाहिए।'
हम चकित! सब अच्छी बातें दीदी के ही दिमाग में कैसे आती हैं!
लेकिन, अब अगली समस्या उठ खड़ी हुई। हम गुड़िया का दूल्हा कहाँ खोजें? पूरे
मुहल्ले में जिस-जिस को हम जानते थे सबके तो गुड़िया ही थी, या फिर गुड्डा-
गुड़िया दोनों ही थे। अकेला गुड्डा तो किसी का भी नहीं था। कौन हमारी गुड़िया से
ब्याह रचाए?
हम पूरा मुहल्ला अगले दो दिनों में घूम आए। कहीं हमारी सुंदर गुड़िया का दूल्हा
नहीं था। क्या समझती हो, लडकी की शादी आसान होती है? कुक्कू ने सयानेपन से
कहा 'मैं जानती हूँ, रोज तो मेरी माँ मेरे पपा से यही कहती हैं। मेरी दीदी की शादी
होनी है न। बहुत ढूँढ़ना पडता है।'
हम थक हारकर रुआँसे हो गए।
नहीं करना गुड़िया का ब्याह!
फिर दीदी ने ही हमारी परेशानी समझी। उन्होंने एक गुड्डा बना दिया। हम वह
गुड्डा शीलू के घर दे आए। उनका गुड्डा, हमारी गुड़िया! विवाह की तैयारियाँ होने
लगीं।
दिन तो रविवार ही रखना था। सब की छुट्टी होती है। शादियाँ रात में होती हैं
इसलिए और कोई झंझट नहीं। सब आ सकते थे और सब ने आना स्वीकार भी
कर लिया। हम सारे दोस्तों को निमंत्रण दे आए। माँ ने छोले-पूरियाँ और गुलाब
जामुन बनाने की स्वीकृति दे दी। जिन्हें आना था वे सब बाराती ही थे। कुल दस-
बारह बाराती। नीलू, पंडित। गुड्डे की मम्मी शीलू। गुड़िया की मम्मी मैं। मुन्ना गुड्डे
का पिता बनने को तैयार हुआ। सबकुछ निर्विघ्न संपन्न हो जाता लेकिन शादियाँ
क्या इतनी आसानी से हो जाती हैं! कन्यादान के समय समस्या खड़ी हो गई जब
पंडित ने पूछा, 'गुड़िया के पापा कौन?'

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मुन्ना हमारी तरफ आ गया। 'मैं गुड़िया का पिता हूँ। गुड्डे के पिता नहीं हैं।'
पंडित जी मान गए।
शादी हो गई।
ऐसी परंपरा है कि लडकी ससुराल जाए तो उसके घरवाले रोते हैं और लड़की भी।
इसलिए भी हम रोए। अपनी तरफ से भी और गुड़िया की तरफ से भी। बहुत रो
धोकर हमने गुड़िया को ससुराल भेज दिया।
'बेटियाँ तो ससुराल जाने के लिए ही होती हैं,' बड़ों ने कहा।
हमारे लिए घर सूना हो गया।
अगले दिन जब हम स्कूल से आए तो हमारे पास करने के लिए कुछ नहीं था।
गुड़िया ससुराल में थी। उसके गहने, कपड़े, खिलौने, बिस्तर सब हमने दहेज में दे
डाले थे। आलमारी के निचले खाने में जगह ही जगह थी। हम चाहते तो कुछ
किताबें वहाँ भी जमा स्कते थे। लेकिन ऐसा करने का मेरा बिल्कुल ही मन नहीं
हुआ। नीलू को भी ऐसा ही लगा।
हम दोनों उदास हो गए।
अगले दिन से गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हो गईं। अब दोपहर भर करें क्या? दीदी को
तो पढ़ना ही पढ़ना है। हमें कहेंगी, 'सो जाओ।' दिन में कहीं नींद आती है! कितना
खाली-खाली लग रहा है। किससे बात करें। किसे नहलाएँ, खिलाएँ, सुलाएँ। लोरी
सुनाएँ!
हमें अचानक से रोना आने लगा।
'हम शाम को गुड़िया को देखने जाएँगे। शीलू के घर।' मैंने नीलू से कहा।

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वह झट सहमत।
लेकिन इस तरह अगले ही दिन लड़की के माँ-बाप का उसकी ससुराल पहुँच जाना
कुछ ठीक नहीं लगा। हमने अपने बड़ों से इसकी निंदा ही सुनी थी। इसलिए हम
दोनों को ही लगा कि हमें शीलू और मुन्ना को बुलावे का इंतजार करना चाहिए।
जब गुड़िया का रिसेप्शन होगा तब हम जाएँगे।
पहाड ज़ैसे गर्मी की छुट्टियों के दिन।
दिन भर गर्म हवा साँय-साँय करती। मैं और नीलू ढूँढ़-ढूँढ़ कर पुराने धर्मयुग
निकालते और बाल जगत पढ़ते। चार किताबें ऊँची आलमारी से और गिरतीं और
दीदी भइया डाँट लगाते। दो दिन बीत गए। कोई खबर नहीं आई।
'सुधा नीलू! तुम लोग बाहर जाकर खेलतीं क्यों नहीं? शाम हो गई तब भी अंदर ही
बैठे रहना है?' बड़ों ने पूछा।
'किसके साथ खेलें? शीलू मुन्ना आते ही नहीं।' हमने मायूसी से जवाब दिया।
'क्यों? मुहल्ले में एक उन्हीं के साथ खेलते थे तुम? कुक्कू भी तो है। रीता संगीता,
क्या हो गया है तुम्हें?' दीदी ने डाँट लगाई।
अब हम क्या बताएँ। हमारी गुड़िया उनके पास है। क्या ये जानते नहीं!
'चलो उस ओर घूम आते हैं। क्या पता शीलू मुन्ना कहीं खेल रहे हों। हम भी बाहर
जाते हैं। उधर ही जाकर खेलेंगे।' नीलू ने कहा।
शीलू और मुन्ना सड़क पर ही मिल गए। बुढ़िया की दुकान से जाने क्या खरीद
कर लौट रहे थे दोनों। हमने उन्हें रास्ते में ही जा पकड़ा।
'कहाँ जा रहे हो?'
आलू ले जा रहे हैं। माँ से आलू-पराठे बनवाएँगे।'
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