जागेंगे जन धीरे-धीरे / गिरीश पंकज




उभरे दुरजन धीरे-धीरे
खुला करप्शन धीरे-धीरे ।।

संतो, बचना पास बुलाए
तन, धन, कंचन धीरे-धीरे ।।

ऐसे हैं हालात मरेंगे
सारे सज्जन धीरे-धीरे।।

ख़त्म रूप का हो जाता है
 सब आकर्षन धीरे-धीरे ।।

दुर्गुण की है यही खासियत
लूटेगा धन धीरे-धीरे।।

धीरज रखना हट जाएगी
सारी अड़चन धीरे-धीरे ।।

हार न मानो पंकज देखो
जागेंगे जन धीरे-धीरे ।।



टिप्पणियाँ

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 11 जनवरी 2016 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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