तबादला / विभूति नारायण रॉय



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उपन्यास
तबादला
विभूति नारायण राय

अनुक्रम
अनुक्रम अध्याय 1     आगे




सर पर कुम्भ और तबादला! अगर मुहावरे की भाषा में कहा जाय तो श्री कमलाकान्त वर्मा, अधिशासी अभियन्ता, प्रान्तीय खंड, सार्वजनिक निर्माण विभाग के लिए यह स्थिति किसी वज्राघात से कम नहीं थी। अक्टूबर खत्म हो रहा था और कुम्भ का काम धीरे-धीरे जोर पकड़ने लगा था। ज्यादातर कामों के टेंडर हो चुके थे। कुछ काम अवार्ड हो चुके थे, कुछ पर निर्णय की प्रक्रिया अपने अन्तिम चरण में थी। मेला क्षेत्र में सड़कें आकार लेने लगी थीं और पुलों के लिए पीपे नदी के किनारे पहुँचने लगे थे। बल्लियाँ, शामियाने, चेकर प्लेटें - ढेर के ढेर गंगा-यमुना के तट पर पड़े थे। जीप से मेला क्षेत्र में जब भी कमलाकान्त निकलते तो लगभग हर बार बंधे पर कहीं गाड़ी रुकवाकर क्षेत्र में फैले इन सारे सामानों पर देर तक सन्तुष्ट नजरें डालते। इनसे टकराकर आती हुई हवा को वे गहरी साँसें खींचकर अपने फेफड़ों में भरते। लगता जैसे कि सरकारी नोट छापने की मशीनों से टकराकर आ रही हो यह हवा। शीतल और स्फूर्ति देनेवाली।
ऐसे समय में तबादला! जितना कुछ खर्च करके वे यहाँ आये हैं, अभी तो उसका दसवाँ हिस्सा भी नहीं निकला। बचत की तो बात ही क्या की जाए। इसलिए कमलाकान्त वर्मा, जिन्हें दफ्तर में सब लोग बड़े साहब कहते हैं, हतप्रभ हैं और दफ्तर का कमरा बन्द कर अपने विशेष मातहतों के साथ उस आदेश पर विचार-विमर्श कर रहे हैं जिसे अभी-अभी मुख्यालय का एक चपरासी थमा गया है।
कमरे में वर्मा साहब के अलावा चार लोग और थे। ये चार लोग अलग-अलग कारणों से वहाँ मौजूद थे। एक कारण ऐसा था जो चारों की उपस्थिति के पीछे था। दफ्तर में सत्ता-परिवर्तन हो रहा था। ये चारों सत्ता पक्ष के लोग थे। नौकरशाही में भी राजनीति की तरह सत्ता परिवर्तित होते ही मुँह फेरने की परम्परा शुरू हो गयी थी, पर ये लोग कुछ हयादार लगते थे, जो तबादले का आदेश आने के बाद भी मन्त्रणा के लिए उपलब्ध थे। या यह भी हो सकता है कि छोटे-मोटे बनाना रिपब्लिकों की तरह यहाँ भी अभी सब कुछ अनिश्चित था। तख्तापलट हो भी सकता है और यह भी हो सकता है कि शाहे-वक्त दुश्मन के हाथी-घोड़ों को रौंदता हुआ वापस गढ़ पर काबिज हो जाय। वैसे भी इस प्रदेश में नौकरशाही के तबादलों के हुक्म नीलाम होते थे। दिन में चार बार भी उनमें परिवर्तन हो सकता था। जो भी कारण हो ये चारों लोग तबादले का आदेश आने के बाद भी वहाँ थे और आदेश को बार-बार उलट-पुलटकर पढ़ रहे थे, फुसफुसाकर बातें कर रहे थे और बड़े साहब को अपनी बहुमूल्य राय दे रहे थे।
वर्मा साहब के बाईं तरफ थे रिजवानुल हक जो इस दफ्तर में सहायक अभियन्ता थे। पचास के पेटे में पहुँचा उनका शरीर बीमारी और दुर्घटनाओं के कारण लगभग ढल चुका था। माथे के ऊपर आधी सफाचट चाँद के कारण उनका पूरा व्यक्तित्व काफी गम्भीर किस्म का लगता था। वे कम बोलते थे और बिना माँगे कभी राय नहीं देते थे। दफ्तर में कोई भी बड़ा साहब आ जाय उनको इसी आदत के कारण अपना राजदार बना लेता था। लोगों को याद नहीं पड़ता था कि कभी किसी अधिशासी अभियन्ता से उनकी नहीं पटी हो।
जब कमलाकान्त वर्मा यहाँ आये तो कुछ दिनों तक उनसे भड़कते रहे। कारण सिर्फ यह था कि वे उनके पूर्वाधिकारी के करीब थे और पिछली बार जब वर्मा इसी तरह का आदेश कराकर लखनऊ से रवाना हुए तो उनके पूर्वाधिकारी ने अपने बँगले पर जो आपात बैठक बुलाई थी उसमें वे भी शरीक हुए थे। दफ्तर में कुछ दिनों तक हक साहब को बेचैन देखा गया। उनके विरोधियों ने चटखारे ले-लेकर वास्तविक, अर्द्ध वास्तविक और काल्पनिक खबरें प्रसारित कीं कि किस तरह हक साहब को बड़े साहब के कमरे में घुसने के पहले तीन घंटे प्रतीक्षा करनी पड़ती है या कि उनके पास अब कोई महत्त्वपूर्ण काम नहीं है या कि जल्दी ही बड़े साहब उन्हें डिजाइन सेक्शन में शंट कराने वाले हैं।
हक साहब इन सारी चर्चाओं से विचलित नहीं हुए। दफ्तर के अनुभवी बाबुओं की तरह उन्हें भी पता था कि यह तो अस्थायी दौर है। यह हर बार सत्ता परिवर्तन के साथ आता है, फिर कुछ महीनों में ठीक हो जाता है। इस बार भी यही हुआ। कभी ईद पड़ी, कभी बकरीद। हक साहब की बेगम अच्छा मुर्गा पकाती थीं और वर्मा साहब की पत्नी खाने की शौकीन थीं। पहली ईद पर हक बड़े साहब के बेरुखे मुबारकबाद के बावजूद दोहरे होते हुए बोले, ''सर, मेरी फैमिली की बड़ी इच्छा थी कि मैडम और बच्चे हमारे गरीबखाने पर तशरीफ लाते, पर आप इतने बिजी रहते हैं कि अर्ज करने की हिम्मत नहीं पड़ी और मैं खुद ही हाजिर हुआ हूँ। बेगम ने अपने हाथ से मुर्गा पकाया है। उम्मीद है बच्चों को पसन्द आएगा।''
मुर्गा बच्चों को खूब पसन्द आया, पर वर्मा साहब की फाँस अभी दूर नहीं हुई थी।
अगले कुछ दिनों हक साहब की बेगम साहिबा किसी न किसी मौके पर मुर्गे या बकरे की कोई लजीज डिश बनाकर भेजती रहीं।
विरोधी खेमे का चपरासी बड़े साहब के घर पर तैनात था। उससे बात खुली तो यह खेमा चौकन्ना हुआ।
एक शाम जब दो टिफिन कैरियरों में भरकर मटन कोरमा, चिकन मुगलाई, मटन यखनी और सींक कबाब जैसी चीजों के साथ जानीवाकर ब्लैक लेबल की बोतल इस आग्रह के साथ पहुँची कि ''सर, मेरा साला कल सऊदी अरब से आया है। वही एयरपोर्ट से मेरे लिए ड्यूटी फ्री स्काच ले आया। अब मैंने तो छोड़ रखी है। साला ठहरा नमाजी, हाथ नहीं लगाता। बेगम ने कहा बड़े साहब इसकी कद्र जानते हैं, उन्हें यह तोहफा दे आओ। साथ में थोड़ा सा नान वेजिटेरियन बच्चों के लिए लेते जाओ। पता नहीं कैसा बना है। मेम साहब ने कभी राय नहीं दी,'' विरोधी कैम्प सक्रिय हो गया। गुप्तचर छोड़े गये और जो सूचना वे लेकर आये उससे इस कैम्प की बाँछें खिल गयीं।
दूसरे दिन बड़े साहब के कमरे में स्टाफ मीटिंग के दौरान जब चाय का मध्यान्तर हुआ तो हल्की-फुल्की बातों के दौरान सहायक अभियन्ता गुप्ता ने हक से ऐसे ही अनायास पूछ लिया, ''भाभी को कब ला रहे हैं हक साहब? कब तक मातादीन के हाथ का खाना खाएँगे?"
हक साहब ने चौंककर देखा। वे बोलते कम थे पर उनका दिमाग बड़ी तेज हरकत करता था। स्पष्ट था कि बड़े साहब को विरोधी खेमा यह बताने की कोशिश कर रहा है कि पिछले दो महीने से उनकी पत्नी अपने मायके बाराबंकी गयी हुई हैं और वे करीम ढाबे से मुर्गा बनवाकर अपनी बेगम के नाम पर बड़े साहब को खिला रहे थे।
बड़े साहब ने चाय का प्याला नीचे रख दिया और हल्के से चश्मा हाथ में लेकर उसे रूमाल से पोंछने लगे।
''बेगम तो बाराबंकी और यहाँ के बीच चक्कर लगाती रहती हैं। दरअसल, सर, जब से फादर-इन-ला की तबीयत खराब हुई है, उन्हें दो जगह के इन्तजाम देखने पड़ रहे हैं। एक ही भाई है उनका जो सऊदी अरब में है। जमींदारी है-छोड़ी भी नहीं जा सकती। बेगम को ही देखनी पड़ रही है। कल साला उन्हें लेकर आया था। आज फिर वापस गये हैं वे लोग।''
विरोधी खेमे के लोग इस तरह मुस्कुराए कि किसी और को मुस्कान दिखाई दे न दे, बड़े साहब को जरूर दिखाई दे जाय।
अपने देश में पिछले कुछ सालों में और कोई तरक्की हुई हो या नहीं, पर इलेक्ट्रॉनिक एक्सचेंजों की बहार जरूर आ गयी है। मोहल्ले-मोहल्ले में खुले पी.सी.ओ. में से एक बाराबंकी के लिए सक्रिय हुआ और देर रात तक बेगम हक शहर में हाजिर हो गयीं। विरोधी खेमा दूसरे दिन हतप्रभ रह गया जब उसे पता चला कि मेम साहब की बीमारी की खबर, जिसकी कोई बुनियाद नहीं थी, सुनकर बेगम साहिबा बड़े साहब के घर अगले दिन दोपहर हालचाल पूछती देखी गयीं। साथ में पिछले दिन से बड़ा टिफिन कैरियर था।
बाद में जैसा कि पिछले कई मौकों पर हुआ था और दफ्तर के अनुभवी बाबू पहले से जानते थे, वैसा ही हुआ। वे बड़े साहब की अन्तरंग टीम के सदस्य बन गये और उसी हैसियत से आज की मन्त्रणा में शरीक थे।
कमरे में वर्मा साहब के दाहिनी तरफ बैठे हुए व्यक्ति की उपस्थिति का कारण बड़ा दिलचस्प था। छोटे-छोटे बाल, गैंडे जैसी गर्दन और टूटे हुए कानवाले इन सज्जन को किसी अखाड़े में होना चाहिए था। वे दफ्तर में थे पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। उनके जीवन का मूलमन्त्र था कि पूरा जीवन ही अखाड़ा है। वे कभी भी कहीं भी कुश्ती लड़ने के लिए तैयार रहते थे। चूँकि अपने जागते समय का बड़ा हिस्सा वे दफ्तर में बिताते थे इसलिए मौजूदा जीवन की अधिकांश कुश्तियाँ भी वे यहीं लड़ते थे। अक्सर उनके साथ बातचीत करनेवाले को उनकी कुश्ती कला से परिचित होने का अवसर मिलता था। धोबिया पाट उनका प्रिय दाँव था और दफ्तर के बरामदों में अगर कोई कर्मचारी, ठेकेदार या मुलाकाती लँगड़ाता हुआ दिखाई दे जाता तो बिना बताये लोग मान लेते कि वह व्यक्ति इनसे कुछ गम्भीर विचार-विमर्श करके जा रहा है।
ध्रुवलाल यादव नामक ये सज्जन जूनियर इंजीनियर थे और डॉ. रघुवीर जैसे उत्साही हिन्दी-प्रेमियों की मेहनत को धता बताते हुए लोग उन्हें अवर अभियन्ता न कहकर जे.ई. कहते थे। वे जे.ई. थे इसलिए जब तक बोलते या लिखते नहीं थे, लोग मानकर चलते थे कि उन्होंने सिविल इन्जीनियरिंग में डिप्लोमा जरूर हासिल किया होगा। जैसे ही उनके श्रीमुख से कोई वाक्य निकलता या वे कागज पर अपने पेशे से सम्बन्धित कोई चीज लिखते, सामनेवाला मान लेता कि वे भी उन फैक्टरियों से निकला हुआ माल थे जिन्हें हमारे शिक्षाविद स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी या पालीटेक्नीक के नाम से पुकारते थे और जो धड़ाधड़ साल-दर-साल हजारों लाखों की तादाद में ध्रुवलाल जैसे होनहार निकालते रहते हैं। उन्होंने पालीटेक्नीक में पढ़ाई के अतिरिक्त प्रयुक्त होनेवाले दो तरीकों में से एक का प्रयोग करके डिप्लोमा हासिल किया था। उनके द्वारा प्रयुक्त तरीका विभाग में बड़ा काम आता है, यह उन्हें नौकरी शुरू करने पर ही पता चला।
जे.ई. ध्रुवलाल यादव के सामने जीवन की प्राथमिकताएँ शुरू से ही बड़ी स्पष्ट थीं। उनके बाप मझोले दर्जे के काश्तकार थे और लगभग बीस भैंस-गायों की सेवा-सुश्रूषा करके अपने परिवार को औसत भारतीय किसान की जिन्दगी से बेहतर जीवन प्रदान किये हुए थे। लेकिन ध्रुवलाल अपने परिवेश के मुकाबले ज्यादा महत्त्वाकांक्षी थे। टखने-टखने तक गोबर में डूबकर गाय-भैंसों की सेवा करना और शाम को कान पर हाथ रखकर बिरहा गाना-सिर्फ इन्हीं दो कामों तक वे अपनी जिन्दगी सीमित नहीं रख सकते थे। लिहाजा उन्होंने पढ़ने का फैसला किया। बाप के बहुत बच्चे थे। जमाना भी बदल रहा था। अपने लिए अब 'करिया अच्छर भैंस बराबर' सुनना बाप को खलने लगा था। इसलिए एक लड़के का पढ़ाई की तरफ रुझान उसके लिए खुशी की बात थी। उसने औपचारिक रूप से ससुरी महँगाई का जिक्र जरूर किया, पर ध्रुवलाल को शहर भेज दिया।
बचपन से ही घी-दूध का सुख होने तथा बाप के प्रिय मुहावरे के अनुसार जूता मारकर सुबह-सुबह अखाड़े में ठेले जाने के कारण ध्रुवलाल एक अदद कसरती बदन के मालिक थे। उनका कद छह फुट से कुछ ऊपर था, दोनों तरफ के कान टूटे हुए थे, रंग गन्दुम और स्वर लट्ठमार हद तक उजड्ड था। यही सारी चीजें उनकी पूँजी थीं। सबसे पहले यह पूँजी पालीटेक्नीक में काम आयी।
पालीटेक्नीक में पहुँचने के पहले दो-तीन हफ्ते में ही यह स्पष्ट हो गया कि राष्ट्रभाषा हिन्दी में छपी पाठ्य-पुस्तकें उनके लिए ग्रीक और लैटिन के महाकाव्यों की तरह थीं।
ध्रुवलाल यादव के ईमानदार मन ने उन्हें सलाह दी कि भाग चल प्यारे! कहाँ फँस गया! जीवन इन किताबों से परे ज्यादा सुखद है। दर्जा आठ में किसी कवि ने, जिसका नाम स्वाभाविक था कि वे भूल गये थे, सही ही लिखा था कि अहा! ग्राम्य जीवन भी क्या है, क्यों न इसे सबका मन चाहे। पर आगे काशी फल, कूष्मांड के साथ-साथ भूसा, गोबर और बाप के जूते का ऐसा त्रिकोण फ्लैश बैक की तरह सामने आता कि वे तो वे उनका ईमानदार मन भी काँप जाता। उन्होंने अपने मन की अनसुनी कर दी और सफलता के गुर दूसरी जगह तलाशने शुरू कर दिये।
भारतीय समाज में बिरादरी बहुत बड़ा सम्बल है। ध्रुवलाल के काम भी यही सम्बल आया। पहले रैगिंग के समय भी यह सम्बल उनके साथ था। रैगिंग में तो उनका डील-डौल और टूटे हुए कान भी निपट लेते पर पढ़ाई में मामला कुछ दूसरा था। उनके बिरादरी के सीनियरों ने बताया कि सूबे के दूसरे पालीटेक्नीकों की तरह इस पालीटेक्नीक में भी सफलता के लिए पढ़ाई के अलावा दो रास्ते थे। पढ़ाई तो निरीह छात्र करते थे। ध्रुवलाल सरीखों को तो शेष दो रास्तों में से एक चुनना था।
पहला रास्ता था बाहुबल का और दूसरा था धनबल का। बाहुबली छात्र कट्टा या चाकू मेज पर रखते और आराम से किताबें खोलकर नकल करते। इन बाहुबली छात्रों की प्रतिभा सत्र के प्रारम्भ में ही पहचान ली जाती और अध्यापकों का कोई न कोई गुट उनके सिर पर वरद-हस्त रख देता। बाहुबली से यह गुट साल-भर अपने विरोधी अध्यापकों को पिटवाता या गाली दिलवाता और इम्तहान में इन्हें पर्चा आउट करने से लेकर छोटी-छोटी पुर्जियों पर उत्तर लिखकर पहुँचाने तक का काम करता।
दूसरा रास्ता था धनबल का। जिस समय ध्रुवलाल पालीटेक्नीक में पहुँचे भारतीय समाज में बहुत कुछ बदल रहा था। शिक्षा की दुनिया बदल रही थी और उससे जुड़े गुरु बदल रहे थे। अब गुरु राजपुत्रों को दौड़ जिताने के लिए निर्धन शिष्यों के अँगूठे नहीं कटवाते थे। वे धनिक पुत्रों से वाजिब फीस लेकर उन्हें दौड़ शुरू होने के पहले ही आगे कर देते थे। प्रधानाध्यापकों और कॉलेजों के मैनेजरों ने नकल को एक व्यवस्थित रोजगार का रूप दे दिया था। हर चीज के रेट निर्धारित हो गये थे। यदि अपने तयशुदा कक्ष में नकल करनी थी तो उसकी एक कीमत थी, किसी अलग कमरे में बैठकर सहायक की मदद से उत्तर पुस्तिका लिखनी थी तो उसकी दूसरी कीमत थी, किसी दूसरे को बैठाकर उससे उत्तर पुस्तिका लिखवाने की कीमत अलग थी और अगर कोई छात्र चाहता कि विषय का अध्यापक ही उसके पास खड़ा होकर इमला दे तो इसकी फीस सबसे भिन्न थी।
ध्रुवलाल ने पहला रास्ता चुना। वे एक-एक कर सारी कक्षाएँ पास करते गये। यह रास्ता परीक्षा पास करने के अलावा नौकरी में भी उनके काम आया। प्रारम्भ में जब वे इस दफ्तर में आये उनकी छवि पहले ही यहाँ पहुँच चुकी थी। अपने सुगठित शरीर और उजड्ड जुबान के साथ वे एक ऐंटी इस्टैब्लिशमेंट छवि लिये दफ्तर में घुसे। नियुक्ति पत्र के मुताबिक जिस समय उन्हें वहाँ होना चाहिए था उससे वे सिर्फ पाँच महीने लेट थे। हुआ यह कि सरकारी नौकरी मिलने के पहले ही उन्हें कहीं विदेश में भी नौकरी दिलाने का भरोसा किसी एजेंट ने दिया था। अतः इस नौकरी का नियुक्ति-पत्र जेब में रखे वे विदेशी नौकरी के लिए दौड़ते रहे और अन्त में निराश होकर पाँच महीने बाद ज्वाइन करने इस दफ्तर में पहुँचे। पहुँचते ही उनके और बड़े बाबू के बीच में बड़ी संवैधानिक किस्म की बहस छिड़ गयी। बड़े बाबू के मुताबिक कोई भी नियुक्ति-पत्र कुछ खास समय तक ही वैध रहता है। कम से कम पाँच महीने तक तो नहीं ही रहता। उनकी राय में ध्रुवलाल यादव को फिर से जाकर अपने नियुक्ति-पत्र का नवीनीकरण कराना चाहिए था। इसके विपरीत ध्रुवलाल का मानना था कि एक बार नियुक्ति-पत्र मिलने के बाद रिटायरमेंट की उम्र तक प्रभावी रहता है। उन्होंने बड़े बाबू को चुनौती भी दी कि वे एक भी नियम ऐसा दिखा दें जिसके मुताबिक कोई नियुक्ति-पत्र पाँच महीने बाद रद्द हो जाता है। बड़े बाबू कोई भी ऐसा नियम नहीं दिखा पाये। फिर भी बड़े बाबू को धर्मसंकट से उबारने के लिए उन्होंने मीठे स्वर में आग्रह किया कि उन्हें पाँच महीने पहले की निर्धारित तारीख में ही ज्वाइन करा दिया जाय। बड़े बाबू जो दफ्तर के दूसरे बाबुओं की तरह उन्हें उनके सुगठित शरीर और मुँह में ठूँसे हुए पान के कारण 'महिमा बरिन न जाय' वाले भाव से निहार रहे थे, उनके इस आग्रह पर एकदम से बड़े बाबू बन गये। उन्होंने अपनी तीस साल की बाबूगिरी का निचोड़ फाइनेंसियल हैंडबुक के फलाँ पेज और अलाँ पैरे तथा गवर्नमेंट सर्वेंट्स कंडक्ट रूल्स के पेज नं. इतने से इतने तक के उद्धरण के रूप में देना शुरू कर दिया जिसे ध्रुवलाल काफी अनिच्छा और अधैर्य के साथ झेलते रहे। इसीलिए पब्लिक सेक्टर इस मुल्क में असफल हो रहा है-उन्होंने निराशा से सोचा और हवा में मुँह उठाकर किसी काल्पनिक व्यक्ति की माँ-बहन के साथ अपने शारीरिक सम्बन्ध कायम करने लगे। बड़े बाबू अगर काफी मोटी चमड़ी के न होते तो इन सम्बोधनों को अपने लिए ही समझ लेते, पर वे निर्विकार भाव से किसी फाइल में डूब गये। दूसरे बाबुओं ने जरूर आँखें मटकाईं, एक दूसरे को देखकर मुस्कराए और अपने उद्गारों से यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि श्री ध्रुवलाल जिन स्त्रियों के सम्मान में कसीदे पढ़ रहे थे, वे बाबू की ही पत्नी और बेटियाँ थीं।
बड़े बाबू ने भारतीय नौकरशाही का मूल मन्त्र पकड़ा। जब कोई फैसला न करना हो तो फौरन फाइल पर लिखो-बात करें। यहाँ उनके नीचे कोई ऐसा नहीं था जिसके पास 'प्लीज स्पीक' लिखकर वे फाइल भेज सकते थे और यमदूत की तरह ध्रुवलाल सामने खड़े थे इसलिए वे भुनभुनाते हुए स्वयं ही उनका नियुक्ति-पत्र लेकर उठ खड़े हुए और बड़े साहब के कमरे की तरफ बात करने के लिए बढ़ गये और दो-तीन घंटे तक नहीं लौटे।
इन दो-तीन घंटों का बड़े साहब के विरोधियों ने जमकर सदुपयोग किया। दूसरे दफ्तरों की तरह इस दफ्तर में भी काम होता हो या नहीं, राजनीति खूब होती थी। कौटिल्य ने सहस्रों वर्षों पूर्व राजनीति और गुप्तचरी का सम्बन्ध परिभाषित कर दिया था और यह दफ्तर पूरी श्रद्धा के साथ उस पर विश्वास करता था। सरकारी गुप्तचर एजेंसियों की तरह यहाँ गोपनीय सूचनाएँ अखबारों की कतरनों से नहीं उपजती थीं, बल्कि इन्हें हासिल करने के लिए मेहनत की जाती थी, इसलिए अक्सर इनमें कुछ दम भी होता था। ध्रुवलाल यादव का कमरे में प्रवेश, बड़े बाबू के साथ उनके नाटकीय संवाद और बाबुओं की प्रतिक्रिया के बीच अचानक जायसवाल नामक ठेकेदार क्यों बाबुओं की सेवा के लिए लाया गया मगही पान का आधे से ज्यादा भरा खोखा तिवारी बाबू की मेज पर छोड़कर कमरे से गायब हो गया, इसका पता करने के लिए अशोक कुमार शुक्ला, सहायक अभियन्ता अर्थात ए.ई. के कमरे में चलना पड़ेगा जो इस कमरे से तीन कमरे दूर था और जिसमें चौरसिया नामक एक अन्य ए.ई. भी बैठते थे और जो इस समय किसी साइट पर गये हुए थे। उनके न होने से ही ध्रुवलाल वहाँ निमन्त्रित किये गये थे। अगर वे होते तो यह गोष्ठी कहीं और होती क्योंकि उनके बारे में शुक्ला का मानना था कि वे बड़े साहब के गुप्तचर थे और उन्हें इस कमरे में बिठाया ही इसलिए गया था कि वे शुक्ला एंड कम्पनी पर निगरानी रख सकें।
इस कमरे में ध्रुवलाल यादव की दफ्तरी दीक्षा शुरू हुई।
कमरे में दो मेजें थीं। दो मेजें इसलिए थीं कि सिर्फ दो ही मेजें उसमें आ सकती थीं। दोनों मेजों के पीछे एक-एक कुर्सी थी। एक कुर्सी का एक हत्था उखड़ा हुआ था और पीछे के ताँत भी जगह-जगह से टूटे हुए थे, उस पर शुक्ला बैठे हुए थे। दूसरी कुर्सी घूमनेवाली थी और उस पर न सिर्फ मैली-सी एक गद्दी थी, बल्कि पीछे एक लिहाफ भी था जो शुरू में जरूर सफेद रहा होगा, पर अब बदरंग हो चुका था। कुर्सियों की यह दशा दफ्तर में बड़े साहब से निकटता का पैमाना था।
दोनों मेजों के सामने दो दो कुर्सियाँ थीं। चार में से कोई कुर्सी साबुत नहीं थी। किसी के पीछे के ताँत टूटे थे किसी के नीचे के, किसी का हत्था हिल रहा था तो किसी के पाँव डगमग कर रहे थे। मेजों पर बेतरतीब फाइल कवर, कागज, पेपरवेट और पान के खोखे फैले हुए थे। पूरे कमरे में सिगरेट के टुकड़े और राख बिखरी हुई थी और कमरे के हर कोने में दीवारें पान की पीक से अमूर्त चित्रकला का नमूना पेश कर रही थीं। दफ्तर में बड़े साहब के कमरे को छोड़कर सभी कमरों की ऐसी ही हालत थी और इस कमरे में भी दूसरे कमरों की तरह सरकारी काम के अलावा सब कुछ होता था।
इसी कमरे में ध्रुवलाल यादव नौकरशाही में दीक्षित हुए। उन्हें चौरसिया ठेकेदार कनखियों से इशारा करते हुए यहाँ तक ले आया था।
कमरे में शुक्ला नामक सहायक अभियन्ता या ए.ई. के अलावा दो जे.ई. और एक बाबू पहले से थे। छोटे से कमरे में उन्होंने सामने पड़ी कुर्सियों का रुख इस तरह मोड़ लिया था कि पहली बार घुसने पर किसी गोलमेज सम्मेलन का-सा माहौल लगता था। किसी को बताने की जरूरत नहीं पड़ी, ध्रुवलाल ने चौथी खाली पड़ी कुर्सी पर कब्जा कर लिया। जायसवाल ने चारों तरफ इस प्रकार देखा मानों उसकी दृष्टि से वहाँ कोई कुर्सी उत्पन्न हो जाएगी। अभी उसकी हैसियत ऐसी नहीं थी कि शुक्ला उसे चौरसिया की कुर्सी पर बैठने को कहते इसलिए थोड़ी देर इधर-उधर देखकर वह 'अभी पान लेकर हाजिर होता हूँ' जैसा कोई वाक्य बुदबुदाकर अदृश्य हो गया।
''आइए...आइए यादवजी। विभाग में आपका स्वागत है।'' ध्रुवलाल कुछ असहज हुए। इस तरह के औपचारिक माहौल के वे अभ्यस्त नहीं थे। उन्होंने गम्भीर होकर अंग्रेजी में 'थैंक यू' से मिलता-जुलता कुछ कहा।
कमरे में मौजूद आठ जोड़ा शातिर आँखों ने उनका मुआयना शुरु कर दिया था। बीच-बीच में ये आँखें एक-दूसरे को अपना मूल्यांकन भी दे रही थीं। है पट्ठा जोरदार! ऐसा आदमी जो शरीर और भाषा से मजबूत हो और दिमाग से कमजोर, उनके लिए बड़े काम का था।
ध्रुवलाल को कमरे का माहौल घबराहट पैदा करनेवाला लग रहा था। वे वहाँ मौजूद किसी व्यक्ति की आँखों में आँखें डालकर अपना आत्मविश्वास प्रदर्शित करने का प्रयास बीच-बीच में करते, पर शीघ्र ही उनकी आँखें झुक जाती थीं। उनके लिए यह एकदम अपरिचित दुनिया थी। अगर कोई कहता कि वहाँ बैठे लोगों में से किसी को जूता निकालकर मारो तो वे बड़े प्रसन्न होते, पर यहाँ तो मामला एक्रास द टेबल यानी मेज के आर-पार था। दूसरे खिलाड़ी ज्यादा मँजे हुए थे, इसलिए वे फँसते गये।
''ज्वाइन कर लिया?" बगल में बैठे बाबू ने भोलेपन से मीठे स्वर में पूछा।
''कर लेंगे। बड़े बाबू को ज्वाइनिंग लेटर दे दिया है,'' ध्रुवलाल ने अपना आत्मविश्वास बरकरार रखते हुए कहा।
''साला एक नम्बर का पाजी है। ज्वाइन करते समय तारीख देख लीजिएगा।''
''दर हरामी है साहब। बिना पैसा लिए पादता भी नहीं। एक पैसा मत दीजिएगा। ज्वाइन तो उसके बाप कराएँगे।''
''इतना आसान मत समझिएगा मिश्रा बाबू। पिछली बार उपधिया का केस नहीं याद है। बेचारा कितने दिन यहाँ से लखनऊ तक दौड़ा। बस एक नुक्स था कि उपधिया बेचारा तीन दिन लेट आया था। साले ने उसके हजारों रुपये गलवा दिये जब जाकर ज्वाइन करवाया।''
ध्रुवलाल के कान खड़े हो गये। वे तो पाँच महीने लेट हैं !
''पर ये सब साले जूते के हैं। आपने तो अच्छा किया कि साले की माँ-बहन कर दी। आपसे शराफत से बोलेगा।''
अच्छा तो ख्याति यहाँ तक पहुँच गयी। ध्रुवलाल प्रसन्न हुए।
पर यह प्रसन्नता क्षणिक थी। आगे जो भयावह सम्भावनाएँ उनके सामने रखी गयीं उनके मुताबिक कुछ भी हो सकता था। वे पाँच महीने लेट थे (बिना बताये यह बात इस कमरे की मंडली को मालूम थी)। बड़ा बाबू उन्हें ज्वाइन कराने से मना कर सकता था। और भी कुछ हो सकता था। मसलन उनकी नियुक्ति रद्द हो सकती थी, उनकी वरिष्ठता खतरे में पड़ सकती थी या इस जैसा कुछ और। आत्मविश्वास बनाये रखने का प्रयास करते-करते वे रुआँसे हो गये। खँखारकर उन्होंने गला साफ किया और जो कुछ उन्होंने पूछा उसका मतलब था कि अब उन्हें क्या करना चाहिए।
उन्हें बताया गया कि अब उनके पास तीन विकल्प बचते थे-
पहला, वे उच्च न्यायालय की शरण में जाएँ जो सौभाग्य से इसी शहर में था और जहाँ निलम्बन, स्थानान्तरण या उनके सामने उपस्थित वर्तमान समस्या जैसे मसलों में इस शहर के सरकारी कर्मचारी जाते थे। समस्या सिर्फ इतनी थी कि वकीलों पर उन्हें कुछ हजार रुपये खर्च करने पड़ते और अगर ''किस्मत काम कर जाय तो परसों तक, नहीं तो कुछ साल प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है।''
दूसरा, वे शाम की गाड़ी से लखनऊ चले जाएँ और किसी जोरदार विधायक को पकड़कर कल तक मन्त्रीजी के समक्ष हाजिर हो जाएँ और ''जब मन्त्री साले की खास जगह में डंडा करेगा तो बड़े बाबू को छोड़ो, बड़ा सहबवा जयमाला हाथ में लेकर ज्वाइन कराएगा।''
तीसरा, वे वही करें जो ऐसी परिस्थिति में फँसने पर उनके जैसे वीर पुरुष को करना चाहिए। अर्थात ''निकालिए जूता और दीजिए हनाहन। लगाइए पचास और गिनिए पाँच। साला पैंट में हग देगा और ज्वाइन कराएगा।''
तीनों विकल्पों पर बड़ी गम्भीरता से विचार-विमर्श हुआ। उच्च न्यायालय का विकल्प ध्रुवलाल ने ही खारिज कर दिया। न तो उनके पास पैसा था और न ही इतना धैर्य कि अगर किस्मत साथ न दे तो वे कुछ वर्ष प्रतीक्षा कर सकें। सुझाव देनेवाली मंडली भी इस विकल्प के बारे में गम्भीर नहीं थी क्योंकि इसमें मसाला फिल्मों का सबसे महत्त्वपूर्ण अंश ऐक्शन नहीं था। बिना ऐक्शन के वे इस दफ्तर के इसी तरह उपेक्षित अंग बने रहते और सारी मलाई बड़े साहब के इर्द-गिर्द बैठे लोग खाते रहते।
दूसरे विकल्प के लिए एक अदद जोरदार विधायक की आवश्यकता थी। बिना अधिक जोर डाले ध्रुवलाल को याद आ गया कि उनके एक दूर के ममिया ससुर विधायक हैं। जोरदार हैं या नहीं, बार-बार पूछने पर वे इसका कोई सन्तोषजनक उत्तर नहीं दे पा रहे थे क्योंकि अभी तक उनसे कोई काम नहीं पड़ा था। पर वे जोरदार होंगे इसके पक्ष में वे सिर्फ यही दलील दे पाये कि विधायक होने के पहले उनके ऊपर हत्या और डकैती के कई मुकदमे दर्ज हुए थे। वे इस समय लखनऊ में होंगे या उनके पी.डब्ल्यू.डी. मन्त्री से अच्छे सम्बन्ध हैं या वे ध्रुवलाल के पहुँचते ही हाथ में सोटा लेकर सचिवालय चल देंगे-प्रश्नों की ऐसी भूल-भूलैया थी जिसमें फँसाकर कमरे में मौजूद लोग चालाकी से उन्हें तीसरे विकल्प की ओर ढकेलकर ले गये।
तीसरा विकल्प ध्रुवलाल को शुरू से ही पसन्द था क्योंकि वह उनके व्यक्तित्व और सोच के अनुकूल पड़ता था।
इस विकल्प को सरअंजाम कैसे दिया जाय, इस पर गम्भीरता से विचार-विमर्श शुरू हुआ।
इस विमर्श में जायसवाल ठेकेदार की भूमिका बड़ी महत्त्वपूर्ण रही। वह इस बीच पान लेकर लौट आया था। सबको बारी-बारी से पान दिखाने के बाद वह चौरसियावाली मेज पर इस तरह टिककर खड़ा हो गया कि देखनेवाले अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार उसे खड़ा या बैठा मान लें। इससे उसे बैठने का सुख भी मिलने लगा और कमरे में मौजूद ए.ई. और जे.ई. उस जैसे टुटपुंजिया ठेकेदार के सामने मेज पर बैठकर अनुशासन भंग करने के त्रास से भी बच गये।
जायसवाल ठेकेदार ने दफ्तरों में पिटाई के बारे में ध्रुवलाल के सामान्य ज्ञान में काफी वृद्धि की। ''यादवजी, अभी तो आपको बड़ी नौकरी करनी है। इन सालों को जूते की नोक पर रखिए। पिछली फरवरी में सक्सेना जे.ई. ने मुझे पेमेंट में बड़ा दौड़ाया। मैंने कहा कि साले एडवांस कमीशन तुम लो, घर की सब्जी और राशन-पानी तुम मँगाओ, बच्चों की फीस तुम हमसे भरवाओ, अब राजा हरिश्चन्द्र के अवतार तुम्हें और क्या चाहिए। अरे पेमेंट करो और बाकी कमीशन भी लो। हम कहाँ भाग रहे हैं। पर नहीं साहब, पट्ठा हाथ न धरने दे। कभी बोले साइट पर फिर से मेजरमेंट करेंगे, कभी मैटीरियल घटिया होने की शिकायत, कभी कुछ, कभी कुछ। मैं परेशान हो गया। ये तो बाद में शुक्ला साहब ने बताया कि इसमें दफ्तर की पालिटिक्स है। मैं तो सीना ठोंककर कहता हूँ कि शुक्ला साहब का आदमी हूँ। तो इसलिए नहीं हो रहा था पेमेंट। पर रास्ता भी साहब ने ही बताया, ''जायसवाल शुक्ला साहब की तरफ इशारा कर चुप हो गया। ध्रुवलाल के सामने एक नयी दुनिया उद्घाटित हो रही थी। वे चाहते थे कि जायसवाल उस तथाकथित रास्ते के बारे में तफसील से बताये।
काफी देर तक कमरे में बैठे लोग उनकी उत्सुकता का मजा लेने के लिए पान खाने, खाँसने-खँखारने या मौसम के वर्णन जैसी बेहूदगियों में लिप्त रहे। यदि ध्रुवलाल यादव आज जैसी माहिर और पुख्ता तबीयत के मालिक होते तो वे भी इन सारी हरकतों में मजा लेते और निरपेक्ष तटस्थता से 'हमसे क्या मतलब' वाला भाव चेहरे पर ओढ़कर जायसवाल ठेकेदार को मुख्य मुद्दे पर आने के लिए विवश कर देते। पर उस समय तो वे पूरे बुरबक थे, (यह शब्द बाद में उनका प्रिय विशेषण बन गया और गम्भीर-से-गम्भीर माहौल में अपने विरोधी के लिए बिना किसी शिकन के इसका इस्तेमाल कर सकते थे) थोड़ी देर में उनके धैर्य का बाँध टूट गया और बेफिक्री का प्रदर्शन करने के बावजूद जब वे बोले तो उनकी आवाज कुछ-कुछ टूटी हुई थी।
''फिर क्या हुआ जायसवाल साहब?"
कमरे में बैठे पात्रों के चेहरों पर मुस्कानें दौड़ गयीं।
''अजी सरकार हुआ क्या? वही फार्मूला नं. उन्नीस।''
ध्रुवलाल ने मूर्खतापूर्ण ढंग से आँखें झपकायीं।
''अपने शुक्ला साहब का फार्मूला नं. उन्नीस बड़ा कारगर है साहब। साहब ने हरी झंडी दी और मैं दूसरे दिन अपनी बुलेट पर...।''
''अरे पाजी, मुझे क्यों बदनाम करता है?" शुक्ला ने आँखों से बरजा।
जायसवाल काइयाँ ढंग से मुस्कुराया, ''बिना आपके हुकुम के मैं एक कदम नहीं रखता। यादव साहब तो अपने आदमी हैं इसलिए जबान फिसल गयी नहीं तो मजाल है कहीं जबान खोली हो।''
ध्रुवलाल को इस अनावश्यक विस्तार में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वे फार्मूला नं. उन्नीस जानना चाहते थे, पर ये लोग बात को विस्तार देने पर तुले थे।
बहरहाल थोड़ी देर में उनकी उत्सुकता का शमन हो गया। हुआ कुछ ऐसे कि जायसवाल ठेकेदार अपनी बुलेट मोटरसाइकिल पर दो स्थानीय गुंडों को लेकर जूनियर इंजीनियर सक्सेना के घर पर सुबह-सुबह पहुँचा। वह मोटरसाइकिल स्टार्ट किये सड़क पर खड़ा रहा और दोनों गुंडे, जिन्हें उसके कथनानुसार 'ठेकेदारों को पालना ही पड़ता है' दनदनाते हुए ऊपर सक्सेना के घर पर चढ़ गये। जब तक नीचे मकान मालिक का परिवार या ऊपर सक्सेना की पत्नी कुछ समझें तब तक दोनों सक्सेना को बनियान-पाजामे में घसीटते हुए नीचे ले आये। उसके बाद ''साला चार घूँसों में ही लाइन पर आ गया। बीवी के पीछे छिप गया। बीवी ने-भैया-भैया कहना शुरू कर दिया। हमने भी कहा कि चल बेटा किस्मत ही खराब है साली, सारी बहनें ही मिलती हैं।'' जायसवाल अश्लील ढंग से मुस्कराया।
आगे की कहानी हिन्दी फिल्मों के अन्त की तरह स्पष्ट थी। जायसवाल ठेकेदार का पेमेंट हो गया। हाँ, उन्होंने सक्सेना जे.ई. या ऊपरवालों का कमीशन पूरा दिया क्योंकि ''साहब, धन्धे के उसूल बहुत साफ हैं। अगर ठेकेदारी करनी है तो कमीशन तो नकद गिनकर देना ही पड़ेगा।''
उस दिन यादवजी ने भी फार्मूला नं. उन्नीस ही अपनाया।
हनुमान की तरह कमरे में उपस्थित लोगों द्वारा अपने बल से अवगत कराते ही वे चमककर उठे और पहले उन्होंने दफ्तर के कमरे में बड़े बाबू नामक जीव को तलाशा। कई घंटे व्यतीत हो जाने के बाद भी वह अभी तक अपनी कुर्सी पर नहीं आया था। बाद में जब वे इस तन्त्र के अंग बन गये तभी उनकी समझ में इतनी लम्बी अनुपस्थिति का कारण समझ में आया। जब कभी ऐसी कठिन घड़ी बड़े बाबू के समक्ष आती थी वह राजनेताओं की तरह उस मुहावरे पर अमल करने लगते थे जिसमें शुतुरमुर्ग और रेत का जिक्र आता है। वह बड़े साहब के कमरे में फाइल दबाये घुसे और थोड़ी देर तक खुसुर-पुसुर करके दूसरे दरवाजे से बाहर निकल गये थे और नीम, इमली, जामुन जैसे पुराने दरख्तों के नीचे खुले बहुत से ओपन एयर रेस्टोरेंटों में से किसी एक में बैठे चाय-समोसे के तीसरे दौर से गुजरते हुए चायवाले का भुगतान करनेवाले किसी ठेकेदार के साथ गम्भीर वार्तालाप में लिप्त थे।
इस बीच बड़े साहब भी लंच पर उठकर चले गये थे।
समस्या गम्भीर थी और ध्रुवलाल अकेले इसका हल नहीं निकाल सकते थे। मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक के रूप में यदि जायसवाल ठकेदार बीच-बीच में अवतरित न होता रहता तो वे दफ्तर के भूल-भुलैया जैसे गलियारों में अभिशप्त आत्मा की तरह भटकते रहते।
जायसवाल बीच-बीच में उन्हें इशारे से किसी चाय या पान की दुकान पर ले जा कर जो बताता रहा उससे यह स्पष्ट हो गया कि आज न बड़ा साहब आएगा और न बड़ा बाबू। ये दोनों तभी आ सकते थे, जब ध्रुवलाल अपनी हरकतों से उन्हें मजबूर कर दे। ध्रुवलाल ने यही किया।
बड़े साहब के कमरे के सामने खड़े होकर उन्होंने हवा में किसी अदृश्य को माँ-बहन की गालियाँ दीं। भौंचक चपरासी के सामने उढ़के हुए किवाड़ को लात मारकर खोला और बड़े साहब की अनुपस्थिति नामक तथ्य को अपने उजड्ड थोबड़े के माध्यम से कमरे में झाँककर सत्यापित किया। फिर वे हुँकारते साँड़ की तरह बड़े बाबू के कमरे की तरफ आये। वहाँ जायसवाल द्वारा इंगित बड़े बाबू के खास चमचे बाबू के समक्ष खड़े होकर उन्होंने तरह-तरह की घोषणाएँ कीं।
ध्रुवलाल की घोषणाएँ शरीर-वैज्ञानिकों और भाषा-शास्त्रियों- दोनों के लिए बड़ी महत्त्वपूर्ण थीं। शरीर के विभिन्न अंगों के इतने सुन्दर और ललित प्रयोग दोनों के लिए आँख खोलनेवाले सिद्ध होते। उनकी घोषणाएँ अन्तर्राष्ट्रीय राजनय की भाँति निरर्थक और भाषा का अपव्यय नहीं थीं। इनसे ठोस कार्यक्रम छलछला रहे थे। इन कार्यक्रमों के मुताबिक अगर शाम तक उन्हें ज्वाइन नहीं करा दिया गया तो बड़े साहब और बड़े बाबू नामक प्राणियों के नश्वर शरीरों के कुछ भागों का ऐसा प्रयोग होता जिसका वर्णन सुनकर निरन्तर अश्लील और फूहड़ भाषा का इस्तेमाल करनेवाले बाबू, ठेकेदार और दफ्तर में प्रचुर संख्या में घूमनेवाले दलाल भी सनाका खा गये ।
अश्वमेध यज्ञ के अश्व की तरह अपनी उन्नत ग्रीवा से बरामदों, कमरों, फाइलों, कुर्सियों, मेजों पर प्रभाव का आकलन करनेवाली भरपूर दृष्टि डालनेवाले श्री ध्रुवलाल यादव बाहर वटवृक्ष के नीचे की चाय की दुकान पर अगले कुछ घंटों तक रहनेवाली अपनी उपस्थिति की घोषणा करते हुए चले तो गये पर उनकी ओजस्वी वाणी से उत्पन्न थरथराहट काफी देर तक उस दफ्तर को कँपकँपाती रही।
इसके बाद घटनाएँ बड़ी तेजी से घटित हुईं। बड़े साहब और बड़े बाबू यानी दफ्तर के सत्ता पक्ष के समर्थक बाबुओं, चपरासियों और ठेकेदारों की आपात बैठक हुई। आम राय बनी कि ऐसी प्रतिभा को विरोधी खेमे में जाने देना जोखिम भरा है। बाहुबल और भाषा के इस धनी को तो अपने साथ ही रखना उचित होगा। इस पूरे घटनाक्रम में ध्रुवलाल के शुक्ला के कक्ष में जाने और बार-बार जायसवाल ठेकेदार के साथ फुसफुसा कर बातें करने का भी विस्तार से विश्लेषण किया गया और रामदीन चपरासी और विमल तिवारी जे.ई. को अगली कार्यवाही के लिए अधिकृत किया गया। इन दूतों ने बड़े बाबू को कचहरी की एक लस्सी की दुकान पर डकारते हुए पकड़ा। उनके साथ गप्प लगा रहे ठेकेदार को भुगतान करने का इशारा करते हुए वे इन्हें एक पान के खोखे पर ले गये। जितनी देर में बनारसी पान लगा, मुँह में गया और पहली पीक थूकी गयी, बड़े बाबू सारा मामला समझ गये। लस्सी का पैसा देकर उनका पिछला साथी जब तक लौटा बड़े बाबू रिक्शे पर बैठकर चल चुके थे और विमल तिवारी पान का पैसा दे रहे थे।
शाम को चार बजते-बजते बड़े बाबू के अदृश्य होने का परिणाम भी आ गया।
रामदीन चपरासी ने वटवृक्ष के नीचे चाय की दुकान पर ध्रुवलाल को विनीत भाव से सम्बोधित किया -
''साहेब, आप इहाँ बैठे हैं। हम पूरी कचहरी ढूँढ़-ढूँढ़कर हैरान हो गये। चलें, बड़े बाबू कब से बुला रहे हैं।''
ध्रुवलाल ने बौड़म की तरह आँखें झपकायीं। वे लगातार दफ्तर के दरवाजे पर निगाहें टिकाए बैठे थे। बड़ा बाबू अन्दर घुसा कैसे? अब उनकी बुलाहट क्यों है? वे इस खेल के नये खिलाड़ी थे, ये सारे प्रश्न उनकी समझ में अबूझ पहेली की तरह थे। पर बगल में बैठे जायसवाल ठेकेदार ने आँख के इशारे से उन्हें चपरासी के साथ जाने को कहा और वे उठ गये।
अन्दर का माहौल सौहार्द और स्वागत से बजबजा रहा था। दिन-भर के तनाव का मद्रासी फिल्मों जैसा सुखद अन्त ध्रुवलाल के लिए सर्वथा अप्रत्याशित था। उन्होंने लाख गम्भीर रहने की कोशिश की, पर बीच-बीच में उनके भदेस चेहरे पर बड़े बाबू की मिसरी घुली बातें सुनकर फिस्स से मुस्कान आ ही जाती थी।
''कहाँ थे यादवजी, बड़े बाबू कब से आपको तलाश रहे हैं। बेचारे इस दुपहरिया में आपका कागज दस्तखत कराने बड़े साहब के बँगले तक गये थे।''
ध्रुवलाल ने देखा कि बोलनेवाला वही बाबू था जिसे जायसवाल ठेकेदार ने बड़े बाबू का खास चमचा बताया था और जिसे अभी-अभी वे गरियाकर गये थे। उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी।
''बिना मिठाई खाए तो ज्वाइन नहीं कराऊँगा।''
बड़े बाबू के इसरार पर ध्रुवलाल शरमाये। उन्होंने जेब से सौ का नोट निकालकर पास खड़े चपरासी को थमाया।
''इन अफसरों का तो टाइम से लंच और टाइम से सोना, मरन तो हमारी होती है। आपका कागज तो टाइप हो गया था, पर बड़े साहब के लंच का टाइम हो गया। जब तक कागज लेकर पहुँचूँ साहब निकल गये। फिर इस धूप में रिक्शे पर बैठकर उनके घर गया। सर धूप में चिटक गया।''
ध्रुवलाल पूरी तरह चित हो गये। बेकार बड़े बाबू को जद्द-बद्द बक रहे थे। कृतज्ञता से लबरेज स्वर में बोले, ''बेकार परेशान होने की क्या जरूरत थी बड़े बाबू। शाम को दस्तखत हो जाते।''
''अरे नहीं भैया, एक बार दफ्तर से निकले अफसर का कोई भरोसा नहीं होता, फिर मिले न मिले। इसलिए मैंने कहा कि एक होनहार नौजवान हमारे दफ्तर में आया है, कल को हमारा साहब बनेगा, इसके कागज पर आज ही चिड़िया बिठवा-कल का भरोसा नहीं, साहब कहीं निकल जाएँ। इसीलिए चटखती धूप में गया। अच्छा हुआ जो चला गया। जरा भी आलस करता तो कई दिन की छुट्टी थी। साहब कल लखनऊ जा रहे हैं। मीटिंग है।''
ध्रुवलाल को जायसवाल ठेकेदार और उसके गुट के लोग दुनिया के सबसे नीच प्राणी लग रहे थे। अगर उस समय जायसवाल ठेकेदार मिल गया होता तो वे शर्तिया उसके साथ अपने बाहुबल का प्रयोग कर चुके होते। बड़े बाबू जैसे भले प्राणी के लिए उनके मन में कैसे-कैसे दूषित विचार भर दिये थे उसने।
अब जब ध्रुवलाल यादव इस व्यवस्था के अंग बन चुके हैं, उन्हें कभी-कभी इस प्रसंग की याद आती है तो वे मुस्कुराकर अपने मुँह के पान की पीक थूकते हुए, गोल-सा मुँह बनाकर कहते हैं, ''साला...धूर्त...अच्छी ऐक्टिंग करता है। खूब बुरबक बनाया।''
पहले दिन ध्रुवलाल की ऐंग्री यंग मैन की जो छवि बनी वह आज तक उनसे चिपकी हुई है।
दफ्तर में कई गुट थे। अक्सर कोई न कोई गुट उनका इस्तेमाल अपने विरोधी खेमे से किसी सदस्य की पिटाई कराने या उसे गाली दिलाने के लिए कर लिया करता था। पर शुरू के वर्षों में वे अपनी इस छवि के कारण घाटे में रहा करते थे। वे व्यवस्था विरोध के चक्कर में अक्सर दफ्तर के सत्ता पक्ष के खिलाफ खड़े हो जाते थे। नतीजा यह रहता कि लोग उनसे आतंकित रहते, दफ्तर में बिगड़ैल साँड़ की तरह नथुने फुलाकर घूमते हुए उन्हें देखकर मुग्ध भाव से उनकी देहयष्टि पर प्रशंसा-भरी निगाहें डालते अथवा चाय-पान की दुकानों पर घेरकर उनकी वाहवाही करते रहते, किन्तु मार्च में जब कमीशन के अन्तिम बँटवारे का समय आता वे सबसे कम पैसा जेब में डाले निकलते।
वक्त ने धीरे-धीरे उन्हें होशियार बना दिया था। वे अब भी लम्पट थे, उजड्ड थे और बुद्धि से अधिक बाहुबल का प्रयोग करते थे, पर अब वे सत्ता पक्ष के उपयोग की चीज थे। जिस तरह हिन्दी का क्रान्तिधर्मा लेखक पहले तो 'वाम वाम वाम दिशा समय साम्यवादी' का उद्घोष करता है फिर धीरे-धीरे पुरस्कारों और अध्यापक से रीडर बनने के चक्कर में रणनीति निर्धारित करता हुआ दुनियावी सफलताओं के सोपान चढ़ता है, उसी प्रकार ध्रुवलाल यादव जे.ई. को भी वक्त ने धीरे-धीरे इतना प्रशिक्षित कर दिया था कि इधर वे दफ्तर के सत्ता पक्ष के साथ रहकर दफ्तर के मुहावरे में साल-भर काफी मोटी रकम चीरते थे।
इसीलिए ध्रुवलाल यादव इस समय इस गम्भीर मन्त्रणा में शरीक थे।
मन्त्रणा में सम्मिलित अन्य दो व्यक्ति बड़े साहब के सामने बैठे थे। बाईं तरफ बैठे थे दफ्तर के बड़े बाबू लाभचन्द्र श्रीवास्तव उर्फ लाला बाबू। इन्होंने इस दफ्तर में अपनी जिन्दगी का अधिकांश भाग बिताया था। उन्होंने लगभग तीन दशक पहले अपनी सरकारी जिन्दगी इसी दफ्तर में बाबुओं की सबसे निचली जमात से शुरू की थी। वे मक्कारी, चापलूसी और गिरावट के मानवीकरण थे और इसीलिए स्वाभाविक रूप से निरन्तर सफल थे। भारतीय नौकरशाही उन जैसे पुख्ता खम्भों पर ही टिकी हुई थी।
लाभचन्द्र श्रीवास्तव जिनका असली नाम दफ्तर के ज्यादातर बाबू, अफसर या ठेकेदार नहीं जानते थे और जिन्हें लोग लाला बाबू के नाम से पुकारते थे, बीच-बीच में तब्दील होकर बाहर जाते थे, लेकिन फिर घूम-फिरकर साल-छह महीने में वापस आ जाते थे। इस शहर में उन्होंने एक मकान बना लिया था जिसे वे बड़ी दयनीय विनम्रता से झोंपड़ा कहते थे और उनके विरोधी उनके तबादले के लिए दरखास्तें देते समय तिमंजिला महल कहते थे। सबसे ऊपरी मंजिल पर दो छोटे-छोटे कमरों में वे अपने कुनबे यानी खुद, बीवी और चार लड़कों के साथ रहते थे। शेष दोनों मंजिलों पर उनके अनगिनत किरायेदार रहते थे। अनगिनत इसलिए कि उनके और उनकी बीवी के अलावा उस भवन में रहनेवाले भी नहीं जानते थे कि किस समय वहाँ कितने किराएदार थे। मकान बनवाते समय उन्हें जहाँ कहीं जगह मिली उन्होंने पाखाना, गुसलखाना या रसोईघर बनवा दिया। इससे फायदा यह हुआ कि इमारत की दो मंजिलों पर कई स्वतन्त्र हिस्से निकल आये जिनमें उन्होंने किरायेदार बसा दिये। पूरा घर सराय की तरह लगता था और उसमें रहनेवाले गोर्की के चरित्रों की तरह भाँति-भाँति के लोग थे। जिनसे निरन्तर गालियाँ, घुड़कियाँ, धमकियाँ प्राप्त करते हुए भी वे अपनी नियमित प्रातःकालीन पूजा में ईश्वर को धन्यवाद देते रहते।
लाला बाबू के जीवन के कुछ बुनियादी उसूल थे, जिन्हें वे कभी नहीं छोड़ते थे। इनमें से एक विनम्रता थी। बड़ी से बड़ी अपमानजनक परिस्थिति में भी वे हे...हे...करते हुए अपने को क्रोध से दूर किए रहते थे। भारतीय नौकरशाही में बाबू की स्थिति ही कुछ ऐसी है कि अपमान की घड़ियाँ पल-पल उसके समक्ष आती रहती हैं। कभी अफसर घुड़कता है, कभी मातहत। लाला बाबू के महकमे में तो ठेकेदार नामक एक तीसरा दुष्ट ग्रह भी है जिससे बाबुओं का निरन्तर पाला पड़ता था। ठेकेदारी में जो नयी पौध आ रही थी वह पूरी तरह से लम्पट और उजड्ड नौजवानों की थी जो चाकू-पिस्तौल के बल पर सारा काम कराना चाहती थी। इनके गाली-गलौज का सबसे ज्यादा शिकार निरीह बाबू ही बनते थे। पर लाला बाबू कठिन से कठिन परिस्थिति में भी अपना धैर्य नहीं खोते थे।
हाल के सालों में जो नये बाबू आ रहे थे उन्हें देखकर लाला बाबू को जरूर कुछ निराशा होती थी। ये बाबू नये फैशनों के कपड़े पहनते, अफसरों के सामने कुर्सी पर बैठ जाते, कई बार उनसे तू-तड़ाक भी कर देते और सबसे बुरी बात दफ्तर में अपने पैसे से मँगाकर चाय-समोसा खा लेते। लाला बाबू अपनी पीढ़ी के बाबुओं के साथ बैठकर इनके पतन पर शोक प्रकट करने के सिवाय कुछ न कर पाते।
किसी नये बाबू के दफ्तर में आने पर लाला बाबू उसे अपने जीवन का एक अनुभव जरूर सुनाते। यह किस्सा दफ्तर के सारे बाबुओं के सामने अलग-अलग ढंग से सुनाया जा चुका है। कभी लाला बाबू के मुख से, कभी उनके किसी विरोधी खेमे के सदस्य द्वारा। इसलिए दफ्तर के लगभग सभी लोग इसके एक-एक प्रसंग को जानते हैं। किसी अंश पर अगर कथावाचक भूल करता है तो श्रोता उसकी पूर्ति कर देते हैं। बड़े बाबू इस किस्से को यों शुरू करते हैं, ''बरखुरदार, जब मैं भी तुम्हारी तरह जवान था'' या ''जब मेरी भी कमर में ताकत थी तब का वाकया है।'' विरोधी इसे कुछ ऐसे सुनाते, ''साला जब नया-नया दफ्तर में आया तब से ही अफसरों के सामने पतलून खोल देता है। एक बार ऐसा हुआ कि...''
जिस तरह हिन्दी की ज्यादातर फिल्मों में कहानी घुमा-फिराकर एक जैसी होती है और केवल तर्जे-बयाँ बदलता रहता है, उसी तरह दोनों पक्षों की कहानी का मूल तत्त्व एक ही था, केवल उसे सुनाने का ढंग बदल जाता था। कहानी का प्रारम्भ होता था लाला बाबू के एक नौजवान कनिष्ठ लिपिक के रूप में दफ्तर में प्रवेश से और अफसरों के प्रति उनकी ताबेदारी की भावना के वर्णन से। इस दृश्य को लाला बाबू अपनी कर्तव्य निष्ठा और अनुशासनप्रियता जैसे विशेषणों से बखान करते और उनके विरोधी 'पक्का हरामुद्दहर जो हमेशा अफसर का गू उठाने को तैयार रहता था' जैसे ईर्ष्यालु वाक्यों से व्यक्त करते।
इसके बाद कथा का ललित पक्ष आ जाता। इसको बड़े बाबू तेजी के साथ इस सूचना से निपटा देते कि 'मेरी घरवाली को गाँव का पानी रास नहीं आ रहा था इसलिए न चाहते हुए भी उसे यहाँ लाना पड़ा और यहीं कालोनी में बड़े साहब से कह-सुनकर एक क्वार्टर मिल गया जिसमें बाद में पन्द्रह साल हम लोग रहे और एक-एक कर चार पुत्र रत्नों की प्राप्ति हुई।'
पर विरोधी पक्ष इतनी जल्दबाजी में नहीं रहता। पहले तो वह इस मामले की तह में जाने की कोशिश करता कि उनकी पत्नी अचानक गाँव से एक दिन दफ्तर के दरवाजे पर कैसे प्रकट हुई। इसके बारे में अलग-अलग किंवदन्तियाँ थीं। पर कमोबेश सभी इस मामले पर एकमत थीं कि लाला बाबू की शहर में गुलछर्रे उड़ाने की अफवाहें कुछ इस रूप में गाँव में पहुँचीं कि एक दिन उनके वृद्ध पिता अपनी बहू को सीधे उनके दफ्तर लेकर पहुँच गये और इस आघात से हक्का-बक्का मुँह बाये लाला बाबू के पास छोड़कर सीधे बस अड्डे रवाना हो गये।
समस्या बड़ी विकट थी। लाला बाबू खुद एक दूसरे बाबू के साथ एक कमरा लेकर रहते थे। दोनों अकेले थे, इसलिए कोई दिक्कत नहीं थी। दफ्तर के एक चपरासी को उन लोगों ने पटा रखा था। वह खाना उनके साथ खाता और एवज में उनका खाना पका दिया करता था। जिन गुलछर्रों की खबरें उड़ती-पुड़ती गाँव में पहुँची थीं वे इसी सान्निध्य और छड़ेपन की उपज थीं। उस माहौल में लाला बाबू पत्नी को लेकर कैसे जाते?
दफ्तर में पत्नी की उपस्थिति से अलग-अलग चेहरों पर जो मुस्कानें तैर रही थीं उन्होंने लाला बाबू को असहज बना दिया। ये मुस्कानें कुटिलता, उपहास, अश्लीलता और तरस से भरी थीं। उन्होंने पहला काम किया कि सर से पैर तक कपड़े की गठरी बनी पत्नी को दफ्तर के सामने एक परिचित चायवाले की दुकान पर बैठा दिया और उस समय के दफ्तर के बड़े बाबू लक्ष्मी बाबू के पास रुआँसा चेहरा बनाकर अपनी आवास समस्या लेकर पहुँच गये।
घटना लगभग दो दशक पुरानी है, पर दफ्तरों में राजनीति आज जैसी ही थी।
उस जमाने के बड़े बाबू लक्ष्मीधर द्विवेदी उर्फ लक्ष्मी बाबू की बड़े साहब से नहीं पटती थी। उन्होंने लाला बाबू को दफ्तर की राजनीति का शिकार बना दिया।
लक्ष्मी बाबू की मेज के इर्द-गिर्द दफ्तर के कर्मचारियों की आपात बैठक हुई और लाला बाबू की समस्या पर गम्भीर-विचार विमर्श हुआ। लक्ष्मी बाबू खुद तो कम बोले पर उनके एक समर्थक ने जो हल सुझाया वह उस समय लाला बाबू को बहुत आसान लगा। अब, जब वे भी उसी खुर्राट व्यवस्था के अंग बन चुके हैं उन्हें उस साधारण सुझाव का पेंच समझ में आता है।
पी.डब्लू.डी. कॉलोनी में एक टाइप टू का मकान काफी दिनों से खाली था। उस जमाने में कॉलोनी में मकान काफी कम थे, पर आज के मुकाबले अधिकारी और कर्मचारी भी कम ही थे, इसलिए मारामारी भी कमोबेश आज जैसी ही थी। यह मकान किसी बाबू को मिल सकता था और कई बाबू शहर में गन्दे तंग मकानों में रहते थे। उन सभी ने इस मकान के लिए अपनी-अपनी दरखास्तें लगा रखी थीं। वे बारी-बारी से बड़े साहब के सामने पेश होते रहते थे और झिड़की खाकर वापस लौट आते थे।
यह मकान किसी बाबू को अलाट क्यों नहीं हो रहा था, यह राज लक्ष्मी बाबू और दफ्तर के सभी घाघ बाबू और चपरासी जानते थे। नहीं जानते थे तो सिर्फ लाला बाबू या उनके जैसे दो-चार गावदी जो इस दुनिया में नये-नये आये थे। बात कुछ ऐसी थी कि बड़े साहब का एक दूर का साला काफी दिनों से बेरोजगार था। उनकी मेम साहब का हठ कुछ ऐसा था कि बड़े साहब ने अपना सारा रसूख और जोर लगाकर उसे किसी तरह बाबू बनवा दिया था। अब वे कोशिश कर रहे थे कि उसका तबादला इसी दफ्तर में हो जाय। तबादला हो भी जाता, पर इस बीच प्रमुख अभियन्ता कार्यालय में उनका एक विरोधी प्रमुख अभियन्ता का पी.ए. होकर पहुँच गया था। वह लगातार अड़ंगें डाल रहा था और कई महीनों से उनका प्रयास सफलता के कगार पर पहुँच-पहुँचकर लक्ष्य से थोड़ी दूर रह जाता था। यह मकान इसी चक्कर में उनके साले की प्रतीक्षा में पिछले कई महीनों से खाली पड़ा था।
उस दिन लक्ष्मी बाबू की मेज के इर्द-गिर्द जो मीटिंग हुई, उसमें यह तय पाया गया कि लाला बाबू बड़े साहब के सामने उसी मकान के लिए दरखास्त पेश करेंगे। सम्भावित तर्क एवं उनकी काटें भी उन्हें समझा दी गयीं। बड़े हल्के ढंग से बताया गया कि लखीमपुरखीरी में कोई बाबू है जो बड़े साहब का दूर का रिश्तेदार है और जिसका यहाँ तबादला कराने के लिए बड़े साहब प्रयासरत हैं। अव्वल तो यहाँ कोई जगह नहीं है जिस पर उसका तबादला हो सके और अगर हो भी गया तो उसके यहाँ पहुँचने में दो-चार महीने तो लग ही जाएँगे। लाला बाबू की समस्या तो तात्कालिक है। फिलहाल वे अपनी पत्नी को लेकर उस क्वार्टर में चले जाएँ, बाद में अगर बड़े साहब का रिश्तेदार यहाँ आया तो वे मकान खाली कर देंगे। तब तक सभी लोग मिलकर उनके लिए शहर में कोई न कोई मकान ढूँढ़ ही लेंगे।
लाला बाबू को एक बात और अलग तरह से समझाई गयी। इस दफ्तर में सीधी उँगली से घी नहीं निकलता। सीधे कर्मचारी पर सभी अफसर सवारी गाँठने की कोशिश करते हैं। बड़ा साहब भी आसानी से नहीं मानेगा, पर लाला बाबू को अपनी आवाज थोड़ी ऊँची करनी होगी और आँखें तरेरनी होंगी। मकान देगा कैसे नहीं …कोई उसके बाप का क्वार्टर है... इतने महीने से खाली पड़ा है… सरकार को किराये का इतना नुकसान हो रहा है… उसे कौन भरेगा?
सारे तर्क-वितर्क का यही अंश थोड़ा कठिन था। लाला बाबू की प्रकृति के यह खिलाफ था कि वे बड़े साहब के सामने ऊँचे स्वर में बोल सकें। पर बीवी बाहर चाय की दुकान पर घूँघट काढ़े बैठी थी। इस शहर में कोई सगा-सम्बन्धी नहीं था जिसके पास जाकर दो-चार दिन बिताये जा सकें। किराये का मकान भी इतनी आसानी से कहाँ मिलेगा? उन्हें रह-रहकर अपने बाप और बीवी पर गुस्सा आ रहा था। पर अब गुस्सा करने से भी क्या मिलनेवाला था शाम हो रही थी। एक बार बड़े साहब उठकर घर चले गये तो फिर उन्हें पकड़ पाना मुश्किल होगा। उन्होंने मन कड़ा किया। कागज-कलम लेकर एक दरखास्त लिखी और कुरुक्षेत्र की तरफ बढ़ चले।
लक्ष्मी बाबू ने उनके साथ दो-तीन बाबू और कर दिये। यह एक डेलीगेशन की सी शक्ल बन गयी जिससे शुरू में तो लाला बाबू का हौसला बढ़ा, पर बाद में कमरे से बाहर निकलने पर उन्हें सबको साथ ले जाने का अफसोस हुआ क्योंकि बहुत सी बातें बाहर नमक-मिर्च लगाकर इन्हीं लोगों द्वारा फैलाई गयीं।
जब यह शिष्टमंडल कमरे में घुसा। बड़ा साहब ऐनक नाक के ऊपर चढ़ाये किसी फाइल को पढ़ने में मशगूल था। एक बाबू उसके बगल में खड़ा उसे कुछ समझाने की कोशिश कर रहा था। तीन-चार बाबुओं के एक साथ कमरे में घुसने में कोई नयी बात नहीं थी, इसलिए उसने कोई ध्यान नहीं दिया। पहले से खड़े बाबू की बात बड़े साहब की समझ में आ गयी और उसने फाइल के सामने खुले पन्ने पर हस्ताक्षर करके फाइल सरका दी।
बड़े साहब ने थोड़ी देर इन्तजार किया कि नये आनेवाले बाबू कोई फाइल या कागज उसके सामने रखेंगे, पर उनकी तरफ से कोई हरकत न होने पर उसने चिढ़कर पूछा, ''हाँ...क्या बात है?"
''सरकार...ये लाला बाबू कुछ अर्ज लेकर आये हैं। इनकी बीवी गाँव से आ गयी है,'' लाला बाबू की खामोशी न टूटने पर एक दूसरे बाबू ने खीस निपोरी।
''अच्छा,'' साहब ने कौतूहल से लाला बाबू को निहारा जैसे उसने आज की सबसे मजेदार खबर सुनी हो।
थोड़ी देर फिर खामोशी रही। एक बाबू ने लाला बाबू से मजाक कर माहौल को अपनी विनोदप्रियता, साहब की विशालहृदयता और लाला बाबू की निरीहता जैसी स्थितियों से भरने की कोशिश की। ''अरे समस्या बताओ लाला बाबू। साहब से क्या शर्म। कोई भगाकर तो लाये नहीं हो। ब्याहता है। इस अनजान शहर में साहब ही तो गार्जियन हैं। बता डालो।''
लाला बाबू ने साहस बटोरा और अर्जी साहब के समक्ष बढ़ा दी।
बड़ा साहब चौकन्ना हुआ, 'तो ये मामला है। साले बड़े घाघ हैं। बीवी का बहाना बनाकर मकान लेना चाहते हैं। हरामजादे लक्ष्मी ने पट्टी पढ़ाई होगी।' उसने मन-ही-मन अपनी रणनीति बनायी।
इसके बाद कथा में क्या हुआ, इसके बारे में लाला बाबू और उनके विरोधियों में मतभेद हैं।
लाला बाबू बताते हैं कि काफी बहस-मुबाहिसों और जद्दो-जहद के बाद जब बड़े साहब किसी तरह टस-से-मस नहीं हुए तो उन्होंने साफ-साफ कह दिया कि ''हम तो आपकी औलाद हैं। नहीं मकान देंगे तो आपकी बहू को लेकर शाम को आपके घर पहुँच जाएँगे। कहीं-न-कहीं सर छुपाने की जगह मेम साहब दे ही देंगी। कुछ रूखा-सूखा भी मिल जाएगा। पड़े रहेंगे।''
उनके सामने तो कोई कुछ न कहता। पर पीठ पीछे लोग उन बाबुओं की फैलाई बातें दोहराते जो लाला बाबू के साथ उस ऐतिहासिक क्षण मौजूद थे।
विरोधी खेमा इस प्रसंग को इस तरह बयान करता है कि जब काफी देर तक बड़ा साहब दुत्कारता रहा और डपटता रहा, साथ गये बाबुओं के इशारों के बावजूद लाला बाबू ने आवाज ऊँची नहीं की और पूरे शिष्टमंडल को यह विश्वास हो गया कि अब ज्यादा तर्क-वितर्क करने से कोई फायदा नहीं, इसलिए वापस लौटना चाहिए, तभी एक ऐसी घटना हुई जिसने कमरे में मौजूद सभी लोगों को हतप्रभ कर दिया।
अफसरों की मौजूदगी में सदा दीनता की प्रतिमूर्ति बने रहनेवाले लाला बाबू अचानक अधिक दीन हो गये। उन्होंने हाथ जोड़ लिये और बोलते-बोलते उनकी आवाज रुँध गयी, ''हुजूर माँ-बाप की जगह हैं। नहीं पालेंगे तो हम कहाँ जाएँगे।''
इसके अलावा भी लाला बाबू बहुत कुछ बोले पर आवाज के रुँध जाने से सब कुछ अस्पष्ट सा हो गया।
साहब कौतूहल, वितृष्णा और आत्म-मुग्धता के भाव से लाला बाबू का विलाप सुनता रहा। वह इस उद्गार से सहमत था कि वह दयालु है, बन्दापरवर और गरीब-नवाज जैसा न जाने क्या-क्या है।
लाला बाबू और विरोधी खेमे दोनों की कथाओं का सार यही था कि साहब ने अन्त में लाला बाबू के प्रार्थना-पत्र पर घसीटकर 'मकान आवंटित' लिख दिया और विजयोल्लास की भावना के साथ पूरा शिष्टमंडल बाहर आ गया।
यह कथा लाला बाबू नये बाबुओं को इस भाव से सुनाते थे कि वह भी अफसर को अपना माई-बाप समझे। शुरुआती दौर में तो सब ठीक-ठाक चलता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से बाबुओं की पौध में बड़ा गुणात्मक परिवर्तन आ गया है। अब बाबू पहले जैसी श्रद्धा से यह प्रसंग नहीं सुनते। कुछ तो उनका लिहाज-शर्म छोड़कर कथा के बीच में ही उठकर चल देते हैं, कुछ मुँह बिचकाते हैं, कुछ तरस खाने के भाव से मुस्कराने लगते हैं और कुछ-कुछ तो इतने शरारती हो गये हैं कि विरोधी पक्ष द्वारा प्रचारित झूठ को समस्यापूर्ति की तरह उनके किस्से में बीच-बीच में जड़ते जाते हैं। बाबुओं के बीच हो रहे ये परिवर्तन लाला बाबू को विचलित करते हैं।
सारे परिवर्तनों के बावजूद लाला बाबू ने अपनी लीक नहीं छोड़ी। वे पिछले तीस सालों से अफसर को माई-बाप समझते आये हैं। आज भी एक आदत की तरह नये से नये छोकरे अफसर के लिए उनका सर लिहाज से झुका रहता है। आज भी वे रोज सबेरे एक घंटे भगवान की पूजा करते हैं। रोज भगवान को इस बात के लिए धन्यवाद देते हैं कि उसने उन्हें लड़कियाँ नहीं दीं, चार बेटे ही दिये। घर का कुछ बाहर नहीं जाएगा, घर में ही कुछ-न-कुछ आएगा। कभी-कभी कोई किराएदार बहुत तंग करता तब अन्तिम विकल्प के रूप में ही लाला बाबू उसके अशुभ की प्रार्थना भगवान से करते थे, नहीं तो अक्सर वे इतने से ही सन्तुष्ट हो जाते थे कि भगवान किराएदार की जेब में पैसा और मन में सद्बुद्धि पैदा कर दे कि वह उन्हें समय से किराया दे दिया करें या किराएदार की पत्नी में इतनी सुघड़ता भर जाय कि वह अपना कूड़ा-कचरा लाला बाबू के बाहर निकलनेवाले दरवाजे पर न डाला करे या किराएदारों में से भगवान जाने किसका बच्चा जो अक्सर उनकी साइकिल का पहिया ब्लेड से काट देता है, उसे अक्ल आ जाय और वह ऐसा करना बन्द कर दे। ये छोटे-मोटे संवाद थे जो वर्षों से लाला बाबू धन्यवाद या शिकायत के रूप में ईश्वर से करते आ रहे थे।
वर्षों से लाला बाबू दाल-रोटी खाकर दफ्तर के समय से आधा घंटा पहले घर का दरवाजा खोलकर बाहर निकलते थे। अपनी बुढ़िया साइकिल को पन्द्रह मिनट तक झाड़ते-पोंछते थे, दोनों पहियों की हवा चेक करते थे, ब्रेक, पैडिल और चेन का मुआयना करते, घंटी बजाते और सब कुछ ठीक-ठाक होने पर दफ्तर के समय से दस मिनट पहले घर से निकल पड़ते। उनके घर से दफ्तर पास ही था और सात-आठ मिनट में वे दफ्तर पहुँच जाते। जब यह जमीन उन्होंने खरीदी थी तब शुरू के कई सालों तक ईश्वर को धन्यवाद देने के एजेंडा में यह जमीन भी थी जो दफ्तर के इतने करीब थी और जो भगवान की दया से उन्हें प्राप्त हो गयी थी। इधर वे जरूर ईश्वर को इस बात के लिए धन्यवाद नहीं देते क्योंकि अब धन्यवाद देने के लिए और बहुत सी चीजें हो गयी थीं।
दफ्तर में पहुँचनेवालों में लाला बाबू हमेशा पहले या दूसरे होते। चौकीदार और फर्राश अभी दफ्तर का ताला खोल रहे होते या मेज-कुर्सियों की धूल पर कपड़ा मार रहे होते कि लाला बाबू की बुढ़िया साइकिल दफ्तर के बाहर आकर खड़ी होती। चौड़े पाँयचे वाली पैंट में लोहे का हुक फँसाकर उसे पतला किये हुए लाला बाबू धीमी रफ्तार वाली अपनी साइकिल बिना किसी हड़बड़ी के रोकते और आहिस्ता से नीचे उतर आते। जब से वे बड़े बाबू हुए हैं, कोई-न-कोई चपरासी या चौकीदार कहीं-न-कहीं से प्रकट हो जाता और उनकी साइकिल पकड़कर बरामदे में खड़ा कर देता। अगर कोई नजर नहीं आता तो स्वयं ही धीरे-धीरे ले जाकर साइकिल नियत जगह खड़ी कर देते। उनकी साइकिल हमेशा ऐसी जगह खड़ी होती जहाँ पर अपनी कुर्सी से वे बैठे-बैठे फाइलों से सर उठाकर थोड़ी-थोड़ी देर में उसे देख लेते। इस दफ्तर में वे अलग-अलग जगह बैठे हैं, लेकिन साइकिल के लिए हमेशा उन्होंने ऐसी जगह तलाश ही ली है जहाँ से साइकिल उन्हें दिखाई देती रहे। इसी तरह साइकिल में ताला लगाने का काम भी वे एक खास नियम की तरह करते हैं। साइकिल खड़ी कोई करे, ताला वे खुद लगाते हैं। ताला लगाकर वे दो-तीन बार जाँचते हैं, फिर सन्तुष्ट होने पर ही आगे बढ़ते हैं। इधर जमाना खराब हो गया है इसलिए वे रबड़ चढ़ी लोहे की चेनवाला दूसरा ताला भी साथ रखने लगे हैं जिसे अगले पहिए में लगा देते हैं। कभी-कभी भावुक होकर वे प्रातःकालीन ईश वन्दना में प्रभु को इस बात का भी धन्यवाद देते हैं कि इतने खराब वक्त में भी उनकी साइकिल कभी चोरी नहीं हुई।
पचास के आसपास लाला बाबू अपनी उम्र से काफी बड़े लगते हैं। चेहरे पर हमेशा मौजूद रहनेवाली दो-तीन दिन की बढ़ी दाढ़ी, दयनीयता बिखेरते हुए पिचके गाल, छोटे-छोटे सीधे खड़े बाल, गन्दे कालरों वाली कमीज और चौड़े पाँयचोंवाली बदरंग पतलून ट्रेडमार्क से उनके व्यक्तित्व के अभिन्न अंग की तरह उनके साथ रहते हैं।
आज की इस गम्भीर मन्त्रणा में लाला बाबू के उपस्थित रहने के दो कारण हैं। वैसे तो सारे अफसर लाला बाबू के लिए माई-बाप हैं, पर वर्तमान बड़े साहब कमलाकान्त वर्मा से उनके कुछ विशेष सम्बन्ध हैं। एक तो वे अपनी बिरादरी के हैं, दूसरे ससुराल पक्ष से वे उनकी पत्नी के मामा के फुफिया ससुर भी लगते हैं। यह लाला बाबू की शाइस्तगी ही थी कि उन्होंने आज तक कभी भी इस रिश्ते का अनुचित लाभ उठाने की कोशिश नहीं की और अफसर और मातहत के रिश्ते को कभी नहीं भूले।
दूसरा कारण भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं था। नये आनेवाले बड़े साहब थे बटुकचन्द उपाध्याय। लाला बाबू जैसा विनम्र व्यक्ति भी कभी-कभी दाँत किटकिटाकर उनके लिए कह उठता था, 'हरामुद्दहर'। पहले भी वे इस दफ्तर में रह चुके थे। एक बार नहीं-दो-दो बार। दोनों बार का लाला बाबू का अनुभव बड़ा कटु था। उपाध्यायजी एक नम्बर के जातिवादी थे। उनके आते ही दफ्तर के ब्राह्मण चपरासियों और बाबुओं का राज हो जाता। बेचारे ठाकुर-कायस्थ एक किनारे कर दिए जाते। पंडितजी मुँह में पान दबाये अपने पैर मेज के बाहर निकालकर दफ्तर में बैठते। उनके कमरे में घुसने पर ठेकेदारों या बाबुओं को उनका पैर छूना पड़ता। अफसरों में भी ज्यादातर पैर छूते। पैर तो लाला बाबू ने भी खूब छुआ पर बात कुछ बनी नहीं। दोनों बार उपाध्याय ने लाला बाबू का तबादला करा दिया और दोनों ही बार काफी परेशान होकर वे वापस इस दफ्तर में लौट पाये।
आज लाला बाबू की इस मन्त्रणा में भागीदारी का राज यही था। वे अपने स्वभाव के विपरीत बटुकचन्द उपाध्याय की सम्भावित उपस्थिति से उत्तेजित थे और अपने स्वभाव के विपरीत ही अपने वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति में उपाध्याय का नामोल्लेख होने पर कभी-कभी मुँह बिचकाकर कह उठते थे, 'हरामुद्दहर'।
लाला बाबू की बगल में यानी बड़े साहब के सामने मेज की दूसरी तरफ चेचक के दागोंवाला चेहरा लटकाये, हरे और काले रंगों के बीच के किसी रंगवाला चश्मा पहने ऊपर की दो खुली बटनोंवाला चारखानेदार सफारी सूट चढ़ाये और बोलते समय अपने मुँह में ठुँसे पान की पीकें दाहिने-बाएँ-सामने हर तरफ उछालते हुए, फूहड़ता ही जिनके जीवन का सबसे बड़ा धन था ऐसे श्री लल्लन राय विराजमान थे। उनका यहाँ होना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। दफ्तर का कोई भी व्यक्ति उन्हें इस विभागीय गोष्ठी में शिरकत करते देखता और वह लल्लन राय की पृष्ठभूमि जानता होता तो वह उन्हें कत्तई बाहरी व्यक्ति न मानकर उनकी उपस्थिति को सहज रूप में लेता।
लल्लन राय बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने अपना जीवन अखबारों की हाकरी से प्रारम्भ किया था। अखबार बेचते-बेचते वे पत्रकार बन बैठे थे। शुरुआत में एक दैनिक अखबार, जो इसी शहर से छपता था, के वे अपने मोहल्ले के संवाददाता बन गये थे। यद्यपि वे सही हिन्दी नहीं लिख पाते थे और उनकी ज्यादातर खबरों को डेस्क पर बैठा कोई उप-सम्पादक अपना माथा पीटते हुए लगभग फिर से पूरा लिखता था, पर वे शीघ्र ही शहर के सबसे सक्रिय खबरनवीस बन गये। वे रोज बिना किसी पारिश्रमिक की अपेक्षा किये कई-कई पेज काले करते थे और उन्हें अँधेरा होते-होते अपने अखबार के दफ्तर पहुँचा आते थे।
लल्लन और उनका अखबार दोनों एक दूसरे के लिए बड़े उपयोगी थे। वे एक ऐसे समय पत्रकारिता की दुनिया में आये थे जब समाज के दूसरे अंगों की तरह अखबारों की दुनिया में भी आदर्शवाद एक फालतू शब्द हो गया था। उपभोक्ता संस्कृति ने हर चीज की तरह अखबार को भी व्यापार बना दिया था। इस दुनिया में या तो बड़े उद्योगपति थे जो राजधानियों से अखबार निकाल रहे थे और जिनका उद्देश्य अखबारों की ताकत के बल पर अपने जूट, सीमेंट या तेल साम्राज्यों की रक्षा करना था अथवा छोटे और मझोले पूँजीपति थे जो छोटे शहरों से अखबार निकालकर अपनी जमीनों की खरीद-फरोख्त, चिटफंडों या राजनीतिक दलाली जैसे धन्धों में बिना किसी बाधा के फलना-फूलना चाहते थे। जिस तरह के अखबार के लल्लन राय संवाददाता थे उनमें काम करनेवाले ज्यादातर लोग अर्द्ध शिक्षित या लगभग अशिक्षित थे। उन्होंने अपनी साइकिलों, स्कूटरों और मोटरसाइकिलों पर मोटे-मोटे अक्षरों में प्रेस लिखवा रखा था और खुद को पत्रकार कहते थे। उनके सम्पर्क में आनेवाले सरकारी कर्मचारियों की दृष्टि में वे सिर्फ दलाल थे जो पार्टटाइम पत्रकारिता भी करते थे।
इन पत्रकारों की एक न्यूसेंस वैल्यू थी जिसके कारण सरकारी अधिकारी या कर्मचारी इनसे डरते थे। खबरें इकट्ठी करने के बहाने ये थानों, दफ्तरों या अस्पतालों में कोई न कोई सिफारिश लिये घूमते रहते थे। जिन अफसरों के पास वे सिफारिश लेकर पहुँचते वे अक्सर उनसे बड़े घाघ होते थे। सिफारिश करनेवाला चाहे जितने भोलेपन से सिफारिशी को अपना रिश्तेदार, पड़ोसी, मित्र या परिस्थितियों का मारा निरीह घोषित करे, घाघ अफसर को यह ताड़ने में ज्यादा वक्त नहीं लगता कि पैरवी के पीछे कितने का लेन-देन हुआ है। कुछ पत्रकारों के अफसरों से बिचौलिये जैसे सम्बन्ध कायम हो जाते। वे थाने पर पैरवी की जगह सीधे-सीधे लेन-देन की बात करने लग जाते। इस लेन-देन में एक हिस्सा उन्हें भी मिल जाता। ठेकेदार और इंजीनियर के बीच में कमीशन को लेकर विवाद हो तो वे मध्यस्थ की भूमिका निभाते। विकास प्राधिकरण में प्लाट या फ्लैट अलाट कराकर वे अपना हिस्सा काटकर अफसर को घर पर उसके हिस्से की राशि पहुँचा आते।
लल्लन राय को पत्रकार बनने का सौभाग्य उनकी एक विशेष योग्यता के कारण मिला। उनके पिता अपने क्षेत्र के सबसे बड़े समाचार पत्र एजेंट थे। उन्होंने शुरुआत तो एक साधारण हॉकर के रूप में की थी, पर धीरे-धीरे पिछले दो दशकों में उन्होंने एक बड़े एजेंट की हैसियत हासिल कर ली थी। इसमें तिकड़म के साथ-साथ उनकी मेहनत ने भी उनका साथ दिया था। पहले वे अपने पाँचों लड़कों के साथ सबेरे तीन बजे उठकर मीलों साइकिल चलाते थे। गर्मी-जाड़ा-बरसात उनकी एक जैसी दिनचर्या रहती थी। सारे बाप-बेटे भोर में उठकर अखबारों के दफ्तरों या एजेंटों की दुकानों का चक्कर लगाते और फिर आठ बजे तक घर-घर घूमकर अखबार और पत्रिकाएँ बाँटते। इसके बाद ही उनके पेट में कुछ अन्न जाता। दिन में पूरा परिवार अलग-अलग जगहों में अलग-अलग धन्धे करके जीविका कमाता था। बाप ने सभी बच्चों को पढ़ाने की कोशिश की थी। पर पारिवारिक माहौल और जीवन की दुश्वारियों के चलते सभी लड़के पाँच-सात साल स्कूल में बिताकर बारी-बारी से बाहर निकल आये। बाद में बाप ने कुछ अखबारों की एजेंसी ले ली। मेहनत और व्यावसायिक बुद्धि ने अब यह स्थिति पैदा कर दी थी कि बाप-बेटों को सिर्फ प्रबन्ध देखना पड़ता था और बीसियों हाकर उनके नौकर की हैसियत से अखबार ले जाकर बाँटते थे। इसी एजेंसी के कारण लल्लन राय को पत्रकार की हैसियत प्राप्त हुई।
हुआ कुछ ऐसे कि प्रदेश में तीन अखबार घरानों में भयानक युद्ध छिड़ गया। ये अखबार प्रदेश के पूर्वी, पश्चिमी और केन्द्रीय भागों से निकलते थे और इनके अपने-अपने क्षेत्र थे। व्यापारिक प्रतिस्पर्धा के चलते तीनों के मालिकों ने एक दूसरे के इलाकों में घुसपैठ शुरू कर दी। उन्होंने धड़ाधड़ नये-नये शहरों से अपने संस्करण निकालने शुरू कर दिए। बैंकों और सरकारी संस्थाओं का पैसा उनकी अखबारी ताकत के कारण आसानी से उपलब्ध था। हलवाइयों, हज्जामों या हर्र-बहेड़ा बेचनेवालों की दुकानों में तमाम महत्त्वाकांक्षी नौजवान मौजूद थे जो पत्रकार बनने के लिए दो-तीन सौ रुपयों पर भी आने के लिए तैयार थे।
सनसनी ही इन अखबारों की सबसे बड़ी पूँजी थी। हर तरह की नैतिकता और दायित्वबोध से मुक्त ये अखबार अपनी खबरों के कारण कस्बों या देहातों के चायखानों में सबसे लोकप्रिय थे। इनमें छपनेवाली खबरों को लिखने के लिए पढ़ा-लिखा होना जरूरी नहीं था। इसलिए लल्लन राय जैसे लोग यहाँ पूरी तरह से फिट थे।
लल्लन राय में कुछ विशेष बात जरूर थी जिससे वे अपने जैसे अर्द्धशिक्षितों के बीच भी अलग पहचान बना लेते थे। उनके सम्पादक-कम-मालिक उनकी इस प्रतिभा को पहचानते थे। जब अयोध्या में बीस आदमी कार सेवा के दौरान मरे और उनके अखबार के अलग-अलग संस्करणों ने मरनेवालों की संख्या दो हजार से शुरू करके बीस हजार तक पहुँचा दी, उसी दौर में लल्लन राय की एक खबर ने उनके कल्पनाजीवी सम्पादक को भी भौंचक्का कर दिया। लल्लन राय ने एक शाम खबर दी कि जब से राम जन्मभूमि आन्दोलन चल रहा है, शहर की सब्जी मंडी की एक धर्मपरायणा बुढ़िया सब्जी-विक्रेता की दुकान पर बिकनेवाले बैगनों को काटने पर उनमें जय श्री राम लिखा हुआ दिखाई देता है।
उनकी प्रतिभा का ही परिणाम था कि उनका मालिक जिसका नाम अखबार के सम्पादक के रूप में जाता था, उन्हें पत्रकारिता के अलावा बहुत सारे काम सौंपता था। उसके बच्चे का दाखिला कराना हो, घर में गैस खत्म हो गयी हो या बन्दूक के लाइसेंस का नवीनीकरण हो-ये सारे काम लल्लन राय के जिम्मे रहते थे। मालिक की पत्नी को बाजार जाना हो, लल्लन राय की खोज होती। बच्चे सर्कस जाना चाहते तो लल्लन राय पास लेकर हाजिर होते। घर में किसी का जन्मदिन होता तो लल्लन राय शहर के आला हुक्कामों को निमन्त्रित करने का दायित्व उठाते। वे उत्सव के समय लगातार मालिक के पोर्टिको में खड़े रहते और अफसरों की अगवानी और विदाई करते रहते।
बदले हुए समय में पत्रकारिता ज्यादातर लोगों के लिए दलाली बन गयी थी। अपनी-अपनी हैसियत के हिसाब से बड़ी या छोटी। मसलन लल्लन राय का मालिक कोलोनाइजिंग करता था। अखबार ने ही उसे यह ताकत दी थी कि सारे नियम-कायदों की धज्जियाँ उड़ाकर ऐन सिविल लाइंस में बनाई गयी उसकी बहुमंजिला इमारत का उद्घाटन प्रदेश के नगर विकास मन्त्री ने किया था और अब जब उसने आधी खरीदी और आधी अवैध कब्जा की गयी सरकारी जमीन पर एक नयी कालोनी बनाने की घोषणा की तो उसका शिलान्यास शहर के कमिश्नर से कराने जा रहा था। यह अखबार उसका सबसे बड़ा कवच था।
अखबार के इस मालिक-कम-सम्पादक की व्यावहारिक बुद्धि बड़ी तेज थी। जब प्रदेश के दूसरे अखबारों ने उसके शहर में धावा बोला तो अपनी इसी व्यावहारिक बुद्धि के चलते उसने उन्हें काफी दुखी किया। सबसे पहले उसने हाकरों के तन्त्र पर कब्जा किया। हॉकरों को मोपेड से लेकर टेलीविजन जैसे उपहार बाँटे गये। इसी चक्कर में लल्लन राय पत्रकार बन गये। उनके पिता बड़े वितरक थे और यह उनका प्रभाव था कि नये अखबारों को बरसों उनके प्रभाव क्षेत्र में हॉकर नहीं मिले। शुरू के वर्षों में तो नये अखबारों को लगता था कि उनके वितरण का कोई तन्त्र इस शहर में नहीं बन पाएगा। पर अब धीरे-धीरे उनके पाँव भी जमने लगे हैं, हालाँकि अब भी हॉकरों पर लल्लन राय के अखबार का ही असर मुख्य है। हॉकर बार-बार माँगने पर ही कोई दूसरा अखबार देता है नहीं तो अगर बहुत आग्रही ग्राहक न हो तो उसे लल्लन राय का अखबार ही पढ़ने को मिलता है। बरसों तक इन नये अखबारों के दफ्तरों में रहस्यमय ढंग से आग लगती रही या उनके अखबार में छपी छोटी सी खबर पर छात्रों का कोई दल आकर तोड़-फोड़ करता रहा और पुलिस देर से पहुँचती रही या रात की पाली से लौटते उनके सहायक सम्पादकों की पिटाई होती रही। अब तो इन अखबारों ने भी बहुत सारे हथकंडे सीख लिये हैं, पर फिर भी लल्लन राय का भवन-निर्माता मालिक अब भी उन पर भारी पड़ता है।
लल्लन राय के शहर के पत्रकारों को दुख था कि राजधानी की तरह उनके यहाँ दलाली के लिए बड़ी सम्भावनाएँ नहीं थीं। राजधानी के पत्रकारों की मन्त्रियों और बड़े अफसरों के साथ बिताई जानेवाली शामों की खबरें जब उन तक पहुँचतीं, वे ईर्ष्या और आत्मग्लानि में डूबने-उतराने लगते। उनका शहर कहने के लिए तो सूबे के बड़े शहरों में था, पर व्यवहार पूरी तरह कस्बाई शहर की तरह करता था। एक बोतल शराब देकर अफसर दस जगह गा देता। एक थानेदार को कमाऊ जगह लगवाने में जितना पैसा मिलता उससे ज्यादा शहर में इसकी चर्चा हो जाती। हाल में यह चलन जरूर शुरू हो गया था कि प्रेस कान्फ्रेंस रेस्तराँओं या होटलों में होने लगी थीं, पर उनमें भी शहर का कस्बाई टुच्चापन झलकता। अक्सर तो कान्फ्रेंस बुलानेवाले चाय-समोसे पर ही टरका देते। बहुत कम मौकों पर राजधानी की तरह शराब मयस्सर होती। राजधानी में प्रेस कान्फ्रेंसों में मिलनेवाले सूट के कपड़े, घड़ियाँ या टू-इन-वन तो अभी भी इस शहर के पत्रकारों के लिए हसरत-भरी व्यथा थे। अभी तक इस शहर ने सिर्फ इतनी तरक्की की थी कि अब पेन या सस्ती घड़ी तक बात पहुँचने लगी थी।
राजधानी के पत्रकारों की तरह इस शहर के पत्रकारों ने भी अपने-अपने बीट चुन लिये थे-खबरों और दलाली के बीट। इनमें पुलिस सबसे लोकप्रिय बीट थी। हर पत्रकार क्राइम रिपोर्टर बनना चाहता था। इस बीट में मेहनत कम और मक्खन ज्यादा था। अपराध की ज्यादातर खबरें तो कंट्रोल रूम में शाम को फोन करने पर मिल जातीं। दिन-भर क्राइम रिपोर्टर थानों और पुलिस दफ्तरों के चक्कर लगाकर काजू और मिठाई खाते और एकाध मुर्गा भी ढंग का फँस जाता तो उसकी पैरवी करके दिन-भर की मेहनत वसूल कर लेते। एक-दो आदर्शवादी किस्म के पत्रकारों को छोड़कर बाकी सबकी शाम का इन्तजाम हो जाता। सब कुछ यहाँ संस्थागत हो गया था। समझदार पुलिस कप्तान एक-एक क्राइम रिपोर्टर एक-एक थानेदार के हवाले कर देता। थानेदार ही उसके बीवी-बच्चों के लिए फिल्म अथवा सर्कस के पास पहुँचा आता या शाम को निर्धारित मात्रा में शराब और मुर्गे की व्यवस्था कर देता। छुटभैये क्राइम रिपोर्टर जो कप्तान तक नहीं पहुँच पाते वे चौकियों या थानों में रम जाते और वहीं से फलते-फूलते। लल्लन राय ने भी शुरू में इसी बीट की माँग अपने सम्पादक से रखी थी। पर उनका सम्पादक उनकी इस माँग से सहमत नहीं हुआ क्योंकि उस समय उसका एक खास चमचा इस बीट में लगा था और वह लल्लन राय की प्रतिभा से आज की तरह वाकिफ भी नहीं था। उसने लल्लन राय को पी.डब्लू.डी. नामक महकमा आवंटित कर दिया। पहले तो लल्लन राय ने काफी नाक-भौं सिकोड़ी, हाथ-पाँव मारे कि पुलिस मिल जाय, पर बाद में जब उन्होंने इसमें प्रवेश किया तो पाया कि यहाँ भी पुलिस की तरह चरने-खाने के लिए विस्तृत मैदान था।
शुरू-शुरू में लल्लन राय को काफी मेहनत करनी पड़ी। पी.डब्लू.डी. यानी सार्वजनिक निर्माण विभाग उनके लिए एकदम नयी दुनिया थी। पर वे जल्दी ही कामयाब पत्रकार माने जाने लगे। एक तो वे बेहद मेहनती थे। बचपन की ट्रेनिंग काम आयी। इस पेशे में सफलता के साथ क्रमशः परिवर्तित होनेवाली साइकिल, मोपेड और स्कूटर पर वे हाड़ कँपाती सर्दी या माथा चकरा देनेवाली लू में बारह घंटे से अधिक काम कर सकते थे। दूसरे सफलता के कुछ गुर उन्हें उन्हीं के अखबार में काम करनेवाले अमृतलाल गुप्ता ने सिखाये।
अमृतलाल गुप्ता अखबार की पुलिस बीट के वही पत्रकार थे जिन्हें हटाने का प्रयास प्रारम्भ में लल्लन राय ने किया था और बाद में निराश होकर मित्रता गाँठ ली थी। गुप्ताजी जीवन में कुछ भी उधार रखने में विश्वास नहीं रखते थे। वे दोस्त के दोस्त और दुश्मन के दुश्मन थे। स्थानीय थाने से रोज उन्हें एक पाव शराब मिलती थी। जब तक यह व्यवस्था जारी रहती उनके थाने में अमन-चैन का साम्राज्य रहता। जैसे ही कोई थानेदार इस व्यवस्था में विघ्न डालता वैसे ही गुप्ता जी का अखबार कुछ खास तरह के शीर्षकों से भर उठता। इनमें से कुछ की बानगी इस तरह थी-'थाना रूपनगर में चोरों की बन आयी', 'डाकू कस्बा लूटते रहे, पुलिस थाने में सोती रही' या 'दिन दहाड़े थाने में बलात्कार'। बाद में जब उनकी शराब फिर से बँध जाती तो शीर्षक कुछ इस तरह हो जाते - 'थाना रूपनगर में पूरी तरह अमन-चैन', 'रात-भर पुलिस की गश्त से चोरों के हौसले पस्त' या 'अब नहीं लुटेगी किसी अबला की इज्जत-रूप नगर के थानाध्यक्ष लोहा सिंह की गर्जना'। दरअसल उनके शीर्षक देखकर ही यार-दोस्त बता देते थे कि आजकल पुलिस और अमृतलाल गुप्ता की कैसी छन रही है।
इन्हीं गुप्ता पत्रकार ने लल्लन राय को पेशे के गुर सिखाये। शुरू-शुरू में तो जब लल्लन राय टुटपुँजिया साइकिल पर सवार अपने चेचकहरू चेहरे पर हरे और काले के बीच के किसी रंग का चश्मा पहने अपने चारखानेवाले सफारी सूट के साथ पी.डब्लू.डी. के दफ्तर में पधारे तो अफसरों और बाबुओं ने उन्हें किसी चिड़ीछाप हॉकर से ज्यादा महत्त्व नहीं दिया। उन्होंने पत्रकारों के रोब-दाब और महत्त्व को लेकर जो सपने देखे थे, वे चूर-चूर होने लगे थे। वे निराशा और क्षोभ के समुद्र में डूबते-उतराते रहते अगर उन्हें अमृतलाल गुप्ता की विशेषज्ञ सेवाएँ न मिली होतीं। काफी दुख उठाने के बाद वे अमृतलाल गुप्ता के शरणागत हो गये।
अमृतलाल गुप्ता ने सबसे पहले लल्लन राय की मुलाकात एक ऐसे जूनियर इंजीनियर से कराई जो पी.डब्लू.डी. महकमे में सतत चलनेवाले सत्ता-संघर्ष में विरोधी खेमे में था। उसने जो-जो सूचनाएँ दीं उनसे लल्लन राय के दिव्य चक्षु खुल गये। कुछ निर्माणाधीन इमारतों, पुलियों और सड़कों का उन्होंने चुपके-चुपके मुआयना किया। कुछ जगहों के फोटो उतारे गये। फिर दिखाये जौहर उनके शीर्षकों ने-'एक बरसात नहीं झेल पाएगी प्राइमरी स्कूल की इमारत : अपने बच्चों को दाखिल कराने से पहले अभिभावक सौ बार सोचेंगे', 'इंजीनियर शर्मा का कमाल : सड़क बनी बाद में बही पहले', 'विचित्र किन्तु सत्य : एक बोरा सीमेंट में मिला रहे हैं छब्बीस बोरा बालू' या 'सार्वजनिक निर्माण विभाग का प्रान्तीय खंड लूट का अड्डा बना'। इन शीर्षकों का जादुई असर हुआ और एक दिन बड़े साहब ने लल्लन राय को बुलवा भेजा। बन्द कमरे में दोनों के बीच डेढ़ घंटे की शिखर-वार्ता के दौरान हर मुलाकाती को चपरासी लगातार 'साहब बिजी हैं' कहकर टरकाता रहा। इस गोष्ठी के बाद जब लल्लन राय बाहर निकले तो वे इस प्रतिष्ठान के अभिन्न अंग बन चुके थे।
कुछ ही दिनों में लल्लन राय को पी.डब्लू.डी. इतना रास आया कि उन्होंने पुलिस के बारे में सोचना बन्द कर दिया। पी.डब्लू.डी. बीट ने घर में उनकी हैसियत बढ़ा दी थी। बेटा पत्रकार हो गया है और हाकिम-हुक्काम उससे मिलने आएँगे, यह सोचकर उनके बाप ने पास पड़ी सरकारी जमीन घेरकर दो कमरे बनवा डाले। पत्रकारजी का मकान बन रहा है, यह जानकर नगर महापालिका वाले रोकने नहीं आये। बालू, सीमेंट, सरिया वगैरह पी.डब्लू.डी. के बड़े साहब ने अलग-अलग जूनियर इंजीनियरों के जिम्मे लगा दी। ईंट अमृतलाल गुप्ता ने एक थानेदार से कहकर आधे दाम में भट्ठेवालों से दिला दी। शुरुआती पत्रकारिता में ही परिवार तथा पड़ोसियों पर लल्लन राय का रोब पड़ गया। जल्दी ही उन्होंने अपने सबसे छोटे भाई को, जो चाकूबाजी और लड़कियाँ छेड़ने के दो मामलों में जेल जा चुका था और भविष्य में जिसके ज्यादा समय जेल में ही बिताने की सम्भावना थी, ठेकेदारी में लगवा दिया। देखते ही देखते वह भी इस क्षेत्र में तरक्की कर गया।
लल्लन राय हर बड़े साहब के लिए काम की चीज हुआ करते थे। वर्तमान बड़े साहब भी उनका तरह-तरह का इस्तेमाल करते थे। अपने विरोधियों के खिलाफ अखबार-बाजी करानी हो, शहर में आये हुए सार्वजनिक निर्माण विभाग के मन्त्री की प्रेस कान्फ्रेंस में विरोधी खेमे के पत्रकारों को साधना हो, किसी नेता को हमवार करना हो या बड़े साहब के किसी बड़े अफसर को खुश करने के लिए अखबारों में कोई इंटरव्यू छापना हो-हर मौके पर लल्लन राय अपनी सेवाओं के साथ हाजिर होते। वर्तमान बड़े साहब का तो कुछ ज्यादा ही विश्वास जम गया था उन पर। राजधानी में कुछ लोग थे जिन्हें वह नियमित पैसा भेजते थे। कभी-कभी कोई नहीं मिलता तो वह लल्लन राय को ही पैसा लेकर भेज देते। लल्लन राय के अपने राजनीतिक सम्बन्ध भी इस बीच बन गये थे।
यही सारे कारण थे कि आज की आपात बैठक में लल्लन राय उपस्थित थे।
रोज की दिनचर्या के मुताबिक वे 11 बजे पी.डब्लू.डी. दफ्तर में प्रवेश करते थे। उसके पहले दस से ग्यारह तक का समय वे कचहरी और दूसरे सरकारी दफ्तरों के सामने चाय या लस्सी की दुकानों पर बिताते थे। अक्सर उनके साथ अमृतलाल गुप्ता भी होता। रोज ही कोई न कोई जूनियर इंजीनियर या ठेकेदार मिल जाता जो उन्हें चाय, समोसा या लस्सी का सेवन कराता। जब लल्लन राय की बीट का कोई मुर्गा नहीं फँसता तो अमृतलाल गुप्ता किसी दरोगा या सिपाही को पकड़ लेता जो उनके चाय-पानी का खर्च उठाता। इस बीच तरह-तरह के लोगों से उनका साक्षात्कार चलता रहता और वे खबरें एकत्रित करते रहते। दिन-भर के कार्यक्रम की रूपरेखा वे यहीं बैठे-बैठे तय करते। घंटे डेढ़ घंटे की मटरगश्ती के बाद वे मगही पान का जोड़ा मुँह में दबाते और अपनी-अपनी बीट पर रवाना हो जाते। अमृतलाल गुप्ता की मंजिल होती वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक का कार्यालय या कोई थाना और लल्लन राय पी.डब्लू.डी. दफ्तर में प्रवेश करते।
आज इस दिनचर्या में थोड़ा फर्क आया। अभी लल्लन राय ने अपना स्कूटर चाय की दुकान के बाहर खड़ा कर अपना चश्मा उतारकर इस उम्मीद से पोंछना शुरू किया ही था कि कोई न कोई परिचित चाय पिलानेवाला या अमृतलाला गुप्ता कहीं न कहीं से उन्हें देखकर उनकी तरफ आ जाएगा, तभी बड़े साहब का ड्राइवर जाने कहाँ से उनके सामने प्रकट हो गया।
''आज बड़ी देर कर दी राय साहब। बड़े साहब कब से ढुँढ़वा रहे हैं चार बार हमें भेज चुके।''
लल्लन राय ने गौर से ड्राइवर की तरफ देखा। मामला कुछ संगीन लगा। अभी मुश्किल से सवा दस बजा था। बड़े साहब इतनी जल्दी दफ्तर आ गये और उन्हें ढूँढ़ रहे हैं, जरूर कोई खास बात है।
''हमें कुछ नहीं पता, बस बार-बार साहब हमें भेज रहे हैं आपको देखने को। अभी आप न मिलते तो गाड़ी लेकर आपके घर पहुँच जाते हम।''
''अच्छा...चलो...एक जोड़ा पान मुँह में दबा लिया जाय तो चलें।''
''आप चलें, हम पान लगवाकर ला रहे हैं। यहाँ खड़े रहेंगे तो अभी आपके चाहने वाले घेर लेंगे, फिर निकलना मुश्किल हो जाएगा।''
''ठीक है। पान लगवा के आओ, हम चल रहे हैं,'' लल्लन राय ने कहा और स्कूटर स्टार्ट कर सड़क के दूसरी तरफ स्थित पी.डब्लू.डी. दफ्तर की तरफ कचहरी की भीड़ में से धीरे-धीरे स्कूटर निकालते हुए बढ़ गये।
लल्लन राय जब बड़े साहब के कमरे के सामने पहुँचे तो उन्होंने पाया कि दरवाजा बन्द था। पर जिस तरह लपककर चपरासी ने दरवाजा खोलकर उन्हें अन्दर जाने का इशारा किया उससे यह स्पष्ट हो गया कि मामला कुछ खास था और उनका इन्तजार हो रहा था।
अन्दर पसरी हुई उदासी और क्षोभ को घुसते ही सूँघा जा सकता था। लल्लन राय ने भी बिना पूरा मामला समझे मुँह लटका लिया। उन्होंने यह सोचकर जरूर सन्तोष का अनुभव किया कि वे बड़े साहब के लिए इतने महत्त्वपूर्ण हैं कि चार लोगों के अन्तरंग विचार-विमर्श में उनका नम्बर पड़ता है।
कमरे में बैठे लोग फुसफुसाकर बातें कर रहे थे। उन्हें देखते ही सभी चुप हो गये। बड़े साहब की अर्द्ध चन्द्राकार और काफी हद तक भव्य मेज के बाईं तरफ सहायक अभियन्ता रिजवानुल हक, दाईं तरफ अवर अभियन्ता ध्रुवलाल यादव तथा सामने बड़े बाबू बैठे थे। हालाँकि तीनों के बगल में कुर्सियाँ खाली पड़ी थीं, पर लल्लन राय बड़े बाबू के पासवाली एक कुर्सी पर बैठ गये।
थोड़ी देर तक खामोशी छायी रही। मामला क्या है, इस उत्सुकता में लल्लन राय ने बौड़म की तरह बारी-बारी से सबकी तरफ देखा। कोई नहीं बोला तो वे असहज हो गये। उन्हें कुछ नहीं सूझा तो सामने प्लेट में रखे पान के बीड़ों में से दो पान उठाये, उसके बगल में रखे तम्बाकू में से एक चुटकी तम्बाकू उठायी और मुँह में डाल लिया।
पान खाकर लल्लन राय चूना-कत्था अपने बालों में पोंछ रहे थे कि साहब ने अपने सामने पड़े एक कागज को उनके सामने सरका दिया। यह स्थानान्तरण आदेश था जो सुबह-सुबह एक विशेष पत्रवाहक लाया था।
''बड़ी शुद्ध हिन्दी है साहब,'' लल्लन राय ने लोगों को हँसाने की कोशिश की, पर कोई मुस्कुराया तक नहीं।
क्लिष्ट सरकारी हिन्दी में जो लिखा था उसे पढ़ने में लल्लन राय को दिक्कत जरूर हुई, पर समझने में नहीं। मतलब साफ था कि बड़े साहब अर्थात श्री कमलाकान्त वर्मा का स्थानान्तरण विभागीय हेडक्वार्टर में डिजाइन सेल में हो गया था और उन्हें तत्काल दफ्तर के नम्बर दो श्री ऋषभचरण शुक्ल सहायक अभियन्ता को कार्यभार सौंप देना था। बटुकचन्द उपाध्याय नामक अधिशासी अभियन्ता को शीघ्र ही आकर ऋषभचरण शुक्ल से कार्यभार लेकर इस खंड का अधिशासी अभियन्ता बनना था। इतना पढ़ने के बाद लल्लन राय की समझ में आ गया कि मामला गम्भीर है क्योंकि समय कम था।
उन्हें पता नहीं था कि अभी तक क्या रणनीति बन चुकी है और क्या-क्या फैसले किये जा चुके हैं। इस पूरे प्रकरण में उनकी क्या भूमिका होगी, इसे समझने के लिए उन्होंने कागज सामने से सरकाया और बड़े साहब की तरफ देखते हुए निरर्थक-सा शब्द मुँह से उच्चारित किया-
''तो...''
''तो क्या...पत्रकारजी आप बताइए क्या करना है?" रिजवानुल हक ने पूछा।
इसका मतलब उनकी राय का महत्त्व है। लल्लन राय गम्भीर हो गये। राय देने के पहले कुछ जरूरी जानकारियाँ होनी चाहिए।
''बटुकचन्द उपाध्याय कब तक आ रहा है?''
''चल चुका है। आधे-एक घण्टे में पहुँच रहा है।''
''कैसे पता?"
''लखनऊ फोन किया गया था। उसके दफ्तर से पता चला कि सुबह किसी प्राइवेट कार से रवाना हो गया है। अब तो पहुँचनेवाला होगा।''
''बड़े साहब इतना सबेरे दफ्तर क्यों आ गये?"
''धोखा देकर बुलाया गया। एस. ई. ने फोन किया कि दस बजे वो दफ्तर आएँगे। यहाँ आने पर यह स्पेशल मैसेंजर खड़ा था।''
''ऑर्डर रिसीव कर लिया?"
''साहब ने नहीं किया, पर ऋषभचरण साले ने डिस्पैचर से करा दिया है।''
''इस हरामजादे ऋषभचरण से तो मैं निपटूँगा। दफ्तर में सालों ने ब्राह्मणवाद फैला रखा है,'' ध्रुवलाल ने दाँत पीसते हुए कहा।
बड़े साहब के सामने तबादलों से उपजी ऐसी स्थिति कई बार उत्पन्न हुई थी। उनका आधा ध्यान अपने मातहतों की बातचीत पर था और आधा आगे की रणनीति बनाने में था। बीच-बीच में मुस्कुराकर या कुछ मजाकिया वाक्य बोलकर वे अपने को सहज दिखाने की कोशिश कर रहे थे।
''अब क्या करना है साहब, जल्दी फैसला किया जाय। नहीं तो बटुकवा सार कभी भी पहुँच सकता है,'' ध्रुवलाल यादव कर्म में विश्वास करते थे। इतनी लम्बी गोष्ठी में उन्हें ऊब महसूस होने लगी थी।
''आपने जो करने का फैसला किया है, पत्रकारजी को भी सुना दीजिए। बेचारे देर से आये हैं,'' बड़े साहब ने चुहल की। बड़े बाबू मुस्कुराए और रिजवानुल हक हँसने लगे।
ध्रुवलाल को भी मजा आया। उन्होंने अपनी खास अदा में लल्लन राय पत्रकार को समझाया, ''पत्रकारजी अपना तो खुला खेल फर्रूखाबादी है। लात के देवता से बात नहीं करनी चाहिए। आने दो बटुकचन्द उपाध्याय को। पोर्टिको में गाड़ी रुकते ही दूँगा हनाहन सौ जूते और गिनूँगा एक, साले ने जितना पैसा खर्च किया होगा लखनऊ में पीछे के रास्ते सब निकल जाएगा। बड़े साहब बस एक बार हाँ कर दें।'' बात तो लल्लन राय को भी जमी। अगर कुछ दिनों पहले यह प्रस्ताव उनके सामने रखा गया होता तो वे किलकारी मारकर हँसते और अपने चेचकहरू चेहरे पर शरारत-भरी मुस्कान लाकर एक आँख दबाते और शरारती अन्दाज में कहते, ''गुरु आइडिया तो ठीक है, पर जूता कड़ुआ तेल में डुबोया होना चाहिए।'' पर इस समय वे पत्रकार थे इसीलिए गुरु-गम्भीर तरीके से सिर्फ मुस्कुराए।
''चलिए आप लोगों को छुट्टी मिली मुझसे। सोचते होंगे बड़ा परेशान करता था पाजी,'' बड़े साहब ने अपने को सहज दिखाने के लिए मजाक किया। पर उनका चेहरा देखकर कोई भी व्यक्ति जो उन्हें करीब से जानता हो समझ सकता था कि उनके अन्दर तेजी के साथ कुछ पक रहा था।
''आप भी कैसी बात कर रहे हैं साहब उस हरामुद्दहर के साथ...'' बड़े बाबू की आवाज रुँध गयी।
''काम करने का मजा तो आपके साथ ही आया। आपको जाने नहीं देंगे हम,'' रिजवानुल हक ने इसरार किया।
''हम तो साहब लंठ थे। आपने हमें जे.ई. बना दिया। पहली बार ध्रुवलाल यादव ने भी काम करना शुरू कर दिया। आप गये तो बटुकचन्द को चार जूता मारकर फिर लंठई शुरू कर देंगे,'' ध्रुवलाल यादव ने भी अपनी वफादारी का इजहार किया।
बड़े साहब ने चश्मे को नाक पर खिसकाया और बोलनेवालों को गौर से तौला। 'साले यही सब डायलाग बटुकचन्द के सामने बैठकर भी झाड़ेंगे। बड़ी जलील दुनिया है यह',मन में सोचकर उन्होंने ठण्डी साँस ली।
''राय साहब आपको लखनऊ का मोर्चा सँभालना पड़ेगा,'' रिजवानुल हक ने कहा।
''मुझे हुकुम चाहिए,'' लल्लन राय ने बड़े साहब की तरफ देखा।
''हक साहब सबको बताएँगे कि किसे क्या-क्या करना है?" बड़े साहब ने युद्ध का सेनापति हक साहब को मुकर्रर कर दिया।
''सबसे पहले तो आप ही यहाँ से तशरीफ ले जाइए। आपको धोखा देकर यहाँ बुलाया गया है। पर अब आपको बीमार पड़ने से कोई नहीं रोक सकता। बटुकचन्द को आसानी से चार्ज नहीं मिलना चाहिए।''
बड़े साहब के चेहरे पर हिचकिचाहट देखकर हक ने चापलूसी और शरबती चाशनी में भिगोकर अपनी जुबान का वार किया, ''फिर आप एस.ई. साहब की मुरव्वत में पड़े। उन्होंने आपके लिए क्या किया है आजतक? झूठ बोलकर दफ्तर बुला लिया। इसका मतलब उन्हें बटुकचन्द के आदेश का पता चल गया था। प्रमुख अभियन्ता के दफ्तर से हुकुम मिला होगा कि आपका चार्ज करा दो तो झूठ बोलकर आपको यहाँ बुला लिया। थोड़ी देर में बटुकचन्द यहाँ पहुँच जाएगा। फिर आप देखिएगा कि एस.ई. साहब भी पीछे-पीछे हें...हें...करते पहुँच जाएँगे। तब आपके पास क्या चारा होगा। वक्त कम है, आप पहले यहाँ से जाइए तब हम फैसला करेंगे कि क्या करना है।''
''वक्त सचमुच कम है,'' बड़े साहब अर्थात कमलाकान्त वर्मा ने सोचा और उठ खड़े हुए। ऐसा नहीं था कि वे इस बात को समझ नहीं रहे थे। अपने मातहतों की बातें सुनते हुए वे बोले बहुत कम, पर उनका दिमाग लगातार काम कर रहा था। दफ्तर में आते ही वे समझ गये थे कि उनके साथ षड्यन्त्र हुआ है। सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर प्यारेलाल ने सुबह-सुबह उनके घर चपरासी भेजा कि वे दस बजे दफ्तर आएँगे और कोई जरूरी रिपोर्ट लखनऊ भेजनी है, उसी के बारे में बात करनी है। उन्होंने फौरन फोन से एस.ई. से सम्पर्क करके जानना चाहा कि मामला क्या है। लेकिन एस.ई. का फोन लगातार व्यस्त मिला। अब समझ में आया कि उसका रिसीवर ही हटा दिया गया होगा। इतने सबेरे दफ्तर पहुँचना और एस.ई. का भी उनके दफ्तर आना उन्हें खटका जरूर, लेकिन यह उम्मीद नहीं थी कि यहाँ पहुँचने पर उन्हें स्थानान्तरण आदेश थमा दिया जाएगा।
इस उम्मीद के पीछे सबसे बड़ा कारण तो यह था कि कमलाकान्त वर्मा अपने को एस.ई. प्यारेलाल का सबसे खास समझते थे। उनके और अधीक्षण अभियन्ता के सम्बन्ध दूसरे अधिशासी अभियन्ताओं के लिए ईर्ष्या का बायस थे। इन सम्बन्धों के कारण लोग उनकी पीठ पीछे तरह-तरह की बातें करते थे। उन्हें इन बातों का पता था, लेकिन इसे ईर्ष्याजन्य क्षुद्रता मानकर उन्होंने कभी किसी की परवाह नहीं की। उन्हें पूरी उम्मीद थी कि कभी उनके ऊपर कोई मुसीबत आयी भी तो प्यारेलाल सबसे पहले उन्हें चेतावनी देंगे। इस तरह धोखा देकर दफ्तर बुला लिये जाने की तो उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। दूसरे इस समय कुम्भ मेले की तैयारियाँ चल रही थीं। रोज लखनऊ तरह-तरह की सूचनाएँ मँगाई जाती थीं। कई बार तो देर रात तक सूचनाएँ एकत्रित की जातीं, लम्बे-चौड़े ड्राफ्ट बनते और रात में ही जाकर एस.ई. के दस्तखत कराये जाते और सुबह ट्रेन पकड़कर कोई बाबू लखनऊ रवाना होता। महीने में दस दिन से ज्यादा वे और एस.ई. लखनऊ में रहकर अलग-अलग किस्म की बैठकों में शरीक होते। यह उनकी मेहनत और कौशल का परिणाम था कि कुम्भ मेले का बजट पिछले कुम्भ से ड्योढ़ा हो गया था।
इस सारी मेहनत का यही फल उन्हें मिलना चाहिए था? कमलाकान्त वर्मा ने उदास होकर सोचा। इस साले प्यारेलाल से तो वे बाद में निपटेंगे। साला उनका नहीं हुआ तो दुनिया में किसी का नहीं होगा। उन्होंने उसके लिए दफ्तर के सारे उसूल तोड़ दिये। पिछले एस.ई. जिन टेंडरों को खुद मंजूर करते थे, उन पर एक प्रतिशत लेते थे। इसने डिवीजन की कैश बुक देखकर पूरे काम पर एक प्रतिशत लेना शुरू कर दिया। दूसरे अधिशासी अभियन्तओं ने विरोध किया, पर कमलाकान्त वर्मा ने मंजूर कर लिया तो झख मारकर उन्हें भी यह स्थिति स्वीकार करनी पड़ी। इसी तरह पिछला एस.ई. हर डिवीजन से दो हजार रुपया महीना लेता था, लेकिन इसने तो आते ही पाँच हजार रुपया कर दिया। पहले बड़ी हाय-तौबा मची, पर कमलाकान्त ने यहाँ भी सबसे पहले समर्पण किया। दूसरे डिवीजनों के अधिशासी अभियन्ताओं ने कुछ दिन तो प्रतिरोध किया, पर उनको भी झुकना पड़ा। हर महीने एस.ई. पहले हफ्ते में सबकी मीटिंग करता था। उसी दौरान सभी अपना-अपना लिफाफा बढ़ा देते थे। कई महीने तक एस.ई. उन इंजीनियरों को छोटे-मोटे कारणों पर जलील करता रहा जिन्होंने कमलाकान्त वर्मा की तरह लिफाफे में पाँच हजार रखने नहीं शुरू किये थे। उनके कागजों पर तरह-तरह की आपत्तियाँ लगती रहतीं। अन्त में एक-एक कर सबने समर्पण कर दिया। आपसी बातचीत में वे सब कमलाकान्त को इस बात के लिए कोसते थे कि उन्होंने पूरा माहौल बिगाड़ दिया है।
इतना सब करने के बाद प्यारेलाल ने उनके साथ ऐसा सलूक किया-कमरे के बाहर निकलते-निकलते उन्होंने दर्द-भरे अन्दाज में सोचा।
उनके कमरे के बाहर दफ्तर का माहौल उत्सुकता और रहस्य से सराबोर था। बाहर आते ही वे अपनी जीप की तरफ बढ़े। मुश्किल से दस कदम पर जीप खड़ी थी, लेकिन ये दस कदम तय करते हुए उन्हें लगा कि जैसे पूरा एक युग बीत गया हो। पता नहीं कि यह उनका भ्रम था या हकीकत, उन्हें अहसास हुआ कि दफ्तर के दरवाजों और खिड़कियों से आँखें चिपकी हुई थीं और वे सभी उन्हें घूर रही थीं। रास्ते में दफ्तर के मातहतों और ठेकेदारों ने हाथ उठाकर अभिवादन किया और वे अपने स्वभाव के अनुरूप सर की हल्की जुम्बिश से उन्हें जवाब देते रहे। उनके जीप में बैठते ही ड्राइवर ने गाड़ी रवाना कर दी। पूरे माहौल का उस पर भी असर था। रोज की तरह एक बार भी उसने गन्तव्य के बारे में नहीं पूछा और हड़बड़ाहट में दूसरे गेयर में गाड़ी उठा दी। इंजन ने दो-तीन बार झटके खाए, ड्राइवर ने क्लच दबाया तो हल्की थरथराहट के बाद गाड़ी लय में आ गयी और दफ्तर के गेट से बाहर निकल गयी।
>>आगे>>

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