शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

बेटी / गिरीश पंकज





 एक रीत है यह सदियों की, करना है सम्मान.
'कन्या' है यह दिल का टुकड़ा, मगर कर रहे 'दान'.

जाओ बेटी, सुखी रहो तुम, है सबका सन्देश,
खुश रखना तुम दो-दो घर को, कभी न पहुंचे क्लेश.
समझदार बेटी ही करती, घर भर का सम्मान.
'कन्या' है यह दिल का टुकड़ा, मगर कर रहे 'दान'.





आँगन का इक फूल है बिटिया, दूजा घर महकाए।
अपने सद्कर्मों से अपना,जीवन सफल बनाए।
लायक बेटी हरदम करती है सबका कल्यान।
'कन्या' है यह दिल का टुकड़ा, मगर कर रहे 'दान'.

बहुत कीमती धन है बेटी,नहीं परायी रहती.
जैसे एक नदी हो पावन, दो-दो तट तक बहती।
जाओ बिटिया 'नए देश' तुम, गूंजे मंगल-गान।
एक रीत है यह सदियों की, करना है सम्मान.
'कन्या' है यह दिल का टुकड़ा, मगर कर रहे 'दान'.

प्रस्तुति-- राहुल मानव

2 टिप्‍पणियां:

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