शनिवार, 10 अप्रैल 2021

खूब लड़ी मर्दानी वो तो...../ सुभद्रा कुमारी चौहान

  सुभद्रा कुमारी चौहान

सुभद्रा कुमारी चौहान (१६ अगस्त १९०४-१५ फरवरी १९४८) हिन्दी की सुप्रसिद्ध कवयित्री और लेखिका थीं। उनके दो कविता संग्रह तथा तीन कथा संग्रह प्रकाशित हुए पर उनकी प्रसिद्धि झाँसी की रानी (कविता) के कारण है। ये राष्ट्रीय चेतना की एक सजग कवयित्री रही हैं, किन्तु इन्होंने स्वाधीनता संग्राम में अनेक बार जेल यातनाएँ सहने के पश्चात अपनी अनुभूतियों को कहानी में भी व्यक्त किया। वातावरण चित्रण-प्रधान शैली की भाषा सरल तथा काव्यात्मक है, इस कारण इनकी रचना की सादगी हृदयग्राही है।

Subhadra Kumari Chauhan
सुभद्रा कुमारी चौहान
Subhadra Kumari Chauhan.JPG
सुभद्रा कुमारी चौहान
जन्म16 अगस्त 1904
इलाहाबाद, संयुक्त प्रान्त आगरा व अवध, ब्रिटिश भारत के प्रेसीडेंसी और प्रांत
मृत्यु15 फ़रवरी 1948 (उम्र 43)[1]
सिवनी, भारत
व्यवसायकवयित्री
भाषाहिन्दी
राष्ट्रीयताभारतीय
अवधि/काल1904–1948
विधाकविता
विषयहिन्दी
जीवनसाथीठाकुर लक्ष्मण सिंह चौहान
सन्तान5

कृतियाँ

कहानी संग्रह

  • बिखरे मोती (१९३२)
  • उन्मादिनी (१९३४)
  • सीधे साधे चित्र (१९४७)

कविता संग्रह

  • मुकुल
  • त्रिधारा
  • प्रसिद्ध पंक्तियाँ
  • यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।  मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे॥ 
  • सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी,  गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,  दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी। 
  • मुझे छोड़ कर तुम्हें प्राणधन  सुख या शांति नहीं होगी  यही बात तुम भी कहते थे  सोचो, भ्रान्ति नहीं होगी।

जीवनी

'मिला तेज से तेज'

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