शंकर दयाल सिंह vs shankar dayal singh ( deo )









 प्रस्तुति-- राजेन्द्र प्रसाद सिन्हा, उषा रानी

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
शंकर दयाल सिंह
Shankar Dayal Singh.jpg
साहित्यकार राजनेता शंकर दयाल सिंह (1937-1995)

कार्यकाल
1971-1977
चुनाव-क्षेत्र
चतरा लोक सभा क्षेत्र

कार्यकाल
1990-1995

जन्म
27 दिसम्बर 1937 औरंगाबाद, बिहार
मृत्यु
नवम्बर 26, 1995 (उम्र 57) टूण्डला (यात्रा के दौरान रेल के डिब्बे में)
राजनीतिक दल
जीवन संगी
कानन बाला सिंह
बच्चे
रंजन कुमार सिंह (पुत्र) राजेश कुमार सिंह (पुत्र) रश्मि सिंह (पुत्री)
व्यवसाय
पेशा
शंकर दयाल सिंह (अंग्रेजी: Shankar Dayal Singh, जन्म: २७ दिसम्बर,१९३७, मृत्यु: २७ नवम्बर १९९५) भारत के राजनेता तथा हिन्दी साहित्यकार थे। वे राजनीति व साहित्य दोनों क्षेत्रों में समान रूप से लोकप्रिय थे। उनकी असाधारण हिन्दी सेवा के लिये उन्हें सदैव स्मरण किया जाता रहेगा। उनके सदाबहार बहुआयामी व्यक्तित्व में ऊर्जा और आनन्द का अजस्र स्रोत छिपा हुआ था।[1] उनका अधिकांश जीवन यात्राओं में ही बीता और यह भी एक विचित्र संयोग ही है कि उनकी मृत्यु यात्रा के दौरान उस समय हुई जब वे अपने निवास स्थान पटना से भारतीय संसद के शीतकालीन अधिवेशन में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने दिल्ली आ रहे थे। नई-दिल्ली रेलवे स्टेशन पर २७ नवम्बर १९९५[2] की सुबह ट्रेन से कहकहे लगाते हुए शंकर दयाल सिंह तो नहीं उतरे, अपितु बोझिल मन से उनके परिजनों ने उनके शव को उतारा।

अनुक्रम

जन्म और जीवन

बिहार के औरंगाबाद जिले के भवानीपुर गाँव में २७ दिसम्बर १९३७ को प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी, साहित्यकार व बिहार विधान परिषद के सदस्य स्व० कामताप्रसाद सिंह के यहाँ जन्मे बालक के माता-पिता ने अपने आराध्य देव शंकर की दया का प्रसाद समझ कर उसका नाम शंकर दयाल रखा जो जाति सूचक शब्द के संयोग से शंकर दयाल सिंह हो गया। छोटी उम्र में ही माता का साया सिर से उठ गया अत: दादी ने उनका पालन पोषण किया। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक (बी०ए०) तथा पटना विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर (एम०ए०) की उपाधि (डिग्री) लेने के पश्चात १९६६ में वह अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य बने और १९७१ में सांसद चुने गये। एक पाँव राजनीति के दलदल में सनता रहा तो दूसरा साहित्य के कमल की पांखुरियों को कुरेद-कुरेद कर उसका सौरभ लुटाता रहा। श्रीमती कानन बाला जैसी सुशीला प्राध्यापिका पत्नी, दो पुत्र - रंजन व राजेश तथा एक पुत्री - रश्मि; और क्या चाहिये सब कुछ तो उन्हें अपने जीते जी मिल गया था तिस पर मृत्यु भी मिली तो इतनी नीरव, इतनी शान्त कि शरीर को एक पल का भी कष्ट नहीं होने दिया। २७ नवम्बर १९९५ की भोर में पटना से नई दिल्ली जाते हुए रेल यात्रा में टूण्डला रेलवे स्टेशन पर हृदय गति रुक जाने के कारण उनका प्राणान्त हो गया।

विविधि कार्य

समाचार भारती के निदेशक पद से प्रारम्भ हुई शंकर दयाल सिंह की जीवन-यात्रा संसदीय राजभाषा समिति, दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी, भारतीय रेल परामर्श समिति, भारतीय अनुवाद परिषद, केन्द्रीय हिन्दी सलाहकार समिति जैसे अनेक पडावों को पार करती हुई देश-विदेश की यात्राओं का भी आनन्द लेती रही और अपने सहयात्रियों के साथ उन्मुक्त ठहाके लगाकर उनका रक्तवर्धन भी करती रही। और अन्त में उनकी यह यात्रा रेलवे के वातानुकूलित शयनयान में गहरी नींद सोते हुए २७ नवम्बर १९९५ को उस समय समाप्त हो गयी जब उनके जन्म दिन की षष्टिपूर्ति में मात्र एक मास शेष रह गया था। यदि २७ दिसम्बर १९९५ के बाद भी उनकी यात्रा जारी रहती तो वे अपना ५८वाँ जन्म-दिन उन्हीं ठहाकों के बीच मनाते जिसके लिये वे अपने मित्रों के बीच जाने जाते थे। उनकी एक विशेषता यह भी रही कि उन्होंने जीवन पर्यन्त भारतीय जीवन मूल्यों की रक्षा के साथ-साथ भारतीय संस्कृति का पोषण किया भले ही इसके लिये उन्हें कई बार उलझना भी पडा किन्तु अपने विशिष्ट व्यवहार के कारण वे उन तमाम वाधाओं पर एक अपराजेय योद्धा की तरह विजय पाते रहे।

राजनीति की धूप

शंकर दयाल सिंह लोकसभाराज्यसभा दोनों के सदस्य रहे किन्तु चूँकि मूलत: वे एक साहित्यकार थे अत: राजनीति में होने वाले दाव पेंच उन्हें रास नहीं आते थे और वे उसकी तेज धूप से बचने के लिये बहुधा साहित्य का छाता तान लिया करते थे। कहने का तात्पर्य यह है कि वे अपने लेखों में उन सबकी बखिया उधेड कर रख देते थे जो उनके शुद्ध अन्त:करण को नीति विरुद्ध लगते थे। जैसे सरकार की ग्रामोत्थान के प्रति तटस्थता का भाव उन्हें सालता था तो वह संसद की चर्चाओं में तो अपनी बात रखते ही थे विविध पत्र-पत्रिकाओं में लेख भी लिखते थे जिन्हें पढकर विरोधी-पक्ष खुश और सत्ता-पक्ष (कांग्रेस), जिसके वे स्वयं सांसद हुआ करते थे, नाखुश रहता था। देखा जाये तो राजनीति में, आज जहाँ प्रत्येक पार्टी ने केवल चाटुकारों की चण्डाल-चौकडी का मजमा जमा कर रक्खा है जिसके कारण राजनीति के तालाब में स्वच्छ जल की जगह कीचड ही कीचड नजर आ रही है; वहाँ के प्रदूषित वातावरण में शंकरदयाल सिंह सरीखे कमल की कमी वास्तव में खलती है। उन्होंने लगभग २५ लेख राजनीतिक उठापटक को लेकर ही लिखे जो तत्कालीन समाचारों की सुर्खियाँ तो बने ही, पुस्तकाकार रूप में पुस्तकालयों में उपलब्ध भी हैं।

साहित्य की छाँव

जीवन को धूप-छाँव का खेल मानने वाले शंकर दयाल सिंह का यह मानना एक दम सही था कि जिस प्रकार प्रकृति अपना संतुलन अपने आप कर लेती है उसी प्रकार राजनीति में काम करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को साहित्यकार होना पहली योग्यता का मापदण्ड होना चाहिये। वे अपने से पूर्ववर्ती सभी दिग्गज राजनीतिक व्यक्तियों का उदाहरण प्राय: दिया करते थे और बताते थे कि वे सभी दिग्गज लोग साहित्यकार पहले थे बाद में राजनीतिकार या कुछ भी; जिसके कारण उनके जीवन में निरन्तर सन्तुलन बना रहा और वे देश के साथ कभी धोखा नहीं कर पाये। आज जिसे देखो वही राजनीति को व्यवसाय की तरह समझता है सेवा की तरह नहीं; यही कारण है कि सर्वत्र अशान्ति का साम्राज्य है। हालात यह हैं कि आजकल राजनीति की धूप में नेताओं के पाँव कम, जनता के अधिक झुलस रहे हैं। उन्हीं के शब्दों में - "मैंने स्वयं राजनीति से आसव ग्रहण कर उसकी मस्ती साहित्य में बिखेरी है। अनुभव वहाँ से लिये, अनुभूति यहाँ से। मरण वहाँ से वरण किया जीवन यहाँ से। वहाँ की धूप में जब-जब झुलसा, छाँव के लिये इस ओर भागा। लेकिन यह सही है कि धूप-छाँव का आनन्द लेता रहा, आँख-मिचौनी खेलता रहा।"[3]

भाषा की भँवर में

भारतवर्ष को स्वतन्त्रता के पश्चात यदि कोई एक नीति एकजुट रख सकती थी तो वह केवल एक भाषागत राष्ट्रीय-नीति ही रख सकती थी किन्तु हमारे देश के कर्णधारों ने इस ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया अपितु एक के बजाय अनेक भाषाओं के भँवर-जाल में उलझाकर डूब मरने के लिये विवश कर दिया है। जब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम अथवा हमारी आजादी का युद्ध एक भाषा हिन्दी के माध्यम से लडा गया, उसमें किसी भी प्रान्त-भाषा-भाषी ने यह अडंगा नहीं लगाया कि पहले उनकी भाषा सीखो तभी वे एकजुट होकर तुम्हारा साथ देंगे अन्यथा नहीं देंगे। इस तरह यदि करते तो क्या कभी १९४७ में हिन्दुस्तान आजाद हो सकता था? कदापि नहीं। राष्ट्रभाषा तो एक ही हो सकती है अनेक तो नहीं हो सकतीं। यदि राष्ट्र-भाषायें एक के स्थान पर १५ या २० कर दी जायेंगी तो निश्चित मानिये प्रान्तीयता का भाव प्रत्येक के मन में पैदा होगा और उसका दुष्परिणाम यह होगा कि यह राष्ट्र विखण्डन की ओर अग्रसर होगा, एकता की ओर नहीं।

यायावरी के अनुभव

शंकर दयाल सिंह चूँकि सांसद भी रहे और संसदीय कार्य-समितियों में उनकी पैठ भी बराबर बनी रही अतएव उन्हें सरकारी संसाधनों के सहारे विभिन्न देशों व स्थानों की यात्रायें करने का सुख भी उपलब्ध हुआ। परन्तु उन्होंने वह सुख अकेले न उठाकर अपने साहित्यिक मित्रों को भी उपलब्ध कराया तथा लेखों के माध्यम से अपने पाठकों को भी पहुँचाया। सोवियत संघ की राजधानी मास्को से लेकर सूरीनाम और त्रिनिदाद तक की महत्वपूर्ण यात्राओं के वृतान्त पढकर हमें यह लगता ही नहीं कि शंकर दयाल सिंह हमारे बीच नहीं हैं। अपितु कभी-कभी तो ऐसा आभास-सा होता है जैसे वह हमारे इर्द-गिर्द घूमते हुए लट्टू की भाँति गतिमान इस भूमण्डल के चक्कर अभी भी लगा रहे हैं। पारिजात प्रकाशन, पटना से प्रथम बार सन् १९९२ में प्रकाशित पुस्तक राजनीति की धूप : साहित्य की छाँव में[4] दिये गये उनकी यायावरी (घुमक्कडी वृत्ति) के अनुभव बडे ही रोचक हैं।

रचना संसार

सन १९७७ से 'सोशलिस्ट भारत' में उनके लेख प्रकशित होने प्रारम्भ हुए जो सन १९९२ तक अनवरत रूप से छपते ही रहे ऐसा उल्लेख उनकी बहुचर्चित पुस्तक राजनीति की धूप : साहित्य की छाँव में[5] मिलता है। इसी उल्लेख के आगे दी गयी शंकर दयाल सिंह की प्रकाशित पुस्तकों की सूची इस प्रकार है:
  1. राजनीति की धूप:साहित्य की छाँव
  2. इमर्जेन्सी:क्या सच, क्या झूठ
  3. परिवेश का सुख
  4. मैने इन्हें जाना
  5. यदा-कदा
  6. भीगी धरती की सोंधी गन्ध
  7. अपने आपसे कुछ बातें
  8. आइये कुछ दूर हम साथ चलें
  9. कहीं सुबह:कहीं छाँव
  10. जनतन्त्र के कठघरे में
  11. जो साथ छोड गये
  12. भाषा और साहित्य
  13. मेरी प्रिय कहानियाँ
  14. एक दिन अपना भी
  15. कुछ बातें:कुछ लोग
  16. कितना क्या अनकहा
  17. पह्ली बारिस की छिटकती बूँदें
  18. बात जो बोलेगी
  19. मुरझाये फूल:पंखहीन
  20. समय-सन्दर्भ और गान्धी
  21. समय-असमय
  22. यादों की पगडण्डियाँ
  23. कुछ ख्यालों में:कुछ ख्वाबों में
  24. पास-पडोस की कहानियाँ
  25. भारत छोडो आन्दोलन

सम्मान व पुरस्कार

राष्ट्रभाषा हिन्दी के लिये शंकर दयाल सिंह ने आजीवन आग्रह भी किया, युद्ध भी लडा और यदा-कदा आहत भी हुए। इस सबके बावजूद उन्हें सन् १९९३ में हिन्दी सेवा के लिये अनन्तगोपाल शेवडे हिन्दी सम्मान तथा सन् १९९५ में गाडगिल राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा गया परन्तु इससे वे मानसिक रूप से पूर्णत: सन्तुष्ट कभी नहीं हुए। निस्सन्देह शंकर दयाल सिंह पुरस्कार या सम्मान पाकर अपनी बोलती बन्द रखने वालों की श्रेणी के व्यक्ति नहीं, अपितु और अधिक प्रखरता से मुखर होने वालों की श्रेणी के व्यक्ति थे। यही कारण था कि प्रतिष्ठित लेखक के रूप में केन्द्र सरकार ने भले ही कोई पुरस्कार या सम्मान न दिया हो, जिसके वे वास्तविक रूप से अधिकारी थे; परन्तु पूरे भारतवर्ष से कई संस्थाओं, संगठनों व राज्य-सरकारों से उन्हें अनेकों पुरस्कार प्राप्त हुए।

सन्दर्भ

1.       व्होरा आशा रानी मेरे ये आदरणीय और आत्मीय पृष्ठ १४६
2.       व्होरा आशा रानी मेरे ये आदरणीय और आत्मीय पृष्ठ १५४
3.       सिंह शंकर दयाल राजनीति की धूप : साहित्य की छाँव पृष्ठ ११७
4.       सिंह शंकर दयाल राजनीति की धूप : साहित्य की छाँव पृष्ठ ३०१ से ३३१ तक
5.       सिंह शंकर दयाल राजनीति की धूप : साहित्य की छाँव पृष्ठ ३४४-३४५
  1. शंकर दयाल सिंह राजनीति की धूप : साहित्य की छाँव १९९२ पटना पारिजात प्रकाशन
  2. आशारानी व्होरा मेरे ये आदरणीय और आत्मीय २००२ नई दिल्ली नमन प्रकाशन ISBN 81-87368-07-1

बाहरी कड़ियाँ

  1. http://krantmlverma.blogspot.com/2011/07/shankar-dayal-singh.html





Shankar Dayal Singh

From Wikipedia, the free encyclopedia
Dr. Shankar Dayal Singh
Shankar Dayal Singh.jpg
Dr. Shankar Dayal Singh (1937–1995)
Member of Lok Sabha
In office
1971-1977
Constituency
Member of Rajya Sabha
In office
1990-1995
Personal details
Born
27 December 1937 Aurangabad, Bihar
Died
26 November 1995 (aged 57)
In train at Tundla
Political party
Spouse(s)
Smt. Kanan Bala Singh
Children
Ranjan Kumar Singh (Son)
Rajesh Kumar Singh (Son)
Rashmi Singh (Daughter)
Occupation
Profession
Litterateur and parliamentarian Shankar Dayal Singh (Hindi: डा० शंकर दयाल सिंह) was twice elected to the Parliament of India. He was one of the youngest members of the Fifth Lok Sabha, in which he represented the Chatra parliamentary constituency in Bihar (now in Jharkhand). Contesting his maiden Lok Sabha election in 1971, he defeated Smt. Vijaya Raje, the wife of Sri Kamakhya Narayan Singh, Raja of Ramgarh.[1] He was again elected to the upper house, the Rajya Sabha, in 1990 from Bihar.[2]
Dr. Singh was a prolific author and a popular columnist. He authored more than thirty books and edited many more. He was a staunch supporter of Hindi and the Indian Languages. As the Vice Chairman of the Parliamentary Committee on Official Languages, he promoted the use of Hindi and other Indian languages in official work and also encouraged various Public Sector Enterprises (PSE) to come out with their house magazines in vernacular. As a mark of respect for his untiring services several PSEs have instituted annual awards in his memory.[3]
Singh was equally admired and loved by all across the party line.[4] He died of cardiac arrest during a train journey from Patna to New Delhi in the midway at Tundla on 26 November 1995.

Contents

75th Birth Anniversary

Shankar Amrit Mahotsava Logo.jpg
His 75th Birth Anniversary was celebrated from 27 December 2011 to 27 December 2012 as Amrit Mahotsav (Hindi : अमृत महोत्सव) in the country with much fanfare and enthusiasm. The celebrations started with a grand program at New Delhi on 27 December 2011. Programs were held at Goa (February 2012: organized by the Gomantak Rashtrabhasha Vidyapeeth), Indore (July 2012; organized by Sri Madhya Bharat Hindi Sahitya Samiti [5] and by Shankar Amrit Mahotsava Samiti, Aurangabad [Bihar]). Salasar (Rajasthan), Chennai, Rishikesh and Patna.
To mark the Shankar Amrit Mahotsava, Singh's 75th birth anniversary, the Government of Bihar named an important road stretch from NH2 near Deo More (Hindi :
देव मोड़) to Bhawanipur in Aurangabad district after the famous Hindi laureate.[6]
A Felicitation Volume entitled Shankar Dayal Singh: Rajniti Ki Dhoop; Sahitya Ki Chhanv (Hindi :
शंकर दयाल सिंह : राजनीती की धूप; साहित्य की छाँव ) was also released on the occasion of his 75th Birth Anniversary and a copy of it was presented to the President of India Smt. Pratibha Devisingh Patil at the Rashtrapati Bhavan. [7]

Memorial Awards

About a dozen Public Sector Enterprises of India, including the State Trading Corporation of India (New Delhi), HL Life Care Limited (Thiruvanantpuram), NHDC (Bhopal), Securities and Exchange Printing Construction Corporation Limited, Container Corporation of India (New Delhi), PEC Limited (New Delhi), Drazing Corporation of India (Vishakhapattanam), India Infrastructure Finance Company Limited (New Delhi), Hindustan Aeronautics Limited (Bangalore) and National Seeds Corporation (New Delhi) have instituted various annual awards in the memory of the great scholar and Hindi patriarch. [3]
An award by the name of Dr. Shankar Dayal Singh Jan Bhasha Samman (
डा० शंकर दयाल सिंह जन भाषा सम्मान) has been instituted in his memory by the Shankar Sanskriti Pratishan. The first award was presented to International Hindi Association of the USA by Honorable Speaker, Lok Sabha Smt. Meira Kumar in a function held at New Delhi on 27 December 2012. [8]

Early life

He was born in Bhawanipur village of Aurangabad, Bihar into a Rajput family to Sri Kamta Prasad Singh 'Kam'. He lost his mother at a very early age and was brought up by his grandmother and paternal aunts. He was a brilliant student of exceptional merit right from his early childhood.

Father

His father Sri Kamta Prasad Singh 'Kam' was a freedom fighter and was close to Shri Sri Krishna Sinha, the first Chief Minister of Bihar. He himself was a writer of extraordinary merit and authored more than a dozen books. He was also a Member of the Legislative Council (MLC) in Bihar.[9]

Education

Singh got his primary education at home and went on to study at the Rajghat Besant School in Benaras. He received his B.A. degree from the Banaras Hindu University, followed by M.A. degree from the Patna University. Later, he was awarded D.Litt. by the Vikramshila University.

Career

Singh was a prolific writer and a published author of over 30 books. His memoirs and travelogues found place in almost all the esteemed periodicals of the times, such as the Dharam Yug, Saptahik Hindustan, Kadambini, Dinmaan, Ravivaar etc. besides various news papers like the Nav Bharat Times, Hindustan, Lokmat Samachar, Jansatta, Dainik Jagran, Prabhat Khabar etc. He was also the editor of Mukta Kantha, a literary Hindi magazine. He founded Parijat Prakashan in Patna that became one of the premier Hindi publication houses in eastern India. He was conferred with the title of Bihar Ratna in 1990 and was felicitated with the Anant Gopal Shevade Hindi Samman in 1993, for his contributions to the society and literature.

Indian National Congress

Besides being one of the youngest MPs in the Fifth Lok Sabha, we was also an elected member of the Central Election Committee (CEC) of the ruling Indian National Congress.He was a special invitee to the Congress Working Committee (CWC). Up against a popular anti-Indira wave in 1977, he lost to Sri Sukhdev Prasad Verma of BLD.[10]

Janata Party

In 1984, he joined the Janata Party and unsuccessfully contested the parliamentary election from Aurangabad, Bihar, but still he was able to shake the bastion of the Rajput Supremo Sri Satyendra Narayan Sinha as he had to trail in one of the assembly segments for the first time.[11]

Janata Dal

Singh was one of the founder members of the Jan Morcha with Sri Vishwanath Pratap Singh and raised it in Bihar almost solely. Jan Morcha later merged into the Janata Dal. Thereafter, he was elected to the Rajya Sabha in 1990, the office that he held until his death.

Parliamentary committees

He served as a Member on various Parliamentary Committees. His contribution as the Member of the Parliamentary Committee on Official Languages deserves special mention. Later, he rose to become its Deputy Chairman (07.06.1994 to 26.11.1995).[12] He was also on the Panel of Vice-Chairmen of the Rajya Sabha (1990–92).[13]

Manifold services

A widely travelled person, he made valuable contribution in the fields of literature, education, culture, social work and labour welfare. He served as the secretary of B.D. College, Patna for almost a decade and held this post until the collage became a constituent collage of the Magadh University. He was also associated with many other academic institutions like the Balika Vidyapeeth, Lakhisarai; Deogarh Vidyapeeth, Deogarh and Madhustahli, Madhupur. He also served as the Deputy Chairman of the Delhi Public Library and the Kendriya Hindi Sansthan (en.Central Hindi Institute). Earlier, he was a Director on the Board of Samachar Bharti, a news agency for vernacular languages; and went on to become its Chairman. He authored more than thirty books and edited many others. He was a popular columnist for Hindi dailies and periodicals.

Personal life

A true humanitarian, he was a friend of all and a foe of none. Even being in politics, he did not let himself be bound in the shackles of the party that he represented. He was equally admired and loved by all across the party line. His sudden demise in the night of 26 November 1995, in a train journey between Patna and New Delhi at Tundla, left his family of friends, admirers and followers shocked and surprised.[4] He was survived by his wife Kanan Bala Singh, an educationist, and three children: viz Ranjan Kumar Singh, a journalist, Rajesh Kumar Singh and Rashmi Singh, both in the civil services.[13][14] His wife, Kanan Bala Singh published her reminiscence on the life of her husband titled Mere Sahchar (English: my co-partner) in 2001.[15]

Published works

  • Yudh Ke Chaurahe Tak[16]
  • Yudh Ke Aas Pass[17]
  • Gandhi Ke Desh Se, Lenin Ke Desh Mein[18]
  • Kitna Kya Ankaha[19]
  • Emergency: Kya Sachh, Kya Jhooth[20]
  • Emergency: Fact and Fiction[21]
  • Kuchh Batein, Kuchh Log[22]
  • Ek Din Apna Bhi 1980
  • Hindi Sahitya Katipaya More (Hindi), 1980
  • Samaya; Asamaya (Hindi), 1980
  • Baat Jo Bolegi, (Hindi), 1982
  • Paas Se Dekhne Ka Sukh (Hindi)[23]
  • Jo Chhor Gaye Veh Bhi Rahenge (Hindi)[24]
  • Bheegi Dharti Ki Sondhi Gandh (Hindi)[25]
  • Parivesh Ka Sukh (Hindi)[26]
  • Rajniti Ki Dhoop, Sahitya Ki Chhanva (Hindi)[27]
  • Dhara Ke Is Par, Dhara Ke Us Par (Hindi)[28]
  • Surbhit Smritiyan (Hindi)[29]
  • Yeh Kahani Nahin (Hindi)[30]
  • Gandhi's First Step: Champaran Movement[31]
  • Mahatma Gandhi: Pratham Darshan, Pratham Anubhuti (Hindi)[28]
  • Mahatma Gandhi: Satya Se Satyagrah Tak (Hindi)[32]
  • Gandhi Aur Ahinsak Andollan (Hindi)[33]
  • Hindi: Rashtra Bhasha; Raj Bhasha; Jan Bhasha[34]
  • Khile Gulab Ki Pankhuri (Hindi)[35]
  • Bihar : Ek Sanstkritik Vaibhav(Hindi)[36][37]

Edited works

  • Pandit Motilal Nehru, a Great Patriot, with D. C. Goswami, R. K. Nayak. National Forum of Lawyers and Legal Aid, 1976
  • Acharya Hazari Prasad Dwivedi Smriti Dharohar (Hindi), Muktakantha Prakashan, 1979
  • Dr. Karan Singh: Ek Saumya Vyaktitva (Hindi), 1981
  • Yaad Ek Yayavar Ki (Hindi), Parijat Prakashan, 1988

Further reading

  • Mere Sahchar (Hindi) by Kanan Bala Singh. Pārijat Prakashan, Patna, 2001.
  • Indradhanushi Yaden (Hindi). Prabhat Prakashan. 1998. ISBN 81-7315-228-4.
  • Shankar Dayal Singh : Rajniti Ki Dhoop; Sahitya Ki Chhanv (Hindi) Parijat ISBN 81-903561-3-5.

References

1.       Lok Sabha Results 1971 [1] Page 101
3.       News on Hindi Home Page [2]
7.       Press Information Bureau
8.       Lok Sabha Website
10.   Lok Sabha Results 1977 [3] Page 103
11.   Lok Sabha Results 1984 [4] Page 85
16.   Parijat Prakashan 1970 Patna
17.   Star Pocket Books 1972 Delhi
18.   Star Pocket Books 1974 Delhi
19.   Parijat Prakashan 1974 Patna
20.   Delhi Printers 1977 Delhi
21.   Delhi Printers 1978 Delhi
22.   Poorvodaya Prakashan, 1978 Patna
23.   Parijat Prakashan 1983 Patna
24.   Anurag Prakashan 1986 Delhi
25.   Parijat Prakashan 1990 Patna
26.   Parijat Prakashan 1991 Patna
27.   Parijat Prakashan 1992 Patna
28.   Prabhat Prakashan 1994 Delhi
29.   Prabhat Prakashan 1994 Delhi ISBN 81-7315-034-6
30.   Prabhat Prakashan 1994 Delhi ISBN 81-7315-033-8
31.   B.R. Pub. Corp. 1994 Delhi ISBN 81-7018-834-2
32.   Abhiruchi Prakashan 1994 Delhi
33.   Kitab Ghar 1995 Delhi ISBN 81-7016-257-2
34.   Kitab Ghar Delhi ISBN 81-7016-290-4
35.   Sri Almora Book Depot 1995 ISBN 818586590
36.   Diamond Pocket Books (P) Ltd. 1999 Delhi ISBN 81-7182-294-0

External links

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

ईर्ष्यालु बहनों की कहानी / अलिफ लैला

रेडियो पत्रकारिता / पत्रकारिता के विभिन्न स्वरूप

कौन है हिन्दी की पहली कहानी ?