.सृजन -मूल्यांकन

देव औरंगाबाद बिहार 824202 साहित्य कला संस्कृति के रूप में विलक्ष्ण इलाका है. देव स्टेट के राजा जगन्नाथ प्रसाद सिंह किंकर अपने जमाने में मूक सिनेमा तक बनाए। ढेरों नाटकों का लेखन अभिनय औऱ मंचन तक किया. इनको बिहार में हिंदी सिनेमा के जनक की तरह देखा गया. कामता प्रसाद सिंह काम और इनकi पुत्र दिवंगत शंकर दयाल सिंह के रचनात्मक प्रतिभा की गूंज दुनिया भर में है। प्रदीप कुमार रौशन और बिनोद कुमार गौहर की भी इलाके में काफी धूम रही है.। देव धरती के इन कलम के राजकुमारों की याद में .समर्पित हैं ब्लॉग.

मंगलवार, 3 नवंबर 2015

रीति काल





मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से

इस लेख में सन्दर्भ या सूत्र नहीं दिए गए हैं।
कृपया विश्वसनीय सूत्रों के सन्दर्भ जोड़कर इस लेख में सुधार करें। बिना सूत्रों की सामग्री को हटाया जा सकता है। (जून 2015)
सन् १७०० ई. के आस-पास हिंदी कविता में एक नया मोड़ आया। इसे विशेषत: तात्कालिक दरबारी संस्कृति और संस्कृत साहित्य से उत्तेजना मिली। संस्कृत साहित्यशास्त्र के कतिपय अंशों ने उसे शास्त्रीय अनुशासन की ओर प्रवृत्त किया। हिंदी में 'रीति' या 'काव्यरीति' शब्द का प्रयोग काव्यशास्त्र के लिए हुआ था। इसलिए काव्यशास्त्रबद्ध सामान्य सृजनप्रवृत्ति और रस, अलंकार आदि के निरूपक बहुसंख्यक लक्षणग्रंथों को ध्यान में रखते हुए इस समय के काव्य को 'रीतिकाव्य' कहा गया। इस काव्य की शृंगारी प्रवृत्तियों की पुरानी परंपरा के स्पष्ट संकेत संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, फारसी और हिंदी के आदिकाव्य तथा कृष्णकाव्य की शृंगारी प्रवृत्तियों में मिलते हैं।
इस काल में कई कवि ऐसे हुए हैं जो आचार्य भी थे और जिन्होंने विविध काव्यांगों के लक्षण देने वाले ग्रंथ भी लिखे। इस युग में शृंगार की प्रधानता रही। यह युग मुक्तक-रचना का युग रहा। मुख्यतया कवित्त, सवैये और दोहे इस युग में लिखे गए।
कवि राजाश्रित होते थे इसलिए इस युग की कविता अधिकतर दरबारी रही जिसके फलस्वरूप इसमें चमत्कारपूर्ण व्यंजना की विशेष मात्रा तो मिलती है परंतु कविता साधारण जनता से विमुख भी हो गई।
रीतिकाल के अधिकांश कवि दरबारी थे। केशवदास (ओरछा), प्रताप सिंह (चरखारी), बिहारी (जयपुर, आमेर), मतिराम (बूँदी), भूषण (पन्ना), चिंतामणि (नागपुर), देव (पिहानी), भिखारीदास (प्रतापगढ़-अवध), रघुनाथ (काशी), बेनी (किशनगढ़), गंग (दिल्ली), टीकाराम (बड़ौदा), ग्वाल (पंजाब), चन्द्रशेखर बाजपेई (पटियाला), हरनाम (कपूरथला), कुलपति मिश्र (जयपुर), नेवाज (पन्ना), सुरति मिश्र (दिल्ली), कवीन्द्र उदयनाथ (अमेठी), ऋषिनाथ (काशी), रतन कवि (श्रीनगर-गढ़वाल), बेनी बन्दीजन (अवध), बेनी प्रवीन (लखनऊ), ब्रह्मदत्त (काशी), ठाकुर बुन्देलखण्डी (जैतपुर), बोधा (पन्ना), गुमान मिश्र (पिहानी) आदि और अनेक कवि तो राजा ही थे, जैसे- महाराज जसवन्त सिंह (तिर्वा), भगवन्त राय खीची, भूपति, रसनिधि (दतिया के जमींदार), महाराज विश्वनाथ, द्विजदेव (महाराज मानसिंह)।
रीतिकाव्य रचना का आरंभ एक संस्कृतज्ञ ने किया। ये थे आचार्य केशवदास, जिनकी सर्वप्रसिद्ध रचनाएँ कविप्रिया, रसिकप्रिया और रामचंद्रिका हैं। कविप्रिया में अलंकार और रसिकप्रिया में रस का सोदाहरण निरूपण है। लक्षण दोहों में और उदाहरण कवित्तसवैए में हैं। लक्षण-लक्ष्य-ग्रंथों की यही परंपरा रीतिकाव्य में विकसित हुई। रामचंद्रिका केशव का प्रबंधकाव्य है जिसमें भक्ति की तन्मयता के स्थान पर एक सजग कलाकार की प्रखर कलाचेतना प्रस्फुटित हुई। केशव के कई दशक बाद चिंतामणि से लेकर अठारहवीं सदी तक हिंदी में रीतिकाव्य का अजस्र स्रोत प्रवाहित हुआ जिसमें नर-नारी-जीवन के रमणीय पक्षों और तत्संबंधी सरस संवेदनाओं की अत्यंत कलात्मक अभिव्यक्ति व्यापक रूप में हुई।

परिचय

रीतिकाल के कवि राजाओं और रईसों के आश्रय में रहते थे। वहाँ मनोरंजन और कलाविलास का वातावरण स्वाभाविक था। बौद्धिक आनंद का मुख्य साधन वहाँ उक्तिवैचित्रय समझा जाता था। ऐसे वातावरण में लिखा गया साहित्य अधिकतर शृंगारमूलक और कलावैचित्रय से युक्त था। पर इसी समय प्रेम के स्वच्छंद गायक भी हुए जिन्होंने प्रेम की गहराइयों का स्पर्श किया है। मात्रा और काव्यगुण दोनों ही दृष्टियों से इस समय का नर-नारी-प्रेम और सौंदर्य की मार्मिक व्यंजना करनेवाला काव्यसाहित्य महत्वपूर्ण है।
इस समय वीरकाव्य भी लिखा गया। मुगल शासक औरंगजेब की कट्टर सांप्रदायिकता और आक्रामक राजनीति की टकराहट से इस काल में जो विक्षोभ की स्थितियाँ आई उन्होंने कुछ कवियों को वीरकाव्य के सृजन की भी प्रेरणा दी। ऐसे कवियों में भूषण प्रमुख हैं जिन्होंने रीतिशैली को अपनाते हुए भी वीरों के पराक्रम का ओजस्वी वर्णन किया। इस समय नीति, वैराग्य और भक्ति से संबंधित काव्य भी लिखा गया। अनेक प्रबंधकाव्य भी निर्मित हुए। इधर के शोधकार्य में इस समय की शृंगारेतर रचनाएँ और प्रबंधकाव्य प्रचुर परिमाण में मिल रहे हैं। इसलिए रीतिकालीन काव्य को नितांत एकांगी और एकरूप समझना उचित नहीं है। इस समय के काव्य में पूर्ववर्ती कालों की सभी प्रवृत्तियाँ सक्रिय हैं। यह प्रधान धारा शृंगारकाव्य की है जो इस समय की काव्यसंपत्ति का वास्तविक निदर्शक मानी जाती रही है। शृंगारी काव्य तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है। पहला वर्ग रीतिबद्ध कवियों का है जिसके प्रतिनिधि केशव, चिंतामणि, भिखारीदास, देव, मतिराम और पद्माकर आदि हैं। इन कवियों ने दोहों में रस, अलंकार और नायिका के लक्षण देकर कवित्त सवैए में प्रेम और सौंदर्य की कलापूर्ण मार्मिक व्यंजना की है। संस्कृत साहित्यशास्त्र में निरूपित शास्त्रीय चर्चा का अनुसरण मात्र इनमें अधिक है। पर कुछ ने थोड़ी मौलिकता भी दिखाई है, जैसे भिखारीदास का हिंदी छंदों का निरूपण। दूसरा वर्ग रीतिसिद्ध कवियों का है। इन कवियों ने लक्षण नहीं निरूपित किए, केवल उनके आधार पर काव्यरचना की। बिहारी इनमें सर्वश्रेष्ठ हैं, जिन्होंने दोहों में अपनी "सतसई' प्रस्तुत की। विभिन्न मुद्राओंवाले अत्यंत व्यंजक सौंदर्यचित्रों और प्रेम की भावदशाओं का अनुपम अंकन इनके काव्य में मिलता है। तीसरे वर्ग में घनानंद, बोधा, द्विजदेव ठाकुर आदि रीतिमुक्त कवि आते हैं जिन्होंने स्वच्छंद प्रेम की अभिव्यक्ति की है। इनकी रचनाओं में प्रेम की तीव्रता और गहनता की अत्यंत प्रभावशाली व्यंजना हुई है।
रीतिकाव्य मुख्यत: मांसल शृंगार का काव्य है। इसमें नर-नारीजीवन के रमणीय पक्षों का सुंदर उद्घाटन हुआ है। अधिक काव्य मुक्तक शैली में है, पर प्रबंधकाव्य भी हैं। इन दो सौ वर्षों में शृंगारकाव्य का अपूर्व उत्कर्ष हुआ। पर धीरे धीरे रीति की जकड़ बढ़ती गई और हिंदी काव्य का भावक्षेत्र संकीर्ण होता गया। आधुनिक युग तक आते आते इन दोनों कमियों की ओर साहित्यकारों का ध्यान विशेष रूप से आकृष्ट हुआ।
इतिहास साक्षी है कि अपने पराभव काल में भी यह युग वैभव विकास का था। मुगल दरबार के हरम में पाँच-पाँच हजार रूपसियाँ रहती थीं। मीना बाज़ार लगते थे, सुरा-सुन्दरी का उन्मुक्त व्यापार होता था। डॉ॰ नगेन्द्र लिखते हैं- "वासना का सागर ऐसे प्रबल वेग से उमड़ रहा था कि शुद्धिवाद सम्राट के सभी निषेध प्रयत्न उसमें बह गये। अमीर-उमराव ने उसके निषेध पत्रों को शराब की सुराही में गर्क कर दिया। विलास के अन्य साधन भी प्रचुर मात्रा में थे।" पद्माकर ने एक ही छन्द में तत्कालीन दरबारों की रूपरेखा का अंकन कर दिया है-
गुलगुली गिल में गलीचा हैं, गुनीजन हैं,
चाँदनी है, चिक है चिरागन की माला हैं।
कहैं पद्माकर त्यौं गजक गिजा है सजी
सेज हैं सुराही हैं सुरा हैं और प्याला हैं।
सिसिर के पाला को व्यापत न कसाला तिन्हें,
जिनके अधीन ऐते उदित मसाला हैं।
तान तुक ताला है, विनोद के रसाला है,
सुबाला हैं, दुसाला हैं विसाला चित्रसाला हैं। ६
ऐहलौकिकता, श्रृंगारिकता, नायिकाभेद और अलंकार-प्रियता इस युग की प्रमुख विशेषताएं हैं। प्रायः सब कवियों ने ब्रज-भाषा को अपनाया है। स्वतंत्र कविता कम लिखी गई, रस, अलंकार वगैरह काव्यांगों के लक्षण लिखते समय उदाहरण के रूप में - विशेषकर श्रृंगार के आलंबनों एवं उद्दीपनों के उदाहरण के रूप में - सरस रचनाएं इस युग में लिखी गईं। भूषण कवि ने वीर रस की रचनाएं भी दीं। भाव-पक्ष की अपेक्षा कला-पक्ष अधिक समृद्ध रहा। शब्द-शक्ति पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया, न नाटयशास्त्र का विवेचन किया गया। विषयों का संकोच हो गया और मौलिकता का ह्रास होने लगा। इस समय अनेक कवि हुए— केशव, चिंतामणि, देव, बिहारी, मतिराम, भूषण, घनानंद, पद्माकर आदि। इनमें से केशव, बिहारी और भूषण को इस युग का प्रतिनिधि कवि माना जा सकता है। बिहारी ने दोहों की संभावनाओं को पूर्ण रूप से विकसित कर दिया। आपको रीति-काल का प्रतिनिधि कवि माना जा सकता है।
इस काल के कवियों को तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है-
(१) रीतिबद्ध कवि
(२) रीतिमुक्त कवि
(३) रीतिसिद्ध कवि
विद्वानों का यह भी मत हॅ कि इस काल के कवियों ने काव्य में मर्यादा का पूर्ण पालन किया है। घोर शृंगारी कविता होने पर भी कहीं भी मर्यादा का उल्लंघन देखने को नहीं मिलता है।

यह भी देखें

हिन्दी साहित्य
आदिकाल
भक्ति काल
आधुनिक हिंदी पद्य का इतिहास

बाहरी कड़िया

  • हिन्दी रीति साहित्य (गूगल पुस्तक ; लेखक - भगीरथ मिश्रा)
  • मध्ययुगीन प्रेमाख्यान (गूगल पुस्तक ; लेखक - श्याम मनोहर पाण्डेय)
  • कविता कोश - हिन्दी काव्य का अकूत खज़ाना
  • रीतिकाव्य के गुणदोष
श्रेणियाँ:
  • हिन्दी
  • साहित्य

दिक्चालन सूची

  • अंक परिवर्तन
  • खाता बनाएँ
  • लॉग इन
  • लेख
  • संवाद
  • पढ़ें
  • सम्पादन
  • इतिहास देखें
- नवंबर 03, 2015
इसे ईमेल करेंइसे ब्लॉग करें! X पर शेयर करेंFacebook पर शेयर करेंPinterest पर शेयर करें

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

नई पोस्ट पुरानी पोस्ट मुख्यपृष्ठ
सदस्यता लें टिप्पणियाँ भेजें (Atom)

हिंदी दिवस लेख श्रृंखला 2/3 अतुल प्रकाश

अतुल प्रकाश  हिंदी निबंध श्रृंखला: हिंदी दिवस पखवाड़ा-२ *हिन्दी के सबसे विवादास्पद शब्द : नीच से गोदी मीडिया तक, शब्दों की समय-यात्रा- अतुल ...

  • दो सौ पौराणिक कथाएं
    प्रस्तुति-  कृति शरण / मेहर स्वरूप / सृष्टि शरण / अम्मी  शरण / दृष्टि शरण पौराणिक कथा, कहानियों का संग्रह 1 to 10 पौराणिक कह...
  • हिंदी मे सबसे अश्लील किताबें
      इच्छा और कामुकता से भरी 15 सर्वश्रेष्ठ भारतीय कामुक पुस्तकें भारत इरॉटिका लेखकों की एक नई नस्ल के साथ फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे की घटना पोस्ट क...
  • चंचल नार के नैन छिपे नहीं…/ कवि गंग
    जी.के. अवधिया के द्वारा 25 Sep 2010. को सामान्य , शाश्वत रचनाएँ , ज्ञानवर्धक लेख कैटेगरी के अन्तर्गत् प्रविष्ट किया गया।    टैग्स:   कवि ...

यह ब्लॉग खोजें

  • मुख्यपृष्ठ

मेरे बारे में

ASBAbalnews.blogsport.com
मेरा पूरा प्रोफ़ाइल देखें

ब्लॉग आर्काइव

  • ►  2025 (10)
    • ►  सितंबर (4)
    • ►  जुलाई (2)
    • ►  मार्च (1)
    • ►  फ़रवरी (2)
    • ►  जनवरी (1)
  • ►  2024 (38)
    • ►  दिसंबर (6)
    • ►  नवंबर (4)
    • ►  अक्टूबर (5)
    • ►  सितंबर (5)
    • ►  अगस्त (1)
    • ►  जुलाई (3)
    • ►  जून (3)
    • ►  मई (1)
    • ►  अप्रैल (1)
    • ►  मार्च (4)
    • ►  फ़रवरी (2)
    • ►  जनवरी (3)
  • ►  2023 (165)
    • ►  दिसंबर (4)
    • ►  नवंबर (1)
    • ►  अक्टूबर (3)
    • ►  सितंबर (13)
    • ►  अगस्त (31)
    • ►  जुलाई (21)
    • ►  जून (3)
    • ►  मई (9)
    • ►  अप्रैल (17)
    • ►  मार्च (21)
    • ►  फ़रवरी (19)
    • ►  जनवरी (23)
  • ►  2022 (398)
    • ►  दिसंबर (38)
    • ►  नवंबर (25)
    • ►  अक्टूबर (34)
    • ►  सितंबर (39)
    • ►  अगस्त (36)
    • ►  जुलाई (15)
    • ►  जून (25)
    • ►  मई (25)
    • ►  अप्रैल (44)
    • ►  मार्च (38)
    • ►  फ़रवरी (20)
    • ►  जनवरी (59)
  • ►  2021 (513)
    • ►  दिसंबर (56)
    • ►  नवंबर (57)
    • ►  अक्टूबर (71)
    • ►  सितंबर (38)
    • ►  अगस्त (51)
    • ►  जुलाई (19)
    • ►  जून (38)
    • ►  मई (23)
    • ►  अप्रैल (36)
    • ►  मार्च (39)
    • ►  फ़रवरी (40)
    • ►  जनवरी (45)
  • ►  2020 (223)
    • ►  दिसंबर (8)
    • ►  नवंबर (3)
    • ►  अक्टूबर (6)
    • ►  सितंबर (6)
    • ►  अगस्त (8)
    • ►  जुलाई (63)
    • ►  जून (49)
    • ►  मई (24)
    • ►  अप्रैल (50)
    • ►  मार्च (6)
  • ►  2017 (17)
    • ►  जुलाई (3)
    • ►  जून (1)
    • ►  मई (1)
    • ►  मार्च (8)
    • ►  फ़रवरी (3)
    • ►  जनवरी (1)
  • ►  2016 (119)
    • ►  सितंबर (6)
    • ►  अगस्त (15)
    • ►  जुलाई (10)
    • ►  जून (6)
    • ►  मई (5)
    • ►  अप्रैल (2)
    • ►  मार्च (11)
    • ►  फ़रवरी (16)
    • ►  जनवरी (48)
  • ▼  2015 (283)
    • ►  दिसंबर (39)
    • ▼  नवंबर (142)
      • बर्फ़ में फंसी मछली / दयानंद पांडेय
      • भुवनेश्वर
      • बिहारी
      • भूषण
      • चंदबरदाई
      • मीराबाई के दोहे
      • सआदत हसन मंटो
      • इंशा अल्ला ख़ाँ
      • काशी के साहित्यकार
      • हिन्दी साहित्य के इतिहास में द्विवेदी युग
      • हिन्दी भाषा का इतिहास और काल खंड
      • कौन है हिन्दी की पहली कहानी ?
      • हिन्दी के 10 बेमिशाल कालजयी नाटक
      • बादशाह का दिल
      • मातृृभारती ई बुक प्रकाशक का किताब संसार
      • योनिज तो हम सभी है.. / -भँवर मेघवंशी
      • प्रियदर्शी की शायरी
      • अकबर इलाहाबादी
      • अंधेर नगरी .....
      • हिन्दी उपन्यास का इतिहास
      • आकाश चारी / से.रा. यात्री
      • नसीहतों का दफ्तर / प्रेमचंद
      • सालवती / जयशंकर प्रसाद
      • पंचायत / जयशंकर प्रसाद
      • खंडहर की लिपि / जयशंकर प्रसाद
      • हाथी की फाँसी गणेशशंकर विद्यार्थी
      • मीर तकी मीर की रचनाएं
      • ओ देस से आने वाले बता! अख्तर शीरानी
      • चोर पुराण -- विमल कुमार
      • चारुमित्रा -- रामकुमार वर्मा
      • रीढ़ की हड्डी -- जगदीशचंद्र माथुर
      • मेघदूत --- कालिदास
      • विक्रमोर्वशीयम् --- कालिदास
      • एक साम्यहीन साम्यवादी --- भुवनेश्वर
      • पतित (शैतान) --- भुवनेश्वर
      • प्रतिभा का विवाह -- भुवनेश्वर
      • श्यामा : एक वैवाहिक विडंबना --- भुवनेश्वर
      • श्रीचंद्रावली नाटिका -- भारतेंदु हरिश्चंद्र
      • भारतदुर्दशा भारतेंदु हरिश्चंद्र
      • बन्दर सभा भारतेंदु हरिश्चंद्र
      • प्रेमजोगिनी -- भारतेंदु हरिश्चंद्र
      • अंधेर नगरी चौपट्ट राजा टके सेर भाजी टके सेर खाजा -...
      • सबै जात गोपाल की --- भारतेंदु हरिश्चंद्र
      • एक अद्भुत अपूर्व स्वमप्न -- भारतेंदु हरिश्चंद्र
      • श्री रामलीला भारतेंदु हरिश्चंद्र
      • सत्य हरिश्चन्द्र / भारतेंदु हरिश्चंद्र
      • गबरघिचोर / भिखारी ठाकुर
      • बिदेसिया / भिखारी ठाकुर
      • पत्थर की पुकार / जयशंकर प्रसाद
      • छोटा जादूगर / जयशंकर प्रसाद
      • एक अधूरी प्रेमकथा / इला प्रसाद
      • उस पार का योगी / जयशंकर प्रसाद
      • इतने बुरे दिन / सुभाष नीरव
      • इज्जत का खून / प्रेमचंद
      • इंद्रजाल / जयशंकर प्रसाद
      • ईर्ष्यालु बहनों की कहानी / अलिफ लैला
      • ईश्वरीय न्याय / प्रेमचंद
      • कबीर की साखी-1
      • इश्तिहारी शहीद / प्रेमचंद
      • उर्वशी / जयशंकर प्रसाद
      • आहुति / प्रेमचंद
      • आल्हा / प्रेमचंद
      • आना पलामू / श्याम बिहारी श्यामल
      • आदर्श विरोध / प्रेमचंद
      • आदमी और कुत्ता / वनमाली
      • आजादी: एक पत्र / भुवनेश्वर
      • आत्माराम / प्रेमचंद
      • आगा-पीछा / प्रेमचंद
      • आखिरी हीला / प्रेमचंद
      • आख़िरी मंज़िल / प्रेमचंद
      • आकाशदीप / जयशंकर प्रसाद
      • आँधी / जयशंकर प्रसाद
      • अशोक / जयशंकर प्रसाद
      • अवांछित बेटियां / जयनन्दन
      • अवगुंठन / रवीन्द्रनाथ ठाकुर
      • अलग्योझा / प्रेमचंद
      • अर्थ / जयशंकर
      • अमृत / प्रेमचंद
      • अमिट स्मृति / जयशंकर प्रसाद
      • अनमोल भेंट / रवीन्द्रनाथ ठाकुर
      • अनाथ / रवीन्द्रनाथ ठाकुर
      • अनिष्ट शंका / प्रेमचंद
      • अनुभव / प्रेमचंद
      • अन्धा, कुबड़ा और राजकुमारी / पंचतंत्र
      • अन्धे भिखारियों का गीत /
      • अपनी करनी / प्रेमचंद
      • अपरिचिता / रवीन्द्रनाथ ठाकुर
      • अब उठूँगी राख से / जया जादवानी
      • अब और नही / सुभाष नीरव
      • अभिलाषा / प्रेमचंद
      • अग्नि-समाधि / प्रेमचंद
      • अख़बार में नाम/ यशपाल
      • अंधेर / प्रेमचंद
      • अंधकार / सुदर्शन
      • मैकलुस्कीगंज की कहानी
      • बटरोही
      • हिन्दी पुस्तकों की सूची
      • सफेद सांप की कहानी
      • अब्दुल हमीद 'अदम'
      • मिर्ज़ा गालिब
    • ►  अक्टूबर (38)
    • ►  सितंबर (24)
    • ►  अगस्त (5)
    • ►  जुलाई (4)
    • ►  अप्रैल (1)
    • ►  मार्च (7)
    • ►  फ़रवरी (6)
    • ►  जनवरी (17)
  • ►  2014 (134)
    • ►  दिसंबर (7)
    • ►  नवंबर (45)
    • ►  अक्टूबर (18)
    • ►  सितंबर (26)
    • ►  अगस्त (1)
    • ►  जुलाई (7)
    • ►  जून (2)
    • ►  मई (8)
    • ►  अप्रैल (3)
    • ►  मार्च (15)
    • ►  फ़रवरी (2)
  • ►  2013 (22)
    • ►  सितंबर (3)
    • ►  अगस्त (7)
    • ►  जुलाई (2)
    • ►  फ़रवरी (3)
    • ►  जनवरी (7)
  • ►  2012 (70)
    • ►  दिसंबर (10)
    • ►  नवंबर (4)
    • ►  सितंबर (6)
    • ►  अगस्त (7)
    • ►  जुलाई (17)
    • ►  अप्रैल (11)
    • ►  मार्च (3)
    • ►  फ़रवरी (11)
    • ►  जनवरी (1)
  • ►  2011 (114)
    • ►  दिसंबर (3)
    • ►  अक्टूबर (3)
    • ►  सितंबर (4)
    • ►  अगस्त (15)
    • ►  जुलाई (23)
    • ►  जून (31)
    • ►  मई (3)
    • ►  अप्रैल (3)
    • ►  मार्च (3)
    • ►  फ़रवरी (1)
    • ►  जनवरी (25)
Hindi Blog Tips

बुरे बर्ताव की शिकायत करें

वाटरमार्क थीम. Blogger द्वारा संचालित.