नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं / रामधारी सिंह दिनकर

 राष्ट्रकवि श्रद्धेय रामधारी सिंह " दिनकर " 


*01 जनवरी के संदर्भ में -*


_*ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं*_

_*है अपना ये त्यौहार नहीं*_

_*है अपनी ये तो रीत नहीं*_

_*है अपना ये व्यवहार नहीं*_

_*धरा ठिठुरती है सर्दी से*_

_*आकाश में कोहरा गहरा है*_

_*बाग़ बाज़ारों की सरहद पर*_

_*सर्द हवा का पहरा है*_

_*सूना है प्रकृति का आँगन*_

_*कुछ रंग नहीं , उमंग नहीं*_

_*हर कोई है घर में दुबका हुआ*_

_*नव वर्ष का ये कोई ढंग नहीं*_

_*चंद मास अभी इंतज़ार करो*_

_*निज मन में तनिक विचार करो*_

_*नये साल नया कुछ हो तो सही*_

_*क्यों नक़ल में सारी अक्ल बही*_

_*उल्लास मंद है जन -मन का*_

_*आयी है अभी बहार नहीं*_

_*ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं*_

_*है अपना ये त्यौहार नहीं*_

_*ये धुंध कुहासा छंटने दो*_

_*रातों का राज्य सिमटने दो*_

_*प्रकृति का रूप निखरने दो*_

_*फागुन का रंग बिखरने दो*_

_*प्रकृति दुल्हन का रूप धार*_

_*जब स्नेह – सुधा बरसायेगी*_

_*शस्य – श्यामला धरती माता*_

_*घर -घर खुशहाली लायेगी*_

_*तब चैत्र शुक्ल की प्रथम तिथि*_

_*नव वर्ष मनाया जायेगा*_

_*आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर*_

_*जय गान सुनाया जायेगा*_

_*युक्ति – प्रमाण से स्वयंसिद्ध*_

_*नव वर्ष हमारा हो प्रसिद्ध*_

_*आर्यों की कीर्ति सदा -सदा*_

_*नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा*_

_*अनमोल विरासत के धनिकों को*_

_*चाहिये कोई उधार नहीं*_

_*ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं*_

_*है अपना ये त्यौहार नहीं*_

_*है अपनी ये तो रीत नहीं*_

_*है अपना ये त्यौहार नहीं*_


जागो देशवासियों - जगाओ जन जन को - - - - 


*✍🏻राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर*

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