स्वामी विवेकानंद का संदेश किसे याद है




रवींद्र नाथ टैगोर का 150वां जन्मदिन मनाने के बाद अब बारी है स्वामी विवेकानंद का जन्मदिन मनाने की. दोनों बंगाल के थे, लेकिन भारत के संदर्भ में दोनों का विजन का़फी अलग था. शिकागो में हुई विश्व धर्म संसद में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के बाद विवेकानंद का़फी प्रसिद्ध हो गए. कदाचित वह आधुनिक भारत के पहले व्यक्ति थे, जिन्हें वैश्विक प्रसिद्धि प्राप्त हुई थी. वह न केवल अच्छे वक्ता थे, बल्कि अच्छे रूप-रंग, अच्छी आवाज़ और गेरुआ वस्त्र के कारण पवित्र इंसान भी दिखते थे. अब यही गेरुआ वस्त्र स्वामियों की पोशाक बन गया है. दूसरी ओर टैगोर ब्रह्म समाज की परंपरा में पले थे. भारतीय रहस्यवाद के माध्यम से विश्व को एशिया का संदेश देकर उन्होंने भी अंग्रेजी समाज पर चोट की, लेकिन उनका धर्म वैश्विक था. सबसे बड़ी बात है कि वह संत नहीं थे, लेकिन टैगोर एक महान उपन्यासकार, नाटककार, कहानीकार, चित्रकार एवं संगीतकार थे.
20वीं सदी के मध्य में राजनीतिक हिंदूवाद रूढ़िवादी हो गया और जातिवाद की समाप्ति, जिसे सुधार का मुख्य आधार होना चाहिए था, को ऐसे ही छोड़ दिया गया. हम लोग अभी तक इसकी क़ीमत चुका रहे हैं. हर दिन दलित महिलाओं और पुरुषों के ऊपर हो रहे अत्याचार की खबर आती है. स्वामी लोग अब इस देश में स़िर्फ पूजे जाते हैं. न तो उन्हें पढ़ा जाता है और न गंभीरता से लिया जाता है.
उनकी अधिकांश कृतियां अब भुला दी गई हैं. टैगोर को अब पश्चिमी देशों में नहीं पढ़ा जाता है. यही नहीं, इस महान साहित्यकार की कृतियों को भारत के लोग भी नहीं पढ़ते हैं. यदि किसी भारतीय से टैगोर के बारे में पूछें तो वह केवल भुनभुनाएगा, जवाब कुछ नहीं देगा. साथ ही उसे यह अ़फसोस भी नहीं होगा कि वह इस महान व्यक्ति के बारे में नहीं जानता है. विवेकानंद को भी कोई ज़्यादा नहीं पढ़ता है. विवेकानंद की संपूर्ण कृतियों का जो संकलन है, न तो उसकी छपाई अच्छी है और न उसे बेहतर ढंग से संपादित किया गया है. उनके अनुयायी उनकी पूजा तो करते हैं, परंतु उनके मूल्यों को नहीं समझते. वे सामान्यत: विवेकानंद को नहीं पढ़ते हैं. विवेकानंद आधुनिक भारत के उन लोगों में से हैं, जिन्हें हिंदूवादी भी उतना ही स्वीकार करते हैं, जितना धर्मनिरपेक्ष लोग. दोनों संभवत: इसलिए ऐसा करते हैं, क्योंकि दोनों में से किसी ने भी उन्हें नहीं पढ़ा है. विवेकानंद आधुनिक भारतीय इतिहास के केंद्र में रहे हैं. विवेकानंद गीता की व्याख्या की वजह से नहीं, बल्कि आधुनिक भारतीय समाज का परीक्षण करने की वजह से आकर्षण के केंद्र में रहे हैं. उन्होंने 1894 में अपने एक भारतीय मित्र को लिखा कि धर्म का काम सामाजिक नियम बनाना नहीं है और न लोगों के बीच विभेद करना, लेकिन फिर भी धर्म की अनुमति से आर्थिक स्थितियों ने ही सामाजिक नियम बनाए हैं और सामाजिक मामलों में धर्म ने जो हस्तक्षेप किया, वह इसकी एक भयानक भूल थी. वह मिशन ऑफ वेदांता में लिखते हैं कि उन्हें अपने भारतीय अनुयायियों से कठोर सत्य कहना है. वह कहते हैं कि अगर कोई अंग्रेज किसी भारतीय की हत्या कर देता है या उसके साथ ग़लत व्यवहार करता है तो उसके लिए ज़िम्मेदार कौन है. उसके लिए ज़िम्मेदार अंग्रेज नहीं, बल्कि भारतीय हैं. हम भारतीय ही अपने राष्ट्र और खुद की दुर्दशा के लिए ज़िम्मेदार हैं. हमारे तानाशाह पूर्वजों ने आम जन को तब तक पददलित किया, जब तक कि वे असहाय नहीं हो गए, जब तक कि ग़रीब लोग इस बात को भूले नहीं कि वे भी इंसान हैं.
जब विवेकानंद को ध्यान से पढ़ते हैं तो ऐसा लगता है कि उनके धर्म संबंधी विचार थोड़े जटिल हैं. यह भारतीय जीवन का केंद्रीय तत्व है. भारत की राष्ट्र रूपी इमारत की बुनियाद स्वामी विवेकानंद के इन्हीं विचारों ने रखी है, लेकिन वह यह भी कहते हैं कि धर्म सामाजिक सुधार का शत्रु है. भारत जातीयता का दंश झेल रहा है, पर इसे स्वीकार नहीं करता है. स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि अगर ब्राह्मणों के पास आनुवांशिक आधार पर ही सीखने की योग्यता अछूतों से अधिक है तो फिर ब्राह्मणों की शिक्षा पर धन मत खर्च करो, सारा धन अछूतों की शिक्षा पर खर्च करो, उन्हीं को इसकी ज़रूरत है. विवेकानंद का ब्राह्मण विरोधी विचार का़फी मज़बूत है. जैसा कि वह भारत में मुसलमानों के आगमन के बारे में लिखते हैं कि भारत पर मुस्लिमों का आक्रमण इस कारण संभव हुआ, क्योंकि ब्राह्मणों ने भारतीयों को सांस्कृतिक एकता प्रदान नहीं की. हज़ारों वर्षों तक इन्होंने लोगों के लिए खज़ाना नहीं खोला और सभी आक्रमणकारी भारत को अपने पैरों तले रौंदते रहे. 20वीं सदी के मध्य में राजनीतिक हिंदूवाद रूढ़िवादी हो गया और जातिवाद की समाप्ति, जिसे सुधार का मुख्य आधार होना चाहिए था, को ऐसे ही छोड़ दिया गया. हम लोग अभी तक इसकी क़ीमत चुका रहे हैं. हर दिन दलित महिलाओं और पुरुषों के ऊपर हो रहे अत्याचार की खबर आती है. स्वामी लोग अब इस देश में स़िर्फ पूजे जाते हैं. न तो उन्हें पढ़ा जाता है और न गंभीरता से लिया जाता है.

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