हिंदी का महत्व और विडंबनाएं


सिर्फ मातमपुर्सी से काम नहीं चलने वाला. हिंदी भारतवर्ष में राज-काज की भाषा है, हमारे सम्मान की प्रतीक है और सभी प्रांतीय एवं स्थानीय भाषाएं हिंदी की बहनें. भारतवर्ष में बोली जाने वाली समस्त स्थानीय भाषाओं का एक समान आदर-सम्मान हमारा राष्ट्रधर्म होना चाहिए. डॉ. राम मनोहर लोहिया ने प्रत्येक हिंदीभाषी क्षेत्र के निवासी को सलाह दी थी कि वे कम से कम जहां जिस क्षेत्र या प्रदेश में रह रहे हों, वहां की स्थानीय भाषा को सीखें, उसका आदर करें, उसी स्थानीय भाषा को वहां पर बोलचाल में अपनाएं. इसी के साथ समूचे भारत के लोगों को हिंदी अवश्य सीखने की सलाह भी डॉ. लोहिया ने दी थी. आज हिंदी उस जगह पर नहीं है, जहां उसे होना चाहिए था. हिंदीभाषी क्षेत्रों के शहरी इलाक़ों में रहने वाले लोग हिंदी की जगह अंग्रेजी एवं पाश्चात्य सभ्यता को जाने-अनजाने बढ़ावा देते चले आ रहे हैं. हिंदी समूचे राष्ट्र के लिए सम्मान की प्रतीक होनी चाहिए, परंतु ऐसा हो नहीं पा रहा है.
हम अंग्रेजी भाषा के ज्ञान को कतई ग़लत नहीं मानते. किसी भी भाषा का ज्ञान व्यक्ति के व्यक्तिगत विकास एवं योग्यता के लिए बहुत आवश्यक होता है, लेकिन जब किसी भाषा को किसी देश की मातृभाषा-स्थानीय भाषा पर थोपा जाता है, तब कष्ट होता है. भारत के लोगों को भी चीन, जापान, रूस, फ्रांस एवं स्पेन आदि देशों के लोगों की तरह अंग्रेजी को स़िर्फ एक साधारण भाषा के तौर पर ही लेना चाहिए.
अंग्रेजों के जाने के पश्चात भी अंग्रेजपरस्त लोगों की गुलाम मानसिकता के कारण आज़ाद भारत में आज भी निज भाषा गौरव का बोध परवान नहीं चढ़ पा रहा है. जगह-जगह यानी हर शहर एवं क़स्बे में अंग्रेजी में लिखे बोर्ड देखकर इस भाषाई पराधीनता की वस्तुस्थिति को समझा जा सकता है. आज की शिक्षा बच्चों के लिए बोझ सदृश्य हो गई है. वर्तमान शिक्षा में अंग्रेजी के अनावश्यक महत्व ने आमजन एवं ग़रीबों के बच्चों के विकास को बाधित कर रखा है. जो ग़रीब का बच्चा, आम आदमी का बच्चा हिंदी या अपनी किसी अन्य मातृभाषा में शिक्षा ग्रहण करता है, उसे अपने आप शैक्षिक रूप से पिछड़ा मान लिया जाता है. अंग्रेजी भाषा का झुनझुना उसके हाथों में पकड़ा कर उसके बोल कानों में जबरन डाले जाते हैं. वह बेबस बच्चा दोहरी पढ़ाई करता है यानी एक तो शिक्षा ग्रहण करना और दूसरे पराई भाषा को भी पढ़ना. उस पर अंग्रेजपरस्त लोगों का यह कहना कि अंग्रेजी एक वैश्विक भाषा है, इसका महत्व किसी भी स्थानीय भाषा के महत्व से ज़्यादा है, गुलाम मानसिकता का द्योतक है. इसी गुलाम मानसिकता वाले अंग्रेजपरस्त लोगों ने अंग्रेजी भाषा को आज प्रतिष्ठा का विषय बना लिया है. जबकि सत्य यह है कि आज लोग इस भ्रम में अपने बच्चों को अंग्रेजी की शिक्षा दिलाना चाहते हैं कि अंग्रेजी सीखने के बाद जीविका के तमाम अवसर मिल जाएंगे. दरअसल किसी भी भाषा के बढ़ने के कारकों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह हो गई है कि उस भाषा का प्रत्यक्ष लाभ आदमी को रोजी-रोटी कमाने में मिले. जिस भाषा से ज्ञान और शिक्षा को संगठित करके रोज़गारपरक बना दिया जाता है, वह भाषा आमजन के मध्य लोकप्रिय होती जाती है. आज भारत की भाषाओं पर एक सोची-समझी रणनीति के तहत अंग्रेजी थोप दी गई है. जीविका को अंग्रेजी भाषा का आश्रित बनाकर भारत के लोगों को मानसिक तौर पर गुलाम बना लिया गया है. आज पूरे विश्व में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जहां के निवासियों को अपनी भाषा में बातचीत करने या लिखने-पढ़ने में भी शर्म आने लगी है. भारत के मूल निवासी अधकचरी अंग्रेजी बोलने में गर्व महसूस करते हैं.
हम अंग्रेजी भाषा के ज्ञान को कतई ग़लत नहीं मानते. किसी भी भाषा का ज्ञान व्यक्ति के व्यक्तिगत विकास एवं योग्यता के लिए बहुत आवश्यक होता है, लेकिन जब किसी भाषा को किसी देश की मातृभाषा-स्थानीय भाषा पर थोपा जाता है, तब कष्ट होता है. भारत के लोगों को भी चीन, जापान, रूस, फ्रांस एवं स्पेन आदि देशों के लोगों की तरह अंग्रेजी को स़िर्फ एक साधारण भाषा के तौर पर ही लेना चाहिए. भाषा ज्ञान का पर्यायवाची नहीं होती है. कोई भी राष्ट्र अपनी भाषा में तऱक्क़ी के बेमिसाल मापदंड स्थापित कर सकता है, इसके जीवंत उदाहरण जापान, अमेरिका एवं चीन आदि देश हैं.

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