गुरुवार, 22 फ़रवरी 2024

प्रेमचंद / जयचन्द प्रजापति

 कलम के जादूगर-मुंशी प्रेमचंद्र

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आजादी के पहले भारत की दशा दुर्दशा देखकर सबका कलेजा फट रहा था.दयनीय हालत हमारे देश के समाज की हो गई थी.पीड़ा दर्द से कराहता हमारा समाज दुर्दिन के दौर से गुजर रहा था.यह सब देख कर हमारा साहित्य भी कराह उठा.हिन्दी साहित्य की पीड़ा का जगना स्वाभाविक हो गया था.उसी दुर्दिन से हिन्दी साहित्य के महान कथाकार,उपन्यास सम्राट,कलम के सिपाही के नाम से प्रसिध्द मुँशी प्रेमचन्द्रजी का परिवार गुजर रहा था.देख समाज की हालात से मजबूर हो कर कलम उठ गया और मुंशी प्रेमचन्द्र एक से बढ़कर एक रचना देकर हिन्दी साहित्य का एक महान वृक्ष बन गये.सामाजिक गिरे हालात से गुजर रहे लोगों पर लेखनी चला कर समाज के स्वरूप व बिडम्बना को पूरे विश्व मंच पर रखा.गरीबी नजदीक से मुँशी जी ने देखा,झेला,अनुभव लिया और इस कटु अनुभव को अपनी लेखनी में उतारा.


31जुलाई सन1880 को बनारस शहर से करीब चार मील दूर लमही नामक एक छोटे से गाँव में मुंशी अजायबलाल के घर जन्म हुआ.मुंशी प्रेमचन्द्र का वास्तविक नाम धनपत राय था.मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक था.पिताजी डाकमुंशी के पद पर कार्यरत थे. इस प्रकार नौकरी पिताजी की होने के कारण शुरूआती समय में खाने पीने,पहनने ओढ़ने की तंगी नहीं थी लेकिन इतने उच्च स्तर के नहीं हो सके थे कि ठाठ बाट से रह सके.आर्थिक हालातों से जीवन भर जूझते रहने वाले मुँशी जी तंगी में ही 8 अक्टूबर सन 1936 को 56 वर्ष की अल्पआयु में जलोधर रोग से पीड़ित यह महान लेखक हम लोगों से जुदा हो गया.


पाँच छः साल के उम्र में शिक्षा के लिये लमही गाँव के करीब लालगंज नामक गाँव में एक मौलवी साहब के पास फारसी और उर्दू पढ़ने के लिये भेजा गया और उस पढ़ाई के दौरान पढ़ाई कम हुआ करता था लेकिन हुल्लडबाजी ज्यादा हुआ करता था.गाँव की जिन्दगी थी.गाँव की माटी से जुड़ा हृदय था,माँ व दादी के लाड़ प्यार में बचपन मजे से बीत रहा था लेकिन होनी कौन टाल सकता है.खुशी में पता नहीं कौन नजर लगी कि अचानक माँ की तबियत खराब हो गई और तबियत ऐसी खराब हुई की बालक धनपतराय को इस भरे संसार में अकेला छोड़ दी.उस समय बालक धनपतराय की अवस्था बहुत कम की थी.माँ के जाने के बाद बालक धनपयराय के चेहरे पर वह हँसी,ठिठोली,बदमाशियाँ सब छिन गई.बिन माँ का जीवन दुर्दिन का जीवन हो जाता है.


माँ के जाने के बाद प्रेमचन्द्र के जीवन में जो माँ का प्यार,दुलार,स्नेह,संग साथ में खेलना था,सब उजड़ गया.माँ से जो प्यार मिला फिर वह प्यार दुबारा कभी नहीं मिला,थोड़ा बहुत प्यार बहन से मिला लेकिन शादी के पश्चात वह अपने ससुराल चली गई.उस प्यार से भी वंचित हो जाना पड़ा.अब समझिये पूरी दुनिया बालक के लिये सूनी हो गई.यह सूनापन इतनी गहरी थी कि उनका मासूम हृदय तड़प उठा और वही तड़प व पीड़ा अपने कहानियों व उपन्यासों में दुःखित व पीड़ित व्यक्तियों को पात्र बनाया और उनके जीवन में उठे संत्रास को उकेरा और कामयाबी मिली.ऐसे पात्रों को लिया जिनके बचपन में माँ चल बसी थी या जिनके माँ बाप बचपन में बिछड़ गये या ऐसे पात्रों को समाहित किया जिनका जीवन दरिद्रता से परिपूर्ण रहा,दीन हीन जीवन जी रहा होता.विधवा,मजदूरों,शोषितों,पीड़ितों,कल्पितों और अनाथों के जीवन को सजीव चित्रण कर कथा साहित्य को अमर कर दिया.


मातृत्व स्नेह से वंचित यह बालक कुछ इस तरह का रास्ता चुना कि आगे चल महान कथाकार,उपन्यास सम्राट तथा कलम के सिपाही के नाम से पूरे विश्व साहित्य के लिये आदरणीय बन गये.तमाम विभूतियों से अलंकृत यह महान रचना कार साधारण सा ही जिन्दगी जिया.दिखावे के चीज से सदैव दूर रहे.स्वाभिमानी थे.सादा जीवन में पूर्ण भरोसा था और इसी तरह जीवन को आत्मसात किया.साधारण से जीवन में एक महान व्यक्तित्व का निर्माण किया.


विवाह छोटी सी अवस्था में हो गया जब लगभग पन्द्रह-सोलह बरस के रहे थे.यह विवाह इनके लिये कष्टकारी रहा यानी दुर्भाग्य से भरा रहा लेकिन विवाह के साथ एक संयोग जुड़ा.बनारस के पास चुनार में एक स्कूल में मास्टरी मिल गई.सन 1899 से सन1821 तक मास्टरी किया.नौकरी करते हुये अपनी शिक्षा भी ली.इंटर और बीए तक पढ़ाई नौकरी के दरम्यान पूरी कर ली.इसी नौकरी के समय तबादलों का सामना करना पड़ा.इस नौकरी के सिलसिले में घाट घाट का पानी पीना पड़ा.इन्हीं तबादलों के साथ साथ नये लोगों से मिलने का अवसर मिला.सामाजिक ताने बाने को और करीब से जानने का मौका मिला.सामाजिक समस्याओं से रूबरू भी हुये.ये सारी चीजें एक साहित्यकार के लिये सोने में सुहागा सिध्द हुआ और इन्हीं सब चीजों को देखकर अपनी आत्मा तक साहित्य के लिये समर्पित कर दिया.साहित्य में यह महान रचनाकार कूद पड़ा और जमकर साहित्य की रचना की. ऐसा लिखा की पूरे समाज की नब्ज को लिख दी.साहित्य को नई ऊँचाई दी.


साहित्य का महान पुरोधा प्रेमचन्द्र लगभग तीन सौ कहानिया और चौदह छोटे बड़े उपन्यास की रचना की.रचना इतनी सुंदर रही कि कोई अगर थोड़ा पढ़ना शुरू किया तो बिना पूरा पढ़े रहा नहीं.यही वजह रहा कि पाठकों की संख्या बहुत रही है.इसी प्रकार इस महान साहित्यकार की गिनती दुनिया के महान लेखकों में होती है.इनके साहित्य का अनुवाद लगभग सभी प्रमुख भाषाओं में किया जा चुका है.


कानपुर में भी मारवाड़ी स्कूल में काम किया लेकिन स्वाभिमानी स्वभाव के कारण मैनेजर से नहीं बनी और वहाँ से तत्काल इस्तीफा दे दिया और बनारस चले आये.बनारस में 'मर्यादा' पत्रिका का संपादन किया.कुछ समय तक काशी विद्यापीठ में शिक्षक रहे.लखनऊ से बुलावा आने पर 'माधुरी' के संपादन के लिये गये.लगभग छः सात वर्ष तक रहे फिर हंस के संपादन के लिये पुनः बनारस चले गये.हंस मुंशी जी की पत्रिका रही.आजकल हंस का प्रकाशन दिल्ली से होता है.यह एक प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका है.मुंशी जी कुछ समय बाद 'जागरण' निकाला.


प्रेमचन्द्रजी अपने सशक्त लेखनी के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों,रूढ़िवादियों एवं शोषणकर्ताओं के खिलाफ जमकर लिखा.तमाम सामाजिक विद्रुपताओं पर कुठाराघात करके अपने पाठकों को स्वस्थ मनोरंजन परोसने में कामयाब रहे.सामाजिक दुष्परिणाम को उजागर कर उनको जड़ से मिटाने का संदेश पूरे समाज को दिया.अमर कथाकार ऐसे नक्षत्र हैं जिनकी रोशनी में साहित्यप्रेमियों को आम भारतीय जीवन का सच्चा दर्शन मिलता है.अपनी बेमिशाल लेखनी चलाकर गरीब,बेबस,दबे कुचले लोगों की आवाज को रखा.पाठकों के मन में बेबस लोगों को पढ़कर मन में टीस व भावुकता का भाव उमड़ने लगता है.कथानक के पात्र चलचित्र की तरह पाठकों का सजीव दर्शन कराती है.सच्चे भावों को रखा है.मानवीय संवेदनाओं को उकेरा है.नपे तुलेे शब्दों के प्रयोग से रचना अंदर तक बेधती है.इसी खासियत के चलते आम जन में लोकप्रिय रहे.आज भी उतने प्रासंगिक हैं जितने उस समय रहे.आज भी इनकी रचनायें चाव से पढ़ी जाती है.प्रेमचन्द्र समाज के कुशल चितेरे थे.


प्रेमचन्द्र जी को सामाजिक लेखक भी कह सकते हैं.19वीं सदी के अंतिम दशक तथा 20वीं सदी के तीसरे दशक तक सामाजिक समस्याओं एव भारत की दुर्दशा पर अपनी सशक्त लेखनी चलाई.

देशभक्ति की भावना भी कूट कूट कर भरी थी.चौरी चौरा काण्ड से दुःखी होकर चौथे दिन सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया.यह लेखक की देश के प्रति अगाध प्रेम दर्शाता है.अंग्रेजों द्वारा महान क्रांतिकारी खुदीरामबोस की फांसी से उनका मन बहुत आहत हुआ.कई दिन तक दुःखी रहे.बाजार से खुदीरामबोस की तस्वीर लाकर अपने घर में टांग दी.


जिस समय प्रेमचन्द्र हिन्दी में उभर रहे थे.वह युग छायावाद का युग रहा लेकिन वे किसी वाद के चक्कर में नहीं पड़े .अलग रह कर हिन्दी साहित्य को समृध्य किये.जिस रूप में समाज को देखा वैसा ही अपने लेखनी में चित्रण किया.समाज में हो रहे अत्याचारों को पात्र का माध्यम बनाकर कहानिया व उपन्यास लिखे.समाज के हर बुराई को लिखा.संवेदनाओं को  दिखाया.लोगों को जागृति करने का भरसक प्रयत्न किया.सामाजिक ढोंग पर सीधे प्रहार किये.सामाजिक भेदभाव को करारा तमाचा जड़ा.हिन्दु व मुस्लिम के दिखावे पर करारा प्रहार किया.स्त्रियों की दुर्दशा पर उनका रूह कांप गया.कहानियों व उपन्यास में स्त्री को केन्द्र बिन्दु मान कर रचना की.समस्याओं पर बेबाक लिखने वाले मुंशी जी सामाजिक समस्याओं का समाधान भी खोजते हैं.कैसे समस्याओं से निदान हो सकता है .इस पर भी प्रकाश डाला है.भारतीयों के ऊपर हो रहे अत्याचार से आहत मुंशीजी अंग्रेजों पर भी करारा प्रहार किये.हिम्मती थे जो इतने साहसी विषय पर लिखा.हार मानने वाले नहीं थे.


मुंशीजी दलितों के हालत पर समाज के उच्च वर्गों पर प्रहार करने से नहीं चूके.भेदभाव पर वे भरोसा नहीं करते थे.सामाजिक कलंक इसे मानते थे.दलित को भी समाज में हक है जीने का .तमाम चीजें लेकर वे खुद मुद्दा बनाते और दलितों के हक के लिये लड़ाई लड़ी.सामाजिक भेदभाव को हटाने का प्रयत्न किये.हिन्दु व मुश्लिम के बीच जो असमानता का भेदभाव था.उस पर करारा प्रहार किया.अगर हम आपस में लड़ेगें तो फिर हमारा देश कैसे आजाद होगा.इस प्रकार कहा जा सकता है कि सामाजिक समरसता लाने में मुंशी जी का विशेष योगदान रहा है.


किसानों पर जमकर लिखा.किसानों की हालत दयनीय थी जो देश के लिये अन्न उपजा रहा है वही भूखा सोता है.वही नंगधडंग है.उसके बच्चे गरीबी में हैं.स्कूल नहीं जा पा रहें है.किसानों की दयनीय हालत पर लिखा और किसानों की समस्याओं को दिखाया और समाधान भी खोजा.गबन,गोदान,निर्मला प्रसिध्द कृतियां रहीं हैं.नमक का दारोगा,पूस की रात,ईद,काकी इत्यादि कई रचनाये पढ़ने से मन हर्षित हो जाता है.सामाजिक भावों को दिखाती रचना अतीव सुंदर है.


वैसे मुंशी जी की रचनायें आज भी प्रासंगिक है.समाज में हो रहे अत्याचार,सामाजिक भेदभाव,स्त्रियों के उपर हो रहे दुराचार,अमानवीय भाव से इनकी रचनाओं की यहाँ जरूरत है.अगर सामाजिक समरसता नहीं बनी तो वह दिन दूर नहीं फिर जब वही पुराने दौर से गुजरना पड़े.चिन्तन बहुत जरूरी है.भेदभाव खत्म करना है.स्त्रियों का सम्मान करना है.किसानों के बारे में सोंचना है.गरीबों के बारे कुछ करना होगा .बदलाव लाना ही पड़ेगा.तभी रामराज्य की कल्पना गांधी जी का साकार होगा.


                                                                 लेखक

                                                          

जयचन्द प्रजापति 

                                                               प्रयागराज

बुधवार, 14 फ़रवरी 2024

अपने हिस्से का भाग्य*


*प्रस्तुति - *स्वामी शरण 

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एक आदमी एक सेठ की दुकान पर नौकरी करता था। वह बेहद ईमानदारी और लगन से अपना काम करता था। 

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उसके काम से सेठ बहुत प्रसन्न था और सेठ द्वारा मिलने वाली तनख्वाह से उस आदमी का गुज़ारा आराम से हो जाता था। ऐसे ही दिन गुज़रते चले गये और वो बाल बच्चेदार हो गया तब भी काम करता रहा...!

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एक दिन वह आदमी बिना बताए काम पर नहीं गया। उसके न जाने से सेठ का काम रूक गया।  

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तब उसने सोचा कि *यह आदमी इतने वर्षों से ईमानदारी से काम कर रहा है। मैंने कबसे इसकी तन्ख्वाह नहीं बढ़ाई। इतने पैसों में इसका गुज़ारा कैसे होता होगा ?*

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सेठ ने सोचा कि *अगर इस आदमी की तन्ख्वाह बढ़ा दी जाए, तो यह और मेहनत और लगन से काम करेगा। उसने अगले दिन से ही उस आदमी की तनख्वाह बढ़ा दी।*

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उस आदमी को जब एक तारीख को बढ़े हुए पैसे मिले, तो वह हैरान रह गया। लेकिन वह बोला कुछ नहीं और चुपचाप पैसे रख लिये...

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धीरे-धीरे बात आई गई हो गयी। कुछ महीनों बाद वह आदमी फिर फिर एक दिन ग़ैर हाज़िर हो गया। 

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यह देखकर सेठ को बहुत गुस्सा आया। वह सोचने लगा- *कैसा कृतघ्न आदमी है। मैंने इसकी तनख्वाह बढ़ाई, पर न तो इसने धन्यवाद तक दिया और न ही अपने काम की जिम्मेदारी समझी। इसकी तन्खाह बढ़ाने का क्या फायदा हुआ ? यह नहीं सुधरेगा !*

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*और उसी दिन सेठ ने बढ़ी हुई तनख्वाह वापस लेने का फैसला कर लिया।*

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अगली 1 तारीख को उस आदमी को फिर से वही पुरानी तनख्वाह दी गयी। लेकिन हैरानी यह कि इस बार भी वह आदमी चुप रहा। उसने सेठ से ज़रा भी शि‍कायत नहीं की। यह देख कर सेठ से रहा न गया और वह पूछ बैठा-

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*बड़े अजीब आदमी हो भाई। जब मैंने तुम्हारे ग़ैरहाज़िर होने के बाद पहले तुम्हारी तन्ख्वाह बढ़ा कर दी, तब भी तुम कुछ नहीं बोले।*

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*और आज जब मैंने तुम्हारी ग़ैर हाज़री पर तन्ख्वाह फिर से कम कर के दी, तुम फिर भी खामोश रहे। इसकी क्या वजह है ?*

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उस आदमी ने जवाब दिया- *"जब मैं पहली बार ग़ैर हाज़िर हुआ था तो मेरे घर एक बच्चा पैदा हुआ था। उस वक्त आपने जब मेरी तन्ख्वाह बढ़ा कर दी, तो मैंने सोचा कि ईश्वर ने उस बच्चे के पोषण का हिस्सा भेजा है। इसलिए मैं ज्यादा खुश नहीं हुआ। ...*

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*जिस दिन मैं दोबारा ग़ैर हाजिर हुआ, उस दिन मेरी माता जी का निधन हो गया था। आपने उसके बाद मेरी तन्ख्वाह कम कर दी, तो मैंने यह मान लिया कि मेरी माँ अपने हिस्से का अपने साथ ले गयीं.... फिर मैं इस तनख्वाह की ख़ातिर क्यों परेशान होऊँ ?*

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यह सुनकर सेठ गदगद हो गया। उसने फिर उस आदमी को गले से लगा लिया और अपने व्यवहार के लिए क्षमा मांगी। उसके बाद उसने न सिर्फ उस आदमी की तनख्वाह पहले जैसे कर दी, बल्कि उसका और ज्यादा सम्मान करने लगा. 

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❤️❤️

शुक्रवार, 12 जनवरी 2024

महाभारत और हनुमान जी


महाभारत के युद्ध में अर्जुन के रथ पर बैठे हनुमानजी.. कभी-कभी खड़े हो कर कौरवों की सेना की और घूर कर देखते.. 

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तो उस समय कौरवों की सेना तूफान की गति से युद्ध भूमि को छोड़ कर भाग जाती... हनुमानजी की दृष्टि का सामना करने का साहस किसी में नही था... 

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उस दिन भी ऐसा ही हुआ था.. जब कर्ण और अर्जुन के बीच युद्ध चल रहा था।

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कर्ण अर्जुन पर अत्यंत भयंकर बाणों की वर्षा किये जा रहा था... उनके बाणों की वर्षा से श्रीकृष्ण को भी बाण लगते गए... 

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अतः उनके बाण से श्रीकृष्ण का कवच कटकर गिर पड़ा और उनके सुकुमार अंगो पर बाण लगने लगे।

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रथ की छत पर बैठे पवनपुत्र हनुमानजी  एक टक नीचे अपने इन आराध्य की और ही देख रहे थे।

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श्रीकृष्ण कवच हीन हो गए थे.. उनके श्री अंग पर कर्ण निरंतर बाण मारता ही जा रहा था.. 

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हनुमानजी से यह सहन नही हुआ.. आकस्मात् वे उग्रतर गर्जना करके दोनों हाथ उठाकर कर्ण को मार देने के लिए उठ खड़े हुए।

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हनुमानजी की भयंकर गर्जना से ऐसा लगा मानो ब्रह्माण्ड फट गया हो.. कौरव- सेना तो पहले ही भाग चुकी थी.. अब पांडव पक्ष की सेना भी उनकी गर्जना के भय से भागने लगी...

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हनुमानजी का क्रोध देख कर कर्ण के हाथ से धनुष छूट कर गिर गया।

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भगवान श्रीकृष्ण तत्काल उठकर अपना दक्षिण हस्त उठाया.. और हनुमानजी को स्पर्श करके सावधान किया.. रुको ! आपके क्रोध करने का समय नही है।

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श्रीकृष्ण के स्पर्श से हनुमान जी रुक तो गए किन्तु उनकी पूंछ खड़ी हो कर आकाश में हिल रही थी.. 

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उनके दोनों हाथों की मुठ्ठियाँ बन्द थीं.. वे दाँत कट- कटा रहे थे.. और आग्नेय नेत्रों से कर्ण को घूर रहे थे.. 

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हनुमानजी का क्रोध देख कर कर्ण और उनके सारथी काँपने लगे।

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हनुमानजी का क्रोध शांत न होते देख कर श्रीकृष्ण ने कड़े स्वर में कहा.. हनुमान ! मेरी और देखो.. 

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अगर तुम इस प्रकार कर्ण की ओर कुछ क्षण और देखोगे तो कर्ण तुम्हारी दृष्टि से ही मर जाएगा।

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यह त्रेतायुग नहीं है... आपके पराक्रम को तो दूर आपके तेज को भी कोई यहाँ सह नही सकता..

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आपको मैंने इस युद्ध मे शांत रहकर बैठने को कहा है।

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🙏🚩फिर हनुमान जी ने अपने आराध्यदेव की और नीचे देखा और शांत हो कर बैठ गए।


।।जय श्री कृष्णा।। 


।।शुभ प्रभात।।

मैं यूँ तो सबके साथ सदा / किशोर कौशल

 मैं यूँ तो सबके साथ सदा 

पर मेरा अपना अलग ढंग



जो बात किसी को चुभ जाए 

मैं ऐसी बात नहीं कहता

हो जहाँ कहीं कुछ ग़लत बात 

मैं क्षण भर वहाँ नहीं रहता


जो बनी-बनाई लीक मिली 

मैं अकसर उस पर चला नहीं 

मुझको वह बात नहीं भाई 

हो जिसमें सबका भला नहीं



जग जिस प्रवाह में बहता है 

मैं उस प्रवाह में बहा नहीं 

जो भीड़ कहा करती अकसर 

मैंने वह हरगिज कहा नहीं



अपना कुछ काम बनाने को 

मैंने समझौता नहीं किया 

खु़श हो कोई या रुष्ट रहे 

झूठा यशगायन नहीं किया



मैं सबको रास नहीं आता 

पर इसकी कुछ परवाह नहीं 

सब मुझे सुनें,बस मुझे सुनें

ऐसी कुछ मन में चाह नहीं 


अपनी धुन,अपनी मस्ती है 

अपनी भी कोई हस्ती है। 

*   *   *   *   *   *   *   *

--- किशोर कुमार कौशल

 मोबाइल:9899831002

मंगलवार, 9 जनवरी 2024

बलिराजगढ़ पुरास्थल ? मुरारी कुमार झा / /

 #बलिराजगढ़ पुरास्थल


     आप तो हद कर दिए, महाराज! बलिराजगढ़ पुरास्थल तक साइकिल🚴 से आ गए! :- माननीय सांसद दरभंगा(गोपाल जी ठाकुर)।(कुल दूरी 200किमी)


  ( इस पोस्ट को पूरा पढ़कर और शेयर कर अनुगृहित करें।)


         25 जनवरी को MLS संग्रहालय पहुंचा तो वहां पूर्व से ही संग्रहाल्याध्यक्ष डा शिव कुमार मिश्र, प्रो जयशंकर झा, वरीय इतिहासकार डा अवनींद्र कुमार झा, डा सुशांत कुमार, श्री कौशल जी, श्रीउज्ज्वल कुमार जी आदि मौजूद थे। शिवकुमार सर ने मिथिला के अति महत्वपूर्ण पुरास्थल बलिराजगढ़ की चर्चा की, जिस पर आदरणीय प्रो झा ने माननीय सांसद, दरभंगा से भ्रमण को कहने संबंधी बात कहते हुए उन्हें फोन कर कहा, डा मिश्र सर से भी बातें हुई, इस दौरान बलिराजगढ़ का सम्पूर्ण उत्खनन कराने हेतु भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, भारत सरकार का ध्यान आकृष्ट किया जाना चाहिए।


      उपरोक्त विषय पर सांसद महोदय का ध्यान आकृष्ट कराया गया, सांसद महोदय हर्ष व्यक्त करते हुए अगले ही दिन बलिराजगढ़ पुरास्थल भ्रमण का योजना बना लिए, जिसमें मुझे इनके पुरातात्विक गाइड लाइन के लिए जाने को कहा गया, मैं तो पुरातत्व के लिए तैयार ही रहता हूं।


            अगले दिन सुबह यानी कि 26 जनवरी(गणतंत्र दिवस) को मैं आदरणीय प्रो जयशंकर झा, मिसेज झा और सामाजिक कार्यकर्ता श्री उज्ज्वल कुमार जी दरभंगा से मधुबनी जिला अतिथि गृह पहुंचे, जहां से सांसद महोदय साथ हुए और हमलोग करीब 03:30 बजे बलिराजगढ़ पुरास्थल पहुंचे।


           वहां प्रो झा(डा मिश्र का दिया हुआ) के द्वारा सांसद महोदय को बलिराजगढ़ पुरास्थल से संबंधित अब तक के कतिपय प्रपत्र दिए गए। उन्होंने इस पुरास्थल का पुनः खुदाई कार्य प्रारंभ करवाने हेतु अपना पूर्ण जोड़ लगाने की बात कही। मैंने उनको पुरास्थल का प्राचीनता, तीनों बार हुए खुदाई कार्य, ऐतिहासिक काल खंड की जानकारी, विशेषता, संभावना आदि विषयों संबंधित विस्तृत विवरणों से अवगत करवाया। तत्पश्चात हमलोग बलीराजपुर स्थित ऐतिहासिक रामजानकी मंदिर भ्रमण कर वापस लौटे।


 #बलिराजगढ

#भारतीय_पुरातत्व_सर्वेक्षण

#Archaeological_survey_of_India

#मिथिला_पर्यटन, #बिहार_पुराविद_परिषद, #Government_of_Bihar, #Government_of_India


      अगर राम का जन्म हुआ तो सीता का भी हुआ होगा......


        अगर राजा दशरथ की #अयोध्या है तो #विदेहराज जनक की राजधानी #मिथिलापुरी भी होगी। राम का मूल आधार #वाल्मीकि_रामायण है। इसी रामायण में कहा गया है कि गौतम आश्रम से ईशान कोण में राजा जनक की राजधानी मिथिला थी। गौतम आश्रम की पहचान #दरभंगा जिला के ब्रह्मपुर से की गई है तो इसके ईशान कोण में मिथिला पुरी की तलाश क्यों नहीं की जाती ?


         #रामजन्म_भूमि को प्रमाणित करने के लिए #पुरातत्व का सहारा लिया गया है तो सीताजी के जन्मभूमि के लिए पुरातत्व की आवश्यकता क्यों नहीं ?


        हमारे देश के लोग अपनी सारी ऊर्जा राम जन्मभूमि के लिए लगा रहे हैं थोड़ी तो सीता जी के लिए भी लगाया जाना चाहिए।


                        -:बलिराजगढ़:-


         भारत के दार्शनिक, उद्भव, सांस्कृतिक और साहित्यिक विकास के क्षेत्र में मिथिला का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। मिथिला का इतिहास निस्संदेह गौरवमय रहा है. पुरातत्व के अवशेषों का अन्वेषण, विश्लेषण में पूरा #पाषाणकाल, मध्यकाल और नव पाषाण काल के कई अवशेष अभीतक प्रकाश में नहीं आए हैं। उत्तर बिहार के #तीरभुक्ति क्षेत्र में पुरातात्विक दृष्टिकोण से वैशाली पुरास्थल के बाद अगर कोई दूसरा महत्वपूर्ण पुरातत्व स्थल प्रकाश में आया तो वह है बलिराजगढ़। जिसे #डी०_आर_पाटिल बलराजपुर लिखते हैं। बलिराजगढ़ #हिमालय की तराई में भारत-नेपाल के सीमा से लगभग 15 किलोमीटर दूर बिहार प्रान्त में अवस्थित है।


          प्राचीन मिथिला के लगभग मध्यभाग में #मधुबनी जिला से 30 किलोमीटर की दुरी पर #बाबूबरही थाना के अन्तर्गत आता है। यहां पहुंचने के लिए रेल और सड़क मार्ग दोनों की सुविधा उपलब्ध है। बलिराजगढ़ कामला बलान नदी से 7 किलोमीटर पूर्व और कोसी नदी से 35 किलोमीटर पश्चिम में मिथिला के भूभाग पर अवस्थित है। #वैदिक_काल और उत्तर वैदिक काल में मिथिला अति प्रसिद्ध विदेह राज्य के रूप में जाना जाता था। द्वितीय नगरीकरण अथवा महाजनपद काल में वज्जि संघ, लिच्छवी संघ आदि नाम से प्रसिद्ध रहा है। बलिराजगढ़ का महत्व देखते हुए कुछ विद्वान् इसे प्राचीन मिथिला की राजधानी के रूप में संबोधित करते हैं। यहां का विशाल दुर्ग रक्षा प्राचीर से रक्षित पूरास्थल निश्चित रूप से तत्कालीन नगर व्यवस्था में सर्वोत्कृष्ट स्थान रखता था।


          175 एकड़ वाले विशाल भूखंड को बलिराजगढ़, बलराजगढ़ या बलिगढ़ कहा जाता है। स्थानीय लोगों का मानना है की महाकाव्यों और पुराणों में वर्णित दानवराज बलि की राजधानी का ये ध्वंष अवशेष है। ओ मैले के अनुसार स्थानीय लोगों का विश्वास है की इस समय भी रजा बलि अपने सैनिकों के साथ इस किले में निवास करते हैं. सम्भवतः इसी वजह से कोई भी खेती के लिए जोतने की हिम्मत नही करता है। इसी अफवाह के चलते इस भूमि और किले की सुरक्षा अपने आप होती रही।  बुकानन के अनुसार वेणु, विराजण और सहसमल का चौथा भाई बलि एक राजा था। यह बंगाल के राजा बल का किला था जिसका शासनकाल कुछ दिनों के लिए मिथिला पर भी था। बुकानन के अनुसार वे लोग दोमकटा ब्राह्मण थे जो महाभारत में वर्णित राजा युधिष्ठिर के समकालीन थे। किन्तु डीआर पाटिल इसे ख़ारिज करते हुए कहते हैं कि वेणुगढ़ तथा विरजण गढ़ के किले से बलिराजगढ़ की दूरी अधिक है।


         एक अन्य विद्वान् इस गढ़ को विदेह राज जनक के अंतिम सम्राट द्वारा निर्मित मानते हैं। उनके अनुसार जनक राजवंश के अंतिम चरण में आकर वंश कई शाखों में बंट गया और उन्ही में से एक शासक द्वारा किले का नाम बलिगढ़ रखा गया।

प्रो उपेन्द्र ठाकुर ने बलिराजगढ़ का उल्लेख करते हुए लिखा है कि प्रख्यात #चीनी_यात्री_ह्वेनसांग ने तीरभुक्ति भ्रमण करते हुए वैशाली गए थे। वैशाली (चेन-सुन-ना) संभवतः बलिगढ़ गए और वहां से बड़ी नदी अर्थात महानन्दा के निकट गए। बलिराजगढ़ के ऐतिहासिक महत्व के लिए एक तर्क यह है कि विदेह राज जनक की राजधानी अर्थात रामायण में वर्णित मिथिलापुरी यहीं स्थित थी। यधपि मिथिलापुरी की पहचान आधुनिक जनकपुर (नेपाल) से की गयी है किन्तु पुरातात्विक सामग्रियों के आभाव में इसे सीधे मान लेना कठिन है।


          रामायण के अनुसार राम, लक्ष्मण और विश्वामित्र गौतम आश्रम से ईशाणकोण को ओर चलकर मिथिला के यज्ञमण्डप पहुंचे। गौतम आश्रम की पहचान दरभंगा जिले के ब्रह्मपुर गांव से की गयी है। जिसका उल्लेख स्कन्दपुराण में भी मिलता है। आधुनिक जनकपुर गौतम आश्रम अर्थात ब्रह्मपुर से ईशाणकोण न होकर उत्तर दिशा में है। इस तरह गौतम आश्रम से ईशाणकोण में बलिराजगढ़ के अलावा और कोई ऐतिहासिक स्थल दिखाई नहीं देता है, जिसपर प्राचीन मिथिलापुरी होने की सम्भावना व्यक्त की जा सके। अतः बलिराजगढ़ के पक्ष में ऐसे तर्क दिए जा सकते हैं कि मिथिलापुरी इस स्थल पर स्थित थी।


          पाल साहित्य में कहा गया है कि अंग की राजधानी आधुनिक भागलपुर से मिथिलापुरी साठ योजन की दूरी पर थी। महाउम्मग जातक के अनुसार नगर के चारों द्वार पर चार बाजार थे जिसे यवमज्क्ष्क कहा जाता था बलिराजगढ़ से प्राप्त पुरावशेष इस बात की पुष्टि करता है. बौद्धकालीन मिथिलानगरी का ध्वंशावशेष भी बलिराजगढ़ ही है। बलिराजगढ़ के पुरातात्विक महत्व को सर्वप्रथम 1884 में प्रसिद्ध प्रसाशक, इतिहासकार और भाषाविद् जार्ज ग्रीयर्सन ने उत्खनन के माध्यम से उजागर करने की चेष्टा की, किन्तु बात यथा स्थान रह गयी। ग्रियर्सन के उल्लेख के बाद भारत सरकार 1938 में इस महत्वपूर्ण पुरास्थल को #राष्ट्रीय_धरोहर के रूप में घोषित कर दिया गया।


          सर्वप्रथम इस पुरास्थल का उत्खनन 1962-63 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण रघुवीर सिंह के निर्देशन संपादित हुआ। इस उत्खनन से ज्ञात हुआ की जो इस विशाल सुरक्षा दीवाल के निर्माण में पकी ईट के साथ मध्यभाग में कच्ची ईट का प्रयोग किया गया है। सुरक्षा प्राचीर के दोनों ओर पककी ईटों का प्रयोग दीवार को मजबूती प्रदान करती है। सुरक्षा दीवार की चौड़ाई सतह पर 8.18 मी. और 3.6 मी. तक है। सुरक्षा दीवार का निर्माण लगभग तीसरी शताब्दी ई.पू. से लेकर लगातार पालकालीन अवशेष लगभग 12-13 शताब्दी पर प्राप्त होता है। पुरावशेष में सुंदर रूप से गढ़ित मृण्मूर्ति महत्वपूर्ण है।


         इसके बाद 1972-73 और 1974-75 में बिहार राज्य पुरातत्व संग्रहालय द्वारा उत्खनन किया गया। इस उत्खनन कार्य में बी.पी सिंह के समान्य निर्देशन में सीता राम रॉय द्वारा के.के सिन्हा, एन. सी.घोष, एल. पी. सिन्हा तथा आर.पी सिंह के सहयोग से किया गया। उक्त खुदाई में पुरावशेषों तथा भवनों के अवशेष प्राप्त हुए। इस उत्खनन में उत्तर कृष्ण मर्जित मृदभांड से लेकर पालकाल तक के मृदभांड मिला है। सुंदर मृण्मूर्ति अथाह संख्या में मिला है, अर्ध्यमूल्यवाल पत्थर से बनी मोती, तांबो के सिक्के,मिट्टी के मुद्रा प्राप्त हुआ है। अभी हाल में 2013-14 में एक बार फिर उत्खनन कार्य #भरतीय_पुरातत्व_सर्वेक्षण_पटना मण्डल के मदन सिंह चौहान, सुनील कुमार झा और उनके मित्रों द्वारा उत्खनन कार्य किया गया।


         इस स्थल के उत्खनन में मुख्य रूप से चार संस्कृति काल प्रकाश में आए।

1-उत्तर कृष्ण मर्जित मृदभांड

2-शुंग कुषाण काल

3-गुप्त उत्तर गुप्तकला

4-पाककालीन अवशेष


           इस स्थल से अभी तक पुरावशेष में तस्तरी, थाली,पत्थर के वस्तु, हड्डी और लोहा, बालुयुक्त महीन कण, विशाल संग्रह पात्र, सिक्के, मनके, मंदिर के भवनावशेष प्राप्त हुए है और एक महिला की मूर्ति भी प्राप्त हुई है जो कि गोदी में बच्चे को स्तन से लगायी हुई है।


            यहाँ सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य में प्राचीर दीवार है जो पकी ईट से बनी हुई है और अभी तक सुरक्षित अवस्था में है दीवार में कहीं कहीं कच्ची ईटों का प्रयोग किया गया है। यहां प्रयोग की गयी ईटों की लंबाई 25" और चौड़ाई 14" तक है।


        पाल काल या सेन काल के अंत में भीषण बाढ़ द्वारा आयी मिट्टी के जमाव कही कही 1 मीटर तक है। इससे निष्कर्ष निकाला जा सकता है की इस महत्वपूर्ण कारक रहा है। इस समय में कोई पुरास्थल मिथिला क्षेत्र में इतना वैभवशाली नही प्राप्त हुआ है। कुछ विद्वान द्वारा इस पुरास्थल की पहचान प्राचीन मिथिला नगरी के राजधानी के रूप में चिन्हित करते है। ये पुरास्थल मिथिला की राजधानी है की नहीं इस विषय में और अधिक अध्ययन और पुरातात्विक उत्खनन और अन्वेषण की आवश्यकता है।


           इस भ्रमण कार्य के लिए आदरणीय सांसद, दरभंगा(#गोपाल_जी_ठाकुर) डा मिश्र, डा झा सहित प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग करने वाले सभी महानुभावों के प्रति आभार 🙏🙏🙏


                           

-मुरारी कुमार झा

(पुरातत्व)

बुधवार, 27 दिसंबर 2023

चिंता राजा की

 *💐राजा की चिंता💐*


प्रस्तुति - उषा रानी +राजेंद्र प्रसाद सिन्हा 


*प्राचीन समय की बात है, एक राज्य में एक राजा राज करता था। उसका राज्य सुख वैभव से संपन्न था।


धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी। राजा और प्रजा ख़ुशी-ख़ुशी अपना जीवन-यापन कर रहे थे।


एक वर्ष उस राज्य में भयंकर अकाल पड़ा, पानी की कमी से फ़सलें सूख गई। ऐसी स्थिति में किसान राजा को लगान नहीं दे पाए। लगान प्राप्त न होने के कारण राजस्व में कमी आ गई और राजकोष खाली होने लगा। यह देख राजा चिंता में पड़ गया, हर समय वह सोचता रहता कि राज्य का खर्च कैसे चलेगा?

अकाल का समय निकल गया, स्थिति सामान्य हो गई किंतु राजा के मन में चिंता घर कर गई। हर समय उसके दिमाग में यही रहता कि राज्य में पुनः अकाल पड़ गय तो क्या होगा..? इसके अतिरिक्त भी अन्य चिंतायें उसे घेरने लगी। पड़ोसी राज्य का भय, मंत्रियों का षड़यंत्र जैसी कई चिंताओं ने उसकी भूख-प्यास और रातों की नींद छीन ली।

वह अपनी इस हालत से परेशान था किंतु जब भी वह राजमहल के माली को देखता, तो आश्चर्य में पड़ जाता। दिन भर मेहनत करने के बाद वह रूखी-सूखी रोटी भी छककर खाता और पेड़ के नीचे मज़े से सोता। कई बार राजा को उससे जलन होने लगती।


एक दिन उसके राजदरबार में एक सिद्ध साधु पधारे। राजा ने अपनी समस्या साधु को बताई और उसे दूर करने सुझाव मांगा।

साधु राजा की समस्या अच्छी तरह समझ गए थे। वे बोले, “राजन! तुम्हारी चिंता की जड़ राज-पाट है, "अपना राज-पाट पुत्र को देकर चिंता मुक्त हो जाओ।"


इस पर राजा बोला, ”गुरुवर! मेरा पुत्र मात्र पांच वर्ष का है। वह अबोध बालक राज-पाट कैसे संभालेगा?”


“तो फिर ऐसा करो कि अपनी चिंता का भार तुम मुझे सौंप दो” साधु बोले।


राजा तैयार हो गया और उसने अपना राज-पाट साधु को सौंप दिया। इसके बाद साधु ने पूछा, “अब तुम क्या करोगे?”

राजा बोला, “सोचता हूँ कि अब कोई व्यवसाय कर लूं।”


“लेकिन उसके लिए धन की व्यवस्था कैसे करोगे? अब तो राज-पाट मेरा है, राजकोष के धन पर भी मेरा अधिकार है।”


“तो मैं कोई नौकरी कर लूंगा, राजा ने उत्तर दिया।


“ये ठीक है लेकिन यदि तुम्हें नौकरी ही करनी है, तो कहीं और जाने की आवश्यकता नहीं। यहीं नौकरी कर लो, मैं तो साधु हूँ मैं अपनी कुटिया में ही रहूंगा। राजमहल में ही रहकर मेरी ओर से तुम ये राज-पाट संभालना।”

राजा ने साधु की बात मान ली और साधु की नौकरी करते हुए राजपाट संभालने लगा। साधु अपनी कुटिया में चले गए।


कुछ दिन बाद साधु पुनः राजमहल आये और राजा से भेंट कर पूछा, “कहो राजन! अब तुम्हें भूख लगती है या नहीं और तुम्हारी नींद का क्या हाल है?”


“गुरुवर! अब तो मैं खूब खाता हूँ और गहरी नींद सोता हूँ। पहले भी मैं राजपाट का कार्य करता था, अब भी करता हूँ। फिर ये परिवर्तन कैसे? ये मेरी समझ के बाहर है. ”राजा ने अपनी स्थिति बताते हुए प्रश्न भी पूछ लिया''।

साधु मुस्कुराते हुए बोले, “राजन! पहले तुमने काम को बोझ बना लिया था और उस बोझ को हर समय अपने मानस-पटल पर ढोया करते थे, किंतु राजपाट मुझे सौंपने के उपरांत तुम समस्त कार्य अपना कर्तव्य समझकर करते हो इसलिए चिंतामुक्त हो।”


मित्रों "जीवन में जो भी कार्य करें, अपना कर्त्तव्य समझकर करें न कि बोझ समझकर। यही चिंता से दूर रहने का एकमात्र उपाय है"।

शनिवार, 23 दिसंबर 2023

भोजपुरी के शेक्सपियर : भिखारी ठाकुर / नलिनी वर्मा

 

भिखारी ठाकुर: भोजपुरी के 'शेक्सपियर' और भारत के जीनियस की कहानी

भिखारी ठाकुर

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  • Author,नलिन वर्मा
  • पदनाम,वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

भोजपुरी बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई इलाकों में बड़े पैमाने पर बोली और समझे जाने वाली भाषा है.

भोजपुरी फिल्म और गीत-संगीत के अलावा लोक संगीत का दायरा भी काफ़ी विस्तृत है और इसकी एक पहचान के तौर पर भिखारी ठाकुर हमेशा याद किए जाते रहेंगे.

आधुनिकतम तकनीक के दौर में लोक संस्कृति को बचाने का संकट है, ऐसे में भोजपुरी समाज के लिए भिखारी ठाकुर की विरासत को बचाने की चुनौती है.

भिखारी ठाकुर का जन्म बिहार के एक ग़रीब और उपेक्षित हजाम परिवार में 18 दिसंबर, 1887 को हुआ था.

ग़रीबी और वर्ण व्यवस्था के तहत निचली जाति में आने के चलते भिखारी ठाकुर को पढ़ने लिखने का मौका नहीं मिला.

भिखारी ठाकुर

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जानवर चराने जाना और गुनगुनाना

बचपन में वे गाय-भैंस चराने लगे थे.

जानवरों को चराने के समय ही भिखारी ठाकुर अपनी मधुर आवाज़ में गाते गुनगुनाते थे. वे पढ़ तो नहीं सकते थे लेकिन सुनकर याद करने लगे और इस दौरान उन्होंने रामचरितमानस की चौपाइयां, कबीर के निर्गुण भजन और रहीम के दोहों को कंठस्थ किया.

यहां से शुरुआत करके वे भोजपुरी गीत संगीत की दुनिया के सबसे बड़े आयकन बने.

उनका गांव कुतुबपुर पुराने शाहाबाद (अब भोजपुर ज़िला) का हिस्सा है. लेकिन गंगा नदी के रास्ता बदलने की वजह से 1926 में कुतुबपुर सारण ज़िले का हिस्सा हो गया.

बचपन में ही उनकी शादी मतुआ देवी से हो गई और जल्दी ही वे शिलानाथ के पिता भी बन गए.

जानवरों को चराने के अलावा परिवार का गुज़र बसर चलाने के लिए भिखारी ठाकुर अपने पुश्तैनी नाई का काम करने लगे थे. 1927 में आकाल के बाद वे आजीविका कमाने के लिए पहले खड़गपुर और फिर बाद में जगन्नाथपुरी गए.

भिखारी ठाकुर

दूसरे राज्य गए पर ज़िंदगी नहीं बदली

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समाप्त

हिंदू धर्म के रीति रिवाजों और संस्कारों के लिए हजाम, ब्राह्मणों की तरह ही महत्वपूर्ण माने जाते हैं.

उदाहरण के लिए हजाम की ज़रूरत मुंडन, जनेऊ, शादी और श्राद्ध सभी जगहों पर होती है. लेकिन सामाजिक पायदान पर उनकी हैसियत पुजारी जितनी नहीं होती है. उन्हें ‘निचली जाति’ का माना जाता है, यही वजह है कि भिखारी ठाकुर को भी अपने जीवन में ख़राब व्यवहार और अपमान का दंश झेलना पड़ा.

लेकिन उनकी गायकी ने उन्हें सामाजिक जटिलताओं और विसंगतियों की तरफ़ देखने का अवसर भी मुहैया कराया.

उन्होंने समाज को बारीक़ी से देखा और उसे लोकगीतों के माध्यम से आम लोगों के सामने रखा.

आजीविका के सिलसिले में उन्हें प्रवासी मज़दूर के तौर पर दूसरे राज्य में जाना पड़ा. वहां भी उन्होंने प्रवासी मज़दूरों के दर्द और तकलीफ़ को नज़दीक से देखा. भिखारी ठाकुर उसे विदेश (हालांकि वो देश के अंदर ही एक राज्य से दूसरे राज्य गए थे) कहते थे.

विदेश जाकर भी कमाने से उनके परिवार की हैसियत में कोई बदलाव नहीं आया.

इस दौरान वे अपने गांव के लोगों और परिवार वालों की कमी महसूस करते थे. कुछ साल बाहर रहने के बाद वे अपने गांव कुतुबपुर लौट आए थे, ताकि सुख दुख अपने परिवार और गांवों के लोगों के बीच ही मना सकें.

बिहार राष्ट्र भाषा

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जीनियस से कम नहीं थे भिखारी ठाकुर

भिखारी ठाकुर अपने समय में किसी जीनियस से कम नहीं थे. वे पढ़े लिखे नहीं थे, समाजिक हैसियत भी नहीं थी लेकिन वे लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाना जानते थे, लोगों का मनोरंजन करना जानते थे.

गायकी के अलावा अभिनय और नृत्य को भी उन्होंने साध लिया था.

वे कई तरह के वाद्य यंत्रों को भी बजाने लगे थे. इतना ही नहीं उन्होंने गांव के लोगों को इसकी ट्रेनिंग देकर एक मंडली बना ली. वे अपनी नाट्य मंडली के संगीतकार और निर्देशक भी खुद ही थे.

उन्होंने गांव के लोगों में से गायक, अभिनेता, लबार (जोकर) और संगीतकारों की टीम बनाई.

भिखारी ठाकुर के पास नाटक करने के लिए कोई मंच नहीं था. वे चौकी (लकड़ी की चारपाई) को किसी पेड़ के नीचे रखकर स्टेज बना लेते थे और ढोलक, झाल और मजीरा के साथ लोगों का मनोरंजन करते थे.

असल मायनों में भिखारी ठाकुर को भारत में ओपन एयर थिएटर का जनक माना जा सकता है.

भिखारी ठाकुर की नाट्य मंडली कजरी, होली, चैता, बिरहा, चौबोला, बारामासा, सोहार, विवाह गीत, जंतसार, सोरठी, अल्हा, पचरा, भजन और कीर्तिन हर तरह से लोगों का मनोरंजन करने लगी थी. लेकिन भिखारी ठाकुर अपने कविताई अंदाज़ में जिस तरह से सामाजिक सच्चाइयों को पेश करते थे, उसमें मनोरंजन के साथ साथ तंज़ भी होता था.

उन्होंने अपनी टीम के साथ सभी तरह की सामाजिक कुरीतियों, मतलब समाज में उपेक्षित लोगों के साथ होने वाले अत्याचार, धार्मिक रुढ़ियों, संयुक्त परिवार के घटते चलन, बाल विवाह, बेमेल विवाह, विधवाओं का दर्द, बुजुर्गों की उपेक्षा, नशाखोरी, दहेज प्रथा और साधु संतों के वेश में ठगतई जैसे तमाम मुद्दों पर लोक गीत बनाए.

भिखारी ठाकुर
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2021 में बिहार के रामचंद्र मांझी को पद्मश्री सम्मान से नवाज़ा गया था. रामचंद्र मांझी और उनकी मंडली कई सालों से भिखारी ठाकुर के नाटकों का मंचन करते आ रहे हैं.

कभी स्कूल नहीं गए पर लिखी 29 किताबें

भिखारी ठाकुर किस प्रतिभा के धनी थे, इसका अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि वे खुद स्कूल नहीं गए लेकिन उन्होंने लोकगीतों पर 29 किताब लिखीं जो कैथी लिपि में थीं.

इन किताबों को बाद में देवनागरी लिपि में बदला गया. इनका पूरा संकलन बिहार राष्ट्रभाषा परिषद ने भिखारी ठाकुर रचनावली के नाम से प्रकाशित किया है. इनमें बेटी वियोग, विदेशिया, ननद भौजाई, गबर घिचौर और कलियुग का प्रेम जैसे लोक नाटक बेहद चर्चित रहे.

बेटी वियोग, शादी के बाद घर परिवार से बेटी की विदाई के दुख पर आधारित लोक नाटक है, तो विदेशिया उस महिला के दर्द की दास्तां है जिसका पति आजीविका कमाने के लिए विदेश (दूसरे राज्य) गया हुआ है. ननद-भौजाई, एक बहन और उसके भाई की पत्नी के बीच नोंकझोंक भरे रिश्ते की कहानी है.

गबरघिचौर नाटक, एक महिला के सेक्सुअल अधिकारों पर टिप्पणी करता है.

हिंदी साहित्य में भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटकों को जागरण का वाहक माना जाता है. लेकिन उससे काफी पहले भिखारी ठाकुर ने अपने नाटकों में महिलाओं के दर्द और तकलीफ़ को बखूबी उकेरा है. विदेशिया नाटक की महिला किरदार अपने पति को याद करती है, - पिया मोरा गैलन परदेस, ए बटोही भैया. रात नहीं नीन, दिन तनी ना चैनवा.

भिखारी ठाकुर के लोक नाटकों पर महान हिंदी साहित्यकार राहुल सांकृत्यान ने लिखा है, “हमनी के बोली में कितने जो हवअ, केतना तेज़ बा, इ सब अपने भिखारी ठाकुर के नाटक में देखिला. भिखारी ठाकुर हमनी के अनगढ़ हीरा हवें.”

भिखारी ठाकुर के नाटक का मंचन
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भिखारी ठाकुर के नाटक का मंचन

सेक्सुअल अधिकारों की वकालत

भिखारी ठाकुर के एक दूसरे नाटक गबरघिचौर में महिला का पति विदेश कमाने गया हुआ है और वह गांव के किसी अन्य शख़्स के साथ संबंध बना लेती है और अपने सेक्सुअल अधिकारों की वकालत करती है, “घर में रहे दूध पांच सेर, केहू जोरन देहल एक धार. का पंचायत होकात बा, घीऊ साफे भेल हमार.”

भिखारी ठाकुर की करीब तीन चौथाई रचनाएं पद्य के तौर पर हैं जिनमें मेलोड्रामा, भक्ति और सांसारिक प्रेम, उदासी और एकजुटता की खुशी, प्रेम, घृणा और क्रोध, हास्य और तीखे व्यंग्य छंदों में लिखे गए हैं.

आमतौर पर, उनके लोक नाटकों के पात्र दलित और निचली जातियों से आते हैं, यह किरादारों के नामों से भी पता चलता है. उपदार, उदवास, झंटुल, चटक, चेथरू, अखाजो और लोभा जैसे नाम उनके किरदारों के रहे हैं.

भिखारी ठाकुर के दौर में ग्रामीण परिवेश में महिला कलाकार आसानी से नहीं मिलते होंगे, यही वजह थी कि वे पुरुषों को महिलाओं की वेशभूषा में महिला किरदार निभाने के लिए प्रेरित करने लगे थे.

इस तरकीब के ज़रिए उन्होंने महिलाओं के मुद्दों को कुशलतापूर्वक दर्शाया और मंचित किया. भिखारी ठाकुर से प्रेरणा लेते हुए दूसरे लोक कलाकारों ने भी नाच पार्टियों का गठन किया, जो टीवी और इंटरनेट के दौर से पहले ग्रामीण समाज में लोगों का मनोरंजन किया करते थे.

आज तकनीक और प्रोद्यौगिक का दौर बढ़ा है और मनोरंजन के तमाम नए विकल्प मौजूद हैं. लेकिन क्या उन सवालों का हल मिल गया है जिसे भिखारी ठाकुर ने अपने लोक नाटकों के माध्यम से उठाया था?

इसका जवाब है नहीं.

आज भी समाज में नशाखोरी और दहेज प्रथा मौजूद है. समाज में आज भी असमानता, भेदभाव और अन्याय मौजूद हैं. जाति और धर्म के नाम पर सामाजिक उत्पीड़न हो रहा है. समाचार पत्रों और समाचार चैनलों में उपेक्षित लोगों और महिलाओं पर अत्याचार की ढेरों कहानियां आती रहती हैं और सरकारें इस समस्या से उबरने के लिए नए क़ानून बनाने और उसे लागू करने में व्यस्त हैं.

Bhikhari Thakur Repertory Training & Research Centre

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भिखारी ठाकुर की विरासत बचाए रखना ज़रूरी

ऐसे में भिखारी ठाकुर की विरासत को बचाए रखना बेहद ज़रूरी है. राहुल सांकृत्यायन ने ठीक ही ज़ोर देकर कहा है, "भिखारी ठाकुर की कला और साहित्य में सभी गुण विद्यमान हैं. बस ज़रूरत इस बात की है कि उनकी कृतियों वाले सोने की खान से चमचमाते आभूषण तैयार किए जाएं."

ज़ाहिर है, राहुल सांकृत्यायन ने भिखारी ठाकुर पर और अधिक शोध और अध्ययन की ज़रूरत बताई है.

कुछ विश्लेषक शिष्टता के साथ भिखारी ठाकुर की तुलना 16वीं सदी के विख्यात नाटककार शेक्सपियर से करते हैं और उन्हें 'भोजपुरी का शेक्सपियर' के रूप में याद करते हैं. लेकिन शैक्षणिक दृष्टि से यह अधिक विवेकपूर्ण है कि भिखारी ठाकुर को भिखारी ठाकुर ही रहने दिया जाए और भारतीय संदर्भ में उनका अधिक अध्ययन किया जाए.

भिखारी ठाकुर के जीवन का बड़ा हिस्सा ग्रामीण इलाकों में आम लोगों को परेशान करने वाले मुद्दों पर जीवंत प्रस्तुतियों में गुज़रा.

उन्होंने और उनकी मंडली ने बिहार, बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और नेपाल के कुछ हिस्सों की यात्राएं भी कीं, लेकिन उनकी कला मॉरीशस, गायाना, सूरीनाम, टोबैगो और कई अन्य अफ्रीकी देशों तक पहुंची जहां भारत से गिरमिटिया मज़दूर गए थे.

भिखारी ठाकुर अपने परिवेश में रामलीला और रासलीला देखते हुए बड़े हुए थे.

जीवन के अंतिम सालों में उन्होंने अपना अधिकांश समय भगवान राम, सीता, कृष्ण और गणेश की भक्ति में बिताए. विरासत में लोक नाटक और लोक कथाओं के विशाल भंडार छोड़कर 10 जुलाई 1971 को पैतृक गांव में भिखारी ठाकुर का निधन हुआ था.

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प्रेमचंद / जयचन्द प्रजापति

 कलम के जादूगर-मुंशी प्रेमचंद्र ++++++++++++++++++ आजादी के पहले भारत की दशा दुर्दशा देखकर सबका कलेजा फट रहा था.दयनीय हालत हमारे देश के समाज...