गुरुवार, 26 जनवरी 2023

विश्व में हिंदी : संजय जायसवाल

 

कविसमीक्षक और संस्कृति कर्मी।विद्यासागर 


विश्वविद्यालयमेदिनीपुर में सहायक प्रोफेसर।

आज दुनिया के लगभग 150 विश्वविद्यालयों और संस्थानों में हिंदी में पठन-पाठन एवं शोध के कार्य हो रहे हैं।विदेशों से कई हिंदी पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा है।हाल में अबू धाबी के न्यायालयों में हिंदी को तीसरी भाषा का दर्जा दिया गया है।2008 के न्यूयार्क में हुए विश्व हिंदी सम्मलेन में हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा के तौर पर शामिल करने की मांग की गई थी।फलस्वरूप संयुक्त राष्ट्र संघ ने हाल में एक फैसला लेकर हिंदी में रेडियो और समाचार बुलेटिन का प्रसारण शुरू किया है।2016 में विश्व आर्थिक मंच ने दुनिया की दस सर्वाधिक बोली जाने वाली और महत्वपूर्ण भाषाओं की सूची में हिंदी को शामिल किया है।

वैश्वीकरण के इस चुनौतीपूर्ण समय में हिंदी का प्रयोग और प्रभाव वैश्विक पटल पर बना हुआ है।इंटरनेट पर हिंदी के सैकड़ों कंटेंट डेवेलप हुए हैं।हिंदी के उपभोक्ताओं की बढ़ती संख्या से समझ सकते हैं कि हिंदी का संजाल फैल रहा है।एक बड़ा सवाल यह है कि दुनिया के देशों में हिंदी का प्रयोग और शिक्षा में स्थान कितना बढ़ा है, क्योंकि एक तथ्य यह है कि कैंब्रिज विश्वविद्यालय जैसी कुछ जगहों पर दशकों से चल रहा हिंदी का पाठ्यक्रम स्थगित कर दिया गया है।विदेशों के भारतीय युवक-युवतियों में हिंदी सीखने की प्रवृत्ति कम हो रही है।

इस परिचर्चा में विदेश में रहने वाले विद्वानों के विचार हैं।यहां हम उनके देश में हिंदी की स्थिति और उपस्थिति के बारे में जान सकते हैं।

सवाल : भूमंडलीकरण के बाद पहले से बहुत अधिक अंग्रेजीमय हो चुके विश्व में हिंदी की क्या स्थिति हैभारतीय परिवारों में हिंदी की क्या स्थिति हैहिंदी शिक्षण के स्तर और स्थिति पर थोड़ा प्रकाश डालें।आप इधर क्या लिख रहे हैं?

फ्रेंचेस्का ऑर्सीनी

लंदन यूनिवर्सिटी की भूतपूर्व प्रो़फेसर और हिंदी की सुप्रसिद्ध विदुषी।चर्चित पुस्तकें :हिंदी का लोकवृत्त, ‘बफ़ॉर दे डिवाइड’ और  हाल में हिंग्लिश लाइव’ (रविकांत के साथ)

यू.केमें विद्यार्थी हिंदी खोज लेते हैं

यू.के. में भारत से आनेवाले परिवार ज़्यादातर पंजाब या गुजरात से आए थे, या तो सीधे हिंदुस्तान से या पूर्वी अफ्रीका में बसकर उखड़ने के बाद।इसलिए उनकी मातृभाषा पंजाबी या गुजराती थी।फिर भी उनके बच्चों ने अंग्रेज़ी और घरेलू पंजाबी और गुजराती के साथ साथ हिंदी को भी किसी तरह, ख़ासकर फ़िल्मों के ज़रिए या फिर कम्यूनिटी सेंटर्स के मा़र्फत, अपनाया।कुछ लोग हिंदी प्रदेश से भी यहां आए, सो उनके घर में हिंदी बोली जाती थी।इसलिए, यूं देखा जाए तो यू.के. में हिंदी में लिखने और पढ़नेवालों की तादाद कम नहीं है, जिसकी गवाही ‘पुरवाई जैसी पत्रिका और ‘कथा यू.के.’ जैसी संस्था देती हैं, भले उनके सदस्य ज्यादातर बुजुर्ग होते हों।लंदन में जब जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल के हिंदी से संबंधित प्रोग्राम होते हैं, तो यू.के. का हिंदी समुदाय आकर इकट्ठा हो जाता है।

मैंने तीन दशक तक यू.के. के विश्वविद्यालयों में हिंदी और विशेषकर हिंदी साहित्य को पढ़ाया।इस सिलसिले में दुनिया भर के विद्यार्थियों को देखा।उनमें यू.के. के प्रवासी भारतीयों के बच्चे भी थे और भारत और पाकिस्तान से आए विद्यार्थी भी।दोनों को मौखिक हिंदी में रवानगी थी, मगर हिंदी में लिखाई-पढ़ाई का वास्ता काफ़ी सीमित था।साहित्य की रुचि, उन्होंने अंग्रेज़ी किताबों से ही पाई थी।रश्दी और अरुंधती रॉय को सबने पढ़ा था, निराला या रेणु या गीतांजलि श्री का नाम भी किसी ने नहीं सुना था, और सुनते भी कैसे? यू.के. के बच्चों को ख़ैर हिंदी साहित्य की कोई जानकारी थी ही नहीं, मगर भारत से आए बच्चों ने भी स्कूली दिनों के बाद हिंदी साहित्य से रिश्ता तोड़ा था।इसके प्रति उदासीन या निराश-से  हो गए थे।

मेरा काम यह था कि उनको जताऊं कि हिंदी साहित्य में बहुत सारे अच्छे और दिलचस्प लेखक और किताबें मौजूद हैं।कभी किसी मुद्दे के बहाने तो कभी भाषा की बारीकियों को सिखाने के वास्ते उनको मन्नू भंडारी की कहानियां, फणीश्वरनाथ रेणु के ‘मैला आँचल’ और ‘परती परिकथा’, कृष्णा सोबती का ‘दिलोदानिश’, और गीतांजलि श्री के ‘माई’ और ‘हमारा शहर उस बरस’ को पढ़ाती।जिनकी किसी एक साहित्यिक विधा में रुचि थी, उनको उसके हिंदी नमूने दिखाती।जब उनको दूसरे विषयों के लिए भी पर्चे लिखने होते तो उनको हिंदी के मजेदार पाठ सुझाती, ताकि उनको लगे कि दुनिया में अंग्रेजी के अलावा दूसरी भाषाओं में भी लोग सोचते हैं, और उनको पढ़ने से दिमाग़ खुल जाता है।इसी तरह ये विद्यार्थी यू. के. में आकर हिंदी की पुनः खोज करते रहे।

भाषा को लेकर लोगों के दिमाग में कई अवधारणाएं हैं जो परस्पर-विरोधी हैं और अकसर कष्ट पैदा करती हैं।जैसे अगर आप अंग्रेजी को तरजीह देते हैं तो हिंदी को नाकाफी या तुच्छ समझकर।आप हिंदी राष्ट्रभाषा पर गर्व करेंगे तो आपको लगेगा कि उसके लिए उर्दू  नकारना जरूरी है।साथ ही आप हिंदी की कोई एक किताब को हाथ नहीं लगाएंगे और अपने बच्चों से कहेंगे कि अंग्रेजी पर खास ध्यान दो।भाषा को लेकर इतनी उलझी हुई सोच रखना हिंदुस्तान में ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में उस फैले गहरे यथार्थ से मुंह मोड़ना है, जिसके तहत हमारे परिवारों में, हमारे माहौल में और हमारे इतिहास में लोग एक से अधिक भाषा सीखते, बोलते और पढ़ते आए हैं।

क्या एक से अधिक भाषा पर गर्व करना नामुमकिन या मना है? क्या अंग्रेजी को सीखने के लिए यह जरूरी है कि मैं अपनी हिंदी, पंजाबी, भोजपुरी या इतालवी को भूल जाऊं, या उनको ठुकराऊं? कतई नहीं।हमारे पूर्वजों ने ऐसा नहीं किया था, और षड्भाषी होना विशेष गुण समझते थे।भूमंडलीकरण के इस दौर में अंग्रेजी काम और संपर्क की भाषा ज़रूर हो गई है, मगर उनके ज्यादातर बोलनेवाले मूल अंग्रेजी भाषी नहीं होते और यही उसकी सांस्कृतिक समृद्धि और पहचान है।

ईमेल– fo@soas.ac.uk


रवींद्र बाबू के साहित्य से).......

 कलकत्ता के दो सेठों ने नाविकों से शर्त बदी कि जो अपनी नाव से हुगली पहले पार कर लेगा, उसे पुरस्कार मिलेगा। रात का समय तय हुआ। दोनों नाविकों ने अपने-अपने ख़ेमे के नाव खेने वालों को ख़ूब दारू पिलाई और रात दस बजे से नावें बढ़ने को तैयार। हुंकार भरी और नाव खेने लगे। सुबह का सूरज उगते ही दोनों नौकाओं के मुख्य नाविक ने शंख ध्वनि की। पर यह क्या, शंख ध्वनि एक साथ हुई। दोनों ने परदा हटा कर देखा तो पाया कि दोनों नावें समानांतर खड़ी हैं। और झांका तो पता चला कि दोनों नावें उसी किनारे पर हैं, जहां से चली थीं। नाविक नीचे उतरे तो देखा, कि अरे नावें तो खूँटे से ही बँधी रह गईं। भारत के समाज का यही हाल है। हुँकारा तो खूब भरते हैं लेकिन धर्म और समुदाय तथा जाति के खूँटे से अपनी नावें खोल नहीं रहे।


(रवींद्र बाबू के साहित्य से)

प्रिय, मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ! /

प्रिय, मैं तुम्हारे ध्यान में हूँO!

वह गया जग मुग्ध सरि-सा मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ!

तुम विमुख हो, किन्तु मैं ने कब कहा उन्मुख रहो तुम?

साधना है सहसनयना-बस, कहीं सम्मुख रहो तुम!


विमुख-उन्मुख से परे भी तत्त्व की तल्लीनता है-

लीन हूँ मैं, तत्त्वमय हूँ, अचिर चिर-निर्वाण में हूँ!

मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ!

क्यों डरूँ मैं मृत्यु से या क्षुद्रता के शाप से भी?


क्यों डरूँ मैं क्षीण-पुण्या अवनि के सन्ताप से भी?

व्यर्थ जिस को मापने में हैं विधाता की भुजाएँ-

वह पुरुष मैं, मर्त्य हूँ पर अमरता के मान में हूँ!

मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ!

रात आती है, मुझे क्या? मैं नयन मूँदे हुए हूँ,


आज अपने हृदय में मैं अंशुमाली की लिये हूँ!

दूर के उस शून्य नभ में सजल तारे छलछलाएँ-

वज्र हूँ मैं, ज्वलित हूँ, बेरोक हूँ, प्रस्थान में हूँ!

मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ!


मूक संसृति आज है, पर गूँजते हैं कान मेरे,

बुझ गया आलोक जग में, धधकते हैं प्राण मेरे।

मौन या एकान्त या विच्छेद क्यों मुझ को सताए?

विश्व झंकृत हो उठे, मैं प्यार के उस गान में हूँ!


मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ!

जगत है सापेक्ष, या है कलुष तो सौन्दर्य भी है,

हैं जटिलताएँ अनेकों-अन्त में सौकर्य भी है।

किन्तु क्यों विचलित करे मुझ को निरन्तर की कमी यह-


एक है अद्वैत जिस स्थल आज मैं उस स्थान में हूँ!

मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ!

वेदना अस्तित्व की, अवसान की दुर्भावनाएँ-

भव-मरण, उत्थान-अवनति, दु:ख-सुख की प्रक्रियाएँ


आज सब संघर्ष मेरे पा गये सहसा समन्वय-

आज अनिमिष देख तुम को लीन मैं चिर-ध्यान में हूँ!

मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ!

बह गया जग मुग्ध सरि-सा मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ!

प्रिय, मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ!


                                   ◆अज्ञेय

शमशेर बहादुर सिंह

 शाम का बहता हुआ दरिया कहाँ ठहरा!

साँवली पलकें नशीली नींद में जैसे झुकें

चाँदनी से भरी भारी बदलियाँ हैं,

ख़ाब में गीत पेंग लेते हैं

प्रेम की गुइयाँ झुलाती हैं उन्हें :

– उस तरह का गीत, वैसी नींद, वैसी शाम-सा है

वह सलोना जिस्म।


उसकी अधखुली अँगड़ाइयाँ हैं

कमल के लिपटे हुए दल

कसें भीनी गंध में बेहोश भौंरे को।


वह सुबह की चोट है हर पंखुड़ी पर।


रात की तारों भरी शबनम

कहाँ डूबी है!


नर्म कलियों के

पर झटकते हैं हवा की ठंड को।


तितलियाँ गोया चमन की फ़िज़ा में नश्तर लगाती हैं।


– एक पल है यह समाँ

जागे हुए उस जिस्म का!


जहाँ शामें डूब कर फिर सुबह बनती हैं

एक-एक –

और दरिया राग बनते हैं – कमल

फ़ानूस – रातें मोतियों की डाल –

दिन में

साड़ियों के से नमूने चमन में उड़ते छबीले; वहाँ

गुनगुनाता भी सजीला जिस्म वह –

जागता भी

मौन सोता भी, न जाने

एक दुनिया की

उमीद-सा,

किस तरह!


  ◆ शमशेर बहादुर सिंह


#❤️

मंगलवार, 24 जनवरी 2023

चेहरा देखा तुम्हारा- / विजय प्रकाश

 अजनबी इक चेहरे में

चेहरा देखा तुम्हारा- 

खुल गये अध्याय कितने

बंद पुस्तक के दुबारा।


पूर्व की खिड़की खुली,

छँटने लगा खुद ही अँधेरा,I

रश्मि-रथ पर चढ़ा आता

दिख रहा अद्भुत सबेरा;

रौशनी की बाढ़-सी

आने लगी चहुंओर से ज्यों

इक नदी इतनी बढ़ी कि

खो गया यह-वह किनारा।


खुल गये संदर्भ कितने

देह के, मन के मिलन के, 

खुल गये गोपन सभी

संसार के सुंदर सृजन के;

इस जगह इस मोड़ पर

अब प्रश्न बेमानी हुए कि 

कौन आया दौड़ता-सा

और किसने था पुकारा।


गंध का संसार केवल

रह गया चहुंओर अपने,

एक मिलकर हो रहे हैं

सच हमारे और सपने;

बिन्दु में ब्रह्माण्ड के

दर्शन सहज होने लगे हैं,

क्षीर-सागर में स्वयं

मिलने लगी है एक धारा।

                       * * *

- डॉ. विजय प्रकाश

सोमवार, 23 जनवरी 2023

लहसुन का प्रयोग

 रात को  से पहले कुछ दिन लहसून खाने से शरीर में क्या तब्दीली आती है?

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लहसुन का प्रयोग हर घर में सब्जी बनाते समय किया जाता है। कच्चे लहसुन में कई औषधीय गुण भी पाए जाते हैं। यह हमारे शरीर को बीमारियों से लडने की शक्ति प्रदान करता है। लहसुन का रोजाना सेवन स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना गया है।


रात को सोने से पहले कुछ दिन लहसुन खाने से शरीर में जो तब्दीलियां आती है, वह इस प्रकार हैं:-


1. लहसुन में पोषक तत्व होने के कारण यह पुरषों की शारीरिक कमजोरी को दूर करता है और मेल हार्मोन में भी इजाफा करता है।


2. यह खाना पचाने में मदद करता है। कब्ज और पेट गैस से हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाता है।


3. लहसुन का सेवन कोलेस्ट्रॉल को कम करता और दिल की बीमारियों को ठीक करता है। इसके रोजाना सेवन से हृदय सेहतमंद बना रहता है।


4. हमारे शरीर के विषैले पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है और संक्रामक बीमारियों में भी लाभकारी है ‌


5. तनाव और ब्लडप्रेशर को नियंत्रित करता है।


6. लहसुन के रोजाना सेवन से सर्दी और खांसी में बचाव होता है।


7. लहसुन के रोजाना सेवन करने से चेहरे पर चमक रहती है और भूख भी अच्छी लगती हैं।


8. लहसुन का प्रभाव सारे शरीर पर होता है। यह रक्त, ताकत और वीर्य बढ़ाने वाला है ‌


9. लहसुन का सेवन करने से क्षय रोग (टीबी) पास नहीं आता।क्षय रोग के लिए लहसुन एक वरदान है।


10. रात को नींद अच्छी आती है और रात को निकलने वाले पसीने को रोकता है।


11. जिन लड़कियों के वक्षस्थल का विकास ठीक तरह से न हो रहा हो उन्हें लहसुन का रोजाना सेवन करना चाहिए।


12. लहसुन का रोजाना सेवन करने से स्वप्नदोष की समस्या हमेशा के लिए खत्म हो जाती है।


13. इसके सेवन से पीलिया रोग भी ठीक हो जाता है और पेट के कैंसर होने का खतरा मिट जाता है।


14. यदि लहसुन का सेवन नियमित रूप किया जाए तो असमय ही बुढ़ापे का शिकार होने से बचा जा सकता है।


लहसुन खाने के बाद धनिया चबाने से इसकी गंध नहीं आती।


रात को खाना खाने के एक घंटे बाद लहसुन की 1–2 कलियां छीलकर चबा-चबाकर पानी के साथ निगल जाए। या इसे किसी चीज से पीसकर भी सेवन कर सकते हैं। तीन महीने इसका सेवन करें। 1–2 लहसुन की कलियां तो आप रोजाना भी ले सकते हैं। ज्यादा गर्मियों में एक क्लीं का ही सेवन करें।


लहसुन खाने से आने वाली गंध को दूर करने के लिए लहसुन को सुबह के समय पानी में भी भिगो सकते हैं।


(लहसुन की 50 ग्राम कलियां छीलकर शहद में डाल दें और ढक्कन को अच्छी तरह बंद कर दें। 10 दिन के बाद 1–2 कलियां रोजाना रात को सोने से पहले सेवन करें। यह एक सर्दियों का तोहफा है।

रविवार, 22 जनवरी 2023

मुंशी प्रेमचंद

 1


यह जमाना चाटुकारिता और सलामी का है तुम विद्या के सागर बने बैठे रहो, कोई सेंत (मुफ़्त) भी न पूछेगा।


- मुंशी प्रेमचंद


स्रोत : कायाकल्प


2


अब सब जने खड़े क्या पछता रहे हो। देख ली अपनी दुर्दशा, या अभी कुछ बाकी है। आज तुमने देख लिया न कि हमारे ऊपर कानून से नहीं, लाठी से राज हो रहा है। आज हम इतने बेशरम हैं कि इतनी दुर्दशा होने पर भी कुछ नहीं बोलते।


- मुंशी प्रेमचंद


[ स्रोत : समर यात्रा से .. ]


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3


मुंशी प्रेमचंद बहुत ही हसमुँख स्वभाव के थे, उनकी हँसी मशहूर थी। एक बार इलाहाबाद विश्वविद्यालय में एक व्याख्यान के उपरान्त एक छात्र ने उनसे पूछा- “आपके जीवन की सबसे बङी अभिलाषा क्या है?”


प्रेमचंद जी अपनी चिरपरिचित हँसी के साथ बोले- “मेरे जीवन की सबसे बङी अभिलाषा ये है कि ईश्वर मुझे सदा मनहूसों से बचाये रखे।”


प्रेमचंद जी 1916 से 1921 के बीच गोरखपुर के नोरमल हाई स्कूल में  में असिस्टेंट मास्टर  के पद पर रहे और इसी दौरान “सेवा सदन” सहित चार उपन्यासों की रचना की ।


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4


मुंशी प्रेमचंद 1935 के नवंबर महीने में दिल्ली आए। वे बंबई से वापस बनारस लौटते हुए दिल्ली में रुक गए थे। उनके मेजबान ‘रिसाला जामिया’ पत्रिका के संपादक अकील साहब थे। उन दिनों जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी करोल बाग में थी। उसे अलीगढ़ से दिल्ली शिफ्ट हुए कुछ समय ही हुआ था। प्रेमचंद और अकील साहब मित्र थे। जामिया में प्रेमचंद से मिलने वालों की कतार लग गई। इसी दौरान एक बैठकी में अकील साहब ने प्रेमचंद से यहां रहते हुए एक कहानी लिखने का आग्रह किया। ये बातें दिन में हो रही थीं। प्रेमचंद ने अपने मित्र को निराश नहीं किया। उन्होंने उसी रात को जामिया परिसर में अपनी कालजयी कहानी ‘कफन’ लिखी। वो उर्दू में लिखी गई थी। कफन का अगले दिन जामिया में पाठ भी हुआ। उसे कई लोगों ने सुना। ये कहानी त्रैमासिक पत्रिका ‘रिसाला जामिया’ के दिसंबर,1935 के अंक में छपी थी। ये अंक अब भी जामिया मिलिया इस्लामिया की लाइब्रेरी में है। ‘कफन’ को प्रेमचंद की अंतिम कहानी माना जाता है। 1936 में उनकी मृत्यु हो गई।


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विश्व में हिंदी : संजय जायसवाल

  परिचर्चा ,  बहस  |  2 comments कवि ,  समीक्षक और संस्कृति कर्मी।विद्यासागर  विश्वविद्यालय ,  मेदिनीपुर में सहायक प्रोफेसर। आज  दुनिया के ल...