मंगलवार, 9 अगस्त 2022

गुलज़ार के बहाने....../ आलोक यात्री

 गुलज़ार के बहाने

 खुसरो के कहे "ज़िहाल ए मस्कीं मकुन ब रंजिश..."

 की पड़ताल


आलोक यात्री 


  अपने समय में एक फिल्मी गीत "ज़िहाल ए मस्कीं मकुन ब रंजिश..." खूब लोकप्रिय हुआ था। यह गीत अपने समय में जितना लोकप्रिय हुआ था, उतना ही आज भी लोकप्रिय है।‌ लोकप्रिय होने के साथ यह कर्णप्रिय भी है।‌ गीत के बोल काफ़ी अजीब ओ ग़रीब हैं। फिल्म 'गुलामी' के इस गीत को भी लिखा गुलज़ार साहब ने ही है।‌ गीत के बोल "ज़िहाल ए मस्कीं मकुन ब रंजिश..." का अर्थ मालूम नहीं था। हो सकता है मेरी तरह कई अन्य लोगों को भी "ज़िहाल ए मस्कीं मकुन ब रंजिश..." का अर्थ शायद न पता हो। लेकिन आज जब यह गीत एक बार फिर सुना तो "ज़िहाल ए मस्कीं मकुन ब रंजिश..." फितरतन इस पंक्ति का अर्थ जानने की जिज्ञासा हुई। मेरी पड़ताल आगे बढ़े उससे पहले आप उस गीत से रू-ब-रू होइए जिसकी वजह से यह बात छिड़ी है

"जिहाल-ए-मस्कीं मकुन-ब-रन्जिश

बहाल-ए-हिजरा बेचारा दिल है

सुनाई देती है जिसकी धड़कन

तुम्हारा दिल या हमारा दिल है

     वो आके पहलू में ऐसे बैठे

     के शाम रंगीन हो गई है

     जरा जरा सी खिली तबीयत

     जरा सी गमगीन हो गई है

जिहाल-ए-मस्कीं मकुन-ब-रन्जिश...

     कभी कभी शाम ऐसे ढलती है

     के जैसे घूँघट उतर रहा है

     तुम्हारे सीने से उठता धुआँ

     हमारे दिल से गुजर रहा है

जिहाल-ए-मस्कीं मकुन-ब-रन्जिश...

     ये शर्म है या हया है क्या है

     नजर उठाते ही झुक गयी है

     तुम्हारी पलकों से गिर के शबनम

     हमारी आंखों में रुक गयी है

जिहाल-ए-मस्कीं मकुन-ब-रन्जिश

बहाल-ए-हिजरा बेचारा दिल है..."

  बाकी तो सब ठीक है। गीत भी आला-तरीन है। मामला बस "ज़िहाल-ए-मस्कीं मकुन-ब-रन्जिश बहाल-ए-हिजरा बेचारा दिल है..." पर ही अटका है। और यही पंक्तियां इस पूरे गीत का शबाब हैं। "ज़िहाल-ए-मस्कीं मकुन-ब-रन्जिश बहाल-ए-हिजरा बेचारा दिल है..." का मानी न जानते हुए भी यह गीत बार-बार सुनने की इच्छा होती है।

  फारसी की एक अदीब मित्र से "ज़िहाल-ए-मस्कीं मकुन-ब-रन्जिश बहाल-ए-हिजरा बेचारा दिल है..." का अर्थ पूछा तो उन्होंने इसका अर्थ कुछ यूं बताया -"गरीब की बदहाली को नज़रअंदाज न करो"। एक और उस्ताद से जानना चाह तो उन्होंने इन पंक्तियों की तफसील बताते हुए कहा कि "ज़िहाल" का अर्थ होता है -ध्यान देना या गौर फ़रमाना, "मिस्कीं" का अर्थ है -गरीब, "मकुन" के मायने हैं -नहीं और "हिज्र" का अर्थ है -जुदाई। उनके अनुसार इन पंक्तियों का भावार्थ यह निकला कि "मेरे इस गरीब दिल पर गौर फरमाएं और इसे रंजिश से न देखें। बेचारे दिल को हाल ही में जुदाई का ज़ख्म मिला है।"

 लेकिन... इन पंक्तियों का यह अर्थ जान कर भी तसल्ली नहीं हुई तो सिरखपाई का यह सिलसिला आगे बढ़ता हुआ अमीर खुसरो तक जा पहुंचा। गुलज़ार साहब के "गुलामी" फिल्म के लिए लिखे गए इस गीत की पंक्तियां असल में अमीर खुसरो की एक कविता से प्रेरित हैं। जो फारसी और ब्रज भाषा के मिले-जुले रूप में लिखी गई थी। अब जरा अमीर खुसरो के लिखे पर भी गौर फ़रमाया जाए। जिसकी एक पंक्ति फारसी में तो एक ब्रज भाषा में लिखी गई है...

-"ज़िहाल-ए मिस्कीं मकुन तगाफ़ुल

    दुराए नैना बनाए बतियां।

कि ताब-ए-हिजरां नदारम ऐ जान,

     न लेहो काहे लगाए छतियां।

शबां-ए-हिजरां दरज़ चूं ज़ुल्फ़

वा रोज़-ए-वस्लत चो उम्र कोताह,

     सखि पिया को जो मैं न देखूं

     तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां।

यकायक अज़ दिल, दो चश्म-ए-जादू

ब सद फ़रेबम बाबुर्द तस्कीं,

     किसे पड़ी है जो जा सुनावे

     पियारे पी को हमारी बतियां।

  क्या बेहतरीन प्रयोग किया है अमीर खुसरो ने फारसी और ब्रज भाषा का। "ज़िहाल-ए मिस्कीं मकुन तगाफ़ुल, दुराए नैना बनाए बतियां। कि ताब-ए-हिजरां नदारम ऐ जान, न लेहो काहे लगाये छतियां"... का अर्थ समझते हैं। इसका अर्थ है -"मुझ गरीब की बदहाली को नज़रंदाज़ न करो, नयना चुरा के और बातें बना के।"

  गौरतलब है कि अमीर खुसरो मिज़ाज और कलाम दोनों से ही सूफियाना तुर्क वंश के खड़ी बोली हिंदी के पहले कवि हैं। मध्य एशिया की लाचन जाति के तुर्क सैफुद्दीन के पुत्र अमीर खुसरो का जन्म सन 652 हिजरी में एटा (उत्तर प्रदेश) के पटियाली नामक कस्बे में हुआ था। लाचन जाति के तुर्क चंगेज खां के आक्रमणों से पीड़ित होकर बलवन (1266 ईस्वी) के राज्यकाल में शरणार्थी के रूप में भारत में आ बसे थे। खुसरो की मां बलबन के युद्धमंत्री इमादुतुल मुलक की लड़की, एक भारतीय मुसलमान महिला थी। सात वर्ष की अवस्था में खुसरो के पिता का निधन हो गया था। खुसरो ने किशोरावस्था में कविता लिखना प्रारम्भ किया और बीस वर्ष के होते-होते वे कवि के रूप में प्रसिद्ध हो गए। 

  खुसरो ने सामाजिक जीवन की अवहेलना कभी नहीं की। खुसरो ने अपना सारा जीवन राज्याश्रय में ही बिताया। राजदरबार में रहते हुए भी खुसरो हमेशा कवि, कलाकार, संगीतज्ञ और सैनिक ही बने रहे। भारतीय गायन में क़व्वाली और सितार को इन्हीं की देन माना जाता है। इन्होंने गीत की तर्ज पर फ़ारसी में और अरबी ग़जल के शब्दों को मिलाकर कई पहेलियां और दोहे लिखे।

  खुसरो ने दिल्ली वाली बोली अपनाई जिसे कालांतर में ‘हिंदवी’ नाम दिया गया। खुसरो ने सौ के करीब पुस्तकें लिखीं। जिनमें से अब कुछ ही मौजूद हैं। लेकिन उनके गीत, दोहे, कहावतें, पहेलियां और मुकरियां उन्हें आज भी आवाम में जिंदा रखे हुए हैं। कव्वालों की कई पीढ़ियां सदियों से उन्हें गाती आ रही हैं। जीवन के बहुत सारे प्रसंगों में खुसरो रोज़ याद आने वाले कवियों में से एक हैं।


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रविवार, 7 अगस्त 2022

वेद मित्र शुक्ल के सावन पर सात हिंदी सॉनेट


सावन


 वेद मित्र शुक्ल के सावन पर सात हिंदी सॉनेट


1.

सावन आया है 


सावन है एक माह का, पर, मन हरा भरा

ज़िंदादिल होकर जीता यह अपना जीवन

साथी बदरा भी तो है निशदिन सदा झरा

कैसे भी छूने को धरती का अंतर्मन।


पुरवइया हैं साँसें रितु पावस आह भरे

मधुरितु को कौन भला तड़पाए यारब!

पी-पी करता चातक तो कोई दर्द हरे

है कौन विरह पावक से बच पाए यारब?


पर, दिन जो भी हैं मिले दोस्त! जी भर रहना

हिस्से में जो भी विरह-प्रेम होता जीना,

धरती से नभ तक होकर सावन-सा बहना

शंकर की भाँति गरल भी तो होता पीना।


सावन आया है, जाएगा, फिर आएगा,

जैसे भी हो खुशतर जीना सिखलाएगा।


2.

सावन, कविता, तुम औ शाम


तुमने जो कविता उस शाम सुनायी थी ना

सुनता रहता हूँ अब भी भीतर ही भीतर

सच में, साथ-साथ दिल्ली के कविता जीना

आसां कब, पर, तुम भी तो कवि हो यह दीगर।


सावन की थी उमस किन्तु तुम सहज रहे थे

साधा होगा बारिश, ग्रीष्म, नमी जीवन में

आँखें चुप थी कविता के सुर बोल रहे थे

अच्छा ही है यों रहना कविता वाचन में।


‘क्या चीनी, क्या पाकिस्तानी मानुष हैं सब’

खतरा पैदा करता होगा ऐसे कहना 

समझे है कब भीड़, मॉब-लिंचिंग का युग जब

पर, तुम भी तो; ऐसे ही है तुमको रहना।


सावन, कविता, तुम औ शाम सुनहरी यादें

मेरे खातिर तो ये हुईं शायरी यादें।


3.

फिर इस सावन


पानी-पानी फिर इस सावन शहर हुआ है

पहिये थमे हुए हैं भारी जाम लगा जी

कौन भला जो इसका जिम्मेदार मुआ है

छोड़ो भी, बतलाएं किनका नाम लगा जी?


लजा रही हैं सड़कें अपना हाल देखकर

गड्ढे भर आए हैं जैसे ताल-तलैया

राहगीर ऐसे में माना गुज़र रहे, पर

ऊपर वाला ही मालिक है इनका भैया!


सरकारी दस्तावेज़ों में साफ सफाई

और मरम्मत सड़कों की बारिश से पहले

इन पर जो भी खर्च हुआ है पाई पाई

दर्ज सभी, लेकिन, ज़मीन पर देखो घपले।


कब तक यों बतलाव अत्याचार सहेंगे

चुप्पी साधे रहे अगर, दुर्भाग्य कहेंगे।


4.

ऋतुओँ में है कौन यहाँ, है जैसा सावन?


अनजानेपन में भी हैं जाने से लगते

शायद मौसम का जादू छाया है मितवा!

अनचीन्ही गर्माहट में दोनों ही पगते

सच बतलाऊँ, तो सावन आया है मितवा!


माना बदरा धरती को जाने औ माने

सागर-नदिया से है नाता बड़ा पुराना

लेकिन, भू भी क्या हर इक बदरा को जाने

झरते हैं गुमनाम बने क्या खोना-पाना? 


छाए रहते देखो नित ही नए नवेले

बदरा कारे-कारे हरियाली लाने को 

ठाना सावन ने ही मेघों के ये मेले

मेल-जोल अजनबियों में भी फैलाने को।


ऋतुओँ में है कौन यहाँ, है जैसा सावन?

धरा-गगन का मेल कराए ऐसा सावन।


5.


सावन के मेघों-सा हो



शब्द शब्द हो, बसा गीत जो भीतर, बरसे

प्यास बुझे, ऐ सुनने वालों! बस, इतना मन

भीगो, अवसर है आया, थे जो भी तरसे

सच पूछो, झूमे-गाए अब अपना सावन।


दादुर, मोर, पपीहा ज्यों सब हिलमिल गाएं

नहीं मियाँ-मल्हार, मग़र, कमतर भी है कब?

मस्ती के सुर कैसे भी हों सबको भाएं

गीतों की दुनिया का यह भी तो है इक ढब।


सावन, साजन, बादल, बारिश औ यह धरती

बोल हुए हैं पंक्ति-पंक्ति के, नव रस घोले

हर इक मन को भिगो रहे हैं बारिश झरती

मनवा डोल रहा, देखो, तन भी अब डोले।


बसे गीत भीतर मानो असली धन पाया

सावन के मेघों-सा हो झरने को आया।


6.

बदरा जैसे कवि की कविता 


बदरा जैसी कवि की कविता उमड़े-घुमड़े

गरजे-बरसे रह-रहकर के आसमान से 

आखर-आखर शब्द-शब्द जब रहें न टुकड़े 

कविता रचते कथ्य-भाव के गीतगान से।


भीगे देखो तन हो या मन बनके सावन 

बूँदें पैठी भीतर तक जगमगा रही हैं 

धरती के ऊपर और भीतर जलमय जीवन 

ताल-तलैया, पोखर, नदिया पुनः बही हैं।


रचने वाले इन मेघों को, खोए इनमें 

जैसे कवि मैं कविता हो या कविता में कवि 

काले मेघा तैर रहे हैं उजले दिन में 

ऐसे में तो सच बतलाऊं अद्भुत है छवि।


अनगिन रूपों वाले बदरा देखो भाते 

दूर गगन में कुछ यों गीत रचे हैं जाते।


7.

उम्मीदों के पेड़ उगेंगे 


कविताएँ, गज़लें, नगमे हैं उगा रहे हम

बैठे आस-पास देखो, ये, वे औ तुम भी

भीतर-बाहर बोल रहे औ कुछ गुमसुम भी

बो देंगे दो-चार बीज, अच्छा है मौसम।


बरसे थे बादल यों, बाकी नमी जमीं में

अखुवांयेंगे जल्दी ही हर बीज दोस्त! जो

कविता से कविता फूटेगी मन हरने को

कह पाएगा कौन भला तब कमी ज़मीं में।


अरे धरा तो माँ होती है, सच ही कहता

शब्द अर्थ भावों से इसको आओ सींचें

मसि कागद जो भी मिलता उनको हम भीचें

भीतर-भीतर कुछ तो है जो उगता रहता।


कविता है बोकर तो देखो यह तन-मन में

उम्मीदों के पेड़ उगेंगे फिर जीवन में।



संपर्क: अंग्रेजी विभाग, राजधानी महाविद्यालय,

दिल्ली विश्वविद्यालय, राजा गार्डन, नई दिल्ली-110015 

मोबा.: 9953458727, 9599798727

बनारस पर दो ग़ज़लें / वेद मित्र शुक्ला

 दो ग़ज़लें बनारस पर 🙏

(सोच विचार, जुलाई २०२२, के काशी अंक १३ में)

*1.*

इक नदिया को मान दिया है हर हर गंगे,

सबका ही उपकार किया है हर हर गंगे|


सुबह-ए-बनारस होती है ओ दोस्त! तभी तो,

कहने को आयी दुनिया है हर हर गंगे|


पाप मुक्त होता जल की कुछ छींटों से ही,

भोला-भाला या छलिया है हर हर गंगे|


देश-धर्म, रिश्ते-नाते औ गाँव-शहर ने-

कह-कहकर बस पुण्य लिया है हर हर गंगे|


बीच धार में दीप लिए उम्मीदों के औ –

फूलों वाली इक डलिया है हर हर गंगे|


*2.*


मौसम हो या बेमौसम हो थमे न रेला, चलो बनारस!

दुनियावी या देवों का हो, सबका मेला, चलो बनारस!


ढलने कब दे रौनक देखो, संध्या-वंदन घाट-घाट पर,

जगमग जगमग दीपाराधन है अलबेला, चलो बनारस!


दर्शन काशी-विश्वनाथ के करने सारा ही जग उमड़े,

जब भी, जैसे भी हों दर्शन, उत्तम बेला, चलो बनारस!


कंकर-कंकर में शंकर औ हर घर मंदिर महादेव के,

सब उसके ही, कौन सगा औ है सौतेला, चलो बनारस!


छोड़े है संसार साथ पर, प्यारी काशी साथ न छोड़े,

अंतिम क्षण भी कौन यहाँ पर रहा अकेला, चलो बनारस!


बाहर ही बाहर बस घूमें, भीतर कभी न देखा हमने

‘क्या खोया औ क्या पाया’ का छोड़ झमेला चलो बनारस!

                                               - वेद मित्र शुक्ल  

                     https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=pfbid02FGTwaSTY1ZcgLp1advrWx7WHKj8wq4DYi5j9yBPPe237zg4JQm9h16WjUbSPqeuol&id=1113073210

शनिवार, 6 अगस्त 2022

घर-घर तिरंगा फहरायें / अरविंद अकेला

 

घर-घर तिरंगा फहरायें / अरविंद अकेला 


अपनी तो दिल में यह आरजू,

घर-घर तिरंगा फहरायें,

चूमें अपनी पावन धरती को,

खुशी से सब नाचे गायें।

      अपनी तो दिल में...।


बड़ी मुश्किल से पायी आजादी,

इसे कभी भूल नहीं जायें,

रखें देश की हर सीमा सुरझित,

मिलकर सभी यह कसमें  खायें।

       अपनी तो दिल में...।


नहीं पालें गद्दार गाँव-शहर में,

नहीं आतंकी को घर में बसायें,

जहाँ कहीं दिखे कोई आतंकी,

अतिशीघ्र सब मार गिरायें।

       अपनी तो दिल में...।

      

हर दिल में रहे यह हिन्दुस्तान,

इसके लिए दे दें अपनी जान,

मुख पर रहे सदा वंदे मातरम,

विश्व विजयी तिरंगा लहरायें।

      अपनी तो दिल में...।

         ------0-----

      अरविन्द अकेला,पूर्वी रामकृष्ण नगर,पटना-27

शुक्रवार, 5 अगस्त 2022

रवि अरोड़ा की नजर से.....

 मुकाबला लाल सिंह चड्ढा और दूध पिलाने वालों में


रवि अरोड़ा



 टॉम हैंक्स अभिनीत मशहूर अंग्रेजी फिल्म फॉरेस्ट गंप मुझे बहुत अच्छी लगती है। अब तक कम से कम आधा दर्जन बार तो उसे देख ही चुका होऊंगा । तमाम दुश्वारियों के बावजूद यदि आगे बढ़ने की इच्छा हो तो कुदरत भी रास्ता नहीं रोक सकती, फिल्म का यह संदेश न जाने कितने लोगों के जीवन को रौशन कर गया होगा । फिल्म की अपार सफलता भी यह दर्शाती है कि उसने दुनिया भर के करोड़ों लोगों के दिलों को छुआ है। शायद यही वजह भी रही होगी मात्र 55 मिलियन डॉलर की लागत वाली इस फिल्म ने रिकॉर्ड तोड़ 683 मिलियन डॉलर कमाए और इतने अवॉर्ड जीते कि पूरी दुनिया में इस फिल्म का हल्ला मच गया । मुझे जब से पता चला हुई कि इसी फिल्म की रीमेक हिन्दी में लाल सिंह चड्ढा के नाम से बनी है, मन उसे देखने को बेताब है। यह देखना वाकई सुखद हो सकता है कि भारतीय पृष्ठभूमि में इस लाजवाब कहानी का फिल्मांकन कैसे किया गया होगा। हालांकि #boycottlaalsinghchaddha जैसे मैसेज मुझे भी रोज मिल रहे हैं मगर मुझे पता है कि यह शोर शराबा भी कुछ ऐसा ही है जैसे गधे से गिरने पर कोई गुस्सा कुम्हार पर उतारे। 


इसमें तो कोई शक नहीं कि मिस्टर परफेक्शनिस्ट के नाम से मशहूर आमिर खान ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को समृद्ध करने में महती योगदान दिया है। उनके खाते में सरफरोश, लगान, रंग दे बसंती, तारे जमीन पर, थ्री ईडियट्स, पीके और दंगल जैसी बेहतरीन फिल्में हैं जो आम जन मानस में देशभक्ति की भावना को प्रबल करने के साथ साथ अनेक सामाजिक संदेश भी देती हैं। उसके टीवी कार्यक्रम सत्यमेव जयते ने भी देश के असली नायकों से लोगों का परिचय कराया था ।  हालांकि उनकी फ़िल्म लाल सिंह चड्ढा अभी रिलीज नहीं हुई मगर ट्रेलर देख कर तो लोगबाग यही अनुमान लगा रहे हैं कि यह फिल्म भी उम्दा होगी और तारे जमीन पर फिल्म की तरह उन माता पिता के लिए प्रेरणादायक होगी जिनके बच्चे किसी न किसी शारीरिक अथवा मानसिक कमजोरी के साथ इस दुनिया में आए हैं। अपनी क्षमताओं को कम कर के आंकने वाले भी इस तरह की फिल्मों से सकारात्मता से यकीनन ओतप्रोत होते हैं। 


जहां तक फिल्म पीके में उन दृश्यों का सवाल है जिन्हें हिन्दू विरोधी ठहराया जा रहा है, कम से कम मुझे तो उसमें ऐसा कुछ नज़र नहीं आता । यह फिल्म तो पाखंड के खिलाफ गहरा संदेश देती है और पाखंड को ही धर्म समझने वाले यदि इससे खफा हैं तो कोई क्या कह सकता है। सच बताऊं तो लाल सिंह चड्ढा फिल्म का बॉयकॉट करने का शगूफा पूरी तरह राजनीतिक लगता है। एक के बाद एक बड़ी सरकारी विफलताओं से जनता का ध्यान हटाने को हर महीने जो एक शगूफा छोड़ा जाता है , यह उसकी ही नई कड़ी भर है। इस फ़िल्म की मुखालफत इस वजह से भी की जा रही है कि आमिर खान मुसलमान है और अनेक बार खरी खरी बातें भी कर देता है जो पाखंडियों को सहन नहीं होतीं। अब यह फिल्म चलेगी अथवा नहीं यह किसी को नहीं पता । आमिर खान का नाम होने का मतलब फिल्म के अच्छा होने की गारंटी यूं भी नहीं है। अपनी आख़िरी फिल्म ठग्स ऑफ हिंदुस्तान में उन्होंने लोगों को बेहद निराश किया था । अब इस फिल्म के साथ क्या होगा यह तो ग्यारह अगस्त के बाद पता चलेगा ही मगर साथ ही साथ यह भी पता चलेगा कि गणेश जी को दूध पिलाने वालों की तलवार की धार वक्त के साथ कुछ कुंद हुई है या पहले से भी अधिक पैनी।

गुरुवार, 4 अगस्त 2022

कालिदास और पनीहारिन संवाद


प्रस्तुति - रेणु दत्ता / आशा सिन्हा


कालिदास बोले :- माते पानी पिला दीजिए बड़ा पुण्य होगा.

स्त्री बोली :- बेटा मैं तुम्हें जानती नहीं. अपना परिचय दो।

मैं अवश्य पानी पिला दूंगी।

कालिदास ने कहा :- मैं पथिक हूँ, कृपया पानी पिला दें।

स्त्री बोली :- तुम पथिक कैसे हो सकते हो, पथिक तो केवल दो ही हैं सूर्य व चन्द्रमा, जो कभी रुकते नहीं हमेशा चलते रहते। तुम इनमें से कौन हो सत्य बताओ।


कालिदास ने कहा :- मैं मेहमान हूँ, कृपया पानी पिला दें।

स्त्री बोली :- तुम मेहमान कैसे हो सकते हो ? संसार में दो ही मेहमान हैं।

पहला धन और दूसरा यौवन। इन्हें जाने में समय नहीं लगता। सत्य बताओ कौन हो तुम ?

.

(अब तक के सारे तर्क से पराजित हताश तो हो ही चुके थे)


कालिदास बोले :- मैं सहनशील हूं। अब आप पानी पिला दें।


स्त्री ने कहा :- नहीं, सहनशील तो दो ही हैं। पहली, धरती जो पापी-पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है। उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज के भंडार देती है, दूसरे पेड़ जिनको पत्थर मारो फिर भी मीठे फल देते हैं। तुम सहनशील नहीं। सच बताओ तुम कौन हो ?

(कालिदास लगभग मूर्च्छा की स्थिति में आ गए और तर्क-वितर्क से झल्लाकर बोले)


कालिदास बोले :- मैं हठी हूँ ।

.

स्त्री बोली :- फिर असत्य. हठी तो दो ही हैं- पहला नख और दूसरे केश, कितना भी काटो बार-बार निकल आते हैं। सत्य कहें ब्राह्मण कौन हैं आप ?


(पूरी तरह अपमानित और पराजित हो चुके थे)


कालिदास ने कहा :- फिर तो मैं मूर्ख ही हूँ ।

.

स्त्री ने कहा :- नहीं तुम मूर्ख कैसे हो सकते हो।

मूर्ख दो ही हैं। पहला राजा जो बिना योग्यता के भी सब पर शासन करता है, और दूसरा दरबारी पंडित जो राजा को प्रसन्न करने के लिए ग़लत बात पर भी तर्क करके उसको सही सिद्ध करने की चेष्टा करता है।

(कुछ बोल न सकने की स्थिति में कालिदास वृद्धा के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना में गिड़गिड़ाने लगे)


वृद्धा ने कहा :- उठो वत्स ! (आवाज़ सुनकर कालिदास ने ऊपर देखा तो साक्षात माता सरस्वती वहां खड़ी थी, कालिदास पुनः नतमस्तक हो गए)

माता ने कहा :- शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार । तूने शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और अहंकार कर बैठे इसलिए मुझे तुम्हारे चक्षु खोलने के लिए ये स्वांग करना पड़ा।

.

कालिदास को अपनी गलती समझ में आ गई और भरपेट पानी पीकर वे आगे चल पड़े।


शिक्षा :-

विद्वत्ता पर कभी घमण्ड न करें, यही घमण्ड विद्वत्ता को नष्ट कर देता है।

दो चीजों को कभी व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए.....

अन्न के कण को

"और"

आनंद के क्षण को...

(साभार)🚩🙏🇮🇳


शिवतत्व



प्रस्तुति - रेणु दत्ता / आशा सिन्हा


धर्मराज युधिष्ठिर ने जब भीष्म जी से शिवतत्त्व के सम्बन्ध में प्रश्न किया, तब उन्होंने अपनी असमर्थता प्रकट करके कहा कि "श्रीकृष्ण उनकी कृपा के पात्र हैं, उनकी महिमा को जानते हैं और वही कुछ वर्णन भी कर सकते हैं।" 

युधिष्ठिर के प्रश्न से श्रीकृष्ण ने शान्त, समाहित होकर यही कहा कि "भगवान की महिमा तो अनन्त है, तथापि उन्हीं की कृपा से उनकी महिमा को अति संक्षेप में कहता हूँ।" यह कह कर बड़ी ही श्रद्धा से उन्होंने शिव-महिमा का गायन किया। विष्णु भगवान ने तो अपने नेत्रकमल से भगवान की पूजा की है। उसी भक्त्त्युद्रेक से उन्हें सुदर्शन चक्र मिला है।


शिव-विष्णु को तो परस्पर में ऐसा उपास्योपासक सम्बन्ध है कि जो अन्यत्र हो ही नहीं सकता। तम काला होता है। और सत्त्व शुल्क, इस दृष्टि से सत्त्वोपाधिक विष्णु को शुक्लवर्ण होना था और तम उपाधिक रुद्र कृष्णवर्ण होना था और सम्भवतः हैं भी वे स्वरूपः वैसे ही, परन्तु परस्पर एक-दूसरे की ध्यानजनित तन्मयता से दोनो के ही स्वरूप में परिवर्तन हो गया। अर्थात् विष्णु कृष्णवर्ण और रुद्र शुक्लवर्ण हो गये। 


मुरलीरूप से कृष्ण के अधरामृतपान का अधिकार शिव को ही हुआ। श्रीकृष्ण अपने अमृतमय मुखचन्द्र पर, सुमधुर अधरपल्लव पर पधराकर अपनी कोमलांगुलियो से उनके पादसंवाहन करते, अधरामृत का भोग धरते, किरीट-मुकुट का छत्र धरते और कुण्डल से नीराजन करते हैं श्रीराधारूप से श्रीशिव का प्राकट्य होता है, तो कृष्णरूप से विष्णु का, कालीरूप विष्णु का तो शंकररूप से शिव का। "या उमा सा स्वयं विष्णुः" ( रुद्रहृदयोपनिषत् ५ ) इस तरह ये दोनों उभय-उभयात्मा, उभय उभयभावात्मा हैं। 


श्रीशिव का सगुण स्वरूप भी इतना अद्भत, मधुर, मनोहर और मोहक है कि उस पर सभी मोहित हैं। भगवान को तेजोमयी दिव्य, मधुर, मनोहर विशुद्धसत्त्वमयी, मंगलमयी मूर्ति को देखकर स्फटिक, शंख, कुन्द, दुग्ध, कर्पूरखण्ड, श्वेताद्रि, चन्द्रमा सभी लज्जित होते हैं। अनन्तकोटि चन्द्रसागर के मन्थन से समुद्रभूत, अद्भुत, अमृतमय, निष्कलंक पूर्णचन्द्रक भी उनके मनोहर मुखचन्द्र की आभा से लज्जित हो उठता है। मनोहर त्रिनयन, बालचन्द्र एवं जटामुकुट पर दुग्धधवल स्वच्छाकृति गंगा की धारा हठात मन को मोहती है।


हस्ति-शुण्ड से समान विशाल, भूतिभूषित, सुडोल, गोल, तेजोमय अंगद-कंकण-शोभित भुजा, मुक्ता मोतियों के हार, नागेन्द्रहार, व्याघ्रचर्म, मनोहर चरणारविन्द और उनमें सुशोभित नखमणिचन्द्रिकाएँ भावुको को अपार आनन्द प्रदान करती हैं। हिमाद्रि के समान धवलवर्ण स्वच्छ नन्दीगण पर विराजमान रुदाशक्तिरूपा श्रीउमा के संग श्रीशिव ठीक वैसे ही शोभित होते हैं, जैसे धर्मतत्त्व के ऊपर ब्रह्मविद्यासहित ब्रह्म विराजमान हों, किंवा माधुर्याधिष्ठात्री महाशक्ति के साथ मूर्तिमान होकर परमानन्दरसामृतसिन्धु विराजमान हो।


भगवान की ऐसी सर्वमनोहारिता है कि सभी उनके उपासक हैं। कालकूट विष और शेषनाग को गले में धारण करने से भगवान की मृत्यंजयरूपता स्पष्ट है। जटामुकुट में श्रीगंगा को धारण कर विश्वमुक्ति मूल को स्वाधीन कर लिया। अग्निमय तृतीय नेत्र के समीप में ही चन्द्रकला को धारण कर अपने संहारकत्व-पोषकत्वरूप विरुद्ध धर्माश्रयत्व को दिखलाया। सर्वलोकाधिपति होकर भी विभूति और व्याघ्रचर्म को ही अपना भूषण-वसन बनाकर संसार में वैराग्य को ही सर्वापेक्षया श्रेष्ठ बतलाया।


आपका वाहन नन्दी, तो उमा का वाहन सिंह, गणपति का वाहन मूषक, तो स्वामी कार्तिकेय का वाहन मयूर है। मूर्तिमान त्रिशूल और भैरवादिगण आपकी सेवा में सदा संलग्न हैं। ब्रह्मा, विष्णु, राम, कृष्णादि भी उनकी उपासना करते हैं। नर, नाग, गन्धर्व, किन्नर, सुर, इन्द्र, बृहस्पति, प्रजापति प्रभृति भी शिव की उपासना में तल्लीन हैं।


इधर तामस से तामस असुर, दैत्य, यज्ञ, भूत, प्रेत, पिशाच, बेताल, डाकिनी, शाकिनी, वृश्चिक, सर्प, सिहं सभी आपकी सेवा में तत्पर हैं। वस्तुतः परमेश्वर का लक्षण भी यही है कि उसे सभी पूजें। 


पार्वती के विवाह में जब भगवान शंकर प्रसन्न हुए, तब अपनी सौन्दर्य-माधुर्य-सुधामयी दिव्य मूर्ति का दर्शन दिया। बरात में पहले लोग इन्द्र का ऐश्वर्य, माधुर्य देखकर मुग्ध हो गये, समझा कि यही शंकर हैं और उन्हीं की आरती के लिये प्रवृत्त हुए।


जब इन्द्र ने कहा कि "हम तो श्रीशंकर के उपासकों के भी उपासकों में निम्नतम हैं", तब उन लोगों न प्रजापति ब्रह्मा आदि का अद्भुत ऐश्वर्य देखकर उन्हेंं परमेश्वर समझा। जब उन्होंने भी अपने को भगवान का निम्नतम उपासक कहा, तब वे लोग विष्णु की ओर प्रवृत्त हुए और उन्हें ही अद्भुत ऐश्वर्य-माधुर्य-सौन्दर्यसम्पन्न देखकर शंकर समझा। जब श्रीविष्णु ने भी अपने को शंकर का उपासक बतलाया, तब तो सब आश्चर्य-सिन्धु में डुबने लगे।


सचमुच भगवान कृष्ण के श्रीअंग का सौन्दर्य, माधुर्य अद्भुत है। और क्या कौन कहे, उस पर वे स्वयं मुग्ध हो जाते हैं। मणिमय स्तम्भों या मणिमय प्रांगण में प्रतिबिम्बित अपनी ही मधुर, मनोंहर, मंगलमयी मूर्ति को देख, उसके ही संमिलन और परिरम्भण के लिये वे स्वयं विभोर हो उठते हैं।


श्रीमूर्ति के प्रत्येक अंग-भूषणों को भी भूषित करते हैं। कौस्तुभादि मणिगणों ने अनन्त आराधनाओं के अनन्तर अपनी शोभा बढाने के लिये उनके श्रीकण्ठ को प्राप्त किया है, किंबहुना अनन्त गुणगणों ने भी बढाने के लिये उनके श्रीकण्ठ को प्राप्त किया है, किंबहुना अनन्त गुणगणों ने भी अनन्त तपस्याओं के अनन्तर अपनी गुणत्वसिद्धि के लिये जिन, निर्गुण, निरपेक्ष का आश्रयण किया है, वे स्वयं श्रीकृष्ण जिसकी उपासना करें, जिस पर मुग्ध रहें, उसकी महिमा, मधुरिमा का कहना ही क्या?


राधारूप से जिसे प्रतिक्षण हृदय एवं रोम-रोम में रखें वंशीरूप से अधरपल्लव पर रखें, जिनके स्वरूप का निरन्तर ध्यान करें, उनकी महिमा को कौन कह सकता है? शब्द, स्पर्श, रस, गन्ध के माधुर्य में प्राणियों का चित्त आसक्त होता है।


चित्त में अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय ब्रह्म का आरोहण कठिन होता है। इसलिये भगवान ऐसी मधुर, मनोहर मंगलमयी मूर्तिरूप में अपने आपको व्यक्त करते हैं, जिसके शब्द-स्पर्शादि के माधुर्य का पारावार नहीं, जिसके लावण्य, सौन्दर्य, सौगन्ध, सकुमार्य की तुलना कहीं है ही नहीं। मानों भगवान की सौन्दर्य-सुधाजलनिधि मंगलमूर्ति से ही, किंवा उसके सौन्दर्यादि-सुधासिन्धु के एक बिन्दु से ही अनन्त ब्रह्माण्ड में सौन्दर्य, माधुर्य, लावण्य सौगन्ध्य, सौकुमार्य आदि वित हैं।


जब प्राणी का मन प्राकृत कान्ता के सौन्दर्य, माधुर्यादि में आसक्त हो जाता है, तब अनन्तब्रह्माण्डगत सौन्दर्य, माधुर्यादि बिन्दुओं के उद्गम स्थान सौन्दर्यादि सुधाजलनिधि भगवान के मधुर स्वरूप में क्यों न आसक्त होगा? 


भगवान का हृदय भास्वती भगवती अनुकम्पा देवी के परतन्त्र है। संसार में माँगने वाला किसी को अच्छा नहीं लगता, उससे सभी घृणा करते हैं। परन्तु भगवान शंकर तो आक, धतूर, अक्षत, बिल्वपत्र, जलमात्र चढाने वाले से ही सन्तुष्ट होकर सब कुछ देने को प्रस्तुत हो जाते हैं। ब्रह्मा जी पार्वती से अपना दुखड़ा रोते हुए कहते हैं।


"बावरो रावरो नाह भवानी। जिनके भाल लिखी लिपि मेरी सुख की नाहिं निशानी। तिन रंकन को नाक सँवारत हों आयों नकबानी।। 

शिव की दई सम्पदा देखत श्री शारदा सिहाहीं। दीनदयाल देहबोइ भावई यां जस जाहि सुहाहीं।।" ( विनय पत्रिका, शिव स्तुति )


उनका भक्त एक ही बार प्रणाम करने से अपने को मुक्त मानता है। भगवान भी 'महादेव' ऐसे नाम उच्चारण करने वाले के प्रति ऐसे दौड़ते हैं, जैसे वत्सला गौ अपने बछड़े के प्रति - 


"महादेव महादेव महादेवेति वादिनम्। 

वत्सं गौरिव गौरीशो धावन्तमनुधावति।।" 


जो पुरुष तीन बार महादेव, महादेव, महादेव, इस तरह भगवान का नाम उच्चारण करता है, भगवान एक नाम से मुक्ति देकर शेष दो नाम से उसके ऋणी हो जाते है।


"महोदेव महादेव महादेवेति यो वदेत्। 

एकेन मुक्तिमाप्नोति द्वाभ्यां शंभू ऋणी भवेत्।।"

गुलज़ार के बहाने....../ आलोक यात्री

 गुलज़ार के बहाने  खुसरो के कहे "ज़िहाल ए मस्कीं मकुन ब रंजिश..."  की पड़ताल आलोक यात्री    अपने समय में एक फिल्मी गीत "ज़िहाल...