सोमवार, 6 दिसंबर 2021

हरिवंशराय बच्चन

हरिवंशराय बच्चन  की 114वीं जयंती है....



इलाहाबाद के दिनों में हरिवंश राय बच्चन की सबसे अधिक निकटता शमशेर बहादुर सिंह सिंह,  पंडित नरेन्द्र शर्मा, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और सुमित्रानंदन पंत से हुआ करती थी. अपनी आत्मकथा नीड़ का निर्माण फिर में बच्चन पंत और निराला का एक दिलचस्प किस्सा लिखते हैं. 'पंत और निराला एक दूसरे से कितने एलर्जिक थे इसका अनुभव मुझे इलाहाबाद में हुआ. निराला उन दिनों पहलवानी मुद्रा में रहते थे. पांव में पंजाबी जूता, कमर में तहमद और बदन पर लंबा ढीला कुर्ता और सिर पर पतली साफी. कहीं अखाड़े में लोट कर चेहरे और मुंडे सिर पर मिट्टी भी पोत आते थे. एक दिन वो मेरे ड्राइंग रूम में आ धमके और उन्होंने पंत जी को कुश्ती के लिए ललकारा.  वो बोले मैं निराला नहीं हूं मुत्तन खान हूं, टुट्टन खान का बेटा. बोलते बोलते वो ताल ठोक कर दंड बैठक करने लगे. जब उन्हें पंत से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली तो मेरी तरफ़ मुड़ कर बोले, वो नहीं तो तुम सही. मैने कहा मैं आपके पैर छूने लायक भी नहीं हूं. कुश्ती क्या लडूंगा आपसे...'

Raman Hitkari

क्रोधब / ओशो

 मैंने सुना है, एक गांव में एक अत्यंत क्रोधी व्यक्ति था। उसके क्रोध की चरमसीमा आ गई, जब उसने अपनी पत्नी को धक्का देकर कुएं में फेंक दिया। किसी क्रोध में पत्नी की हत्या कर दी। उसे खुद भी बहुत पीड़ा और दुख हुआ, पश्चात्ताप हुआ। सभी क्रोधी लोगों को बहुत पश्चात्ताप होता है। इसलिए नहीं कि अब वे क्रोध को नहीं करेंगे, बल्कि इसलिए कि पश्चात्ताप करके वे मन में जो अपराध पैदा होता है क्रोध करने से उसको पोंछ कर साफ कर लेते हैं, ताकि फिर से क्रोध करने के लिए तैयार हो सकें। मन में जो ग्लानि पैदा होती है क्रोध करने की, पश्चात्ताप करके उस ग्लानि को पोंछ लेते हैं, भले आदमी फिर से हो जाते हैं कि मैंने पश्चात्ताप भी कर लिया, ताकि फिर क्रोध की तैयारी की जा सके।


उस व्यक्ति को पश्चात्ताप हुआ। गांव में एक मुनि का आगमन हुआ था। लोग उसे उस मुनि के पास ले गए। मुनि के चरणों में सिर रख कर उसने कहा कि मुझे कोई रास्ता बताएं, मैं तो पागल हुआ जाता हूं क्रोध के कारण। मुनि ने कहाः रास्ता एक है कि संन्यास ले लो और संसार छोड़ दो। शांति की साधना करो। उस आदमी ने तत्क्षण वस्त्र फेंक दिए, नग्न हो गया और उसने कहा कि मुझे आज्ञा दें, मैं संन्यासी हो गया! मुनि भी हैरान हुए। ऐसा संकल्पवान व्यक्ति पहले उन्होंने कभी नहीं देखा था कि इतनी शीघ्रता से, इतने त्वरित वस्त्र फेंक दे और संन्यासी हो जाए! उन्होंने उसकी पीठ ठोकी, धन्यवाद दिया। और गांव भी जयजयकार से भर गया कि अदभुत व्यक्ति है यह। लेकिन भूल हो गई थी उनसे। वह आदमी था क्रोधी। क्रोधी आदमी कोई भी काम शीघ्रता से कर सकता है। यह कोई संकल्प न था, यह केवल क्रोध का ही एक रूप था। लेकिन वह साधु हो गया, उसकी बहुत प्रशंसा हुई। और चूंकि शांति की तलाश में वह आया था, तो मुनि ने उसे नया नाम दे दिया–शांतिनाथ। वह मुनि शांतिनाथ हो गया।


क्रोधी व्यक्ति था इतना वह। अब तक दूसरों पर क्रोध निकाला था, अब दूसरों पर निकालने का उपाय न रहा, तो उसने अपने पर निकालना शुरू किया। दूसरे साधु तीन दिन के उपवास करते थे, वह तीस दिन के कर सकता था। अपने पर क्रोध निकालने की क्षमता उसकी बहुत बड़ी थी। वह अपने पर हिंसक, वायलेंट हो सकता था। दूसरे साधु छाया में बैठते, तो वह धूप में खड़ा रहता। दूसरे साधु पगडंडी पर चलते, तो वह कांटों में चलता। वह सब तरह से शरीर को कष्ट दिया। बहुत जल्दी उसकी कीर्ति सारे देश में फैल गई। महान तपस्वी की तरह वह प्रसिद्ध हो गया।


वह देश की राजधानी में गया। उसकी कीर्ति उसके चारों तरफ फैल रही थी। वैसा कोई तपस्वी न था। सचाई यह थी कि उस आदमी का क्रोध ही था यह, यह कोई तपश्चर्या न थी। यह क्रोध का ही रूपांतरण था। यह क्रोध की ही अभिव्यक्ति थी। लेकिन दूसरों पर क्रोध निकलना बंद हो गया, अपने पर ही लौट आया। लेकिन इसका किसको पता चलता।


राजधानी में उसका एक मित्र रहता था, बचपन का साथी। उस मित्र को बड़ी हैरानी हुई कि यह आदमी जो इतना क्रोधी था, क्या शांतिनाथ हो गया होगा? जाऊं, देखूं, अगर यह परिवर्तन हुआ तो बहुत अदभुत है।


वह मित्र आया, मुनि तख्त पर बैठे थे, हजारों लोग उन्हें घेरे हुए थे।


जो आदमी प्रतिष्ठा पा जाता है, वह फिर किसी को भी पहचानता नहीं। चाहे वह मुनि हो जाए,  फिर वह किसी को पहचानता नहीं। देख लिया मित्र को, लेकिन कौन पहचाने उस मित्र को, मुनि चुपचाप हैं। मित्र को भी समझ में तो आ गया कि उन्होंने पहचान लिया है लेकिन पहचानना नहीं चाहते हैं। मित्र निकट आया, थोड़ी देर बैठ कर उनकी बातें सुनता रहा, फिर उस मित्र ने पूछाः क्या मैं जान सकता हूं आपका नाम क्या है?


मुनि ने उसे गौर से देखा और कहा, अखबार नहीं पढ़ते हो? सुनते नहीं हो लोगों की चर्चा? मेरा नाम कौन नहीं जानता है? मेरा नाम है, मुनि शांतिनाथ। मित्र तो पहचान गया, क्रोध अपनी जगह है, कहीं कोई फर्क नहीं हुआ। थोड़ी देर मुनि ने फिर बात की, दो मिनट बीत जाने पर उस मित्र ने फिर पूछा, क्या मैं पूछ सकता हूं आपका नाम क्या है? अब तो मुनि को हद हो गया, अभी इसने पूछा दो मिनट पहले। मुनि ने कहाः बहरे हो, पागल हो, कहा नहीं मैंने कि मेरा नाम है, मुनि शांतिनाथ। सुना नहीं? फिर दो मिनट बात चलती होगी, उस आदमी ने फिर पूछा कि क्या मैं पूछ सकता हूं आपका नाम क्या है? उन्होंने डंडा उठा लिया और कहा कि अब मैं बताऊंगा तुम्हें कि मेरा नाम क्या है। उस मित्र ने कहा, मैं पहचान गया, पुराने मित्र हैं आप मेरे, और कुछ भी नहीं बदला है, आप वही के वही हैं।


क्रोध भीतर हो, तो ऊपर से संन्यास ओढ़ लेने से समाप्त नहीं हो जाता। अगर घृणा भीतर हो, तो ऊपर से प्रेम के शब्द सीख लेने से घृणा समाप्त नहीं हो जाती। दुष्टता भीतर हो, तो करुणा के वचन सीख लेने से दुष्टता का अंत नहीं हो जाता। वासना भीतर हो, तो ब्रह्मचर्य के व्रत लेने से समाप्त नहीं हो जाती। इन बातों से भीतर जो छिपा है उसके अंत का कोई भी संबंध नहीं है। लेकिन धोखा पैदा हो जाता है, प्रवंचना पैदा हो जाती है, ऊपर से हम वस्त्र ओढ़ लेते हैं अच्छे-अच्छे और नग्नता भीतर छिप जाती है, दुनिया के लिए हम भले मालूम होने लगते हैं, लेकिन भीतर? भीतर हम वही के वही हैं।

ओशो

गुलाबी नदी की मछलियां"

 "


  साहित्य में पहचान बनाने के लिए लेखक को अपना श्रेष्ठ से श्रेष्ठ देना होता है, जो उसने अपने अनुभव, चिंतन और अभिव्यक्ति के जरिए पैदा किया है। आज मशीनीकरण का ज़माना है और चारों ओर से बाजार भी समाज को घेर रहा है, जो लोगों को चिंतन नहीं करता, बल्कि सोने के जाल की तरह लुभाता है। 

  ऐसे में सिनीवाली की कहानियां एक नया विमर्श रचती हैं। उनकी कहानी 'करतब बायस' का वितान गांवों का है, जहां शहर की चमचमाती सड़कों को छोड़ कर लेडीज पार्टियों को लांघकर और रंगीनियां त्याग कर कच्ची डगर और धूल-मिट्टी में जीने वाले लोग रहते हैं। खेती-किसानी का रोजगार करते हैं। सिनीवाली गांव में होने वाले चुनाव की कथा लिखती हैं। वैसे तो हमारे हिन्दी साहित्य में कहा जाता है कि महिलाएं राजनीति पर कलम चलाने की हिम्मत नहीं कर पातीं, पर सिनीवाली के संदर्भ में यह बात सच नहीं साबित होती। 

  अगर मनुष्य अपनी खोखली मान्यताओं के कारण बर्बाद होने से नहीं कतराता तो वह पर्यावरण को भी दूषित करने से भी नहीं घबराता। ग्रामीणों का बड़ा तबका लालच के वशीभूत तमाम स्वास्थ्य नियमों को ताक पर रख देता है। लेखिका यह सब देख रही है, लेकिन देख कर रह जाए तो फिर लेखन की धार ही क्या! कोई तो ऐसा पैदा होता है, जो उसकी कलम को सार्थकता देने के लिए आता है, आवाज उठाता है। यह आवाज कितनी जरूरी है, वह ईंट-भट्ठों के खिलाफ हो या धुंआ उगलती चिमनियों के खिलाफ कि आदमी सांस लेने के लिए तरस रहा है। 

  सिनीवाली हिन्दी साहित्य में अपनी कहानियों से यह सिद्ध कर देती हैं कि महिला रचनाकार अब अपनी दृष्टि को कितना-कितना विस्तार दे रही हैं। उसकी पहुंच केवल घर, परिवार तक ही नहीं, समाज, राजनीति और धर्म की जद तक जाती है।

( जनसत्ता से साभार)

रविवार, 5 दिसंबर 2021

संभोग में समाधि

 प्रश्न: काम-कृत्य को ध्यान का अनुभव कैसे बनाया जा सकता है? क्या संभोग करते समय किसी विशेष आसन के अभ्यास की आवश्यकता है?


 ओशो~ आसन का कोई महत्व नहीं। आसन की बात ही असंगत है। असली बात तो चित्त की अवस्था है–शरीर की नहीं लेकिन यदि तुम अपने मन में परिवर्तन करते हो तो हो सकता है तुम आसन भी बदलना चाहो। ये दोनों एक दूसरे से जुड़े हैं लेकिन बुनियादी नहीं हैं।


उदाहरण के लिए संभोग करते समय पुरुष हमेशा स्त्री के ऊपर होता है। यह अहंकारी व्यक्ति का आसन है। क्योंकि पुरुष हमेशा यह सोचता है कि वह स्त्री से अधिक योग्य है उच्च है श्रेष्ठ है अत: वह स्त्री के नीचे कैसे हो सकता है? लेकिन पूरी दुनिया के आदिवासी समाजों में स्त्री पुरुष के ऊपर लेटती है। इसलिए अफ्रीका में इसे

मिशनरी पोस्चर धर्मदूत का आसान कहते हैं–क्योंकि पहली बार जब ईसाई धर्म प्रचारक अफ्रीका पहुंचे आदिवासी समझ हीन पाए कि ”ये लोग क्या कर रहे हैं? ये औरत को मार ही डालेगे।”


अफ्रीका में इसे मिशनरी पोस्चर कहते हैं। वहां के आदिवासी इसे हिंसात्मक मानते हैं–कि पुरुष स्त्री के ऊपर सवार हो। वह नाजुक और कमजोर है उसे पुरुष के ऊपर होना चाहिए। लेकिन पुरुष के लिए ऐसा सोचना भी मुश्किल है कि वह स्त्री से नीचा है और वह स्त्री के नीचे हो।


अगर तुम्हारी मनःस्थिति में कुछ परिवर्तन आता है तो बहुत कुछ बदल जाएगा। बहुत–से कारणों से यह उचित है कि स्त्री पुरुष के ऊपर हो। क्योंकि अगर स्त्री पुरुष के ऊपर है…वह निष्क्रिय है वह अधिक हिंसात्मक नहीं हो सकती। वह केवल शिथिल होगी और उसके नीचे लेटा पुरुष कुछ ज्यादा नहीं कर सकता। यह अच्छी बात है।

अगर वह ऊपर हो तो निश्चित ही हिंसात्मक हो जाएगा। वह करेगा कुछ ज्यादा और ज्यादा कुछ करने की तुम्हें जरूरत नहीं। तंत्र के लिए तुम्हें निश्चेष्ट और शिथिल होना पड़ेगा इसलिए यह उचित है कि स्त्री ऊपर लेटी है। वह पुरुष से कहीं ज्यादा शांत और शिथिल हो सकती है क्योंकि वह स्वभाव से ही निष्क्रिय पैसिव है।


आसन बदल जाएगा, लेकिन इसकी अधिक फिक्र मत करो। पहले अपनी चित्त-दशा को बदलो। जीवन-ऊर्जा के प्रति समर्पित हो जाओ इसके साथ बहो। अगर कहीं सच में ही समर्पित हो गए तो तुम्हारे शरीर उस क्षण स्वत: ही उस अवस्था में आ जाएंगे जिसकी आवश्यकता है। अगर दोनों साथियों का समर्पण गहरा है तब उनके शरीर ठीक उस आसन में आ जाएंगे जिसकी उस घड़ी जरूरत है।


और प्रतिदिन परिस्थितियां बदल जाती हैं इसलिए पहले से ही इसको निर्धारित करने की जरूरत नहीं। यही भूल है कि तुम पहले से ही निश्चित करना चाहते हो। जब भी तुम कुछ पहले से निश्चित करना चाहते हो तो स्मरण रहे यह निश्चय तुम्हारा मन ही करता है। इसका अर्थ हुआ कि तुम समर्पण नहीं कर रहे।


अगर तुम समर्पण करते हो तो चीजों को अपने ढंग से घटने दो। और तब एक आश्चर्यजनक समस्वरता हारमनी घटित होती है जब दोनों साथी समर्पण कर देते हैं। वे कई आसन बदलेंगे या फिर वैसे ही पड़े रहेंगे शांत और शिथिल। लेकिन, यह सब बुद्धि द्वारा पहले से किए गए निश्चयों पर नहीं बल्कि जीवन-उर्जा पर निर्भर करता है। पहले कुछ भी निश्चित करने की जरूरत नहीं। यह निश्चय ही समस्या है।


प्रेम करने से पहले तुम सब तय कर लेना चाहते हो। प्रेम करने के लिए तुम पुस्तकें पढ़ते हो। ऐसी पुस्तकें भी हैं जो सिखाती हैं कि कैसे प्रेम किया जाए। इससे यही स्पष्ट होता है कि हमने कैसी मानवीय बुद्धि का विकास किया है–कैसे प्रेम करे! तब प्रेम मस्तिष्क का विषय हो जाता है तुम उसके विषय में सोचते हो मन ही मन उसका रिहर्सल करते हो और फिर इसे कृत्य का रूप देते हो। वह कृत्रिम है वास्तविक नहीं जब तुम रिहर्सल करते हो तो यह अभिनय हो जाता है अप्रामाणिक हो जाता है।


बस, समर्पित हो जाओ और ऊर्जा के साथ-साथ बहो, और फिर वह तुम्हें कहीं भी ले जाए। भय क्या है? भयभीत किस लिए होना? अपने प्रेमी के साथ भी यदि तुम निर्भय नहीं हो सकते, तब कहां, किसके साथ निर्भय हो सकोगे? और एक बार तुम्हें यह अनुभव हो जाए कि जीवन-उर्जा स्वत: ही सहायता करती है और उचित मार्ग, जो

अपेक्षित है, पर ले जाती है, तब तुम्हें जीवन को देने की गहल अंतदृष्टि उपलब्ध होगी। तब तुम अपना सारा जीवन

परमात्मा पर छोड़ सकते हो। वह तुम्हारी प्रियतम है।


तब तुम अपना सारा जीवन उस परम सत्ता के हाथों छोड़ सकते हो। तब तुम सोचते नहीं और योजनाएं नहीं बनाते, तुम भविष्य को बलपूर्वक अपने अनुसार बनाने की चेष्टा नहीं करते। तुम अपना जीवन उसकी मरजी पर छोड़ देते हो।


लेकिन काम-कृत्य (संभोग) को ध्यान कैसे बनाया जाए? समर्पण मात्र से ही ऐसा हो जाता है। उसके विषय में सोचो मत, उसे होने दो। तुम शांत और शिथिल पड़े रहो, और आगे कुछ मत करो। मन के साथ यही समस्या है। वह हमेशा आगे की सोचता है, हमेशा परिणाम की सोचता है और परिणाम भविष्य में है। इसलिए कृत्य में तुम स्वयं कभी उपस्थित नहीं होते। फलाकांक्षा के कारण तुम हमेशा भविष्य में होते हो। फल की आकांक्षा सब गड़बड़ कर देती, सब बिगाड़ देती है।


केवल कृत्य में ही रहो। भविष्य को भूल जाओ। वह आयेगा ही, उसकी चिंता करने की जरूरत नहीं। चिंता करके तुम उसे ला नहीं सकते। वह आ ही रहा है, वह आ ही गया है। तुम उसकी चिंता मत करो। तुम बस, यहां और अभी ”हेयर एंड नाओ” बने रहो।


यहां और अभी होने के लिए काम एक गहरी अंतदृष्टि बन सकता है। मेरे देखे, अब केवल यही एक कृत्य ऐसा बचा है जिसमें तुम यहीं और अभी हो सकते हो। अपने कालेज में जहां तुम शिक्षा ग्रहण कर रहे हो, यहीं और अभी नहीं हो सकते, इस आज की दुनिया में तुम कहीं भी यहां और अभी नहीं हो सकते।


लेकिन वहां भी तुम नहीं हो। तुम फल की चिंता कर रहे हो। और अब कई नई किताबों ने बहुत–सी उलझने पैदा कर दी हैं। क्योंकि अब तुम उन किताबों को पढ़ते हो जिनमें लिखा है कि प्रेम कैसे किया जाए और फिर तुम डरते हो कि प्रेम ठीक ढंग से कर रहे हो या गलत ढंग से। तुम किताब पढ़ते हो कि संभोग किस आसन में और कैसे किया जाए और फिर तुम चिंतित हो कि तुमने ठीक आसन बनाया या नहीं।


मनोवैज्ञानिक ने मन के लिए नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। अब वे कहते हैं कि पति इस बात का ख्याल रखे कि पत्नी कामसंवेग के शिखर तक पहुंच पा रही है या नहीं। इसलिए अब वह चिंतित है, ”क्या मेरी पत्नी ऑरगॉज्म को प्राप्त कर रही है या नहीं?” और यह चिंता किसी प्रकार से कोई मदद नहीं कर सकती, बल्कि बाधा बन जाएगी।


और अब पत्नी चिंतित है कि क्या वह अपने पति को पूरी तरह रिलैक्स, होने में मदद कर रही है या नहीं? इसलिए उसके चेहरे पर प्रसन्नता और ओंठों पर मुस्कुराहट होनी ही चाहिए। उसे ऐसा प्रकट करना चाहिए कि वह बहुत ही आनंदित अनुभव कर रही है। सब झूठ हो जाता है। दोनों ही परिणाम की फिक्र कर रहे हैं और इस फिक्र के कारण वे फल कभी नहीं आएंगे।


सब भूल जाओ। उस क्षण में बहो और अपने शरीरों को जो भी करें, करने दो– तुम्हारे शरीर भली भांति जानते हैं, उनकी अपनी समझ है। तुम्हारे शरीर काम-कोशिकाओं सेक्स-सैलस से बने हैं। इनके भीतर सब कार्य पहले से निर्धारित हैं, तुमसे कुछ भी नहीं पूछा गया। बस, सब शरीर पर छोड़ दो; और शरीर हिलने-डुलने लगेगा। यह सब छोड़ देना, यह ”लेट गो” स्वत: ध्यान बन जायेगा।


और अगर तुम संभोग में ध्यान का अनुभव पा सको, तो एक बात तुम्हें समझ आ जाएगी कि जब भी तुम समर्पण कर पाते हो, तुम्हें वही अनुभूति होती है। फिर तुम गुरु के आगे भी समर्पण कर सकोगे। वह प्रेम-संबंध है।


तुम गुरु को समर्पित हो सकते हो, और तब उसके चरणों में सिर रखते समय तुम्हारा सिर खाली हो जाएगा, तुम विचार शून्य हो जाओगे। तुम ध्यानावस्था में होओगे।


फिर गुरु की भी जरूरत नहीं रहेगी–बाहर निकलकर तुम आकाश के प्रति समर्पित हो सकते हो–अब तुम समर्पण करना जानते हो, बस यही पर्याप्त है। तुम वृक्ष के आगे समर्पण कर सकते हो…और इसीलिए यह मूर्खतापूर्ण लगता है क्योंकि हम समर्पण करना नहीं जानते। हम किसी आदिवासी या ग्रामीण को देखते हैं, वह नदी पर जाता है, नदी को समर्पित होता है, उसे मां कहता है, देवी मां। या ऊगते सूर्य के प्रति समर्पण करता है और उसे महान देवता कहता है या पेड़ के पास जाता है सिर झुकाता है और समर्पित हो जाता है।


हमारे लिए वह अंधविश्वास है, तुम उसे कहते कि यह क्या मूर्खता कर रहे हो? पेड़ क्या कर सकता है? नदी क्या कर सकती है? और सूर्य क्या करेगा? देवी-देवता नहीं हैं। अगर तुम समर्पण कर सको तो कुछ भी देवता बन सकता है। अत: तुम्हारा समर्पण ही उसे दिव्य बना देता है। कुछ भी दिव्य नहीं है केवल तुम्हारा समर्पण करने वाला मन ही दिव्य बना देता है।


अपनी पत्नी के प्रति समर्पित हो जाओ और वह दिव्य हो जाती है; अपने पति के प्रति समर्पण करो, वह दिव्य हो जाता है। दिव्यता समर्पण के माध्यम से प्रकट होती है। पत्थर के प्रति समर्पण होते ही वह पत्थर नहीं रह जाता–पत्थर एक मूर्ति, एक सजीव मूर्ति हो जाता है।


इसलिए केवल यह जानना कि कैसे समर्पण करें… और जब मैं कहता हूं ”कैसे समर्पण करे”, मेरा अभिप्राय यह नहीं कि इसके लिए किसी विधि को जानो। मेरा मतलब है, तुम्हारे पास प्रेम में समर्पित होने की प्राकृतिक संभावना है। समर्पित हो जाओ और इसे अनुभव करो। और तब अपने पूरे जीवन पर इसे छा जाने दो।


 


आज इतना ही

प्यार औऱ स्त्री

 वह स्त्री जो सचमुच तुमसे प्यार करती है तुम्हें छोड़कर जाने का फैसला एक पल में नहीं करती। महीनों वह ख़ुद को समझाती है और जिस दिन वह तुम्हारे बिना ख़ुद को सम्हालना और समझाना सीख जाती है  ठीक उसी पल वह तुम्हें छोड़कर सिर्फ़ ख़ुद की हो जाती है। तुम्हें उस दिन से डरना चाहिए जिस दिन स्त्री प्रेम और स्वाभिमान में से स्वाभिमान को चुनती है।  क्योंकि उसी दिन स्त्री तुमसे मिले प्रेम को हीरे की तरह दिल में रख लेती है औऱ सारी दुनिया के लिए दिल के दरवाज़े सदा के लिए बंद कर लेती है। यह उसका अंतिम फैसला होता है तुम्हें छोड़ कर जाने का।


स्त्री सहज विद्रोही नहीं होती, विद्रोह करने से पहले वह बार-बार तुम्हें एहसास कराती है कि " अब पहले जैसा प्रेम महसूस नहीं हो रहा है  , प्रेम को कुछ वक्त दिया करो " तुम उसे और उसकी बातों को लापरवाही से टाल देते हो  और एक दिन वह तमाम यादें और प्रेम समेट कर तुमसे दूर चली जाती है।


एक बार प्रेम तज कर और प्रेम समेट कर जा चुकी स्त्री कभी पहली सी नहीं रह जाती। तुम्हारे जिस प्रेम ने उसे कोमल और संतुलित बनाया था , तुम्हारा वही प्रेम उसे जीवन भर के लिए कठोर और निष्ठुर बना देता है।


 तुम लापरवाही में कभी जान ही नहीं पाते कि मरते दम तक वह स्त्री दुबारा वैसी कभी नहीं बन पाती जैसी वह तुमसे मिलने से पहले थी।


अपनी मौज में चलते तुम कभी जान ही नहीं पाते कि -

"तुम एक हरी-भरी , खिली औऱ खिलखिलाती स्त्री की हत्या कर चुके हो..!!

नीतू    सचदेवा 


शनिवार, 4 दिसंबर 2021

राजा का फैसला


प्रस्तुति - कमल शर्मा


एक बनिया था 5 रुपए की रोटी बेचता था। उसे रोटी की कीमत बढ़ानी थी लेकिन बिना राजा की अनुमति कोई भी अपने दाम नहीं बढ़ा सकता था।

 लिहाजा राजा के पास बनिया पहुंचा, बोला राजा जी मुझे रोटी का दाम 10 करना है। राजा बोला तुम 10 नहीं 30 रुपए करो, बनिया बोला महाराज इससे तो हाहाकार मच जाएगा, राजा बोला इसकी चिंता तुम मत करो, तुम 10 रुपए दाम कर दोगे तो मेरे राजा होने का क्या फायदा, तुम अपना फायदा देखो और 30 रुपए दाम कर दो, अगले दिन बनिये ने रोटी का दाम बढ़ाकर 30 रुपए कर दिया, शहर में हाहाकार मच गया, सभी राजा के पास पहुंचे, बोले महाराज यह बनिया अत्याचार कर रहा है, 5 की रोटी 30 में बेच रहा है, राजा ने अपने सिपाहियों को बोला उस गुस्ताख बनिए को मेरे दरबार में पेश करो, बनिया जैसे ही दरबार में पहुंचा, राजा ने गुस्से में कहा गुस्ताख तेरी यह मजाल तूने बिना मुझसे पूछे कैसे दाम बढ़ा दिया, यह जनता मेरी है तू इन्हें भूखा मारना चाहता है, राजा ने बनिए को आदेश दिया तुम रोटी कल से आधे दाम में बेचोगे, नहीं तो तुम्हारा सर कलम कर दिया जाएगा, राजा का आदेश सुनते ही पूरी जनता ने जोर से बोला.... महाराज की जय हो ,

महाराज की जय हो, महाराज की जय हो।





नतीजा सुनिए....

अगले दिन से 5 की रोटी 15 में बिकने लगी।

जनता खुश... बनिया खुश... और राजा भी खुश।

#वर्तमान भारतीय परिदृश्य की, एक झलक 🤔

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2021

फूफा (बेचारा ) भी कभी जीजा था

 *फूफा किसे कहतेहैं*


*फूफा एक रिटायर्ड जीजा होता है, जिसने एक जमाने में जिस घर में शाही पनीर खा रखा हो और उसे सुबह शाम  धुली मूँग की दाल खिलाई जाय, उसका *फू और फा* *करना वाजिब है, इसलिए ऐसे शख्स को फूफा कहना उचित है।*


*फूफा पर निबन्ध, पूर्णांक-१००*


             *फूफा*

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*भूमिका*  बुआ के पति को फूफा कहते हैं। फूफाओं का बड़ा रोना रहता है शादी ब्याह में। किसी शादी में जब भी आप किसी ऐसे अधेड़ शख़्स को देखें, जो पुराना, उधड़ती सिलाई वाला सूट पहने, मुँह बनाये, तना-तना सा घूम रहा हो जिसके आसपास दो-तीन ऊबे हुए से लोग मनुहार की मुद्रामें हों तो बेखट के मान लीजिये कि यही बंदा दूल्हे का फूफा है!

ऐसे मांगलिक अवसर पर यदि फूफा मुँह न फुलाले तो लोग उसके फूफा होने पर ही संदेह करने लगते हैं।उसे अपनी हैसियत जताने का आखिरी मौका होता है यह उसके लिये । और कोई भी हिंदुस्तानी फूफा इसे गँवाना नहीं चाहता है !

*करता कैसे है यह सब (ModusOperendi)* 

वह किसी-न-किसी बातपर अनमना होगा। चिड़चिड़ाएगा। तीखी बयानबाज़ी करेगा। किसी बेतुकी-सी बात पर अपनी बेइज़्ज़ती होने की घोषणा करता हुआ किसी ऐसी जानी-पहचानी जगह के लिये निकल लेगा, जहाँ से उसे मनाकर वापस लाया जा सके! 

*अगला वाजिब सवाल यह है, फूफा ऐसा करता ही क्यों है (CAUSE)*

दर असल फूफा जो होता है, वह व्यतीत होता हुआ जीजा होता है। वह यह मानने को तैयार नहीं होता कि उसके अच्छे दिन बीत चुके है और उसकी सम्मान की राजगद्दी पर किसी नये छोकरे ने जीजा होकर क़ब्ज़ा जमा लिया है। फूफा, फूफा नहीं होना चाहता। वह जीजा ही बने रहना चाहता है और शादी-ब्याह जैसे नाज़ुक मौके पर उसका मुँह फुलाना, जीजा बने रहने की नाकाम कोशिश भर होती है।

*प्रभाव (EF FECT)*

●फूफा को यह ग़लतफ़हमी होती है कि उसकी नाराज़गी को बहुत गंभीरता से लिया जायेगा। पर अमूमन एेसा होता नहीं। लड़के का बाप उसे बतौर जीजा ढोते-ढोते ऑलरेडी थका हुआ होता है। ऊपर से लड़के लडकी के ब्याह के सौ लफड़े। इसलिये वह एकाध बार ख़ुद कोशिश करता है और थक-हारकर अपने इस बुढ़ाते जीजा को अपने किसी नकारे भाई बंद के हवाले कर दूसरे ज़्यादा ज़रूरी कामों में जुट जाताहै।

●बाकी लोग फूफा के ऐंठने को शादी के दूसरे रिवाजों की ही तरह लेते हैं। वे यह मानते हैं कि यह यही सब करने ही आया था और अगर यही नहीं करेगा तो क्या करेगा?

●ज़ाहिर है कि वे भी उसे क़तई तवज्जो नहीं देते।

फूफा यदि थोड़ा-बहुत भी समझदार हुआ तो बात को ज़्यादा लम्बा नहीं खींचता। 

*समाधान (SOLUTION)*

●वह माहौल भाँप जाता है। मामला हाथ से निकल जाय, उसके पहले ही मान जाता है। बीबी की तरेरी हुई आँखें उसे समझा देती हैं कि बात को और आगे बढ़ाना ठीक नहीं। लिहाजा, वह बहिष्कार समाप्त कर ब्याह की मुख्य धारा में लौट आताहै। 

●हालांकि, वह हँसता- बोलता फिर भी नहीं और तना-तना सा बना रहता है। उसकी एकाध उम्रदराज सालियां और उसकी ख़ुद की बीबी ज़रूर थोड़ी-बहुत उसके आगे-पीछे लगी रहती हैं। पर जल्दी ही वे भी उसे भगवान भरोसे छोड़-छाड़ दूसरों से रिश्तेदारी निभाने में व्यस्त हो जातीहैं।

*भविष्य (FUTURE)*

●फूफा *बहादुर शाह ज़फ़र* की गति को प्राप्त होता है। अपना राज हाथ से निकलता देख कुढ़ता है, पर किसी से कुछ कह नहीं पाता। मन मसोस कर रोटी खाता है और दूसरों से बहुत पहले शादी का पंडाल छोड़ खर्राटे लेने अपने कमरे में लौट आता है। फूफा चूँकि और कुछ कर नहीं सकता, इसलिये वह यही करता है।

*उपसंहार(The End)* 

इन हालात को देखते हुए मेरी आप सबसे यह अपील है कि फूफाओं पर हँसिये मत। आप आजीवन जीजा नहीं बने रह सकते। आज नहीं तो कल आपको भी फूफा होकर मार्गदर्शक मंडल का हिस्सा हो  जाना है। 

● *फूफा भी कभी शुद्ध जीजा थे।*😊😊

हरिवंशराय बच्चन

हरिवंशराय बच्चन  की 114वीं जयंती है.... इलाहाबाद के दिनों में हरिवंश राय बच्चन की सबसे अधिक निकटता शमशेर बहादुर सिंह सिंह,  पंडित नरेन्द्र श...