शुक्रवार, 22 अक्तूबर 2021

शोध की खातिर किस दुनिया में ? कहां गए ?

प्रिय भारत! / शम्भू बादल 


प्रिय भारत! 

शोध की खातिर

किस दुनिया में ? 

कहां गए ?

साक्षात्कार रेणु से लेने ?

बातचीत महावीर से करने?

 त्रिलोचन - नागार्जुन से मिलने ?


 कविता - आलोचना 

जीवनी - संपादन 

ये भी तो थे साथ तुम्हारे 

इन्हें छोड़

 हमसे दूर

 बहुत दूर गए

 'चुपचाप'

अचानक यायावर


कैसी-कैसी बातें? 

किसकी - किसकी बातें? 

 साहित्य की अंत:कथा 

सच - झूठ का अंत:पुर 

खुली हंसी 

खुश की विधि 

लाएगा कौन ?

 'झेलते हुए', 'मैं हूं, यहां हूं' 

'बेचैनी', 'हाल - बेहाल'

बताएगा कौन ?


'कैसे जिंदा है आदमी' 

सवाल रख 

उत्तर जाने बिना 

अंतरलोक - यात्री

कैसे बन गए तुम ?

तुम्हारी कविता में 

कितनी बातें !

कितनी चिंता!


तुमने कहा था  

 'दृश्य ही अदृश्य हो जाएगा'

और आज हो कर

 दिन को दुखी कर 

तुमने बता दिया 

    


 तुम्हारी कविता देख रहा हूं :


  दृश्य ही अदृश्य हो जाएगा

                           - भारत यायावर


एक दृश्य है जो अदृश्य हो गया है

उसका बिम्ब मन में उतर गया है

मैं चुप हूँ

चुपचाप चला जाऊँगा

कहाँ

किस ओर

किस जगह

अदृश्य  !


किसी के मन में यह बात प्रकट होगी

कि एक दृश्य था

अदृश्य हो चला गया है !


अब उसके शब्द जो हवा में सनसनाते थे

किसी के साथ कुछ दूर घूम आते थे

उसके विचार कहीं मानो किसी गुफ़ा से निकलते थे

पहले गुर्राते थे

फिर गले लगाते थे

फिर कुछ चौंक - चौंक जाते थे

फिर बहुत चौंकाते थे


अब उसकी कहीं छाया तक नहीं है 

अब कोई पहचान भी नहीं है 

दृश्य में अदृश हो जाएगा 

कहीं नजर नहीं आएगा

युद्ध पीड़ित महिलाओ के दुख क़ो नया आयाम दिया है गरिमा ने / राकेश रेणु

 #माणिकचौक_1


कितने मित्रों का कर्ज़ है मुझ पर- प्रेम और भरोसे से आबद्ध! उनकी बेशक़ीमती किताबें आती हैं लेकिन अपनी काहिली में  उन पर दो शब्द भी नहीं लिख पाता। ख़ुद इस स्थिति को स्वीकार नहीं कर पा रहा। मेरे भीतर के क़ाहिल को अपनी तंद्रा तोड़नी होगी। भरोसे पर खरा उतरना होगा। इसलिए तय किया है कि इस पेज पर साथियों की किताबों में से पसंदीदा की थोड़ी-थोड़ी ही सही, चर्चा करता रहूँगा। इनमें अभी-अभी साया हुई किताबें होंगी और कुछ थोड़ी पुरानी भी, जैसेकि चार साल क़बल, 2017 में प्रकाशित प्रोफ़ेसर गरिमा श्रीवास्तव की ‘देह ही देश’ जिसे उन्होंने क्रोएशिया प्रवास डायरी कहा है। कहने को इस किताब के प्रकाशन के चार साल पूरे होने को हैं लेकिन इसकी चर्चा आज भी है, लंबे समय तक रहेगी क्योंकि इस तरह की पृष्ठभूमि वाली किताबें हिन्दी में कम ही लिखी जाती हैं।


‘देह ही देश’ को केवल डायरी कहना पर्याप्त नहीं है, इसे सीमित करना है। यह जितनी डायरी है उतना ही यात्रा वृत्तांत, जितनी आत्मकथा है उतना ही पत्र संवाद, जितनी स्मृति है उतनी ही पत्रकारिता। यह कुछ और ही चीज है- विरल रूप से तरल और सरल। सीधे हृदय में समाती, दुनियाभर का साक्षात्कार कराती, दुःख से संवाद करती, एकाकार कराती। लेखिका के ज़ेहन में वे सब चीज़ें हैं - कविता, कहानी, समालोचना, इतिहास और विमर्श - वे सबको साथ लेकर चलती हैं जो आमतौर पर स्त्रियों की ख़ूबी होती है। 


विद्वान कहते हैं, अनुभूति पहले आती है भाषा उसके बाद और अभिव्यक्ति उसके भी बाद। यह जो गहराई है इस पुस्तक की, अनुभूति की गहराई है, भाषा जिसे अभिव्यक्त करती है। लेखिका क्रोएशिया और बोस्निया हर्जेगोविना की युद्ध पीड़ित, बलत्कृत और तरह-तरह से दमित स्त्रियों की पीड़ाओं से इस क़दर बोसीदा हैं कि दर्द उनकी भाषा और अभिव्यक्ति में स्वत: चला आया है - पढ़ने वाले को भीतर तक भिंगोता, नम करता। वह स्वयं उस पीड़ा में डूबती-उतराती रहीं, इस हद तक कि बार-बार उनके अवसादग्रस्त हो जाने की आशंका पैदा हुई। अजनबी देश में अध्यापक-समालोचक की प्रचलित प्रकृति से अलग जैसा शोधपूर्ण लेखन उन्होंने किया है और उसके लिए जो यात्राएँ की, जिन-जिन जगहों पर गयी, मिलीं लोगों से, वे भी उनकी इसी गहरे इन्वॉल्मेंट की कहानी कहती हैं।


क्रोएशियाई बोस्नियाई स्त्रियों की यह लोमहर्षक गाथा ‘देह ही देश’ का मुख्य प्रतिपाद्य है। पुस्तक का तीन चौथाई और लेखिका के प्रवास के तीन चौथाई हिस्से की डायरी इनके वृत्तांतों और निहितार्थों से भरी है। लेखिका का स्त्री मन-मस्तिष्क इन स्त्रियों के मार्फ़त न केवल उनके मूल देश भारत, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप, एशिया और उससे भी बढ़कर पूरे विश्व की स्त्रियों की दशा का, उनके प्रति पितृसत्तात्मक समाज दृष्टि का विश्लेषण करता है।


किताब की पृष्ठभूमि में क्रोएशिया की राजधानी है जहाँ रहते हुए लेखिका योरोप के अल्पज्ञात पक्षों से अवगत होती हैं, 1992 से ’95 तक चले सर्बिया-क्रोएशिया-बोस्निया हर्ज़ेगोविना युद्ध के दौरान हुए अकल्पनीय दमन से अवगत होती हैं। इस युद्ध में सर्बियाई सैनिकों की बर्बरता जैसा दूसरा उदाहरण आधुनिक विश्व इतिहास में नहीं है। इस कल्पनातीत जेनोसाइड के मूल में अंध राष्ट्रवाद है, दूसरी राष्ट्रीयताओं को घृणित और त्याज्य मानने की प्रवृत्ति। इतिहास बार-बार हमें सावधान करता है कि राष्ट्रवाद की अति ऐसी ही विध्वंसक स्थितियाँ पैदा करती है। क्रोएशिया और बोस्निया के ख़िलाफ़ युद्ध का एकमात्र मक़सद क्रोएशियाई और बोस्नियाई लोगों, ख़ासकर मुसलमानों के जीवन को इतना दूभर बना देना था कि वे अपने घर, खेत, खलिहान छोड़कर भाग जाएँ जिससे कि बृहत्तर सर्बिया का सपना पूरा हो सके। 


दुनिया का इतिहास गवाह है कि सारे युद्ध स्त्रियों की देह पर ही लड़े गए। वही उनकी पहली और आख़िरी भोक्ता होती हैं। योद्धाओं का पौरुष औरतों के दमन से तुष्ट होता है। योद्धाओं का ही क्यों, पुरुष मात्र का! गहरी पीड़ा से भरकर गरिमा कहती हैं, ‘ऐसा क्यों होता है, युद्ध कहीं हो, किसी के भी बीच हो, मारी तो जाती हैं औरतें ही।’ और, ‘स्त्रियों की देह पर नियंत्रण करना युद्ध नीति का ही एक हिस्सा होता है जिससे तीन उद्देश्य सधते हैं - पहला, आम नागरिकों में भय का संचार, दूसरा नागरिकों का विस्थापन और तीसरा सैनिकों को बलात्कार की छूट देकर पुरस्कृत करना।’


बोस्निया सरकार ने इस युद्ध के दौरान 50,000 स्त्रियों के यौन शोषण की रिपोर्ट दी जबकि यूरोपियन यूनियन के जाँच कमीशन ने लगभग 20,000 से ऊपर स्त्रियों को बलत्कृत-घर्षित किए जाने की संख्या को प्रामाणिक माना। उन स्त्रियों को अकल्पनीय दैहिक शोषण और अमानवीय यातनाओं से दरपेश होना पड़ा। प्रतिरोध करने वाली स्त्रियों के स्तन काट लिए गए, अंग-भंग किया गया, यातना दे-दे कर मार डाला गया। यंत्रणादायी जीवन जीते हुए अनेक की मौत हो गई, अन्य अनेक पागल हो गईं या देह बाज़ारों में पहुँच गईं अथवा उन्हें देह व्यापार को ही अपना पेशा बनाना पड़ा। कुछ स्त्रियों ने अपने आत्मबल की बदौलत नए सिरे से जीवन आरंभ करने का संकल्प लिया हालाँकि अतीत की स्मृतियाँ उनका पीछा नहीं छोड़तीं। लेखिका खोज-खोजकर ऐसी स्त्रियों से मिलती हैं, उनकी कथाएँ जानने की कोशिश करती हैं और उन्हें अपनी डायरी का हिस्सा बनाती हैं। कुछ भी हो, अमानवीयता की शिकार हुई स्त्रियों की वास्तविक संख्या घोषित संख्या से कहीं बड़ी है।


प्रवास काल का पहला चौथाई दिसंबर (संभवतः 2008) से आरंभ होकर मई (संभवतः 2009) तक का समय है। इस अंश में लेखिका अपने देश से बाहर एक यूरोपीय देश की संस्कृति और समाज को समझने का यत्न करती हैं, बार-बार अपने देश से उनकी तुलना करती हैं। उनका संवेदनशील मन लौट-लौट आता है अपने देश, शांतिनिकेतन के कुंजों और भारत के दूसरे शहरों की गलियों में जहाँ से उनकी स्मृतियाँ जुड़ी हैं। दोनों भूभागों की आबोहवा, संस्कृति, लोग, रहन-सहन के तौर तरीक़ों के बीच सामंजस्य बिठाने की कोशिश प्रवास काल और पुस्तक के पहले चौथाई का मुख्य प्रतिपाद्य है। एक प्रकार से इस पहले चौथाई में पर्याप्त विविधता है। इसमें लेखिका का स्त्री विमर्शकार है, उसका बहुपठित और बहुभाषी व्यक्तित्व है जो बांग्ला भाषा और कवींद्र रवींद्र से उनका लगाव है जो अनेक रूपों में - कविताओं और गाथाओं मैं प्रकट होता है। इसी चौथाई हिस्से में सिमोन-द-बोउवार हैं और जो लोग उन्हें नहीं जानते अथवा कम जानते हैं उनके लिए सिमोन के लेखन के साथ-साथ उनके व्यक्तिगत जीवन से अवगत कराने वाली झलकियाँ भी हैं।


‘देह ही देश’ को पढ़ने के बाद विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि गरिमा श्रीवास्तव यदि स्त्री विमर्शकार न होतीं तो बेहतर कवि होतीं, यदि कथेतर न लिखतीं तो बेहतर कथाकार होतीं। लेकिन वे एक साथ यह सब हैं। ‘देह ही देश’ इसकी पुष्टि करती है। उनके ज़ेहन में वे सब चीज़ें हैं - कविता, कहानी, समालोचना, इतिहास और विमर्श - वे सबको साथ लेकर चलती हैं जो आमतौर पर एक संवेदनशील विमर्शकार की ख़ूबी होती है। उन्होंने क्रोएशिया और बोस्निया की युद्ध पीड़ित स्त्रियों से के दुख को वैश्विक बनाया है और युद्ध के उद्योग को, युद्धों की तिजारत करने वाले लोगों को बेनक़ाब किया है।



👍🏼✌🏼👌

भारत यायावर का जाना / विजय केसरी

 भारत यायावर का जाना एक बड़ी अपूरणीय क्षति है।

 संपूर्ण साहित्य जगत आज स्तब्ध है ।

भारत यायावर का संपूर्ण जीवन हिंदी साहित्य को समर्पित रहा।

 वे मूलत: एक कवि थे ।

उन्होंने हिंदी साहित्य की सभी विधा पर  अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज की थी ।

वे एक साहित्यकार की भूमिका में सबसे अलग और निराले थे।

 उन्होंने कविता लेखन, आलोचना, संस्मरण, समीक्षा, संपादन आदि तमाम विधाओं पर जमकर काम किया ।

उन्होंने देश के जाने-माने प्रख्यात साहित्यकार फणीश्वर नाथ रेनू की कृतियों को देशभर से ढूंढ कर संग्रहित कर रत्नावली  प्रकाशित कर एक अद्वितीय कार्य किया।

 उन्होंने प्रख्यात साहित्यकार महावीर प्रसाद द्विवेदी की रचनावाली का  संपादन कर इतिहास रच दिया।

वे झारखंड के जाने माने साहित्यकार राधा कृष्ण की रचनाओं को भी  ढूंढ कर रचनावली के कार्य में लगे थे। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित उनकी रचनाएं प्रकाशित हो रही थी।

 एक साथ कई पत्रिकाओं के प्रधान संपादक के रूप में भी अपने दायित्व का निर्वहन सफलतापूर्वक कर रहे थे। ऐसे साहित्यकार विरले ही पैदा होते हैं।

 इनका संपूर्ण जीवन  हिंदी साधना और सेवा में बीता।

 उनके जाने से हिंदी साहित्य संसार सुना हो गया है।

 ऐसा प्रतीत होता है।

नहीं रहे भारत यायावर / मुकेश प्रत्यूष

 भारत यायावर नहीं रहे। 


आज दिन में फोन  किया। स्वीच आफ आया। अंदेशा हुआ शायद अस्पताल गए  हों लेकिन  शाम होते-होते उनके निधन की सूचना आ गई।  


वर्षों से रात में दस बजे के बाद यह कहते हुए  कि मुझे रात में नींद बहुत कम आती है बिना किसी संकोच के घ॔टो  फोन पर समकालीन  साहित्य की, घर-परिवार की बात करने वाले सबसे पुराने मित्र चले गए। 


मेरी पहली  कविता उन्होंने ही  1978 में  ने नवतारा में  प्रकाशित की  थी। हमारी  मित्रता  की शुरुआत वहीं से  हुई । जब वे फणीश्वरनाथ रेणु रचनावली का संपादन कर रहे थे तो उनके  संबंध में जानकारियों ,  उनकी रचनाओं की तलाश  में प्रायः  पटना आते थे । पटना  रेणुजी की कर्मभूमि रही है। पटना में उनके मित्रों की संख्या बहुत ज्यादा  थी। यायावरजी अक्‍सर मुझे भी साथ  ले लेते। कभी मुझे समय नहीं होता तो वे मेरी साइकिल लेकर चले जाते और देर रात में वापस आते।  रेणुजीके प्रति वे अपने अंतिम दिनों तक समर्पित रहे। हर बातचीत  में उनपर अपने काम की प्रगति की जानकारी जरूर  देते। 


अंतिम मुलाकात  दो वर्ष  पहले हजारीबाग में हुई थी। पहुंचते ही उन्हें फोन किया।  वे खुश भी हुए  और दुखी भी कि मैं इतने कम समय के  लिए  क्यों  आया।  मिलने आए। अपना नया काव्य  संग्रह कविता फिर भी मुस्कुराएगी दी। हमने फिर  हिलने का वायदा किया लेकिन कोरोना के कारण न वे आ पाए, न मैं जा पाया। 


पिछले कुछ  महीनों से वे अस्वस्थ चल रहे थे। हमेशा कहते खड़ा होने या बैठने में दिक्कत होती है। लेकिन  हजारीबाग से बाहर कहीं जाकर  ईलाज करवाने को तैयार नहीं होते।  


मर्माहत हूं।

बुधवार, 20 अक्तूबर 2021

प्रेम? / ओशो

 बहुत समय पहले, च्वांग्त्सु नाम का एक विचारक हुआ। एक रात्रि में, एक झोपड़े के पास निकलता था। उसके भीतर..एक प्रेमी और प्रेयसी की बातें चलती थीं, उनको झोपड़े के बाहर से अचानक सुन लिया। वह प्रेयसी अपने प्रेमी को कहती थी कि तुम्हारे बिना मैं एक क्षण भी नहीं जी सकती हूं। तुम्हारा होना ही मेरा जीवन है। च्वांग्त्सु मन में सोचने लगा, किसी का जीवन किसी दूसरे के होने में कैसे हो सकता है? अगर मैं आपसे कहूं कि आपके होने में ही मेरा जीवन है, और अगर मेरा कोई जीवन होगा तो वह छाया का जीवन होगा कि क्योंकि आपके होने में मेरा जीवन कैसे हो सकता है? जो लोग भी अपने जीवन को किसी और में रख देते हैं, वे लोग छाया का जीवन जीते हैं..चाहे धन में, चाहे यश में, चाहे मित्रों में, चाहे प्रियजनों में। जो दूसरों में अपने जीवन को रख देता है उसका खुद का जीवन छाया का जीवन हो जाता है। उसका जीवन वास्तविक नहीं हो सकता। उसका जीवन झूठा होगा। जैसे कोई वृक्ष कहे किसी दूसरे वृक्ष से कि तुम्हारी जड़ें ही मेरी जड़ें हैं और अपनी जड़ों को भूल जाए, तो यह वृक्ष थोड़े ही दिनों में कुम्हला जाएगा, मुर्झा जाएगा और सूख जाएगा। क्योंकि दूसरे की जड़ें दूसरे की ही होंगी, इस वृक्ष की नहीं हो सकेंगी। च्वांग्त्सु ने लौट कर अपने शिष्यों को कहा कि आज मैंने एक अदभुत सत्य अचानक सुन लिया है। एक प्रेयसी अपने प्रेमी को कहती थी, तुम्हारे होने में मेरा जीवन है। जहां-जहां कोई व्यक्ति यह कहता हो कि फलां चीज के होने में मेरा जीवन है, वहीं जानना कि जीवन असत्य है और झूठा है। जीवन अपने होने में होता है, किसी और के होने में संभव नहीं है।


फिर और भी आश्चर्यजनक बात घटी..कुछ समय बीत जाने के बाद च्वांग्त्से एक पहाड़ के करीब से गुजरता था और उसने एक स्त्री को एक कब्र के पास बैठे हुए देखा। यह तो कोई अनहोनी बात न थी।


च्वांग्त्सु ने जाकर पूछा कि बात क्या है? उस स्त्री ने कहाः मेरे पति को मरे दो ही दिन हुए और मुझे एक नये प्रेमी के प्रेम में पड़ जाना हो गया है। तो कम से कम पति की कब्र सूख जाए, उतनी देर तक रुकना जरूरी है। इसलिए कब्र को सुखा रहे हैं। च्वांग्त्सु वापस लौटा, उसने अपने शिष्यों से कहाः आज एक और नये सत्य का अनुभव हुआ। जो लोग कहते हैं, तुम्हारे बिना न जी सकेंगे, वे तुम्हारे मरने के बाद तत्क्षण अपने जीने के लिए कोई और कारण खोज लेंगे, कोई और उपाय खोज लेंगे। अभी एक स्त्री अपने पति की कब्र को पंखा कर रही थी, क्योंकि कब्र जल्दी सूख जाए ताकि वह नये प्रेम की दुनिया में प्रवेश कर सके।


जो जीवन दूसरों पर जीता है वह उनके हट जाने पर तत्क्षण दूसरे मुद्दे, दूसरे कारण खोज लेगा। और यह भी स्मरण रखें कि ऐसा जीवन प्रतिक्षण बदलता हुआ जीवन होगा, क्योंकि छाया का जीवन स्थिर जीवन नहीं हो सकता। आप जहां जाते हैं वहां आपकी छाया चली जाती है। सुबह, मैंने सुना है, एक चींटी अपने छेद से बाहर निकली, उसने देखा, सूरज उग रहा है, उसकी बड़ी लंबी छाया बन रही है।


उसने कहाः आज तो मुझे बहुत भोजन की जरूरत पड़ेगी। बहुत भोजन की जरूरत पड़ेगी, क्योंकि छाया उसकी बड़ी थी और उसने सोचा, इतनी बड़ी मेरी देह है आज मुझे भोजन की जरूरत पड़ेगी। दोपहर तक वह भोजन खोजती रही, तब तक सूरज ऊपर चढ़ गया, छाया छोटी हो गई। दोपहर उसने सोचा था, आज थोड़ा सा भी मिल जाए तो भी काम चल जाएगा। जो छाया सुबह बड़ी थी, वह दोपहर सिकुड़ कर छोटी हो गई। जो छाया बहुत बड़ी बनती थी, अंधकार में बिल्कुल नहीं बनेगी।

ओशो

मन में है आकाश कम नहीं / रतन वर्मा



जीवन में अवसाद बहुत, पर,

सपनों के सौगात कम नहीं,

कंट भरी है राह, परन्तु ,

मन में है आकाश कम नहीं !


पंछी बन उड़ना जो चाहूं,

पर डैनें हैं बोझल -बोझल,

नैन पपीहरा चांद निहारे,

चंदा दिखता मद्धम -मद्धम,


चलना चाहूं, पकड़ उंगली,

उसमें भी झटकार कम नहीं ! 

कंट भरी है राह, परन्तु,

मन में है आकाश कम नहीं !


जीवन का यह ताना -बाना , 

चलता रहा सदा मनमाना,

कहां चाल में चूक हो गयी,

अपना खास हुआ बेगाना !


हमने प्यार लुटाया जी भर,

बदले में दुत्कार कम नहीं,

कंट भरी है राह परन्तु ,

मन में है आकाश कम नहीं !

जीवन का टॉनिक*_ / प्रस्तुति - शैलेन्द्र किशोर जारूहार

 😴🤔😴


*


   *मैं अपने विवाह के बाद. अपनी पत्नी के साथ शहर में रह रहा था।* 


*बहुत साल पहले पिताजी मेरे घर आए थे। मैं उनके साथ सोफे पर बैठा बर्फ जैसा ठंडा जूस पीते हुए अपने पिताजी से विवाह के बाद की व्यस्त जिंदगी, जिम्मेदारियों और उम्मीदों के बारे में अपने ख़यालात का इज़हार कर रहा था और वे अपने गिलास में पड़े बर्फ के टुकड़ों को स्ट्रा से इधर-उधर नचाते हुए बहुत गंभीर और शालीन खामोशी से मुझे सुनते जा रहे थे।*

        

*अचानक उन्होंने कहा- "अपने दोस्तों को कभी मत भूलना। तुम्हारे दोस्त उम्र के ढलने पर पर तुम्हारे लिए और भी महत्वपूर्ण और ज़रूरी हो जायेंगे। बेशक अपने बच्चों, बच्चों के बच्चों को भरपूर प्यार  देना मगर अपने पुराने, निस्वार्थ और सदा साथ निभानेवाले दोस्तों को हरगिज़ मत भुलाना। वक्त निकाल कर उनके साथ समय ज़रूर बिताना। उनके घर खाना खाने जाना और जब मौक़ा मिले उनको अपने घर खाने पर बुलाना।*   

*कुछ ना हो सके तो फोन पर ही जब-तब, हालचाल पूछ लिया करना।"*      


*मैं नए-नए विवाहित जीवन की खुमारी में था और पिताजी मुझे यारी-दोस्ती के फलसफे समझा रहे थे।* 


*मैंने सोचा-  "क्या जूस में भी नशा होता है जो पिताजी बिन पिए बहकी-बहकी बातें करने लगे? आखिर मैं अब बड़ा हो चुका हूँ, मेरी पत्नी और मेरा होने वाला परिवार मेरे लिए जीवन का मकसद और सब कुछ है।* 


*दोस्तों का क्या मैं अचार डालूँगा?"*

      

*लेकिन फ़िर भी मैंने आगे चलकर एक सीमा तक उनकी बात माननी जारी रखी।*

 *मैं अपने गिने-चुने दोस्तों के संपर्क में लगातार रहा।* 


 *समय का पहिया घूमता रहा और मुझे अहसास होने लगा कि उस दिन पिता 'जूस के नशे' में नहीं थे बल्कि उम्र के खरे तजुर्बे  मुझे समझा रहे थे।*  


*उनको मालूम था कि उम्र के आख़िरी दौर तक ज़िन्दगी क्या और कैसे करवट बदलती है।*    


*हकीकत में ज़िन्दगी के बड़े-से-बड़े तूफानों में दोस्त कभी नाव बनकर, कभी पतवार बनकर तो कभी मल्लाह बनकर साथ निभाते हैं और कभी वे आपके साथ ही ज़िन्दगी की जंग में कूद पड़ते हैं।* 


*सच्चे दोस्तों का काम एक ही होता है- दोस्ती निभाना।* 


*ज़िन्दगी के पचास साल बीत जाने के बाद मुझे पता चलने लगा कि घड़ी की सुइयाँ पूरा चक्कर लगाकर वहीं पहुँच गयीं हैं जहाँ से मैंने जिंदगी शुरू की थी।*  


 *विवाह होने से पहले मेरे पास सिर्फ दोस्त थे।* 


*विवाह के बाद बच्चे हुए।* 


*बच्चे बड़े हो हुए। उनकी जिम्मेदारियां निभाते-निभाते मैं बूढ़ा हो चला।* 

*बच्चों के विवाह हो गए और उनके अलग परिवार और घर बन गए।* 

*बेटियाँ अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त हो गयीं।*  

*उसके बाद उनकी रुचियाँ, मित्र-मंडलियाँ और जिंदगी अलग पटरी पर चलने लगीं।*

            

*अपने घर में मैं और मेरी पत्नी ही रह गए।*


*वक्त बीतता रहा।*

 

*नौकरी का भी अंत आ गया।*

 

*साथी-सहयोगी और प्रतिद्वंद्वी मुझे बहुत जल्दी भूल गए।* 


 *जो मालिक कभी छुट्टी मांगने पर मेरी मौजूदगी को कम्पनी के लिए जीने-मरने का सवाल बताता था, वह मुझे यूं भूल गया जैसे मैं कभी वहाँ काम करता ही नहीं था।*


*एक चीज़ कभी नहीं बदली- मेरे मुठ्ठी-भर पुराने दोस्त।* 


*मेरी दोस्ती न तो कभी बूढ़ी हुई न ही रिटायर।*


*आज भी जब मैं अपने दोस्तों के साथ होता हूँ, लगता है अभी तो मैं जवान हूँ और मुझे अभी बहुत साल और ज़िंदा रहना चाहिए।*   


*सच्चे दोस्त जिन्दगी की ज़रुरत हैं, कम ही सही कुछ दोस्तों का साथ हमेशा रखिये।*           


*वे कितने भी अटपटे, गैरजिम्मेदार, बेहूदे और कम अक्ल क्यों ना हों, ज़िन्दगी के खराब वक्त में उनसे बड़ा योद्धा और चिकित्सक मिलना नामुमकिन है।*


*अच्छा दोस्त दूर हो चाहे पास हो, आपके दिल में धड़कता है।* 


*सच्चे दोस्त उम्र भर साथ रखिये और हर कीमत पर यारियां बचाइये।*

 *ये बचत उम्र-भर आपके काम आयेगी,,,!!!*

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शोध की खातिर किस दुनिया में ? कहां गए ?

प्रिय भारत! / शम्भू बादल  प्रिय भारत!  शोध की खातिर किस दुनिया में ?  कहां गए ? साक्षात्कार रेणु से लेने ? बातचीत महावीर से करने?  त्रिलोचन ...