शनिवार, 3 दिसंबर 2022

प्रेम जनमेजय होने का मतलब /

 


मैं अगस्त 1978 की एक सुबह पांच बजे दिल्ली के अंतर्राज्यीय बस अड्डे पर उतरा था, किसी परम अज्ञानी की तरह, राजधानी में पहली बार,वह भी एकदम अकेले,बाइस साल की उम्र में। मुझे उसी दिन हिंदी के सबसे बड़े प्रकाशन संस्थान राजकमल में नौकरी ज्वाइन करनी थी। साढ़े आठ बजे तक का समय इधर उधर भटक कर मैं अपने भारी बैग के साथ पौने नौ बजे राजकमल पहुंच गया। लंबी प्रक्रिया में नहीं जाते हैं।उसी दिन से मेरी नौकरी शुरू हो गई और रहने के लिए राजकमल का गेस्ट हाउस मिल गया, जहां आज राजकमल का दफ्तर है। दोपहर के समय बीच बीच में मैं दस, दरियागंज जाया करता था, अपने इकलौते परिचित, सुरेश उनियाल से मिलने के लिए,जो सारिका जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका में काम करते थे। एक दिन मुझे सुरेश ने चित्रकार कवि हरिप्रकाश त्यागी से मिलवाया, मुझे त्यागी का साथ इतना भाया कि हम बार बार मिलने लगे। एक दिन त्यागी राजकमल आया तो उसके हाथ में एक किताब झूल रही थी-- शीर्षक पढ़ते ही मेरी हंसी छूट गई। क्या हुआ,त्यागी ने पूछा। मैंने कहा,जिस दिन मैं दिल्ली आया, मेरी हालत इस किताब के शीर्षक जैसी थी। त्यागी भी हंसने लगा। फिर त्यागी वह किताब मेरी मेज पर यह कहते छोड़ गया- रख ले।यह दिल्ली में मेरे अपनी मिल्कियत वाली पहली किताब थी।

  दोस्तों, इतनी लंबी भूमिका इसलिए कि उस किताब का नाम था- राजधानी में गंवार।लेखक थे प्रेम जनमेजय।यह जानकारी यकीनन प्रेम जनमेजय को भी नहीं होगी।बाद में त्यागी ने या शायद सुरेश ने ही मुझे प्रेम जनमेजय से मिलवाया और हम दोस्त बन गए।तब तक साहित्य में व्यंग्य का महत्व मैं समझ चुका था। राजकमल में रहते हुए हरिशंकर परसाई,शरद जोशी और श्रीलाल शुक्ल को न सिर्फ पढ़ चुका था बल्कि बेच भी रहा था। उसके बाद 1982 में बेशर्म मेव जयते और 1986 में पुलिस पुलिस नामक किताबें मैंने पढ़ीं।1990 में मैंने दिल्ली छोड़ दिया और मुंबई आ गया। लेकिन दिल्ली छोड़ने से पहले मैं यह धारणा बना चुका था की परसाई जी और शरद जी के बाद व्यंग्य की दुनिया में प्रेम जनमेजय का सिक्का चलने वाला है। और कालांतर में यह धारणा पुष्ट भी हुई।आज अपने उन आरंभिक दिनों के दोस्त की शिनाख्त जैसी भारी भरकम किताब मेरी गवाही में खड़ी है और मैं गर्व से हंस रहा हूं और भावुकता में बह कर रो भी रहा हूं। बहुत खुश हूं मैं।प्रकाशकीय सीमा है वरना तो इस दोस्त की शख्सियत के आकलन के लिए ऐसे चार खंड भी कम हैं।अब आते हैं इस महत्वपूर्ण किताब पर जो शोधकर्ताओं के लिए किसी लाटरी लगने से कम नहीं है।किस किस दिग्गज ने नहीं लिखा है इसमें?

यह किताब खुलती है वरिष्ठ आलोचक और लेखक तरसेम गुजराल के संपादकीय से- प्रेम जनमेजय को क्यों पढ़ा जाए।इस महत्वपूर्ण और विचारवान संपादकीय में तरसेम जी ने प्रेम के विविधरंगी रचना संसार की विस्तृत जानकारी देने के साथ ही यह भी सिद्ध किया है कि प्रेम जनमेजय होने का क्या मतलब है? इसके बाद करीब 75 वरिष्ठ, कनिष्ठ, समकालीन लेखकों ने प्रेम जनमेजय की रचनात्मक यात्रा और योगदान का विश्लेषण किया है। कुछ खास लेखकों में शामिल हैं-- नरेंद्र कोहली,रामदरश मिश्र, निर्मला जैन, ममता कालिया, चित्रा मुद्गल,सूर्यबाला,कमल किशोर गोयनका,शंकर पुणतांबेकर, कन्हैयालाल नंदन,नासिरा शर्मा, ज्ञान चतुर्वेदी, जगदीश चतुर्वेदी,हरीश नवल,सुधीश पचौरी,रमेश उपाध्याय,अजय नावरिया,अशोक चक्रधर,दिविक रमेश,सूरज प्रकाश,महेश दर्पण और अनंत विजय।सब लेखकों का नाम लेना संभव नहीं लेकिन जो भी हैं महत्वपूर्ण हैं। प्रेम के बारह बहुचर्चित व्यंग्य किताब को रचनात्मक चेहरा भी प्रदान करते हैं।प्रेम द्वारा संपादित पत्रिका व्यंग्य यात्रा पर कमलेश्वर, विष्णु प्रभाकर, श्रीलाल शुक्ल, डाक्टर कमला प्रसाद, डाक्टर विजय बहादुर सिंह जैसे दिग्गजों की टिप्पणी किताब को नये मायने देती हैं।

  दोस्तों,यह समीक्षा नहीं है।यह एक महत्वपूर्ण ग्रंथ का परिचय भर है। फेसबुक पर परिचय ही देना ठीक है।अब किताब मंगाना पढ़ना शुरू होता है आपके पाले में।





मधुबाला

 कवि और जनता का संबंध स्वस्थ काव्य के सृजन के लिए अत्यंत आवश्यक है।यह संबंध तभी बना रह सकता है जब कवि आत्मविश्वासी हो और उसे जनता की सुरुचि में आस्था हो।जहाँ इसका अभाव है वहाँ तरह-तरह के विकार उत्पन्न हो जाते हैं- आप मेरी भूमिका लिख दीजिए, आप मेरी रचना पर सम्मति दे दीजिए, आप मेरी समालोचना कर दीजिए;कविताएँ तो मैंने उच्च कोटि की लिखीं पर जनता में उसे समझने की बुद्धि ही नहीं है, मुझे समझनेवाली जनता का अभी जन्म ही नहीं हुआ है, मुझे तो लोग दो सौ बरस बाद समझेंगे, मेरी कविता इतनी मौलिक है कि उसे परखने के लिए एक विशेष वर्ग का पाठक चाहिए आदि, आदि।इसका सबसे विकृत रूप आज ऐसे अनेक कवियों में देखा जाता है जिनके पाठक तो हैं तीन पर समालोचक तेरह।उनकी कविताओं की चर्चा निर्जीव स्याही से मुर्दा काग़ज़ों पर तो बहुत होती है पर सजीव धड़कते हुए हृदय से उनकी प्रतिध्वनियाँ नहीं आतीं।.....प्रजातंत्र की स्वतंत्रता साहित्य के राज्य का अपेल सिद्धांत है।वहाँ न तानाशाही चलती है और न गुरुडम चलता है।

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 डॉ. हरिवंशराय बच्चन

('मधुबाला' के आठवें संस्करण की भूमिका से)

शैलप्रिया जी के लिए संबोधन के कुछ शब्द.......।

 (ज़िन्दगी में साथ चलते लोग जब अचानक अलविदा कहते हैं तो वह जगह हमेशा के लिए खाली हो जाती है। 28 साल पहले​ वह हादसा हुआ था जब सिर्फ 48 साल की उम्र में वे हमसब से बहुत दूर चली गयीं।  इसी सन्नाटे के बीच रहते हुए शैलप्रिया जी के लिए संबोधन के कुछ शब्द।) 


ओ मेरी तुम!

नींद और अवसाद में बीते हैं ये अकेले दिन।

ये दिन 

जिनके उजाले प्रतिपल मद्धिम हुए हैं।

उस रात अस्फुट अलविदा में

कांपे थे जो होंठ और हाथ, 

वे अब पिघलती पुतलियों के हमराज हैं।


एक दिन चावल के नियति-पिंड  पर

काले तिलों से लिखा था

आधी कविता का अधूरा पत्र। 

क्या सहज है पुरखों की कतार में

दिवंगत प्रिया की प्रतिष्ठा ?

और उसके लिए भरे-मरे मन से

अन्तिम बिदाई में

कर्मकांड की सनातनी क्रिया ?


आज यादों की वेदी पर

आंसुओं के फूल मुरझा चुके हैं,

मजार पर जलती मोमबत्तियां

धुएं में घुट रही हैं,

ऐसे में सिर्फ नीम बेहोशी की चाह

सुकून देती है।

ओ मेरी तुम!

मनोमंथन की यात्राएं

अजनबी पड़ावों से लौट कर

देह-घाटी में थम जाती हैं।

हरकत का इकतारा बजता है

जब यह भीतर का सन्नाटा

बाहरी कोलाहल से टकराता है।

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 Vidya bhushn  



अनूठा है ‘साउथ-ईस्ट एशिया रामायण रिसर्च सेंटर’


जब भी असम जाती हूं तो कोशिश होती है कि एक बार डा. इंदिरा गोस्वामी जी के घर जरूर जाऊं और साउथ-ईस्ट एशिया रामायण रिसर्च सेंटर में अध्ययनरत शोध छात्रों और उनके परिजनों से उनकी अन्य किताबों के बारे में और अधिक जान सकूं। पिछले वर्ष आज के ही दिन में वहां गई थी। गुवाहाटी जाती हूं तो मां कामाख्या, जाने-माने समाजसेवी हेमभाई जी के आश्रम, वरिष्ठ पत्रकार रविशंकर रवि और मामोनी बाइदौ के अलावा मेरे कुछ अनन्य मित्रों से जरूर मिलती हूं। इस बार काफी कष्ट में थी क्योंकि 3-4 दिन पहले नगांव, असम में मेरा एक बड़ा एक्सीडेंट हो गया था। ‘बड़ा’ इसलिए कहा कि उसके पहले याद नहीं पड़ता, कभी चक्कर आया हो या इतनी अधिक चोटें एक साथ आईं हो और रोकर किसी अपने को बताऊं, ऐसा कोई नहीं था वहां। क्योंकि मैं तो सोलो ट्रैवलर की तरह नागालैंड और असम की यात्रा पर निकली थी। खैर, न्यूज-18 में कार्यरत मेरे बंधु नीलोत्पल बोरा के घर रुकी| उन्होंने, उनकी पत्नी और मेरी मित्र सुजाता, उनकी माता जी आदि ने मेरा बहुत बहुत ख्याल रखा। इसके लिए मैं उनकी ताउम्र आभारी रहूंगी।  🙏🙏

#mamtasinghmedia  Nilutpal Z Borah Ravishankar Ravi Sujata Pujari Borah Minu Borah

आ: धरती कितना देती है' ....???/ ममता सिंह



सुमित्रानंदन पंत की गिनती ऐसे लेखकों में की जाती है, जिनका प्रकृति का चित्रण समकालीन कवियों में सर्वश्रेष्ठ था। आधुनिक काव्य की भूमिका में सुमित्रानंदन पंत जी लिखते हैं कि ’’कविता करने की प्रेरणा मुझे सबसे पहले प्रकृति निरीक्षण से मिली है, जिसका श्रेय मेरी जन्मभूमि प्रदेश को है। मैं घण्टों एकांत में बैठा प्राकृतिक दृश्यों को एकटक देखा करता था और कोई अज्ञात आकर्षक मेरे भीतर एक अव्यक्त सौन्दर्य का जाल बुनकर मेरी चेतना को तन्मय कर देता था।’’

पद्मभूषण, साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ जैसे अनगिनत पुरस्कार प्राप्त महान कवि सुमित्रानंदन पंत को हिंदी में ‘वर्ड्सवर्थ’ कहा जाता है। उनके बिना हिंदी साहित्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती। साथ ही, हिमालय की ओट में छिपे कौसानी जैसे छोटे से गांव को अपनी रचनाओं के माध्यम से विश्व मानचित्र पर जगह दिलाने का काम यदि किसी ने किया है तो वो पंत जी ही थे। आज उनकी एक कविता की ये पंक्ति 

'आ : धरती कितना देती है'... अनायास ही मानस पटल को झकझोर कर रख देती है कि वो अपनी लेखनी के माध्यम से इतना कुछ गढ़ गए हैं जो देश के लिए अमूल्य धरोहर हैं लेकिन हमने उन्हें क्या दिया? उनके एक कमरे के मकान जिसे ठीक से सरकार संग्रहालय तक की शक्ल भी नहीं दे पाई। कहने को पहाड़ी शैली में एक स्ट्रक्चर जरूर खड़ा किया गया है लेकिन वह भी महज खानापूर्ति ही है। यानी संग्रहालय के नाम पर सरकार ने उनकी कुछेक चीजों को इकट्ठा करके एक मिनी म्यूजियम तो बना दिया लेकिन उसे संग्रहालय भी नहीं कहा जा सकता। वहां न कोई तख्ती लगी मिली, न कोई जानकार व्यक्ति, जिससे पंत जी के बारे में पर्यटकों को कुछ ठोस जानकारी मिल सके। यानी  जिसने राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रौशन किया हो, उनकी ऐसी बेकद्री देखकर मन बहुत व्यथित हुआ।

कल सुमित्रानंदन पंत जी की पोस्ट डाली, यह अनायास ही नहीं डाली। लिखना कुछ और था जो वहां देखकर समझा, लेकिन सोचा कि क्या लिखूं उस राज्य के बारे में जिसने देश को कई जाने माने कवि और साहित्यकार दिए। जब वहां की सरकारों और बुद्धिजीवियों ने अपने प्रतिष्ठित कवियों और साहित्यकारों की सुध नहीं ली तो हम कौन...हां, इतना जरूर है कि पर्यटकों की के लिए आगामी 19 और 20 नवम्बर को ‘कौसानी महोत्सव’ का आयोजन किया जा रहा है। लेकिन इस दौरान होने वाले कार्यक्रमों में सुमित्रानंदन पंत जी को कितना स्थान मिलेगा, यह देखने वाली बात होगी।  

#mamtasinghmedia @pmoindia @narendramodi #AmritMahotsav @MinOfCultureGoI @pushkardhami @cmo_uttarakhand

रविवार, 27 नवंबर 2022

 प्रखर पत्रकार, तेजस्वी टिप्पणीकार, बेहतरीन कवि और विरल कथाकार

प्रियदर्शन ने कहानी कला के अनेक आयामों की रौशनी में

मेरी कथा यात्रा का बारीक विश्लेषण किया है जिसे पाठकों और मित्रों के साथ साझा करने का मन हो आया है---

 ज़िंदगी को कहानी की तरह लिखते धीरेंद्र अस्थाना

प्रियदर्शन

धीरेंद्र अस्थाना ने 70 के दशक में लिखना शुरू किया। यह वह समय है जब नई कहानी का आंदोलन अपने शिखर पर पहुंच चुका था और उसके कई नायक आधुनिक हिंदी साहित्य में इतिहास पुरुष जैसे हो चुके थे। कमलेश्वर, मोहन राकेश और राजेंद्र यादव की लगभग कुख्यात हो चुकी त्रयी के अलावा निर्मल वर्मा, धर्मवीर भारती, भीष्म साहनी, मन्नू भंडारी और कृष्णा सोबती की कहानियां अलग-अलग ढंग से इसी आंदोलन की कड़ियों की तरह हमारे सामने थीं। ज्ञानरंजन, अमरकांत, दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह, मार्कंडेय, रवींद्र कालिया और धीरेंद्र अस्थाना इसी परंपरा का हिस्सा रहे। इनके लगभग समानांतर या तत्काल बाद उदय प्रकाश, संजीव और शिवमूर्ति जैसे विलक्षण कथाकार हिंदी साहित्य के परिदृश्य पर उभरे।

धीरेंद्र अस्थाना की कहानियों को इस परंपरा के हिस्से के तौर पर पढ़ने का एक मकसद और है। नई कहानी का आंदोलन किसी शून्य से पैदा नहीं हुआ था, वह अपने देशकाल, अपनी परिस्थितियों की निहायत उपज था। आज़ादी के बाद का मोहभंग, गांव से कटकर पहली बार शहरों में बस रहे मध्यवर्ग का मुश्किल होता जीवन, युवाओं के भीतर बढ़ती बेरोज़गारी और हताशा, प्रेम और दांपत्य के नए बनते तनाव- यह सब एक नया यथार्थ बना रहे थे जिसे शायद पुराने शिल्प में देखना और रचना संभव नहीं था। यह एक शुष्क यथार्थ था जिसके हिस्से के पुराने स्वप्न धीरे-धीरे तिरोहित हो रहे थे, जिसके भीतर देश को नए सिरे से गढ़ने और एक बराबरी वाला समाज बनाने की कल्पना लगभग रोज चोट खाती हुई मर रही थी और जिसके भीतर इन सबसे पैदा हुई एक गहरी बेचैनी थी।

अभाव, अनिश्चय, हताशा और बेचैनी के लगभग इसी चौराहे पर हमें धीरेंद्र अस्थाना की कई कहानियां मिलती हैं। लेकिन वे जीवन की छायाप्रति की तरह नहीं मिलतीं। धीरेंद्र अस्थाना इस मायने में अपने समय के कई कथाकारों से भिन्न हैं कि वह किन्ही दी हुई जीवन स्थितियों को, किसी अर्जित अनुभव को जस का तस नहीं रखते, बल्कि उनका लेखकीय हस्तक्षेप उनमें से अपनी कहानी चुनता है। ऐसा लगता है, पूरा जीवन उनके सामने चल रही एक कहानी जैसा है। वे उसमें शामिल भी हैं और उससे विलग भी हैं। ऐसी कहानी लिखना आसान काम नहीं होता। इसमें दो तरह के खतरे बहुत प्रत्यक्ष होते हैं। या तो कहानी बिखर जाती है या फिर वह जीवन की नकली, स्पंदनविहीन प्रति होकर रह जाती है।

लेकिन धीरेंद्र अस्थाना की कहानियां दोनों खतरों के पार जाती हैं- शायद इसलिए कि उन्हें मालूम है कि अंततः उन्हें कहना या बताना क्या है। कई तरह की जटिल स्थितियां रचते हुए वे अंततः कहानी अर्जित कर लेते हैं जो उन्हें कहनी होती है। उनकी पहली ही कहानी 'लोग हाशिए पर' एक जटिल कहानी है। कहानी कम से कम तीन स्तरों पर चलती है। पहले स्तर पर एक प्रेस है जिसमें काम कर रहे कई लेखक बहुत कम पैसे पर- लगभग- शोषण की स्थिति में नौकरी करने को मजबूर हैं। दूसरा स्तर आर्थिक तौर पर कमज़ोर इन लेखकों के परिवारों का है जिनकी ज़िम्मेदारियां पूरी करते या उनके दबाव से भागते-बचते ये लोग शराब के ठेकों की शरण लेते हैं और एक-दूसरे को किसी फुरसत में अपनी परेशानियां, कुंठाएं, कहानियां-कविताएं सब सुनाते हैं। एक अन्य स्तर पर यह कहानी उन मज़दूरों की है जो एक दिन हड़ताल करते हैं और अपना हक़ हासिल करने की कोशिश करते हैं। लगभग कामयाब दिखती इस हड़ताल के खात्मे के बाद मालिक साज़िश करते हैं और हड़ताल का नायक एक क़त्ल के जुर्म में सलाखों के पीछे भेज दिया जाता है। 

पहली नज़र में यह कुछ अतिरिक्त नाटकीय कहानी लग सकती है- जिसे लेखक ने अपनी कल्पना से बुना ही नहीं है, बल्कि अपने स्व को अलग-अलग चरित्रों में बिखेर दिया है। लेकिन कहानी की सफलता इस बात में है कि कथाकार इन तमाम प्रतिकूलताओं के बीच बनने वाले हालात को बिल्कुल ठीक-ठीक पकड़ता है, किसी नक़ली आशावाद की गिरफ़्त में आने की जगह कहानी को उसके यथार्थ तक जाने देता है और उसमें नाटकीयता मिलाते हुए भी उसके पाठ की प्रामाणिकता बनाए रखता है। दरअसल इस काम में धीरेंद्र अस्थाना की मददगार उनकी बहुत जीवंत भाषा भी है- ऐसी भाषा जो बहुत कम शब्दों में स्थितियों और चरित्रों को रच सकने में सक्षम है। यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ऐसी भाषा किसी कौशल या अभ्यास का नतीजा नहीं होती, उस जीवन से जुड़ाव से पैदा होती है जिसको लेखक अपनी कथा में रचने की कोशिश कर रहा होता है। यह जुड़ाव इस कहानी में बना रहता है और इसलिए कहानी अपने पाठकों से जुड़ पाती है। 

धीरेंद्र अस्थाना दरअसल जीवन के समानांतर अपनी कहानियों में एक और जीवन रच रहे होते हैं। क़ायदे से लगभग हर लेखक यही काम करता है, लेकिन सबकी अपनी प्रविधि होती है। कुछ लोग बस जो घटित होता है, उसमें कुछ कल्पना का रसायन मिलाकर, अपने-आप को अदृश्य रखते हुए ऐसी यथार्थवादी कहानियां लिखते हैं जिन्हें पढ़ते हुए लेखक का- या कहानी पढ़ने का- ध्यान नहीं आता। 

मगर धीरेंद्र अस्थाना की प्रविधि दूसरी है। वे एक साथ अपनी कहानियों में इतनी सारी चीज़ें ले आते हैं कि उन्हें जोड़ने के लिए कोई लेखक चाहिए। वे पाठक को यह भूलने नहीं देते कि वह कहानी ही पढ़ रहा है, लेकिन कहानी के तमाम सूत्र अंततः उस जीवन की ओर ले जाते हैं जिसमें उल्लास हो या उदासी, वह अपने पूरे गाढ़े रंग में प्रगट होती है। 

ऐसी ही एक कहानी है ‘भूत।‘ लेखक का एक वर्तमान है जिसमें एक स्त्री भी है जिससे वह प्रेम करता है। लेकिन उसे लगता रहता है कि उसका भूत उसके वर्तमान को खा रहा है। वह चाहता है कि वह अपनी प्रेमिका से यह सब साझा कर सके, लेकिन कर नहीं पाता। दूसरी तरफ़ प्रेमिका लगातार महसूस करती है कि वह एक अजनबी शख़्स के साथ है। वह बार-बार उसे कुरेदने की कोशिश करती है, लेकिन वह अपने खोल से बाहर नहीं आता। यह स्थिति उसे दफ़्तर में भी अजनबी और अकेला करती जाती है। जब वह पीछे मुड़कर और पलट कर देखता है तो पाठक के सामने एक सिहरा देने वाला यथार्थ सामने आता है। बरसों पहले वह पिता की मौत के बाद अपनी मां की उम्मीद की तरह घर से निकला था- लेकिन कहां और क्यों रास्ते में छूट गया और इस अधूरी रह गई वापसी ने कैसे उसे वर्तमान का प्रेत बना डाला है, इसकी लगभग स्तब्ध कर देने वाली कहानी हमारे सामने आती है। 

ध्यान से देखें तो धीरेंद्र अस्थाना की कहानियां जीवन के कई आयामों के बीच आवाजाही करती हैं। एक तरफ़ वह समाज और व्यवस्था है जिससे उनके मध्यवर्गीय चरित्र टकराते रहते हैं- कभी हारते और कभी जीतते भी हैं, लेकिन अंततः उनकी कहानी इस अन्यायपूर्ण और अमानवीय व्यवस्था और इसे बदलने की ज़रूरत को कुछ रेखांकित करती हुई किसी अंत तक पहुंचती है। एक आयाम उस परिवार का है जिसमें बेबस पिता हैं, कातर मां हैं, भाई और बहनें हैं। कहीं पिता से टकराता, कहीं उनसे पिटता और कहीं उनको याद करता नायक है, कहीं मां की अपेक्षाओं पर खरा न उतरने की कचोट का मारा कथावाचक हैं, कहीं भाई को तलाश रहा एक स्तब्ध शख़्स है जिसे पता है कि बहुत सारी मजबूरियों को मिलाकर बने यथार्थ ने उसे लगभग पीस डाला है। एक आयाम प्रेम और घर से जुड़ा है जहां रिश्ते दरकते हैं, एक-दूसरे को सहारा देते हैं और फिर एक-दूसरे को नए सिरे से पहचानने की कोशिश करते हैं। 

इन्हीं कहानियों के बीच एक स्तब्ध कर देने वाली कहानी ‘चीख’ है। कथावाचक का मानसिक तौर पर दुर्बल भाई घर से चला गया है, घर उसकी तलाश में जुटा है, पच्चीस दिन बाद अचानक वह लौट आता है। लेकिन वह यह बता पाने में असमर्थ है कि इन पच्चीस दिनों में वह कहां रहा, किनके आसरे रहा। बस एक दिन बता पाता है कि उसे मां की चीख सुनाई पड़ी थी और वह लौट आया था। 

ऐसी ही एक बहुत जटिल कहानी ‘जन्मभूमि’ है। लेखक कहानी के शुरू में ही यह ‘डिस्क्लेमर’ डाल देता है कि यह सुसंगत घटनाक्रमों के बीच बनी कहानी नहीं है- इसे वह ‘ऐंटी स्टोरी’- प्रति कहानी- कहता है। यह कहानी भी बहुत नाटकीय ढंग से शुरू होती है- लेखक का इसरार है कि पाठक किसी मंच की कल्पना करें जिसमें एक दृश्य घटित हो रहा है। इस दृश्य में अरसे बाद बेटे के सामने आया पिता उसे गद्दार कहता है। आने वाले दिनों में पार्टी के कॉमरेड उसे डरपोक कहते हैं क्योंकि वह कहता है कि वह राजनीतिक मोर्चे से ज़्यादा साहित्यिक मोर्चे पर उपयुक्त है। वह शराब के ठेके पर अपने दोस्त के साथ बैठता है, वहां से पिट कर दोस्त के साथ ही किसी अनजान लड़की के घर पहुंचता है। उसे अपनी पत्नी याद आती है और उसका दुख याद आता है कि वह उसे समझने की कोशिश नहीं करता। 

दरअसल यह कई दृश्यों को मिलाकर बुनी गई कहानी है। किसी फिल्म की तरह ये सारे दृश्य साथ चल रहे होते हैं। एक दृश्य पत्नी का है, एक दृश्य कथावाचक की रंगकर्मी दोस्त अनुराधा कुलकर्णी का है और एक दृश्य उसके अकेलेपन का भी है। ये सारे दृश्य मिलकर एक बड़ा दृश्य बनाते हैं- अभाव और संकट की मारी दुनिया में एक संवेदनशील-चरित्र के लगातार पिटने, रोने और पलायनोन्मुख होने का। लेकिन यह इस निरे अर्थ में पलायन नहीं है कि इसमें सोचने का तत्व बाक़ी है, प्रतिरोध और गुस्सा बाक़ी है और यह खयाल और सवाल बाक़ी है कि ‘एक अकेला आदमी बावजूद सकारात्मक सोच और तमन्नाओं के अंततः ग़लत क्यों साबित होता है, होता चला जाता है?’

यहीं यह खयाल आता है कि क्या धीरेंद्र अस्थाना की कहानियां विफल कथानायकों की कहानियां हैं? उनके हिस्से का प्रेम अधूरा रहता है, उनका परिवार उनसे असंतुष्ट रहता है, ज़िंदगी उनसे सधती नहीं, क्रांति उनसे होती नहीं। वे अकेले पड़ जाने को अभिशप्त चरित्र हैं। लेकिन क्या यह विफलता उनके भीतर मौजूद किसी ‘फेटल फ्लॉ’- किसी सांघातिक कमज़ोरी की है- शेक्सपियर के महान चरित्रों की तरह जो एक मोड़ पर जानलेवा साबित होती है? या इसका वास्ता उस दुर्निवार और दुर्विराट होती व्यवस्था से है जिसमें किसी भी संवेदनशील आदमी के लिए या तो यांत्रिक बन कर जीना संभव है या फिर घुट-घुट कर मरना संभव है? दरअसल यह सवाल धीरेंद्र अस्थाना की कहानियों का मर्म समझने की एक कुंजी दे सकता है। धीरेंद्र अस्थाना की ये कहानियां अच्छी क्यों लगती हैं? क्योंकि वे अपनी अंतर्वेदना में सिर्फ़ निजी छटपटाहट की कहानियां नहीं हैं, वे एक सार्वजनिक विडंबना की भी कहानियां हैं जिन्होंने मनुष्य को मनुष्य नहीं रहने दिया है। 

‘नींद के बाहर’ वह कहानी है जिसमें धीरेंद्र अस्थाना का कथा-वैभव अपने पूरे निखार के साथ दिखाई पड़ता है। एक बड़े कंपनी के बड़े अधिकारी की नौकरी छूटने के बाद उसकी दुनिया बदल जाती है। लेकिन यह नौकरी छूटने के साथ लोगों की नज़र बदल जाने की सपाट कहानी नहीं है। उल्टे उस अधिकारी को लगता है कि वह जब तक नौकरी में था तब तक एक गहरी नींद में था जिसमें दुनिया और उसका सच उसके सामने से ओझल थे। नौकरी छूटने के साथ वह नींद से बाहर आ गया है। बेशक, इसमें बदली हुई निगाहें भी हैं, दोस्तों द्वारा उसका फोन न उठाने की दास्तानें भी हैं, पास-पड़ोस से उसका नया बनता संबंध भी है, लेकिन इन सबके बावजूद यह निजी दुख या पीड़ा की कहानी नहीं है। यह इस नए बनते चमकदार भारत में लगातार असुरक्षित होते जाते लोगों और उनकी ज़िंदगियों में फैलते अंधेरे की भी कहानी है- जो बहुत बारीक़ी से लिखी गई है और जिसके बहुत सारे स्तर हमें बांधे रखते हैं। 

इसी तरह एक और कहानी है- ‘पिता’। यहां पिता और पुत्र एक-दूसरे से जुड़े हुए भी हैं और कटे हुए भी- उनमें एक आत्मीय पारस्परिकता है, लेकिन वैसी भावुक निर्भरता नहीं जो पुराने पिताओं-पुत्रों में उनकी संवादहीनता के बावजूद देखी जाती है- एक-दूसरे पर दबाव बनाने या एक दूसरे के दबाव से मुक्त होने की कोशिश तो कतई नहीं। कोई हठी आलोचक पढ़ना चाहे तो इसमें टूटती-बिखरती

पारिवारिकता के सूत्र भी पढ़ सकता है। बेशक, वे सूत्र यहां हैं, लेकिन इन चरित्रों या इस कहानी की वजह से नहीं, बल्कि उस सहज माहौल की वजह से जो वक़्त बदलने के साथ बदल गया है। हां, इस बदले हुए माहौल में, एक निष्ठुर अकेलापन है जो सिर्फ इस वजह से नहीं है कि मां-पिता कहीं दूर हैं और बेटा अकेले है, बल्कि इस वजह से भी है कि अपनी स्वतंत्रता की कामना की, जीवन को अपने ढंग से जीने की ज़िद की, एक क़ीमत यह अकेलापन भी है। इसी अकेलेपन ने राहुल को भी बनाया है और मनचाही शादी और परिवार के बावजूद अंततः अकेला छोड़ दिया और यही अकेलापन विकास को भी बना रहा है।

कहानी का अंत काफी महत्वपूर्ण है। धीरेंद्र अस्थाना चाहते तो इसे आसानी से पिता की मर्जी की कहानी

बना सकते थे। बेटे की छूटी हुई नौकरी दुबारा लग गई है, वह कलाकार के रूप में स्थापित है, अब एक

घर है जहां से वह जुड़ा रहे तो पिता और परिवार से बंधा रहेगा। लेकिन अपने बेटे की उपलब्धि पर खुश

पिता फिर भी उसे यह आश्रय नहीं देता। राहुल दिल्ली की फ्लाइट वापस पकड़ने के लिए निकलने से पहले विकास से पूछता है, वह रहेगा कहां। विकास के जवाब में एक बेफिक्री है और राहुल उसे अपने हिस्से का आसमान या अपने हिस्से की छत बनाने के लिए (बिना यह कहे) छोड़ जाता है। यह एक जटिल अंत है- एक हूक भी पैदा करता है जो देर तक बनी रहती है। लेकिन शायद यही तार्किक है।

विकास को बांधे रखना होता तो राहुल शुरू से बांधे रखता- इस आख़िरी मोड़ पर वह उसे क्यों बांधे।

इस कहानी की कई ख़ासियतें हैं। यह अपने समय से बंधी- उसकी ताल में निबद्ध- कहानी है। यहां

छूटते हुए घर हैं, छूटती हुई नौकरियां हैं, नौजवान बेफ़िक्री है, बहुत हल्के से दीखता, लेकिन बदलता हुआ हिंदुस्तान है- और खालिस इक्कीसवीं सदी का वह द्वंद्व है जो अपने रिश्तों को लेकर हमारे भीतर

मौजूद है।

धीरेंद्र अस्थाना का लेखन संसार बहुत बड़ा और विपुल है। लेकिन उसकी खासियत यह है कि वह अपने बहुत क़रीब लगता है। शायद इसलिए कि वह बहुत दूर तक निजी प्रसंगों और अनुभवों से बनता है। यही वजह है कि उसमें बहुत गहरी तपिश दिखाई पड़ती है, उससे बहुत ऊष्मा मिलती है। उनके उपन्यास ‘गुज़र क्यों नहीं जाता’ में भी ये आत्मकथात्मक प्रसंग मिलते हैं। यह एक निजी कहानी जैसा है, लेकिन इसमें निहित सार्वजनिकता अदृश्य नहीं रहती और न ही इसके दंश अलक्षित रह जाते हैं।

लेकिन इतना राग-विराग-खटराग-अनुराग धीरेंद्र अस्थाना लाते कहां से हैं? उनका निजी वितान इतना बड़ा कैसे होता जाता है कि उसमें सार्वजनिकता भी समाई मिलती है? इसका जवाब उनकी आत्मकथा ‘ज़िंदगी का क्या किया’ देती है। इस किताब से गुज़रते हुए अनायास यह खयाल आता है कि धीरेंद्र जीवन की ऊष्मा को, उसके ताप को, जिस तीव्रता के साथ महसूस करते हैं, उसे अपने लेखन में लगभग ज्यों का त्यों उतार लेते हैं। धीरेंद्र बहुत बेबाकी और धीरज से अपने बचपन का, उस बचपन के संघर्ष का, अपने रिश्तों का, अपनी मां-अपने पिता. अपने चाचा का उल्लेख करते हैं। इस उल्लेख में संवेदनशीलता भी है, ज़रूरी दूरी भी, तटस्थता भी और कभी-कभी बिल्कुल निष्कवच यथार्थ को दिखा देने वाला साहस और स्वीकार भी। धीरेंद्र के कोख में रहते आत्महत्या की कोशिश में अपाहिज हो गई मां, फक्कड़पने के अलग-अलग ध्रुवांतों को जीते और परिवार के लिए किसी मुसीबत की तरह मिलते पिता, परिवार के आर्थिक अभावों को अनदेखा कर अपनी संपन्न जीवनशैली में खोए रिश्तेदार, और छोटे-बड़े अभावों का जैसे अंतहीन सिलसिला- मेरठ, आगरा, मुज़फ़्फरनगर और देहरादून के बीच पले-बढ़े इस जीवन की झलक हमें य़ह भी बताती है कि लेखक कैसे बनते हैं या धीरेंद्र अस्थाना नाम का लेखक कैसे बना। 

जिसे ज़िंदगी इस दुर्धर्ष अनुभव की तरह मिली हो, वह या तो बिल्कुल संवेदनहीन होकर उसे मशीन या पशु की तरह काट देता है, या फिर अतिरिक्त संवेदनशील होकर आत्महत्य़ा के रास्ते की ओर बढ़ चलती है और अगर यह भी नहीं तो लेखक बन जाता है। दरअसल यह लिखना है जिसने धीरेंद्र अस्थाना का जीना संभव किया। यही वजह है कि जीवन भी उनके लिए कहानी जैसा है। इस कहानी में अपनी राहतें भी हैं और इससे निकलती राहें भी। यह उनकी सीमा भी है और उनकी शक्ति भी। और इन सबसे निकलता अंतिम सच यह है कि धीरेंद्र अस्थाना हिंदी के एक मूल्यवान लेखक हैं जिनकी रचनाओं ने पाठकों को समृद्ध किया है और हिंदी कथा की परंपरा में अपने स्तर पर कुछ जोड़ा भी है।

शनिवार, 26 नवंबर 2022

कवि केदारनाथ सिंह की कविता पर भारत यायावर की विद्वता पूर्ण विवेचना

  




देश के जाने माने हिंदी के साहित्यकार कवि, संपादक समालोचक, डॉ. भारत यायावर ने कवि केदारनाथ सिंह की एक कविता, जो निराला जी को समर्पित है।.. जिसे वे  अपने जीवन काल में बार-बार गुनगुनाया करते थे।

 कविता के मायने व अर्थ को.. वे किस रूप में लेते हैं ? उसका वर्णन किस तरह करते हैं ? साहित्य के लिए यह एक अमिट वर्णन बन गया है।

 कविताएं तो खुब लिखी जा रही हैं। पढ़ी भी जा रही हैं। कई कविताएं पाठकों की समझ से बाहर चली जाती है। बार-बार पढ़ने के बाद भी कविताओं का अर्थ समझ में नहीं आ पाता है।  कई कविताएं पढ़ने के साथ ही भाव साफ-साफ समझ में आने लगती है। कई कविताओं के अर्थ बार बार पढ़ने के बावजूद कविताओं की पंक्तियों से बाहर आ नहीं पाती हैं। 

इन दिनों  मुक्त छंद की कविताओं की बाढ़ सी आ गई है। यह सिर्फ यह बार सिर्फ भारत में ही नहीं अपितु विश्व के सभी  देशों में आई हुए है।  मुफ्त छंद की कविता की शुरुआत को गति प्रदान करने में निराला की कविताएं प्रतिमान के रूप में सामने आई थीं। तब से लगातार मुक्त छंद की कविताएं लिखी जा रही हैं।

 भारत यायावर देश के एक जाने-माने कवि थे । आज भी इनकी कविताएं बड़े चाव से पढ़ी जाती हैं।  लोग इनकी कविताओं में जीवन, तड़प और मुस्कुराहट तलाशते रहते हैं।‌ इनकी कविताएं मुक्त छंद में रहती जरूर हैं, लेकिन बहुत ही सहजता के साथ अपनी बातों को कह गुजरती है। भारत यायावर  एक कवि के साथ एक अच्छे कविताओं के पाठक थे। वे हमेशा नए एवं पुराने कवियों की कविताओं को पढ़ते रहते थे। वे कवि  की पंक्तियों के मर्म व भाव को समझने का प्रयास करते रहे थे। भारत यायावर की नजर कवि केदारनाथ सिंह की पंक्तियों पर पड़ी । कवि केदारनाथ सिंह देश के जाने-माने कवियों में एक थे।  उनकी पंक्तियां भाव से  भरी होती हैं। लेकिन समझने का नजरिया और भाव भी होनी चाहिए।

'दुखता रहता है,अब यह जीवन' शीर्षक  की यह कविता कवि केदारनाथ सिंह की प्रमुख कविताओं में एक है । यह कविता कवि निराला जी को समर्पित है ।

भारत यायावर ने उक्त कविता के भाव को कम से कम पंक्तियों में इतनी सहजता और विद्वता पूर्ण तरीके से समझाने की कोशिश की है, पढ़कर मन गदगद हो जाता है।

 आज मैं कवि केदारनाथ सिंह की उक्त पंक्तियां और भारत यायावर की उक्त कविता पर अर्थपूर्ण  विवेचना आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं ।

उम्मीद है, आपको पसंद आएगा।


निराला को याद करते हुए

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निराला को याद करते हुए केदारनाथ सिंह ने एक कविता लिखी है, जिसे मैं प्राय: गुनगुनाता हूं।यह मेरी पसंदीदा कविता है।कल मेरे परम प्रिय मित्र अनिल जनविजय से बातचीत के दौरान मैंने कहा था कि मैं केदारनाथ सिंह की कविता पर टिप्पणी लिखूंगा। पहले यह कविता फिर से पढ़ने की आपसे गुजारिश करूंगा :


    उठता हाहाकार जिधर है

     उसी तरफ अपना भी घर है


     खुश हूं -- आती है रह-रह कर

      जीने की सुगंध बह-बहकर


     उसी ओर कुछ झुका-झुका- सा

     सोच रहा हूं रुका - रुका - सा


      गोली दगे न हाथापाई

      अपनी है यह अज़ब लडाई


      रोज़ उसी दर्जी के घर तक

       एक प्रश्न से सौ उत्तर तक


      रोज़ कहीं टाँके पड़ते हैं

      रोज़ उघड़ जाती है सीवन

       " दुखता रहता है अब जीवन!"


केदारनाथ सिंह की कविताएं कई-कई बार पाठ करने के बाद भी जल्दी खुलती नहीं हैं। उनके अर्थ और मर्म तक कैसे पहुंचा जाए, प्रवेशद्वार पर ताला लगा हुआ है। कुंजी के रूप में निराला का एक वाक्य है :

    दुखता रहता है यह जीवन!

जीवन का दुखना ही दुखी जीवन की पहचान है।इस दुखी जीवन पर प्रेमचंद का एक निबंध है, जिसमें उन्होंने अपनी भाव-संवेदना बुद्ध को समर्पित की है।दुखते जीवन का गहरा एहसास निराला ही नहीं, प्रेमचंद में भी है। जीवन को सही रूप में महसूस करते रहने की यह एक प्रक्रिया है।दुखिया दास कबीर ही नहीं हाहा करते भारतेंदु भी हैं, जो दुर्दशा को विकल मन से पहचान करते हैं। हाहाकार मैथिलीशरण शरण गुप्त की भारती में भी दिखाई देता है । आहत हृदय में शरबद्ध क्रौंच पक्षी वाल्मीकि की तरह हर युग के रचनाकार के भीतर करुण विलाप करता दिखाई देता है। केदारनाथ सिंह हाहाकार की तरफ ही अपना घर होने का इशारा कर इसी परंपरा से संबद्ध होने की घोषणा करते हैं तो दरअसल वे जीवन के गहरे रूप से जुड़े होने की संकल्पना को ही प्रकट करते हैं।

  इस दुखते जीवन में भी कभी-कभार जीने की सुगंध बहकर आती है, यह आह्लादित करती है। जीवन का यह भी एक पक्ष है। जीवन खुशियों के इसी पक्ष की ओर झुका रहना चाहता है, लेकिन इससे गतिशीलता बाधित होती है।वह नहीं चाहता कि जीवन की सुख-सुविधा की ओर रुका हुआ झुका रहे।

     दुखते जीवन की गहरी संवेदना से युक्त कवि इस सद्भाव से संचालित है कि इस जीवन में प्रेम और सदाचार हो। अपनत्व की भावना को स्थापित करना ही उसका संघर्ष है।न कहीं गोली चले और न हाथापाई हो, यह उसकी विचित्र किस्म की लड़ाई है।

   जीवन में टूट-फूट होता रहता है। इसमें तरह-तरह की परेशानियां आती रहती हैं। रोज़ टांके पड़ना और सिलाई का उघड़ जाना लगा रहता है। ऐसे में मरम्मत करने वाले दर्जी के घर दौड़ लगाने की रोज़-रोज़ की आवश्यकता बनी रहती है।

    इस दुखते रहने वाले जीवन के साथ मिलकर चलने वाले रचनाकार की प्रतिभा निरंतर निखरती है और जीवन को भी संवारती है।

   केदारनाथ सिंह की कविता कबीर की वाणी की तरह चुनौती देती है, कहै कबीर कोई विरला बूझै।

   नामवर सिंह ने कहा है कि जब बिना मेहनत के रोटी भी नहीं मिलती तो कविता में छुपा अर्थ और मूल्य कैसे मिल सकता है? कविता ही नहीं कोई साधारण से साधारण वस्तु भी अपने में कई रहस्यों को समेटे हुए रहती है। उससे विरले लोग ही जूझ पाते हैं। समुद्र के गहरे तल में जाकर ही मोती की खोज संभव होती है।

प्रेम जनमेजय होने का मतलब /

  मैं अगस्त 1978 की एक सुबह पांच बजे दिल्ली के अंतर्राज्यीय बस अड्डे पर उतरा था, किसी परम अज्ञानी की तरह, राजधानी में पहली बार,वह भी एकदम अक...