गुरुवार, 6 अक्तूबर 2022

मुक्ति

 🥀 *इस कथा को जो पढ़ेगा उसे 84 लाख योनियों से मुक्ति मिल जायेगी*🙏🥀

प्रस्तुति - नवल किशोट प्रसाद 


*एक बार की बात है कि यशोदा मैया प्रभु श्री कृष्ण के उलाहनों से तंग आ गयीं और छड़ी लेकर श्री कृष्ण की ओर दौड़ीं। जब प्रभु ने अपनी मैया को क्रोध में देखा तो वह अपना बचाव करने के लिए भागने लगे।*


*भागते-भागते श्री कृष्ण एक कुम्हार के पास पहुँचे । कुम्हार तो अपने मिट्टी के घड़े बनाने में व्यस्त था। लेकिन जैसे ही कुम्हार ने श्री कृष्ण को देखा तो वह बहुत प्रसन्न हुआ। कुम्हार जानता था कि श्री कृष्ण साक्षात् परमेश्वर हैं। तब प्रभु ने कुम्हार से कहा कि 'कुम्हारजी, आज मेरी मैया मुझ पर बहुत क्रोधित हैं। मैया छड़ी लेकर मेरे पीछे आ रही हैं। भैया, मुझे कहीं छुपा लो।' तब कुम्हार ने श्री कृष्ण को एक बड़े से मटके के नीचे छिपा दिया। कुछ ही क्षणों में मैया यशोदा भी वहाँ आ गयीं और कुम्हार से पूछने लगीं- 'क्यूँ रे, कुम्हार ! तूने मेरे कन्हैया को कहीं देखा है, क्या ?' कुम्भार ने कह दिया- 'नहीं, मैया ! मैंने कन्हैया को नहीं देखा।' श्री कृष्ण ये सब बातें बड़े से घड़े के नीचे छुपकर सुन रहे थे। मैया तो वहाँ से चली गयीं। अब प्रभु श्री कृष्ण कुम्हार से कहते हैं- 'कुम्हारजी, यदि मैया चली गयी हो तो मुझे इस घड़े से बाहर निकालो।*'

            

*कुम्भार बोला- 'ऐसे नहीं, प्रभु जी ! पहले मुझे चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो।' भगवान मुस्कुराये और कहा- 'ठीक है, मैं तुम्हें चौरासी लाख योनियों से मुक्त करने का वचन देता हूँ। अब तो मुझे बाहर निकाल दो।'*


*कुम्हार कहने लगा- 'मुझे अकेले नहीं, प्रभु जी ! मेरे परिवार के सभी लोगों को भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दोगे तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकालूँगा।' प्रभु जी कहते हैं- 'चलो ठीक है, उनको भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त होने का मैं वचन देता हूँ। अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो।'*


*अब कुम्हार कहता है- 'बस, प्रभु जी ! एक विनती और है। उसे भी पूरा करने का वचन दे दो तो मैं आपको घड़े से बाहर निकाल दूँगा।' भगवान बोले- 'वो भी बता दे, क्या कहना चाहते हो ?' कुम्भार कहने लगा- 'प्रभु जी ! जिस घड़े के नीचे आप छुपे हो, उसकी मिट्टी मेरे बैलों के ऊपर लाद के लायी गयी है। मेरे इन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो।' भगवान ने कुम्हार के प्रेम पर प्रसन्न होकर उन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त होने का वचन दिया।'*


*प्रभु बोले- 'अब तो तुम्हारी सब इच्छा पूरी हो गयीं, अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो।'* 


*तब कुम्हार कहता है- 'अभी नहीं, भगवन ! बस, एक अन्तिम इच्छा और है। उसे भी पूरा कर दीजिये और वो ये है- जो भी प्राणी हम दोनों के बीच के इस संवाद को सुनेगा, उसे भी आप चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करोगे। बस, यह वचन दे दो तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकाल दूँगा।'*


*कुम्भार की प्रेम भरी बातों को सुन कर प्रभु श्री कृष्ण बहुत खुश हुए और कुम्हार की इस इच्छा को भी पूरा करने का वचन दिया।*


*फिर कुम्हार ने बाल श्री कृष्ण को घड़े से बाहर निकाल दिया। उनके चरणों में साष्टांग प्रणाम किया। प्रभु जी के चरण धोये और चरणामृत पीया। अपनी पूरी झोंपड़ी में चरणामृत का छिड़काव किया और प्रभु जी के गले लगाकर इतना रोये कि प्रभु में ही विलीन हो गये।*

           

*जरा सोच करके देखिये, जो बाल श्री कृष्ण सात कोस लम्बे-चौड़े गोवर्धन पर्वत को अपनी इक्क्नी अंगुली पर उठा सकते हैं, तो क्या वो एक घड़ा नहीं उठा सकते थे। *लेकिन बिना प्रेम रीझे नहीं नटवर नन्द किशोर। कोई कितने भी यज्ञ करे, अनुष्ठान करे, कितना भी दान करे, चाहे कितनी भी भक्ति करे, *लेकिन जब तक मन में प्राणी मात्र के लिए प्रेम नहीं होगा, प्रभु श्री कृष्ण मिल नहीं सकते।*

    *🌹🙏राधे राधे 🙏🌹*

 🕉️ *ॐ नमः शिवाय*🔱🕉️

 🌹 *जय श्री कृष्णा*🙏🌹

मंगलवार, 4 अक्तूबर 2022

व्यंग्य क्यों? कैसे? किस लिए? : हरिशंकर परसाई


 व्यंग्य क्यों? कैसे? किस लिए? : हरिशंकर परसाई


मैं व्यंग्य लेखक माना जाता हूँ। व्यंग्य को लेकर जितना भ्रम हिन्दी में है, उतना किसी और विधा को लेकर नहीं। समीक्षकों ने भी इसकी लगातार उपेक्षा की है। अभी तक व्यंग्य की समीक्षा की भाषा ही नहीं बनी। ‘मजा आ गया’ से लेकर ‘बखिया उधेड़ दी’ तक कुछ फ़िकरे इस पर चिपका कर समीक्षा की इतिश्री समझ ली जाती है। अकसर विनोद, हास्य मखौल से व्यंग्य को अलग करके नहीं देखा जाता। मेरी ही कोई रचना पढ़कर प्रबुद्ध पाठक भी कह देता है-बड़ा मजा आया, जब कि मैंने खिजाने के लिए वह चीज़ लिखी है।


आदमी कब हँसता है ? इस सम्बन्ध में बड़ी दिलचस्प और विभिन्न धारणाएँ हैं। एक विचार यह है कि जब आदमी हँसता है, तब उसके मन में मैल नहीं होता। हँसने के क्षणभर पहले उसके मन में मैल हो सकता है और हँसी के क्षणभर बाद भी। पर जिस क्षण वह हँसता है, उसके मन में किसी के प्रति मैल नहीं होता। फिर जिसका हाज़मा अच्छा हो वही हँस सकता है। कब्ज का मरीज़ मुश्किल से हँसता है। फिर जब मनुष्य को चैन की (well being) अनुभूति होती है, तब वह हँसता है। बिना चैन की हँसी खिन्न हँसी होती है, जैसी पंडित नेहरू की अन्तिम वर्षों में हो गयी थी।


आदमी हँसता क्यों है ? परम्परा से हर समाज की कुछ संगतियाँ होती हैं, सामंजस्य होते हैं, अनुपात होते हैं। ये व्यक्ति और समाज दोनों के होते हैं। जब यह संगति गड़बड़ होती है तब चेतना में चमक पैदा होती है। इस चमक से हँसी भी आ सकती है और चेतना में हलचल भी पैदा हो सकती है। शरीर में कितनी बड़ी नाक हो इसका एक अनुपात मानस में बना हुआ है। पर अगर किसी की बहुत मोटी नाक हो तो लोग कहते हैं-अरे, यह तो नाक की जगह आलूबड़ा रखे हैं-और हँस पड़ते हैं। साइकिल पर एक आदमी बैठे, यह संगति है। दो को बरदास्त कर लिया जाता है, पर एक साइकिल पर तीन सवार हों और वे गिर पड़ें तो उनकी चोट के प्रति सहानुभूति नहीं होगी बल्कि दर्शक हँस पड़ेंगे-अच्छे गिरे साले। हमारे यहाँ कंजी आँख बुरी मानी जाती है। कंजी आँख वाले पर लोग हँसते हैं। कहावत है-


सौ में सूर सहस्त्र में काना,

सवा लाख में ऐंचक ताना।

ऐंचक ताना करे पुकार,

मैं कंजे से खाई हार।


पर कंजी आँखें पश्चिम में अच्छी मानी जाती हैं। आमतौर पर पतले ओंठ सुन्दर माने जाते हैं पर नीग्रो लोगों में अच्छे मोटे ओंठ भी अच्छे लगते हैं। भारत में किसी के नीग्रो जैसे मोटे ओंठ हों तो लोग हँसेंगे क्योंकि सौंदर्य बोध की संगति बिगड़ती है।


लोग किसी भी बात पर हँसते हैं। हलकी, मामूली विसंगति पर भी हँस देते हैं। आदमी अगर घोड़े सरीखा हिनहिनाए तो इस पर भी हँस देते हैं। दीवाली पर कुत्ते की दुम में पटाखे की लड़ी बाँधकर उसमें कुछ लोग आग लगा देते हैं। बेचारा कुत्ता तो मृत्यु भय से भागता और चीखता है, पर लोग हँसते हैं।


पर व्यंग्य में जरूरी नहीं कि हँसी आये ही। मार्क ट्वेन ने लिखा है-यदि कोई भूखे कुत्ते को रोटी खिलाए तो वह उसे काटेगा नहीं। मनुष्य और कुत्ते में यही खास फ़र्क है। इस कथन से हँसी नहीं आती पर व्यंग्य की वह करारी यह चोट चेतना पर करता है कि पाठक पहले तो भौंचक रह जाता है और फिर सोचने लगता है।


व्यंग्य के साथ हँसी भी आती है, पर वह दूसरे प्रकार की होती है। मेरी ही एक लघु कथा है-संसद में एक सदस्य ने कहा कि अमुक जगह पुलिस की गोली से ग्यारह आदमी मारे गये। गृहमन्त्री इसका जवाब दें। गृहमन्त्री बड़ी शान्ति से उठे। जिन्हें रोज गोली चलवानी है वे कब तक अशान्त रहेंगे। गृहमन्त्री ने जवाब दिया-गोली का कारखाना जनता के पैसे से चलता है। जनता कै पैसे से जो सामान बनता है, उसे जनता के ही काम आना चाहिए। अब जनतान्त्रिक असूल में यह बात पूरी तरह संगत है। पर यह कितनी बड़ी विडम्बना पैदा करती है और संसदीय प्रणाली पर चोट करती है। इस लघुकथा से हँसी जरूर आती है पर यह हँसी और किस्म की होती है और सोचने को बाध्य करती है।


व्यंग्य लेखन एक गम्भीर कर्म है। कम से कम मेरे लिए। सवाल यह है कि कोई लेखक अपने युग की विसंगतियों को कितने गहरे से खोजता है। उस विसंगति की व्यापकता क्या है और वह जीवन में कितनी अहमियत रखती है मात्र व्यक्ति की ऊपरी विसंगति-शरीर रचना की, व्यवहार की, बात के लहजे की एक चीज़ है। और व्यक्ति तथा समाज के जीवन की भीतरी तहों में जाकर विसंगति खोजना, उन्हें अर्थ देना तथा उसे सशक्त विरोधाभास से पृथक करके जीवन से साक्षात्कार कराना दूसरी बात है। सच्चा व्यंग्य जीवन की समीक्षा होता है। वह मनुष्य को सोचने के लिए बाध्य करता है। अपने से साक्षात्कार करता है। चेतना में हलचल पैदा करता है और जीवन में व्याप्त मिथ्याचार, पाखंड असामंजस्य और अन्याय से लड़ने के लिए उसे तैयार करता है।


जोनाथन स्विफ्ट कहता है-मैं मनुष्य को अपमानित करने और उसे नीचा दिखाने के लिए लिखता हूँ। परन्तु मार्क ट्वेन कहता है-मैं बुनियादी तौर पर एक शिक्षक हूँ। मेरा खयाल है, कोई भी सच्चा व्यंग्य लेखक मनुष्य को नीचा नहीं दिखाना चाहता। व्यंग्य मानव सहानुभूति से पैदा होता है। वह मनुष्य को बेहतर मनुष्य बनाना चाहता है। वह उससे कहता है-तू अधिक सच्चा, न्यायी मानवीय बन। यदि मनुष्य के प्रति व्यंग्यकार को आशा नहीं है, यदि वह जीवन के प्रति कनसर्न्ड नहीं है तो वह क्यों रोता है उसकी कमजोरियों पर। जो यह कहते हैं कि व्यंग्य लेखक निर्मम, कठोर और मनुष्य विरोधी होता है, उसे बुराई ही बुराई दिखती है, तो मैं जवाब देता हूँ कि डॉक्टर के पास जो लोग जाते हैं उन्हें वह रोग बताता है। तो क्या डॉक्टर कठोर है ? अमानवीय है ? अगर डॉक्टर रोग का निदान न कर और अच्छा ही अच्छा कहे तो रोगी मर जायेगा। जीवन की कमजोरियों का निदान करना कठोर होना नहीं है।


अच्छे व्यंग्य में करुणा की अंतर्धारा होती है। चेखव में शायद यह बात सबसे साफ़ है। चेखव की एक कहानी है-बाबू की मौत। इस कहानी को पढ़ते-पढ़ते हँसी आती है पर अन्त में मन करुणा से भर उठता है। जिस बात पर कहानी का ताना-बाना चेखव ने बुना वह यह है-


थियेटर में एक बाबू नाटक देख रहा है। उसके ठीक सामने उसका बॉस बैठा है। बॉस के चाँद है। बाबू को छींक आती है और उसे लगता है कि उसकी छींक के छींटे साहब की चाँद पर पड़ गये हैं। वह घबराता है और इंटरवल में साहब से माफी माँगता है-साहब माफ़ कर दीजिए। मुझसे गलती हो गयी। मैंने जान बूझ कर गुस्ताखी नहीं की। अब मजा यह है कि साहब की चाँद पर छींटे पड़े ही नहीं हैं। वह नहीं जानता कि बाबू माफी किस बात की मांग रहा है। वह उसे डाँटता है-क्या बक-बक लगा रखी है। भागो यहाँ से। इधर बाबू समझता है कि साहब ज्यादा नाराज है। वह खेल छूटने पर फिर माफी माँगता है-साहब मैं क्षमा चाहता हूँ। मुझे जुखाम हो गया है। मैंने जानबूझ कर वैसा नहीं किया है। साहब फिर उसे डाँट कर भगा देता है। तीन दिन तक यह क्रम चलता है। बाबू माफी माँगता है, पर साहब नहीं जानते कि माफी किस बात की माँग रहा है। वह अधिकाधिक खीज कर उसे भगाता है। इधर बाबू समझता है कि साहब को बड़े छींटे पड़े होंगे तभी नाराज है। यहाँ तक तो कहानी में एक कॉमिक का वातावरण रहता है। पर जब साहब उसे चपरासी से बाहर निकलवा देता है तब वह सोचता है-अब नौकरी गयी। मेरी बीवी है। तीन बच्चे हैं। इनका पालन कैसे होगा ? इसी घबराहट में वह घर आता है। कुर्सी पर बैठता है और उसके प्राण निकल जाते हैं।


कैसा करुण प्रसंग है। कहानी में चेखव ने इस कठोर नौकरशाही पर चोट की है जिसमें साहब अहंकार के कारण बाबू से पूछता तक नहीं कि तू माफी क्यों माँग रहा है। सिर्फ इतना पूछ लेता तो बाबू की जान नहीं जाती।

व्यंग्य के सम्बन्ध में कुछ बातें मैंने यहाँ कहीं, इस मकसद से कि व्यंग्य का मर्म समझने में इनसे कुछ सहायता मिलेगी।

सोमवार, 3 अक्तूबर 2022

कोई संबंध अवैध नहीं होता

 

दया शंकर पांडेय 


कोई संबंध अवैध नहीं होता। संबंध नैसर्गिक होते हैं , पवित्र होते हैं । और स्त्री तो हर महीने पवित्र होती रहती है । तो पवित्र-अपवित्र की बात भी बेमानी ही है । भोजपुरी में एक कहावत है , साईत से सुतार भला । मतलब यह कि मुहूर्त से ज़्यादा महत्वपूर्ण सुविधा होती है । यही स्थिति संबंधों में भी होती है । सुविधा और पसंद ही प्राथमिकता होती है सर्वदा ही । संकोच और मर्यादा की नाजुक दीवार के साथ । रही बात 497 की , एडल्ट्री की , तो वह कुरान की इस बात की प्रतिध्वनि भर थी कि औरतें तो पुरुषों की खेती हैं । सुप्रीम कोर्ट द्वारा 497 का खत्म करना , औरतों का पुरुषों की खेती से खत्म हो जाना है । सो मैं तो इस के खात्मे का भरपूर स्वागत करता हूं । फिर स्त्री-पुरुष के बीच ही नहीं , पति-पत्नी के बीच ही नहीं , हर किसी संबंध में विश्वास और प्यार एक महत्वपूर्ण तत्व होता है । पाप-पुण्य भी विश्वास से जुड़ा तत्व है । बहुत संभव है कि जो बात मेरे लिए पुण्य का सबब हो , आप के लिए वह पाप का निहितार्थ हो या आप का पुण्य किसी दूसरे के लिए पाप का सबब हो । गरज यह कि मुहूर्त से ज़्यादा महत्वपूर्ण सुविधा होती है । सुविधा , पसंद और लाभ का विषय ही सब को मुफ़ीद पड़ता है । यही सार्वभौमिक सच है । बाक़ी सब पाखंड है , मूर्खता है । रही बात परिवार की तो वह एडल्ट्री खत्म होने या रहने से नहीं टूटने , बनने या बचने वाले । संयुक्त परिवार टूट चुके हैं । लेकिन जब तक बच्चों की ज़रूरत और बच्चों से प्यार बना और बचा रहेगा , एकल परिवार बचे रहेंगे । इस लिए भी कि स्वार्थ और सुविधा ही किसी भी समाज की धुरी है । किसी स्त्री को बांध कर आप उस की रखवाली नहीं कर सकते , करनी भी नहीं चाहिए । एक भदेस कहावत भी है इस बाबत । उस की याद कीजिए । याद रखिए कि विश्वास और प्यार से बड़ी कोई चीज़ नहीं होती ।

सागर की यायावरी / दयानंद पांडेय

 सागर की यायावरी / दयानंद पांडेय 


सागर वह भी यायावर। शानदार और सदाबहार यायावर। सागर वैसे भी अपने आप में एक मुकम्मल यात्रा हैं। जब भी वह मिलते हैं , जैसे यात्रा पर ही रहते हैं। गोया सागर से मिलना भी यात्रा ही होती है। फिर सागर की समंदर पार की यात्राओं का तो कहना ही क्या। इतनी दिलकश , रेशमी और समंदर की लहरों की तरह उछलती भाषा जैसे अपने भीतर डुबो लेती है। आप पढ़ते जाइए , डूबते जाइए। वह यूरोप , अमरीका , साऊथ अफ्रीका , अरब , चीन , आस्ट्रेलिया सब जगह घुमाते हुए घूमते हैं। उन के इन यात्रा विवरणों में कभी किसी पेंटिंग की तरह लैंडस्केप मिलता है तो कहीं किसी कविता सी कल-कल तो कहीं कथा सा विस्तार। कभी गद्य का स्वाद तो कभी गरम रोटी सी महक वाली बातें। कभी शिमला सी नरमी और लखनऊवा नफासत में डूबे विवरण। सागर अपने इन संस्मरणों में सिर्फ यात्रा ही नहीं परोसते , वहां की प्रकृति भी ऐसे परोसते हैं जैसे किसी मीठी नरम ऊँख हो कि एक गुल्ला छीलिए , पोर-पोर खुल जाए। 


जाने क्यों वह पहले फ़्रांस का पेरिस ही घुमाते हैं। पेरिस की पोर-पोर बांचते हुए उस की रंगीनी का बखान करने की जगह पेरिस की क्रांति की तफसील में उतर जाते हैं। वर्साव का महल , फ़्रांस के राजा की चौराहे पर सजाए मौत के विवरणों से होते हुए नेपोलियन की प्रेम कहानियों के आगोश में कब ले लेते हैं , पता ही नहीं चलता। काफ्का का शहर प्राग दूसरा पड़ाव है। प्राग की सड़कों , सैलानियों और चार्ल्स ब्रिज को सहेजते हुए जिस तरह काफ्का को सागर ने याद किया है , धरोहर में तब्दील काफ्का को समेटा है वह अद्भुत है। पेरिस में सागर नेपोलियन की प्रेमिकाओं को दर्ज करते हैं तो प्राग में काफ्का के प्रेम को। काफ्का के प्रेम पत्रों को भी वह उसी बेकली से बांचते हैं , जिस बेकली से काफ्का ने लिखे हैं। 


अपार्टमेंट का कोड भूलने की भूलभुलैया की यातना बांचते हुए सागर प्राग की खुशबू , प्राग घूमने की सुविधाओं को बताते हुए गाइड से बन जाते हैं। पेरिस में वह वर्साय के महल के जादू में कैद हैं तो प्राग में प्राग काँसिल के लोमहर्षक इतिहास में ले जाते हैं। जिनेवा उन का नया पड़ाव है। जिनेवा की बर्फ , पाकिस्तानी रेस्टोरेंट में हिंदुस्तानी नॉनवेज खाते , हमउम्र जर्मन लड़की इलसा की फराखदिली और गुस्से का संयुक्त लुत्फ़ लेते हुए लेखक वायलन बजाने वाले भिखारियों से भी दो चार होता है। नया , पुराना जिनेवा घूमते हुए स्वीट्जरलैंड आ जाता है। एक गांव की शाम है , स्वीट्जरलैंड का लुगानो शहर है  , लुगानो की झील है , स्विस फ्रेंक है लेकिन पेरिस और प्राग की तरह का कोई महल या इतिहास नहीं। 


लीजिए सागर अब अमरीका उठा लाए हैं आप को । न्यू जर्सी एयरपोर्ट पर वह उतरते हैं। अमरीका के डर को अपनी कड़ी सुरक्षा की जांच के डर से जोड़ते हैं। एक सरदार जी के फंसने की कथा भी बांचते हैं। गनीमत कि किसी मुस्लिम के फंसने की कथा वह नहीं बांचते। कि उस की पेंट उतार दी गई। सागर की यायावरी की यह दिलकश दास्तान बतकही के ऐसे-ऐसे महीन धागों में बुनी मिलती है अमरीका के पूरे यात्रा वृत्तांत में कि लगता है जैसे हम बार-बार धरती ही नहीं , आकाश भी बदलते जा रहे हैं । सागर का गद्य कई बार आकाश की तरह कभी सागर से तो कभी धरती से मिलता चलता है। ऐसे गोया सागर यात्रा वृत्तांत नहीं , यात्रा कथा सुना रहे हों। चाहे बाल्टीमोर की वृद्ध शटल कैब ड्राइवर हो या कंटीनेंटल एयरवेज की वृद्ध एयर होस्टेस हों। सब की जिजीविषा की तफ़सील अलग-अलग भले हो पर तेवर एक है। अमरीका में लोगों के कभी रिटायर न होने की इबारत बांचते अनदेखे नालंदा की कल्पना जोन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी में घूमते हुए करते हैं तो लगता है गोया वह कविता लिखना चाहते हैं। लेकिन कविता कहीं ठिठक कर गद्य में बहती हुई अमरीका की इस नालंदा की नाव में बिठाए घुमाती रहती है। हॉपकिंस का दिलचस्प इतिहास , भूगोल बताते हुए बाल्टीमोर के बंदरगाह की सैर भी खाते-पीते कब किसी के सिगरेट में सुलग जाती है पता ही नहीं चलता। अमरीकी सीरियल की चर्चा भी बतर्ज बालिका बधू करते हुए खुली देह , खुला सेक्स भी बांचना मुफीद जान पड़ता है। भारत में सीनियर सिटीजन 60 प्लस हैं तो अमरीका में 80 प्लस। यह बताते हुए सागर यह बात भी धीरे से बता ही देते हैं कि अमरीका में खंडहर नहीं मिलते। तो पेरिस और प्राग की प्रागैतिहासिक्ता भी मन में बसी याद की सांकल को खटखटा जाती है। वाशिंगटन डी सी घूमते हुए सागर की यायावरी में वाशिंगटन की समृद्धि की शुरुर से भी गुज़रना है। झुरमुटों के पीछे व्हाइट हाऊस भी वह देखते हैं। पर व्हाइट हाऊस की सीढ़ियों तक का सफर उन्हें बता देता है कि यहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता। व्हाइट हाऊस को भव्य और शक्ति का केंद्र बताते हुए वह जैसे फैसला सा दे देते हैं कि व्हाइट हाऊस सम्मान का केंद्र नहीं है। अमरीका की सौदागिरी का बखान भी लेकिन नहीं भूलते। न्यूयार्क को लुटेरों और पाकेटमारों का शहर बताते हुए सागर ओबामा कंडोम बेचती हुई लड़की का विवरण भी बेसाख्ता परोस देते हैं। 


अफ्रीकी नागरिकता वाले , हिंदी न जानने वाले लेकिन अपने को हिंदुस्तानी बताने वाले साऊथ अफ्रीका के लोगों से मिलना भी एक सपना है। सपना ही था सागर का कभी दक्षिण अफ्रीका जाना। तब जब वह गांधी पर अपनी चर्चित किताब लिख रहे थे। पर तब नहीं जा सके थे। अब जब गए तो उन्हें गिरमिटिया और फ्री इंडियन याद आए जिन की लड़ाई गांधी ने लड़ी थी। भारत से मज़दूरों और उन के पीछे-पीछे व्यापारियों के जाने की दिलचस्प दास्तान भी बताई है सागर ने। गिरमिटिया कैसे कहलाए यह भी। हुआ यह कि यह मज़दूर पांच साल के एग्रीमेंट पर गए थे , जिन में ज़्यादातर पूर्वी उत्तर प्रदेश के थे। इन्हें एग्रीमेंट कहने में दिक्क्त होती थी सो इसे वो गोरिमेंट कहते कहते थे। यह गोरिमेंट ही धीरे-धीरे गिरमिटिया कहलाने लगे। जूलू हब्शियों और फ्री इंडियन के संघर्ष और समृद्धि की कथा भी सागर की इस यायावरी में आता है। डच और पुर्तगालियों का राज भी। डरबन शहर , उस का बंदरगाह नेटाल का विवरण भी। वूगी-वूगी का स्वाद , गांधी और नेल्सन मंडेला की याद में गरम रेत का रंग भी है , और आंच भी साऊथ अफ्रीका की इस यायावरी में। 


दुबई पहुंचे हैं सागर लिटरेरी एक्सीलेंसी अवार्ड लेने। मुशायरा भी है। मुशायरा और अवार्ड यानी डबल लुत्फ़। अल - मकदूम एयरपोर्ट से ही वह सैलानी की तरह नहीं मेहमान की तरह निकलते हैं। सो यूरोप , अमरीका के शहरों की तरह अरब के इस शहर दुबई का इतिहास , भूगोल नहीं बांचते , बताते। पर हां , वहां की ज़िंदगी बांचते हैं। इस लिए भी कि वहां की आबादी में हिंदुस्तानी और हिंदुस्तानियत बहुत है। 


आप मानें या न मानें चीन के मकाऊ के जुआघर में सुबह-सुबह जुए में हारना भी एक यायावरी है। तो आस्ट्रेलिया का शहर सिडनी को भी सैलानी सागर की यायावरी का ख़ास रंग है। 


सागर की यायावरी के यों तो बेशुमार रंग हैं। पर एक रंग इन सभी रंगों में शुमार है। जो बहुत चटक है और सागर की तरह बेलौस भी। वह यह कि बिना गए भी सागर के शब्दों के कंधे पर बैठ कर दुनिया के सारे शहर घूम सकते हैं। बड़ी धूमधाम से। इस रंग के जादू में मैं तो रंग गया हूं। आप भी रंग जाइए और पढ़िए सागर की इस यायावरी को। घूम आइए यूरोप , अमरीका , साऊथ अफ्रीका , अरब , चीन और ऑस्ट्रेलिया के शहर दर शहर। 


[ दयाशंकर शुक्ल सागर की किताब ओ फकीरा मान जा की भूमिका। राजकमल प्रकाशन , दिल्ली ने यह किताब प्रकाशित की है। ]

रविवार, 2 अक्तूबर 2022

,माँ अन्नपूर्णा की कथा!!

 नवरात्रि के अवसर पर माँ अन्नपूर्णा की कथा!


वाराणसी में काशी विश्‍वनाथ मंदिर से कुछ ही दूरी पर माता अन्‍नपूर्णा का मंदिर है। इन्‍हें तीनों लोकों की माता माना जाता है। कहा जाता है कि इन्‍होंने स्‍वयं भगवान शिव को खाना खिलाया था। इस मंदिर की दीवाल पर चित्र बने हुए हैं। एक चित्र में देवी कलछी पकड़ी हुई हैं। अन्नपूर्णा मंदिर के प्रांगण में कुछ एक मूर्तियाँ स्थापित है,जिनमें माँ काली,शंकर पार्वती,और नरसिंह भगवान का मंदिर है। 


अन्नकूट महोत्सव पर माँ अन्नपूर्णा का स्वर्ण प्रतिमा एक दिन के लिऐ भक्त दर्शन कर सकतें हैं। अन्नपूर्णा मंदिर में आदि शंकराचार्य ने अन्नपूर्णा स्त्रोत् की रचना कर ज्ञान वैराग्य प्राप्ति की कामना की थी। यथा।

 अन्नपूर्णे सदापूर्णे शंकरप्राण बल्लभे,ज्ञान वैराग्य सिद्धर्थं भिक्षां देहि च पार्वती।


माँ अन्नपूर्णा की कथा!!!!!!!!


अन्नपूर्णा देवी हिन्दू धर्म में मान्य देवी-देवताओं में विशेष रूप से पूजनीय हैं। इन्हें माँ जगदम्बा का ही एक रूप माना गया है, जिनसे सम्पूर्ण विश्व का संचालन होता है। इन्हीं जगदम्बा के अन्नपूर्णा स्वरूप से संसार का भरण-पोषण होता है। 


अन्नपूर्णा का शाब्दिक अर्थ है- 'धान्य' (अन्न) की अधिष्ठात्री। सनातन धर्म की मान्यता है कि प्राणियों को भोजन माँ अन्नपूर्णा की कृपा से ही प्राप्त होता है।


शिव की अर्धांगनी, कलियुग में माता अन्नपूर्णा की पुरी काशी है, किंतु सम्पूर्ण जगत् उनके नियंत्रण में है। बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी के अन्नपूर्णाजी के आधिपत्य में आने की कथा बडी रोचक है। 


भगवान शंकर जब पार्वती के संग विवाह करने के पश्चात् उनके पिता के क्षेत्र हिमालय के अन्तर्गत कैलास पर रहने लगे, तब देवी ने अपने मायके में निवास करने के बजाय अपने पति की नगरी काशी में रहने की इच्छा व्यक्त की।


 महादेव उन्हें साथ लेकर अपने सनातन गृह अविमुक्त-क्षेत्र (काशी) आ गए। काशी उस समय केवल एक महाश्मशान नगरी थी। माता पार्वती को सामान्य गृहस्थ स्त्री के समान ही अपने घर का मात्र श्मशान होना नहीं भाया।


 इस पर यह व्यवस्था बनी कि सत्य, त्रेता, और द्वापर, इन तीन युगों में काशी श्मशान रहे और कलियुग में यह अन्नपूर्णा की पुरी होकर बसे। इसी कारण वर्तमान समय में अन्नपूर्णा का मंदिर काशी का प्रधान देवीपीठ हुआ।


स्कन्दपुराण के 'काशीखण्ड' में लिखा है कि भगवान विश्वेश्वर गृहस्थ हैं और भवानी उनकी गृहस्थी चलाती हैं। अत: काशीवासियों के योग-क्षेम का भार इन्हीं पर है। 'ब्रह्मवैव‌र्त्तपुराण' के काशी-रहस्य के अनुसार भवानी ही अन्नपूर्णा हैं।


 परन्तु जनमानस आज भी अन्नपूर्णा को ही भवानी मानता है। श्रद्धालुओं की ऐसी धारणा है कि माँ अन्नपूर्णा की नगरी काशी में कभी कोई भूखा नहीं सोता है। अन्नपूर्णा माता की उपासना से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। ये अपने भक्त की सभी विपत्तियों से रक्षा करती हैं।


 इनके प्रसन्न हो जाने पर अनेक जन्मों से चली आ रही दरिद्रता का भी निवारण हो जाता है। ये अपने भक्त को सांसारिक सुख प्रदान करने के साथ मोक्ष भी प्रदान करती हैं। तभी तो ऋषि-मुनि इनकी स्तुति करते हुए कहते हैं-


शोषिणीसर्वपापानांमोचनी सकलापदाम्।दारिद्र्यदमनीनित्यंसुख-मोक्ष-प्रदायिनी॥


काशी की पारम्परिक 'नवगौरी यात्रा' में आठवीं भवानी गौरी तथा नवदुर्गा यात्रा में अष्टम महागौरी का दर्शन-पूजन अन्नपूर्णा मंदिर में ही होता है। अष्टसिद्धियों की स्वामिनी अन्नपूर्णाजी की चैत्र तथा आश्विन के नवरात्र में अष्टमी के दिन 108 परिक्रमा करने से अनन्त पुण्य फल प्राप्त होता है। 


सामान्य दिनों में अन्नपूर्णा माता की आठ परिक्रमा करनी चाहिए। प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन अन्नपूर्णा देवी के निमित्त व्रत रखते हुए उनकी उपासना करने से घर में कभी धन-धान्य की कमी नहीं होती है।


 भविष्यपुराण में मार्गशीर्ष मास के अन्नपूर्णा व्रत की कथा का विस्तार से वर्णन मिलता है। काशी के कुछ प्राचीन पंचांग मार्गशीर्ष की पूर्णिमा में अन्नपूर्णा जयंती का पर्व प्रकाशित करते हैं।


अन्नपूर्णा देवी का रंग जवापुष्प के समान है। इनके तीन नेत्र हैं, मस्तक पर अ‌र्द्धचन्द्र सुशोभित है। भगवती अन्नपूर्णा अनुपम लावण्य से युक्त नवयुवती के सदृश हैं। बन्धूक के फूलों के मध्य दिव्य आभूषणों से विभूषित होकर ये प्रसन्न मुद्रा में स्वर्ण-सिंहासन पर विराजमान हैं।


 देवी के बायें हाथ में अन्न से पूर्ण माणिक्य, रत्न से जडा पात्र तथा दाहिने हाथ में रत्नों से निर्मित कलछूल है। अन्नपूर्णा माता अन्न दान में सदा तल्लीन रहती हैं।


 देवीभागवत में राजा बृहद्रथ की कथा से अन्नपूर्णा माता और उनकी पुरी काशी की महिमा उजागर होती है। भगवती अन्नपूर्णा पृथ्वी पर साक्षात कल्पलता हैं, क्योंकि ये अपने भक्तों को मनोवांछित फल प्रदान करती हैं।


 स्वयं भगवान शंकर इनकी प्रशंसा में कहते हैं- "मैं अपने पांचों मुख से भी अन्नपूर्णा का पूरा गुण-गान कर सकने में समर्थ नहीं हूँ। यद्यपि बाबा विश्वनाथ काशी में शरीर त्यागने वाले को तारक-मंत्र देकर मुक्ति प्रदान करते हैं, तथापि इसकी याचना माँ अन्नपूर्णा से ही की जाती है। गृहस्थ धन-धान्य की तो योगी ज्ञान-वैराग्य की भिक्षा इनसे मांगते हैं-


अन्नपूर्णेसदा पूर्णेशङ्करप्राणवल्लभे।

ज्ञान-वैराग्य-सिद्धयर्थम् भिक्षाम्देहिचपार्वति॥


मंत्र-महोदधि, तन्त्रसार, पुरश्चर्यार्णव आदि ग्रन्थों में अन्नपूर्णा देवी के अनेक मंत्रों का उल्लेख तथा उनकी साधना-विधि का वर्णन मिलता है। मंत्रशास्त्र के सुप्रसिद्ध ग्रंथ 'शारदातिलक' में अन्नपूर्णा के सत्रह अक्षरों वाले निम्न मंत्र का विधान वर्णित है-


"ह्रीं नम: भगवतिमाहेश्वरिअन्नपूर्णेस्वाहा"


मंत्र को सिद्ध करने के लिए इसका सोलह हज़ार बार जप करके, उस संख्या का दशांश (1600 बार) घी से युक्त अन्न के द्वारा होम करना चाहिए। जप से पूर्व यह ध्यान करना होता है-


रक्ताम्विचित्रवसनाम्नवचन्द्रचूडामन्नप्रदाननिरताम्स्तनभारनम्राम्।नृत्यन्तमिन्दुशकलाभरणंविलोक्यहृष्टांभजेद्भगवतीम्भवदु:खहन्त्रीम्॥


अर्थात 'जिनका शरीर रक्त वर्ण का है, जो अनेक रंग के सूतों से बुना वस्त्र धारण करने वाली हैं, जिनके मस्तक पर बालचंद्र विराजमान हैं, जो तीनों लोकों के वासियों को सदैव अन्न प्रदान करने में व्यस्त रहती हैं, यौवन से सम्पन्न, भगवान शंकर को अपने सामने नाचते देख प्रसन्न रहने वाली, संसार के सब दु:खों को दूर करने वाली, भगवती अन्नपूर्णा का मैं स्मरण करता हूँ।'


प्रात:काल नित्य 108 बार अन्नपूर्णा मंत्र का जप करने से घर में कभी अन्न-धन का अभाव नहीं होता। शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन अन्नपूर्णा का पूजन-हवन करने से वे अति प्रसन्न होती हैं। करुणा मूर्ति ये देवी अपने भक्त को भोग के साथ मोक्ष प्रदान करती हैं। 


सम्पूर्ण विश्व के अधिपति विश्वनाथ की अर्धांगिनी अन्नपूर्णा सबका बिना किसी भेद-भाव के भरण-पोषण करती हैं। जो भी भक्ति-भाव से इन वात्सल्यमयी माता का अपने घर में आवाहन करता है, माँ अन्नपूर्णा उसके यहाँ सूक्ष्म रूप से अवश्य वास करती हैं।

पहली रामायण

 पहली रामायण 


 महर्षि वाल्मीकि जी द्वारा रचित रामायण से पहले भी लिखी गई थी राम कथा, जानिए कौन थे लेखक?


भगवान विष्णु के अवतार श्री राम के जीवन पर आधारित अनेको ग्रन्थ एवं पुस्तके लिखी गई है पर मह्रिषी वाल्मीकि द्वारा रचित ”रामायण” को इन सभी में प्रमुख स्थान दिया गया है. लेकिन क्या आप जानते है की सर्वप्रथम रामायण की कथा मह्रिषी वाल्मीकि ने भी नही लिखी थी, सबसे पहले राम के जीवन की कथा लिखने वाले कोई और नही बल्कि उन्ही के परम भक्त पवनपुत्र हनुमान थे।


वानरों की सेना के साथ मिलकर रावण को पराजित करने के बाद प्रभु श्री राम, देवी सीता, लक्ष्मण जी और हनुमान जी सहित पुष्पक विमान में बैठ अयोध्या वापस लोट आये तथा अयोध्या का राजा बन जाने के बाद उन्होंने राज काज संभाला। प्रजा को प्रसन्न रखने के लिए भगवान श्री राम ने अयोध्या में सुशासन स्थापित किया तथा न्याय पूर्वक राज करने लगे।


श्री राम को राज-काज में लीन देख हनुमान कैलाश पर्वत की और चल दिए। वहा पहुंच हनुमान जी ने तपस्या आरम्भ कर दी, तपस्या से जो कुछ भी समय उन्हें शेष मिलता उस समय को वे अपने प्रभु श्री राम के साथ बीते सुन्दर दिनों की यादो में बिताने लगे। जब उन्हें प्रभु राम के साथ बिताये दिनों की कोई स्मृति याद आती तो वे अपने आस-पास पड़े पत्थरो में अपने नाखुनो द्वारा उस स्मिृति को दर्ज कर लेते।


भगवान राम से संबंधित कुछ दुर्लभ प्रसंग जो खुद प्रभु राम तथा माता सीता के श्रीमुख से हनुमान ने सुनी थी वह भी इन पत्थरो में दर्ज थी। इस तरह प्रतिदिन उन पत्थरो पर प्रभु श्री राम की लीला और महिमा उकेरते हुए हनुमान जी ने एक बहुत विस्तृत और दुर्लभ ग्रन्थ की रचना कर दी।


कुछ वर्षो पश्चात मह्रिषी वाल्मीकि ने भी प्रभु राम के जीवन पर आधारित ग्रन्थ ”रामायण ” की रचना करी, मह्रिषी वाल्मीकि अपने द्वारा रचित इस ग्रन्थ को भगवान शिव को समर्पित करना चाहते थे अतः एक दिन वे कैलाश पर्वत की ओर गए। कैलाश पहुंच जब उन्होंने प्रभु राम भक्त हनुमान जी को देखा तो अपने दोनों हाथ जोड़ उन्हें प्रणाम किया।


हनुमान जी के आस पास पड़े पत्थरो में उकेरे गए शब्दों को देखने पर जब मह्रिषी वाल्मीकि ने उस ओर ध्यान दिया तो पाया की हनुमान जी ने तो उनसे पहले ही प्रभु श्री राम की लीलाओ को उन पत्थरो में लिख डाला है। हनुमान द्वारा रचित इस रामायण को मह्रिषी वाल्मीकि ने ”हनुमद रामायण” नाम दिया परन्तु वे हनुमद रामायण को देख दुखी हो गए।


जब हनुमान ने उनके दुखी होने का कारण पूछा तो मह्रिषी वाल्मीकि बोले की बड़ी कठिन तपस्या के कारण में रामायण के इस ग्रन्थ की रचना करने में सफल हो पाया परन्तु फिर भी आप के दवारा लिखे गए हनुमद रामायण के आगे मेरा लिखा गया ग्रन्थ कुछ भी नही। चाहे मेरे द्वारा रचित इस रामायण में कितने ही काव्य रास व अलंकार हो परन्तु आस्था व भक्ति के विश्वाश के प्रमाण से परिपूर्ण आपके इस दुर्लभ ग्रन्थ के आगे मेरी रचना फीकी है।


मह्रिषी वाल्मीकि के दुःख को दूर करने के लिए हनुमान जी अपने एक कंधे में हनुमद रामायण रखी तथा दूसरे कंधे में वाल्मीकि जी को बैठाया तथा दोनों को लिए वे समुद्र के तट पर पहुंचे।हनुमान जी ने अपने आराध्य देव श्री राम का नाम लेते हुए हनुमद रामायण को गहरे समुद्र में फेक दिया. हनुमान जी के इस महिमा को देख वाल्मीकि जी के आँखो में आसु आ गए तथा वे उनकी दया की महिमा का गुणगान करने लगे।


तब मह्रिषी वाल्मीकि ने हनुमान को वचन दिया था की कलयुग में पुनः जन्म लेकर वे एक और रामायण लिखेंगे। माना जाता है की गोस्वामी तुलसीदास के रूप में दूसरा जन्म लेने वाले मह्रिषी वाल्मीकि ही थे। तभी उन्होंने रामचरितमानस लिखने से पहले हनुमान चालीसा लिखी थी तथा रामचरित मानस के पूर्व में ही यह वर्णन है की गोस्वामी तुलसीदास इस ग्रन्थ की रचना हनुमान जी के प्रेरणा से कर रहे है।


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कसाई की कथा!!!!

 ।। राम ।। 

भक्त के अधीन भगवान! सदना कसाई की कथा!!!!


एक कसाई था सदना। वह बहुत ईमानदार था, वो भगवान के नाम कीर्तन में मस्त रहता था। यहां तक की मांस को काटते-बेचते हुए भी वह भगवद्नाम गुनगुनाता रहता था।


एक दिन वह अपनी ही धुन में कहीं जा रहा था, कि उसके पैर से कोई पत्थर टकराया। वह रूक गया, उसने देखा एक काले रंग के गोल पत्थर से उसका पैर टकरा गया है। उसने वह पत्थर उठा लिया व जेब में रख लिया, यह सोच कर कि यह माँस तोलने के काम आयेगा।


वापिस आकर उसने वह पत्थर माँस के वजन को तोलने के काम में लगाया। कुछ ही दिनों में उसने समझ लिया कि यह पत्थर कोई साधारण नहीं है। जितना वजन उसको तोलना होता, पत्थर उतने वजन का ही हो जाता है।


धीरे-धीरे यह बात फैलने लगी कि सदना कसाई के पास वजन करने वाला पत्थर है, वह जितना चाहता है, पत्थर उतना ही तोल देता है। किसी को एक किलो मांस देना होता तो तराजू में उस पत्थर को एक तरफ डालने पर, दूसरी ओर एक किलो का मांस ही तुलता। अगर किसी को दो किलो चाहिए हो तो वह पत्थर दो किलो के भार जितना भारी हो जाता।


इस चमत्कार के कारण उसके यहां लोगों की भीड़ जुटने लगी। भीड़ जुटने के साथ ही सदना की दुकान की बिक्री बढ़ गई।


बात एक शुद्ध ब्राह्मण तक भी पहुंची। हालांकि वह ऐसी अशुद्ध जगह पर नहीं जाना चाहता थे, जहां मांस कटता हो व बिकता हो। किन्तु चमत्कारिक पत्थर को देखने की उत्सुकता उसे सदना की दुकान तक खींच लाई ।


दूर से खड़ा वह सदना कसाई को मीट तोलते देखने लगा। उसने देखा कि कैसे वह पत्थर हर प्रकार के वजन को बराबर तोल रहा था। ध्यान से देखने पर उसके शरीर के रोंए खड़े हो गए। भीड़ के छटने के बाद ब्राह्मण सदना कसाई के पास गया।


ब्राह्मण को अपनी दुकान में आया देखकर सदना कसाई प्रसन्न भी हुआ और आश्चर्यचकित भी। बड़ी नम्रता से सदना ने ब्राह्मण को बैठने के लिए स्थान दिया और पूछा कि वह उनकी क्या सेवा कर सकता है!


ब्राह्मण बोला- “तुम्हारे इस चमत्कारिक पत्थर को देखने के लिए ही मैं तुम्हारी दुकान पर आया हूँ, या युँ कहें कि ये चमत्कारी पत्थर ही मुझे खींच कर तुम्हारी दुकान पर ले आया है।"


बातों ही बातों में उन्होंने सदना कसाई को बताया कि जिसे पत्थर समझ कर वो माँस तोल रहा है, वास्तव में वो शालीग्राम जी हैं, जोकि भगवान का स्वरूप होता है। शालीग्राम जी को इस तरह गले-कटे मांस के बीच में रखना व उनसे मांस तोलना बहुत बड़ा पाप है


सदना बड़ी ही सरल प्रकृति का भक्त था। ब्राह्मण की बात सुनकर उसे लगा कि अनजाने में मैं तो बहुत पाप कर रहा हूं। अनुनय-विनय करके सदना ने वह शालिग्राम उन ब्राह्मण को दे दिया और कहा कि “आप तो ब्राह्मण हैं, अत: आप ही इनकी सेवा-परिचर्या करके इन्हें प्रसन्न करें।मेरे योग्य कुछ सेवा हो तो मुझे अवश्य बताएं।“


ब्राह्मण उस शालीग्राम शिला को बहुत सम्मान से घर ले आए। घर आकर उन्होंने श्रीशालीग्राम को स्नान करवाया, पँचामृत से अभिषेक किया व पूजा-अर्चना आरम्भ कर दी


कुछ दिन ही बीते थे कि उन ब्राह्मण के स्वप्न में श्री शालीग्राम जी आए व कहा- *हे ब्राह्मण! मैं तुम्हारी सेवाओं से प्रसन्न हूं, किन्तु तुम मुझे उसी कसाई के पास छोड़ आओ


स्वप्न में ही ब्राह्मण ने कारण पूछा तो उत्तर मिला कि- तुम मेरी अर्चना-पूजा करते हो, मुझे अच्छा लगता है, परन्तु जो भक्त मेरे नाम का गुणगान - कीर्तन करते रहते हैं, उनको मैं अपने-आप को भी बेच देता हूँ। सदना तुम्हारी तरह मेरा अर्चन नहीं करता है परन्तु वह हर समय मेरा नाम गुनगुनाता रहता है जोकि मुझे अच्छा लगता है, इसलिए तो मैं उसके पास गया था


ब्राह्मण अगले दिन ही, सदना कसाई के पास गया व उनको प्रणाम करके, सारी बात बताई व श्रीशालीग्रामजी को उन्हें सौंप दिया ब्राह्मण की बात सुनकर सदना कसाई की आंखों में आँसू आ गए। मन ही मन उन्होंने माँस बेचने-खरीदने के कार्य को तिलांजली देने की सोची और निश्चय किया कि यदि मेरे ठाकुर को कीर्तन पसन्द है, तो मैं अधिक से अधिक समय नाम-कीर्तन  ही करूंगा 


हरि ॐ...

मुक्ति

 🥀 *इस कथा को जो पढ़ेगा उसे 84 लाख योनियों से मुक्ति मिल जायेगी*🙏🥀 प्रस्तुति - नवल किशोट प्रसाद  *एक बार की बात है कि यशोदा मैया प्रभु श्...