गुरुवार, 23 सितंबर 2021

घास का तिनका और दशरथ वचन

 रामायण में एक घास के तिनके का भी रहस्य है, जिससे ज्यादातर लोग अनजान हैं l


 प्रस्तुति - सत्यनारायण प्रसाद अनंत 


रावण ने जब माँ सीता जी का हरण करके लंका ले गया तब लंका मे सीता जी वट वृक्ष के नीचे बैठ कर चिंतन करने लगी। रावण बार बार आकर माँ सीता जी को धमकाता था, लेकिन माँ सीता जी कुछ नहीं बोलती थी। यहाँ तक की रावण ने श्री राम जी के वेश भूषा मे आकर माँ सीता जी को 

भ्रमित करने की भी कोशिश की लेकिन फिर भी सफल नहीं हुआ,

रावण थक हार कर जब अपने शयन कक्ष मे गया तो मंदोदरी ने उससे कहा आप  तो राम का वेश धर कर गये थे, फिर क्या हुआ।

रावण बोला जब मैं राम का रूप लेकर सीता के समक्ष गया तो सीता मुझे नजर ही नहीं आ रही थी ।

रावण अपनी समस्त ताकत लगा चुका था लेकिन जिस जगत जननी माँ को आज तक कोई नहीं समझ सका, उन्हें रावण भी कैसे समझ पाता !

रावण एक बार फिर आया और बोला मैं तुमसे सीधे सीधे संवाद करता हूँ लेकिन तुम कैसी नारी हो कि मेरे आते ही घास का तिनका उठाकर उसे ही घूर-घूर कर देखने लगती हो,

क्या घास का तिनका तुम्हें राम से भी ज्यादा प्यारा है?  रावण के 

इस प्रश्न को सुनकर माँ सीता जी बिलकुल चुप हो गयी और उनकी

आँखों से आसुओं की धार बह पड़ी।

इसकी सबसे बड़ी वजह थी कि

जब श्री राम जी का विवाह माँ सीता जी के साथ हुआ,तब सीता जी का बड़े आदर सत्कार के साथ गृह प्रवेश भी हुआ। बहुत उत्सव मनाया गया।    *प्रथानुसार नव वधू विवाह पश्चात जब ससुराल आती है तो उसके हाथ से कुछ मीठा पकवान बनवाया जाता है, ताकि जीवन भर घर पर मिठास बनी रहे* 

इसलिए माँ सीता जी ने उस दिन अपने हाथों से घर पर खीर बनाई और समस्त परिवार, राजा दशरथ एवं तीनों रानियों  सहित चारों भाईयों और ऋषि संत भी भोजन पर आमंत्रित थे।

माँ सीता ने सभी को खीर परोसना शुरू किया, और भोजन शुरू होने ही वाला था की ज़ोर से एक हवा का झोका आया। सभी ने अपनी अपनी पत्तलें सम्भाली,सीता जी बड़े गौर स सब देख रही थी।

ठीक उसी समय राजा दशरथ जी की खीर पर एक छोटा सा घास का तिनका गिर गया जिसे माँ सीता जी ने देख लिया। लेकिन अब खीर मे हाथ कैसे डालें ये प्रश्न आ गया। माँ सीता जी ने दूर से ही उस तिनके को घूर कर देखा  वो जल कर राख की एक छोटी सी बिंदु बनकर रह गया। सीता जी ने सोचा 'अच्छा हुआ किसी ने नहीं देखा'।

लेकिन राजा दशरथ माँ सीता जी 

के इस चमत्कार को देख रहे थे। फिर भी दशरथ जी चुप रहे और अपने कक्ष पहुचकर माँ सीता जी को बुलवाया ।

फिर उन्होंने सीताजी जे कहा कि मैंने आज भोजन के समय आप के चमत्कार को देख लिया था ।

आप साक्षात जगत जननी स्वरूपा हैं, लेकिन एक बात आप मेरी जरूर याद रखना।

आपने जिस नजर से आज उस तिनके को देखा था उस नजर से आप अपने शत्रु को भी कभी मत देखना।

इसीलिए माँ सीता जी के सामने जब भी रावण आता था तो वो उस घास के तिनके को उठाकर राजा दशरथ जी की बात याद कर लेती थी।

*तृण धर ओट कहत वैदेही*

*सुमिरि अवधपति परम् सनेही*


*यही है उस तिनके का रहस्य* ! 

इसलिये माता सीता जी चाहती तो रावण को उस जगह पर ही राख़ कर 

सकती थी, लेकिन राजा दशरथ जी को दिये वचन एवं भगवान श्रीराम को रावण-वध का श्रेय दिलाने हेतु वो शांत रही !

ऐसी विशलहृदया थीं हमारी जानकी माता !


🙏🏻🙏🏻💐जय जय सीताराम💐🙏🏻🙏🏻

यूं हवाओं को बदनाम न कर / सुनील सक्सेना



                           


       :- सुनील सक्सेना                         


        वे पैदाइशी शायर हैं । उनके खानदान में उनसे पहले न कोई शायर हुआ न कोई अफसाना निगार  । यानी नेपोटिज्‍म वाला कोई चक्‍कर नहीं है । वे जन्‍म के समय जब  रोए थे,  तो उनका रूदन  शायराना अंदाज में हुआ था । उनके रोने का लहजा ऐसा मानो  किसी गजल को तरन्‍नुम में पढ़ रहे हों ।  वे जितने जोर से रोते घरवाले उन्‍हें चुप करने के लिए उतनी ही जोर से तालियां बजाते ।  उन्‍हें लगता कि उनका  शेर  मुक्‍कमल हो गया । वे रोना बंद कर देते थे । उनकी इस जन्‍मजात प्रतिभा को देखते हुए घरवालों ने उनका  नाम ही “शायर” रख दिया । शायर नाम होने का फायदा ये हुआ कि वे शायरी करें या न करें, पर वे  शायर हैं । 


        उम्र के साथ उनकी मकबुलियत बढ़ने लगी । शोहरत की ये फितरत होती है कि वो फनकार से अपनी कीमत वसूलती है । कुछ झण्‍डाबरदार हिंदी- उर्दू को लेकर मैदान में उतर गये । भाषाएं जहर बुझे तीरों की तरह मारक होती हैं । सीधे दिल पर चोट करती हैं । जुबानों की नूराकुश्‍ती में सियासतदानों को गहरी दिलचस्‍पी होती है । जब मजहब और कौम के मसाइल ठंडे पड़ जाते हैं तब भाषा की चिंगारी से शोले भड़काकर हाथ सेंके जाते हैं ।  सो जनाब शायर को अपने वतन के प्रति निष्‍ठा, देशभक्ति साबित करने के लिए शायरी के साथ-साथ कविता में भी हाथ आजमाना पड़ा । चुनांचे वे कवि भी हो गये ।


        आज शायर साहब कुछ उदास दिखे  । न… न… इसलिए नहीं कि शेर के काफिये नहीं मिल रहे हैं, या कविता का विषय नहीं सूझ रहा है,  या बिम्‍ब नहीं रच पा रहे हैं, या छंद नहीं बन रहा है, या तुकबंदी नहीं जम रही है, या अकविता टाइप की रचना नहीं रच पा रहे हैं, या वे कई दिनों से कहीं छप नहीं रहे हैं,  काव्‍य गोष्‍ठी नहीं हो रही है, कवि सम्‍मेलन और मुशायरे बंद हैं,  ऐसी कोई वजह नहीं है । शायर साहब की उदासी का सबब ये है कि कोरोना की तीसरी लहर में अब “हवाओं” को बदनाम करने की साजिश रची जा रही है ।


        हवाओं पर ये तोहमत लगाई जा रही है कि “कोरोना वायरस” हवाओं का  हमसफर है । वो हवाओं के साथ रहता है, उठता है, बैठता चलता है, मरता नहीं, वो जावेद है, अमर है । हवाएं जिधर का रूख अख्तियार कर लें, कोरोना वायरस उसी ओर चल देता है । इसलिए हवाओं से बचें । घर में परदानशीं बनकर रहें ।


        अब ये भी खूब रही कि निजाम अपनी नाकामयाबियों  का इल्‍जाम हवाओं पर लगा दे ।  ये वही हवाएं है जब लहर बनकर चलती हैं तो सत्‍ता पलट देती हैं । ये वो हवाएं हैं जिसने माशुका की जुल्‍फें लहराई तो काली घटा छा गई । ये वही हवाएं हैं जिसने महबूबा का आंचल जरा सा  ढलका दिया और कयामत आ गई । ये वही हवा है जिसने प्रेयसी के संगेमरमर बदन को छुआ और चमन में बहार आगई ।  जनाब शायर ये सब सोचकर व्‍यथित हैं ।


        शायर साहब की शरीक-ए-हयात ने पूछा – “ये क्‍या रोनी सूरत बना रखी है जनाब ने ? मिजाज तो ठीक हैं ?”


        वे बोले – “बस पूछो मत बेगम,  अब तो हद हो गई..”  


        “आपने हद अभी देखी ही कहां हैं मियां । हद की कोई हद नहीं होती जनाबे आली । एक हद पार होती है, तो नई हद बन जाती है..” बेगम ने हद को परिभाषित करते हुए शायर साहब को काढ़े का गिलास थमा दिया ।     


        “बेगम ! ये कैसा निजाम है..? उन्‍होंने फरमाया घर में रहो । हम रहने लगे । दो गज की दूरी रखो, हमने रख ली । अब हवाओं पर इल्‍जाम ? कल कोई दानिशमंद खोज कर लेगा कि कोरोना देखने से फैलता है, तो आंख पर पट्टी बांध लो । कोई साइंसदां रिसर्च में ये बतायेगा कि कोरोना सुनने से फैलता है,  कान में रूई डालकर रखो । सुनना बंद कर दो । मतलब न बोलो, न सुनो, न देखो । जो हो रहा है, उसे बस सहते रहो । खामोश रहो । तमाशबीन बनकर अपनी तबाही का मंजर देखते रहो । ये कहां का इंसाफ है बेगम ?” जनाब शायर का गला दर्द से भर गया ।


        “मियां ये सियासत है । आप भी कहां दीवारों से अपना सर फोड़ रहे हैं । चलिए उठिये । भूल गये आज आपको फेसबुक पर “लाइव” गजल पढ़नी है ।” बेगम ने लेपटॉप ऑन किया । शायर साहब लाइव हो गये इस शेर के साथ “न लगा अपनी हार का इल्‍जाम मेरे सिर पर, अभी बाकी है उसका फैसला  इसी सरजमीं पर”


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बुधवार, 22 सितंबर 2021

उजाला या अँधेरा: / मुकेश कुमार

बात यही कोई पचीस-तीस साल पुरानी है जब गाँव में सही से सड़क भी नहीं बनी थी और ना ही हर तरफ बिजली पहुँच पायी थी. 

हाँ गाँव के कुछ धनी लोग जरुर थे जिन्होंने बिजली के लिए जनरेटर और मनोरंजन के लिए टीवी का इंतजाम कर रखा था. अधिकतर लोग सरकारी नौकरी वाले ही थे, उनका ऑफिस कस्बे में था सो सारी उपलब्ध सुविधाओं का पुरा खबर रहता था उन्हें.

अँधेरा हुआ नहीं की फट-फट की आवाज़ से गूंजने लगती थी उनके घर के बगल वाली झोपडी जिसमे जनरेटर रखा होता था. 


वो अँधेरा भी कमाल का था, एक ही समय में गाँव को दो हिस्सों में बाँट जाता था. एक तरफ जहाँ ढिबरी जलती हुई दिखती तो दूसरी तरफ़ जगमगाती रौशनी में चमकता हुआ सब कुछ. 

गाँव के दोनों तरफ दूर से देखो तो लगता था मानो वो जनरेटर ढिबरी की रौशनी का मजाक उडा रहा हो.

एक तरफ जगमगाती रौशनी में लोग खेलते या फिर जमावड़ा लगा कर बैठे नज़र आते, तो दुसरी तरफ़ क्या हो रहा है ए बता पाना भी मुश्किल.


गाँव के दुसरे हिस्से को देख ऐसा लगता था मानो अँधेरे को गुलाम बना रखा हो उन्होंने, जब तक मन करे तब तक अँधेरे को चीरते हुए बड़ी-बड़ी बत्तियां जलाते और फिर बड़े से कमरे में रखी हुई टीवी पर सब एक साथ फिल्म देखने का लुत्फ़ उठाते थे. उस समय टीवी पर सिर्फ़ दूरदर्शन आता था, शुक्रवार की शाम को चित्रहार पर नए-पुराने गाने और रात को पुरानी फ़िल्में.


इधर गाँव के दूसरे तरफ ढिबरी की रौशनी में कुछ औरतें खाना पकाती, कुछ बुजुर्ग रिश्तों को अपनी अनुभव देते, कुछ लोग बच्चे को पढ़ाते नजर आते थे.

जो बच्चे बड़े थे वो अपने से छोटे बच्चों को भी पढ़ा रहे थे. रौशनी तो ज्यादा नहीं होती है ढिबरी से लेकिन हाँ जब अगल-बगल हर तरफ ढिबरी जलती हुई नज़र आती तो लगता था जैसे दिवाली की रात हो. 

वक़्त गुजरता रहा और बच्चे बड़े होते गए गाँव के इस तरफ भी और उस तरफ भी. गाँव के स्कूल के स्कूल से पढ़ाई पूरी होते ही दोनों तरफ के बच्चों ने कस्बे के हाई स्कूल में दाखिला लिया. यहाँ भी दोनों तरफ के बच्चों ने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली और कॉलेज के लिए दूसरे शहर भी गए.

वक़्त जितना लगना था उतना ही लगा और फिर दोनों तरफ के कुछ बच्चों ने अपनी उच्चतम पढ़ाई पूरी कर ली.


गाँव के इस तरफ वाले बच्चों ने ज्यादा मेहनत की इसलिए उनमे से एक जिला अधिकारी बन गया और उसकी पहली पोस्टिंग उसी के जिले में हुई. 

उस अधिकारी के देख-रेख के वजह से काफी कम समय में ही उस गाँव के दोनों तरफ की सारी सड़कें पक्की बन गयी और हर तरफ बिजली भी आ गयी.


एक दिन वो जिला-अधिकारी अपने गाँव आया हुआ था तो उस से मिलने कुछ लोग उस तरफ से भी आये. 

अधिकारी से मिल कर जाते वक़्त उस तरफ के एक बुजुर्ग ने पूछा "बेटे तुम ढिबरी में पढ़ते हुए बड़े अधिकारी बन गए और हमारे बच्चे तेज़ रौशनी में भी पढ़ कर कुछ ना बन सके ऐसा क्यों?"


अब मैं क्या बताऊँ काका आपके उम्र को देखते हुए "छोटी मुँह और बड़ी बात हो जाएगी" 

लेकिन आपने पुछा है तो बताना जरुरी है ताकि उस तरफ़ के बच्चों में भी सुधार हो और कुछ करने का जज़्बा जागे.

काका, जहाँ अँधेरा होता है वहिं लोग रौशनी की तलाश में निकलते हैं.

हमारे पास खोने के लिए कुछ नहीं था इसलिए हमने सिर्फ़ अपना सम्मान पाने पर ध्यान दिया और आपके बच्चों के पास सब कुछ पहले से ही था इसलिए उन्होंने कुछ पाने पर ध्यान नहीं दिया.


अनजान लेखक (मुकेश कुमार)

भावना संवेदना

 !! संवेदनशीलता !!

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एक पोस्टमैन ने एक घर के दरवाजे पर दस्तक देते हुए कहा,”चिट्ठी ले लीजिये।” अंदर से एक बालिका की आवाज आई,”आ रही हूँ।” लेकिन तीन-चार मिनट तक कोई न आया तो पोस्टमैन ने फिर कहा,”अरे भाई! मकान में कोई है क्या,अपनी चिट्ठी ले लो।” 


लड़की की फिर आवाज आई,”पोस्टमैन साहब,दरवाजे के नीचे से चिट्ठी अंदर डाल दीजिए,मैं आ रही हूँ।” पोस्टमैन ने कहा,”नहीं,मैं खड़ा हूँ,रजिस्टर्ड चिट्ठी है,पावती पर तुम्हारे साइन चाहिये।” करीबन छह-सात मिनट बाद दरवाजा खुला। 


पोस्टमैन इस देरी के लिए झल्लाया हुआ तो था ही और उस पर चिल्लाने वाला था लेकिन दरवाजा खुलते ही वह चौंक गया, सामने एक अपाहिज कन्या जिसके पांव नहीं थे,सामने थी। पोस्टमैन चुपचाप पत्र देकर और उसके साइन लेकर चला गया। 


हफ़्ते, दो हफ़्ते में जब कभी उस लड़की के लिए डाक आती, पोस्टमैन एक आवाज देता और जब तक वह कन्या न आती तब तक खड़ा रहता। एक दिन कन्या ने पोस्टमैन को नंगे पाँव देखा। 


दीपावली नजदीक आ रही थी। उसने सोचा पोस्टमैन को क्या ईनाम दूँ। एक दिन जब पोस्टमैन डाक देकर चला गया,तब उस लड़की ने, जहां मिट्टी में पोस्टमैन के पाँव के निशान बने थे, उन पर काग़ज़ रख कर उन पाँवों का चित्र उतार लिया। अगले दिन उसने अपने यहाँ काम करने वाली बाई से उस नाप के जूते मंगवा लिये। 


दीपावली आई और उसके अगले दिन पोस्टमैन ने गली के सब लोगों से तो ईनाम माँगा और सोचा कि अब इस बिटिया से क्या इनाम लेना? 


पर गली में आया हूँ तो उससे मिल ही लूँ। उसने दरवाजा खटखटाया। अंदर से आवाज आई,”कौन?” पोस्टमैन,उत्तर मिला। 


बालिका हाथ में एक गिफ्ट पैक लेकर आई और कहा,”अंकल,मेरी तरफ से दीपावली पर आपको यह भेंट है।” पोस्टमैन ने कहा,”तुम तो मेरे लिए बेटी के समान हो,तुमसे मैं गिफ्ट कैसे लूँ?” कन्या ने आग्रह किया कि मेरी इस गिफ्ट के लिए मना नहीं करें।” ठीक है कहते हुए पोस्टमैन ने पैकेट ले लिया। बालिका ने कहा,”अंकल इस पैकेट को घर ले जाकर खोलना।


घर जाकर जब उसने पैकेट खोला तो विस्मित रह गया,क्योंकि उसमें एक जोड़ी जूते थे।उसकी आँखें भर आई। अगले दिन वह ऑफिस पहुंचा और पोस्टमास्टर से फरियाद की कि उसका तबादला फ़ौरन कर दिया जाए।

 पोस्टमास्टर ने कारण पूछा, तो पोस्टमैन ने वे जूते टेबल पर रखते हुए सारी कहानी सुनाई और भीगी आँखों और रुंधे कंठ से कहा,”आज के बाद मैं उस गली में नहीं जा सकूँगा। उस अपाहिज बच्ची ने तो मेरे नंगे पाँवों को तो जूते दे दिये पर मैं उसे पाँव कैसे दे पाऊँगा?”


संवेदनशीलता का यह श्रेष्ठ दृष्टांत है। संवेदनशीलता… यानि,दूसरों के दुःख-दर्द को समझना,अनुभव करना और उसके दुःख-दर्द में भागीदारी करना,उसमें सम्मलित होना। यह ऐसा मानवीय गुण है जिसके बिना इंसान अधूरा है।

 ईश्वर से प्रार्थना है कि वह हमें संवेदनशीलता रूपी आभूषण प्रदान करें ताकि हम दूसरों के दुःख-दर्द को कम करने में योगदान कर सकें।

 संकट की घड़ी में कोई यह नहीं समझे कि वह अकेला है,अपितु उसे महसूस हो कि सारी मानवता उसके साथ है।


🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

मंगलवार, 21 सितंबर 2021

सेंधा नमक के फायदे

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     *🎊आज का सामान्य ज्ञान🎊*


*🎛️क्या आपको पता है खाने में श्रेष्ठ नमक कौन-सा होता है?🎛️*


आयुर्वेद के अनुसार सेंधा नमक सर्वश्रेष्ठ है । लाखों वर्ष पुराना समुद्री नमक जो पृथ्वी की गहराई में दबकर पत्थर बन जाता है, वही सेंधा नमक है । यह रुचिकर, स्वास्थ्यप्रद व आँखों के लिए हितकर है ।


*🔮सेंधा नमक के लाभ👉🏻*

जहां विज्ञान बताता है कि आधुनिक आयोडीनयुक्त नमक श्रेष्ठ है वहीँ भारत का प्राचीन आयुर्वेद कहता है कि आयोडीनयुक्त नमक से सेंधा नमक श्रेष्ठ है । यह कोशिकाओं के द्वारा सरलता से अवशोषित किया जाता है । शरीर में जो 84 प्राकृतिक खनिज तत्त्व होते हैं, वे सब इसमें पाये जाते हैं ।


*(1)* शरीर में जल-स्तर का नियमन करता है, जिससे शरीर की क्रियाओं में मदद मिलती है ।


*(2)* रक्तमें शर्करा के प्रमाण को स्वास्थ्य के अनुरूप रखता है ।


*(3)* पाचन संस्थान में पचे हुए तत्त्वों के अवशोषण में मदद करता है ।


*(4)* श्वसन तंत्र के कार्यों में मदद करता है और उसे स्वस्थ रखता है ।


*(5)* साइनस की पीड़ा को कम करता है ।


*(6)* मांसपेशियों की ऐंठन को कम करता है ।


*(7)* अस्थियों को मजबूत करता है ।


*(8)* स्वास्थ्यप्रद प्राकृतिक नींद लेने में मदद करता है ।


*(9)* पानी के साथ यह रक्तचाप के नियमन के लिए आवश्यक है ।


*(10)* मूत्रपिंड व पित्ताशय की पथरी रोकने में रासायनिक नमक की अपेक्षा अधिक उपयोगी ।




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होनी अनहोनी होनी

 ••।। हाेनी, होकर रहती है ।।••


एक समय की बात है। एक बहुत ही ज्ञानी पण्डित था। वह अपने एक बचपन के घनिष्‍ट मित्र से मिलने के लिए किसी दूसरे गाँव जा रहा था जो कि बचपन से ही गूंगा व एक पैर से अपाहिज था। उसका गांव काफी दूर था और रास्‍ते में कई और छोटे-छोटे गांव भी पडते थे।


पण्डित अपनी धुन में चला जा रहा था कि रास्‍ते में उसे एक आदमी मिल गया, जो दिखने मे बडा ही हष्‍ठ-पुष्‍ठ था, वह भी पण्डित के साथ ही चलने लगा। पण्डित ने सोचा कि चलो अच्‍छा ही है, साथ-साथ चलने से रास्‍ता जल्‍दी कट जायेगा। पण्डित ने उस आदमी से उसका नाम पूछा तो उस आदमी ने अपना नाम महाकालबताया। पण्डित को ये नाम बडा अजीब लगा, लेकिन उसने नाम के विषय में और कुछ पूछना उचित नहीं समझा। ‍दोनों धीरे-धीरे चलते रहे तभी रास्‍त में एक गाँव आया। महाकाल ने पण्डित से कहा- तुम आगे चलो, मुझे इस गाँव मे एक संदेशा देना है। मैं तुमसे आगे मिलता हुं।


“ठीक है” कहकर पण्डित अपनी धुन में चलता रहा तभी एक भैंसे ने एक आदमी को मार दिया और जैसे ही भैंसे ने आदमी को मारा, लगभग तुरन्‍त ही महाकाल वापस पण्डित के पास पहुंच गया।


चलते-चलते दोनों एक दूसरे गांव के बाहर पहुंचे जहां एक छोटा सा मन्दिर था। ठहरने की व्‍यवस्‍था ठीक लग रही थी और क्‍योंकि पण्डित के मित्र का गांव अभी काफी दूर था साथ ही रात्रि होने वाली थी, सो पण्डित ने कहा- रात्रि होने वाली है।  पूरा दिन चले हैं, थकावट भी बहुत हो चुकी है इसलिए आज की रात हम इसी मन्दिर में रूक जाते हैं। भूख भी लगी है, सो भोजन भी कर लेते हैं और थोडा विश्राम करके सुबह फिर से प्रस्‍थान करेंगे।


महाकाल ने जवाब दिया- ठीक है, लेकिन मुझे इस गाँव में किसी को कुछ सामान देना है, सो मैं देकर आता हुं, तब तक तुम भोजन कर लो, मैं बाद मे खा लुंगा।”


और इतना कहकर वह चला गया लेकिन उसके जाते ही कुछ देर बाद उस गाँव से धुंआ उठना शुरू हुआ और धीरे-धीरे पूरे गांव में आग लग गई थी । पण्डित को आर्श्‍चय हुआ। उसने मन ही मन सोचा कि- जहां भी ये महाकाल जाता है, वहां किसी न किसी तरह की हानि क्‍यों हो जाती है? जरूर कुछ गडबड है।


लेकिन उसने महाकाल से रात्रि में इस बात का कोई जिक्र नहीं किया। सुबह दोनों ने फिर से अपने गन्‍तव्‍य की ओर चलना शुरू किया। कुछ देर बाद एक और गाँव आया और महाकाल ने फिर से पण्डित से कहा कि- पण्डित जी… आप आगे चलें। मुझे इस गांव में भी कुछ काम है, सो मैं आपसे आगे मिलता हुँ’।


इतना कहकर महाकाल जाने लगा। लेकिन इस बार पण्डित आगे नहीं बढा बल्कि खडे होकर महाकाल को देखता रहा कि वह कहां जाता है और करता क्‍या है।


तभी लोगों की आवाजें सुनाई देने लगीं कि एक आदमी को सांप ने डस लिया और उस व्‍यक्ति की मृत्‍यु हो गई। ठीक उसी समय महाकाल फिर से पण्डित के पास पहुंच गया। लेकिन इस बार पण्डित को सहन न हुआ। उसने महाकाल से पूछ ही लिया कि- तुम जिस गांव में भी जाते हो, वहां कोई न कोई नुकसान हो जाता है? क्‍या तुम मुझे बता सकते हो कि आखिर ऐसा क्‍याें होता है?


महाकाल ने जवाब दिया: पण्डित जी… आप मुझे बडे ज्ञानी मालुम पडे थे, इसीलिए मैं आपके साथ चलने लगा था क्‍योंकि ज्ञानियाें का संग हमेंशा अच्‍छा होता है। लेकिन क्‍या सचमुच आप अभी तक नहीं समझे कि मैं कौन हुँ?


पण्डित ने कहा: मैं समझ तो चुका हुँ, लेकिन कुछ शंका है, सो यदि आप ही अपना उपयुक्‍त परिचय दे दें, तो मेरे लिए आसानी होगी।


महाकल ने जवाब दिया कि- मैं यमदूत हुँ और यमराज की आज्ञा से उन लोगों के प्राण हरण करता हुँ जिनकी आयु पूर्ण हो चुकी है।


हालांकि पण्डित को पहले से ही इसी बात की शंका थी। फिर भी महाकाल के मुंह से ये बात सुनकर पण्डित थोडा घबरा गया लेकिन फिर हिम्‍मत करके पूछा कि- अगर ऐसी बात है और तुम सचमुच ही यमदूत हो, तो बताओ अगली मृत्‍यु किसकी है?


यमदूत ने जवाब दिया कि- अगली मृत्‍यु तुम्‍हारे उसी मित्र की है, जिसे तुम मिलने जा रहे हो और उसकी मृत्‍यु का कारण भी तुम ही होगे।


ये बात सुनकर पण्डित ठिठक गया और बडे पशोपेश में पड गया कि यदि वास्‍तव में वह महाकाल एक यमदूत हुआ तो उसकी बात सही होगी और उसके कारण मेरे बचपन के सबसे घनिष्‍ट मित्र की मृत्‍यु हो जाएगी। इसलिए बेहतर यही है कि मैं अपने मित्र से मिलने ही न जाऊं, कम से कम मैं तो उसकी मृत्‍यु का कारण नहीं बनुंगा। तभी महाकाल ने कहा कि-


तुम जो सोंच रहे हो, वो मुझे भी पता है लेकिन तुम्‍हारे अपने मित्र से मिलने न जाने के विचार से नियति नहीं बदल जाएगी। तुम्‍हारे मित्र की मृत्‍यु निश्चित है और वह अगले कुछ ही क्षणों में घटित होने वाली है।


महाकाल के मुख से ये बात सुनते ही पण्डित को झटका लगा क्‍योंकि महाकाल ने उसके मन की बात जान ली थी जो कि किसी सामान्‍य व्‍यक्ति के लिए तो सम्‍भव ही नहीं थी। फलस्‍वरूप पण्डित को विश्‍वास हो गया कि महाकाल सचमुच यमदूत ही है। इसलिए वह अपने मित्र की मृत्‍यु का कारण न बने इस हेतु वह तुरन्‍त पीछे मुडा और फिर से अपने गांव की तरफ लौटने लगा।


परन्‍तु जैसे ही वह मुडा, सामने से उसे उसका मित्र उसी की ओर तेजी से आता हुआ दिखाई दिया जो कि पण्डित को देखकर अत्‍यधिक प्रसन्‍न लग रहा था। अपने मित्र के आने की गति को देख पण्डित को ऐसा लगा जैसे कि उसका मित्र काफी समय से उसके पीछे-पीछे ही आ रहा था लेकिन क्‍योंकि वह बचपन से ही गूूंगा व एक पैर से अपाहिज था, इसलिए न तो पण्डित तक पहुंच पा रहा था न ही पण्डित को आवाज देकर रोक पा रहा था।


लेकिन जैसे ही वह पण्डित के पास पहुंचा, अचानक न जाने क्‍या हुआ और उसकी मृत्‍यु हो गर्इ। पण्डित हक्‍का-बक्‍का सा आश्‍चर्य भरी नजरों से महाकाल की ओर देखने लगा जैसे कि पूछ रहा हो कि आखिर हुआ क्‍या उसके मित्र को। महाकाल, पण्डित के मन की बात समझ गया और बोला-


तुम्‍हारा मित्र पिछले गांव से ही तुम्‍हारे पीछे-पीछे आ रहा था लेकिन तुम समझ ही सकते हो कि वह अपाहिज व गूंगा होने की वजह से ही तुम तक नहीं पहुंच सका। उसने अपनी सारी ताकत लगाकर तुम तक पहुंचने की कोशिश की लेकिन बुढापे में बचपन जैसी शक्ति नहीं होती शरीर में, इसलिए हृदयाघात की वजह से तुम्‍हारे मित्र की मृत्‍यु हो गई और उसकी वजह हो तुम क्‍योंकि वह तुमसे मिलने हेतु तुम तक पहुंचने के लिए ही अपनी सीमाओं को लांघते हुए तुम्‍हारे पीछे भाग रहा था।


अब पण्डित को पूरी तरह से विश्‍वास हो गया कि महाकाल सचमुच ही यमदूत है और जीवों के प्राण हरण करना ही उसका काम है। चूंकि पण्डित एक ज्ञानी व्‍यक्ति था और जानता था कि मृत्‍यु पर किसी का कोई बस नहीं चल सकता व सभी को एक न एक दिन मरना ही है, इसलिए उसने जल्‍दी ही अपने आपको सम्‍भाल लिया लेकिन सहसा ही उसके मन में अपनी स्‍वयं की मृत्‍यु के बारे में जानने की उत्‍सुकता हुई। इसलिए उसने महाकाल से पूछा- अगर मृत्‍यु मेरे मित्र की होनी थी, तो तुम शुरू से ही मेरे साथ क्‍यों चल रहे थे?


महाकाल ने जवाब दिया- मैं, तो सभी के साथ चलता हुं और हर क्षण चलता रहता हुं, केवल लोग मुझे पहचान नहीं पाते क्‍योंकि लोगों के पास अपनी समस्‍याओं के अलावा किसी और व्‍यक्ति, वस्‍तु या घटना के संदर्भ में सोंचने या उसे देखने, समझने का समय ही नहीं है।


पण्डित ने आगे पूछा- तो क्‍या तुम बता सकते हो कि मेरी मृत्‍यु कब और कैसे होगी?


महाकाल ने कहा- हालांकि किसी भी सामान्‍य जीव के लिए ये जानना उपयुक्‍त नहीं है, क्‍योंकि कोई भी जीव अपनी मृत्‍यु के संदर्भ में जानकर व्‍यथित ही होता है, लेकिन तुम ज्ञानी व्‍यक्ति हो और अपने मित्र की मृत्‍यु को जितनी आसानी से तुमने स्‍वीकार कर लिया है, उसे देख मुझे ये लगता है कि तुम अपनी मृत्‍यु के बारे में जानकर भी व्‍यथित नहीं होगे। सो, तुम्‍हारी मृत्‍यु आज से ठीक छ: माह बाद आज ही के दिन लेकिन किसी दूसरे राजा के राज्‍य में फांसी लगने से होगी और आश्‍चर्य की बात ये है कि तुम स्‍वयं खुशी से फांसी को स्‍वीकार करोगे। इतना कहकर महाकाल जाने लगा क्‍योंकि अब उसके पास पण्डित के साथ चलते रहने का कोई कारण नहीं था।


पण्डित ने अपने मित्र का यथास्थिति जो भी कर्मकाण्‍ड सम्‍भव था,  किया और फिर से अपने गांव लौट आया। लेकिन कोई व्‍यक्ति चाहे जितना भी ज्ञानी क्‍यों न हो, अपनी मृत्‍यु के संदर्भ में जानने के बाद कुछ तो व्‍यथित होता ही है और उस मृत्‍यु से बचने के लिए कुछ न कुछ तो करता ही है सो पण्डित ने भी किया।


चूंकि पण्डित विद्वान था इसलिए उसकी ख्‍याति उसके राज्‍य के राजा तक थी। उसने सोंचा कि राजा के पास तो कई ज्ञानी मंत्राी होते हैं आैर वे उसकी इस मृत्‍यु से सम्‍बंधित समस्‍या का भी कोई न कोई समाधान तो निकाल ही देंगे। इसलिए वह पण्डित राजा के दरबार में पहुंचा और राजा को सारी बात बताई। राजा ने पण्डित की समस्‍या को अपने मंत्रियों के साथ बांटा और उनसे सलाह मांगी।


अन्‍त में सभी की सलाह से ये तय हुआ कि यदि पण्डित की बात सही है, तो जरूर उसकी मृत्‍यु 6 महीने बाद होगी लेकिन मृत्‍यु तब होगी, जबकि वह किसी दूसरे राज्‍य में जाएगा। यदि वह किसी दूसरे राज्‍य जाए ही न, तो मृत्‍यु नहीं होगी। ये सलाह राजा को भी उपयुक्‍त लगी सो उसने पण्डित के लिए महल में ही रहने हेतु उपयुक्‍त व्‍यवस्‍था करवा दी। अब राजा की आज्ञा के बिना कोई भी व्‍यक्ति उस पण्डित से नहीं मिल सकता था लेकिन स्‍वयं पण्डित कहीं भी आ-जा सकता था ताकि उसे ये न लगे कि वह राजा की कैद में है। हालांकि वह स्‍वयं ही डर के मारे कहीं आता-जाता नहीं था।


धीरे-धीरे पण्डित की मृत्‍यु का समय नजदीक आने लगा और आखिर वह दिन भी आ गया, जब पण्डित की मृत्‍यु होनी थी। सो, जिस दिन पण्डित की मृत्‍यु होनी थी, उससे पिछली रात पण्डित डर के मारे जल्‍दी ही सो गया ताकि जल्‍दी से जल्‍दी वह रात और अगला दिन बीत जाए और उसकी मृत्‍यु टल जाए। लेकिन स्‍वयं पण्डित को नींद में चलने की बीमारी थी और इस बीमारी के बारे में वह स्‍वयं भी नहीं जानता था, इसलिए राजा या किसी और से इस बीमारी का जिक्र करने अथवा किसी चिकित्‍सक से इस बीमारी का र्इलाज करवाने का तो प्रश्‍न ही नहीं था।


चूंकि पण्डित अपनी मृत्‍यु को लेकर बहुत चिन्तित था और नींद में चलने की बीमारी का दौरा अक्‍सर तभी पडता है, जब ठीक से नींद नहीं आ रही होती, सो उसी रात पण्डित रात को नींद में चलने का दौरा पडा, वह उठा और राजा के महल से निकलकर अस्‍तबल में आ गया। चूंकि वह राजा का खास मेहमान था, इसलिए किसी भी पहरेदार ने उसे न ताे रोका न किसी तरह की पूछताछ की। अस्‍तबल में पहुंचकर वह सबसे तेज दौडने वाले घोडे पर सवार होकर नींद की बेहोशी में ही राज्‍य की सीमा से बाहर दूसरे राज्‍य की सीमा में चला गया। इतना ही नहीं, वह दूसरे राज्‍य के राजा के महल में पहुंच गया और संयोग हुआ ये कि उस महल में भी किसी पहरेदार ने उसे नहीं रोका न ही कोई पूछताछ की क्‍योंकि सभी लोग रात के अन्तिम प्रहर की गहरी नींद में थे।


वह पण्डित सीधे राजा के शयनकक्ष्‍ा में पहुंच गया। रानी के एक ओर उस राज्‍य का राजा सो रहा था, दूसरी आेर स्‍वयं पण्डित जाकर लेट गया। सुबह हुई, तो राजा ने पण्डित को रानी की बगल में सोया हुआ देखा। राजा बहुत क्रोधित हुआ। पण्डित काे गिरफ्तार कर लिया गया।


पण्डित को तो समझ में ही नहीं आ रहा था कि वह आखिर दूसरे राज्‍य में और सीधे ही राजा के शयनकक्ष में कैसे पहुंच गया। लेकिन वहां उसकी सुनने वाला कौन था। राजा ने पण्डित को राजदरबार में हाजिर करने का हुक्‍म दिया। कुछ समय बाद राजा का दरबार लगा, जहां राजा ने पण्डित को देखा और देखते ही इतना क्रोधित हुआ कि पण्डित को फांसी पर चढा दिए जाने का फरमान सुना दिया।


फांसी की सजा सुनकर पण्डित कांप गया। फिर भी हिम्‍मत कर उसने राजा से कहा कि- महाराज… मैं नहीं जानता कि मैं इस राज्‍य में कैसे पहुंचा। मैं ये भी नहीं जानता कि मैं आपके शयनकक्ष में कैसे आ गया और आपके राज्‍य के किसी भी पहरेदार ने मुझे रोका क्‍यों नहीं, लेकिन मैं इतना जानता हुं कि आज मेरी मृत्‍यु होनी थी और होने जा रही है।


राजा को ये बात थोडी अटपटी लगी। उसने पूछा- तुम्‍हें कैसे पता कि आज तुम्‍हारी मृत्‍यु होनी थी? कहना क्‍या चाहते हो तुम?


राजा के सवाल के जवाब में पण्डित से पिछले 6 महीनों की पूरी कहानी बता दी और कहा कि- महाराज… मेरा क्‍या, किसी भी सामान्‍य व्‍यक्ति का इतना साहस कैसे हो सकता है कि वह राजा की उपस्थिति में राजा के ही कक्ष में रानी के बगल में सो जाए। ये तो सरासर आत्‍महत्‍या ही होगी और मैं दूसरे राज्‍य से इस राज्‍य में आत्‍महत्‍या करने क्‍यों आऊंगा।


राजा को पण्डित की बात थोडी उपयुक्‍त लगी लेकिन राजा ने सोंचा कि शायद वह पण्डित मृत्‍यु से बचने के लिए ही महाकाल और अपनी मृत्‍यु की भविष्‍यवाणी का बहाना बना रहा है। इसलिए उसने पण्डित से कहा कि – यदि तुम्‍हारी बात सत्‍य है, और आज तुम्‍हारी मृत्‍यु का दिन है, जैसाकि महाकाल ने तुमसे कहा है, तो तुम्‍हारी मृत्‍यु का कारण मैं नहीं बनुंगा लेकिन यदि तुम झूठ कह रहे हो, तो निश्चित ही आज तुम्‍हारी मृत्‍यु का दिन है।


चूंकि पडौस्‍ाी राज्‍य का राजा उसका मित्र था, इसलिए उसने तुरन्‍त कुछ सिपाहियों के साथ दूसरे राज्‍य के राजा के पास पत्र भेजा और पण्डित की बात की सत्‍यता का प्रमाण मांगा।


शाम तक भेजे गए सैनिक फिर से लौटे और उन्‍होंने आकर बताया कि- महाराज… पण्डित जो कह रहा है, वह सच है। दूसरे राज्‍य के राजा ने पण्डित को अपने महल में ही रहने की सम्‍पूर्ण व्‍यवस्‍था दे रखी थी और पिछले 6 महीने से ये पण्डित राजा का मेहमान था। कल रात राजा स्‍वयं इससे अन्तिम बार इसके शयन कक्ष में मिले थे और उसके बाद ये इस राज्‍य में कैसे पहुंच गया, इसकी जानकारी किसी को नहीं है। इसलिए उस राज्‍य के राजा के अनुसार पण्डित को फांसी की सजा दिया जाना उचित नहीं है।


लेकिन अब राजा के लिए एक नई समस्‍या आ गई। चूंकि उसने बिना पूरी बात जाने ही पण्डित को फांसी की सजा सुना दी थी, इसलिए अब यदि पण्डित को फांसी न दी जाए, तो राजा के कथन का अपमान हो और यदि राजा द्वारा दी गई सजा का मान रखा जाए, तो पण्डित की बेवजह मृत्‍यु हो जाए।


राजा ने अपनी इस समस्‍या का जिक्र अपने अन्‍य मंत्रियों से किया और सभी मंत्रियों ने आपस में चर्चा कर ये सुझाव दिया कि- महाराज… आप पण्डित को कच्‍चे सूत के एक धागे से फांसी लगवा दें। इससे आपके वचन का मान भी रहेगा और सूत के धागे से लगी फांसी से पण्डित की मृत्‍यु भी नहीं होगी, जिससे उसके प्राण भी बच जाऐंगे।


राजा को ये विचार उपयुक्‍त लगा और उसने ऐसा ही आदेश सुनाया। पण्डित के लिए सूत के धागे का फांसी का फन्‍दा बनाया गया और नियमानुसार पण्डित को फांसी पर चढाया जाने लगा। सभी खुश थे कि न तो पण्डित मरेगा न राजा का वचन झूठा पडेगा। पण्डित को भी विश्‍वास था कि सूत के धागे से तो उसकी मृत्‍यु नहीं ही होगी इसलिए वह भी खुशी-खुशी फांसी चढने को तैयार था, जैसाकि महाकाल ने उसे कहा था।


लेकिन जैसे ही पण्डित को फांसी दी गई, सूत का धागा तो टूट गया लेकिन टूटने से पहले उसने अपना काम कर दिया। पण्डित के गले की नस कट चुकी थी उस सूत के धागे से और पण्डित जमीन पर पडा तडप रहा था, हर धडकन के साथ उसके गले से खून की फूहार निकल रही थी और देखते ही देखते कुछ ही क्षणों में पण्डित का शरीर पूरी तरह से शान्‍त हो गया। सभी लोग आश्‍चर्यचकित, हक्‍के-बक्‍के से पण्डित को मरते हुए देखते रहे। किसी को भी विश्‍वास ही नहीं हो रहा था कि एक कमजाेर से सूत के धागे से किसी की मृत्‍यु हो सकती है लेकिन घटना घट चुकी थी, नियति ने अपना काम कर दिया था।

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     जो होना होता है, वह होकर ही रहता है। हम चाहे जितनी सावधानियां बरतें या चाहे जितने ऊपाय कर लें, लेकिन हर घटना और उस घटना का सारा ताना-बाना पहले से निश्चित है जिसे हम रत्‍ती भर भी इधर-उधर नहीं कर सकते। इसीलिए ईश्‍वर ने हमें भविष्‍य जानने की क्षमता नहीं दी है, ताकि हम अपने जीवन को ज्‍यादा बेहतर तरीके से जी सकें और यही बात उस पण्डित पर भी लागु होती है। यदि पण्डित ने महाकाल से अपनी मृत्‍यु के बारे में न पूछा होता, तो अगले 6 महीने तक वह राजा के महल में कैद होकर हर रोज डर-डर कर जीने की बजाय ज्‍यादा बेहतर जिन्‍दगी जीता।


प्रकृति ने जो भी कुछ बनाया है और उसे जैसा बनाया है, वह सबकुछ किसी न किसी कारण से वैसा है और उसके वैसा होने पर सवाल उठाना गलत है क्‍योंकि हर व्‍यक्ति, वस्‍तु या स्थिति का सम्‍बंध किसी न किसी घटना से है, जिसे घटित होना है।


उदाहरण के लिए पण्डित की मृत्‍यु का सम्‍बंध उसके मित्र से था क्‍योंकि यदि वह उसके मित्र से मिलने न जा रहा होता, तो उसे रास्‍ते में महाकाल न मिलता और पण्डित उससे अपनी मृत्‍यु से सम्‍बंधित सवाल न पूछता। जबकि यदि पण्डित अपने मित्र से मिलने न जाता और पण्डित का मित्र बचपन से ही गूंगा व अपाहिज न होता, तो उसकी मृत्‍यु न होती क्‍योंकि उस स्थिति में वह अपने मित्र को पीछे से आवाज देकर रोक सकता था। यानी बपचन से प्रकृति ने उसे जो अपंगता दी थी, उसका सम्‍बंध उसकी मृत्‍यु से था।


इसी तरह से पण्डित को नींद में चलने की बीमारी है, इस बात का पता यदि स्‍वयं पण्डित को पहले से होता, तो वह इस बात का जिक्र राजा से जरूर करता, परिणामस्‍वरूप वह राजा के महल से निकलता तो कोई न कोई पहरेदार उसे जरूर रोक लेता अथवा राजा ने कुछ ऐसी व्‍यवस्‍था जरूर की होती, ताकि पण्डित नींद में उठकर कहीं न जा सके।


यानी हर घटना के घटित होने के लिए प्रकृति पहले से ही सारे बीज बो देती है जो अपने निश्चित समय पर अंकुरित होकर उस घटना के घटित होने में अपना योगदान देते हैं। इसलिए प्रकृति से लडने का कोई मतलब नहीं है क्‍योंकि हमें नहीं पता कि किस घटना के घटित होने के लिए कौन-कौन से कारण होंगे और उन कारणों से सम्‍बंधित बीज कब, कहां और कैसे बोए गए हैं और इसी को हम सरल शब्‍दों में भाग्‍य कहते हैं।


ये कहानी आपको कैसी लगी? क्‍या आपने भी कभी ये महसूस किया है कि प्रकृति की सभी घटनाऐं पहले से निश्चित हैं और आपके कुछ करने अथवा न करने से कहीं कोई फर्क नहीं पडता बल्कि सबकुछ अपने आप अपने अनुसार घटित होता है?


🌹🌹जय जय श्री राम🌹🌹

(साभार- Sampurna Nand Pandey )

प्रेम

 ऎसा भी प्रेम  / Must read this moral story👇

       

एक फकीर बहुत दिनों तक बादशाह के साथ रहा बादशाह का बहुत प्रेम उस फकीर पर हो गया। 


प्रेम भी इतना कि बादशाह रात को भी उसे अपने कमरे में सुलाता। 


कोई भी काम होता, दोनों साथ-साथ ही करते।


एक दिन दोनों शिकार खेलने गए और रास्ता भटक गए। 


भूखे-प्यासे एक पेड़ के नीचे पहुंचे।


 पेड़ पर एक ही फल लगा था।


 बादशाह ने घोड़े पर चढ़कर फल को अपने हाथ से तोड़ा। 


बादशाह ने फल के छह टुकड़े किए और अपनी आदत के मुताबिक पहला टुकड़ा फकीर को दिया।


 फकीर ने टुकड़ा खाया और बोला, 'बहुत स्वादिष्ट ऎसा फल कभी नहीं खाया। 


एक टुकड़ा और दे दें।


 दूसरा टुकड़ा भी फकीर को मिल गया। 


फकीर ने एक टुकड़ा और बादशाह से मांग लिया। 


इसी तरह फकीर ने पांच टुकड़े मांग कर खा लिए।


 जब फकीर ने आखिरी टुकड़ा मांगा, तो बादशाह ने कहा, 'यह सीमा से बाहर है। 


आखिर मैं भी तो भूखा हूं।


 मेरा तुम पर प्रेम है, पर तुम मुझसे प्रेम नहीं करते।'.


और सम्राट ने फल का टुकड़ा मुंह में रख लिया। 


मुंह में रखते ही राजा ने उसे थूक दिया, क्योंकि वह कड़वा था।


राजा बोला, 'तुम पागल तो नहीं, इतना कड़वा फल कैसे खा गए?' 


उस फकीर का उत्तर था, 


'जिन हाथों से बहुत मीठे फल खाने को मिले, एक कड़वे फल की शिकायत कैसे करूं?


 सब टुकड़े इसलिए लेता गया ताकि आपको पता न चले।


 दोस्तों जँहा मित्रता हो वँहा संदेह न हो ।

घास का तिनका और दशरथ वचन

 रामायण में एक घास के तिनके का भी रहस्य है, जिससे ज्यादातर लोग अनजान हैं l  प्रस्तुति - सत्यनारायण प्रसाद अनंत  रावण ने जब माँ सीता जी का हर...