सोमवार, 27 जून 2022

मुक़ाबला / कृष्ण मेहता

 🐃मुसीबत का सामना🐃


जंगली भैंसों का एक झुण्ड जंगल में घूम रहा था , तभी एक  बछड़े (पाड़ा) ने पुछा , ” पिताजी, क्या इस जंगल में ऐसी कोई चीज है जिससे डरने की ज़रुरत है ?”


” बस शेरों से सावधान रहना …”, भैंसा बोला .


“हाँ , मैंने भी सुना है कि शेर बड़े खतरनाक होते हैं . अगर कभी मुझे शेर दिखा तो मैं जितना हो सके उतनी तेजी से दौड़ता हुआ भाग जाऊँगा ..”, बछड़ा बोला .


“नहीं , इससे बुरा तो तुम कुछ कर ही नहीं सकते ..”, भैंसा बोला


बछड़े को ये बात कुछ अजीब लगी , वह बोला ” क्यों ? वे खतरनाक होते हैं , मुझे मार सकते हैं तो भला मैं भाग कर अपनी जान क्यों ना बचाऊं ?”


भैंसा समझाने लगा , ” अगर तुम भागोगे तो शेर तुम्हारा पीछा करेंगे , भागते समय वे तुम्हारी पीठ पर आसानी से हमला कर सकते हैं और तुम्हे नीचे गिरा सकते हैं … और एक बार तुम गिर गए तो मौत पक्की समझो …”


” तो.. तो। .. ऐसी स्थिति में मुझे क्या करना चाहिए ?”, बछड़े ने घबराहट में पुछा .


” अगर तुम कभी भी शेर को देखो , तो अपनी जगह डट कर खड़े हो जाओ और ये दिखाओ की तुम जरा भी डरे हुए नहीं हो . अगर वो ना जाएं तो उसे अपनी तेज सींघें दिखाओ और  खुरों को जमीन पर पटको . अगर तब भी शेर ना जाएं तो धीरे -धीरे उसकी तरफ बढ़ो ; और अंत में तेजी से अपनी पूरी ताकत के साथ उसपर हमला कर दो .”, भैंसे ने गंभीरता से समझाया .


” ये तो पागलपन है , ऐसा करने में तो बहुत खतरा है … अगर शेर ने पलट कर मुझपर हमला कर दिया तो ??”, बछड़ा नाराज होते हुए बोला .


“बेटे , अपने चारों तरफ देखो ; क्या दिखाई देता है ?”, भैंसे ने कहा .


बछड़ा घूम -घूम कर देखने लगा , उसके चारों तरफ ताकतवर भैंसों का बड़ा सा झुण्ड था .


” अगर कभी भी तुम्हे डर लगे , तो ये याद रखो कि हम सब तुम्हारे साथ हैं . अगर तुम मुसीबत का सामना करने की बजाये , भाग खड़े होते हो , तो हम तुम्हे नहीं बचा पाएंगे ; लेकिन अगर तुम साहस दिखाते हो और मुसीबत से लड़ते हो तो हम मदद के लिए ठीक तुम्हारे पीछे खड़े होंगे .”


बछड़े ने गहरी सांस ली और अपने पिता को इस सीख के लिए धन्यवाद दिया।

हम सभी की ज़िन्दगी में शेर हैं … कुछ ऐसी समस्याएं हैं जिनसे हम डरते हैं , जो हमें भागने पर … हार मानने पर मजबूर करना चाहती हैं , लेकिन अगर हम भागते हैं तो वे हमारा पीछा करती हैं और हमारा जीना मुश्किल कर देती हैं . इसलिए उन मुसीबतों का सामना करिये … उन्हें दिखाइए कि आप उनसे डरते नहीं हैं … दिखाइए की आप सचमुच कितने ताकतवर हैं …. और पूरे साहस और हिम्मत के साथ उल्टा उनकी तरफ टूट पड़िये … और जब आप ऐसा करेंगे तो आप पाएंगे कि आपके परिवार और दोस्त पूरी ताकत से आपके पीछे खड़े हैं।

गुरुवार, 23 जून 2022

काला पहाड़ : मेवात की कथा और संस्कृति का जीवंत दस्तावेज / धीरेन्द्र asthanab

 मैं पहले ही स्वीकार कर लेता हूं कि वरिष्ठ उपन्यासकार भगवान दास मोरवाल का सन् 1999 में प्रकाशित और चर्चित उपन्यास काला पहाड़ विराट फलक वाले उपन्यासों की परंपरा का सशक्त पायदान होने के बावजूद मेरे पाठकीय स्वाद के उस पार रहता है।

यही वजह रही कि इसे पढ़ने में मुझे पूरे बीस दिन लगे,रुक रुक कर। चार सौ छह पन्नों में घुसने की हिम्मत बटोरने में ही दो साल गुजर गए। लेकिन अब जब मैं यह उपन्यास पढ़ चुका हूं तो कह सकता हूं कि अगर मैं यह उपन्यास नहीं पढ़ता तो मेवात की कथा, संस्कृति और जीवन को मिस करता।

 पूरा उपन्यास पढ़ने के दौरान मुझे ऐसा महसूस होता रहा कि मैं अपनी आंख में कौतूहल लिए एक विशाल कस्बाई मेले में घूम भटक रहा हूं। कितने लोग, कितने अरमान, कितने संघर्ष, कितने सपने,कितनी निराशाएं, कितने ध्वंस और कितने कितने दुर्भाग्य लेकर विचरण कर रहा है इसका कथानक। पचासों चरित्रों वाले इस उपन्यास में क्या नहीं है? सांप्रदायिक वैमनस्य की आहटें हैं, बेरोजगारी के कारण गांव कस्बों से होता युवा पलायन है, स्त्री मन की उलझनें और मुश्किलें हैं। दैनंदिन जीवन की दिक्कतें और दैन्य है। स्वस्थ शांत कस्बाई जीवन को जहरीला बनातीं राजनीतिक दुरभिसंधियां और चालबाज शरारतें हैं।

 सबसे अंत में एक करुण पटाक्षेप के तहत उपन्यास के केंद्रीय पात्र सलेमी का मरना है जिसकी कब्र के सिरहाने और पांयते दो पत्थर गाड़ दिये गये हैं।इस शिनाख्त के लिए ताकि भविष्य में यह पता रहे कि सलेमी यहां एक लंबी नींद में सोया हुआ है।सलेमी जैसों का काले पहाड़ के यही पत्थर तो बरसों तक साथ देते हैं वरना कौन उन्हें याद रखता है।

उपन्यास की बैक पर दिग्गज आलोचक उपस्थित हैं अपनी प्रशंसात्मक टिप्पणी के साथ। होना भी चाहिए।

 क्षमा कि किताब के पास पहुंचने में मुझे पूरे तेईस साल लग गए।

जन्मों का कर्ज / कृष्ण मेहता

 


          एक सेठ जी बहुत ही दयालु थे। धर्म-कर्म में यकीन करते थे। उनके पास जो भी व्यक्ति उधार माँगने आता वे उसे मना नहीं करते थे। सेठ जी मुनीम को बुलाते और जो उधार माँगने वाला व्यक्ति होता उससे पूछते कि "भाई ! तुम उधार कब लौटाओगे ? इस जन्म में या फिर अगले जन्म में ?"

          जो लोग ईमानदार होते वो कहते - "सेठ जी ! हम तो इसी जन्म में आपका कर्ज़ चुकता कर देंगे।" और कुछ लोग जो ज्यादा चालक व बेईमान होते वे कहते - "सेठ जी ! हम आपका कर्ज़ अगले जन्म में उतारेंगे।" और अपनी चालाकी पर वे मन ही मन खुश होते कि "क्या मूर्ख सेठ है ! अगले जन्म में उधार वापसी की उम्मीद लगाए बैठा है।" ऐसे लोग मुनीम से पहले ही कह देते कि वो अपना कर्ज़ अगले जन्म में लौटाएंगे और मुनीम भी कभी किसी से कुछ पूछता नहीं था। जो जैसा कह देता मुनीम वैसा ही बही में लिख लेता।

         एक दिन एक चोर भी सेठ जी के पास उधार माँगने पहुँचा। उसे भी मालूम था कि सेठ अगले जन्म तक के लिए रकम उधार दे देता है। हालांकि उसका मकसद उधार लेने से अधिक सेठ की तिजोरी को देखना था। चोर ने सेठ से कुछ रुपये उधार माँगे, सेठ ने मुनीम को बुलाकर उधार देने कोई कहा। मुनीम ने चोर से पूछा- "भाई ! इस जन्म में लौटाओगे या अगले जन्म में ?"  चोर ने कहा - "मुनीम जी ! मैं यह रकम अगले जन्म में लौटाऊँगा।"  मुनीम ने तिजोरी खोलकर पैसे उसे दे दिए। चोर ने भी तिजोरी देख ली और तय कर लिया कि इस मूर्ख सेठ की तिजोरी आज रात में उड़ा दूँगा।

          रात में ही सेठ के घर पहुँच गया और वहीं भैंसों के तबेले में छिपकर सेठ के सोने का इन्तजार करने लगा। अचानक चोर ने सुना कि भैंसे आपस में बातें कर रही हैं और वह चोर भैंसों की भाषा ठीक से समझ पा रहा है।

         एक भैंस ने दूसरी से पूछा- "तुम तो आज ही आई हो न, बहन !" उस भैंस ने जवाब दिया- “हाँ, आज ही सेठ के तबेले में आई हूँ, सेठ जी का पिछले जन्म का कर्ज़ उतारना है और तुम कब से यहाँ हो ?” उस भैंस ने पलटकर पूछा तो पहले वाली भैंस ने बताया- "मुझे तो तीन साल हो गए हैं, बहन ! मैंने सेठ जी से कर्ज़ लिया था यह कहकर कि अगले जन्म में लौटाऊँगी। सेठ से उधार लेने के बाद जब मेरी मृत्यु हो गई तो मैं भैंस बन गई और सेठ के तबेले में चली आयी। अब दूध देकर उसका कर्ज़ उतार रही हूँ। जब तक कर्ज़ की रकम पूरी नहीं हो जाती तब तक यहीं रहना होगा।”

           चोर ने जब उन भैंसों की बातें सुनी तो होश उड़ गए और वहाँ बंधी भैंसों की ओर देखने लगा। वो समझ गया कि उधार चुकाना ही पड़ता है, चाहे इस जन्म में या फिर अगले जन्म में उसे चुकाना ही होगा। वह उल्टे पाँव सेठ के घर की ओर भागा और जो कर्ज़ उसने लिया था उसे फटाफट मुनीम को लौटाकर रजिस्टर से अपना नाम कटवा लिया।

           हम सब इस दुनिया में इसलिए आते हैं, क्योंकि हमें किसी से लेना होता है तो किसी का देना होता है। इस तरह से प्रत्येक को कुछ न कुछ लेने देने के हिसाब चुकाने होते हैं। इस कर्ज़ का हिसाब चुकता करने के लिए इस दुनिया में कोई बेटा बनकर आता है तो कोई बेटी बनकर आती है, कोई पिता बनकर आता है, तो कोई माँ बनकर आती है, कोई पति बनकर आता है, तो कोई पत्नी बनकर आती है, कोई प्रेमी बनकर आता है, तो कोई प्रेमिका बनकर आती है, कोई मित्र बनकर आता है, तो कोई शत्रु बनकर आता है, कोई पङोसी बनकर आता है तो कोई रिश्तेदार बनकर आता है। चाहे दुःख हो या सुख हिसाब तो सबको देना ही पड़ता हैं। यही प्रकृति का नियम है।

रविवार, 19 जून 2022

पिता / अरविंद अकेला:


वह छोड़ गये हैं 

  

आज नहीं है मेरे पास,

मेरे पिता की कोई वसीयत,

कोई जमीन जायदाद,

नहीं है कोई बैंक बैलेंस,

नहीं कोई छोड़ी हुई हवेली,

या साधारण सा मकान। 


वह छोड़ गये है,

मेरे तन मन में अपना वजूद,

अपनी अजीम शख्शियत,

अपना अलौकिक व्यक्तित्व,

अपनी कर्मठता,ईमान, 

और अपनी ऊँची शान।


करता हूँ महसूस खुद में,

उनका जूझारुपन,

उनकी दयालुता,संघर्ष,

उनका दिया अनुशासन ,

उनकी सकारात्मक सोच,

और उनका सामजिक सम्मान।


आज उनकी बदौलत,

बन पाये एक इंसान,

मिल रही राष्ट्रीय प्रतिष्ठा,

स्वस्थ हैं अपने तन, प्राण,

बढ़ रही मेरी यश कीर्ति,

हो रहा मेरा कल्याण।

      ----0---

     अरविन्द अकेला,पूर्वी रामकृष्ण नगर,पटना-27:

 


-----------------------c-----------------

पिता घर के आसमान हैं  /  नेतलाल यादव


पिता घर के आसमान हैं

पिता परिवार के शान हैं

पिता बच्चों के अरमान हैं

पिता बहुत मूल्यवान हैं ।


पिता जीवन के संचित ज्ञान हैं 

पिता समाज के मान है

पिता संतानों के धनवान है

पिता के कदमों चारों धाम है


पिता मेहनत करते हैं

पिता तकलीफ को सहते हैं

पिता आशीर्वचन ही देते हैं

दुनियाँ दूसरे भगवान कहते हैं



पिता संस्कारों के बीज बोते हैं

पिता अनुशासन प्रिय होते है

पिता सिंधु-सा गंभीर होते हैं

पिता मुश्किलों में वीर होते हैं । ।


नेतलाल  यादव ।

शुक्रवार, 17 जून 2022

जंगल के जानवर |

 # जंगल के जानवर |

बीरबल की कहानी


प्रस्तुति -  रेणु दत्ता / आशा सिन्हा


एक बार बादशाह अकबर अपने सभी मंत्रियो के साथ शिकार को निकले , तभी पेड़ पर बैठे हुए उल्लू और उसके बच्चे ने उन्हें देखा और उन्होंने सभी जानवरों को सावधान कर दिया कि शिकार करने को बादशाह आ रहे है।


सभी जानवर पहले से सचेत हो गए।


और बादशाह को जब पूरा जंगल घूमने के बाद भी कोई जानवर नहीं मिला तो सब आश्चर्य मे थे कि ऐसा कैसे हो सकता है?


जरूर किसी ने पहले ही सभी जानवरो को हमारे आने की सूचना दे दी थी। इसी कारण कोई जानवर नहीं मिला हमें। फिर सब महल वापस आ गए। दूसरे दिन फिर सभी शिकार को निकले।


सैनिकों को पहले ही कह दिया गया था कि वह ध्यान रखे कि कौन हमारे आने की सूचना पहले ही दे देता है।


उल्लू और उसके बच्चे ने आज फिर देख लिया था। तो वह बताने के लिए जैसे ही उड़े। वैसे ही सैनिकों को पता चल चुका था। कि यही जानवरो के पहले से ही बता देते है।


उन दोनों को पकड़कर पिंजरे मे डाल लिया गया। तब वह जोर जोर से चिल्लाने लगे। उनको इस प्रकार देखकर बीरबल को बहुत दया आ रही थी। वह बादशाह से मना करना चाहते थे कि वह मासूम जानवरों का शिकार न करे।


पर वह कुछ कह नहीं पा रहे थे। जब उल्लुओं को इस प्रकार चिल्लाते देखकर बादशाह बोले। क्या बीरबल आप इनकी भाषा समझ पा रहे है?


तब बीरबल बोले यह कह रहे है। कि आगे आने वाले समय मे इंसान को जब जंगल की कीमत पता चलेगी। तब तक देर हो चुकी होगी। सारे जंगल काट दिए गए होंगे। उसमे रहने वाले जानवरो का शिकार किया जा चूका होगा।


इंसान के लिए कुछ नहीं बचेगा। तब उन्हें जंगल और उसमे रहने वाले बेचारे जानवरों का ख्याल आएगा। तब बादशाह यह सुनकर बहुत दुखी हुए। वह अपने मनोंरजन के लिए बेचारे जानवरों से उनका घर और उन्हें दोनों छीन रहे है।


उन्होंने बोला आज से किसी भी जानवर का शिकार नहीं किया जायेगा और यदि किसी ने ऐसा किया तो उसको कड़ी सजा मिलेगी। और इन उल्लुओं को भी पिंजरे मे से आजाद किया जाये।


उल्लू आजाद कर दिए गए। तब अकबर बीरबल से बोले आप वाकई लाजवाब है ‘बीरबल’. आप जैसा दूसरा और कोई हो ही नहीं सकता। कितनी अच्छी तरह से आपने हमें समझा दिया। और सभी जानवरों को बचा लिया।


#hindistory #hindlekan #Hindikahani #HindiStories #AkbarBirbal

https://hindilekan.in/akbar-birbal-ki-kahaniyan/

गुरुवार, 16 जून 2022

आत्मकथ्य सृजन लेखन और पठन पाठन का / धीरेन्द्र अस्थाना

 मैं कहानी में पठनीयता और रोचकता का कायल हूं। इन गुणों के बिना महान कथ्य भी अपठित रह जा सकता है।

मुझे कहानी में रोचकता का गुण दादा दादी से सुनी कहानियों से नहीं,उनके द्वारा दी गई किताबों से प्राप्त हुआ-- किस्सा तोता मैना,किस्सा हातिमताई,गुल सनौवर की कथा, विक्रमादित्य और बेताल। और बाद में चंद्रकांता संतति, भूतनाथ,लाल रेखा आदि। फिर गुलशन नंदा, प्रेम बाजपेयी,रानू, वेद प्रकाश शर्मा, सुरेंद्र मोहन पाठक, इब्ने सफी बीए, कर्नल रंजीत, जासूसी पंजा वगैरह।

  और इसके बाद तो साहित्य को आना ही था।

सोलह की उम्र तक प्रेमचंद, यशपाल, जयशंकर प्रसाद, अमृत लाल नागर, भगवती चरण वर्मा, जैनेन्द्र कुमार, निराला, हजारी प्रसाद द्विवेदी, उपेन्द्र नाथ अश्क, अमृता प्रीतम, फिराक गोरखपुरी, कमलेश्वर,मोहन राकेश, राजेंद्र यादव, धर्मवीर भारती, भीष्म साहनी, कृष्णा सोबती, फणीश्वर नाथ रेणु, भैरवप्रसाद गुप्त, निर्मल वर्मा, मार्कंडेय,शेखर जोशी, मुक्तिबोध और सोवियत साहित्य पढ़ा जा चुका था।

फिर तो सिलसिला चल निकला,जो आज रेत समाधि पढ़ने तक जारी है।



लाकडाउन भी अब हट गया है / उमाकांत दीक्षित

 कर्फ्यू अब खुल गया है

लाकडाउन भी अब हट गया है

गली में सब्जी, चूड़ी और पौधे

बेचने वालों की आवाजें आने लगी हैं... 


लेकिन अरशद कबाड़ी अब नहीं आता,

चौराहे पर गेंदे गुलाब की फूलमाला

बेचने ‌वाली फूलवती अब नहीं दिखती,

ओमी प्लम्बर, ईश्वर दूधवाला, गोरे पंडित जी,

गुप्ता जी कपड़े वाले अब कभी नहीं दिखेंगे...


कोरोना ले गया इन सबको चुन चुन कर

और जाने कितने बच्चे हो गए अनाथ... 

कितने ही घरों में अब चूल्हा नहीं जलता

और कुछ में तो दीपक भी नहीं...


मैं उन्हें कैसे बताऊं कि

अब मुझसे भी कुछ खाया नहीं जाता

उन सबकी आत्मा मुझसे पूछतीं हैं

क्या तुमने इन हालात में 

अपना इन्सानी फर्ज निभाया था...?


- उमाकांत दीक्षित

मुक़ाबला / कृष्ण मेहता

 🐃मुसीबत का सामना🐃 जंगली भैंसों का एक झुण्ड जंगल में घूम रहा था , तभी एक  बछड़े (पाड़ा) ने पुछा , ” पिताजी, क्या इस जंगल में ऐसी कोई चीज है ...