मंगलवार, 17 मई 2022

काश........

( *धीरे धीरे पढ़े.... पूरा पढ़कर बहुत सकूं मिलेगा ✍🏻✍🏻*)


प्रस्तुति  - सीताराम मीणा 


▪︎प्यास लगी थी गजब की मगर पानी मे जहर था...

पीते तो मर जाते और ना पीते तो भी मर जाते


▪︎बस यही दो मसले, जिंदगीभर ना हल हुए!!!

ना नींद पूरी हुई, ना ख्वाब मुकम्मल हुए!!!


▪︎वक़्त ने कहा.....काश थोड़ा और सब्र होता!!!

सब्र ने कहा....काश थोड़ा और वक़्त होता!!!


▪︎सुबह सुबह उठना पड़ता है कमाने के लिए साहेब...।। 

आराम कमाने निकलता हूँ आराम छोड़कर।।


▪︎"हुनर" सड़कों पर तमाशा करता है और "किस्मत" महलों में राज करती है!!


"शिकायते तो बहुत है तुझसे ऐ जिन्दगी, 

पर चुप इसलिये हु कि, जो दिया तूने,

 वो भी बहुतो को नसीब नहीं होता"..


▪︎अजीब सौदागर है ये वक़्त भी!!!!

जवानी का लालच दे के बचपन ले गया....

अब अमीरी का लालच दे के जवानी ले जाएगा. ......


▪︎लौट आता हूँ वापस घर की तरफ हर रोज़ थका-हारा...

आज तक समझ नहीं आया की जीने के लिए काम करता हूँ या काम करने के लिए जीता हूँ।


▪︎भरी जेब ने 'दुनिया' की पहचान करवाई और खाली जेब ने 'अपनो' की.


▪︎जब लगे पैसा कमाने, तो समझ आया,

शौक तो मां-बाप के पैसों से पुरे होते थे,

अपने पैसों से तो सिर्फ जरूरतें पुरी होती है। ...!!!


▪︎हंसने की इच्छा ना हो तो भी हसना पड़ता है...

कोई जब पूछे कैसे हो...??

तो मजे में हूँ कहना पड़ता है...


▪︎ये ज़िन्दगी का रंगमंच है दोस्तों....

यहाँ हर एक को नाटक करना पड़ता है.


▪︎"माचिस की ज़रूरत यहाँ नहीं पड़ती...

यहाँ आदमी आदमी से जलता है...!!"


दुनिया के बड़े से बड़े साइंटिस्ट,

ये ढूँढ रहे है की मंगल ग्रह पर जीवन है या नहीं...पर आदमी ये नहीं ढूँढ रहा

कि जीवन में मंगल है या

मंगल में ही जीवन है.....✍

शुक्रवार, 13 मई 2022

-पता ही-नहीं-चला*.li/


पता-ही-नहीं-चला*.li


अरे सखियो कब 30+, 40+, 50+ के हो गये 

                        पता ही नहीं चला। 

कैसे कटा 21 से 31,41, 51 तक का सफ़र 

                       पता ही नहीं चला 

क्या पाया  क्या खोया  क्यों खोया 

                       पता ही नहीं चला 

बीता बचपन  गई जवानी  कब आया बुढ़ापा 

                      पता ही नहीं चला 

कल बेटी थे  आज सास हो गये 

                       पता ही नहीं चला 

कब मम्मी से नानी बन गये 

                        पता ही नहीं चला 

कोई कहता सठिया गयी  कोई कहता छा गयीं

                  क्या सच है 

                       पता ही नहीं चला 


पहले माँ बाप की चली  फिर पतिदेव की चली 

              अपनी कब चली    

                       पता ही नहीं चला 


पति महोदय कहते अब तो समझ जाओ 

             क्या समझूँ  क्या न समझूँ न जाने क्यों 

                        पता ही नहीं चला 

        

दिल कहता जवान हूं मैं उम्र कहती नादान हुं मैं 

               इसी चक्कर में  कब घुटनें घिस गये 

                        पता ही नहीं चला 


झड गये बाल  लटक गये गाल  लग गया चश्मा 

                             कब बदलीं यह सूरत 

                       पता ही नहीं चला 


मैं ही बदली  या बदली मेरी सखियां 

                             या समय भी बदला 

     कितनी छूट गयीं    कितनी रह गयीं सहेलियां 

                      पता ही नहीं चला 


कल तक अठखेलियाँ करते थे सखियों के साथ 

                 आज सीनियर सिटिज़न हो गये 

                       पता ही नहीं चला 


अभी तो जीना सीखा है   कब समझ आई

                                 

पता ही नहीं चला 


आदर  सम्मान  प्रेम और प्यार 

          वाह वाह करती कब आई ज़िन्दगी 

                       पता ही नहीं चला 


बहु  जमाईं नाते पोते  ख़ुशियाँ लाये  ख़ुशियाँ आई 

               कब मुस्कुराई   उदास ज़िन्दगी 

                        पता ही नहीं चला 


 जी भर के जी लो प्यारी सखियो  फिर न कहना

                               

 *पता ही नहीं चला*

मंगलवार, 10 मई 2022

विद्रोही " / अनंग

 " 

नया - नया  इतिहास  बताने लगता है।

वह  मेरा  विश्वास   डिगाने  लगता  है।।

दिखा-दिखाकर उंगली विद्रोही कहता। 

तथ्य   बताने  पर  घबराने   लगता  है।।

कायर अज्ञानी क्या-क्या कहने लगता। 

खुद  को  देशभक्त दिखलाने लगता है।। 

मनवाने को व्याकुल अपनी बात सभी। 

भड़काऊ   पुस्तकें  जुटाने  लगता  है।। 

अब तक लिखी-सुनी बातें सब झूठी हैं।

वह  तो  उल्टी  धार  बहाने  लगता  है।। 

सभी  बुजुर्गों - विद्वानों को झूठा कह।

जाने   कैसी   बात  सुनाने  लगता  है।।

आजादी के जो  नायक थे उन पर ही।

नए - नए  इल्जाम  लगाने  लगता  है।। 

अंग्रेजों  की  तरह  तोड़ने  वालों  का। 

विरुदावली गुणगान वो गाने लगता है।। 

चमन  सजाया  जाने  कितने फूलों ने।

वह सब पर अधिकार जताने लगता है।।..."

अनंग "

माँ का पल्लू

 *गुरुजी ने कहा कि मां के पल्लू पर निबन्ध लिखो..*🙏🏻


 *तो लिखने वाले छात्र ने क्या खूब लिखा.....*

     

*"पूरा पढ़ियेगा आपके दिल को छू जाएगा"* 🥰


       आदरणीय गुरुजी जी...

    माँ के पल्लू का सिद्धाँत माँ को गरिमामयी

 छवि प्रदान करने के लिए था.


  इसके साथ ही ... यह गरम बर्तन को 

   चूल्हा से हटाते समय गरम बर्तन को 

      पकड़ने के काम भी आता था.


        पल्लू की बात ही निराली थी.

           पल्लू पर तो बहुत कुछ

              लिखा जा सकता है.


 पल्लू ... बच्चों का पसीना, आँसू पोंछने, 

   गंदे कान, मुँह की सफाई के लिए भी 

          इस्तेमाल किया जाता था.


   माँ इसको अपना हाथ पोंछने के लिए

           तौलिया के रूप में भी

           इस्तेमाल कर लेती थी.


         खाना खाने के बाद 

     पल्लू से  मुँह साफ करने का 

      अपना ही आनंद होता था.


      कभी आँख में दर्द होने पर ...

    माँ अपने पल्लू को गोल बनाकर, 

      फूँक मारकर, गरम करके 

        आँख में लगा देतीं थी,

   दर्द उसी समय गायब हो जाता था.


माँ की गोद में सोने वाले बच्चों के लिए 

   उसकी गोद गद्दा और उसका पल्लू

        चादर का काम करता था.


     जब भी कोई अंजान घर पर आता,

           तो बच्चा उसको 

  माँ के पल्लू की ओट ले कर देखता था.


   जब भी बच्चे को किसी बात पर 

    शर्म आती, वो पल्लू से अपना 

     मुँह ढक कर छुप जाता था.


    जब बच्चों को बाहर जाना होता,

          तब 'माँ का पल्लू' 

   एक मार्गदर्शक का काम करता था.


     जब तक बच्चे ने हाथ में पल्लू 

   थाम रखा होता, तो सारी कायनात

        उसकी मुट्ठी में होती थी.


       जब मौसम ठंडा होता था ...

  माँ उसको अपने चारों ओर लपेट कर 

    ठंड से बचाने की कोशिश करती.

          और, जब बारिश होती तो,

      माँ अपने पल्लू में ढाँक लेती.


  पल्लू --> एप्रन का काम भी करता था.

  माँ इसको हाथ तौलिया के रूप में भी 

           इस्तेमाल कर लेती थी.


 पल्लू का उपयोग पेड़ों से गिरने वाले 

  मीठे जामुन और  सुगंधित फूलों को

     लाने के लिए किया जाता था.


     पल्लू में धान, दान, प्रसाद भी 

       संकलित किया जाता था.


       पल्लू घर में रखे समान से 

 धूल हटाने में भी बहुत सहायक होता था.


      कभी कोई वस्तु खो जाए, तो

    एकदम से पल्लू में गांठ लगाकर 

          निश्चिंत हो जाना ,  कि 

             जल्द मिल जाएगी.


       पल्लू में गाँठ लगा कर माँ 

      एक चलता फिरता बैंक या 

     तिजोरी रखती थी, और अगर

  सब कुछ ठीक रहा, तो कभी-कभी

 उस बैंक से कुछ पैसे भी मिल जाते थे.


       *मुझे नहीं लगता, कि विज्ञान पल्लू का विकल्प ढूँढ पाया है !*


*मां का पल्लू कुछ और नहीं, बल्कि एक जादुई एहसास है !*


स्नेह और संबंध रखने वाले अपनी माँ के इस प्यार और स्नेह को हमेशा महसूस करते हैं, जो कि आज की पीढ़ियों की समझ में आता है कि नहीं........

*अब जीन्स पहनने वाली माएं, पल्लू कहाँ से लाएंगी*

            *पता नहीं......!!*

*सभी माताओं को नमन*


🙏🏻🌹🙏🏻

सोमवार, 9 मई 2022

रवि अरोड़ा की नजर से.......

 रहनुमाओं की अदा / रवि अरोड़ा


इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारो ।


आज सुबह से मशहूर शायर दुष्यंत कुमार बहुत याद आ रहे हैं । एक दौर था जब साहित्य, समाज और राजनीति शास्त्र के सभी विद्यार्थियों को दुष्यंत की किताब 'साये में धूप' की तमाम गज़लें गीता कुरान की तरह कंठस्थ होती थीं । सातवें दशक के जेपी आंदोलन से लेकर अन्ना आंदोलन तक ऐसा कोई राजनीतिक सामाजिक मुहिम नहीं गुजरा जिसमें दुष्यंत कुमार के शेर पूरी शिद्दत से न गूंजे हों।

बेशक आज भी दुष्यंत के चाहने वाले कम नहीं हैं मगर फिर भी हाल ही के वर्षों में राजनैतिक सामाजिक मूल्य जिस तेज़ी से बदले हैं , दुष्यंत कुमार जैसे लोगों और उनके कलाम को आम आदमी के जेहन से मिटाने के प्रयासों ने भी गति पकड़ी है । अब ये प्रयास कितने सफल होंगे यह तो पता नहीं मगर इतना तय है कि दुष्यंत कुमार के शेर आज के दौर में और अधिक मौजू होकर सामने आए हैं । अब दुष्यंत के इस शेर को ही लीजिए-  


इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात,

अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियां।


दुष्यंत कुमार का यह शेर आज आपके सम्मुख रखने का एक खास कारण है । हाल ही में ऐसा बहुत कुछ मुल्क में गुजरा है जिन पर किसी बड़े राजनीतिक सामाजिक आंदोलन की उम्मीद की जानी चाहिए थी मगर कहीं पत्ता भी नहीं खड़का । हैरानी होती है कि क्या यह वही मुल्क है जो जरा जरा सी बात पर भी तीखी प्रतिक्रिया देता था । महंगाई तो जैसे उसे बर्दाश्त ही नहीं होती थी और मात्र प्याज के दाम बढ़ने पर वह सरकारें बदल देता था ।

झूठे वादे करने वालों से लोगों को ऐसी चिढ़ थी कि दुबारा उन्हें कभी सत्ता ही नहीं दी । राष्ट्रीय ही नहीं अंतराष्ट्रीय मामलों में भी जनता बेहद जागरूक थी और सन 1962 में चीन द्वारा दिए गए धोखे को उसने मुल्क के नहीं वरन पंडित नेहरू के खाते में डाला और आज तक उनकी नीतियों पर उंगलियां उठाती हैं । आपातकाल में लोगों पर जुल्म ढाने पर इंदिरा गांधी को भी जनता ने एक बार सत्ताच्युत कर दिया था ।

मगर कमाल है यही जनता अब गहरी नींद सो रही है ? उस पर अब किसी बात का असर नहीं होता ? महंगाई दो गुना बढ़े या तीन गुना उसे फर्क नहीं पड़ता । बेरोजगारी सारे रिकॉर्ड तोड़ दे तो भी उसे कोई चिंता नहीं सताती 

 एक नहीं दो नहीं सारी की सारी सरकारी कंपनियां बिक जाएं तो भी उसे कुछ लेना देना नहीं । विदेशी कर्ज बढ़ना तो खैर उसे कतई चिंतित करता ही नहीं । कोरोना से लाखों लोग मारे गए मगर मरने से पूर्व उन्हें इलाज की सुविधा देना तो दूर सरकार ने अपनी गिनती में उनका नाम तक शामिल करने की जहमत नहीं उठाई ।

अब विश्व स्वास्थ्य संगठन सरकार को बता रहा है कि भारत में इस महामारी से पांच लाख नहीं वरन पैंतालीस लाख लोग मरे थे मगर इस बात पर भी इस देश की महान जनता ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी । बेशक मरने वाले लोग भारतीय ही थे मगर उनके अपने भी उनकी मौत की हुई उपेक्षा से कतई उत्तेजित नही हुए ।

पिछले आठ साल में और उससे पूर्व हुए वादे तो शायद लोग ही भूल चुके हैं सो सरकार को याद दिलाने का तो सवाल ही नहीं । चीन हमारे मुल्क में कहां कहां घुसा बैठा है इसकी खबर जब सरकार को ही नहीं तो सारा दोष पब्लिक को भी कैसे दें । 


देख कर कई दफा हैरानी होती है कि सदा नेताओं को छकाने वाली इस देश की जनता अब इतनी उदासीन क्यों हो गई है ? माना आज के नेताओं में इतनी कूवत है कि वे गोल पोस्ट को जन सरोकारों से बदल कर धर्म कर देने की सलाहियत रखते हैं मगर इसकी भी तो कोई सीमा जनता ने तय की होगी या वाकई ये किसी अंतहीन सिलसिले की शुरुआत है ?

 खैर अपनी समझ तो सीमित है हम क्या कहें मगर हां दुष्यंत कुमार होते तो इस बात जरूर बहुत ऊंची आवाज़ में दोहराते-

रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया 

इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारो ।


शनिवार, 7 मई 2022

"भीषण वीरानी"* / अनंग

 


घर घर की है , एक कहानी।

रूठी  दादी  , खुश है नानी।।


महंगाई   ने  मार  दिया  है।

सता रही है बिजली पानी।।


मांगो कुछ भी नही मिलेगा।

फिर भी सब बनते हैं दानी।।


भाव  बहाकर  ठगने वाले।

रोज -रोज करते बेईमानी।।


जो छलते हैं अपनों को ही।

करते  हैं  बिल्कुल नादानी।।


घर  के अंदर बिल्ली मौसी।

बाहर  बैठी  कुतिया कानी।।


बढ़ते  देखा  दुःखी पड़ोसी।

 क्या कहना ये बात पुरानी।।


 तरस  रहे  हैं सभी प्यार को।

 तने हुए फिर भी अभिमानी।।


छोटी  बात  बड़े झगड़े हैं।

घुल जाती है नई जवानी।।


सुख को है परहेज महल से।

कितनी प्यारी अपनी छानी।।


सब खुद में मशगूल हो गए।

छाई   है   भीषण   वीरानी।।


इज्जत दो अपनाओ सबको।

ये  दुनिया  है  आनी  जानी।।.

..*"अनंग"*

शुक्रवार, 6 मई 2022

ऐ भौरे तुमसे जग सुंदर / अनंग

 "तुमसे जग सुंदर "/ अनंग 


तुम इतना समझाते क्यों हो ?

थमकर चल इठलाते क्यों हो ??

अपना समझा प्यार दिया,पर। 

इतना  तुम  इतराते  क्यों हो ?? 

समझ रहे हैं हम भी तुमको।

थोड़े  हैं , शरमाते  क्यों  हो ??

कोई  छोटा  बड़ा  नहीं  है।

तुम इतना घबराते क्यों हो ??

जितना है उतना दिखलाओ।

बहुत अधिक दर्शाते क्यों हो ??

अंदर से तुम पत्थर दिल हो।

इतना प्यार जताते क्यों हो ?? 

उसे बुलाओ जो अपना हो।

सबको पास बुलाते क्यों हो ?? 

दिखती है औकात तुम्हारी।

चिल्लाकर बतलाते क्यों हो ??

खुद को देखो खोया कितना।

हमको और जगाते क्यों हो ??

अंगड़ाई लेती कलियों को।

अपने पास बुलाते क्यों हो ?? 

ऐ  भौरें  तुमसे  जग सुंदर।

अपने को भरमाते क्यों हो ??..

."अनंग "

काश........

( *धीरे धीरे पढ़े.... पूरा पढ़कर बहुत सकूं मिलेगा ✍🏻✍🏻*) प्रस्तुति  - सीताराम मीणा  ▪︎प्यास लगी थी गजब की मगर पानी मे जहर था... पीते तो मर...