शुक्रवार, 7 जून 2024

तारीफ की सजा??

 


❤️*राजा की प्रंशंसा*❤️


प्रस्तुति -:उषा रानी & राजेंद्र प्रसाद सिन्हा 



एक बार एक राजा के दरबार में एक कवि आया ! कवि  अत्यंत  गुणी और प्रतिभाशाली था ! परन्तु गरीब था और अपनी मज़बूरी ( गरीबी )  से निजात पाने का उसे कोइ मार्ग दिखाई नहीं दे रहा था !  अतः  विवश होकर  उसने अपने  इस  ईश्वर प्रदत्त  दिव्य गुण को  ईश्वर की महिमा गान की जगह एक राजा के दरबार में राजा की महिमा गान कर कुछ धन का लाभ पाने की योजना बनाई !  धन की आवश्यकता ने उसे शायद कुछ विवश कर रखा था  अतः राजा के दरबार में उसने अपनी रचनाओं को सुनाने की अनुमति मांगी जो उसे मिल गयी !

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राजा का संकेत मिलते ही कवि ने राजा की प्रशंसा में कविताएं सुनानी शुरू कर दीं. राजा खुश हो गया. फिर कवि का ध्यान राजसभा में उपस्थित महारानी की ओर गया.

.उसने सोचा अपने मिलने वाले पारितोषिक को सुनिश्चित कर लिया जाए ! अब उसने रानी की प्रशंसा में कविताएँ सुनानी शुरू कीं. रानी भी उसकी कविता से प्रभावित और प्रसन्न थीं.  इस प्रकार अपनी सुन्दर रचनाओं से  कवि ने राजा-रानी दोनों का दिल जीत लिया !

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राजा ने मंत्री से पूछा कि इस विद्वान कवि ने हमें प्रसन्न किया है. राजा इतना प्रसन्न था कि वह कवि को दरबार में जगह तक दे सकता था. पर उसने मंत्री से ही कवि के योग्य उचित ईनाम  के लिए परामर्श किया / पूछ लिया !

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 राजा को मंत्री की बुद्धिमता पर अटूट विश्वास था. उसके परामर्श के बिना निर्णय नहीं लेता था ! परन्तु मंत्री चुप था ! मंत्री एक बड़ा ही योग्य  व्यक्ति था !

 राजा ने दोबारा पूछा तो मंत्री ने अनमने मन से कहा- महाराज, इन्होंने आपको और महारानी को  अपनी रचना और मधुर गीत से प्रसन्न कर लिया है. आपको जो उचित लगे वह पुरस्कार इन्हें दें. इस विषय पर मेरा निर्णय शायद आपको रुचिकर ना लगे !

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यह सुनकर  राजा  की जिज्ञासा और मन  का कौतूहल बढ़ गया ! एक कवि को ईनाम देने की साधारण सी बात पर मंत्री ऐसी बात क्यों कह रहा है !  अवश्य ही  कुछ गहरी बात जरूर है !

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उसने घोषणा की  मंत्री  जी  जो पुरस्कार निर्धारित करेंगे वही पुरस्कार इस कवि को दे दिया जाएगा. कवि ने बड़ी आशा की दृष्टि से मंत्री की ओर देखा !  उसे  अफसोस हो रहा था कि यदि उसे मंत्री के इस प्रभाव का पता होता तो वह कुछ प्रशंसा उसकी भी कर देता. फिर भी यदि यह राजा जितना पुरस्कार नहीं भी देगा पर राजा के प्रशंसक को कुछ पारितोषिक  तो देगा ही !

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अभी वह इन ख्यालों में ही था कि मंत्री ने अचानक कहा- महाराज मेरा निर्णय है कि इस कवि को चार जूते लगाए जाएं.

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कवि पर तो बिजली गिर गई. राजा और रानी की प्रशंसा करने वाले को जूते पड़ेगें, यह सोच कर राजा, रानी समेत सभी दरबारियों की आंखें फटी की फटी रह गईं.

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राजा ने तो घोषणा कर दी थी. चाहकर भी निर्णय़ से पीछे हट नहीं सकते थे. कवि को पांच जूते लगा कर छोड दिया गया.

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कवि बहुत दुखी हुआ और  शाम को जब मंत्री अपने घर की ओर चला तो कवि भी पीछे-पीछे चल पडा !  मंत्री जी जब  घर पहुंचे  और अपनी पत्नी को राजसभा में हुई  सारी घटना पत्नी को बताने लगा और बोला कि मुझे बहुत दुख है एक विद्वान  अत्यंत गुणनि , प्रतिभाशाली और  जिस पर माता सरस्व ती की कृपा है उसके साथ यह सब करना पडा ! 

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पत्नी ने पूछा कि इसमें विवशता की क्या बात थी जो आपने एक योग्य कवि का अपमान किया ?

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मंत्री बोला- परमात्मा ने उस कवि को बहुत सुंदर बुद्धि और मधुर आवाज दी है. सरस्वती ने उसमें इतने गुण भर दिए हैं कि वह इस राज्य का सम्मानित मंत्री बनने के योग्य है  परन्तु उसने ईश्वर की महिमा गान , अपनी प्रतिभा  एवं कला  को और बढ़ाने की और ध्यान देने की जगह उसने एक राजा की चाटुकारिता को चुना !

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ऐसे राजा उसके सम्मान में अगवानी करें ऐसी प्रतिभा और कला से युक्त है वह गायक कवि. परंतु उसने अपना मोल ही नहीं समझा !

 आज वह एक राजा की चाटुकारिता कर रहा था ! यदि आज मैं उसे पुरस्कार दिला देता तो वह ज्यादा से ज्यादा पुरस्कार की आस में अपनी कला का प्रयोग सिर्फ राजा रानी की प्रशंसा करने में ही लगाता रहता ! इसके बाद जो राजा बनता फिर वह उसकी चाटुकारिता करता जीवन बिता देता ! उसकी  संताने फिर उस कार्य में लग जातीं और अपनी प्रतिभा एवं कला दोनों का शनैः शनैः अंत होना शुरू हो जाता !

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मंत्री ने पत्नी को कहा- मैं स्वयं कवि का प्रशंसक हूं इसलिए थोड़ा सा दण्डित  कर मैंने उसे कला एवं प्रतिभा के दुरूपयोग एवं अवनति से बचा लिया है !  पत्नी ने पूछा वो कैसे ?

      मंत्री ने बताया- कवि सबसे पहले ईश्वर की प्रशंसा करता है  साथ ही अपनी प्रतिभा को बढ़ाने , कला को निखारने में एकाग्रचित होता है ना की किसी की चाटुकारिता में ध्यान लगाता है ! इसने तो राजा को ही ईश्वर मान लिया. भगवान की प्रशंसा में तो एक शब्द न कहे और राजा-रानी के लिए गाता चला गया  तो मुझे लगा कि उसे इस अपराध की छोटी सी सजा देकर मुक्ति दी जाए !

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 अपनी चाटुकारिता से वह  स्वयं भी पथ्ब्रष्ट होता और  ऐसे राजा को भी  पथभ्रष्ट  कर सकता था / अहंकारी बना सकता था  ! 

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बाहर खडे कवि ने सुना तो रोने लगा ओर मंत्री के सामने आकर पैर पकड लिए. आज के बाद मैं सिर्फ  वही करूँगा जो मुझे अपनी कला को निखारने के लिए आवश्यक है और  ईश्वर की महिमा गाऊंगा. आपने बड़े अपराध से मुझे बचा लिया.




रविवार, 2 जून 2024

मजरूह सुल्तानपुरी के बारे में

 


मजरूह सुल्तानपुरी के बारे में 15 ख़ास बातें


1. नाम था असरार उल हसन खान. मगर दुनिया ने मजरूह सुल्तानपुरी के नाम से जाना.


2. पैदाइश की जगह, उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले का निजामाबाद गांव. यहां उनके अब्बा पुलिस महकमे में तैनात थे. पुरखों की असल जमीन सुल्तानपुर में थी. बहरहाल, पैदाइश की तारीख 1 अक्टूबर, 1919.


3. नौशाद से लेकर अनु मलिक और जतिन ललित, एआर रहमान और लेस्ली लेविस तक के साथ काम किया.


4. 1965 में फिल्म 'दोस्ती' के गाने 'चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे' के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड जीता.


5. 1993 में दादा साहब फाल्के अवॉर्ड से नवाजे गए.


6. बाप नहीं चाहते थे कि बेटा अंग्रेजी सीखे. इसलिए उन्हें मदरसे में भेज दिया गया. यहां उन्होंने अरबी और फारसी जबान सीखी. मजरूह के पिता पुलिस डिपार्टमेंट में काम किया करते थे.


7. आलिम बनने के बाद वह लखनऊ पहुंचे. यूनानी चिकित्सा पद्धति सीखने. फिर एक दिन इस असफल हकीम की किस्मत ने करवट ली. वह सुल्तानपुर के एक मुशायरे में अपनी गजल सुना बैठे. लोगों की दाद उन्हें इतनी सच्ची और हौसलाबख्श लगी कि उन्होंने तय कर लिया कि बहुत हुआ नाड़ी जांचने का काम.


8. उन्होंने मुशायरों में आमद बढ़ा दी. जिगर मुरादाबादी की शागिर्दी भी शुरू कर दी. 'मैं अकेला ही चला था जानिब ए मंजिल मगर, लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया.' 


9. 1945 में मजरूह एक मुशायरे में शामिल होने के लिए बॉम्बे आए. उनकी गजलों और नज्मों को लोगों ने खूब पसंद किया. सुनने वालों में एक थे प्रॉड्यूसर एआर कारदार. मजरूह के बोल सुनकर कारदार पहुंच गए उनके गुरु जिगर मुरादाबादी के पास. सिफारिश के लिए. मगर मजरूह ने फिल्मों के लिए लिखने से इनकार कर दिया. अदबी तबके में उन दिनों इस तरह के काम को हल्का माना जाता था.


10. फिर जिगर ने समझाया. इसमें पैसा अच्छा है. परिवार को मदद हो जाएगी.


11. फिर कारदार मजरूह को नौशाद के पास ले गए. उन्होंने मजरूह को एक ट्यून सुनाई और कहा, इसके मीटर पर कुछ लिखो. मजरूह ने लिखा, 'जब उसने गेसू बिखराए, बादल आए झूम के.' नौशाद को ये लफ्ज पसंद आए और उन्हें फिल्म 'शाहजहां' के लिए बतौर गीतकार रख लिया गया. इसी में केएल सहगल ने गाया, 'जब दिल ही टूट गया'. सहगल चाहते थे कि उनकी आखिरी यात्रा में यही गाना बजे.

12. मजरूह का फिल्मी सफर शुरू हो गया. महबूब का अंदाज, शाहिद लतीफ की आरजू. पर तरक्कीपसंद खेमे के साथ उनका जुड़ाव उनके बागी तेवरों में नजर आया.

13. 1949 में उन्हें बलराज साहनी जैसे कई वामपंथियों के साथ जेल में डाल दिया गया. उनसे कहा गया कि माफी मांगो, वर्ना दो साल की जेल होगी. जेल में रहने के दौरान ही उनकी बड़ी बेटी हुई. परिवार पर आर्थिक संकट आ गया. तब राज कपूर ने मजरूह का लिखा 'दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई' खरीदा और परिवार को उस वक्त हजार रुपये दिए इसके ऐवज में.

14. पहले गीतकार थे, जिन्हें दादासाहब फाल्के मिला.


15. 24 मई, 2000 को उनका निधन हो गया. वजह बना न्यूमोनिया का अटैक. उस वक्त उनकी उम्र थी 80 बरस.


चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे, फिर भी कभी अब नाम को तेरे, दोस्ती फिल्म का ये गीत, जिसके लिए मजरूह को पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला.


🙏🏽❤️🙏🏽

सोमवार, 6 मई 2024

तलाक के बाद फिर से

 पति ने पत्नी को किसी बात पर तीन थप्पड़ जड़ दिए, पत्नी ने इसके जवाब में अपना सैंडिल पति की तरफ़ फेंका, सैंडिल का एक सिरा पति के सिर को छूता हुआ निकल गया।


मामला रफा-दफा हो भी जाता, लेकिन पति ने इसे अपनी तौहीन समझी, रिश्तेदारों ने मामला और पेचीदा बना दिया, न सिर्फ़ पेचीदा बल्कि संगीन, सब रिश्तेदारों ने इसे खानदान की नाक कटना कहा, यह भी कहा कि पति को सैडिल मारने वाली औरत न वफादार होती है न पतिव्रता।


लड़के ने लड़की के बारे में और लड़की ने लड़के के बारे में कई असुविधाजनक बातें कही।


मुकदमा दर्ज कराया गया। पति ने पत्नी की चरित्रहीनता का तो पत्नी ने दहेज उत्पीड़न का 

मामला दर्ज कराया। छह साल तक शादीशुदा जीवन बीताने और एक बच्ची के माता-पिता होने के बाद आज दोनों में तलाक हो गया।


पति-पत्नी के हाथ में तलाक के काग़ज़ों की प्रति थी।

दोनों चुप थे, दोनों शांत, दोनों निर्विकार।


मुकदमा दो साल तक चला था। 

अंत में वही हुआ जो सब चाहते थे यानी तलाक ................

यह महज़ इत्तेफाक ही था कि दोनों पक्षों के रिश्तेदार एक ही टी-स्टॉल पर बैठे , कोल्ड ड्रिंक्स लिया।


यह भी महज़ इत्तेफाक ही था कि तलाकशुदा पति-पत्नी एक ही मेज़ के आमने-सामने जा बैठे।

लकड़ी की बेंच और वो दोनों .

''कांग्रेच्यूलेशन .... आप जो चाहते थे वही हुआ ....'' स्त्री ने कहा।

''तुम्हें भी बधाई ..... तुमने भी तो तलाक दे कर जीत हासिल की ....'' पुरुष बोला।

''तलाक क्या जीत का प्रतीक होता है????'' स्त्री ने पूछा।

''तुम बताओ?''

पुरुष के पूछने पर स्त्री ने जवाब नहीं दिया, वो चुपचाप बैठी रही, फिर बोली, ''तुमने मुझे चरित्रहीन कहा था....

अच्छा हुआ.... अब तुम्हारा चरित्रहीन स्त्री से पीछा छूटा।''

''वो मेरी गलती थी, मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था'' पुरुष बोला।

''मैंने बहुत मानसिक तनाव झेली है'', स्त्री की आवाज़ सपाट थी न दुःख, न गुस्सा।

''जानता हूँ पुरुष इसी हथियार से स्त्री पर वार करता है, जो स्त्री के मन और आत्मा को लहू-लुहान कर देता है... तुम बहुत उज्ज्वल हो। मुझे तुम्हारे बारे में ऐसी गंदी बात नहीं करनी चाहिए थी। मुझे बेहद अफ़सोस है, '' पुरुष ने कहा।

स्त्री चुप रही, उसने एक बार पुरुष को देखा।


कुछ पल चुप रहने के बाद पुरुष ने गहरी साँस ली और कहा, ''तुमने भी तो मुझे दहेज का लोभी कहा था।''

''गलत कहा था''.... पुरुष की ओऱ देखती हुई स्त्री बोली।

कुछ देर चुप रही फिर बोली, ''मैं कोई और आरोप लगाती लेकिन मैं नहीं...''


प्लास्टिक के कप में चाय आ गई।

स्त्री ने चाय उठाई, चाय ज़रा-सी छलकी। गर्म चाय स्त्री के हाथ पर गिरी।

स्सी... की आवाज़ निकली।

पुरुष के गले में उसी क्षण 'ओह' की आवाज़ निकली। स्त्री ने पुरुष को देखा। पुरुष स्त्री को देखे जा रहा था।

''तुम्हारा कमर दर्द कैसा है?''

''ऐसा ही है कभी वोवरॉन तो कभी काम्बीफ्लेम,'' स्त्री ने बात खत्म करनी चाही।

''तुम एक्सरसाइज भी तो नहीं करती।'' पुरुष ने कहा तो स्त्री फीकी हँसी हँस दी।

''तुम्हारे अस्थमा की क्या कंडीशन है... फिर अटैक तो नहीं पड़े????'' स्त्री ने पूछा।

''अस्थमा।डॉक्टर सूरी ने स्ट्रेन... मेंटल स्ट्रेस कम करने को कहा है, '' पुरुष ने जानकारी दी।

स्त्री ने पुरुष को देखा, देखती रही एकटक। जैसे पुरुष के चेहरे पर छपे तनाव को पढ़ रही हो।

''इनहेलर तो लेते रहते हो न?'' स्त्री ने पुरुष के चेहरे से नज़रें हटाईं और पूछा।

''हाँ, लेता रहता हूँ। आज लाना याद नहीं रहा, '' पुरुष ने कहा।

''तभी आज तुम्हारी साँस उखड़ी-उखड़ी-सी है, '' स्त्री ने हमदर्द लहजे में कहा।

''हाँ, कुछ इस वजह से और कुछ...'' पुरुष कहते-कहते रुक गया।

''कुछ... कुछ तनाव के कारण,'' स्त्री ने बात पूरी की।

पुरुष कुछ सोचता रहा, फिर बोला, ''तुम्हें चार लाख रुपए देने हैं और छह हज़ार रुपए महीना भी।''


''हाँ... फिर?'' स्त्री ने पूछा।

''वसुंधरा वाले फ्लैट की कीमत तो बीस लाख रुपए होगी??? मुझे सिर्फ चार लाख रुपए चाहिए....'' स्त्री ने स्पष्ट किया।

''बिटिया बड़ी होगी... सौ खर्च होते हैं....'' पुरुष ने कहा।

''वो तो तुम छह हज़ार रुपए महीना मुझे देते रहोगे,'' स्त्री बोली।

''हाँ, ज़रूर दूँगा।''

''चार लाख अगर तुम्हारे पास नहीं है तो मुझे मत देना,'' स्त्री ने कहा।


उसके स्वर में पुराने संबंधों की गर्द थी।

पुरुष उसका चेहरा देखता रहा....

कितनी सह्रदय और कितनी सुंदर लग रही थी सामने बैठी स्त्री जो कभी उसकी पत्नी हुआ करती थी।

स्त्री पुरुष को देख रही थी और सोच रही थी, ''कितना सरल स्वभाव का है यह पुरुष, जो कभी उसका पति हुआ करता था। कितना प्यार करता था उससे...

एक बार हरिद्वार में जब वह गंगा में स्नान कर रही थी तो उसके हाथ से जंजीर छूट गई। फिर पागलों की तरह वह बचाने चला आया था उसे। खुद तैरना नहीं आता था लाट साहब को और मुझे बचाने की कोशिशें करता रहा था... कितना अच्छा है... मैं ही खोट निकालती रही...''


पुरुष एकटक स्त्री को देख रहा था और सोच रहा था, ''कितना ध्यान रखती थी, स्टीम के लिए पानी उबाल कर जग में डाल देती। उसके लिए हमेशा इनहेलर खरीद कर लाती, सेरेटाइड आक्यूहेलर बहुत महँगा था। हर महीने कंजूसी करती, पैसे बचाती, और आक्यूहेलर खरीद लाती। दूसरों की बीमारी की कौन परवाह करता है? ये करती थी परवाह! कभी जाहिर भी नहीं होने देती थी। कितनी संवेदना थी इसमें। मैं अपनी मर्दानगी के नशे में रहा। काश, जो मैं इसके जज़्बे को समझ पाता।''


दोनों चुप थे, बेहद चुप।

दुनिया भर की आवाज़ों से मुक्त हो कर, खामोश।

दोनों भीगी आँखों से एक दूसरे को देखते रहे....

''मुझे एक बात कहनी है, ''  आवाज़ में झिझक थी।

''कहो, '' स्त्री नजल आँखों से उसे देखा।

''डरता हूँ,'' पुरुष ने कहा।

''डरो मत। हो सकता है तुम्हारी बात मेरे मन की बात हो,'' स्त्री ने कहा।

''तुम बहुत याद आती रही,'' पुरुष बोला।

''तुम भी,'' स्त्री ने कहा।

''मैं तुम्हें अब भी प्रेम करता हूँ।''

''मैं भी.'' स्त्री ने कहा।

दोनों की आँखें कुछ ज़्यादा ही सजल हो गई थीं।

दोनों की आवाज़ जज़्बाती और चेहरे मासूम।

''क्या हम दोनों जीवन को नया मोड़ नहीं दे सकते?'' पुरुष ने पूछा।

''कौन-सा मोड़?''

''हम फिर से साथ-साथ रहने लगें... एक साथ... पति-पत्नी बन कर... बहुत अच्छे दोस्त बन कर।''

''ये पेपर?'' स्त्री ने पूछा।

''फाड़ देते हैं।'' पुरुष ने कहा औऱ अपने हाथ से तलाक के काग़ज़ात फाड़ दिए। फिर स्त्री ने भी वही किया। दोनों उठ खड़े हुए। एक दूसरे के हाथ में हाथ डाल कर मुस्कराए। दोनों पक्षों के रिश्तेदार हैरान-परेशान थे। दोनों पति-पत्नी हाथ में हाथ डाले घर की तरफ चले गए। घर जो सिर्फ और सिर्फ पति-पत्नी का था ।।


पति पत्नी में प्यार और तकरार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जरा सी बात पर कोई ऐसा फैसला न लें कि आपको जिंदगी भर अफसोस हो ।।

सोमवार, 8 अप्रैल 2024

किशोर कुमार कौशल की 10 कविताएं


1.


जाने किस धुन में जीते हैं दफ़्तर आते-जाते लोग। 

कैसे-कैसे विष पीते हैं दफ़्तर आते-जाते लोग।। 

वेतन के दिन भर जाते हैं इनके बटुए जेब मगर। 

दो दिन पीछे फिर रीते हैं दफ़्तर आते-जाते लोग।। 

' रेल-बसों  की दौड़-धूप में तन-मन थक कर  चूर हुए।   ' हारे-हारे भी जीते हैं दफ़्तर आते-जाते लोग।। 

दफ़्तर की हर ऊँच-नीच को सहते हैं पर कह डालें। 

ऐसे नहीं गए-बीते हैं दफ़्तर आते-जाते लोग।। 

रोज़ी-रोटी के चक्कर में सारे मेले छूट गए। 

अपने ज़ख़्मों को सीते हैं दफ़्तर आते-जाते लोग।।

 2


मैं यूँ तो सबके साथ सदा 

पर मेरा अपना अलग ढंग 


जो बात किसी को चुभ जाए 

मैं ऐसी बात नहीं कहता

हो जहाँ कहीं कुछ ग़लत बात 

मैं क्षण भर वहाँ नहीं रहता


जो बनी-बनाई लीक मिली 

मैं अकसर उस पर चला नहीं 

मुझको वह बात नहीं भाई 

हो जिसमें सबका भला नहीं 


जग जिस प्रवाह में बहता है 

मैं उस प्रवाह में बहा नहीं 

जो भीड़ कहा करती अकसर 

मैंने वह हरगिज कहा नहीं


अपना कुछ काम बनाने को 

मैंने समझौता नहीं किया 

खु़श हो कोई या रुष्ट रहे 

झूठा यशगायन नहीं किया 


मैं सबको रास नहीं आता 

पर इसकी कुछ परवाह नहीं 

सब मुझे सुनें,बस मुझे सुनें

ऐसी कुछ मन में चाह नहीं 


अपनी धुन,अपनी मस्ती है 

अपनी भी कोई हस्ती है। 

*   *   *   *   *   *   *   *



: कुछ लोग जहाँ में हरदम ही तकरार की बातें करते हैं।

कुछ लोग हैं ऐसे दीवाने बस प्यार की बातें करते हैं।। 


ऐसे भी बहुत हैं अहले-चमन करते हैं नज़ारा फूलों का।

कुछ लोग मग़र इस गुलशन में बस ख़ार की बातें करते हैं।। 


बिन सोचे-समझे करते हैं वो बात यहाँ हैरानी की। 

दो-चार कदम जो चल न सकें  रफ़्तार की बातें करते हैं।। 

जो बात पे अपनी ना ठहरें दुनिया से हैं बिलकुल बेगाने। 

वादे की हिमायत करते हैं इकरार की बातें करते हैं।। 

जिनको नग़मों का इल्म नहीं जो दूर रहें हर महफ़िल से। 

वो रक्स की कमियाँ गिनते हैं झनकार की बातें करते हैं।। 

*  *  *  *  *  *  *  *  *  *

4



श्रीराम-जन्म का शुभ अवसर 

*  *  *  *  *  *  *  *  *  *

शुभ चैत्र मास मंगलवेला

श्रीराम-जन्म का शुभ प्रभात 

हो प्रेम-प्रीत छवि चहुँओर

हर्षित-पुलकित हों तात-मात। 


हो दूर दुराशा-दैन्यभाव

जग में फैले चहुँओर शान्ति

 हो नष्ट घृणा सब आपस की,

 सबके मुख चमके विमल कान्ति। 


वे मर्यादा पुरुषोत्तम थे

दीनों को गले लगाते थे

करुणामय राम की आँखों को

शबरी-निषाद भी भाते थे। 


पर आज तुम्हारे भक्त बहुत

कट्टरता से समझौता कर

कहते हैं खुद को सर्वश्रेष्ठ 

हिंसा-नफ़रत नित फैलाकर।


श्रीराम बुद्ध और महावीर 

का ध्येय प्रेममय समता है 

हम इसको भी सोचें-समझें

सबसे ऊँची मानवता है। 


हों राम हृदय में,कर्मों में 

ईमानभरी सच्चाई हो 

आचरण हमारा श्रेष्ठ रहे 

मन में यह बात समाई हो। 

*  *  *  *  *  *  *  *  *  *

--5

         

 सत्य कहाँ हैे?

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सत्य कहाँ है अब दुनिया में 

कभी-कभी मन होता व्याकुल

'सत्यमेव जयते'  

संसद औ घर-दफ़्तर की दीवारों पर 

टँगा हुआ अच्छा लगता है 

दुनिया चलती नहीं सत्य से 

बड़े-बड़े सच के हामी को 

झूठ यहाँ कहना पड़ता है 

कभी-कभी सोचा करता हूँ 

हरिश्चंद्र या गाँधी

सच की सूली पर चढ़ते आए हैं

आदर्शों की बात करें तो 

अपने सत्पुरुषों की चर्चा करना 

सदा भला लगता है 

पर जीवन के संघर्षों में 

नहीं काम चल पाता सच से

रोज-रोज के व्यवहारों में 

छोटी या फिर बड़ी बात में 

सदा झूठ का डंका बजता 

और सत्य कोने में रोता 

कभी-कभी मन होता व्याकुल 

इस जग में क्यों ऐसा होता

*   *   *   *   *   *   *   *   *

  6  


  ग़ज़ल 

             *  *  *  *  *


 दम भले रौशनी का भरते हैं। 

 नौकरी तीरगी  की करते हैं।।          

  सिर्फ़ दो रोटियाँ जुटाने में ।

 रोज़ जीते हैं  रोज़  मरते हैं।।

 इस कदर ख़ौफ़ हैं फि़जाओं में। 

राह चलते भी लोग डरते हैं।। 

किसकी आँखों में स्वप्न जीवन के?

किसके होठों से फूल झरते हैं?

आपसे दूरियाँ नहीं मिटती।

कैसे औरों की पीर हरते हैं।। 

*   *   *   *   *   *    *   *

7


             

आया वसंत सखे,छाया वसंत


वन-वन में बेला पलाश फूल फूले

आम नीम मेंहदी पर बौर-मौर  झूले

बहता है मस्ती में पवन दिग्-दिगंत

आया वसंत सखे- - -


सरसों की पियराई फैली चहुँओर

कलियों के घूँघट लख नाचे मन-मोर

मेला उमंगों का मस्ती अनंत

आया वसंत सखे- - -


फूलों को छेड़ भ्रमर करते ठिठोली 

राहों में मौसम ने मस्ती सी घोली

कंतों की कौन कहे बहके हैं संत


आया वसंत सखे,छाया वसंत

*   *   *   *   *   *   *   *   *

--8


ये ज़िन्दगी है प्यार की

-  -  -  -  -  -  -  -  -  -  -

ये ज़िन्दगी है प्यार की 

तू हर बशर से प्यार कर


सवेरे तुझको राह में 

मिलेंगे अजनबी कई

तू मुस्कराता गाता चल 

कि ज़िन्दगी लगे नई

कहीं से कोई आएगा,

मिलेगा ख़ूब बाँह भर 

न ऐसी आस पाल तू,

न उसका इंतज़ार कर। 


तू हर बशर से प्यार कर 



चले थे शहंशाह कुछ 

भरे हुए गुमान में 

करेंगे राज ठाठ से 

डटे हुए जहान में 

मगर दिलों में प्यार के 

जला न पाए दीप कुछ

नहीं हुए सफल कभी

चले गए वे हार कर


तू हर बशर से प्यार कर 


ये ज़िन्दगी है कितने दिन 

किसी को भी नहीं पता 

तो किसलिए घमंड में 

तू घूमता है,यह बता

न कोई पास आएगा

जो साँस जाएगी निकल

बनेगा राख ये बदन 

रखा जिसे सँभालकर


तू हर बशर से प्यार कर


झगड़ रहे जो रात-दिन 

ज़मीन धन के वास्ते 

किये हैं बन्द धर्म के 

जिन्होंने नेक रास्ते 

उन्हें मिलेगा स्वर्ग क्या

जो बाँटते रहे सदा

जिन्हें बशर से प्यार की

समझ न आई उम्र भर 


तू हर बशर से प्यार कर 


यही कहा है वेद ने 

यही लिखा कुरान में 

नहीं है कोई  देवता 

कमी है हर इंसान में 

बनाया जिसने आदमी

बसाया जिसने ये जहाँ

उसी का मंत्र है यही

लुटा दे प्यार हर डगर


तू हर बशर से प्यार कर। 

 *  *  *  *  *  *  *  *  *

--- 9            


    गीत

                *  *  *

मर्यादाएँ जीवन भर अड़ी रही, 

वरना मैं भी कुछ खुलकर जी लेता।


मैं रहा बनाता संबंधों के पुल, 

आने-जाने वालों का ध्यान किया।

मेरे अपने ही मुझसे रूठ गए,

 जिनका मैंने दिल से सम्मान किया।।

 कोई बाधा यूंँ अड़कर खड़ी रही,

वरना मैं भी कुछ खुलकर जी लेता।।


 जिम्मेदारी घर की पूरी करते, 

कर पाते हम कोई संकल्प नहीं,

 बच्चों की खातिर जीते हैं अब तो,

अपनी इच्छा का कहीं विकल्प नहीं।।

समझौते करने पड़ते हैं अक्सर, 

वरना फूलों सा खिलकर जी लेता।।


 कुछ बंधन होते हैं इतने सुखकर, 

जिनको हम खुश होकर अपनाते हैं,

 कुछ बंधन ढोने पड़ते हैं यूंँ ही,

 जिसमें जीवन भर बँध पछताते हैं।।

 करुणा बरसाने वाले नहीं मिले,

वरना घावों को सिलकर जी लेता।। 

*   *   *   *   *   *   *   *   *

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 ग़ज़ल 



जो गुल करते चरागों को उमर भर हाथ मलते हैं।

मिसालें जिनकी बनती हैं, मशालें लेके चलते हैं।।


जहाँ में लोग अक्सर वक्त पर मुँह फेर लेते हैं।

भले इंसान आड़े वक्त में भी साथ चलते हैं।।


जिसे पत्थर समझ कर देखते हैं सब हिकारत से।

उसी परबत के सीने में कई दरिया मचलते हैं।।


थकन से चूर आते शाम अपने आशियाने पर।



सवेरे बन-सँवर के रोज़ फिर घर से निकलते हैं।।


खटकता है बुजुर्गों को यही इस दौर में "कौशल"।

 नई पीढ़ी के ठंडी रेत पर भी पाँव जलते हैं।।

*   *   *   *   *   *   *   *   *

--किशोर कुमार कौशल 

   मो0- 98998 31002

शुक्रवार, 29 मार्च 2024

हरिवंश रॉय बच्चन और उनका साहित्य


प्रस्तुति - A. न कॉलेज. पटना (मगध विश्वविद्यालय )


 रात आधी, खींच कर मेरी हथेली 

एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।


फ़ासला था कुछ हमारे बिस्तरों में

और चारों ओर दुनिया सो रही थी,

तारिकाएँ ही गगन की जानती हैं

जो दशा दिल की तुम्हारे हो रही थी,

मैं तुम्हारे पास होकर दूर तुमसे

अधजगा-सा और अधसोया हुआ सा,


रात आधी खींच कर मेरी हथेली

एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।


एक बिजली छू गई, सहसा जगा मैं,

कृष्णपक्षी चाँद निकला था गगन में,

इस तरह करवट पड़ी थी तुम कि आँसू

बह रहे थे इस नयन से उस नयन में,

मैं लगा दूँ आग इस संसार में है

प्यार जिसमें इस तरह असमर्थ कातर,

जानती हो, उस समय क्या कर गुज़रने

के लिए था कर दिया तैयार तुमने!


रात आधी, खींच कर मेरी हथेली 

एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।


प्रात ही की ओर को है रात चलती

औ’ उजाले में अंधेरा डूब जाता,

मंच ही पूरा बदलता कौन ऐसी,

खूबियों के साथ परदे को उठाता,

एक चेहरा-सा लगा तुमने लिया था,

और मैंने था उतारा एक चेहरा,

वो निशा का स्वप्न मेरा था कि अपने पर

ग़ज़ब का था किया अधिकार तुमने।


रात आधी, खींच कर मेरी हथेली 

एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।


और उतने फ़ासले पर आज तक सौ

यत्न करके भी न आये फिर कभी हम,

फिर न आया वक्त वैसा, फिर न मौका

उस तरह का, फिर न लौटा चाँद निर्मम,

और अपनी वेदना मैं क्या बताऊँ,

क्या नहीं ये पंक्तियाँ खुद बोलती हैं--

बुझ नहीं पाया अभी तक उस समय जो

रख दिया था हाथ पर अंगार तुमने।


रात आधी, खींच कर मेरी हथेली 

एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।


~ हरिवंश राय बच्चन


आज, मॉं हिंदी की वीणा को अपनी सरल व सरस शैली द्वारा झंकृत करके कविता को जन-जन के कंठ तक पहुँचाने वाले समर्थ गीत-ऋषि तथा मधुशाला व निशा-निमंत्रण जैसी अमर काव्य-कृतियों के रचनाकार स्व हरिवंश राय 'बच्चन' जी का जन्मदिन है। अपनी सम्मोहक कविताओं के जरिए खड़ी बोली की कविता को लोक-रूचि का केन्द्र बनाने वाले स्व. हरिवंश राय बच्चन जी को जन्मदिन पर कृतज्ञ प्रणाम। 🙏🏻🙏🏻

प्रभा वर्मा और केरल साहित्य हिंदी और मीडिया में योगदान

 प्रस्तुति - केरल यूनिवर्सिटी

 (हिंदी विभाग)


कवि, साहित्यकार, गीतकार प्रभा वर्मा,  पारंपरिक मीडिया के साथ साथ इलेक्ट्रॉनिक  मीडिया में काम करने वाले मीडियाकर्मी तथा एक सांस्कृतिक कार्यकर्ता के रूप में प्रसिद्ध हैं । वे समकालीन मलयालम साहित्य के महत्वपूर्ण स्वारों में से एक हैं। उनकी कविताएं परंपरा एवं आधुनिकता का समुचित समागम प्रस्तुत करती हैं। उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में परास्नातक और विधि संबंधी उपाधि प्राप्त की है। मलयालम और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं में समान रूप से अधिकार रखने वाले इस द्विभाषिक साहित्यकार ने इस वर्ष अपने सृजनात्मक लेखन के पचास वर्ष पूर्ण किए हैं। ऐतिहासिक पंपा नदी के तट पर बसे तिरुवल नामक कस्बे में उनका जन्म सन् १९५९ में हुआ था। उनकी कविताएं अपने कोमल रोमानी भावों, काव्य बिंबों के एक विशिष्ट संगुम्फन, मौलिक और रचनात्मक अख्यान की क्षमता, दार्शनिक अन्तर्दृष्टि और जीवन के व्यापक अर्थों की एक गहरी समझ के लिए सुविख्यात हैं । उनकी काव्य प्रज्ञा अनुभववाद और प्रयोगवाद का एक अद्भुत सामंजस्य प्रकट करती है। अपने सांस्कृतिक विरासत में व्याप्त सूक्ष्म यथार्थ को आत्मसात् करते हुए वह ऐसी आधुनिक संवेदना को जन्म देते हैं जो न केवल समकालीन पीढ़ी बल्कि आने वाले कल के लिए भी उतनी ही प्रेरणादायी है।


उनके साहित्यिक योगदान में तीस से अधिक पुस्तकें शामिल हैं, जिसके अंतर्गत लगभग दर्जन भर कविता संग्रह, तीन काव्यात्मक उपन्यास, समकालीन  सामाजिक राजनैतिक परिवेश और साहित्य पर आठ पुस्तकें, सात आलोचनात्मक निबंध संग्रह, मीडिया संबंधित एक विश्लेषणात्मक पुस्तक, एक अंग्रेजी उपन्यास,  एक संस्मरण और एक यात्रा वृतांत आते हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने एक मलयालम उपन्यास और प्रसिद्ध शास्त्रीय संगीतकार शादकला गोविंदा मरार के जीवन पर आधारित शादकलम नामक एक पटकथा भी लिखी है। 


उनकी प्रसिद्ध रचनायें, मुख्यतः काव्याखिकाओं में  ‘श्यामामाधवम’ (सांवले भगवान का विलाप), कनल चिलंब (अग्नि पायल) और रौद्र सातविकम आदि को गिना जा सकता है। ‘श्यामामाधवम’ पंद्रह अध्यायों वाली ऐसी पुस्तक है जो भगवान कृष्ण के पृथ्वी पर  अवतरित जीवन में आये पात्रों पर आधारित पुनर्रचना है। कनल चिलंब सात अध्यायों में प्रेम, वासना, शक्ति, कौतूहल, प्रतिशोध और व्यभिचार की कथा है। 


उनका पुरस्कृत छंदबध उपन्यास रौद्र सातविकम राजनीति और सत्ता, व्यक्ति और राज्य, कला और शक्ति के संबंधों में व्याप्त अंतर्विरोधों की एक विशिष्ट शैली में विश्लेषण करता है । यह किताब काल और गति की अवधारणा से परे धर्म और धर्मिकताओं को पुनर्व्याख्यायिक करता है।प्रत्येक व्यक्ति धर्म की अवधारणा से अवगत है  लेकिन वह इसका अभ्यास करने में विफल रहता है। प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि अधर्म क्या है...फिर भी वह इससे विरक्त नहीं रहता। 


इस पुस्तक में धर्म संबंधी इस विरोधभास की दार्शनिक, रचनात्मक व्याख्या के साथ इस विषय में अन्य दूरदर्शी आयामों को अभिव्यक्त किया गया है। संक्षेप में रौद्र सातविकम अपने महाकाव्यात्मक स्वरूप में एक आधुनिक महाकाव्य है। रौद्र और सात्विकम  जैसे  विरोधी पर्याय वाले  दो संस्कृत शब्दों से गढ़े गये  इस शीर्षक का सामान्य अनुवाद सतोगुणी क्रोध के तौर पर किया जा सकता है।

हर व्यक्ति जीवन की उतार चढ़ाव वाली परिस्थितियों के मध्य जूझते हुए जिन दो विरोधाभासी भावों का किसी न किसी समय अनुभव करता है, उनके रचनात्मक समेकन द्वारा गठित इस नए शब्द से लेखक की काव्य प्रज्ञा लक्षित की जा सकती है। प्रभा वर्मा कहते हैं कि “बरसे बिना बादल, खिले बिना कली और रोदन बिना वेदनामय हृदय के पास अन्य कोई विकल्प नहीं बचता है, कविता भी इसी तरह जन्म लेती है।”

प्रभा वर्मा को सत्तर से अधिक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है, जिसमें राष्ट्रीय साहित्य अकादमी सम्मान, रजत कमल राष्ट्रीय फिल्म सम्मान, केरल साहित्य अकादमी सम्मान, केरल संगीत नाटक अकादमी सम्मान, केरल राजकीय फिल्म सम्मान, वायलार सम्मान, पद्मप्रभा पुरुष्कार इत्यादि सम्मिलित हैं। उन्होंने मोहिनीअट्टम और भरतनाट्यम के लिए दर्जनों कार्नाटिक संगीत कृतियों, भजनों, और पद्मों को शब्दबध कर शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में अपना महान योगदान दिया है। 

वर्तमान में वह केरल के मुख्यमंत्री के मीडिया सचिव के रूप में कार्यरत हैं।

शुक्रवार, 15 मार्च 2024

साहिर लुधियानवी ,जावेद अख्तर और 200 रूपये

 एक दौर था.. जब जावेद अख़्तर के दिन मुश्किल में गुज़र रहे थे ।  ऐसे में उन्होंने साहिर से मदद लेने का फैसला किया। फोन किया और वक़्त लेकर उनसे मुलाकात के लिए पहुंचे।

उस दिन साहिर ने जावेद के चेहरे पर उदासी देखी और कहा, “आओ नौजवान, क्या हाल हैं, उदास हो?” 

जावेद ने बताया कि दिन मुश्किल चल रहे हैं, पैसे खत्म होने वाले हैं.. 

उन्होंने साहिर से कहा कि अगर वो उन्हें कहीं काम दिला दें तो बहुत एहसान होगा।


जावेद अख़्तर बताते हैं कि साहिर साहब की एक अजीब आदत थी, वो जब परेशान होते थे तो पैंट की पिछली जेब से छोटी सी कंघी निकलकर बालों पर फिराने लगते थे। जब मन में कुछ उलझा होता था तो बाल सुलझाने लगते थे। उस वक्त भी उन्होंने वही किया। कुछ देर तक सोचते रहे फिर अपने उसी जाने-पहचाने अंदाज़ में बोले, “ज़रूर नौजवान, फ़कीर देखेगा क्या कर सकता है”।


फिर पास रखी मेज़ की तरफ इशारा करके कहा, “हमने भी बुरे दिन देखें हैं नौजवान, फिलहाल ये ले लो, देखते हैं क्या हो सकता है”, जावेद अख़्तर ने देखा तो मेज़ पर दो सौ रुपए रखे हुए थे।


वो चाहते तो पैसे मेरे हाथ पर भी रख सकते थे, लेकिन ये उस आदमी की सेंसिटिविटी थी कि उसे लगा कि कहीं मुझे बुरा न लग जाए। ये उस शख़्स का मयार था कि पैसे देते वक़्त भी वो मुझसे नज़र नहीं मिला रहा था।

 

साहिर के साथ अब उनका उठना बैठना बढ़ गया था क्योंकि त्रिशूल, दीवार और काला पत्थर जैसी फिल्मों में कहानी सलीम-जावेद की थी तो गाने साहिर साहब के। 

अक्सर वो लोग साथ बैठते और कहानी, गाने, डायलॉग्स वगैरह पर चर्चा करते। इस दौरान जावेद अक्सर शरारत में साहिर से कहते, “साहिर साब, आपके वो दौ सौ रुपए मेरे पास हैं, दे भी सकता हूं लेकिन दूंगा नहीं”, साहिर मुस्कुराते। साथ बैठे लोग जब उनसे पूछते कि कौन से दो सौ रुपए तो साहिर कहते, “इन्हीं से पूछिए”, ये सिलसिला लंबा चलता रहा। 

साहिर और जावेद अख़्तर की मुलाकातें होती रहीं, अदबी महफिलें होती रहीं, वक़्त गुज़रता रहा।


और फिर एक लंबे अर्से के बाद तारीख़ आई #25अक्टूबर 1980की। वो देर शाम का वक्त था, जब जावेद साहब के पास साहिर के फैमिली डॉक्टर, डॉ कपूर का कॉल आया। उनकी आवाज़ में हड़बड़ाहट और दर्द दोनों था। उन्होंने बताया कि साहिर लुधियानवी नहीं रहे। हार्ट अटैक हुआ था। जावेद अख़्तर के लिए ये सुनना आसान नहीं था।


वो जितनी जल्दी हो सकता था, उनके घर पहुंचे तो देखा कि उर्दू शायरी का सबसे करिश्माई सितारा एक सफेद चादर में लिपटा हुआ था। वो बताते हैं कि वहां उनकी दोनों बहनों के अलावा बी आर चोपड़ा समेत फिल्म इंडस्ट्री के भी तमाम लोग मौजूद थे।


मैं उनके करीब गया तो मेरे हाथ कांप रहे थे, मैंने चादर हटाई तो उनके दोनों हाथ उनके सीने पर रखे हुए थे, मेरी आंखों के सामने वो वक़्त घूमने लगा जब मैं शुरुआती दिनों में उनसे मुलाकात करता था, मैंने उनकी हथेलियों को छुआ और महसूस किया कि ये वही हाथ हैं जिनसे इतने खूबसूरत गीत लिखे गए हैं लेकिन अब वो ठंडे पड़ चुके थे।


जूहू क़ब्रिस्तान में साहिर को दफनाने का इंतज़ाम किया गया। वो सुबह-सुबह का वक़्त था, रातभर के इंतज़ार के बाद साहिर को सुबह सुपर्दे ख़ाक किया जाना था। ये वही क़ब्रिस्तान है जिसमें मोहम्मद रफी, मजरूह सुल्तानपुरी, मधुबाला और तलत महमूद की क़ब्रें हैं। 

साहिर को पूरे मुस्लिम रस्म-ओ-रवायत के साथ दफ़्न किया गया। साथ आए तमाम लोग कुछ देर के बाद वापस लौट गए, लेकिन जावेद अख़्तर काफी देर तक क़ब्र के पास ही बैठे रहे।


काफी देर तक बैठने के बाद जावेद अख़्तर उठे और नम आंखों से वापस जाने लगे। वो जूहू क़ब्रिस्तान से बाहर निकले और सामने खड़ी अपनी कार में बैठने ही वाले थे कि उन्हें किसी ने आवाज़ दी। जावेद अख्तर ने पलट कर देखा तो साहिर साहब के एक दोस्त अशफाक़ साहब थे।


अशफाक़ उस वक्त की एक बेहतरीन राइटर वाहिदा तबस्सुम के शौहर थे, जिन्हें साहिर से काफी लगाव था। अशफ़ाक हड़बड़ाए हुए चले आ रहे थे, उन्होंने नाइट सूट पहन रखा था, शायद उन्हें सुबह-सुबह ही ख़बर मिली थी और वो वैसे ही घर से निकल आए थे। उन्होंने आते ही जावेद साहब से कहा, “आपके पास कुछ पैसे पड़े हैं क्या? 

वो क़ब्र बनाने वाले को देने हैं, मैं तो जल्दबाज़ी में ऐसे ही आ गया”, जावेद साहब ने अपना बटुआ निकालते हुआ पूछा, “हां-हां, कितने रुपए देने हैं’, उन्होंने कहा, “दो सौ रुपए"...!!

तारीफ की सजा??

  ❤️*राजा की प्रंशंसा*❤️ प्रस्तुति -:उषा रानी & राजेंद्र प्रसाद सिन्हा  एक बार एक राजा के दरबार में एक कवि आया ! कवि  अत्यंत  गुणी और प्...