शनिवार, 3 दिसंबर 2022

प्रेम जनमेजय होने का मतलब /

 


मैं अगस्त 1978 की एक सुबह पांच बजे दिल्ली के अंतर्राज्यीय बस अड्डे पर उतरा था, किसी परम अज्ञानी की तरह, राजधानी में पहली बार,वह भी एकदम अकेले,बाइस साल की उम्र में। मुझे उसी दिन हिंदी के सबसे बड़े प्रकाशन संस्थान राजकमल में नौकरी ज्वाइन करनी थी। साढ़े आठ बजे तक का समय इधर उधर भटक कर मैं अपने भारी बैग के साथ पौने नौ बजे राजकमल पहुंच गया। लंबी प्रक्रिया में नहीं जाते हैं।उसी दिन से मेरी नौकरी शुरू हो गई और रहने के लिए राजकमल का गेस्ट हाउस मिल गया, जहां आज राजकमल का दफ्तर है। दोपहर के समय बीच बीच में मैं दस, दरियागंज जाया करता था, अपने इकलौते परिचित, सुरेश उनियाल से मिलने के लिए,जो सारिका जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका में काम करते थे। एक दिन मुझे सुरेश ने चित्रकार कवि हरिप्रकाश त्यागी से मिलवाया, मुझे त्यागी का साथ इतना भाया कि हम बार बार मिलने लगे। एक दिन त्यागी राजकमल आया तो उसके हाथ में एक किताब झूल रही थी-- शीर्षक पढ़ते ही मेरी हंसी छूट गई। क्या हुआ,त्यागी ने पूछा। मैंने कहा,जिस दिन मैं दिल्ली आया, मेरी हालत इस किताब के शीर्षक जैसी थी। त्यागी भी हंसने लगा। फिर त्यागी वह किताब मेरी मेज पर यह कहते छोड़ गया- रख ले।यह दिल्ली में मेरे अपनी मिल्कियत वाली पहली किताब थी।

  दोस्तों, इतनी लंबी भूमिका इसलिए कि उस किताब का नाम था- राजधानी में गंवार।लेखक थे प्रेम जनमेजय।यह जानकारी यकीनन प्रेम जनमेजय को भी नहीं होगी।बाद में त्यागी ने या शायद सुरेश ने ही मुझे प्रेम जनमेजय से मिलवाया और हम दोस्त बन गए।तब तक साहित्य में व्यंग्य का महत्व मैं समझ चुका था। राजकमल में रहते हुए हरिशंकर परसाई,शरद जोशी और श्रीलाल शुक्ल को न सिर्फ पढ़ चुका था बल्कि बेच भी रहा था। उसके बाद 1982 में बेशर्म मेव जयते और 1986 में पुलिस पुलिस नामक किताबें मैंने पढ़ीं।1990 में मैंने दिल्ली छोड़ दिया और मुंबई आ गया। लेकिन दिल्ली छोड़ने से पहले मैं यह धारणा बना चुका था की परसाई जी और शरद जी के बाद व्यंग्य की दुनिया में प्रेम जनमेजय का सिक्का चलने वाला है। और कालांतर में यह धारणा पुष्ट भी हुई।आज अपने उन आरंभिक दिनों के दोस्त की शिनाख्त जैसी भारी भरकम किताब मेरी गवाही में खड़ी है और मैं गर्व से हंस रहा हूं और भावुकता में बह कर रो भी रहा हूं। बहुत खुश हूं मैं।प्रकाशकीय सीमा है वरना तो इस दोस्त की शख्सियत के आकलन के लिए ऐसे चार खंड भी कम हैं।अब आते हैं इस महत्वपूर्ण किताब पर जो शोधकर्ताओं के लिए किसी लाटरी लगने से कम नहीं है।किस किस दिग्गज ने नहीं लिखा है इसमें?

यह किताब खुलती है वरिष्ठ आलोचक और लेखक तरसेम गुजराल के संपादकीय से- प्रेम जनमेजय को क्यों पढ़ा जाए।इस महत्वपूर्ण और विचारवान संपादकीय में तरसेम जी ने प्रेम के विविधरंगी रचना संसार की विस्तृत जानकारी देने के साथ ही यह भी सिद्ध किया है कि प्रेम जनमेजय होने का क्या मतलब है? इसके बाद करीब 75 वरिष्ठ, कनिष्ठ, समकालीन लेखकों ने प्रेम जनमेजय की रचनात्मक यात्रा और योगदान का विश्लेषण किया है। कुछ खास लेखकों में शामिल हैं-- नरेंद्र कोहली,रामदरश मिश्र, निर्मला जैन, ममता कालिया, चित्रा मुद्गल,सूर्यबाला,कमल किशोर गोयनका,शंकर पुणतांबेकर, कन्हैयालाल नंदन,नासिरा शर्मा, ज्ञान चतुर्वेदी, जगदीश चतुर्वेदी,हरीश नवल,सुधीश पचौरी,रमेश उपाध्याय,अजय नावरिया,अशोक चक्रधर,दिविक रमेश,सूरज प्रकाश,महेश दर्पण और अनंत विजय।सब लेखकों का नाम लेना संभव नहीं लेकिन जो भी हैं महत्वपूर्ण हैं। प्रेम के बारह बहुचर्चित व्यंग्य किताब को रचनात्मक चेहरा भी प्रदान करते हैं।प्रेम द्वारा संपादित पत्रिका व्यंग्य यात्रा पर कमलेश्वर, विष्णु प्रभाकर, श्रीलाल शुक्ल, डाक्टर कमला प्रसाद, डाक्टर विजय बहादुर सिंह जैसे दिग्गजों की टिप्पणी किताब को नये मायने देती हैं।

  दोस्तों,यह समीक्षा नहीं है।यह एक महत्वपूर्ण ग्रंथ का परिचय भर है। फेसबुक पर परिचय ही देना ठीक है।अब किताब मंगाना पढ़ना शुरू होता है आपके पाले में।





मधुबाला

 कवि और जनता का संबंध स्वस्थ काव्य के सृजन के लिए अत्यंत आवश्यक है।यह संबंध तभी बना रह सकता है जब कवि आत्मविश्वासी हो और उसे जनता की सुरुचि में आस्था हो।जहाँ इसका अभाव है वहाँ तरह-तरह के विकार उत्पन्न हो जाते हैं- आप मेरी भूमिका लिख दीजिए, आप मेरी रचना पर सम्मति दे दीजिए, आप मेरी समालोचना कर दीजिए;कविताएँ तो मैंने उच्च कोटि की लिखीं पर जनता में उसे समझने की बुद्धि ही नहीं है, मुझे समझनेवाली जनता का अभी जन्म ही नहीं हुआ है, मुझे तो लोग दो सौ बरस बाद समझेंगे, मेरी कविता इतनी मौलिक है कि उसे परखने के लिए एक विशेष वर्ग का पाठक चाहिए आदि, आदि।इसका सबसे विकृत रूप आज ऐसे अनेक कवियों में देखा जाता है जिनके पाठक तो हैं तीन पर समालोचक तेरह।उनकी कविताओं की चर्चा निर्जीव स्याही से मुर्दा काग़ज़ों पर तो बहुत होती है पर सजीव धड़कते हुए हृदय से उनकी प्रतिध्वनियाँ नहीं आतीं।.....प्रजातंत्र की स्वतंत्रता साहित्य के राज्य का अपेल सिद्धांत है।वहाँ न तानाशाही चलती है और न गुरुडम चलता है।

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 डॉ. हरिवंशराय बच्चन

('मधुबाला' के आठवें संस्करण की भूमिका से)

शैलप्रिया जी के लिए संबोधन के कुछ शब्द.......।

 (ज़िन्दगी में साथ चलते लोग जब अचानक अलविदा कहते हैं तो वह जगह हमेशा के लिए खाली हो जाती है। 28 साल पहले​ वह हादसा हुआ था जब सिर्फ 48 साल की उम्र में वे हमसब से बहुत दूर चली गयीं।  इसी सन्नाटे के बीच रहते हुए शैलप्रिया जी के लिए संबोधन के कुछ शब्द।) 


ओ मेरी तुम!

नींद और अवसाद में बीते हैं ये अकेले दिन।

ये दिन 

जिनके उजाले प्रतिपल मद्धिम हुए हैं।

उस रात अस्फुट अलविदा में

कांपे थे जो होंठ और हाथ, 

वे अब पिघलती पुतलियों के हमराज हैं।


एक दिन चावल के नियति-पिंड  पर

काले तिलों से लिखा था

आधी कविता का अधूरा पत्र। 

क्या सहज है पुरखों की कतार में

दिवंगत प्रिया की प्रतिष्ठा ?

और उसके लिए भरे-मरे मन से

अन्तिम बिदाई में

कर्मकांड की सनातनी क्रिया ?


आज यादों की वेदी पर

आंसुओं के फूल मुरझा चुके हैं,

मजार पर जलती मोमबत्तियां

धुएं में घुट रही हैं,

ऐसे में सिर्फ नीम बेहोशी की चाह

सुकून देती है।

ओ मेरी तुम!

मनोमंथन की यात्राएं

अजनबी पड़ावों से लौट कर

देह-घाटी में थम जाती हैं।

हरकत का इकतारा बजता है

जब यह भीतर का सन्नाटा

बाहरी कोलाहल से टकराता है।

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 Vidya bhushn  



अनूठा है ‘साउथ-ईस्ट एशिया रामायण रिसर्च सेंटर’


जब भी असम जाती हूं तो कोशिश होती है कि एक बार डा. इंदिरा गोस्वामी जी के घर जरूर जाऊं और साउथ-ईस्ट एशिया रामायण रिसर्च सेंटर में अध्ययनरत शोध छात्रों और उनके परिजनों से उनकी अन्य किताबों के बारे में और अधिक जान सकूं। पिछले वर्ष आज के ही दिन में वहां गई थी। गुवाहाटी जाती हूं तो मां कामाख्या, जाने-माने समाजसेवी हेमभाई जी के आश्रम, वरिष्ठ पत्रकार रविशंकर रवि और मामोनी बाइदौ के अलावा मेरे कुछ अनन्य मित्रों से जरूर मिलती हूं। इस बार काफी कष्ट में थी क्योंकि 3-4 दिन पहले नगांव, असम में मेरा एक बड़ा एक्सीडेंट हो गया था। ‘बड़ा’ इसलिए कहा कि उसके पहले याद नहीं पड़ता, कभी चक्कर आया हो या इतनी अधिक चोटें एक साथ आईं हो और रोकर किसी अपने को बताऊं, ऐसा कोई नहीं था वहां। क्योंकि मैं तो सोलो ट्रैवलर की तरह नागालैंड और असम की यात्रा पर निकली थी। खैर, न्यूज-18 में कार्यरत मेरे बंधु नीलोत्पल बोरा के घर रुकी| उन्होंने, उनकी पत्नी और मेरी मित्र सुजाता, उनकी माता जी आदि ने मेरा बहुत बहुत ख्याल रखा। इसके लिए मैं उनकी ताउम्र आभारी रहूंगी।  🙏🙏

#mamtasinghmedia  Nilutpal Z Borah Ravishankar Ravi Sujata Pujari Borah Minu Borah

आ: धरती कितना देती है' ....???/ ममता सिंह



सुमित्रानंदन पंत की गिनती ऐसे लेखकों में की जाती है, जिनका प्रकृति का चित्रण समकालीन कवियों में सर्वश्रेष्ठ था। आधुनिक काव्य की भूमिका में सुमित्रानंदन पंत जी लिखते हैं कि ’’कविता करने की प्रेरणा मुझे सबसे पहले प्रकृति निरीक्षण से मिली है, जिसका श्रेय मेरी जन्मभूमि प्रदेश को है। मैं घण्टों एकांत में बैठा प्राकृतिक दृश्यों को एकटक देखा करता था और कोई अज्ञात आकर्षक मेरे भीतर एक अव्यक्त सौन्दर्य का जाल बुनकर मेरी चेतना को तन्मय कर देता था।’’

पद्मभूषण, साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ जैसे अनगिनत पुरस्कार प्राप्त महान कवि सुमित्रानंदन पंत को हिंदी में ‘वर्ड्सवर्थ’ कहा जाता है। उनके बिना हिंदी साहित्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती। साथ ही, हिमालय की ओट में छिपे कौसानी जैसे छोटे से गांव को अपनी रचनाओं के माध्यम से विश्व मानचित्र पर जगह दिलाने का काम यदि किसी ने किया है तो वो पंत जी ही थे। आज उनकी एक कविता की ये पंक्ति 

'आ : धरती कितना देती है'... अनायास ही मानस पटल को झकझोर कर रख देती है कि वो अपनी लेखनी के माध्यम से इतना कुछ गढ़ गए हैं जो देश के लिए अमूल्य धरोहर हैं लेकिन हमने उन्हें क्या दिया? उनके एक कमरे के मकान जिसे ठीक से सरकार संग्रहालय तक की शक्ल भी नहीं दे पाई। कहने को पहाड़ी शैली में एक स्ट्रक्चर जरूर खड़ा किया गया है लेकिन वह भी महज खानापूर्ति ही है। यानी संग्रहालय के नाम पर सरकार ने उनकी कुछेक चीजों को इकट्ठा करके एक मिनी म्यूजियम तो बना दिया लेकिन उसे संग्रहालय भी नहीं कहा जा सकता। वहां न कोई तख्ती लगी मिली, न कोई जानकार व्यक्ति, जिससे पंत जी के बारे में पर्यटकों को कुछ ठोस जानकारी मिल सके। यानी  जिसने राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रौशन किया हो, उनकी ऐसी बेकद्री देखकर मन बहुत व्यथित हुआ।

कल सुमित्रानंदन पंत जी की पोस्ट डाली, यह अनायास ही नहीं डाली। लिखना कुछ और था जो वहां देखकर समझा, लेकिन सोचा कि क्या लिखूं उस राज्य के बारे में जिसने देश को कई जाने माने कवि और साहित्यकार दिए। जब वहां की सरकारों और बुद्धिजीवियों ने अपने प्रतिष्ठित कवियों और साहित्यकारों की सुध नहीं ली तो हम कौन...हां, इतना जरूर है कि पर्यटकों की के लिए आगामी 19 और 20 नवम्बर को ‘कौसानी महोत्सव’ का आयोजन किया जा रहा है। लेकिन इस दौरान होने वाले कार्यक्रमों में सुमित्रानंदन पंत जी को कितना स्थान मिलेगा, यह देखने वाली बात होगी।  

#mamtasinghmedia @pmoindia @narendramodi #AmritMahotsav @MinOfCultureGoI @pushkardhami @cmo_uttarakhand

रविवार, 27 नवंबर 2022

 प्रखर पत्रकार, तेजस्वी टिप्पणीकार, बेहतरीन कवि और विरल कथाकार

प्रियदर्शन ने कहानी कला के अनेक आयामों की रौशनी में

मेरी कथा यात्रा का बारीक विश्लेषण किया है जिसे पाठकों और मित्रों के साथ साझा करने का मन हो आया है---

 ज़िंदगी को कहानी की तरह लिखते धीरेंद्र अस्थाना

प्रियदर्शन

धीरेंद्र अस्थाना ने 70 के दशक में लिखना शुरू किया। यह वह समय है जब नई कहानी का आंदोलन अपने शिखर पर पहुंच चुका था और उसके कई नायक आधुनिक हिंदी साहित्य में इतिहास पुरुष जैसे हो चुके थे। कमलेश्वर, मोहन राकेश और राजेंद्र यादव की लगभग कुख्यात हो चुकी त्रयी के अलावा निर्मल वर्मा, धर्मवीर भारती, भीष्म साहनी, मन्नू भंडारी और कृष्णा सोबती की कहानियां अलग-अलग ढंग से इसी आंदोलन की कड़ियों की तरह हमारे सामने थीं। ज्ञानरंजन, अमरकांत, दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह, मार्कंडेय, रवींद्र कालिया और धीरेंद्र अस्थाना इसी परंपरा का हिस्सा रहे। इनके लगभग समानांतर या तत्काल बाद उदय प्रकाश, संजीव और शिवमूर्ति जैसे विलक्षण कथाकार हिंदी साहित्य के परिदृश्य पर उभरे।

धीरेंद्र अस्थाना की कहानियों को इस परंपरा के हिस्से के तौर पर पढ़ने का एक मकसद और है। नई कहानी का आंदोलन किसी शून्य से पैदा नहीं हुआ था, वह अपने देशकाल, अपनी परिस्थितियों की निहायत उपज था। आज़ादी के बाद का मोहभंग, गांव से कटकर पहली बार शहरों में बस रहे मध्यवर्ग का मुश्किल होता जीवन, युवाओं के भीतर बढ़ती बेरोज़गारी और हताशा, प्रेम और दांपत्य के नए बनते तनाव- यह सब एक नया यथार्थ बना रहे थे जिसे शायद पुराने शिल्प में देखना और रचना संभव नहीं था। यह एक शुष्क यथार्थ था जिसके हिस्से के पुराने स्वप्न धीरे-धीरे तिरोहित हो रहे थे, जिसके भीतर देश को नए सिरे से गढ़ने और एक बराबरी वाला समाज बनाने की कल्पना लगभग रोज चोट खाती हुई मर रही थी और जिसके भीतर इन सबसे पैदा हुई एक गहरी बेचैनी थी।

अभाव, अनिश्चय, हताशा और बेचैनी के लगभग इसी चौराहे पर हमें धीरेंद्र अस्थाना की कई कहानियां मिलती हैं। लेकिन वे जीवन की छायाप्रति की तरह नहीं मिलतीं। धीरेंद्र अस्थाना इस मायने में अपने समय के कई कथाकारों से भिन्न हैं कि वह किन्ही दी हुई जीवन स्थितियों को, किसी अर्जित अनुभव को जस का तस नहीं रखते, बल्कि उनका लेखकीय हस्तक्षेप उनमें से अपनी कहानी चुनता है। ऐसा लगता है, पूरा जीवन उनके सामने चल रही एक कहानी जैसा है। वे उसमें शामिल भी हैं और उससे विलग भी हैं। ऐसी कहानी लिखना आसान काम नहीं होता। इसमें दो तरह के खतरे बहुत प्रत्यक्ष होते हैं। या तो कहानी बिखर जाती है या फिर वह जीवन की नकली, स्पंदनविहीन प्रति होकर रह जाती है।

लेकिन धीरेंद्र अस्थाना की कहानियां दोनों खतरों के पार जाती हैं- शायद इसलिए कि उन्हें मालूम है कि अंततः उन्हें कहना या बताना क्या है। कई तरह की जटिल स्थितियां रचते हुए वे अंततः कहानी अर्जित कर लेते हैं जो उन्हें कहनी होती है। उनकी पहली ही कहानी 'लोग हाशिए पर' एक जटिल कहानी है। कहानी कम से कम तीन स्तरों पर चलती है। पहले स्तर पर एक प्रेस है जिसमें काम कर रहे कई लेखक बहुत कम पैसे पर- लगभग- शोषण की स्थिति में नौकरी करने को मजबूर हैं। दूसरा स्तर आर्थिक तौर पर कमज़ोर इन लेखकों के परिवारों का है जिनकी ज़िम्मेदारियां पूरी करते या उनके दबाव से भागते-बचते ये लोग शराब के ठेकों की शरण लेते हैं और एक-दूसरे को किसी फुरसत में अपनी परेशानियां, कुंठाएं, कहानियां-कविताएं सब सुनाते हैं। एक अन्य स्तर पर यह कहानी उन मज़दूरों की है जो एक दिन हड़ताल करते हैं और अपना हक़ हासिल करने की कोशिश करते हैं। लगभग कामयाब दिखती इस हड़ताल के खात्मे के बाद मालिक साज़िश करते हैं और हड़ताल का नायक एक क़त्ल के जुर्म में सलाखों के पीछे भेज दिया जाता है। 

पहली नज़र में यह कुछ अतिरिक्त नाटकीय कहानी लग सकती है- जिसे लेखक ने अपनी कल्पना से बुना ही नहीं है, बल्कि अपने स्व को अलग-अलग चरित्रों में बिखेर दिया है। लेकिन कहानी की सफलता इस बात में है कि कथाकार इन तमाम प्रतिकूलताओं के बीच बनने वाले हालात को बिल्कुल ठीक-ठीक पकड़ता है, किसी नक़ली आशावाद की गिरफ़्त में आने की जगह कहानी को उसके यथार्थ तक जाने देता है और उसमें नाटकीयता मिलाते हुए भी उसके पाठ की प्रामाणिकता बनाए रखता है। दरअसल इस काम में धीरेंद्र अस्थाना की मददगार उनकी बहुत जीवंत भाषा भी है- ऐसी भाषा जो बहुत कम शब्दों में स्थितियों और चरित्रों को रच सकने में सक्षम है। यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ऐसी भाषा किसी कौशल या अभ्यास का नतीजा नहीं होती, उस जीवन से जुड़ाव से पैदा होती है जिसको लेखक अपनी कथा में रचने की कोशिश कर रहा होता है। यह जुड़ाव इस कहानी में बना रहता है और इसलिए कहानी अपने पाठकों से जुड़ पाती है। 

धीरेंद्र अस्थाना दरअसल जीवन के समानांतर अपनी कहानियों में एक और जीवन रच रहे होते हैं। क़ायदे से लगभग हर लेखक यही काम करता है, लेकिन सबकी अपनी प्रविधि होती है। कुछ लोग बस जो घटित होता है, उसमें कुछ कल्पना का रसायन मिलाकर, अपने-आप को अदृश्य रखते हुए ऐसी यथार्थवादी कहानियां लिखते हैं जिन्हें पढ़ते हुए लेखक का- या कहानी पढ़ने का- ध्यान नहीं आता। 

मगर धीरेंद्र अस्थाना की प्रविधि दूसरी है। वे एक साथ अपनी कहानियों में इतनी सारी चीज़ें ले आते हैं कि उन्हें जोड़ने के लिए कोई लेखक चाहिए। वे पाठक को यह भूलने नहीं देते कि वह कहानी ही पढ़ रहा है, लेकिन कहानी के तमाम सूत्र अंततः उस जीवन की ओर ले जाते हैं जिसमें उल्लास हो या उदासी, वह अपने पूरे गाढ़े रंग में प्रगट होती है। 

ऐसी ही एक कहानी है ‘भूत।‘ लेखक का एक वर्तमान है जिसमें एक स्त्री भी है जिससे वह प्रेम करता है। लेकिन उसे लगता रहता है कि उसका भूत उसके वर्तमान को खा रहा है। वह चाहता है कि वह अपनी प्रेमिका से यह सब साझा कर सके, लेकिन कर नहीं पाता। दूसरी तरफ़ प्रेमिका लगातार महसूस करती है कि वह एक अजनबी शख़्स के साथ है। वह बार-बार उसे कुरेदने की कोशिश करती है, लेकिन वह अपने खोल से बाहर नहीं आता। यह स्थिति उसे दफ़्तर में भी अजनबी और अकेला करती जाती है। जब वह पीछे मुड़कर और पलट कर देखता है तो पाठक के सामने एक सिहरा देने वाला यथार्थ सामने आता है। बरसों पहले वह पिता की मौत के बाद अपनी मां की उम्मीद की तरह घर से निकला था- लेकिन कहां और क्यों रास्ते में छूट गया और इस अधूरी रह गई वापसी ने कैसे उसे वर्तमान का प्रेत बना डाला है, इसकी लगभग स्तब्ध कर देने वाली कहानी हमारे सामने आती है। 

ध्यान से देखें तो धीरेंद्र अस्थाना की कहानियां जीवन के कई आयामों के बीच आवाजाही करती हैं। एक तरफ़ वह समाज और व्यवस्था है जिससे उनके मध्यवर्गीय चरित्र टकराते रहते हैं- कभी हारते और कभी जीतते भी हैं, लेकिन अंततः उनकी कहानी इस अन्यायपूर्ण और अमानवीय व्यवस्था और इसे बदलने की ज़रूरत को कुछ रेखांकित करती हुई किसी अंत तक पहुंचती है। एक आयाम उस परिवार का है जिसमें बेबस पिता हैं, कातर मां हैं, भाई और बहनें हैं। कहीं पिता से टकराता, कहीं उनसे पिटता और कहीं उनको याद करता नायक है, कहीं मां की अपेक्षाओं पर खरा न उतरने की कचोट का मारा कथावाचक हैं, कहीं भाई को तलाश रहा एक स्तब्ध शख़्स है जिसे पता है कि बहुत सारी मजबूरियों को मिलाकर बने यथार्थ ने उसे लगभग पीस डाला है। एक आयाम प्रेम और घर से जुड़ा है जहां रिश्ते दरकते हैं, एक-दूसरे को सहारा देते हैं और फिर एक-दूसरे को नए सिरे से पहचानने की कोशिश करते हैं। 

इन्हीं कहानियों के बीच एक स्तब्ध कर देने वाली कहानी ‘चीख’ है। कथावाचक का मानसिक तौर पर दुर्बल भाई घर से चला गया है, घर उसकी तलाश में जुटा है, पच्चीस दिन बाद अचानक वह लौट आता है। लेकिन वह यह बता पाने में असमर्थ है कि इन पच्चीस दिनों में वह कहां रहा, किनके आसरे रहा। बस एक दिन बता पाता है कि उसे मां की चीख सुनाई पड़ी थी और वह लौट आया था। 

ऐसी ही एक बहुत जटिल कहानी ‘जन्मभूमि’ है। लेखक कहानी के शुरू में ही यह ‘डिस्क्लेमर’ डाल देता है कि यह सुसंगत घटनाक्रमों के बीच बनी कहानी नहीं है- इसे वह ‘ऐंटी स्टोरी’- प्रति कहानी- कहता है। यह कहानी भी बहुत नाटकीय ढंग से शुरू होती है- लेखक का इसरार है कि पाठक किसी मंच की कल्पना करें जिसमें एक दृश्य घटित हो रहा है। इस दृश्य में अरसे बाद बेटे के सामने आया पिता उसे गद्दार कहता है। आने वाले दिनों में पार्टी के कॉमरेड उसे डरपोक कहते हैं क्योंकि वह कहता है कि वह राजनीतिक मोर्चे से ज़्यादा साहित्यिक मोर्चे पर उपयुक्त है। वह शराब के ठेके पर अपने दोस्त के साथ बैठता है, वहां से पिट कर दोस्त के साथ ही किसी अनजान लड़की के घर पहुंचता है। उसे अपनी पत्नी याद आती है और उसका दुख याद आता है कि वह उसे समझने की कोशिश नहीं करता। 

दरअसल यह कई दृश्यों को मिलाकर बुनी गई कहानी है। किसी फिल्म की तरह ये सारे दृश्य साथ चल रहे होते हैं। एक दृश्य पत्नी का है, एक दृश्य कथावाचक की रंगकर्मी दोस्त अनुराधा कुलकर्णी का है और एक दृश्य उसके अकेलेपन का भी है। ये सारे दृश्य मिलकर एक बड़ा दृश्य बनाते हैं- अभाव और संकट की मारी दुनिया में एक संवेदनशील-चरित्र के लगातार पिटने, रोने और पलायनोन्मुख होने का। लेकिन यह इस निरे अर्थ में पलायन नहीं है कि इसमें सोचने का तत्व बाक़ी है, प्रतिरोध और गुस्सा बाक़ी है और यह खयाल और सवाल बाक़ी है कि ‘एक अकेला आदमी बावजूद सकारात्मक सोच और तमन्नाओं के अंततः ग़लत क्यों साबित होता है, होता चला जाता है?’

यहीं यह खयाल आता है कि क्या धीरेंद्र अस्थाना की कहानियां विफल कथानायकों की कहानियां हैं? उनके हिस्से का प्रेम अधूरा रहता है, उनका परिवार उनसे असंतुष्ट रहता है, ज़िंदगी उनसे सधती नहीं, क्रांति उनसे होती नहीं। वे अकेले पड़ जाने को अभिशप्त चरित्र हैं। लेकिन क्या यह विफलता उनके भीतर मौजूद किसी ‘फेटल फ्लॉ’- किसी सांघातिक कमज़ोरी की है- शेक्सपियर के महान चरित्रों की तरह जो एक मोड़ पर जानलेवा साबित होती है? या इसका वास्ता उस दुर्निवार और दुर्विराट होती व्यवस्था से है जिसमें किसी भी संवेदनशील आदमी के लिए या तो यांत्रिक बन कर जीना संभव है या फिर घुट-घुट कर मरना संभव है? दरअसल यह सवाल धीरेंद्र अस्थाना की कहानियों का मर्म समझने की एक कुंजी दे सकता है। धीरेंद्र अस्थाना की ये कहानियां अच्छी क्यों लगती हैं? क्योंकि वे अपनी अंतर्वेदना में सिर्फ़ निजी छटपटाहट की कहानियां नहीं हैं, वे एक सार्वजनिक विडंबना की भी कहानियां हैं जिन्होंने मनुष्य को मनुष्य नहीं रहने दिया है। 

‘नींद के बाहर’ वह कहानी है जिसमें धीरेंद्र अस्थाना का कथा-वैभव अपने पूरे निखार के साथ दिखाई पड़ता है। एक बड़े कंपनी के बड़े अधिकारी की नौकरी छूटने के बाद उसकी दुनिया बदल जाती है। लेकिन यह नौकरी छूटने के साथ लोगों की नज़र बदल जाने की सपाट कहानी नहीं है। उल्टे उस अधिकारी को लगता है कि वह जब तक नौकरी में था तब तक एक गहरी नींद में था जिसमें दुनिया और उसका सच उसके सामने से ओझल थे। नौकरी छूटने के साथ वह नींद से बाहर आ गया है। बेशक, इसमें बदली हुई निगाहें भी हैं, दोस्तों द्वारा उसका फोन न उठाने की दास्तानें भी हैं, पास-पड़ोस से उसका नया बनता संबंध भी है, लेकिन इन सबके बावजूद यह निजी दुख या पीड़ा की कहानी नहीं है। यह इस नए बनते चमकदार भारत में लगातार असुरक्षित होते जाते लोगों और उनकी ज़िंदगियों में फैलते अंधेरे की भी कहानी है- जो बहुत बारीक़ी से लिखी गई है और जिसके बहुत सारे स्तर हमें बांधे रखते हैं। 

इसी तरह एक और कहानी है- ‘पिता’। यहां पिता और पुत्र एक-दूसरे से जुड़े हुए भी हैं और कटे हुए भी- उनमें एक आत्मीय पारस्परिकता है, लेकिन वैसी भावुक निर्भरता नहीं जो पुराने पिताओं-पुत्रों में उनकी संवादहीनता के बावजूद देखी जाती है- एक-दूसरे पर दबाव बनाने या एक दूसरे के दबाव से मुक्त होने की कोशिश तो कतई नहीं। कोई हठी आलोचक पढ़ना चाहे तो इसमें टूटती-बिखरती

पारिवारिकता के सूत्र भी पढ़ सकता है। बेशक, वे सूत्र यहां हैं, लेकिन इन चरित्रों या इस कहानी की वजह से नहीं, बल्कि उस सहज माहौल की वजह से जो वक़्त बदलने के साथ बदल गया है। हां, इस बदले हुए माहौल में, एक निष्ठुर अकेलापन है जो सिर्फ इस वजह से नहीं है कि मां-पिता कहीं दूर हैं और बेटा अकेले है, बल्कि इस वजह से भी है कि अपनी स्वतंत्रता की कामना की, जीवन को अपने ढंग से जीने की ज़िद की, एक क़ीमत यह अकेलापन भी है। इसी अकेलेपन ने राहुल को भी बनाया है और मनचाही शादी और परिवार के बावजूद अंततः अकेला छोड़ दिया और यही अकेलापन विकास को भी बना रहा है।

कहानी का अंत काफी महत्वपूर्ण है। धीरेंद्र अस्थाना चाहते तो इसे आसानी से पिता की मर्जी की कहानी

बना सकते थे। बेटे की छूटी हुई नौकरी दुबारा लग गई है, वह कलाकार के रूप में स्थापित है, अब एक

घर है जहां से वह जुड़ा रहे तो पिता और परिवार से बंधा रहेगा। लेकिन अपने बेटे की उपलब्धि पर खुश

पिता फिर भी उसे यह आश्रय नहीं देता। राहुल दिल्ली की फ्लाइट वापस पकड़ने के लिए निकलने से पहले विकास से पूछता है, वह रहेगा कहां। विकास के जवाब में एक बेफिक्री है और राहुल उसे अपने हिस्से का आसमान या अपने हिस्से की छत बनाने के लिए (बिना यह कहे) छोड़ जाता है। यह एक जटिल अंत है- एक हूक भी पैदा करता है जो देर तक बनी रहती है। लेकिन शायद यही तार्किक है।

विकास को बांधे रखना होता तो राहुल शुरू से बांधे रखता- इस आख़िरी मोड़ पर वह उसे क्यों बांधे।

इस कहानी की कई ख़ासियतें हैं। यह अपने समय से बंधी- उसकी ताल में निबद्ध- कहानी है। यहां

छूटते हुए घर हैं, छूटती हुई नौकरियां हैं, नौजवान बेफ़िक्री है, बहुत हल्के से दीखता, लेकिन बदलता हुआ हिंदुस्तान है- और खालिस इक्कीसवीं सदी का वह द्वंद्व है जो अपने रिश्तों को लेकर हमारे भीतर

मौजूद है।

धीरेंद्र अस्थाना का लेखन संसार बहुत बड़ा और विपुल है। लेकिन उसकी खासियत यह है कि वह अपने बहुत क़रीब लगता है। शायद इसलिए कि वह बहुत दूर तक निजी प्रसंगों और अनुभवों से बनता है। यही वजह है कि उसमें बहुत गहरी तपिश दिखाई पड़ती है, उससे बहुत ऊष्मा मिलती है। उनके उपन्यास ‘गुज़र क्यों नहीं जाता’ में भी ये आत्मकथात्मक प्रसंग मिलते हैं। यह एक निजी कहानी जैसा है, लेकिन इसमें निहित सार्वजनिकता अदृश्य नहीं रहती और न ही इसके दंश अलक्षित रह जाते हैं।

लेकिन इतना राग-विराग-खटराग-अनुराग धीरेंद्र अस्थाना लाते कहां से हैं? उनका निजी वितान इतना बड़ा कैसे होता जाता है कि उसमें सार्वजनिकता भी समाई मिलती है? इसका जवाब उनकी आत्मकथा ‘ज़िंदगी का क्या किया’ देती है। इस किताब से गुज़रते हुए अनायास यह खयाल आता है कि धीरेंद्र जीवन की ऊष्मा को, उसके ताप को, जिस तीव्रता के साथ महसूस करते हैं, उसे अपने लेखन में लगभग ज्यों का त्यों उतार लेते हैं। धीरेंद्र बहुत बेबाकी और धीरज से अपने बचपन का, उस बचपन के संघर्ष का, अपने रिश्तों का, अपनी मां-अपने पिता. अपने चाचा का उल्लेख करते हैं। इस उल्लेख में संवेदनशीलता भी है, ज़रूरी दूरी भी, तटस्थता भी और कभी-कभी बिल्कुल निष्कवच यथार्थ को दिखा देने वाला साहस और स्वीकार भी। धीरेंद्र के कोख में रहते आत्महत्या की कोशिश में अपाहिज हो गई मां, फक्कड़पने के अलग-अलग ध्रुवांतों को जीते और परिवार के लिए किसी मुसीबत की तरह मिलते पिता, परिवार के आर्थिक अभावों को अनदेखा कर अपनी संपन्न जीवनशैली में खोए रिश्तेदार, और छोटे-बड़े अभावों का जैसे अंतहीन सिलसिला- मेरठ, आगरा, मुज़फ़्फरनगर और देहरादून के बीच पले-बढ़े इस जीवन की झलक हमें य़ह भी बताती है कि लेखक कैसे बनते हैं या धीरेंद्र अस्थाना नाम का लेखक कैसे बना। 

जिसे ज़िंदगी इस दुर्धर्ष अनुभव की तरह मिली हो, वह या तो बिल्कुल संवेदनहीन होकर उसे मशीन या पशु की तरह काट देता है, या फिर अतिरिक्त संवेदनशील होकर आत्महत्य़ा के रास्ते की ओर बढ़ चलती है और अगर यह भी नहीं तो लेखक बन जाता है। दरअसल यह लिखना है जिसने धीरेंद्र अस्थाना का जीना संभव किया। यही वजह है कि जीवन भी उनके लिए कहानी जैसा है। इस कहानी में अपनी राहतें भी हैं और इससे निकलती राहें भी। यह उनकी सीमा भी है और उनकी शक्ति भी। और इन सबसे निकलता अंतिम सच यह है कि धीरेंद्र अस्थाना हिंदी के एक मूल्यवान लेखक हैं जिनकी रचनाओं ने पाठकों को समृद्ध किया है और हिंदी कथा की परंपरा में अपने स्तर पर कुछ जोड़ा भी है।

शनिवार, 26 नवंबर 2022

कवि केदारनाथ सिंह की कविता पर भारत यायावर की विद्वता पूर्ण विवेचना

  




देश के जाने माने हिंदी के साहित्यकार कवि, संपादक समालोचक, डॉ. भारत यायावर ने कवि केदारनाथ सिंह की एक कविता, जो निराला जी को समर्पित है।.. जिसे वे  अपने जीवन काल में बार-बार गुनगुनाया करते थे।

 कविता के मायने व अर्थ को.. वे किस रूप में लेते हैं ? उसका वर्णन किस तरह करते हैं ? साहित्य के लिए यह एक अमिट वर्णन बन गया है।

 कविताएं तो खुब लिखी जा रही हैं। पढ़ी भी जा रही हैं। कई कविताएं पाठकों की समझ से बाहर चली जाती है। बार-बार पढ़ने के बाद भी कविताओं का अर्थ समझ में नहीं आ पाता है।  कई कविताएं पढ़ने के साथ ही भाव साफ-साफ समझ में आने लगती है। कई कविताओं के अर्थ बार बार पढ़ने के बावजूद कविताओं की पंक्तियों से बाहर आ नहीं पाती हैं। 

इन दिनों  मुक्त छंद की कविताओं की बाढ़ सी आ गई है। यह सिर्फ यह बार सिर्फ भारत में ही नहीं अपितु विश्व के सभी  देशों में आई हुए है।  मुफ्त छंद की कविता की शुरुआत को गति प्रदान करने में निराला की कविताएं प्रतिमान के रूप में सामने आई थीं। तब से लगातार मुक्त छंद की कविताएं लिखी जा रही हैं।

 भारत यायावर देश के एक जाने-माने कवि थे । आज भी इनकी कविताएं बड़े चाव से पढ़ी जाती हैं।  लोग इनकी कविताओं में जीवन, तड़प और मुस्कुराहट तलाशते रहते हैं।‌ इनकी कविताएं मुक्त छंद में रहती जरूर हैं, लेकिन बहुत ही सहजता के साथ अपनी बातों को कह गुजरती है। भारत यायावर  एक कवि के साथ एक अच्छे कविताओं के पाठक थे। वे हमेशा नए एवं पुराने कवियों की कविताओं को पढ़ते रहते थे। वे कवि  की पंक्तियों के मर्म व भाव को समझने का प्रयास करते रहे थे। भारत यायावर की नजर कवि केदारनाथ सिंह की पंक्तियों पर पड़ी । कवि केदारनाथ सिंह देश के जाने-माने कवियों में एक थे।  उनकी पंक्तियां भाव से  भरी होती हैं। लेकिन समझने का नजरिया और भाव भी होनी चाहिए।

'दुखता रहता है,अब यह जीवन' शीर्षक  की यह कविता कवि केदारनाथ सिंह की प्रमुख कविताओं में एक है । यह कविता कवि निराला जी को समर्पित है ।

भारत यायावर ने उक्त कविता के भाव को कम से कम पंक्तियों में इतनी सहजता और विद्वता पूर्ण तरीके से समझाने की कोशिश की है, पढ़कर मन गदगद हो जाता है।

 आज मैं कवि केदारनाथ सिंह की उक्त पंक्तियां और भारत यायावर की उक्त कविता पर अर्थपूर्ण  विवेचना आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं ।

उम्मीद है, आपको पसंद आएगा।


निराला को याद करते हुए

********************

निराला को याद करते हुए केदारनाथ सिंह ने एक कविता लिखी है, जिसे मैं प्राय: गुनगुनाता हूं।यह मेरी पसंदीदा कविता है।कल मेरे परम प्रिय मित्र अनिल जनविजय से बातचीत के दौरान मैंने कहा था कि मैं केदारनाथ सिंह की कविता पर टिप्पणी लिखूंगा। पहले यह कविता फिर से पढ़ने की आपसे गुजारिश करूंगा :


    उठता हाहाकार जिधर है

     उसी तरफ अपना भी घर है


     खुश हूं -- आती है रह-रह कर

      जीने की सुगंध बह-बहकर


     उसी ओर कुछ झुका-झुका- सा

     सोच रहा हूं रुका - रुका - सा


      गोली दगे न हाथापाई

      अपनी है यह अज़ब लडाई


      रोज़ उसी दर्जी के घर तक

       एक प्रश्न से सौ उत्तर तक


      रोज़ कहीं टाँके पड़ते हैं

      रोज़ उघड़ जाती है सीवन

       " दुखता रहता है अब जीवन!"


केदारनाथ सिंह की कविताएं कई-कई बार पाठ करने के बाद भी जल्दी खुलती नहीं हैं। उनके अर्थ और मर्म तक कैसे पहुंचा जाए, प्रवेशद्वार पर ताला लगा हुआ है। कुंजी के रूप में निराला का एक वाक्य है :

    दुखता रहता है यह जीवन!

जीवन का दुखना ही दुखी जीवन की पहचान है।इस दुखी जीवन पर प्रेमचंद का एक निबंध है, जिसमें उन्होंने अपनी भाव-संवेदना बुद्ध को समर्पित की है।दुखते जीवन का गहरा एहसास निराला ही नहीं, प्रेमचंद में भी है। जीवन को सही रूप में महसूस करते रहने की यह एक प्रक्रिया है।दुखिया दास कबीर ही नहीं हाहा करते भारतेंदु भी हैं, जो दुर्दशा को विकल मन से पहचान करते हैं। हाहाकार मैथिलीशरण शरण गुप्त की भारती में भी दिखाई देता है । आहत हृदय में शरबद्ध क्रौंच पक्षी वाल्मीकि की तरह हर युग के रचनाकार के भीतर करुण विलाप करता दिखाई देता है। केदारनाथ सिंह हाहाकार की तरफ ही अपना घर होने का इशारा कर इसी परंपरा से संबद्ध होने की घोषणा करते हैं तो दरअसल वे जीवन के गहरे रूप से जुड़े होने की संकल्पना को ही प्रकट करते हैं।

  इस दुखते जीवन में भी कभी-कभार जीने की सुगंध बहकर आती है, यह आह्लादित करती है। जीवन का यह भी एक पक्ष है। जीवन खुशियों के इसी पक्ष की ओर झुका रहना चाहता है, लेकिन इससे गतिशीलता बाधित होती है।वह नहीं चाहता कि जीवन की सुख-सुविधा की ओर रुका हुआ झुका रहे।

     दुखते जीवन की गहरी संवेदना से युक्त कवि इस सद्भाव से संचालित है कि इस जीवन में प्रेम और सदाचार हो। अपनत्व की भावना को स्थापित करना ही उसका संघर्ष है।न कहीं गोली चले और न हाथापाई हो, यह उसकी विचित्र किस्म की लड़ाई है।

   जीवन में टूट-फूट होता रहता है। इसमें तरह-तरह की परेशानियां आती रहती हैं। रोज़ टांके पड़ना और सिलाई का उघड़ जाना लगा रहता है। ऐसे में मरम्मत करने वाले दर्जी के घर दौड़ लगाने की रोज़-रोज़ की आवश्यकता बनी रहती है।

    इस दुखते रहने वाले जीवन के साथ मिलकर चलने वाले रचनाकार की प्रतिभा निरंतर निखरती है और जीवन को भी संवारती है।

   केदारनाथ सिंह की कविता कबीर की वाणी की तरह चुनौती देती है, कहै कबीर कोई विरला बूझै।

   नामवर सिंह ने कहा है कि जब बिना मेहनत के रोटी भी नहीं मिलती तो कविता में छुपा अर्थ और मूल्य कैसे मिल सकता है? कविता ही नहीं कोई साधारण से साधारण वस्तु भी अपने में कई रहस्यों को समेटे हुए रहती है। उससे विरले लोग ही जूझ पाते हैं। समुद्र के गहरे तल में जाकर ही मोती की खोज संभव होती है।

शुक्रवार, 25 नवंबर 2022

प्रेम क्या है ?

 क्या प्रेम ही परमात्मा नहीं है? क्या प्रेम में डूबा हुआ हृदय ही उसका मंदिर नहीं है? और, क्या जो प्रेम को छोड़ उसे कहीं और खोजता है, वह व्यर्थ ही नहीं खो

एक दिन यह मैं अपने से पूछता था। आज यही आपसे भी पूछता हूं।


परमात्मा को जो खोजता है, वह घोषणा करता है कि प्रेम उसे उपलब्ध नहीं हुआ है। क्योंकि जो प्रेम को उपलब्ध होता है, वह परमात्मा को भी उपलब्ध हो जाता है।


परमात्मा की खोज प्रेम के अभाव से पैदा होती है, जब कि प्रेम के बिना परमात्मा को पाना असंभव ही है।


परमात्मा को जो खोजता है, वह परमात्मा को तो पा ही नहीं सकता, प्रेम की खोज से अवश्य ही वंचित हो जाता है। किंतु जो प्रेम को खोजता है, वह प्रेम को पाकर ही परमात्मा को भी पा लेता है।


प्रेम मार्ग है। प्रेम द्वार है। प्रेम पैरों की शक्ति है। प्रेम प्राणों की प्यास है। अंततः प्रेम ही प्राप्ति है। वास्तव में प्रेम ही परमात्मा है।


मैं कहता हूंः परमात्मा को छोडो। प्रेम को पाओ। मंदिरों को भूलो। हृदय को खोजो। क्योंकि, वह है तो वहीं है।


परमात्मा की यदि कोई मूर्ति है तो वह प्रेम है। लेकिन पाषाण-मूर्तियों में वह मूर्ति खो ही गई है। परमात्मा का कोई मंदिर है, तो वह हृदय है, लेकिन मिट्टी के मंदिरों ने उसे भलीभांति ढंक लिया है।


परमात्मा उसकी ही मूर्तियों और मंदिरों के कारण खो गया है और उसके पुजारियों के कारण ही उससे मिलन कठिन है। उसके लिए गाई गई स्तुतियों और प्रार्थनाओं के कारण ही स्वयं उसकी ध्वनि को सुन पाना असंभव हो गया है।


प्रेम आवे तो उसमें ही परमात्मा भी मनुष्य के जीवन में लौट कर आ सकता है। एक पंडित एक फकीर से मिलने गया था। उसके सिर पर शास्त्रों की इतनी बडी गठरी थी कि फकीर के झोपड़े तक पहुंचते-पहुंचते वह अधमरा हो गया था। उसने जाकर फकीर से पूछाः ‘‘परमात्मा को पाने के लिए मैं क्या करूं? ’’ लेकिन जिस गठरी को वह सिर पर लिए हुए था, उसे सिर पर ही लिए रहा। फकीर ने कहाः ‘‘मित्र! सबसे पहले तो इस गठरी को नीचे रख दो।’’ पंडित ने बडी कठिनाई अनुभव की। फिर भी उसने साहस किया और गठरी को नीचे रख दिया। आत्मा के बोझों को नीचे रखने के लिए निश्चय ही अदम्य साहस की जरूरत होती है। लेकिन फिर भी एक हाथ वह गठरी पर ही रखे हुए था। फकीर ने पुनः कहाः ‘‘मित्र! उस हाथ को भी दूर खींच लो!’’ वह बडा बलशाली व्यक्ति रहा होगा, क्योंकि उसने शक्ति जुटा कर अपना हाथ भी गठरी से दूर कर लिया था। तब फकीर ने उससे कहाः ‘‘क्या तुम प्रेम से परिचित हो? क्या तुम्हारे चरण प्रेम के पथ पर चले हैं? यदि नहीं तो जाओ और प्रेम के मंदिर में प्रवेश करो। प्रेम को जीयो और जानो और तब आना। फिर मैं तुम्हें परमात्मा तक ले चलने का आश्वासन देता हूं।’’


वह पंडित लौट गया। वह आया था तब पंडित था, लेकिन अब पंडित नहीं था। वह अपनी ज्ञान-गठरी वहीं छोड़ गया था।


वह व्यक्ति निश्चित ही असाधारण था और अदभुत था। क्योंकि साम्राज्य छोड़ना आसान है किंतु ज्ञान छोड़ना कठिन है। ज्ञान अहंकार का अंतिम आधार जो है।


लेकिन, प्रेम के लिए अहंकार का जाना आवश्यक है।


प्रेम का विरोधी घृणा नहीं है। प्रेम का मूल शत्रु अहंकार है। घृणा तो उसकी ही अनेक संततियों में से एक है। राग, विराग, आसक्ति, विरक्ति, मोह, घृणा, ईष्र्या, क्रोध, द्वेष, लोभ, सभी उसकी ही संतानें हैं। अहंकार का परिवार बड़ा है।


फकीर ने उस व्यक्ति को गांव के बाहर तक जाकर विदा दी। वह इस योग्य था भी। फकीर उसके साहस से आनंदित था। जहां साहस है, वहां धर्म के जन्म की संभावना है। साहस से स्वतंत्रता आती है और स्वतंत्रता से सत्य का साक्षात होता है।


लेकिन फिर वर्ष पर वर्ष बीत गए। फकीर उस व्यक्ति के लौटने की प्रतीक्षा करते-करते बूढ़ा हो गया। लेकिन वह न आया। अंततः फकीर ही उसे खोजने निकला और उसने एक दिन उसे खोज ही लिया। एक गांव में वह आत्मविभोर हो नाच रहा था। उसे पहचानना भी कठिन था। आनंद से उसका कायाकल्प ही हो गया था। फकीर ने उसे रोका और पूछाः ‘‘आए नहीं? मैं तो प्रतीक्षा करते-करते थक ही गया और तब स्वयं ही तुम्हें खोजता यहां आया हूं। क्या परमात्मा को नहीं खोजना है? ’’ वह व्यक्ति बोलाः ‘‘नहीं। बिल्कुल नहीं। प्रेम को पाया, उसी क्षण उसे भी पा लिया है।’’


ओशो

व्यक्तित्व / कृष्ण मेहता

 जब इस संसार के अंदर किसी व्यक्ति की चर्चा और निंदा होनी प्रारंभ हो जाए तब मान लेना चाहिए उस व्यक्ति का व्यक्तित्व है वह बहुत ही ज्यादा विशाल व्यक्तित्व है निंदा और चर्चा मूर्दें व्यक्ति की नहीं होती है हमेशा जिंदे व्यक्ति की होती है जो व्यक्ति शक्तिशाली होता है ताकतवर होता है साहसी होता है वही अपने जीवन में नई कार्य संपादित करने में सफलता प्राप्त करते हैं उन व्यक्तियों को ही हमेशा इस संसार में चर्चित व्यक्तित्व के रूप केंद्र स्थापित होने का अवसर प्राप्त होता है उस व्यक्तित्व की निंदा करने वाले लोग भी उभरकर सामने आने प्रारंभ हो जाते हैं तब वह व्यक्तित्व पूरे संसार के अंदर अपने आप ही चर्चित व्यक्तित्व के रूप में अपनी प्रतिष्ठा को प्रतिष्ठित करने वाला बन जाता है यह 2 गुण जिस व्यक्ति के जीवन में समावेश कर जाते हैं वह व्यक्ति सफल व्यक्तित्व के रूप के अंदर अपने आपको इस संसार में प्रतिष्ठित करने वाला बन जाता है प्रातः काल का शुभ विचार हमारे को चर्चा और निंदा इन दोनों की ओर अग्रसर करने वाला बन सकता है हम अच्छा काम करते चले जाएं हमारी चर्चा सारे संसार में होती चली जाएगी जब हमारे कार्यों की निंदा होने प्रारंभ हो जाए तब अपने आप ही हमारी महानता की प्रतिष्ठा प्रतिष्ठान प्रारंभ हो सकती है प्रातः काल का शुभ विचार हमारे को इसी दिशा की ओर अग्रसर करने वाला बन जाता है ।

रवि अरोड़ा की नजर से......

 डंडी मारने का राष्ट्रीय धर्म



मेरी एक मित्र मंडली अक्सर वृन्दावन जाती है । कभी कभार मैं भी साथ हो लेता हूं।  ग्रेटर नोएडा पार करके एक्सप्रेस वे पर चढ़ने से पूर्व मित्र अक्सर आइस क्रीम खाते हैं। इस जगह लाइन लगा कर दर्जन भर आइस क्रीम की आधुनिक ठेलियां खड़ी होती हैं। हम लोग आइस क्रीम लेते समय ठेली चालक से यूं ही ठिठौली कर रहे थे जब उसने बताया कि अक्सर ऐसे ग्राहक भी आते हैं जो आइसक्रीम लेकर बिना पैसे दिए रफूचक्कर हो जाते हैं। यह काम केवल कार सवार ही करते हैं। हमसे कुछ समय पहले ही एक कार सवार उससे तीन सौ रुपयों की आइसक्रीम लेकर बिना पैसे दिए अपनी कार भगा ले गया था । सुन कर बड़ी हैरानी हुई कि खाते पीते घर के लोग भी ऐसी हरकतें करते हैं ? हमने जब अपनी आइसक्रीम के दाम पूछे तो उसने उसकी कीमत अनुमान से अधिक बताई। एक मित्र ने जब आइसक्रीम के रैपर पर उसके खुदरा मूल्य की जांच की तो पता चला कि दुकानदार हमें पचास रुपए अधिक बता रहा है। इस और जब उसका ध्यान दिलाया तो उसने अपना टोटल दोबारा जांचा और फिर खुद को दुरुस्त करते हुए खुदरा मूल्य के अनुरूप ही हमसे सही सही पैसे लिए । हो सकता है कि उसने ऐसा जान बूझ कर न किया हो मगर मन में आशंका हुई कि अपने तीन सौ रुपए के नुकसान की भरपाई क्या अब वह हम जैसों से करेगा ? 


वृंदावन पहुंच कर मंदिर के लिए ई रिक्शा ली और उसकी महिला चालक से साठ रुपए तय किए मगर गंतव्य पर पहुंच कर चालक ने हमसे सौ रुपए वसूले । पूछने पर उसने कहा कि मैंने तो सौ रुपए ही बताए थे , शायद आपने सुना नहीं। समझ नहीं आया कि यह माजरा क्या है? जिसका जहां दांव लग रहा है वही सामने वाले को ठग रहा है ? क्या अब बेइमानी को पूरी तरह चालाकी ही समझा जाने लगा है ? सामने वाले पर विश्वास कर लेना अब मूर्खता की श्रेणी में रखा जाने लगा है क्या ? बेशक युगों से ऐसा होता आ रहा है मगर क्या अब ऐसी चतुराई बढ़ती नहीं जा रही ? कोई भी अपनी नजरों में बेवकूफ साबित नहीं होना चाहता और एक जगह नुकसान खाकर उसका बदला किसी दूसरे से लेने लगता है और फिर खुद को स्ट्रीट स्मार्ट समझता है । अमीर आदमी का तो जमाने से यही विनिंग फार्मूला है मगर देखा देखी अब गरीब और मेहनत कश वर्ग भी न जाने क्यों इसी दिशा में चल पड़ा है। 


हो सकता है कि मेरे द्वारा गिनाई गई घटनाएं आपको मामूली लगें और आप कहें कि बड़े बड़े घोटाले करने वालों को छोड़ कर गरीब आदमी की छोटी मोटी हेराफेरी के पीछे मैं क्यों पड़ गया ? मगर क्या ऐसा नहीं है कि जिसको जितना मौका मिलता है, वह उससे चूकता नहीं है ? बड़ा आदमी बड़ी ठगी कर रहा है और छोटा आदमी छोटी। ऊपर से नीचे तक डंडी मारना ही हो गया है हमारा राष्ट्रीय चरित्र , हमारा राष्ट्रीय धर्म । मेरी बात पर विश्वास न हो तो किसी भी दिन का अखबार उठा कर देख लीजिए। हम सबके साथ लगभग रोज ही ऐसा नहीं होता क्या ? सामने वाले की जेब से पैसे निकाल लेने को ही अब असली सफलता माना जाने लगा है। सही गलत के बाबत न कोई पूछता है और न ही अब इसका संज्ञान लिया जाता है। ईमानदारी अभिशाप होती जा रही है और बेईमानी कला । इसमें कोई संदेह नहीं कि देश की बड़ी आबादी अभी भी इस कीचड़ से दूर है मगर मुझे चिंता तो इस बात की है कि धीरे धीरे तराजू का पलड़ा अब बेईमानी की और झुकता दिखाई पड़ रहा है ।



बुधवार, 23 नवंबर 2022

किताबों का भविष्य? /

 *

 

🟣कुछ रोज पहले की बात है, एक पुस्तक मेले अथवा पुस्तक-प्रदर्शनी से लौट कर आया। तब पुस्तकों के भविष्य पर देर तक सोचता रहा। मेला भीड़़ के लिहाज से बहुत फीका था। उसे संभालने में जितने लोग लगे थे, उतने लोग भी दर्शक-खरीदार नहीं थे। यदि सरकारी सहायता नहीं होती, तो आयोजकों का बड़ा आर्थिक नुकसान होना तय था। पुस्तकों के कारोबार के बारे में मुझे अधिक जानकारी नहीं है, लेकिन कुल मिला कर मेरा आकलन है कि पहले के मुकाबले इसके उपभोक्ता अधिक हुए हैं। किताबें पहले यानि मेरे युवा काल के मुकाबले अधिक पढ़ी जा रही हैं। इसका कारण और कुछ नहीं, शिक्षा का प्रसार है। हालांकि हमारे ज़माने में किताबों के प्रति जो उत्साह था उसमें गिरावट आई है। हमारे युवाकाल में मध्यवर्गीय परिवारों के बैठकखानों में धर्मयुग, सारिक, हिंदुस्तान, दिनमान जैसी पत्रिकाएं प्रायः मिल जाती थीं। अब वहां कोई पत्रिका नहीं होतीं, अखबार भी तेजी से अनुपस्थित होने लगे हैं। इसके अनेक कारण हैं। बावजूद इसके मेरा मानना है कि ज्ञान के बारे में लोगों की दिलचस्पी बढ़ी है। हां पचास साल पहले की मानसिकता का होना स्वाभाविक तौर पर असंभव है। आज लोग न उस दौर के साहित्य को पसंद करना चाहेंगे, न राजनीतिक विचारधारा को। 

  इस बीच आई डिजिटल क्रांति ने पत्रिकाओं और अख़बारों को अप्रासंगिक कर दिया है। कोई अब अख़बार, पत्रिकाओं पर क्यों निर्भर रहना चाहेगा? अब तो टीवी भी नकार दिए गए हैं। आज मोबाइल फोन में ही सब कुछ है। व्हाट्सप, ट्वीटर ने चिट्ठियों को अप्रासंगिक बना दिया है। इंटरनेट ने विभिन्न मंचों से जो संचार- क्रांति की है उसने दुनिया के मानसिक ढांचे को भी बदल दिया है।पिछले वर्षों की कोरोना महामारी ने ऑनलाइन संस्कृति को इतना आवश्यक बना दिया कि लोग इससे निकलना पसंद नहीं कर रहे हैं। इनके विस्तार को रोकना असंभव होगा। एक-एक कर अख़बार, पत्रिकाएं सब ऑनलाइन हो जाएंगी।


 *लेकिन ये किताबें !!* 


किताबें भी प्रभावित होंगी। किताबें हमेशा आज जैसी थीं भी नहीं। भारत की बात करें तो वेद बहुत दिनों तक लिपि, लेखन और प्रकाशन से दूर रहे। उनका प्रकाशन 19वीं सदी में हुआ। पूरी दुनिया के पैमाने पर भी किताबों का यह स्वरुप कुछ सौ साल पहले की घटना है। मेरी जानकारी के अनुसार 1540 ईस्वी में एक जर्मन जोहन्स गुटेनबर्ग ने पहली दफा प्रिंटिंग मशीन बनाई थी और उसी ने पहली दफा बाइबिल का प्रकाशन किया था, जिसे गुटेनबर्ग बाइबिल कहा जाता है। इसी प्रकाशन के कारण यूरोप में रेनेसां आया। बाइबिल अब पादरियों के घेरे से निकल कर आमजन के लिए सुलभ हो गई और लोग उस पर स्वतंत्र रूप से विचार करने लगे। प्रबोधन के दौर में उसे नकारने की हिम्मत इसी कारण आई कि उन्होंने उसे पहले व्यापक तौर पर पढ़ा था। प्रिंटिंग मशीन ने ज्ञान की दुनिया में एक बड़ी क्रांति लाई थी। अन्यथा इसके पहले किताबें गिनी-चुनी संख्या में प्रकाशित होती थी। मुग़ल बादशाह बाबर की आत्मकथा केवल पांच प्रतियों में प्रकाशित हुई थी। प्रकाशन के लिए उसे अकबर का इंतजार करना पड़ा था। अब तो किताब रात में लिखी गई और सुबह छप गई वाला समय है। लेकिन यह स्वरुप भी अधिक समय तक नहीं चलेगा। किताबें अब बहुत जल्द ऑनलाइन होंगीं और उसका कागज से रिश्ता टूट जाएगा। किताबों के मेले, दुकानें सब बंद। आमेजन वगैरह माध्यमों से मंगाने के झंझट भी ख़त्म। मैं समझाता हूं यह सब दस वर्षों के भीतर होने जा रहा है।

  1990 के दशक में एक रूसी लेखक की अंग्रेजी में अनुदित कहानी पढ़ी थी। शीर्षक भूल नहीं रहा हूँ तो ' *द फन दे हेड'* था। 20वीं सदी के किसी साल में तेरह पंद्रह साल के दो दोस्त बात कर रहे हैं। एक को किताब मिल गई है। उसका दोस्त बताता है, उसके दादा भी किताबों की बात किया करते थे और कहते थे उनके दादा किताबें पढ़ा करते थे। किताबें बिना बिजली के भी सूरज की रौशनी में पढ़ी जा सकती हैं। कमाल की चीज है। लेकिन जिसे किताब मिली है, वह तो किताब पढ़ कर अभिभूत है। किताब स्कूल के बारे में है। पुराने ज़माने में स्कूल हुआ करते थे। बच्चे बस से वहां जाया  करते थे।  क्लासरूम, टीचर, किताबें, खेल के मैदान और अहा हा ! बारिश होने पर छुट्टी। रैनि-डे ! वाह ! क्या मजे थे ! 

  तो हम उसी ज़माने की ओर समृद्ध वेग से बढ़ रहे हैं। ये स्कूल, यूनिवर्सीटियां, किताबें इस रूप में नहीं होंगी। सब ऑनलाइन। मोबाइल और स्क्रीन का भी यह रूप शायद नहीं होगा। जैसे ऑनलाइन बैंकिंग से जाली नोट अप्रासंगिक हो रहे हैं, वैसे ही ऑनलाइन किताबों से जाली लेखक अप्रासंगिक हो जाएंगे। लेकिन कविता, कला, संगीत और विचार अवश्य होंगे। वे अधिक प्रांजल रूप में होंगे। इस दुनिया के स्वागत के लिए हमें तैयार रहना चाहिए।


📎 *प्रेम कुमार मणि* 

की वॉल से साभार

प्रेम,,,,,,

 प्रेम,,,,,,


जो लड़का नही चाहता है प्रेम करना 

जिसके उपर  पूरे जिम्मेदारी होती हैं

उस लड़के  को,

भी  हो जाता है अक्सर  प्रेम।

 जो होता है एकदम परिपक्व।

जानते हुए कि छला , 

जाएंगा ,ठगा जाएंगा ,

सहर्ष मोल लेता है।


सच तो ये है जीना चाहता है,

अपनी बिसराई,भूली जिंदगी,

जो दफना आया ,दायित्व की,

चट्टान  के  नीचे, गहरे कहीं।


सिर्फ देना ही  नहीं  वो,

पाना भी चाहता है वो स्नेह।


उनके उम्र से बड़ी होती है,

उनकी परछाईं की उम्र,

जो मुड़ झिड़कती है,

"हद में रहो,  ।"


नहीं व्यक्त करता है वो अपनें,

अंदर उमड़ती भावनाएं।


 छेड़ना चाहता हैं,

चिढ़ाना चाहता हैं 

 खिलखिलाना और शरमाना

 चाहता  हैं  खुल  के।


नहीं लुभाता उन्हें,

दैहिक आकर्षण ,


होती है  बस चाह,मन से 

मन के मिल जाने की।


खोजता है वो ऐसा कोई,

जो दे तवज्जो उन्हें,

मुखर हो,बिखर जाए,

जिसके समक्ष बिना किसी,

लाज शर्म लिहाज पर्दे के।                        


बांटना चाहता हैं 

बचपन, जवानी  और 

चल रही  कहानी,


खींच लेता है खुद के इर्द गिर्द ,

लक्ष्मण रेखा  खुद  ही।


छुपा लेता है खुद को,

कहानी,किस्सों,

लेखों,संस्मरणों के

भीतर  ही   कहीं।


हाँ, जिम्मेदारी वाले लड़के 

को भी हो जाता है 

अक्सर प्रेम.,,,,,,,,


मैं शून्य हूँ

बाप_और_बेटी_का_रिश्ता 🙏💐🙏

 


बेटी की विदाई के वक्त बाप ही सबसे आखिरी में रोता है, क्यों, चलिए आज आप विस्तारित रूप से समझिए।


बाकी सब भावुकता में रोते हैं, पर बाप उस बेटी के बचपन से विदाई तक के बीते हुए पलों को याद कर करके रोता है।


#माँ_बेटी के रिश्तों पर तो बात होती ही है, पर बाप और बेटी का रिश्ता भी समुद्र से गहरा है।


हर बाप घर के बेटे को गाली देता है, धमकाता और मारता है, पर वही बाप अपनी बेटी की हर गलती को नकली दादागिरी दिखाते हुए, नजर अंदाज कर देता है।


बेटे ने कुछ मांगा तो एक बार डांट देता है, पर अगर बिटिया ने धीरे से भी कुछ मांगा तो बाप को सुनाई दे जाता है और जेब में रूपया हो या न हो पर बेटी की इच्छा पूरी कर देता है।


दुनिया उस बाप का सब कुछ लूट ले तो भी वो हार नही मानता, पर अपनी बेटी के आंख के आंसू देख कर खुद अंदर से बिखर जाए उसे बाप कहते हैं।


और बेटी भी जब घर में रहती है, तो उसे हर बात में बाप का घमंड होता है। किसी ने कुछ कहा नहीं कि वो बेटी तपाक से बोलती है, "पापा को आने दे फिर बताती हूं।"


बेटी घर में रहती तो माँ के आंचल में है, पर बेटी की हिम्मत उसका बाप रहता है।


बेटी की जब शादी में विदाई होती है तब वो सबसे मिलकर रोती तो है, पर जैसे ही विदाई के वक्त कुर्सी समेटते बाप को देखती है, जाकर झूम जाती है, और लिपट जाती है, और ऐसे कसके पकड़ती है अपने बाप को जैसे माँ अपने बेटे को। क्योंकि उस बच्ची को पता है, ये बाप ही है जिसके दम पर मैंने अपनी हर जिद पूरी की थी।


खैर बाप खुद रोता भी है, और बेटी की पीठ ठोक कर फिर हिम्मत देता है, कि बेटा चार दिन बाद आ जाऊँगा, तुझको लेने और खुद जान बूझकर निकल जाता है, किसी कोने में और उस कोने में जाकर वो बाप कितना फूट फूट कर रोता है, ये बात सिर्फ एक बेटी का बाप ही समझ सकता है।


जब तक बाप जिंदा रहता है, बेटी मायके में हक़ से आती है और घर में भी ज़िद कर लेती है और कोई कुछ कहे तो डट के बोल देती है कि मेरे बाप का घर है। पर जैसे ही बाप मरता है और बेटी आती है तो वो इतनी चीत्कार करके रोती है कि, सारे रिश्तेदार समझ जाते है कि बेटी आ गई है।


और वो बेटी उस दिन अपनी हिम्मत हार जाती है, क्योंकि उस दिन उसका बाप ही नहीं उसकी वो हिम्मत भी मर जाती हैं।


आपने भी महसूस किया होगा कि बाप की मौत के बाद बेटी कभी अपने भाई- भाभी के घर वो जिद नहीं करती जो अपने पापा के वक्त करती थी, जो मिला खा लिया, जो दिया पहन लिया क्योंकि जब तक उसका बाप था तब तक सब कुछ उसका था यह बात वो अच्छी तरह से जानती है। 


आगे लिखने की हिम्मत नहीं है, बस इतना ही कहना चाहता हूं कि बाप के लिए बेटी उसकी जिंदगी होती है, पर वो कभी बोलता नहीं, और बेटी के लिए बाप दुनिया की सबसे बड़ी हिम्मत और घमंड होता है, पर बेटी भी यह बात कभी किसी को बोलती नहीं है। 


#बाप_बेटी का प्रेम समुद्र से भी गहरा है।

मंगलवार, 22 नवंबर 2022

सूर के कृष्ण

 


सूर के कृष्ण सबसे अलग  ,अनूठे और विलक्षण हैं। सूर ने अपनी कल्पना सृष्टि से जैसा कृष्ण को रचा है वैसा शायद ही कोई अन्य कवि कर पाया हो। उनके कृष्ण सबसे निराले हैं स्वतंत्र,स्वछंद और समत्वधर्मी। वे सिद्धांतों में नहीं,आचरण में समतावादी हैं। सबसे पहले एक शर्त होती है समतावादी के लिए कि वह किसी भी तरह के आभिजात्य से मुक्त हो । कृष्ण उस पशुचारण अवस्था के हैं जब कृषि व्यापार से पैदा हुआ सामंती आभिजात्य व्यक्ति की प्रवृत्तियों में शामिल नहीं हुआ था। सूर के कृष्ण उसी आदिम  स्थिति में गोपग्वालों के साथ गाय चराते हैं और आदिम अवस्था में स्त्रियों के स्वातंत्र्य को पूरा सम्मान देते हैं। हमारी नज़र में सूर के कृष्ण जैसा समत्ववादी कला-पुरुष कदाचित साहित्य में दूसरा नहीं है। एक बार की बात है कि यशोदा अपने सुपुत्र के लिए घर में मेवा पकवान तैयार करती हैं और अभिलाषा करती हैं कि कृष्ण उनको बहुत चाव से खायेंगे।जब वह उन मेवा पकवानों को अपने प्रिय पुत्र के सामने बड़े लाड़ चाव से परोसती हैं तो कृष्ण साफ़ कहते हैं कि यह मेरी रुचि का भोजन नहीं है। मैं मेवा पकवान नहीं खा सकता। मुझे तो दधिमाखन से अच्छा कुछ लगता ही नहीं।मेरी मेवा पकवानों में कोई रुचि नहीं है।सूर अपने कृष्ण से कहलवाते हैं-----+

         

 मैया री मोहै माखन भाबै।

जो मेबा पकवान कहत तू मोहि नहीं रुचि आबै।

ब्रज जुबती इक पाछै ठाड़ी, सुनत स्याम की बात।

मन मन कहत कबहुं अपने घर देखौं माखन खात।

बैठे आंय मथनिया के ढिंग,तब मैं रहों छिपानीU।

सूरदास प्रभु अंतर्जामी, ग्वालिनि मन की जानी।।


कोई नेता है ऐसा , जो अपनी सुख-सुविधा और आभिजात्य को छोड़कर कृष्ण की तरह से आम जन जीवन से अपने जीवन की सुर ताल मिलाकर चले। इसके बाद सूर के कृष्ण उस ग्वालिनी के घर खुद चलकर जाते हैं और उसके घर दधि माखन खाकर उस जैसे ही हो जाते हैं गये स्याम तिहि ग्वालिन के घर ।आभिजात्य को तोड़ने वाला ऐसा लोककाव्य हिंदी में दूसरा नहीं है।सूर यहां अप्रतिम हैं और समता के आचार विचार में तुलसी से भी दो कदम आगे हैं।स्त्री जीवन के मामले में भी उनके यहां तुलसी जैसी संकीर्ण वैचारिक धारणायें नहीं है।

आधुनिक युग में लेनिन, गांधी,माओ , हो ची मिन्ह आदि ऐसे नाम हैं जो अपने जीवन और आचरण से आभिजात्य विरोधी रहे हैं। बहरहाल।

मैट्रिक्स के बहाने भारत (दशा दुर्दशा) का आंकलन / आनंद कुमार

 



मैट्रिक्स देखिए, तब भी समझ जाएंगे क्यों लिखना पड़ीं रामायण-महाभारत


करीबन बीस साल पहले भारत आज जैसा नहीं था. ये जो कंप्यूटर-इन्टरनेट-फेसबुक वगैरह हैं, ये भी नहीं हुआ करते थे.

हर तरफ व्याप्त इन्टरनेट जब नहीं था तो रेलवे का रिजर्वेशन भी अभी जैसा नहीं होता था. पहले तो तीसरी श्रेणी के लोगों का कोई रिजर्वेशन का हक़ ही नहीं होता था, फिर जब स्लीपर में कैटल क्लास टाइप शुरू हुआ, तो बिना रिजर्वेशन के आप आरक्षित डिब्बे में नहीं घुस सकते ,ऐसा नियम नहीं था.

इन्टरनेट ना होने की वजह से आप हर छोटी-मोटी जगह से आरक्षण करवा भी नहीं सकते थे. बड़े लोगों के लिए था आरक्षण, मामूली आदमी का इसपर कैसा अधिकार?


दो दशक पहले के उस दौर में अगर आपको सहरसा से दिल्ली जाना हो तो एक दिन सुबह की ट्रेन से समस्तीपुर जाना होता था. फिर समस्तीपुर से आरक्षण करवा के शाम की गाड़ी से देर रात वापिस आते.


लोगों को आरक्षण की ज्यादा जानकारी भी नहीं होती थी. ऊपर से लम्बे सफ़र में एक भाषा वाले के पास जब दूसरी भाषा बोलने वाला बैठा होता तो और दिक्कत!


ऐसे ही माहौल में एक बार मौलाना साहब और एक बाबू मोशाय एक ही जगह ऊपर नीचे के बर्थ पर थे. बांग्ला और उर्दू का ज्यादा मेल ना था तो बात चीत क्या होगी?


निदान… बंगाली बाबू अपनी ऊपर की बर्थ पर जा कर सो गए. थोड़ी देर में मौलाना भी नीचे लेट गए.


कुछ समय बाद बंगाली बाबू को शायद शौचालय जाने की जरूरत पड़ी. उतरने की कोशिश करते वो बोले, ओ बाबा एकटू शोरो, आमी पादेबो!


नीचे मौलाना साहब ने सुना फिर अनसुना कर दिया. भद्र पुरुष फिर बोले, ओ बाबा एक टू शोरो (थोड़ा खिसको), आमी पादेबो (मैं पैर रखूँगा).

एक-दो बार तो उनकी बात को मौलाना ने अनसुना किया. आखिर वो खिसिया के उठे, ‘अबे तुझे पादना है, हगना है, मूतना है, जो करना है ऊपर कर! तेरी पाद के लिए मुझे क्यों हैरान परेशान कर रखा है?’


ये अलग-अलग भाषा की समस्या अक्सर होती है. किसी के पाद का मतलब हो या किसी की दस्त का अर्थ, कभी-कभी समझ में नहीं आता.


इसका अच्छा नमूना आपको धार्मिक किताबों में भी दिख जाएगा. आज के दौर में जो भाषा बोली जाती है वो उसमें होती ही नहीं. उसमें जो भाषा होती है, उसका आज के दौर में ज्यादातर अर्थ का अनर्थ ही होता है.


ऐसे में हिन्दुओं को अगर अगली पीढ़ी को उनकी समझ में आने लायक भाषा में हिंदुत्व समझाना काफी मुश्किल लगता है. कई बार खुद भी समझ में नहीं आ रहा होता.


इस समस्या का एक आसान इलाज है कि पकड़ के मैट्रिक्स फिल्म सीरीज़ दिखा दी जाए. इस सीरीज़ की तीन फिल्मों में जितना हिंदुत्व का दर्शन है उतना कई लोगों को खुद भी पता नहीं होता. ऊपर से एक्शन से भरपूर है तो देखने में भी मज़ा आता है.


फिर ये भी समझ आ जाता है कि जब सीधे-सीधे दर्शन की वेद-उपनिषद जैसी किताबें मौजूद थीं तो फिर रामायण-महाभारत जैसे राजदरबार, युद्ध, प्रेम, वियोग, जैसी दर्ज़नों कहानियों वाली किताबें क्यों लिखनी पड़ी.

पहले फिल्मों में देख लीजिये जो रोचक लगे उसे भगवद्गीता में ढूंढ लीजियेगा. आसान है!


कोई चम्मच है ही नहीं! (देयर इज नो स्पून)


जानी पहचानी फिल्म श्रृंखला “मेट्रिक्स” के कई दृश्यों में नायक निओ जब सर्वज्ञ (ओरेकल) से मिलता है तो वहां कोई न कोई बच्चा भी होता है। कई लोग जिन्होंने ये श्रृंखला कई बार देखी होगी,वो “देयर इज नो स्पून” कहते ही दृश्य भी पहचान लेते हैं। इस दृश्य में एक बच्चा बैठे बैठे केवल मानसिक शक्ति से चम्मच को मोड़ रहा होता है। पहले तो ये देखकर निओ को यकीन ही नहीं होता कि उसे कोई नजरों का धोखा नहीं हो रहा है। फिर वो खुद इसकी नक़ल करने की कोशिश करता है और नाकाम होता है।


उसे असफल होता देखकर बच्चा समझाता है कि कोई चम्मच है ही नहीं! (देयर इज नो स्पून) जिसे वो प्रकृति की दूसरी चीज़ें समझ रहा है, वो वास्तव में कोई उससे अलग नहीं, उसके स्वरुप का विस्तार है। जब निओ ये स्वीकारने लगता है तब चम्मच उसकी इच्छा से भी मुड़ने लगता है, और वो आश्चर्यचकित होकर समझना चाहता है कि ऐसा हुआ कैसे? ये भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का उन्तीसवां श्लोक है -


आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन

माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।

आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति

श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्।।2.29।


कोई इसे आश्चर्य के समान देखता है, कोई इसके विषय में आश्चर्य के समान कहता है, और कोई अन्य इसे आश्चर्य के समान सुनता है, और फिर कोई सुनकर भी नहीं जानता। निओ को जो परिवर्तन लाने थे, उसके लिए उसे चम्मच के विषय में सोचना ही नहीं था! जो परिवर्तन उसे प्रकृति (उसके संसार) में चाहिए थे, उनके लिए उसे कहीं बाहर नहीं, बल्कि स्वयं के अन्दर परिवर्तन करना था।


बाकी भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में ही आगे (इकतालीसवें श्लोक में) व्यवसायात्मिका बुद्धि यानी दूसरी कई वस्तुओं से ध्यान हटाकर केवल एक ही विषय पर ध्यान केन्द्रित करने की बात की जाती है। इन सभी हिस्सों को आपको स्वयं ही पढ़कर देखना चाहिए, क्योंकि जो हमने बता दिया है वो केवल नर्सरी स्तर का है और पीएचडी के लिए आपको खुद ही पढ़ना होगा,ये तो याद ही होगा।

✍🏻आनन्द कुमार


तो साल 1927 में अमेरिकी महिला लेखक मिस कैथरीन मेयो ने एक चर्चित किताब लिखी मदर इंडिया। इस किताब में बताया गया कि कैसे भारत जातिवाद, महिला शोषण, गरीबी, दरिद्रता का घर है और जस्टिफिकेशन था कि क्यों अंग्रेजों को भारत में अपना राज जारी रखना चाहिए ताकि भारत की जनता को सभ्य समाज बनाया जा सके। ये किताब इतनी चर्चित और अंग्रेजों द्वारा पसंद की गई थी कि स्वयं चर्चिल ने ब्रिटिश संसद में इस किताब की प्रति लहराकर भारत पर अंग्रेजों के राज को सही बताया था।


इस किताब के जवाब में लाला लाजपत राय ने अगले साल 1928 में एक किताब लिखी जिसका नाम था दुखी भारत। अब सौल साल के बाद हमें ये किताब उठा कर एक बार देखनी चाहिए। कैथरीन मेयो द्वारा भारत के चित्रण पर लाला लाजपत राय का जवाब पढ़ने लायक है और ध्यान देने लायक बात ये है कि आज भी आपको भारत से प्यार करने वाला कोई भी आम सा आदमी बिल्कुल इन्ही सब सवालों के जवाब देता मिल जाएगो जो लाला लाजपत राय 1928 में दे रहे थे।


देवदासी प्रथा, अछूत, शिक्षा का अधिकार नहीं, हिन्दू-विधवा (रत्ना पाठक का हालिया बयान जोड़ लें) , मां मानते हो और गाय को सड़क पर छोड़ देते हो, अंग्रेज न होते तो भारत कभी एक देश हो ही नहीं सकता था। ये ही सारे सवाल आज भी किए जाते हैं बस अंतर ये है कि तब अंग्रेज इन बातों के पीछे छिपकर अपनी मक्कारी को जस्टिफाई कर रहे थे और आज भारत में ही एक तबका तैयार किया गया है जो भारत के बड़े-बड़े विश्वविद्यायलों में बैठकर मिस मेयो के मदर इंडिया की सोच को हमारी देश के बच्चों में डालते हैं साथ में ये ही लोग दावा भी करके हैं कि अंग्रेजों से ये लोग लड़े थे।


और मिस मेयो का भारत का जवाब लिखने वाले लाला लाजपतराय की मौत का बदला लेने वाले भगत सिंह को अपना विचारधारा का भी बता देते हैं।


100 साल पहले सेम कहानी चल रही थी। अपनी एक किताब में श्रीमती एनी बिसेंट इस बात का जवाब लिख रही थी कि अंग्रेज चले गए तो 'ब्राह्मणवादी ताकतों का राज आ जाएगा' कैसे अंग्रेज इस खौफ की आड़ में अपना राज बचाए हुए है। 


बिल्कुल ये ही शब्दावली, ये ही सवाल आज भी भी जस के तस हैं

बस तब जवाब देने वाले लाला लाजपत राय अकेले थे

आज अनगिनत हैं


ये ब्राह्मणवादी और अंधविश्वासी भारत ही बिना किसी स्वार्थ के विश्व को राह दिखाएगा।


इस किताब में एक चैप्टर में लाला लाजपत राय ने लिखा भी है कि क्यों शक्तशाली भारत विश्व के लिए आवश्यक है।

✍🏻अविनाश


'Hello I am leaving on 11th November' वाला पोस्ट आपने कई लोगों की सोशल मीडिया वाल पर पढ़ लिया होगा | ये है क्या ? अगर आपको भी ये अजीब सा मज़ाक लगा हो तो थोड़ा सा पीछे जाइए | पीछे मतलब कबीर के युग में | फिर आप कबीर के के दोहे याद कीजिये |


एक जो प्रसिद्ध सा दोहा था वो कुछ ऐसा कहता है :-

कबीरा खड़ा बाजार में, लिए लुकाठी हाथ |

जो घर बारे आपना, सो चले हमारे साथ ||


आपको क्या लगता है कबीर आपको अपना घर जला के अपने साथ कहीं की यात्रा पर चलने कह रहे हैं ? जाहिर है जवाब नहीं है | वो किसी घर को जलाने की बात नहीं कर रहे | वो prejudice को, inhibitions को, आपकी मूर्खता को जलाने और पीछे छोड़ने की बात करते हैं | आखरी बार पांच सौ पन्ने कब पढ़े थे पूरे पूरे वो भी सोचिये | जिसकी रोज की जॉगिंग की आदत है उसके सात एक दिन में अचानक पांच किलोमीटर आप नहीं दौड़ सकते ये भी याद रखिये |


अगर आपको कबीर, नानक, तुलसीदास, या कहिये कि किसी भी लेखक का लिखा समझना है तो आपको पूरी बात पढ़नी होगी | अगर दोहा है तो पूरा सन्दर्भ पढ़ना होगा फिर दोहे को देखिये | अगर चौपाई है तो चार लेने में से एक लाइन पढ़ के हा हुसैन का विलाप मत शुरू कर दीजिये | कई बार लोगों का पढ़ने का अभ्यास कम होता है | आखरी किताब पूरी बरसों पहले पढ़ी थी | शब्दों के अर्थ और उनके प्रयोग की जानकारी कभी रही भी होगी तो भूल गए होंगे इतने साल में |


कई बार आपको शब्द ही नहीं शब्दों के बीच में भी पढ़ना होगा | जो लिखा गया है वही नहीं, जो बिना लिखे कह दिया गया वो भी पढ़ना होगा | कम से कम शब्दों में कई बार ज्यादा बात कही जाती है | जंगल की आग जैसा फैलना कहने के लिए एक शब्द दवानल भी काफी होगा | लेकिन दवानल का मतलब पता हो तब ना ? कम अभ्यास और उस से भी कम पृष्टभूमि की जानकारी पर पूरा कैसे समझ लिया ?


पूरा पूरा समझने के लिए कई बार लिखे हुए को बार बार पढ़ने की जरूरत भी होती है | कई बार पूरा समझाने के लिए लेखक अपने लिखे को बार बार सुधारता भी है | जिसे कई बार हजारों सालों में सुधार गया है ऐसा कुछ पढ़ रहे हैं तो गलती ढूंढ पाने की संभावना कितनी होगी ? और हमने जो फेसबुक पोस्ट आज लिखा मगर फिर खुद ही भूल गए और दोबारा देखा ही नहीं, उसके पूरा सही होने की संभावना कितनी होगी ?


बाकी शब्दों के बीच पढ़ने की बात पर आश्चर्य है तो, ऊपर के किसी भी पैराग्राफ में "मूर्ख" या "घमंडी" जैसे शब्द तो कहीं इस्तेमाल नहीं हुए हैं ना ? क्या कहा गया है वो फिर कैसे समझ आया ?

✍🏻आनन्द कुमार

जयप्रकाश त्रिपाठी की एक अद्भुत्त कविता --

 प्रस्तुति - वीरेंद्र सेंगर 


आगे-आगे कौवा नाचैं, पीछे से मुँहझौवा नाचैं, 

हौवी नाचै, हौवा नाचैं, पी के अद्धा-पौवा नाचैं ...

.

चारो ओर निखट्टू नाचैं, कुर्सी पर मुँह-चट्टू नाचैं,

महँगी उचक अटारी नाचै, एम०ए० पास बेकारी नाचै,

घर-घर में लाचारी नाचै, दिल्ली तक दुश्वारी नाचै 

लट्टू ऊपर लट्टू नाचैं, राजनीति के टट्टू नाचैं,

गा-गाकर कव्वाली नाचैं, बजा-बजाकर ताली नाचैं...


गुण्डा और मवाली नाचैं, औ उनकी घरवाली नाचैं,

शहर-शहर उजियारी नाचैं, गाँव-गाँव अन्धियारी नाचै,

रहजन खद्दरधारी नाचैं, अफ़सर चोर-चकारी नाचैं,

गाल बजावत मल्लू नाचै, सिंहासन पर कल्लू नाचै,

ठोकैं ताल निठल्लू नाचै, मन्त्री बन के लल्लू नाचै ...


छूरा नाचै, चाकू नाचै, पट्टी पढ़े-पढ़ाकू नाचैं,

चुटकीमार तमाखू नाचै, साधु वेश में डाकू नाचै

रात-रात भर टामी नाचै, मामा के संग मामी नाचै

उजड़े हुए असामी नाचैं, मालामाल हरामी नाचैं

ताकधिनाधिन ताकधिनाधिन ताकधिनाधिन त्ताआ ...

सोमवार, 21 नवंबर 2022

RS धुन

 TRANSMISSION 


रा धा स्व आ मी 


🎤  📹    📡


💥 प्रसारण प्रारंभ।

 *🌹🌹रा धा स्व आ मी, रा धा स्व आ मी, रा धा स्व आ मी, रा धा स्व आ मी, रा धा स्व आ मी, रा धा स्व आ मी, रा धा स्व आ मी, रा धा स्व आ मी, रा धा स्व आ मी!🌹🌹*


रवि अरोड़ा की नजर से.....

 ट्रेन की सीटी और संग्रहालय / रवि अरोड़ा



ट्रेन की आवाज़ अलग अलग लोगों के मन में अलग अलग भाव जगाती है। किसी को यह मधुर लगती है तो किसी को भयावह । कोई इससे वक्त का अंदाजा लगाता है तो कोई दार्शनिकनुमा व्यक्ति इससे प्रेरणा पाता है। किसी को इसमें संगीत का गुमान होता है तो कई ऐसे लोग भी हैं जिन्हें रेलगाड़ी की सीटी की आवाज से कोई अपना याद आ जाता है। मगर एक ट्रेन की आवाज़ ऐसी भी है जो सिर से पांव तक सिहरन पैदा करती है और उसकी सीटी ऐसी चीत्कार सी करती है कि रूह कांप उठे। मैं बात कर रहा हूं अमृतसर के पार्टीशन म्यूजियम में प्रदर्शित एक फिल्म की जिसमें बस एक ट्रेन है जो बंटवारे के समय शरणार्थियों से लदी भारत और पाकिस्तान के बीच कहीं से गुजर रही है। शरणार्थी जितने ट्रेन के भीतर होंगे उससे कई गुना अधिक उसकी छत पर दिखते हैं। एक बड़ी स्क्रीन पर दर्शाई जा रही मात्र दो मिनट की इस फिल्म में ट्रेन की सीटी बार बार कुछ ऐसे बजती है मानो अनगिनत लोग दर्द से चिंघाड़ रहे हों।


 पांच साल पहले अमृतसर के टाउन हॉल में बना था यह अनोखा संग्रहालय मगर इसे देखने का अवसर अब जाकर मिला । दर्द को सहेज कर रखने की जो मिसाल इस म्यूजियम ने कायम की है वैसी पूरी दुनिया में कहीं नहीं मिलेगी। भारत पाकिस्तान के बीच 1947 में हुए बंटवारे जिसमें कम से कम दस लाख लोग मारे गए और डेढ़ करोड़ लोग विस्थापित हुए, की हजारों कहानियां समेटे हुए है यह संग्रहालय । विभाजन से प्रभावित लोगों के कपडे, बर्तन, दस्तावेज और इस्तेमाल की छोटी से छोटी पांच हजार वस्तुओं को बड़े करीने से संजोया गया है इस म्यूजियम में। ये सभी वस्तुएं वह हैं जिन्हें स्वयं पीड़ितों ने इस संग्रहालय के लिए दान किया है। दंगों और विस्थापन से प्रभावित लोगों के इंटरव्यू और टूटे और लूटे गए घरों का संग्रहालय में बनाया गया स्वरूप मजबूत दिल वालों को भी भावुक करने को काफी नज़र आता है।  खास बात यह है कि यह संग्रहालय इतिहास के उस पीड़ादायक माहौल में आपको बिना किसी पक्षपात के ले जाता है। संग्रहालय में जिन लोगों का दर्द है उनका कोई धर्म नहीं है। वे केवल इंसान हैं जिन्हें कुछ कथित बड़े लोगों की अति महत्वकांक्षा ऐसा नासूर दे गई जो कभी भर ही नहीं पाया । वे लाखों महिलाऐं  जिनके साथ बंटवारे में बलात्कार हुआ अथवा अपनी अस्मत बचाने को जिन्होंने कुओं में कूदकर जान दे दी, उनकी अनकही कहानियों को बयां करता एक ऐसा कुआं भी इस म्यूजियम में बनाया गया है जिसमें झांकने को बड़े कलेजे की दरकार होती है।


इतिहास गवाह है कि अंग्रेज वकील सर सिरिल रेडक्लिफ जो भारत की भौगोलिक स्थिति से पूरी तरह अनजान था, ने कागज़ पर लकीर खींच कर ही बंटवारे की रस्म अदायगी कर दी थी । वायसरॉय माउंटबेटन ने भी आज़ादी की घोषणा पहले की और बंटवारे को बाद में अंजाम दिया । नतीजा भारत और पाकिस्तान दोनो की उन नई सरकारों को दंगे रोकने की जिम्मेदारी उठानी पड़ी जिन्हें यह भी नहीं पता था कि पुलिस, फ़ौज और ब्यूरोक्रेसी का कौन आदमी उसके देश में रहेगा और कौन दूसरे मुल्क जायेगा । परिणाम स्वरूप मानव इतिहास की सबसे बड़ी आबादी बदल हत्याओं, लूटपाट और बलात्कारों की भेंट चढ़ गई । इस म्यूजियम को देखने के बाद मेरा बेटा इतना आक्रोशित था कि उसे इस बात पर भी एतराज होने लगा कि इस म्यूज़ियम में उसके साथ कुछ अंग्रेज भी विभाजन की दर्दनाक तस्वीरें क्यों देख रहे हैं। वह गुस्से से बोल उठा कि इन लोगों को यहां घुसने की हिम्मत ही कैसे हो गई ।



रविवार, 20 नवंबर 2022

साहित्य संसद के रूप में स्थापित हो रहा है कथा संवाद : सुरेश उनियाल

 


करुणा ही कहानी को श्रेष्टता की ओर ले जाती हैं : पंकज शर्मा


कथा संवाद ने पूरा किया वाचन यात्रा का वार्षिक पांचवा पड़ाव

                

  गाजियाबाद। सुप्रसिद्ध रचनाकार सुरेश उनियाल ने कहा कि "कथा संवाद" में हुआ विमर्श बताता है कि यह आयोजन साहित्य संसद का स्वरूप लेता जा रहा है। जिसके जरिए कहानी की वाचिक परंपरा समृद्ध हो रही है। उन्होंने कहा कि माना यह जाता है कि प्रकाशित हो कर ही लेखक और लेखन जनमानस में लोकप्रिय होता है।रामचरित मानस का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वाचिक परंपरा ने ही लोक में उसे स्थापित किया है। उन्होंने कहा कि प्रकाशित रचनाओं में भी कच्चापन देखने को मिल रहा है। आज के अधिकांश संपादक प्रोफेशनल न होकर कई तरह के दबाव में काम कर रहे हैं। लेखक अपना निर्माता स्वयं होता है। लिहाजा तारीफ से प्रसन्न होने के बजाए लेखक को अपना आलोचक स्वयं बनना चाहिए।

  मीडिया 360 लिट्रेरी फाउंडेशन की ओर से होटल रेडबरी में आयोजित "कथा संवाद" में श्री उनियाल ने कहा कि सुनी गई तमाम कहानियां इस बात का सुबूत हैं कि नई पीढ़ी समाज की विसंगतियों का सूक्ष्मता से विश्लेषण कर रही हैं। मुख्य अतिथि पंकज शर्मा ने कहा कि लिख कर, सुन कर कहानीकार नहीं बना जा सकते। एक ही शब्द कहानी को बना देता है और एक ही शब्द कहानी को गिरा भी सकता है। कहानी की इस पाठशाला में सुनी गई अधिकांश कहानियां करुणा के बहुत करीब हैं। करुणा ही कहानी को श्रेष्टता की ओर ले जाती है। उन्होंने कहा कि बतौर संपादक बहुत सी अधकचरी रचनाओं को पढ़ने के लिए वह अभिशप्त हैं। लेकिन यह विमर्श नए लेखन को मांजने के साथ उन्हें गढ़ने का अभिनव प्रयोग कर रहा है। उन्होंने कहा कि नए लेखकों को धीरज और धैर्य का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए। अति विशिष्ट अतिथि योगेश अवस्थी ने कहा कि लिखने के लिए पढ़ना जरूरी है। कभी यह नहीं सोचना चाहिए कि मैंने जो लिख दिया वह श्रेष्ठ है। एक लेखक को हमेशा आलोचक की शरण में रहना चाहिए। आलोचना हजम करने की क्षमता ही रचनाकार को बड़ा लेखक बनाती है। एक बार पहचान खत्म हो जाए तो लेखक भी एक ब्रांड की तरह खत्म हो जाता है। संस्था के अध्यक्ष शिवराज सिंह ने कहा कि कथा यात्रा का यह सफर पांच वर्ष पूर्ण कर चुका है। संयोजक सुभाष चंदर ने जानकारी दी कि "कथा रंग पुरस्कार 2021-22" के लिए प्राप्त 194 प्रविष्टियों में से पुरस्कार योग्य चयनित कहानियों की घोषणा अपने चरण में है।

  कार्यक्रम का संचालन रिंकल शर्मा ने किया। कथा संवाद में मनीषा गुप्ता ने 'वासुदी', शकील अहमद ने 'बबुआ', प्रतिभा प्रीत ने 'नाइट लैंप', बीना शर्मा ने 'बत्तो' व मनु लक्ष्मी मिश्रा ने 'कल्लो' कहानी का पाठ किया। विमर्श में अशोक मैत्रेय, सुभाष चंदर, आलोक यात्री, वीणा शुक्ला, डॉ. पूनम सिंह, विपिन जैन, राष्ट्र वर्धन अरोड़ा, अनिल शर्मा, रविन्द्र कांत त्यागी, सुभाष अखिल, सत्य नारायण शर्मा, अक्षयवर नाथ श्रीवास्तव, तेजवीर सिंह, शैलजा सिंह, प्रतिमान उनियाल व सिमरन ने हिस्सा लिया। विगत कार्यक्रम में सुनी गई रिंकल शर्मा की कहानी 'प्यारा सा ठग' को "किआन कथा सम्मान" एवं रश्मि वर्मा की कहानी "फोर बैडरूम फ्लैट" को "दीप स्मृति कथा सम्मान" स्वरूप 11-11 सौ रुपए की प्रोत्साहन राशि प्रदान की गई। इस अवसर पर वागीश शर्मा, संजयवीर भदौरिया, तिलक राज अरोड़ा, रिशी अवस्थी, अमित जैन, राजेश कुमार, सौरभ कुमार, ओंकार सिंह, वीरेंद्र सिंह सहित बड़ी संख्या में श्रोता उपस्थित थे।


शनिवार, 19 नवंबर 2022

लक्ष्य हासिल हो इतना तो आसां नहीं।/ अनंग

 *"जल रहा है कोई"*


बोझ   लादे   हुए   चल  रहा  है  कोई।

दूसरों   के   लिए  ढल  रहा  है  कोई।।


फूल  की  सेज  पर  जीना  आसान है।

धूल  में  घास   में  पल  रहा  है  कोई।।


भीड़  में  ज्ञान  अपना   बघारो   मगर।

ध्यान से देख  लो  टल  रहा  है  कोई।।


उड़  रहे  छोकरों  ये  भी  सोचो   जरा।

पालने   के   लिए  गल  रहा  है  कोई।।


लक्ष्य  हासिल हो इतना तो आसां नहीं।

गौर   से   देखिए  जल  रहा  है  कोई।।


बढ़ रहे  हो  अगर, है  दुआ  का असर।

देख  लो  फूल  बन  फल रहा है कोई।।


जब तलक थी जवानी न समझा कभी।

अपने हाथों को अब मल रहा  है कोई।।


आपसी  बात   लोगों   में   जाने  लगी।

जानिए  बन  सगा  छल  रहा  है कोई।।...*"अनंग"*

बुधवार, 16 नवंबर 2022

अनंग की तीन ग़ज़लें


 "मेरी राधा महारास है"


गुलमोहर  वह  अमलतास  है।

हर   पल  मेरे  आस-पास  है।।


उसकी   छाया  इतनी  शीतल।

वह   बसंत  वह  मधुमास  है।।


कोमल   मधुर   कल्पना   मेरी।

वह  मेरी   विश्वास - आस   है।।


चितवन   की   चंचलता   ऐसी।

अंतर्मन   की   वह  उजास  है।।


आई  बनकर  शत्रु  तमस  की।

मन-मंदिर की वह  प्रकाश  है।।


आंगन   में   उतरी   विभवारी।

चंद्र-किरण सी वही  भास  है।।


तन-मन  मधुर मनोहर उसका।

हुलस मिले बस यही प्यास है।।


गंगाजल   जैसी   वह   पावन।

मेरी     राधा    महारास     है।।


योग-मिलन  मन की प्रत्याशा।

अलंकार-रस   वह   समास   है।।..

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 *"गरीबों को खाना"*


सभी   चाहते   हैं   वतन   को   बनाना।

मगर  झूठ  का   है  यहां  ना  ठिकाना।।


पकौड़े   कहीं    चाय   जो   बेचते   हों।

उन्हें   राजनीति   कभी   ना    बताना।।


मेरे    देश     में     रामराज्य     जरूरी।

मगर  देवी  सीता  को  मत भूल जाना।।


जहां  आम  भी  होते   लंगड़े   वहां  से।

किसी  चोचलेबाज  को  मत  जितना।।


जिन्हें सिर्फ कुर्सी व  सत्ता से  मतलब।

वे  शिक्षा  को  बेचेंगे  हरगिज बचाना।।


जिन्हें कुछ नया करने  आता  नहीं  है।

उन्हें  सिर्फ  आता  है  उंगली  उठाना।।


न  भूलो  लगी   पेट  में  आग  जिनके।

कठिन है  उन्हें  देर  तक  रोक  पाना।।


मेरे   देवताओं   के  घर  तुम  बनाओ।

करो बंद लोगों का पर दिल  दुखाना।।


लगी  आग  बाजार  सड़कें  हैं  महंगी।

कि सीना दिखाकर भरो तुम खजाना।।


दोनों को  क्या  है  जरूरी  तो समझो।

अमीरों  को  योगा,गरीबों  को  खाना।।...


3


*"सौगंधो के आगे क्या है"


मैं  हूं  तो  कैसा  घबड़ाना,  संबंधों  के  आगे  क्या   है।

जल है थल है या मरुथल है, तटबंधों के आगे क्या है।।


ये दुनिया है बहुत मतलबी,भाग गये सब जब दुख देखा।

मिल जाए अपनों का  कंधा, इन कंधों के आगे क्या है।।


सच का साथी बनकर देखो सब हँसते, मैं पड़ा अकेला।

सबसे उत्तम गोरख धंधा, इन  धंधों  के  आगे  क्या  है।।


जिन पर पड़ा वही बन जाता, इतनी  खूबी  होती इसमें।

चला पुलिस का डंडा  देखो, इन  डंडों के आगे क्या है।।


मजदूरन की  भीगी  पलकें, हांफ  रही  है  रोता  बच्चा।

ठेकेदारों बाज तो आओ, तुम  अंधों  के  आगे  क्या है।।


कितने  नामों  के  चंदे  हैं, शहरों   में रहना  है  मुश्किल।

चंदों में  सम्मान  छिपा  जी, इन  चंदों  के आगे क्या है।।


रक्तदान  का   उत्सव  करते,  मैंने  देखा   युवाओं   को।

जिनके मन में  जन  सेवा  है, उन बंदों के आगे क्या है।।


तन-मन-वचन  कर्मरत‌  रहकर,आओ अपना देश बनाएं।

भारत  भूमि  की  सेवा  में, सौगंधों  के  आगे  क्या  है।।

                            ...*"अनंग"*

मंगलवार, 15 नवंबर 2022

कथा संवाद 20112022

 


_मीडिया 360 लिट्रेरी फाउंडेशन_ 

द्वारा आयोजित 

         *'कथा संवाद'* 

 में आप सादर आमंत्रित हैं


 _कार्यक्रम अध्यक्ष_ 

 *श्री सुरेश उनियाल* 

( वरिष्ठ कथाकार) 


 _मुख्य अतिथि_ 

 *श्री पंकज शर्मा* 

(सुविख्यात रचनाकार एवं कार्यकारी संपादक : 'पाखी' पत्रिका)


 _विशिष्ट अतिथि_ 

 *श्री योगेश अवस्थी* 

(आईएएस, वरिष्ठ रचनाकार एवं संपादक : 'भारतीय रेल' पत्रिका)


रविवार  : 20 नवंबर 

समय : 3.00 बजे दोपहर

स्थान : होटल रेडबरी, कालका गढ़ी चौक, अंबेडकर रोड, गाजियाबाद


सुभाष चंदर : संयोजक : 9311660057

शिव राज सिंह : अध्यक्ष : 9911037343

आलोक यात्री : सचिव : 7840052777


🙏🙏🙏🙏☝

सोमवार, 14 नवंबर 2022

हिंदी व्यंग्य के लिए राष्ट्रीय स्तर पर निम्न दो पुरस्कारों की घोषणा

 हिंदी साहित्य एवम व्यंग्य संस्थान रायपुर, छत्तीसगढ़ एवं डॉ. माया ठाकुर फाउंडेशन रायपुर, छत्तीसगढ़ के संयुक्त तत्वावधान में हिंदी व्यंग्य के लिए राष्ट्रीय स्तर पर निम्न दो पुरस्कारों की घोषणा की जा रही है - 


(1) कबीर साहित्य सम्मान (2023) सम्मान राशि - 11000 ₹

स्मृति डॉ.  माया ठाकुर धर्मपत्नी डॉ. महेंद्र कुमार ठाकुर

समग्र व्यंग्य लेखन पर दिया जाएगा।

(2) हरिशंकर परसाई व्यंग्य सम्मान (2023) सम्मान राशि - 11000 ₹ 

स्मृति किरण चौबे धर्मपत्नी राजशेखर चौबे 

समग्र व्यंग्य लेखन पर दिया जाएगा। 

दोनों ही पुरस्कार व्यंग्य विधा पर दिए जाने हैं। दोनों पुरस्कारों के लिए एक अलग-अलग प्रविष्टि भेजना अनिवार्य है। 

उपरोक्त दोनों पुरस्कारों के लिए व्यंग्यकार स्वयं अपने नाम की संस्तुति कर सकता है या अन्य कोई भी व्यक्ति या संस्था किसी व्यंग्यकार की अनुशंसा कर सकता है। इसमे लेखक का पूरा बायोडाटा, प्रकाशित पुस्तकों की सूची, तीन से पाँच (अधिकतम पाँच) चयनित पुस्तकों की दो-दो प्रतियाँ, इनके अतिरिक्त अन्य कोई विवरण जो आप देना चाहें, अपेक्षित हैं। पुस्तकें भेजना अनिवार्य नहीं है। अतः कोई भी लेखक अपनी प्रविष्टि भेज सकता है।

20 दिसंबर 2022 तक प्राप्त प्रविष्टियों पर ही विचार किया जाएगा।

छत्तीसगढ़ के व्यक्ति या संस्था द्वारा साहित्य, समाज सेवा, खेल व अन्य किसी भी क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य द्वारा समाज में एक नई चेतना एवं जागरूकता के साथ समाज को नई दिशा देने वाले व्यक्तियों व संस्था को सम्मानित करने के उद्देश्य से निम्न पुरस्कारों की घोषणा की जा रही है। सभी पुरस्कारों के लिए अलग-अलग प्राप्त प्रविष्टियों पर ही विचार किया जाएगा।  

(1) छत्तीसगढ़ गौरव (2023) - गिफ़्ट हैंपर 

छत्तीसगढ़ को गौरवान्वित करने वाले किसी भी संस्था या व्यक्ति को दिया जाएगा।

(2) छत्तीसगढ़ साहित्य सम्मान 2023

सम्मान राशि 2100 ₹

छत्तीसगढ़ के साहित्यकार को उनके समग्र लेखन के आधार पर दिया जाएगा।

(3) छत्तीसगढ़ समाज सेवा सम्मान 2023

सम्मान राशि 2100 ₹ 

छत्तीसगढ़ के किसी व्यक्ति या संस्था को उनके द्वारा छत्तीसगढ़ में समाज सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने के लिए दिया जाएगा।

(4) छत्तीसगढ़ खेल सम्मान 2023

सम्मान राशि 2100 ₹ 

छत्तीसगढ़ के किसी खिलाड़ी को उनके द्वारा किसी भी खेल में उल्लेखनीय प्रदर्शन के लिए दिया जाएगा।

पहले दोनों पुरस्कार राष्ट्रीय स्तर पर और अन्य चारों पुरस्कार छत्तीसगढ़ के लोगों के लिए सुरक्षित रहेंगे।

छत्तीसगढ़ गौरव 2023 के लिए व्यक्ति या संस्था का चयन,  चयन समिति द्वारा किया जाएगा। अन्य पुरस्कारों के लिए व्यक्ति या संस्था स्वयं अपना आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं या अन्य कोई भी उनके नाम की अनुशंसा कर सकता है।

इसमें  सम्मान के साथ ही  स्मृति चिन्ह, सर्टिफिकेट, शाल ,श्रीफल भी फरवरी 2023 में आयोजित गरिमामय सम्मान समारोह में निर्णायक मंडल द्वारा चयनित व्यक्तियों / संस्था  को दिया जाएगा। संस्थान के अध्यक्ष श्री राजशेखर चौबे जी ने जानकारी दी है कि इच्छुक व्यक्ति/ संस्था अपनी पूर्ण संस्तुति संस्थान के निम्नलिखित पते पर प्रविष्टि हेतु भेज सकते हैं। सभी पुरस्कारों के लिए निर्णायक समिति का निर्णय अंतिम एवं मान्य होगा।

अपनी प्रकाशित पुस्तक की दो प्रतियाँ अपने बायोडाटा के साथ 20 दिसम्बर 2022 तक निम्न पते पर प्रेषित किया जा सकता है ।

निर्धारित तिथि यानी 20 दिसंबर 2022 के बाद प्राप्त प्रविष्टियों पर विचार नहीं किया जाएगा। 

विशेष नोट : जिस पुरस्कार हेतु प्रविष्टि भेजी जा रही है, उसका नाम स्पष्ट अक्षरों मे सबसे ऊपर अवश्य लिखें।

पता - 

हिंदी साहित्य एवं व्यंग्य संस्थान रायपुर 

राजशेखर चौबे

 (फोन- 9425596643 ) 295/A  रोहिणीपुरम रायपुर छत्तीसगढ़ पिन 492010

अथवा

डॉ महेंद्र कुमार ठाकुर ( फोन 9425503229 )

HIG 19, सेक्टर 3,गायत्री नगर, स्टेट बैंक के पास, रायपुर,छत्तीसगढ़।


शनिवार, 12 नवंबर 2022

मोबाइल रोग / कौशल किशोर

 


ग़जब_का_रिश्ता


*मैं बिस्तर पर से उठा, अचानक छाती में दर्द होने लगा मुझे हार्ट की तकलीफ तो नहीं है? 


ऐसे विचारों के साथ मैं आगे वाली बैठक के कमरे में गया मैंने देखा कि मेरा पूरा परिवार मोबाइल में व्यस्त था*


*मैंने पत्नी को देखकर कहा- "मेरी छाती में आज रोज से कुछ ज़्यादा दर्द हो रहा है, डाॅक्टर को दिखा कर आता हूँ* 


*हाँ मगर सँभलकर जाना, काम हो तो फोन करना"   मोबाइल में देखते-देखते ही पत्नी बोलीं*


*मैं एक्टिवा की चाबी लेकर पार्किंग में पहुँचा, पसीना मुझे बहुत आ रहा था, ऐक्टिवा स्टार्ट नहीं हो रही थी*


*ऐसे वक्त्त हमारे घर का काम करने वाला ध्रुव साईकिल लेकर आया, साईकिल को ताला लगाते ही, 

उसने मुझे सामने खड़ा देखा*

*क्यों सा'ब ऐक्टिवा चालू नहीं हो रही है?*

*मैंने कहा- "नहीं..!!*

*आपकी तबीयत ठीक नहीं लगती सा'ब,*


*इतना पसीना क्यों आ रहा है?* *सा'ब इस हालत में स्कूटी को किक नहीं मारते,* 


*मैं किक मार कर चालू कर देता हूँ ध्रुव ने एक ही किक मारकर ऐक्टिवा चालू कर दिया, साथ ही पूछा-* 

*साब अकेले जा रहे हो?*

*मैंने कहा- "हाँ*

*उसने कहा- ऐसी हालत में अकेले नहीं जाते,* 

*चलिए मेरे पीछे बैठ जाइये मैंने कहा- तुम्हें एक्टिवा चलानी आती है?*


*सा'ब गाड़ी का भी लाइसेंस है, चिंता  छोड़कर बैठ जाओ पास ही एक अस्पताल में हम पहुँचे ध्रुव दौड़कर अंदर गया और व्हील चेयर लेकर बाहर आया*

*"सा'ब अब चलना नहीं, इस कुर्सी पर बैठ जाओ"*


*ध्रुव के मोबाइल पर लगातार घंटियां बजती रहीं, मैं समझ गया था। फ्लैट में से सबके फोन आते होंगे कि अब तक क्यों नहीं आया? ध्रुव ने आखिर थक कर किसी को कह दिया कि*


 *#आज_नहीं_आ_सकता*

*ध्रुव डाॅक्टर के जैसे ही व्यवहार कर रहा था, उसे बगैर बताये ही मालूम हो गया था कि सा'ब को हार्ट की तकलीफ है* 


*लिफ्ट में से व्हील चेयर ICU की तरफ लेकर गया*

*डाॅक्टरों की टीम तो तैयार ही थी, मेरी तकलीफ सुनकर। सब टेस्ट शीघ्र ही किये*


*डाॅक्टर ने कहा- "आप समय पर पहुँच गये हो, इसमें भी आपने व्हील चेयर का उपयोग किया, वह आपके लिए बहुत फायदेमन्द रहा"*

*अब किसी की राह देखना आपके लिए बहुत ही हानिकारक है


 इसलिए बिना देर किए हमें हार्ट का ऑपरेशन करके आपके ब्लोकेज जल्द ही दूर करने होंगे इस फार्म पर आप के स्वजन के हस्ताक्षर की ज़रूरत है डाॅक्टर ने ध्रुव की ओर देखा* 

*मैंने कहा- "बेटे, दस्तखत करने आते हैं?"*


*उसने कहा-* 

*"सा'ब इतनी बड़ी जिम्मेदारी मुझ पर न डालो"* 

*"बेटे तुम्हारी कोई जिम्मेदारी नहीं है तुम्हारे साथ भले ही लहू का सम्बन्ध नहीं है,*


 *फिर भी बगैर कहे तुमने अपनी जिम्मेदारी पूरी की वह जिम्मेदारी हकीकत में मेरे परिवार की थी एक और जिम्मेदारी पूरी कर दो बेटा*


 *मैं नीचे सही करके लिख दूँगा कि मुझे कुछ भी होगा तो जिम्मेदारी मेरी है ध्रुव ने सिर्फ मेरे कहने पर ही हस्ताक्षर  किये हैं", बस अब... ..*


*"#और_हाँ_घर_फोन_लगा_कर_खबर_कर_दो"* 


*बस, उसी समय मेरे सामने मेरी पत्नी का फोन ध्रुव के मोबाइल पर आया। वह शांति से फोन सुनने लगा*


*थोड़ी देर के बाद ध्रुव बोला-* *"मैडम, आपको पगार काटने का हो तो काटना, निकालने का हो तो निकाल देना मगर अभी अस्पताल में ऑपरेशन शुरु होने के पहले पहुँच जाओ हाँ मैडम, मैं सा'ब को अस्पताल लेकर आया हूँ,*


 *डाक्टर ने ऑपरेशन की तैयारी कर ली है और राह देखने की कोई जरूरत नहीं है"*

*मैंने कहा- "बेटा घर से फोन था?"*


*"हाँ सा'ब"* 

*मैंने मन में पत्नी के बारे में सोचा, तुम किसकी पगार काटने की बात कर रही हो और किसको निकालने की बात कर रही हो?*


 *आँखों में आँसू के साथ ध्रुव के कन्धे पर हाथ रखकर मैं बोला- "बेटा चिंता नहीं करते"*


*"मैं एक संस्था में सेवायें देता हूँ, वे बुज़ुर्ग लोगों को सहारा देते हैं, वहां तुम जैसे ही व्यक्तियों की ज़रूरत है"*


*"तुम्हारा काम बरतन कपड़े धोने का नहीं है, तुम्हारा काम तो समाज सेवा का है, बेटा पगार मिलेगा*

*#इसलिए_चिंता_बिल्कुल_भी_मत_करना"*


*ऑपरेशन के बाद मैं होश में आया, मेरे सामने मेरा पूरा परिवार नतमस्तक खड़ा था। मैं आँखों में आँसू लिये बोला- "ध्रुव कहाँ है?"*

*पत्नी बोली- "वो अभी ही छुट्टी लेकर गाँव चला गया कह रहा था कि उसके पिताजी हार्ट अटैक से गुज़र गये है,* 


*15 दिन के बाद फिर आयेगा"*

*अब मुझे समझ में आया कि उसको मेरे अन्दर उसका बाप दिख रहा होगा*


*हे प्रभु, मुझे बचाकर आपने उसके बाप को उठा लिया?*

*पूरा परिवार हाथ जोड़कर, मूक, नतमस्तक माफी माँग रहा था*


*एक मोबाइल की लत (व्यसन) एक व्यक्ति को अपने दिल से कितना दूर लेकर जाती है, वह परिवार देख रहा था* 


👌 *यही नहीं मोबाइल आज घर-घर कलह का कारण भी बन गया है बहू छोटी-छोटी बातें तत्काल अपने माँ-बाप को बताती है और माँ की सलाह पर ससुराल पक्ष के लोगों से व्यवहार करती है,


 जिसके परिणाम स्वरूप  वह बीस-बीस साल में भी ससुराल पक्ष के लोगों से अपनत्व नहीं जोड़ पाती.* 👍


*डाॅक्टर ने आकर कहा- "सबसे पहले यह बताइये ध्रुव भाई आप के क्या लगते हैं?"*


*मैंने कहा- "डाॅक्टर साहब,  कुछ सम्बन्धों के नाम या गहराई तक न जायें तो ही बेहतर होगा, 

उससे सम्बन्ध की गरिमा बनी रहेगी,

 बस मैं इतना ही कहूँगा कि वो आपात स्थिति में मेरे लिए फरिश्ता बन कर आया था"*


*पिन्टू बोला- "हमको माफ़ कर दो पापा, जो फर्ज़ हमारा था, वह ध्रुव ने पूरा किया, यह हमारे लिए शर्मनाक है। अब से ऐसी भूल भविष्य में कभी भी नहीं होगी पापा"*


*"बेटा,#जवाबदारी_और_नसीहत (सलाह) लोगों को देने के लिये ही होती है*


*जब लेने की घड़ी आये, 

तब लोग  बग़लें झाँकते हैं या ऊपर नीचे हो जाते हैं*

                   

*अब रही मोबाइल की बात...*


*बेटे, एक निर्जीव खिलौने ने जीवित खिलौने को गुलाम बनाकर रख दिया है अब समय आ गया है कि उसका मर्यादित उपयोग करना है*

*नहीं तो....*


*#परिवार_समाज_और_राष्ट्र को उसके गम्भीर परिणाम भुगतने पडेंगे और उसकी कीमत चुकाने के लिये तैयार रहना पड़ेगा"*


*अतः बेटे और बेटियों को बड़ा #अधिकारी या #व्यापारी बनाने की जगह एक #अच्छा_इन्सान बनायें*

          🙏🙏🙏🙏

*पता नहीं, किन महानुभाव ने लिखी है, लेकिन मेरे दिल को इतना छू गयी कि शेयर करने से मैं अपने आप को रोक नहीं पाया*

*यह हर बेटे बेटी के मोबाइल पर पहुंचनी चाहिए.!*

            *श्रोत अज्ञात*

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बुधवार, 9 नवंबर 2022

खुद ही चरणों में उतरना चाहती हूं।

 प्रेम की अविरल "सरिता" मैं तू है सागर,

मैं तेरी लहरों में मिलना चाहती हूं।

आंजुरी में शुभ्र पावन नीर हूं मैं,

खुद ही चरणों में उतरना चाहती हूं।


देख कुंदन सा मेरा चमका हुआ तन,

फूल की लड़ियों सा महका है मेरा मन।

दूसरा टिकता नहीं नयनों में कोई,

पा गई जनमों जनम का मैं रतन धन।

मैं दिये की भांति जलना चाहती हूं,

खुद ही चरणों में उतरना चाहती हूं।


बाहुओं के वलय को विस्तार दे दे,

रूक न तू निर्भीक सारा प्यार दे दे।

मन विकल है व्यग्र है व्याकुल बहुत है,

प्रेम का अपने मुझे उपहार दे दे।

नख से शिख तक तेरी रहना चाहती हूं,

मैं तेरी लहरों में मिलना चाहती हूं।


छोड़कर तुझको मैं कैसे रह सकूंगी,

विरह के क्षण न किसी से कह सकूंगी।

तू ही मेरा लक्ष्य है ये जानती हूं,

याद कर तुझको निरन्तर बह सकूंगी।

स्वप्न सारे पूर्ण करना चाहती हूं,

खुद ही चरणों में उतरना चाहती हूं।


प्रेम की अविरल नदी मैं तू है सागर,

मैं तेरी लहरों में मिलना चाहती हूं।

आंजुरी में शुभ्र पावन नीर हूं मैं,

खुद ही चरणों में उतरना चाहती हूं।


अक्षिता प्रताप

ग्रेटर नोएडा, गौतमबुद्ध नगर

सोमवार, 7 नवंबर 2022

करतारपुर साहेब से लौट कर ( भाग 1-6)

 सिक्खों से कुछ सीखो जी / रवि अरोड़ा 



दीपावली पर इस बार स्वर्ण मन्दिर अमृतसर में था। इस बड़े त्योहार के चलते हरि मंदिर साहब को रंग बिरंगी खूबसूरत लाइटों से भरपूर सजाया गया था । दिवाली और छुट्टी का दिन होने के कारण परिसर में बेहद भीड़ थी मगर फिर भी कहीं धक्का मुक्की, आपा धापी अथवा किसी किस्म की अव्यवस्था नज़र नहीं आई। दुनिया की सबसे बड़ी सामुदायिक किचन यानि गुरू राम दास रसोई में अटूट लंगर सदा की तरह निर्बाध चल रहा था। आमतौर पर इस लंगर में प्रति दिन एक लाख लोग निशुल्क खाना खाते हैं मगर त्यौहार के चलते यह संख्या अनुमानित तौर पर डेढ़ गुना अधिक तो रही ही होगी मगर फिर भी कहीं कोई बदइंतजामी नजर नहीं आई। जिसे देखो वही हाथ जोड़े भक्ति भाव में खड़ा था और सेवा कार्यों में जुटे लोग भी हाथ बांधे खड़े थे मगर सहयोग के लिए । सिर्फ हरि मन्दिर साहिब की ही बात क्यों करें, देश दुनिया का ऐसा कौन सा गुरुद्वारा है जहां ऐसा दृश्य प्रति दिन दिखाई न देता हो। 


इस बार कई सालों के बाद स्वर्ण मंदिर दर्शन के लिए आना हुआ । हर बार की तरह इस बार भी बहुत कुछ बदला बदला मिला । श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या और दर्शनों को और अधिक सुविधाजनक बनाने के लिए पिछ्ले कई दशकों से कोई न कोई बड़ा परिवर्तन हरबार देखता ही चला आ रहा हूं। नहीं परिवर्तित हो रही तो वह है सिक्खों की सेवा की प्रवृति। कहीं कोई पंडा पुरोहित नहीं, कहीं कोई वीआईपी दर्शन नहीं। पूरे परिसर में ले देकर दान के लिए बस दो गोलक, एक ग्रंथ साहिब के पास और एक परिक्रमा स्थल पर। आप प्रसाद दस रुपए का लें अथवा लाख रुपए का कढ़ाह डोने में उतना ही मिलेगा। कहीं कोई भेदभाव नहीं और कहीं अमीर को गरीब पर वरीयता नहीं। सैंकड़ों साल पहले गुरू नानक और अन्य गुरुओं ने जो शिक्षा दी उसी के अनुरूप स्त्री-पुरूष, अमीर-गरीब, ऊंच- नीच और धर्मी- अधर्मी का कोई भेद नहीं। संगत और पंगत के सिद्धांत के अनुरूप सभी एक साथ एक ही सरोवर में स्नान करो, एक साथ बैठ कर भोजन करो और फिर एक साथ बैठ कर प्रभु का सुमिरन करो। 


हालांकि धर्म कर्म में मेरा अधिक विश्वास नहीं है मगर पारिवारिक माहौल और संस्कारों के चलते सभी धर्मों के अधिकांश धार्मिक स्थलों पर हो आया हूं। लगभग सभी जगह गंदगी और अव्यवस्था का बोलबाला और अमीर गरीब का भेद नजर आया । बेशक चर्च भी खुद को संभाले हुए हैं मगर उनकी मंशा को इस देश में हमेशा से शक की नज़र से देखा गया है। ले देकर गुरुद्वारे ही बचे हैं जहां अभी तक कोई रोग नहीं लगा है। हालांकि अन्य धर्मों के मुकाबले सिख नया धर्म है और चंद सौ वर्षों में बड़ी कुरीतियां अपनी जड़ें जमा भी नहीं पातीं मगर सेवा और भक्ति की परम्परा से सिख कौम इंच भर भी विचलित होती दिखाई नहीं देती। कोरोना काल और अन्य आपदाओं के समय भी सिक्खों ने समाज की सेवा में बढ़ चढ़ कर हाथ बंटाया है। काश हिंदू धर्म के रहनुमा भी इनसे सीखें और पूजा पाठ के अतिरिक्त इंसानियत की सेवा में भी कुछ योगदान दें। क्या ही अच्छा हो कि हमारे मठ और बड़े मंदिर अपनी अरबों खरबों रुपए की दौलत सरकार को सौंप दें और देश की माली हालत को सुधारने में एक सकारात्मक भूमिका निभाएं। चलिए ये भी नहीं तो कम से कम भगवान के दर्शनों के नाम पर पैसे तो न वसूलें । गरीब को भी तो थोडा बहुत सम्मान दें और फिर बेशक जितना चाहें अमीर और ताकतवर के चरणों में लोट लगाएं।


 करतारपुर साहेब से लौट कर



हालांकि करतारपुर कॉरीडोर को खुले हुए पूरे तीन साल हो चुके हैं मगर मैं अब कहीं जाकर पाकिस्तान स्थित करतारपुर साहेब गुरुद्वारे के दर्शन कर पाया । बहुत गहरी इच्छा थी इस यात्रा पर जाने की मगर क्या करता कोरोना के चलते लगभग बीस महीने तो यह कॉरीडोर यूं भी बंद ही रहा और बाकी समय अपनी निजी समस्याओं से जूझने में व्यतीत हो गया। खास बात यह भी है कि मेरे बच्चे भी इस यात्रा के लिए लालायित थे। जब से उन्हें पता चला कि पाकिस्तान की इस यात्रा में पासपोर्ट पर इस पड़ौसी मुल्क की मुहर नहीं लगती तब से उनकी यह इच्छा और अधिक प्रबल हो गई। अब कौन नहीं जानता कि एक बार पाकिस्तान की मुहर पासपोर्ट पर लग जाए तो अमेरीका, आस्ट्रेलिया और यूरोप तो क्या छोटे मोटे देश भी अपने यहां आसानी से घूसने नहीं देते । हालांकि मैं और मेरे दोनो बच्चे धर्म कर्म में बहुत कमजोर हैं मगर पर्यटन को ही सही मगर हम धार्मिक स्थलों पर अकसर हो आते हैं। हां पत्नी यदि आज इस दुनिया में होती तो वह जरूर पूरे भक्ति भाव और श्रद्धा से करतारपुर के दर्शन करती । उसी का साथ निभाने को मैंने देश के अधिकांश धार्मिक स्थल देखे हैं। खैर, बात करतारपुर साहेब गुरूद्वारे की हो रही है तो अपने शब्द वहीं तक महदूद रखता हूं। 


करतारपुर कॉरीडोर के मार्फत पाकिस्तान जाने को लेकर बड़ी आशंका थी कि पता नहीं अनुमति मिलेगी भी अथवा नहीं ? इस गुरूद्वारे में तो यूं भी पूरी दुनिया से सिक्ख आते होंगे और चूंकि हमने सबसे बडे़ त्यौहार दीपावली पर वहां जाना तय किया है तो पता नहीं कितनी भीड़ वहां मिलेगी ? भारतीय होने के नाते पाकिस्तानियों के व्यवहार को लेकर चिंता थी सो अलग। हालांकि उनके बाबत बहुत सारी जानकारी मैं पहले से जुटा कर गया था मगर फिर भी अपनी आंखों से जब तक देख न लो, किसी बात पर आसानी से विश्वास भी तो नहीं होता। बीस दिन पहले ऑन लाईन रजिस्ट्रेशन के बाद गृह मंत्रालय और स्थानीय खुफिया विभाग से प्रपत्रों की जांच तो करा ली थी मगर यात्रा से चार दिन पहले अनुमति पत्र जब तक नहीं मिला यह तय ही नहीं हो पाया कि इस बार हम दीपावली गुरुनानक की निर्वाण स्थली पर मना पाएंगे अथवा नहीं। वैसे तो भारत की सीमा से मात्र चार किलोमीटर दूर है करतारपुर का गुरुद्वारा दरबार साहेब मगर लगभग आधी सदी तक जैसे हमसे हजारों किलोमीटर दूर ही था । आजादी के बाद अधिकांश सिक्खों द्वारा हिन्दुस्तान के इस भू भाग में आकर बसने के निर्णय के बाद पश्चिमी पंजाब ( अब पाकिस्तान )  में रह गई मुठ्ठी भर सिख आबादी अपने गुरुद्वारों की ढंग से देखभाल भी तो नहीं कर पाई। सन 1947 से सन 2000 तक तो यह पवित्र स्थान बंद ही रहा और  स्थानीय लोग अपने मवेशी यहां बांधते थे तथा गुरू घर की जमीन पर भी स्थानीय काश्तकारों का अवैध कब्जा था । साल 2004 से इसे भारतीय श्रद्धालुओं के लिए खोला गया और 2019 को कहीं जाकर इस कॉरिडोर से वीजा मुक्त आवाजाही का मार्ग खुला । कॉरीडोर हेतु भारतीय पक्ष में विकास कार्य का शिलान्यास करते हुए प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने इस महती कार्य को जर्मनी को दो भागों में बांटने वाली बर्लिन की दीवार ढहाए जाने जितना महत्वपूर्ण बताया था । मगर यह सवाल मौजू है कि क्या वाकई भारत पाकिस्तान के बीच की कोई दीवार इस कॉरीडोर के बनने से ढही है ? क्या सचमुच इस कॉरीडोर से करतारपुर साहेब की यात्रा सुगम हुई है ? क्या वाकई भारत और पाकिस्तान की सरकारें चाहती हैं कि दोनो देशों के आम नागरिक एक दूसरे से निर्बाध तरीके से मिलें और यह कॉरीडोर दोनो देशों के बीच सौहार्द पैदा करने में सहायक हो ? ऐसे तमाम सवाल हैं जो बेलाग लम्बी चर्चा की मांग करते हैं । 

क्रमश:



करतारपुर से लौट कर 

( भाग दो )


रवि अरोड़ा


अमृतसर से भारतीय सीमा के लिए हमने टैक्सी का सहारा लिया। आमतौर पर सभी को यही करना पड़ता है। सार्वजनिक परिवहन का कोई जरिया है नहीं और बाहर से आया कोई व्यक्ति पराए शहर में अपना वाहन भला कहां से लाएगा ? लौटते समय भी सीमा पर कोई वाहन मिलता नहीं इसलिए शाम तक के लिए ही सबको टैक्सी बुक करनी पड़ती है । ज़ाहिर है कि यह काम खर्चीला होता है। लगभग 65 किलोमीटर की एक तरफ की यात्रा और दिन भर सवारी का इंतज़ार करने के कम से कम तीन हजार तो टैक्सी वाले वसूलते ही हैं। अमृतसर से अजनाला होते हुए भारत पाक सीमा पर पहुंचते समय सड़क की हालत को देख कर कतई नहीं लगा कि हम किसी बहुप्रचारित यात्रा पर जा रहे हैं और इस यात्रा के नाम पर देश के नेताओं ने खूब सुर्खियां बटोरी हैं। बेशक यह कॉरिडोर खुले हुए तीन साल हो चुके हैं मगर भारत की ओर सड़कों पर अभी तक काम चल रहा है। दो स्थानों पर छोटे पुल बन रहे थे तो कम से कम तीन जगह सड़क की मरम्मत का काम चल रहा था । हालांकि वापसी में टैक्सी चालक ने कोई दूसरा मार्ग पकड़ा मगर मुख्य मार्ग की हालत देख कर तो मन खिन्न ही हो गया।


करतारपुर कॉरिडोर की पहला निशान बॉर्डर से सात किलोमीटर पहले ही दिखाई दिया जहां नई चार लेन सड़क का निर्माण किया गया है। साल 2019 की 26 नवंबर को मोदी जी ने यहीं पर इस कॉरिडोर का शिलान्यास किया था । यह सड़क हमें सीधा इमिग्रेशन सेंटर तक ले गई। यहां पहुंच कर तो ऐसा लगा जैसे हम किसी हवाई अड्डे पर आ गए हों। हवाई अड्डा भी ऐसा जो कई मामलों में दिल्ली हवाई अड्डे के टर्मिनल 3 को मात दे । हवाई अड्डे जैसी ही कदम कदम पर जांच और विदेश यात्रा के लिए की जाने वाली सारी औपचारिकताएं। नियमानुसार एक व्यक्ति केवल ग्यारह हज़ार रूपए ही करतारपुर ले जा सकता है मगर मेरे बच्चों ने खरीदारी को कुछ ज्यादा ही पैसे रख लिए थे सो वापिस जाकर टैक्सी चालक को अतिरिक्त पैसे सौंपने पड़े। हालांकि घोषित रूप से जरूरी प्रपत्रों में पासपोर्ट शामिल नहीं है मगर पासपोर्ट, आधार और यात्रा के लिए मिले इलैक्ट्रोनिक ट्रैवल ऑथोराईजेशन के बिना यात्रा नहीं हो सकती। चूंकि पाकिस्तान में पोलियो का प्रकोप है इसलिए हमें पोलियो की दवा भी पिलवाई गई। एक अलग काउंटर पर प्रति दिन के यात्रियों का रोजनामचा लिखा जा रहा था । हम उस काउंटर पर दोपहर के लगभग एक बजे पहुंचे थे तो मैंने देखा कि मेरा यात्री संख्या 63 था । यानि मेरे परिवार के अतिरिक्त उस समय तक मात्र साठ अन्य यात्री करतारपुर साहेब गए थे । उधर, सुरक्षा कर्मी हमें बार बार चेता रहे थे कि आप लोग बहुत लेट हो गए हैं और हमें वहां से हर सूरत चार बजे तक वापिस आना होगा । हालांकि घोषित रूप से शाम छह बजे तक तीर्थयात्री करतारपुर साहेब रुक सकते हैं मगर अनुपालन साढ़े चार बजे तक के हिसाब से ही कराया जा रहा है । इतना बड़ा गुरुद्वारा जो देश दुनिया की ढाई करोड़ से अधिक सिख बिरादरी और उससे भी अधिक संख्या में नानक नाम लेवा आबादी की श्रद्धा का केन्द्र हो और उसके दर्शनाभिलाषी मात्र 63 लोग ? और वह भी इतने बड़े त्यौहार के अवसर पर ? ऐसा कैसे हो सकता है कि 70 किलोमीटर  दूर स्थित गोल्डन टैंपल में रोजाना लाखों लोग देश दुनिया से पहुंचते हों और लगभग उतने ही प्रसिद्ध और एक तरह से उससे भी अधिक ऐतिहासिक महत्व वाले इस गुरूद्वारे में मात्र 63 की संख्या ? क्या यह पाकिस्तान का कोई ढकोसला है और उसने दुनिया को दिखाने के लिए तो कॉरीडोर खोल दिया और जमीनी स्तर पर हमें वहां की सरकार आने नहीं देती ? क्या कम संख्या में श्रद्धालुओं के करतारपुर जाने के लिए हमारी ही सरकार जिम्मेदार है और क्या वही कदम कदम पर अड़चने लगाती है? आखिर क्या वजह है कि आठ सौ करोड़ रूपए खर्च होने के बावजूद इस कॉरिडोर का लाभ नहीं लिया जा रहा ? इस कॉरिडोर के उद्घाटन के समय दोनो देश की सरकारों ने दावा किया था कि फिलहाल पांच हजार यात्री प्रतिदिन करतारपुर आयेंगे और बहुत जल्द यात्रियों की संख्या दस हजार कर दी जाएगी और वास्तव में यात्रियों की संख्या इतनी कम ? सवाल बहुत बड़ा था और मेरा पूरा दिन इसी से जूझने में बीता ।

क्रमश :



 करतारपुर से लौट कर

( भाग तीन )


रवि अरोड़ा


भारतीय इमिग्रेशन सेंटर पर सीमा सुरक्षा बल का कड़ा पहरा था । हालांकि गिनती तो नहीं की जा सकी मगर सुरक्षा कर्मियों समेत तमाम स्टाफ और सफाई कर्मियों को मिला लें तो कम से कम दो ढाई सौ लोग तो जरूर रहे होंगे। भारतीय टीम द्वारा हमें इलेक्ट्रिक वाहन के मार्फत सीमा पर स्थित पाकिस्तान इमिग्रेशन सेंटर तक पहुंचाया गया । बेशक तमाम अन्य सुविधाओं की तरह यह भी निशुल्क थी। पाकिस्तान पहुंचते ही लोग, भाषा, पहनावा और व्यवहार एक दम बदल गया । भारतीय कर्मचारी में जहां हमें इस यात्रा पर भेजने के लिए कोई उत्साह नहीं था वहीं मात्र सौ मीटर दूर पाकिस्तानी चेहरों पर बला की मुस्कान थी। चूंकि मेरे पूर्वज पश्चिमी पंजाब के ही रहने वाले थे अतः स्थानीय पंजाबी भाषा में सिद्धस्त होने का लाभ मैंने उठाया और उनकी ज़बान में खूब गपशप की । हमारे प्रपत्रों की जांच की मात्र औपचारिकता ही उधर निभाई गई । हां यह जरूर था कि प्रति यात्री बीस डॉलर की दर से उन्होंने हमसे फीस अवश्य वसूली। इसके बाद यहां भी छह सीट वाली उनकी एक इलैक्ट्रिक गाड़ी मौजूद थी जो हमें लेकर करतारपुर के लिए चल दी । हालांकि भारत की तरह यहां भी अनेक एसी बसें खड़ी थीं मगर तीन लोगों के लिए भला बस की भी कोई क्या जरूरत महसूस करता । 


सुंदर और साफ सुथरी सड़क पर धीरे धीरे हमारा वाहन करतारपुर साहेब की ओर बढ़ रहा था। सड़क के दोनो ओर कंटीले तारों की बाड़ थी । दूर दूर तक कोई आबादी अथवा यातायात भी नहीं था । लगभग एक किलोमीटर आगे बढ़ते ही रावी नदी आ गई । यह वही नदी है जिसके किनारे कभी मेरे पूर्वज रहा करते थे । उनका पैतृक शहर ओकाड़ा भी वहां से मात्र डेढ़ सौ किलोमीटर दूर था । ज़ाहिर है कि रावी को देखते ही मन पंजाब की उन कथाओं में खो गया जिसे सुनते सुनते मैं बड़ा हुआ हूं। रावी नदी पार करते ही करतारपुर का दरबार साहेब गुरुद्वारा नज़र आना शुरू हो गया । इस पूरे क्षेत्र को बाबा नानक ने ही आबाद किया था । रावी के किनारे ही उनका वह आध्यात्मिक स्थल था जहां अब गुरुद्वारा है। रावी के किनारे ही उनका अंतिम संस्कार किया गया था। बताते हैं कि उस जगह पर उनकी समाधि भी थी मगर नदी के धारा बदलने से वह स्थान पानी में समा गया । हालांकि इस ऐतिहासिक गुरुद्वारा में भी बाबा नानक की समाधि है मगर उसके बाबत अनेक अन्य कथाएं हैं। जैसे जैसे हम गुरुद्वारे के निकट पहुंच रहे थे , उसके बडे़ आकार का एहसास हो रहा था । फिलवक्त यह गुरुद्वारा 42 एकड़ भूमि पर विकसित है मगर पाकिस्तान सरकार ने उसके लिए पूरे चार सौ एकड़ भूमि अधिग्रहित की है। गुरूद्वारा परिसर के लिए अधिग्रहित जमीन कितनी बड़ी है इसका अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि अयोध्या के निर्माणाधीन राम मंदिर का परिसर कुल सत्तर एकड़ है। 


खैर, गुरूद्वारा परिसर में एक गाइड हमारा इंतजार कर रहा था। वह स्थानीय पर्यटन विभाग का कर्मचारी था । उसने हमें पूरे परिसर के बाबत विस्तार से बताया और फिर हमें भ्रमण के लिए अकेला छोड़ दिया । सबसे पहले हम परिसर के केन्द्र में बने गुरुद्वारे में ही गए । बेशक पूरा परिसर बहुत बड़ा है मगर इस गुरुद्वारे का मूल स्वरूप सुरक्षित रखने की गरज से उसमे कोई खास छेड़छाड़ नहीं की गई है। पहली मंजिल पर जहां गुरू ग्रंथ साहब का प्रकाश हो रहा है वह कमरा तो मात्र बीस फुट बाई पच्चीस फुट का ही है और उसने एक वक्त में बामुश्किल पचास आदमी ही खड़े हो सकते हैं। गुरुद्वारे में माथा टेक कर हम लोग पूरे परिसर को देखने निकले तो वहां एक से बढ़ कर एक चौंकाने वाली चीजें हमें नजर आईं।

क्रमश:



करतारपुर साहेब से लौट कर

( भाग चार )


रवि अरोड़ा


करतारपुर गुरुद्वारा परिसर में श्रद्धालुओं के लिए देखने योग्य एक से बढ़ कर एक चीजें हैं। सबसे महत्वपूर्ण तो बाबा नानक की मजार ही है जो पिछले पांच सौ सालों से यहां श्रद्धा का बड़ा केन्द्र है। सिख और हिंदू संगत के अतिरिक्त स्थानीय मुस्लिम आबादी भी इस मजार पर बड़ी संख्या में माथा टेकने आती है। बाबा नानक के जीते जी ही मुस्लिमों ने उन्हें पीर की संज्ञा दे दी थी और आज भी वे स्थानीय मुस्लिम आबादी के दिलों में बसते हैं। यह मजार ठीक वहीं है जहां बाबा नानक ने अपना शरीर छोड़ा था। पास में ही रहट युक्त एक कुंआ भी है। बताया जाता है कि इसी से बाबा अपने खेतों की सिंचाई करते थे। गुरुद्वारे के जीर्णोद्धार के समय पांच सौ साल पुराना एक और कुआं मिला था और माना गया कि यह भी बाबा नानक से संबंधित है। पाकिस्तान सरकार ने सिक्खों की परम्परा के अनुरूप परिसर में सरोवर का भी निर्माण करवाया है। हालांकि सिख धर्म की मान्यताओं के अनुरूप स्त्रियों और पुरुषों के लिए एक ही सरोवर न बनवा कर दोनो के लिए अलग अलग सरोवर बनवाए गए हैं। जाहिर है कि इस मामले में सिक्ख नहीं इस्लामिक जीवन शैली को तरजीह दी गई है। परिसर में बहुत बड़ा लंगर हॉल भी है जहां एक साथ दो हजार लोग बैठ कर भोजन कर सकते हैं। लगभग इतने ही यात्रियों के ठहरने को भी कमरे और डॉरमेट्री वहां है । अब इस कॉरीडोर का निर्माण और गुरुद्वारे का जीर्णोद्धार राजनेताओं ने कराया है तो जाहिर है कि राजनीति भी यहां अपने पदचिन्ह छोड़ गई है।


पाकिस्तान सरकार ने दावा किया था कि करतारपुर दुनिया का सबसे बड़ा गुरुद्वारा बनने जा रहा है। अपनी इस घोषणा को यथार्थवादी दिखाने को उसने गुरुद्वारे के लिए कुल 1450 एकड़ भूमि चिन्हित की थी मगर अधिग्रहण अभी तक मात्र चार सौ एकड़ भूमि का ही हुआ है। दावा किया गया था कि गुरुद्वारे के पास पांच सितारा होटल और अन्य सुविधाएं भी होंगी मगर इमरान खान सरकार के गिरने के बाद पाकिस्तान में अब इनका नामलेवा भी कोई नहीं बचा है। पाकिस्तान में कुल 195 बडे़ गुरुद्वारे हैं और लगभग सभी का संचालन और देखभाल पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंध कमेटी करती है मगर करतारपुर साहेब से कमेटी को दूर ही रखा गया है और स्वयं सरकार इसका संचालन कर रही है। यहां तक कि नौ सदस्यीय संचालन समिति में एक भी सिख नहीं है। सबसे बड़ी राजनीतिक शरारत तो स्वयं इमरान ख़ान सरकार ने की और  गुरुद्वारे के ठीक बगल में एक चबूतरा सा बना कर उसपर एक बोर्ड लगा दिया कि साल 1971 की लड़ाई में भारत ने इस गुरुद्वारे को नष्ट करने के लिए यहां एक बम फेंका था मगर गुरू महाराज की कृपा से गुरुद्वारे का रत्ती भर भी नुकसान नहीं हुआ । पाकिस्तान की यह हरकत वहां आए हरेक नानक नाम लेवा को नागवार गुजरती होगी मगर इसका कोई खास विरोध अभी तक नहीं हुआ है । भला यह कोई कैसे मान सकता है कि भारतीय सेना, जिसमें सिख बड़ी तादाद में हैं, वह अपने इतने महत्त्वपूर्ण धर्मस्थल को नष्ट करने की चेष्टा करेगी। खैर, इसके बाद हम लोग लंगर हॉल में गए जहां हमारे अतिरिक्त बस दो दंपति और थे । साफ सुथरी शानदार रसोई में तैयार किया गया लजीज़ भोजन हमारे सामने था और मैं दावे से कह सकता हूं कि यह भोजन भारत के किसी भी बड़े से बड़े गुरुद्वारे में परोसे गए लंगर से रत्ती भर भी कमतर नहीं था।

क्रमश:



करतारपुर से लौट कर

( भाग पांच )


रवि अरोड़ा


करतारपुर साहेब में सबसे अधिक जो बात आकर्षित करती है, वह है पाकिस्तानियों का हम भारतीयों के प्रति व्यवहार। वे लोग भारतीयों से ऐसे मिलते हैं जैसे मेले में बिछड़े दो भाई हों। शनिवार और इतवार को सैंकड़ों की तादाद में पाकिस्तानी इस गुरुद्वारे में केवल भारतीयों से मिलने की गरज से ही आते हैं। निकट का सबसे बड़ा शहर है नारोवाल और वहां के लोग सबसे अधिक यहाँ पहुंचते हैं। हालांकि लाहौर और फैसलाबाद समेत कराची जैसे बड़े शहरों के लोग भी इसी उद्देश्य से यहां आते हैं। भारतीयों के लिए कोई मिठाई लेकर आता है तो कोई घर से लजीज़ खाना बनवा कर लाता है। भारतीयों को देखते ही पाकिस्तानी अदब से दुआ सलाम जरूर करता है। हालांकि वहां के हिंदू पुरुष भी अब पठानी सलवार कुर्ता पहनते हैं और हिंदू महिलाएं भी सिर ढक कर रखती हैं मगर फिर भी हाव भाव से साफ पता चलता है कि उनमें अधिकांश मुस्लिम होते हैं। भारतीयों के साथ हाथ मिलाने और उनके साथ तस्वीर खिंचवाने का भी पाकिस्तानियों में अच्छा खासा क्रेज है। 


पता नहीं मुझे क्या सनक हुई कि मैं मिलने वाले हर पाकिस्तानी से उसके शहर का नाम पूछने लगा । मुझे रावलपिंडी, लाहौर,मुल्तान, सरगोधा, गुजरात ( वहां का एक बड़ा शहर)  टोबा टेक सिंह, नारोवाल, सियालकोट, कराची और कुछ अन्य शहरों के लोग मिले। इन सभी से मैंने टूटी फूटी ही सही मगर उनके जिले की बोली के अनुरूप पंजाबी में बात की। पंजाबी की इन तमाम उपबोलियों में बात करने का मुझे बचपन से ही शौक है। सराइकी भाषा भी काम चलाऊ बोल लेता हूं जो पाकिस्तान के एक बड़े भूभाग में बोली जाती है अतः स्थानीय लोगों से संवाद करने में मुझे कोई दिक्कत नहीं आई। भाषा का लाभ लोगों से खुल कर कुछ उगलवाने में भी काम आया । वैसे सच तो यह ही है कि स्थानीय लोग हम भारतीयों से बात करने को उत्सुक रहते हैं और मुझ जैसे बतरसी लोगों से तो आसानी से ही खुल जाते हैं। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि सभी पाकिस्तानी यहां हम लोगों से मिलने ही आते हैं, धार्मिक भाव से भी बड़ी संगत यहां पहुंचती है। यह भी सच है कि ऐसे लोग जिनके पाकिस्तान में रिश्तेदार अथवा मित्र हैं और चाह कर भी उन्हें वहां जाने का वीजा नहीं मिलता वे उन्हें करतार पुर साहेब बुला लेते हैं और बिना किसी झंझट के दोनो देशों के ये लोग पूरा दिन यहां साथ बिताते हैं। अखबारों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार बंटवारे में बिछड़े आठ परिवार भी इस गुरुद्वारे की बदौलत अब तक आपस में मिल चुके हैं।


पूरा परिसर घूमने के बाद हम लोग चारदीवारी के भीतर ही बनाए गए छोटे से बाजार में पहुंचे। वहां लगभग बीस अस्थाई दुकानें हमें नजर आईं। कोई कपड़े बेच रहा था तो कोई लकड़ी का सामान। किसी दुकान पर मुल्तान का डिब्बा बंद मशहूर कराची हलवा बिक रहा था तो किसी पर महिलाओं के श्रृंगार की वस्तुएं अथवा स्मृति चिन्ह। लाहौर निवासी एक दुकानदार एहसान से मैंने जब यह कहा कि तुम्हारे पास नया क्या है, ये सब जो तुम बेच रहे हो वह तो हमें भारत में भी मिल जायेगा । इस पर उस दुकानदार ने कुछ ऐसा कहा कि मैं उसे गले लगाने से खुद को रोक नहीं पाया । लगभग तीस पैंतीस वर्षीय यह दुकानदार एहसान बोला- वीर जी यह प्यार आपको वहां नहीं मिलेगा । 



करतारपुर से लौटकर

( अंतिम भाग )



रवि अरोड़ा


हर बात को कुरेद कुरेद कर जानने की जिज्ञासा और अखबार नवीसी के अनुभव का परिणाम यह हुआ कि दोपहर होते तक गुरुद्वारे का एक सुरक्षा कर्मी मुझे इंटरव्यू दे रहा था । नारोवाल निवासी इस सुरक्षा कर्मी आसिफ़ से मैं मूलत: यही जानना चाहता था इतना बड़ा गुरुद्वारा,  इतनी बड़ी लागत, सीमा के दोनो ओर हुई भरपूर राजनीति और जम कर प्रचार प्रसार के बावजूद यहां भारतीयों की आमद इतनी कम क्यों है ? इस पर आसिफ़ का कहना था कि पाकिस्तान सरकार तो चाहती है मगर भारत सरकार ही अपने लोगों को यहां भेजने में रोड़े अटकाती है। बकौल उसके पाकिस्तान सरकार ने भारत से कई बार कहा है कि अपने लोगों को वह केवल आधार कार्ड के मार्फत ही भेज दे मगर भारत की ओर से पासपोर्ट के बिना यहां आने का आवेदन ही नहीं किया जा सकता । इसके अतिरिक्त भारत में पुलिस और अन्य विभागों की जांचों के चलते भी अनेक आवेदक चाह कर भी यहां नही आ पाते । आसिफ के अनुसार पाकिस्तान सिख गुरूद्वारा प्रबंध कमेटी ने भी भारत से अनुरोध किया है कि सभी ऐच्छिक श्रद्धालुओं को वह वहां भेजे और इसके लिए पाकिस्तान सरकार बीस डॉलर के अपने प्रवेश शुल्क को भी मुआफ करने को तैयार है। 


आसिफ़ ने ही बताया कि पाकिस्तान सरकार की ओर से यहां लगभग एक हजार लोग विभिन्न कार्यों के लिए रोजाना तैनात रहते हैं। लगभग साढ़े सात सौ तो स्थानीय सीमा सुरक्षा बल के ही जवान हैं और बाकी सभी सेवादार हैं। भारत की ओर भी सैंकड़ों लोगों की तैनाती मैं देख कर आया था । यानि दोनो सरकारों की ओर से लगभग डेढ़ हजार सरकारी स्टाफ का खर्च और भारतीय श्रद्धालुओं की संख्या मात्र उंगलियों पर गिनने योग्य ? आसिफ और अन्य लोगों ने बताया कि यहां केवल सौ डेढ़ सौ भारतीय ही रोज आते हैं। हां शनिवार और इतवार को जरूर यह संख्या दोगुनी हो जाती है। बेशक बैसाखी और गुरुपर्व आदि पर दो ढाई हजार भारतीय यहां पहुंचते हैं मगर उनमें अधिकांश वही होते हैं जो बकायदा वीजा लेकर वाघा बॉर्डर से पाकिस्तान आए हुए होते हैं । उन दिनों में भी करतारपुर कॉरीडोर से आने वालों की संख्या चार सौ पार नहीं करती। यानि जिस उद्देश्य से यह कॉरीडोर बनाया गया वह कहीं पीछे छूट गया ।


सिख धर्म के प्रथम गुरु बाबा नानक के बारे में अधिक न जानने वालों को बता दूं कि बाबा की मृत्यु के पश्चात उनके मुरीद मुसलमानों ने उनके फूल जहां दफनाए थे उसी जगह करतारपुर का गुरुद्वारा दरबार साहेब है और जहां हिंदुओं ने उनका अंतिम संस्कार किया वह जगह भारत के गुरुदासपुर जिले में है और वहां पर डेरा बाबा नानक गुरुद्वारा है। दोनो गुरुद्वारों में मात्र सात किलो मीटर की दूरी है। बंटवारे के समय अंग्रेज अफसर रेडक्लिफ की बेवकूफी से एक ही महत्व के दो स्थान अलग अलग देशों में चले गए । उधर, पाकिस्तान सरकार ने तो अपने गुरूद्वारे की काया पलट कर दी है मगर भारत का गुरुद्वारा डेरा बाबा नानक सदियों से अभी भी इसके इंतजार में है। भारत के सिख करतार पुर साहेब बिना वीजा के जा सकते हैं मगर पाकिस्तान के सिक्खों को डेरा बाबा नानक गुरुद्वारे के दर्शन को अभी भी वीजा लेना पड़ता है। हालांकि अपने अपने देश से श्रद्धालु दूसरे देश के गुरुद्वारे को दूरबीन से देखते रहते हैं मगर उनकी मांग है कि इस कॉरीडोर से दोनो गुरुद्वारों को जोड़ा जाए ताकि बाबा नानक की स्मृतियां वे और अच्छे से संजो सकें। आगामी आठ नवम्बर को बाबा नानक का जन्म दिवस है । क्या ही अच्छा हो कि इस अवसर पर दोनो देश की सरकारें करोड़ों नानक नाम लेवा संगत को यह तोहफा दे सकें। 

समाप्त

 

 

प्रेम जनमेजय होने का मतलब /

  मैं अगस्त 1978 की एक सुबह पांच बजे दिल्ली के अंतर्राज्यीय बस अड्डे पर उतरा था, किसी परम अज्ञानी की तरह, राजधानी में पहली बार,वह भी एकदम अक...