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फ़रवरी, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हमारा शरीर और ग्रहों का वास

 *ग्रहों का शरीर में स्थान….* सौर मंडल में जिस तरह नौ ग्रहों का अस्तित्व है,ठीक उसी  मानव शरीर में भी नौ ग्रह मौजूद हैं।ll  ये ग्रह शरीर के विभिन्न अंगों में उपस्थित हैं। ग्रहों का संबंध मानवीय चिंतन से है और चिंतन का संबंध मस्तिष्क से है। चिंतन का आधार सूर्य है। इसीलिए हमारे आदि ऋषियों ने सूरज का स्थान मानव शरीर में माथे पर माना है। ब्रह्मा रंध्र से एक अंगुली नीचे सूर्य का स्थान है। इससे एक अंगुली और नीचे की ओर चंद्रमा है। चंदमा इंसान को भावुकता और चंचलता से जोड़ता है,साथ ही कल्पना शक्ति से भी। चूंकि चंदमा को सूर्य से रोशनी लेनी पड़ती है,इसीलिए चंद्रमा का सूर्य के साये में नीचे रहना आवश्यक है। सूर्य के तेज का उजाला जब चंद्रमा पर पड़ता है,तब इंसान की शक्ति,ओज,वीरता चमकती है। ये गुण चिंतन की प्रखरता से ही निखरते हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार मंगल का स्थान मानव के नेत्रों में माना जाता है। मंगल शक्ति का प्रतीक है। यह प्रतिभा और रक्त से संबंध रखता है। मानव की आंख मन का आईना है,जैसे शिव का तीसरा नेत्र उनके क्रोध का प्रतीक है। इंसान के मन की अवस्था को भी आंखों से पढ़ा और समझा जा सकता है। हमारे

जगदीश बरनवाल कुंद अबतक उपेक्षित क्यों ?

(आजमगढ़ : माटी के लाल) / हिंदी संस्थान का सम्मान तो उन्हें पहले मिल जाना चाहिए था..! @ अरविंद सिंह जी हाँ, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का 'पांडेय बेचने शर्मा उग्र' सम्मान आजमगढ़ के सुप्रसिद्ध साहित्यकार जगदीश बरनवाल कुंद को मिलने की खब़र आ रही है. सच कहें तो यह देर से ही सही, सरकार द्वारा सही व्यक्ति का सम्मान है, अगर साहित्य में सियासत और सत्ता की गणेश परिक्रमा का युग नहीं होता और जुगाड़ संस्कृति का इस कदर कुप्रभाव नहीं होता तो यह सम्मान उन्हें कम से कम दशक भर पहले मिल जाना चाहिए था. इस सम्मान से जगदीश बरनवाल कुंद जैसा साहित्यकार नहीं सम्मानित होता, बल्कि उन्हें देकर सरकारें सम्मानित होतीं.   मेरा मानना है कि कुछ शख्सियत ऐसी भी होती हैं जिनके सम्मानित होने से समाज सम्मानित महसूस करता है, साहित्य और साहित्य अनुरागी सम्मानित महसूस करते हैं. क्योंकि वह साहित्यकार उस व्यापक जनमानस की मुखर अभिव्यक्ति होता  है, वह अपने समाज के दुख सुख और परिवेश का दर्पण होता है. अपने समय की तहरीर और स्वतंत्र आवाज़ होता है.  कुंद जी उसी धारा की मुसाफिर हैं, 'ना कहूँ से दोस्ती और ना कहूँ से बैर'

रश्मि शर्मा की कहानी 'निर्वसन'*

 *कथा-संवेद – 12* भारत और दुनिया के साहित्येतिहास में मिथकों के पुनर्लेखन की एक सुदीर्घ परंपरा रही है। *‘निर्वसन’* के केंद्र में सीता द्वारा दशरथ के पिंडदान की कथा है। फल्गू नदी के किनारे घटित इस कथा में सीता और राम पौराणिक या पारलौकिक पात्रों की तरह नहीं, बल्कि सामान्य स्त्री-पुरुष की तरह परस्पर बर्ताव करते हैं। स्त्री-पुरुष के बीच घटित होनेवाली स्वाभाविक परिस्थितियों के रेशे से निर्मित यह कहानी मिथकीय कथा-परिधि का अतिक्रमण कर बहुत सहजता से समकालीन यथार्थ के धरातल पर अपना आकार ग्रहण करती है। मिथक की जादुई संरचना में स्मृति, भ्रम, संभावना और पूर्वदीप्ति के उपकरणों से प्रवेश करती यह कहानी आधुनिक लैंगिक विमर्श का एक व्यावहारिक और विश्वसनीय पाठ तो रचती ही है, हमेशा से कही-सुनी गई मिथकीय कथा के छूट गये या कि छोड़ दिये गये पक्षों को भी संभाव्य की तरह प्रस्तुत करती है। नदी, वनस्पति और मानवेतर प्राणियों की सजीव उपस्थिति के बीच इस कहानी के चरित्र जिस तरह अपने मौलिक और आदिम स्वरूप में आ खड़े होते हैं, उसी में इसके शीर्षक की सार्थकता सन्निहित है। एक ऐसे समय में जब मिथकों की पुनर्प्रस्तुति के बहाने

बांग्ला साहित्य पर केंद्रित निकट का एक संग्रहणीय अंक / सुभाष नीरव अंक

 निकट : बांग्ला साहित्य पर केंद्रित अंक / सुभाष नीरव  ======================== इसमें कोई दो राय नहीं कि भारतीय भाषाओं का साहित्य बहुत समृद्ध और अमीर रहा है। इसकी झलक अनुवाद के माध्यम से हिन्दी पाठकों को मिलती रही है। हिन्दी की छोटी-बड़ी पत्रिकाओं और अखबारों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता जो समय समय पर भारतीय भाषाओं में लिखे जा रहे श्रेष्ठ साहित्य को अनुवाद के जरिये अपने पाठकों से रू-ब-रू करवाती रहती हैं। कोई भी व्यक्ति सभी भाषाओँ को नहीं सीख सकता है। उसे अन्य भाषाओं के साहित्य को पढ़ने, जानने-समझने के लिए अनुवाद पर ही आश्रित रहना पड़ता है। मैंने स्वयं विश्व का क्लासिक साहित्य ही नहीं, अपितु भारतीय भाषाओं के श्रेष्ठ साहित्य को अनुवाद के माध्यम से ही पढ़ा है। अनुवाद की महत्ता को समझते हुए बहुत सी पत्र पत्रिकाएं अनूदित रचनाएं अब स्थायी तौर पर नियमित छापने लगी हैं। पर दूसरी भाषाओं का साहित्य अभी हिन्दी पाठकों के सम्मुख टुकड़े टुकड़े रूप में आता है। ऐसे में हिन्दी की कुछ पत्रिकाओं ने भारतीय भाषाओं के साहित्य पर केंद्रित विशेषांक प्रकाशित कर बड़े काम भी किये हैं जिससे हिंदी के साहित्यप्रेमी पाठक क

अच्छी आदतें कैसे डाली जाय-

आदतें  ही मनुष्यता की पहचान है प्रस्तुति -  अनिल कुमार चंचल  बिना मनोयोग के कोई काम नहीं होता है। मन के साथ काम का सम्बन्ध होते ही चित्त पर संस्कार पड़ना आरंभ हो जाते हैं और ये संस्कार ही आदत का रूप ग्रहण कर लेते हैं। मन के साथ काम के सम्बन्ध में जितनी शिथिलता होती है, आदतों में भी उतनी ही शिथिलता पाई जाती है। यों शिथिलता स्वयं एक आदत है और मन की शिथिलता का परिचय देती है। असल में मन चंचल है। इसलिए मानव की आदत में चंचलता का समावेश प्रकृति से ही मिला होता है। लेकिन दृढ़ता पूर्वक प्रयत्न करने पर उसकी चंचलता को स्थिरता में बदला जा सकता है। इसलिए कैसी भी आदत क्यों न डालनी हो, मन की चंचलता के रोक थाम की अत्यन्त आवश्यकता है और इसका मूलभूत उपाय है- निश्चय की दृढ़ता। निश्चय में जितनी दृढ़ता होगी, मन की चंचलता में उतनी ही कमी और यह दृढ़ता ही सफलता की जननी है। जिस काम को आरम्भ करो, जब तक उसका अन्त न हो जाय उसे करते ही जाओ। कार्य करने की यह पद्धति चंचलता को भगाकर ही रहती है। कुछ समय तक न उकताने वाली पद्धति को अपना लेने पर फिर तो मनोयोग पूर्वक कार्य में लग जाने की आदत हो जाती है। तब मन अपनी आदत को

राधेसाम जी का तमगा / आलोक यात्री

 राधेसाम जी का तमगा / आलोक यात्री   हुआ यूं के... एम.ए. अंतिम वर्ष की परीक्षा देने से पहले ही मैं एक्सिडेंटल जर्नलिस्ट हो गया। कॉलेज से लौटते हुए एक दिन प्रलयंकर अखबार के मालिक संपादक श्री तेलूराम कांबोज जी ने हाथ पकड़ कर मुझे भाई श्री विनय संकोची के हवाले कर दिया। जर्नलिज्म में सलीके से एडजेस्ट हो पाता उससे पहले ही प्रलयंकर से मेरा डेरा-तंबू उखड़ गया। मेरा नया ठिकाना बना लखनऊ। जहां मुझे देश की नामी गिरामी दवा कंपनी में मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव का ओहदा मिल गया। लखनऊ लखनऊ ठहरा। नवाबों का शहर। मेरी ननिहाल और पिताश्री की ससुराल। भला हम से बड़ा नवाब कौन था?   एक उल्ट बात यह हुई कि भाई संकोची जी लखनऊ से गाजियाबाद पहुंचे थे और मैं वहां से लखनऊ। संकोची जी अखबार में "कह संकोची सकुचाए" कॉलम लिखा करते थे। अखबार में छपने से पहले प्रूफ रीडिंग में ही मैं संकोची जी के सकुचाने का रसानंद ले लिया करता था। इस कॉलम के मुख्य पात्र फुल्लू जी थे और हैं। संकोची जी जिस खूबसूरती से कॉलम लिखते हैं मैं उनका आज भी कायल हूं। उत्सुकतावश मैं उनसे लिखे कॉलम की सच्चाई पूछता रहता था और संकोची जी लखनऊ के अमीनाबाद

सोशल मीडिया और कामायनी / डॉ सकन्द शुक्ला

 जयशंकर प्रसाद की कामायनी का प्रथम पुरुष हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर बैठा भीगे नयनों से प्रलय-प्रवाह देख रहा है। वह नीचे कूद भी सकता है तैरने के लिए और गिर भी। गिरने और तैरने में किन्तु अन्तर बहुत बड़ा है। वैसे ही , जैसे अकेलेपन और एकान्त में।  सोशल मीडिया ग्लोबलाइज़ेशन की पुत्री है। स्थानीयता की जगह वैश्विकता जाति-धर्म-लिंग-नस्ल के बन्धनों को नहीं मानती। वह सबसे जुड़ना चाहती है और जुड़ती जाती है। उसके पास सबके लिए खुली बाँहें हैं : आओ और साथ मिल-बैठो यार !  लेकिन स्थानीयता के पास एक गुण था , जिससे वैश्विकता महरूम है। स्थानीयता के पास क्वॉलिटी थी। वैश्विकता के पास क्वॉन्टिटी चाहे जितनी हो , क्वॉलिटी का उसके पास टोटा है। सोशल मीडिया पर मित्र हज़ारों हैं, किन्तु वे सब आभासी दुनिया की ही हैं। वास्तविक मित्रों का प्रतिशत उनमें से बहुत न्यून ही पाया जाता है।  वह व्यक्ति जो दिनभर फ़ेसबुक पर रहता है , नितान्त अकेला है। वह एकान्तिक नहीं है , एकान्त में चुनाव का भाव जो होता है। एकान्त व्यक्ति स्वयं चुनता है , उसे किसी पर थोपा नहीं जाता। अकेलापन थोपा जाता है , वह एक प्रकार का अवांछित आरोपण ही है। एकान्

गीताश्री की नौ कविताएं

  गीताश्री  की कुछ कविताएं  ============================ पत्थर पर चोट करता है पत्थर  पत्थर पर चोट करता है पत्थर दोनों टूटते हैं थोड़े थोड़े दोनों चनक जाते हैं कई जगह से चोट करने वाला पत्थर क्यों नहीं समझता कि चोट करने से पहले ही टूट जाती है उसकी लय उसके भीतर का जीवन जिसमें जंगल उगाने की अपार ताक़त और संभावनाएँ होती हैं सूखा और निर्मम पत्थर सिर्फ़ चोट करना जानता है स्थिर , अपने भाग्य से जूझता हुआ निश्चेष्ट पत्थर एक दिन पूरा जंगल आयात कर लेता है. उसकी सुरक्षा वाहिनियों में तैनात हो जाते हैं कई कई ऐरावत अपनी सूँड़ों में भर कर आबे जम जम छिड़कते हैं वृक्षों पर पत्तों का हरापन धूप का उधार है मेघों के ज़रिये चुकाता है जंगल हर बरस , बरस बरस कर ... !! 2 खुद को थोड़ा छोड आई हूँ वहाँ /थोड़ा तुम संभाल लेना / मैं खुद को थोड़ा छोड आई हूँ वहाँ /थोड़ा तुम संभाल लेना / कुछ ले आई हूँ अपने साथ / जैसे कोई स्त्री ले जाती है अपने साथ लोकगीतों की कॉपी/  ब्याह के बाद उसका सबकुछ दूसरे तय करते हैं / कॉपी ले जाना वो खुद तय करती है / कि दर्ज होता है उसका समय /उसका उत्सव और उल्लास/ थोड़े दुख - दर्द...थोड़ा शुरु हो

साहित्यिक सफर पे गीताश्री का आत्मकथ्य

2013 से सीरियसली साहित्य का सफ़र शुरु हुआ था... उसी साल पहला कहानी संग्रह आया था. उसके पहले तीन किताबें आईं थीं जो कथेतर थीं.  पहली कहानी -2009 में लिखी. हंस में छपी. फिर कुछ दिन का विराम.  कहानियाँ लिख लिख कर रखती रही. कभी छपने भेज देती थी. कहीं से कोई कहानी लौटी नहीं. ज़्यादा पत्रिकाओं में भेजी भी नहीं. छपने की बहुत ख़्वाहिश इसलिए नहीं कि हम तो दूसरों को छापते रहे पच्चीस साल.  खुद भी छपते रहे. देश के नामी अख़बार, बेल पोर्टल और पत्रिका में काम किया. जो चाहिए.. सब हासिल किया. साहित्य की ओर लौटना था. कॉलेज के दिनों से साहित्यिक संस्था “ साहित्य कुंज “ चलाती थी. उस समय के साथी गवाह हैं. हमारी संस्था से जुड़े कई साथी आज स्थापित लेखक हैं.  हाँ तो...  कहानी लिखने लगी...गति तेज रखी. लोग अपनी किताबों और कहानियों की संख्या दिखाते थे, गिनाते थे. मुझे लगता था... उम्र इतनी हुई, कुछ न लिखा. गहरी हताशा होती थी. अपने नाकारेपन पर कोफ़्त.  फिर तेज दौड़ना शुरु किया...  सब काम छोड़ कर ...  पत्रिका बंद होने के बाद भी डिजीटल संपादक के रूप में साल भर काम किया. वहाँ मन न लगा. तब से खाली...  स्वतंत्र पत्रकार

सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

 🌹 निराला 🌹 ना धन की लालच रखते है ना सत्ता संग मिमियाते है जो मार्ग बदल दे नदियों का दम काव्य कलम का रखते है जो अपनी कलम के दम पर  सत्ता को थर्राते हे ऐसे कवि फिर काव्य जगत में कवि निराला बनते है बचपन बीत गया मेहनत में जीवन तो मुफ़लिसी में वटवृक्ष से डटे काव्य में बन सूर्यकांत त्रिपाठी से अनामिका, परिमल, गीतिका, गीत कुंज जो रचते है वह तोड़ती पत्थर से फिर कवि निराला बनते है कहीं छायावाद से अभिभूत कहीं करुणा का प्रस्फुटन है कहीं मौन प्रियतम चुम्बन है कहीं जनमभूमी का अर्चन है जो राम की शक्ति पूजा अपरा मातृ वंदना रचते है रचते काव्य जो कुकुरमुत्ता से कवि निराला बनते है उपन्यास निबन्ध कहानी संस्मरण जो रचते है गद्य पद्य की सभी विधा  बेजोड़ काव्य जो लिखते है अलका अप्सरा प्रभावती वो निरुपमा का रचयिता भारत की संस्कृति निराला युगदृष्टा फिर बनते है खंड काव्य रच  तुलसीदास सा कवि निराला बनते है करते है श्रृंगार कविता वीर हास्य रस रोद्र में मुक्त छंद में लिखी कविता रहस्यवाद की ओट में लोक गीत की भाषा में जो चित्र कविता रचते है प्रगतिवाद के रचनाकार फिर कवि निराला बनते है ललिता शर्मा शशि  नाथद्वारा  (र

बहुरानी

 ⚜️⚜️🆚⚜️⚜️ बहुरानी कथा           🆚  एक ब्राह्मण और ब्राह्मणी थे, वो सात कोस दूर गंगा जमुना स्नान करने जाते थे। रोज इतनी दूर आने-जाने से ब्राह्मणी थक जाती थी। एक दिन ब्राह्मणी कहती है कि कोई बेटा होता तो बहु आ जाती। घर वापिस आने पर खाना बना हुआ तो मिलता, कपड़े धुले मिलते। ब्राह्मण कहता है कि तूने भली बात चलाई ! चल, मैं तेरे लिए बहु ला ही देता हूँ। ब्राह्मण फिर बोला कि एक पोटली में थोड़ा सा आटा बाँध दे उसमें थोड़ी सी मोहर-अशरफी डाल दे। उसने पोटली बाँध दी और ब्राह्मण पोटली लेकर चल दिया।           चलते-चलते कुछ ही दूर एक गाँव में जमुना जी के किनारे बहुत सारी सुन्दर लड़कियाँ अपने घर बनाकर खेल रही थी। उनमें से एक लड़की बोलती है कि मैं तो अपना घर नहीं बिगाडूंगी, मुझे तो रहने के लिए ये घर चाहिए। उसकी बात सुन ब्राह्मण के मन पर वही लड़की छा गई और मन ही मन सोचने लगा कि बहु बनाने के लिए यही लड़की ठीक रहेगी। जब वह लड़की जाने लगी तो ब्राह्मण भी उसके पीछे चला और जब वह लड़की अपने घर पहुँचती है तब बूढ़ा ब्राह्मण बोला, "बेटी ! कार्तिक का महीना है, मैं किसी के यहाँ खाना नहीं खाता, तुम अपनी माँ से

तमाशा / जयनंदन

 तमाशा / जयनंदन कोई मायने नहीं रखता घुप्प अन्हरिया रात के आगे रंग काला चोर के आगे ताला और बेईमान के आगे केवाला। उघारे कमजोर बदन को कैसे छोड़ेगा पूस का पाला गैंता-कुदाल का वह वंशज जिसकी हथेली में है दरार और पैरों में छाला कब तक माटी पर टिका रहेगा गंदी हवा पीकर जब रोज उसके आगे से छिन रहा है निवाला। हर कोई मीरा तो नहीं हो सकता जो जिंदा रहे पी-पीकर जहर का प्याला। अब इस तमाशा को बंद करना चाहता है ग्वाला चतुराई से बांस के सहारे खड़ा करके मरे हुए पशुओं के कंकाल में लगाकर मसाला यह साबित करने के लिए कि इस इलाके में उम्दा, नायाब और बेहतरीन है उसकी गौशाला। एक राक्षस के उदय से गांव के कल पर भयानक कत्लेआम है मचने वाला क्योंकि उसका प्रिय शौक है पहनने का भोले किसानों के मुंड की माला। थके हुए, टूटे हुए, हारे हुए और निचुड़े हुए माटी-पुत्रों का कौन होगा रखवाला जबकि पहरेदार और चोर की दूरी मिट गयी है और उसके हाथों में थमा दिया गया है बहुमत से एक चोख और पैना भाला। (1989 में लिखी)

संत पलटू साहेब के अनमोल दोहे

 संत पलटू साहिब के दोहे /आत्म स्वरुप  आपै आपको जानते, आपै का सब खेल। पलटू सतगुरु के बिना, ब्रह्म से होय न मेल॥1॥ पलटू सुभ दिन सुभ घड़ी, याद पड़ै जब नाम। लगन महूरत झूठ सब, और बिगाड़ैं काम॥2॥ पलटू उधर को पलटिगे, उधर इधर भा एक। सतगुरु से सुमिरन सिखै, फरक परै नहिं नेक॥3॥ बिन खोजे से न मिलै, लाख करै जो कोय। पलटू दूध से दही भा, मथिबे से घिव होय॥4॥ वृच्छा बड़ परस्वारथी, फरैं और के काज। भवसागर के तरन को, पलटू संत जहाज॥5॥ पलटू तीरथ को चला, बीच मां मिलिगे संत। एक मुक्ति के खोजते, मिलि गई मुक्ति अनंत॥6॥ सुनिलो पलटू भेद यह, हंसि बोले भगवान। दुख के भीतर मुक्ति है, सुख में नरक निदान॥7॥ सोई सिपाही मरद है, जग में पलटूदास। मन मारै सिर गिरि पड़ै, तन की करै न आस॥8॥ ना मैं किया न करि सकौं, साहिब करता मोर। करत करावत आपु है, पलटू पलटू सोर॥9॥ प्रस्तुति - आत्म स्वरूप 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

रिक्शा चालक की किताब

 एक अद्भुत अनुभत प्रयोग बाल झड़ने की समस्या है तो आम की गुठली का तेल बनाऐ  आधा किलो गुठलियों को अच्छी तरह कुट कर दो किलो पानी में उबालें , जब पानी आधा रह जाए तब छलनी से छान लें , छने हुए पानी को एक कड़ाही में डालकर उबलने के लिए रख दें , पानी जब उबलने लगे तब आधा किलो तिल का तेल डाल दे , धीमी आंच पर पकने दें ,जब सारा पानी सुख जाए ,तब ठंडा कर के छान लें, सप्ताह में एक बार बालों में लगाएं ,हल्के हाथों से मसाज करें ,बाल झड़ना बंद हो जाएंगे...

लॉकडाउन में बस / सुभाष चंदर

कभी कभी लघुकथा भी ( श्री राजेश मांझवेकर जी के अतिथि संपादन में पत्रिका सत्य की मशाल में ) लॉकडाउन में बस सुभाष चंदर   वह तीन दिनों से   लॉक डॉउन में फंसा हुआ था। कहीं से उड़ती उड़ती खबर मिली  कि बस अड्डे से बसें उसके राज्य की तरफ जा रही हैं। वह किसी तरह  पुलिस से बचता बचाता बस अड्डे पर पहुंच गया । वहां जाकर पता लगा कि मजदूरों को  लेकर तीन बसें जा चुकी थीं ।चौथी बस  जाने वाली थी। बस पर जिस शहर का नाम लिखा था, वह जगह उसके इलाके से से लगभग  200 किलोमीटर थी ।पर मन में सोच थी कि एक बार किसी तरह अपने प्रदेश में ,अपने लोगों के बीच पहुंच जाएं बस।आगे तो पैदल भी पहुंच जाएंगे।सो वह आगे बढ़ गया।बस के पास ही   एक तरफ मजदूरों के नाम, पते, मोबाइल नंबर वगैरह नोट किए जा रहे थे।एक नेता टाइप आदमी सब नोट कर रहा था। उसके बाद ही मजदूरों को बस में बिठाया जा रहा था। लाइन लगी थी , वह भी उसका हिस्सा बन गया । जब उसका नंबर आया तो उसने भी अपना नाम, गांव,  जिला बताया तो वह नेता भड़क उठा। बोला ," माइक पे एनोंस हो रहा है और बस पे इतना बड़का बड़का अच्छरों में सहर का नाम लिखा है। फिर तुम आए काहे लाइन में।ये बस तुम

पंकज़ बिष्ट की दुनियां / राकेश रेणु

 दिल्ली आने के थोड़े समय बाद ही ‘समकालीन परिभाषा’ के प्रकाशन और फिर कुछ अंकों बाद आठवें दशक की कहानियों पर केंद्रित उसके विशेषांक की योजना बनी। साहित्य में मैं बाहरी आदमी था। आज भी कमोबेश यही स्थिति है।  छिटपुट पढ़ता था और दिनभर नौकरी के बाद उससे बहुत कम लिखना हो पाता था। एक किस्म का उत्साह और कुछ करने की ललक इस पत्रिका के प्रकाशन के फैसले का आधार बने। वही ललक और उत्साह इसके विशेषांकों की योजना के पीछे भी था।     जब हमने ‘समकालीन परिभाषा’ के आठवें दशक की हिंदी कहानियों पर केंद्रित विशेषांक की योजना बनाई तो सबसे पहले उसमें कहानी के क्षेत्र में सुज्ञात लोगों से परामर्श लेने का निर्णय लिया। तब तक पंकज बिष्ट के पहले उपन्यास ‘लेकिन दरवाजा’ को पढ़ चुका था। उन दिनों उनकी एक कहानी ‘बच्चे गवाह नहीं हो सकते?’ की खासी चर्चा थी। विशेषांक के लिए चुनी गई कहानियों में यह भी शामिल थी। दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं में आ रहे बदलाव और जनमानस में उपभोक्तावाद की ओर बढ़ते रुझान तथा भारतीय समाज व निम्न-मध्यवर्गीय परिवारों पर उसके प्रभाव को इंगित करने वाली यह एक महत्वपूर्ण कहानी है। अपनी प्रभावोत्पादकता और चमत्

निराला की कविताओं पर महादेवी वर्मा का उदगार

 ● मैं ही वसंत का अग्रदूत ! ●/  महादेवी वर्मा  महादेवी वर्मा निराला के अंतिम दिनों को याद कर के भावुक हो जाती हैं। बोलते-बोलते उनका गला रूँध जाता है। वो कहती हैं... "उस वक्त समझिए कुछ नहीं था, एक फटी चादर थी। वही छेद वाली फटी चादर ओढ़कर जमीन पर लेटे थे। अब तो रोना आ जाता है। बहुत कष्ट होता है उनको सोचकर। उनका एक टूटा बक्सा था जिसमें पैराडाइज लाॅस्ट और गीता, दो किताबें थीं। एक कपड़ा भी दूसरा नहीं। उसके बाद सरकार को (मृत्यु का) पता चला, तो ये हुआ कि उनका चित्र लेना है। कहां तो ओढ़ने को साफ चादर नहीं, कहां सरकार का पूरा विभाग दौड़ पड़ा और उनको सजाने लगा। जब वो मर गये तो उन्हें सजाने लगा, बताओ !"  (महादेवी वर्मा एक साक्षात्कार में।) अज्ञेय जैसे धीर-गंभीर और मितभाषी व्यक्ति ने भी निराला के कवि को मृत घोषित कर दिया था। यह बात निराला को शूल की तरह जीवन भर चुभती रही। अपनी विक्षिप्त मनोदशा में वो बार-बार इस उद्धरण को खुद दुहराते रहते ..निराला इज डेड ! बाद में अपने लिखे को मिटाने की अज्ञेय ने भरसक कोशिश भी की, लेकिन वह समय की शिला पर लिखा जा चुका मिथ्या वाक्य था। उस मिथ्या दुष्प्रचार म

विवाह

 विवाह एक खूबसूरत जंगल हैं, जहॉ..  बहादुर शेरों का शिकार  'बिल्लियां' करती है..!! 😊😊 'विवाह मतलब' अजी सुनते हो, से लेकर..   बहरे हो गए हो क्या..?  तक का सफर .!! 😊😊 . 'विवाह मतलब' तेरे जैसा कोई नहीं..  से लेकर..  तेरे जैसे बहुत देखे हैं..  तक का सफर..!! 😊😊 . 'विवाह मतलब' प्लीज आप रहने दीजिए..  से लेकर  मेहरबानी करके, आप तो रहने ही दो..  तक का सफर.. 😊😊 . 'विवाह मतलब' कहाँ गये थे जानू..  से लेकर  कहाँ मर गये थे..  तक का सफर.. 😊😊 . 'विवाह मतलब' आप मुझे नसीब से मिले हो ...  से लेकर  नसीब फूटे थे, जो तुम मिले...  तक का सफर.. 😊😊 . 'विवाहित जिंदगी' कश्मीर जैसी है❗ खूबसूरत तो है.,  परंतु आतंक बहुत है..‼️ 😝😝😆😆😅😅

ख़ुशी Vs संतुष्टि

 रिक्शे वाला 🔆/ कृष्ण मेहता  〰️〰️🔸🔸〰️〰️  एक बार एक अमीर आदमी कहीं जा रहा होता है तो उसकी कार ख़राब हो जाती है। उसका कहीं पहुँचना बहुत जरुरी होता है। उसको दूर एक पेड़ के नीचे एक रिक्शा दिखाई देता है। वो उस रिक्शा वाले पास जाता है। वहा जाकर देखता है कि रिक्शा वाले ने अपने पैर हैंडल के ऊपर रखे होते है। पीठ उसकी अपनी सीट पर होती है और सिर जहा सवारी बैठती है उस सीट पर होती है ।  और वो मज़े से लेट कर गाना गुन-गुना रहा होता है। वो अमीर व्यक्ति रिक्शा वाले को ऐसे बैठे हुए देख कर बहुत हैरान होता है कि एक व्यक्ति ऐसे बेआराम जगह में कैसे रह सकता है, कैसे खुश रह सकता है। कैसे गुन-गुना सकता है।   वो उसको चलने के लिए बोलता है। रिक्शा वाला झट से उठता है और उसे 20 रूपए देने के लिए बोलता है।   रास्ते में वो रिक्शा वाला वही गाना गुन-गुनाते हुए मज़े से रिक्शा खींचता है। वो अमीर व्यक्ति एक बार फिर हैरान कि एक व्यक्ति 20 रूपए लेकर इतना खुश कैसे हो सकता है। इतने मज़े से कैसे गुन-गुना सकता है। वो थोडा इर्ष्यापूर्ण  हो जाता है और रिक्शा वाले को समझने के लिए उसको अपने बंगले में रात को खाने के लिए बुला लेता है। र

पिथोरा चित्रकला

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  पिथोरा चित्रकला किसी अन्य भाषा में पढ़ें डाउनलोड करें ध्यान रखें संपादित करें पिथोरा चित्रकला  एक प्रकार की चित्रकला है। जो भील जनजाति के सबसे बड़े त्यौहार  पिठौरा  पर घर की दीवारों पर बनायी जाती है। मध्य प्रदेश  के पिथोरा क्षेत्र मे इस कला का उद्गम स्थल माना जाता है। इस कला के विकास में भील जनजाति के लोगों का योगदान उल्लेखनीय है। इस कला में पारम्परिक रंगों का प्रयोग किया जाता था। प्रायः घरों की दीवारों पर यह चित्रकारी की जाती थी परन्तु अद्यतन समय में यह कागजों, केन्वस, कपड़ों आदि पर की जाने लगी है। यह चित्रकला बड़ोदा से ९० किलोमीटर पर स्थित तेजगढ़ ग्राम (मध्य गुजरात) में रहने वाली राठवा, भील व नायक जनजाति के लोगों द्वारा दीवारों पर बनाई जाती है। पिथोरा चित्रकला इसके अतिरिक्त बड़ोदा जिले के तेजगढ़ व छोटा नागपुर ताल्लुक के आसपास भी पिथोरा चित्रकला घरों की तीन भीतरी दीवारों में काफी संख्या में वहां रहने वाले जनजातीय लोगों के घरों में देखी जा सकती हैं। पिथोरा चित्रकला का इन जनजातीय लोगों के जीवन में विशेष महत्व है तथा उनका यह मानना है कि इस चित्रकला को घरों की दीवारों पर चित्रित करने से