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सुंदत कांड के लाभ

 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 सुंदरकाण्ड का पाठ करने के चमत्कारिक 10 फायदे* महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण पर आधारित तुलसीकृत महाकाव्य रामचरित मानस का पंचम सोपान है सुंदरकाण्ड। सुंदरकाण्ड में रामदूत, पवनपुत्र हनुमान का यशोगान किया गया है। आओ जानते हैं सुंदरकाण्ड का पाठ करने के चमत्कारिक लाभ।   1. सुंदरकाण्ड का पाठ सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला माना गया है। किसी भी प्रकार की परेशानी या संकट हो, सुंदरकाण्ड के पाठ से यह संकट तुरंत ही दूर हो जाता है।   2. सुंदरकांड के पाठ से भूत, पिशाच, यमराज, शनि राहु, केतु, ग्रह-नक्षत्र आदि सभी का भय दूर हो जाता है।   3. हनुमानजी के सुंदर काण्ड का पाठ सप्ताह में एक बार जरूर करना चाहिए। ज्योतिष शास्त्र, ज्योतिष के अनुसार भी विषम परिस्थितियों सुंदरकांड पाठ करने की सलाह दी जाती है। 4. जीवन में किसी प्रकार की समस्या उत्पन्न होती है तो आप संकल्प लेकर लगातार सुंदरकांड का पाठ करें। सुंदरकांड पाठ से एक नहीं बल्कि अनेक सैकड़ों समस्याओं का समाधान तुरंत मिलने लगता है।   5. श्रीराम चरित्र मानस को रचने वाले गोस्वामी तुलसीदास के अनुसार हनुमान जी को जल्द प्रस

ख़ुशी की तलाश

 *मुस्कुराइए* / मनोज कुमार एक औरत बहुत महँगे कपड़े में अपने मनोचिकित्सक के पास गई और बोली "डॉ साहब ! मुझे लगता है कि मेरा पूरा जीवन बेकार है, उसका कोई अर्थ नहीं है। क्या आप मेरी खुशियाँ ढूँढने में मदद करेंगें?" मनोचिकित्सक ने एक बूढ़ी औरत को बुलाया जो वहाँ साफ़-सफाई का काम करती थी और उस अमीर औरत से बोला - "मैं इस बूढी औरत से तुम्हें यह बताने के लिए कहूँगा कि कैसे उसने अपने जीवन में खुशियाँ ढूँढी। मैं चाहता हूँ कि आप उसे ध्यान से सुनें।" तब उस बूढ़ी औरत ने अपना झाड़ू नीचे रखा, कुर्सी पर बैठ गई और बताने लगी - "मेरे पति की मलेरिया से मृत्यु हो गई और उसके 3 महीने बाद ही मेरे बेटे की भी सड़क हादसे में मौत हो गई। मेरे पास कोई नहीं था। मेरे जीवन में कुछ नहीं बचा था। मैं सो नहीं पाती थी, खा नहीं पाती थी, मैंने मुस्कुराना बंद कर दिया था।" मैं स्वयं के जीवन को समाप्त करने की तरकीबें सोचने लगी थी। तब एक दिन,एक छोटा बिल्ली का बच्चा मेरे पीछे लग गया जब मैं काम से घर आ रही थी। बाहर बहुत ठंड थी इसलिए मैंने उस बच्चे को अंदर आने दिया। उस बिल्ली के बच्चे के लिए थोड़े से दूध का इंत

चिट्ठियाँ...! / मनोहर बिल्लोरे

 चिट्ठियाँ...! / मनोहर बिल्लोरे  -------------  चिट्ठियाँ लिखना-पढ़ना अब,   भूल गये  बहुत सारे लोग  पढ़ने-लिखने वालों की संख्या में  जबकि, हुआ है बेतहाशा इज़ाफा  सिर झुकाये तरह-तरह के कामों में  दिन भर डूबे रहने वाले व्यस्त-पस्त,  सनकी-सिरफिरे-से वे डाक-बाबू,  अब नहीं रहे...  सनसनी सी फैलाती, प्रतीक्षा की बेचैनी वह – बनी रहती थी जो – कहाँ बची अब  पाई-पठाई, लिखीं-पढ़ीं जातीं और  घर-घर में, चर्चा में रहती थीं,  जब – चिट्ठियाँ...! जो पढ़ा-लिखा नहीं था  वह भी  दूसरों से पढ़वा-लिखवा लेता था  अपने दुख-दर्द, भाव-अभाव,  हर्षोल्लास, अपनी आशा-निराशाएँ,  चिंताएँ, दिल्लगी, हास-परिहास,  ठिठोली, प्रेम-तरंगें, आलिंगन,  और ज्वार--भाटे सब समां जाते  इन दो पैसों की चिट्ठियों में… अनपढ़ डाकिया भी -   दूसरों से पढ़वा कर पते -  बाँट देता था  घर-घर में   तय समय पर  सही जगह     सही-सही डाक...   अब तो इस समय -   पुश किये जाते हैं चट-पट-पट…  मनचाहे नंबर और कर ली जाती  बातें, झट-पट जी भर-भर… चाहें जब,   जहाँ चाहें और हो इच्छा तो  चेहरे पर चमकने वाले हाव-भाव भी  देख सकते हैं  आमने-सामने अंतर्जाल के ज़रिये,  रेडियो-तरंगों

जय महावीर ज्ञान गुण सागर / कृष्ण मेहता

 *हनुमानजी के जीवन में ज्ञान, कर्म* *और भक्ति की समग्रता विद्यमान है।*    °" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "°       रामराज स्थापना पश्चात श्री हनुमानजी को वापस भेजने की आवश्यकता भगवान् राम नहीं समझते हैं। उनके संदर्भ में प्रभु दूसरी बात सोचते हैं। *कई लोग ऐसे होते हैं कि जिनमें सामीप्य के कारण रस का अभाव हो जाता है। अधिक पास रहने से उन्हें बहुत लाभ नहीं होता। क्योंकि पास रहने से लाभ उठाने वाले मैंने बिरले ही व्यक्ति देखे हैं, बहुधा हानि उठाने वाले ही अधिक देखे हैं। लोग बहुधा आश्चर्य करते हैं कि बड़े-बड़े महात्माओं के अत्यन्त पास रहने वाले व्यक्तियों का स्वभाव बड़ा विचित्र होता है। बड़े-बड़े तीर्थों में रहने वाले व्यक्तियों का आचरण तीर्थ के आदर्श से बिल्कुल भिन्न होता है। इसका रहस्य यही है कि जैसे कोई व्यक्ति प्रतिदिन किसी एक ही वस्तु का भोजन करे तो धीरे-धीरे उसे उस वस्तु का स्वाद आना बन्द हो जाता है। इसी प्रकार से कोई व्यक्ति अगर बहुत लम्ब

मेरी प्यारी दोनों माताएं/ विजय केसरी

 "मातृ दिवस' पर गुरुदेव भारत यायावर  की 'मां' शीर्षक  कविता पढ़ कर अपनी दोनों माताएं याद आ गईं। अब दोनों माताएं स शरीर इस दुनिया में नहीं हैं। फिर भी हम सभी भाई-बहन उनके होने का एहसास हमेशा महसूस करते हैं। जब भी हम सब भाई बहन किसी मुसीबत में होते हैं , तो हमारी दोनों माताएं पीठ पीछे खड़ी होती है। गुरुदेव की कविता की पंक्तियां मन को छूती है। उनकी कविता पढ़ने के बाद कुछ पंक्तियां दोनों माताओं के श्री चरणों में अर्पित है। मेरी प्यारी दोनों  माताएंv यह ईश्वर की कृपा है, मुझे एक नहीं, दो - दो माताओं का, प्यार मिला। सर आप ट्यूशन पढ़ाने, हमारे घर आते थे, दोनों माताओं से मिलते थे, मेरी दोनों  माताओं का स्नेह प्राप्त करते थे। एक मां ने मुझे जन्म दिया, दूसरी मां ने लालन-पालन किया, दोनों माताओं की कृपा सदा, मुझ पर बनी रही। सिर्फ मुझ पर ही नहीं, बल्कि सभी भाई - बहनों पर, दोनों माताओं की कृपा, सदा समान बनी रही। समय के साथ दिन बीतते गए, हम बच्चे बड़े होते गए, दोनों माताओं की उम्र बढ़ती गई, मां - मां बनती गई । दोनों माताओं के आंचल में, हम बच्चे बसते  गए, जरा सी नजरों से दूर होते, मात

सलाह नहीं साथ चाहिए

 *प्रेरक कहानी*        एक बार एक पक्षी समुंदर में से चोंच से पानी बाहर निकाल रहा था। दूसरे ने पूछा भाई ये क्या कर रहा है। पहला बोला समुंदर ने मेरे बच्चे डूबा दिए है अब तो इसे सूखा कर ही रहूँगा। यह सुन दूसरा बोला भाई तेरे से क्या समुंदर सूखेगा। तू छोटा सा और समुंदर इतना विशाल। तेरा पूरा जीवन लग जायेगा। पहला बोला *देना है तो साथ दे*। सिर्फ़ *सलाह नहीं चाहिए*। यह सुन दूसरा पक्षी भी साथ लग लिया। ऐसे हज़ारों पक्षी आते गए और दूसरे को कहते गए *सलाह नहीं साथ चाहिए*। यह देख भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ जी भी इस काम के लिए जाने लगे। भगवान बोले तू कहा जा रहा है तू गया तो मेरा काम रुक जाएगा। तुम पक्षियों से समुंदर सूखना भी नहीं है। गरुड़ बोला *भगवन सलाह नहीं साथ चाहिए*। फिर क्या ऐसा सुन भगवान विष्णु जी भी समुंदर सुखाने आ गये। भगवान जी के आते ही समुंदर डर गया और उस पक्षी के बच्चे लौटा दिए।  आज इस संकट के समय में भी देश को हमारी सलाह नहीं साथ चाहिए। आज सरकार को कोसने वाले नहीं समाज के साथ खड़े हो कर सेवा करने वाले लोगों की आवश्यकता है ।इसलिए सलाह नहीं साथ दें।  *जो साथ दे दे सारा भारत, तो फिर से मुस्क

कोरोना : पांच ग़ज़ले / डॉ. वेद मित्र शुक्ल

 कोरोना: पाँच ग़ज़लें / डॉ. वेद मित्र शुक्ल     -     1. माना मुश्किल घड़ी आज, फिर भी हिम्मत बड़ी आज।   घर में रहकर भजन करें, छोड़ें हम हेकड़ी आज।   लक्ष्मणरेखा खिंची हुई, करना मत गड़बड़ी आज।   खतरे की जंजीर अगर, तोड़ें इक-इक कड़ी आज।   कट जायेगा कठिन समय, काहे की हड़बड़ी आज।   “खट्टे हैं अंगूर” कहे- कोरोना लोमड़ी आज।   2. समय बख्शा है कुदरत ने आओ घर को बनाएं घर अगर मुश्किल तो भी ठानें चाहे हो जो बनाएं घर।   सुनामी हो या कोरोना ये आखिर बीत जाते हैं, बिगाड़े मत धीरज खोकर, आओ, आओ बनाएं घर।   महामारी या कोई जंग मनुष्य जीता, जीतेगा, जहाँ भी हैं, चाहे बंकर या झोपड़ हो बनाएं घर।   प्यार, जज़्बातीपन, सपने औ एकजुटता इनसे हम- चलो भीतर अंतर्मन में आओ यारो! बनाएं घर।   खिंची है लक्ष्मण रेखा आज फिर से, गलती मत करना, शेष जो भी है अब चिंता छोड़ो हम तो बनाएं घर।   3. कौन पढ़े अखबार आज जग झूठा लागे, बेमतलब के राज-काज जग झूठा लागे।   इनकी-उनकी इधर-उधर की कौन सुने अब, भीटर यों है बजा साज जग झूठा लागे।   देह दे रही धोखा, बेबस साँसें उखड़ी,  किस पर यारा! करें नाज जग झूठा लागे।    इतना भी क्यों दुनियादारी में खोए हम, कोरो

माँ की यादें / मिथिलेश्वर

लेखन की प्रेरणा और किस्सागोई की जमीन / मिथिलेश्वर मां की पुण्य तिथि 8 मई पर विशेष। ------------------------------------------------------------------         ----------------------------------------------------------------- मेरे साहित्य पर शोध करनेवाले छात्र तथा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए मेरा साक्षात्कार लेने वाले रचनाकार-पत्रकार मित्र अक्सर यह प्रश्न अवश्य पूछते हैं कि लेखन की प्रेरणा मुझे कैसे और कहां से प्राप्त हुई तथा किन स्थितियों में मैंने  किस्सागोई ग्रहण की? ऐसे सवालों का जवाब देते हुए अपनी मां कमलावती देवी की याद मुझे बरबस आ जाती है।             वह साठ का दशक था।तब अपनी मां के साथ हम छोटे भाई-बहन अपने गाँव बैसाडीह में रहते थे।उस समय हम भाई बहन एकदम छोटे थे।हममे कोई सयाना नहीं था।पिताजी आरा में प्रोफेसर थे।वह रविवार या अवकाश के दिनों में ही गाँव आते थे।उस समय कालेज शिक्षकों की आय एकदम सीमित थी,इस स्थिति में जीविका के लिए अपनी पुश्तैनी खेती पर ही हम निर्भर थे।चूंकि पिताजी अकेले थे, ऐसे में गांव पर हम छोटे भाई बहनों की परवरिश के साथ मां  खेती की देखभाल भी करती थी।            

आज का पंचतंत्र

 आज का पंचतंत्र 1. आप ने जोग पहले सीखा या भाषण करना? भाषण ही मेरा जोग है। इस कला में इतने पारंगत कैसे हुए? राजनीति में आने के बाद। भाषण ही करते हैं या कुछ काम भी?  मैं करने वाला कौन होता हूँ। कर्ता कोई और है। मैं तो निमित्त मात्र हूँ। वह जो चाहता है, मैं वही करने लगता हूं। इससे पहले क्या करते थे? मंदिर में घंटा बजाता था। अगर जनता ने फिर मौका न दिया तो? तो फिर घंटा बजाऊंगा। 2. आप तो जोगी हैं। त्रिकालदर्शी। कुछ बताइये न। आगे क्या होने वाला है? अरे, तुम्हारी समझ में अभी भी नहीं आया? क्या बाबा? हम सब त्रेता की ओर जा रहे हैं।  वहां पहुँचकर क्या करेंगे? देखा जायेगा। वैसे वहां से पाषाणयुग ज्यादा दूर नहीं। 3. बाबा! संन्यास क्या है? जिंदगी का वह मोड़, जहां से किसी भी दिशा में चल पड़ना आसान हो जाता है। आप ऐसा कैसे कह सकते हैं? देखो मैं कहां से कहां आ पहुँचा हूँ।  कहां पहुँचे? कल तक जो मेरे पुरखों की चरण धूलि लेते नहीं अघाते थे, आज मुझे उनके आगे सिर नवाना पड़ रहा है। यह कोई मजबूरी तो है नहीं। आप चाहें तो इनकार कर दें। नहीं बच्चा! एक संन्यासी ही समझ सकता है कि जितना उठना चाहते हो, उससे ज्यादा गिरन

प्रभु के प्यारे हो गये प्रभु जोशी

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  इंदौर से बेहद दुःखद खबर आ रही है कि चित्रकार, कहानीकार, पत्रकार … प्रभु जोशी जी नहीं रहे. इंदौर में प्रभु दा का अपार स्नेह मुझे मिलता रहा. वो अक्सर कहते थे. जब रंग खरीद कर लाओ तो उसमें से सफेद और काला रंग निकालकर खिड़की से बाहर फेंक दो … जयदीप कार्णिक- कोरोना जैसे बस चुन-चुन कर हमले कर रहा है। एक खबर का सदमा पूरा तो क्या शुरु भी नहीं हो पाता और दूसरी ख़बर आ जाती है। गोया मन को दुखाने की होड़ सी लगी हो। आँखों पर मानो पत्थर बरस रहे हों। आँख खोल कर देखने का मौका भी नहीं है कि ये हो क्या रहा है। अब तो केवल आंसू ही नहीं, श्रद्धांजलि के लिए शब्द भी सूख गए हैं… अब ये कोरोना प्रभु दा को भी ले गया। शब्दों और रंगों का ऐसा चितेरा जिसने खुद को इंदौर के कैनवास तक ना समेटा होता तो उनका आसमान कहीं बड़ा होता, इसके बाद भी उन्होंने अपनी कला का इंद्रधनुष पूरी दुनिया तक पहुँचाया, देश दुनिया में अपनी प्रतिभा के रंग बिखेरे। उस इंद्रधनुष का एक सिरा हमेशा इंदौर की धरती पर ही टिका रहा। अभी और शब्द नहीं हैं प्रभु दा, आपके साथ सुनहरी यादों के बायस्कोप से चुनने और बताने के लिए। आप ही ने सबसे पहले आकाशवाणी पर बोल

अब केवल यादों में डॉक्टर गिरिधारी जी

 स्मृति शेष / डॉ० गिरिधारी जी की रचनाएं नई पीढ़ी को जागरूक करती रहेगी /  विजय केसरी  डॉ० गिरिधारी राम गौंझू का जाना एक अपूरणीय क्षति है।  झारखंड की लोक कला, संस्कृति, रीति - रिवाज, रहन-सहन, भाषा आदि पर उनकी गहरी पकड़ थी। झारखंड की  लोक भाषा , कला - संस्कृति , नृत्य - संगीत विकास आदि के प्रति उनकी निष्ठा देखते बनती थी । उन्होंने  बाल काल से ही हिंदी को समृद्ध बनाने के लिए लेखन से नाता जोड़ा लिया था । उनका हिंदी से यह नाता  आजीवन बना रहा था।   वे नियमित रूप से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में झारखंड से संबंधित लेख लिखा करते थे ।  उनकी सामग्रियां  रांची सहित देश के विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में स सम्मान  प्रकाशित होती रही थी । रांची से प्रकाशित हिंदी दैनिक 'रांची एक्सप्रेस' में उनके लेखन के प्रारंभिक दिनों में कई लेख प्रकाशित हुए ।  सभी लेख बहुत ही महत्वपूर्ण व शोध परक हैं । उनके लेखों का संकलन पुस्तक रूप में आ जाए तो यहां के सुधी पाठकों के लिए एक संग्रहणीय पुस्तक बन जाएगी । जहां तक मेरी स्मृति में है कि गिरिधारी राम गौंझू का पहला लेख 'रांची एक्सप्रेस' में प्रकाशित हुआ 

सुनील सक्सेना की तीन रचनाएँ

कहानी / रंग दी कोरी चुनरिया / सुनील सक्‍सेना - “मां मैंने आपको फोन पर पहले ही कह दिया था कि इस बार होली पर अनरसे आप मेरे आने के बाद ही बनाना । मुझे सीखना है, आप कैसे बनाती हैं ? मैंने एकाध बार कोशिश भी की पर हमेशा बिगड़ जाते हैं ।  कोई स्‍वाद ही नहीं आता… क्‍या भाभी आपने भी मां को नहीं रोका… ।” शादी के बाद सुमन की मायके में पहली होली है । पतिदेव को अनरसे बेहद पसंद हैं । सुमन ने वादा किया था कि इस बार होली पर मां से लज्‍जतदार अनरसे का सीक्रेट पता करके ही आएगी । अब गई बात अगली होली तक । सुमन जानती है कि मां सिर्फ होली पर ही अनरसे बनाती हैं । विक्रम भैया तो अनरसे के दीवाने थे । फौज में थे । अक्‍सर छुट्टियों की प्‍लानिंग वो ऐसी करते थे कि होली का त्‍योहार  घर पर सबके साथ मिलकर सेलीब्रेट करें । वो होली का ही दिन था, जब हेडक्‍वार्टर से विक्रम भैया की शहादत की खबर आई थी । घाटी में आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में शहीद हो गए थे । किसी तेज भूकंप की तरह बुरी तरह से तहस-नहस हो गया था हमारा परिवार । भाभी प्रेगनेंट थीं । पापा को दिल का दौरा पड़ा । इस सदमें से मां आज तक उबर नहीं सकी हैं । बीते चार साल

आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री के संग कुछ प्रसंग / मुकेश pश प्रत्यूष praytush

 काश! मेरा कहा सच हो जाता : जानकी वल्लभ शास्त्री /  शास्त्री जी के संग मुकेश  प्रत्यूष की कुछ आत्मीय भेंट मुलाक़ातों की दास्तान  आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री से मेरी पहprtली म गया जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलन के वार्षिक अधिवेशन में हुईyush थी। अधिवेशन के बाद कवि-सम्मेलन का कार्यक्रम था। राज्य-भर के प्रतिष्ठित कवि आमंत्रित किये गये थे।  शास्त्रीजी उनमें सबसे अलग दिखते थे। उन्होंने अपनी उसी कविता का पाठ किया जो हमें पढ़ाई जाती थी और हमें प्रिय भी थी। उनके स्वरों की अनुगूंज अबतक जेहन में होती रहती है - कुपथ-कुपथ रथ दौड़ाता जो पथ निर्देशक वह है। चुनौति देता हुआ लहजा - उतर रेत में। कवि-सम्‍मेलन की अध्‍यक्षता और संचालन वही कर रहे थे मेरी कविता पर कुछ औपचारिक प्रतिक्रियाएं दी। अलग से कुछ कहा नहीं, मैंने भी पूछना उचित  नहीं समझा।  मंच पर कोई किसी को क्‍या कह सकता है।  कवि सम्मेलन के बाद मैं उनके कमरे तक साथ-साथ गया उन्हें तत्काल मुजफ्फरपुर के लिये निकलना था। आयोजकों ने अन्य चीजों के साथ-साथ उन्हें ले जाने के लिये तिलकुट भी दिचा जिसे देखते ही उन्होंने कहा यहां कि लाई भी अच्छी होती है वह मंगवा दे स

सब कुछ बदल रहा है / व्हाट्सप्प

 *दादी से पोती तक* मेरी दादी आई थी अपने ससुराल पालकी में बैठकर, माँ आई थी बैलगाड़ी में, मैं कार में आई,  मेरी बेटी हवाईजहाज से, मेरी पोती हनीमून की ट्रिप पर उड़गई अंतरीक्ष में। कच्चे मकान में दादी की जिंदगी गुजर गई पक्के मकान में रही माँ मुझे मिला मोजाइक का घर बेटी के घर में मार्वल पोती के घर में स्लैब लगे हैं ग्रेनाईट के। दादी पहनती थी खुरदरे खद्दर की साड़ी माँ की रेशमी और संबलपुरी मैंने पहनी हर तरह की फैशनेबुल साड़ियाँ बेटी की हैं सलवार-कमीज, जीन्स और टॉप्स मेरी पोती पहन रही स्किन फिटिंग टी-शर्ट और शर्ट्स। लकड़ी के चूल्हे में खाना पकाती थी दादी माँ की थी कोयले की सिगड़ी और हीटर  मेरे हिस्से में आया गैस का चूल्हा, जहाँ बेटी की रसोई होती माइक्रोवेव ओवन से पोती आधे दिन घर चलाती  डिब्बे के खाने से। दादा जी से कुछ कहने को दादी इंतजार करती थी सबेरे लालटेन के बुझने तक, माँ बात करती पिता जी से ऐसे मानो दीवार से बोल रही, मैं इनसे बात करती "अजी सुनते हो", मेरी बेटी दामाद जी को नाम से बुलाती, पोती आवाज लगाती दामाद को, "हाय हनी"। दादी बतियाती थी दादा जी से आधी बात सीने में दबाकर मा

कवि राजेश जोशी से मुकेश प्रत्यूष की बातचीत

 प्रिय कवि राजेश जोशी  से बात करना  हमेशा रूचिकर होता है।  बात से बात निकलती चली जाती है।  लगभग दो दशक पूर्व ऐसे  ही एकबार हमने लंबी बातचीत की थीी। टेप रिकार्डर आन था। बाद में यह कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई । पुराने कागजों में आज वह मिला। काफी लंबा है। कुछ अंश,  जो आज भी प्रासंगिक हैं, दे रहा हूं।    हिन्दी का  क्या भविष्य दिखता है आपको? जब नई अवधारणाएं आती हैं, नए तकनीक आते हैं, समाज में नए परिवर्तन होते हैं तो नए शब्द आते ही हैं। यह भाषा का विस्तार है। हिन्दी के बारे में पवित्रतावादी ढंग से सोचने की आदत को बदलना चाहिए और थेाडा लचीला रुख अपनाना चाहिए। रही बात हिन्दी के भविष्य की तो बाजार के पास हिन्दी केा अपनाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।  आज बाजार की नियामक शक्तियां आम आदमी की चेतना को कुंठित कर रहीं हैं। उसे उसकी वर्गीय चेतना और संघर्ष से दूर ले जा रहीं हैं। ऐसी स्थिति में  एक  रचनाकार होने के नाते आप किस भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं?  बाजार शब्द बहुत व्यापक है।  हम इसके इस्तेमाल से यह नहीं बता पाते कि हमारा विरोध बाजार से नहीं, नए बाजार से है,  जो हमारा बाजार नहीं है। ह

खूब लड़ी मर्दानी वो तो...../ सुभद्रा कुमारी चौहान

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   सुभद्रा कुमारी चौहान भारतीय कवि किसी अन्य भाषा में पढ़ें डाउनलोड करें ध्यान रखें संपादित करें     सुभद्रा कुमारी चौहान  ( १६ अगस्त   १९०४- १५ फरवरी   १९४८ )  हिन्दी  की सुप्रसिद्ध कवयित्री और लेखिका थीं। उनके दो कविता संग्रह तथा तीन कथा संग्रह प्रकाशित हुए पर उनकी प्रसिद्धि  झाँसी की रानी (कविता)  के कारण है। ये राष्ट्रीय चेतना की एक सजग कवयित्री रही हैं, किन्तु इन्होंने स्वाधीनता संग्राम में अनेक बार जेल यातनाएँ सहने के पश्चात अपनी अनुभूतियों को कहानी में भी व्यक्त किया। वातावरण चित्रण-प्रधान शैली की भाषा सरल तथा काव्यात्मक है, इस कारण इनकी रचना की सादगी हृदयग्राही है। Subhadra Kumari Chauhan सुभद्रा कुमारी चौहान सुभद्रा कुमारी चौहान जन्म 16 अगस्त 1904 इलाहाबाद ,  संयुक्त प्रान्त आगरा व अवध ,  ब्रिटिश भारत के प्रेसीडेंसी और प्रांत मृत्यु 15 फ़रवरी 1948 (उम्र 43) [1] सिवनी ,  भारत व्यवसाय कवयित्री भाषा हिन्दी राष्ट्रीयता भारतीय अवधि/काल 1904–1948 विधा कविता विषय हिन्दी जीवनसाथी ठाकुर लक्ष्मण सिंह चौहान सन्तान 5 जीवन परिचय कथा साहित्य सम्मान कृतियाँ कहानी संग्रह बिखरे मोती (१९३२) उन्