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जनवरी, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

विदुर का जीवन

 महात्मा विदुर महाभारत के मुख्य पात्रों में से एक हैं। उन्होंने अपने जीवनकाल में बहुत सी ऐसी नीतियों की रचना की है, जिन्हें अगर कोई व्यक्ति अपने जीवन में अपना लें तो उसका जीवन बहुत ही सरल हो सकता है। उन्होंने व्यक्ति के जीवन से जुड़ी कई समस्याओं का हल बताने के साथ ही उत्तम पुरुष के लक्षण बताए हैं और आज हम आपको उन्हीं लक्ष्णों के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं।   विदुर कहते हैं कि परोपकार रहित मानव का जीवन व्यर्थ होता है। लेकिन उत्तम पुरुष उस मरे हुए पशु के समान होते हैं जिसका मृत्यु के बाद चमड़ा भी काम आता है। यानि ऐसे लोगों को मृत्यु के बाद स्वर्ग मिलता है। उत्तम पुरुष को भले ही मृत्यु लोक में कष्टों का सामना करना पड़ता है, लेकिन वह तटस्थ भाव से धर्म निभाता है। उत्तम पुरुष के जीवन में कितने ही दुख क्यों न आ जाएं, लेकिन वह अपना धर्म निभाता है। विदुर जी कहते हैं कि उत्तम पुरुष में हर दुख को सहने की शक्ति होती है। विदुर जी कहते हैं कि धर्म का पालन, दान करने, सत्य बोलने और मेहनत करने वाले पुरुषों की चर्चा तीनों लोकों में होती है। ऐसे लोगों की मृत्यु के बाद इनकी कई पीढ़ियां इनके द्वा

मनुष्य की ममता

मनुष्य की मोह माया ममता  कहा कहाँ ? भगवान् श्री रामजी ने विभीषणजी को कहा है कि नौ जगह मनुष्य की ममता रहती है, माता, पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार में, जहाँ जहाँ हमारा मन डूबता है वहाँ वहाँ हम डूब जाते हैं, इन सब ममता के धांगो को बट कर एक रस्सी बना। * सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ॥ जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवै सभय सरन तकि मोही॥ भावार्थ:-(श्री रामजी ने कहा-) हे सखा! सुनो, मैं तुम्हें अपना स्वभाव कहता हूँ, जिसे काकभुशुण्डि, शिवजी और पार्वतीजी भी जानती हैं। कोई मनुष्य (संपूर्ण) जड़-चेतन जगत्‌ का द्रोही हो, यदि वह भी भयभीत होकर मेरी शरण तक कर आ जाए,॥ * तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना॥ जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुहृद परिवारा॥ भावार्थ:-और मद, मोह तथा नाना प्रकार के छल-कपट त्याग दे तो मैं उसे बहुत शीघ्र साधु के समान कर देता हूँ। माता, पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार॥ * सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥ समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं॥ भावार्थ:-इन सबके ममत्व रूपी ताग

महाबीर" बिनवउं हनुमाना।

 यहां गोस्वामी जी द्वारा हनुमानजी के लिए "महाबीर" और"हनुमाना" दो शब्दों का प्रयोग क्यों? "महाबीर"  बिनवउं हनुमाना।  राम जासु जस आपु बखाना।। गोस्वामी जी महाराज कहते हैं कि मैं उन अद्वितीय महावीर हनुमानजी की विनती करता हूं जिनके यश और कीर्ति की स्वयं परमात्मा श्रीराम जी ही वर्णन करते हैं। देखिए यहां गोस्वामी जी महाराज "महाबीर" और "हनुमाना" शब्द के बीच में "बिनवउं" शब्द का प्रयोग करते हैं जबकि महावीर और हनुमान दोनों पवनपुत्र हनुमानजी के ही नाम हैं। यदि यहां कुछ खास उद्देश्य न होता तो हनुमानजी के लिए एक ही नाम का प्रयोग करते या दोनों नामों को एक साथ प्रयोग करते।  जैसे- बिनवउं महाबीर हनुमाना। राम जासु जस आपु बखाना।। और इसे पढ़ने में थोड़ा सरल भी होता क्योंकि... "महाबीर बिनवउं हनुमाना" पढ़ने में एक धक्का जैसा अनुभव होता है। तो चलिए यथामति अवलोकन करने की कोशिश करते हैं... गोस्वामी जी का कहने का आशय है कि... मैं उन महावीर की विनती करता हूं जो... "महाबीर विक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी"।। इनमें ऐसी सामर्थ्य

रामायण

 *श्रीरामचरितमानस* ☀️/ *सप्तम सोपान*/ उत्तरकाण्ड*                          *दोहा सं० ५५*               *(चौपाई सं० ६ से ९ एवं दोहा)* *गौरि    गिरा    सुनि    सरल    सुहाई ।* *बोले    सिव    सादर     सुख     पाई ।।६।।* अर्थ – पार्वतीजी की सरल, सुन्दर वाणी सुनकर शिवजी सुख पाकर आदर के साथ बोले – *धन्य     सती    पावन    मति    तोरी ।* *रघुपति    चरन    प्रीति   नहिं   थोरी ।।७।।* *सुनहु     परम     पुनीत     इतिहासा ।* *जो  सुनि  सकल  लोक  भ्रम   नासा ।।८।।* *उपजइ     राम      चरन     बिस्वासा ।*  *भव  निधि  तर  नर  बिनहिं   प्रयासा ।।९।।* अर्थ –हे सती ! तुम धन्य हो, तुम्हारी बुद्धि अत्यन्त पवित्र है । श्रीरघुनाथजी के चरणों में तुम्हारा कम प्रेम नहीं है (अर्थात् अत्यधिक प्रेम है)। अब वह परम पवित्र इतिहास सुनो, जिसे सुनने से सारे लोक के भ्रम का नाश हो जाता है तथा श्रीरामजी के चरणों में विश्वास उत्पन्न होता है और मनुष्य बिना ही परिश्रम संसार रूपी समुद्र से तर जाता है । 👉 _*'धन्य सती...'*_ – श्रीपार्वतीजी के पूर्व जन्म में सती-शरीर में मति अपावनी थी इसीलिये तब श्रीरामजी को मनुष्य मा

चार आने का हिसाब

 हिसाब चार आने का / प्रस्तुति - सृष्टि, दृष्टि  अम्मी  कृति और मेहर  बहुत समय पहले की बात है, for चंदनपुर का राजा बड़ा प्रतापी था, दूर-दूर तक उसकी समृद्धि की चर्चाएं होती थी, उसके महल में हर एक सुख-सुविधा की वस्तु उपलब्ध थी पर फिर भी अंदर से उसका मन अशांत रहता था। उसने कई ज्योतिषियों और पंडितों से इसका कारण जानना चाहा, बहुत से विद्वानो से मिला, किसी ने कोई अंगूठी पहनाई तो किसी ने यज्ञ कराए, पर फिर भी राजा का दुःख दूर नहीं हुआ, उसे शांति नहीं मिली। एक दिन भेष बदल कर राजा अपने राज्य की सैर पर निकला। घूमते- घूमते वह एक खेत के निकट से गुजरा , तभी उसकी नज़र एक किसान पर पड़ी, किसान ने फटे-पुराने वस्त्र धारण कर रखे थे और वह पेड़ की छाँव में बैठ कर भोजन कर रहा था। किसान के वस्त्र देख राजा के मन में आया कि वह किसान को कुछ स्वर्ण मुद्राएं दे दे ताकि उसके जीवन मे कुछ खुशियां आ पाये। राजा किसान के सम्मुख जा कर बोला–  मैं एक राहगीर हूँ, मुझे तुम्हारे खेत पर ये चार स्वर्ण मुद्राएँ गिरी मिलीं, चूँकि यह खेत तुम्हारा है इसलिए ये मुद्राएं तुम ही रख लो। किसान –  ना – ना सेठ जी, ये मुद्राएं मेरी नहीं हैं, इसे

नमन विनम्र श्रद्धांजलि

 "महाराणा संग्रामसिंह जी मेवाड़ (राणा सांगा) की 493वीं पुण्यतिथि पर उन्हें शत शत नमन" * शरीर पर 84 घावों के कारण महाराणा सांगा को "मानवों का खंडहर" भी कहा जाता है। * इन महाराणा का कद मंझला, चेहरा मोटा, बड़ी आँखें, लम्बे हाथ व गेहुआँ रंग था। दिल के बड़े मजबूत व नेतृत्व करने में माहिर थे। युद्धों में लड़ने के शौकीन ऐसे कि जहां सिर्फ अपनी फौज भेजकर काम चलाया जा सकता हो, वहां भी खुद लड़ने जाया करते थे। * महाराणा सांगा अंतिम शासक थे, जिनके ध्वज तले खानवा के युद्ध में समस्त राजपूताना एकजुट हुआ था। * महाराणा सांगा के समय मेवाड़ दस करोड़ सालाना आमदनी वाला प्रदेश था। * महाराणा सांगा द्वारा बाबर को हिंदुस्तान में आमंत्रित करने की घटना मात्र एक भ्रम है, जो स्वयं बाबर द्वारा फैलाया गया। जवाहर लाल नेहरू द्वारा लिखित पुस्तक पर आधारित धारावाहिक "भारत एक खोज" द्वारा बिना किसी ठोस आधार पर इसे और फैलाया गया, वरना जिन महाराणा ने दिल्ली के बादशाह इब्राहिम लोदी को 2 बार परास्त कर भगाया हो वे भला बाबर से मदद की आस क्यों रखेंगे। वास्तव में इब्राहिम लोदी से अनबन के चलते पंजाब के

माखनलाल चतुर्वेदी

माखनलाल चतुर्वेदी   माखनलाल चतुर्वेदी   (४ अप्रैल १८८९-३० जनवरी १९६८)   भारत   के ख्यातिप्राप्त कवि, लेखक और पत्रकार थे जिनकी रचनाएँ अत्यंत लोकप्रिय हुईं। सरल भाषा और ओजपूर्ण भावनाओं के वे अनूठे   हिंदी   रचनाकार थे। प्रभा और   कर्मवीर   जैसे प्रतिष्ठत पत्रों के संपादक के रूप में उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ जोरदार प्रचार किया और नई पीढ़ी का आह्वान किया कि वह गुलामी की जंज़ीरों को तोड़ कर बाहर आए। इसके लिये उन्हें अनेक बार ब्रिटिश साम्राज्य का कोपभाजन बनना पड़ा। [1]   वे सच्चे देशप्रमी थे और १९२१-२२ के असहयोग आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेते हुए जेल भी गए। आपकी कविताओं में देशप्रेम के साथ-साथ प्रकृति और प्रेम का भी चित्रण हुआ है। माखनलाल चतुर्वेदी जीवनी कार्यक्षेत्र पुरस्कार व सम्मान प्रकाशित कृतियाँ बाहरी कड़ियाँ

माटी का चितेरा / शीला पांडे

 । माटी का चितेरा ।। हर नमी सिंकती गयी है  आंच पर फुल्का बनी है  धूल बोई ज़िन्दगी में खिल उठें कचनार कोई पर्वतों की लालियों पर साझेदारी, पार कोई पर कहाँ कब हो सका यह जड़, तने, पत्ते लरजते हल की जोती हर हराई नई पिंड उल्का बनी है कण पसीने की न जाने कैसी ये तासीर पाई बीज पोषे लहलहाये ज़िन्दगी नकसीर पाई जोतता हल अपनी जिनगी स्वेद में 'घर' बह रहे हैं कौन रोके धार को, जो काल भी गुल का बनी हैं  गुल भी हैं सब खार पहने बागबां सौदागरों सा मेड़ खाता खेत सारा ऊँघता है अजगरों सा लीलता शिशु और सैनिक,.......... पेड़ सारे 'हल' बने हैं टांगते नोकों पे फल के हक़ मिले कुल का, ठनी है  ***************                      -------------शीला पांडे

साहित्य साधना के तप: पुरुष - श्री शिव पूजन लाल 'विद्यार्थी'

 साहित्य साधना के तप:पुरुष -श्री शिव पूजन लाल 'विद्यार्थी //विनोद सिंह वर्षों  सत्कर्म जब पुण्य बन कर धरती पर फलता है। साहित्य का अलख जगाने को शिवपूजन सा लाल निकलता है।। आज जब मैं अपने अतीत का विहंगावलोकन करने बैठता हूँ तो वो दिन मेरे लिए सबसे शुभ प्रतीत होता है जिस दिन मेरी चचेरी दीदी ने मुझसे कहा कि तुम्हारे गुरु श्री शिव पूजन लाल विद्यार्थी जी रांची में  इसी बिल्डिंग के चौथे तल्ले पर अपनी बेटी के यहां आए हैं।फिर क्या था उनसे मिलने की उत्कंठा मेरे हृदय में एक ऐसा तरंग उत्पन्न कर दिया  कि अब वह उनके पवित्र चरणों को छूकर ही शांत हो सकता था।  बिना समय गंवाए मैं पहुंच गया चौथे तल्ले पर,और क्यों नहीं , 1983 के बाद अपने इस महान गुरु से मिलने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ था।मिलने की इच्छा पहले से भी थी,और वो घड़ी आखिर आ हीं गई। जेही कर जा पर सत्य सनेहु। वा तेही मिलही कछु ना संदेहु।। घंटी बजाई ,दरवाजा खुला।सामने खड़ा वहीं सोम्यता  सहजता और सादगी की प्रतिमूर्ति ,गोरा चेहरा प्रशस्त ललाट ,सफेद बाल ,सादा लिवास और ओठो पर वही चिर परिचित मृदुल मुस्कान।देखते हीं स्वतः मेरे दोनों हाथ पूर्ण समर्पण

विजयादशमी के समकालीन अर्थ / आलोक तोमर

 विजयादशमी, अर्थात अश्वेनमाघ की पहली दशमी पर जब चंद्रमा भद्रपद में चला जाता है तो नवरात्रि के बाद दशहरा आता है और उस समय पापियों का नाश करने वाली मा दुर्गा की प्रचंड पूजा के बाद उन्हें अपने लोक भेजने के लिए उनकी प्रतिमा का विजर्सन कर दिया जाता है। विजया दशमी युद्व में विजय का पर्व है और इसका इतिहास बुराई पर अच्छाई की जीत के तौर पर सब जानते हैं। भारत सरकार भी जिसने एक हलफनामा सर्वोच्च न्यायालय को दे कर वापस लिया था और इसमें कहा गया था कि भगवान राम के होने का कोई ऐतिहासिक अस्तित्व नहीं है।    बंगाल के समाज में दुर्गा पूजा कुछ अतिरिक्त हिस्सों में रामचरित्र मानस के सुदंर कांड का नौ दिन पाठ किया जाता है। इस पाठ में कल्पना है कि रावण के जो दस सिर बताएं गए हैं वे असल में मानसिक संताप और कुरीतियां हैं। ये कुरीतियां वासना, क्रोध, मोह, लोभ, मद,र् ईष्या, मानस, बुद्वि, चित्त और अहंकार है। इन संदर्भों को अगर इतिहास से निकाल कर समकालीन युग में लाया जाए और विजयादशमी में इन सब पर बुद्वि, मन, चित्त को छोड़ कर बाकी सबसे मुक्ति पा ली जाए तो दशहरा सबसे आदर्श होगा।    यह संयोग हो भी सकता है और नहीं भी कि ज

पाश के आसपास

 हम लड़ेंगे साथी...../ अवतार सिंह पाश  ( यह तस्वीर पाश यादगारी समागम की है दो साल पहले सूरतगढ़ की ...)           रूह में तो "वो" बैठी है...... पाश जब मिल्खा सिंह की जीवनी लिख रहे थे तो उनसे काम में देरी हो रही थी तो एक दिन "देश प्रदेश" के सम्पादक तरसेम ने उन्हें कहा कि,"पाश तूं जीवनी लिखते समय अपनी रूह में मिल्खा सिंह को बैठा लिया कर।"      पाश हमे बुदबुदाते हुए कहता,"बताओ भला मैं मिल्खा सिंह को अपनी रूह में कैसे बैठा लूँ,मेरी रूह में तो बहुत अरसे से "वो" बैठी है,तुम सबको तो पता ही है......मैं किसी और को नहीं बैठा सकता" '               (२) रात के समय किसे जगाते,हम (अवतार पाश और शमशेर सन्धु) पाश के घर की दिवार फांद के अंदर पहुँच गए क्योंकि बंटवारे के समय चौबारा बड़े भाई के हिस्से चला गया था।भीतर एक मांची थी बहुत ही ढीली....हम उस पर लेट गए,मगर नींद कहाँ... कुछ देर बाद.....ये क्या,मेरा कंधा आंसुओं से भीग गया.....हमेशा चहकते,हंसते मुस्कुराते रहने वाला पाश रो रहा है...वो कुछ समय बाद उठा और पौड़ियों पर बैठ बुदबुदाने लगा.... "हमारा परिवार

विकिलीक्स के संस्थापक और संचालक / आलोक तोमर

खगोलीय साहस का एक नया नाम /  आलोक तोमर  विकिलीक्स के संस्थापक और संचालक जूलियन असांजे ने ब्रिटिश अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया, उन्हें जमानत नहीं मिली और स्वीडन जा कर वे अपने खिलाफ लगाए गए बलात्कार के आरोपों का सामना करेंगे। इसी बीच विश्व विख्यात टाइम पत्रिका ने जूलियन को मैंन ऑफ द ईयर घोषित करने की तैयारी कर ली है।  टाइम मैग्जीन में इंटरनेट पर अपने पाठकों के बीच जो सर्वेक्षण करवाया उसमें दूसरों से बहुत ज्यादा वोट जूलियन असांजे को मिले। अभी तो यह पता नहीं हैं कि जूलियन असांजे ने अपनी गिरफ्तारी या मौत के बाद रखे हुए बहुत सारे विस्फोटक दस्तावेज जारी होने का जो ऐलान किया था उसका क्या हो रहा है मगर टाइम मैग्जीन के इतिहास में पहली बार किसी अभियुक्त को मैन ऑफ द ईयर या वर्ष का व्यक्तित्व माना गया है।  जूलियन असांजे ने धमकी दी थी कि उन्होंने पहले से एक गीगाबाइट की एक फाइल इंश्योंरेंस डॉट 256 के नाम से इंटरनेट पर चढ़ा रखी है और इसका 256 अक्षरों और अंकों का पासवर्ड है। उन्होंने कहा था कि कुछ हुआ तो यह पासवर्ड सार्वजनिक कर दिया जाएगा और इसमें जो रहस्य छिपे हुए हैं वे सामने आने के बाद अमेरिका को मु

अनजाना बंधन तोड़ गए बालू.../ रतन भूषण

 यादें / एस पी बालासुब्रमण्यम/अनजाना बंधन तोड़ गए बालू... फ़िल्म और फिल्म संगीत प्रेमी के साथ ही संगीत को महसूस करने वाले को 5 जून 1981 को रिलीज हुई फ़िल्म एक दूजे के लिए के गीतों ने मानो पागल कर दिया था। गीतों के सुरीलापन ने जहां आम लोगों के दिलों में जगह बनाया वहीं युवा पीढ़ी ने गीतों को अपनी प्रेमभावना, अपने दिल से निकली बात मान ली। दरअसल इस फ़िल्म के सभी गीत सुरीले थे, लेकिन तेरे मेरे बीच में कैसा है ये बंधन अनजाना..., सोलह बरस की बाली उमर को सलाम..., हम बने तुम बने एक दूजे के लिए... को युवाओं ने अपना खयाल समझ लिया। वे अपने प्रियतम को इन गीतों को गाकर दिल की बात व्यक्त करते थे। लता मंगेशकर की आवाज तो निराली थी ही, लेकिन मेल सिंगर के रूप में इन गीतों को गाकर नए गायक एस पी बालासुब्रमण्यम ने धूम मचा दिया। अलग अंदाज़ और अनोखी आवाज़ के स्वामी एस पी बालासुब्रमण्यम की गायकी के लोग दीवाने हो गए। आनंद बक्षी के बोल और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का संगीत भी कमाल साबित हुआ। फ़िल्म एक दूजे के लिये एक दुखान्त प्रेमकहानी है। इसका निर्देशन के बालाचंदर ने किया था। मुख्य कलाकार थे कमल हासन और रति अग्निहोत्री। यह

कभी कभी मेरे दिल में..../ रतन भूषण

 चलते चलते.../ कभी कभी मेरे दिल में........ ऐसा मेरा मानना है कि जो भी लोग फ़िल्म संगीत को थोड़ा सा भी पसंद करते या सुनते होंगे, वे कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है... को जरूर चाहे अनचाहे गुनगुना लेते होंगे। ऐसा हो भी क्यों न? यह अनूठे बोल वाला गीत है ही इतना मधुरता लिए कि सहज ही लोगों की जुबान पर चढ़ जाता है।  यह गीत फ़िल्म कभी कभी का है, जो 27 जनवरी 1976 को रिलीज हुई थीं। वैसे तो इस फ़िल्म के सभी गीत तेरे चेहरे से नजर नहीं हटती... किशोर कुमार- लता मंगेशकर, मैं पल दो पल का शायर हूं... मुकेश, सुर्ख जोड़े की ये जगमगाहट... लता मंगेशकर, प्यार कर लिया तो क्या... किशोर कुमार, मेरे घर आई एक नन्ही परी... लता मंगेशकर, मैं हर एक पल का शायर हूं... मुकेश और तेरा फूलों जैसा रंग... किशोर कुमार-लता मंगेशकर बेहद सुरीले हैं, लेकिन गीत कभी कभी मेरे दिल में... फ़िल्म में तीन बार बजता है और तीनों बार अलग अलग अंदाज में। एक बार अमिताभ बच्चन की आवाज में, जो नज़्म है। एक बार लता मंगेशकर और मुकेश की आवाज़ में युगल गीत के रूप में और एक बार सिर्फ मुकेश की आवाज़ में।  कभी कभी एक रूमानी फिल्म है। इसका निर्देशन और निर्माण

ईमानदारी क्या हैँ?/ अखिलेश श्रीवास्तव चमन

 जैसी दाई आप छिनार, वैसा जाने सब संसार       ईमानदारी राष्ट्रीय अपराध है। ईमानदार लोग देश की अर्थव्यवस्था के लिए खतरा हैं और इस कारण राष्ट्रद्रोही हैं। न सिर्फ इतना ईमानदारी की प्रवृत्ति हमारी संस्कुति के भी विरूद्ध है। किसी कार्य के लिए उत्कोच लेने की परम्परा एक धर्मिक कृत्य है। गंगा मइया, यमुना मइया, शीतला मइया, सती मइया आदि आदि सभी देवियाॅं एक अदद रंगीन कपड़े का टुकड़ा चुनरी  और चूड़ी, बिंदी, सिंदूर आदि कुछ श्रृगांर सामग्रियाॅं पा कर हमारे बिगड़े काम बनाने निकल पडती  हैं। महावीर हनुमान जी पाव, सवा पाव लड्डू पाते ही सहायता के लिए दौड़ पड़ते हैं। और शंकर भगवान तो इतने भोले हैं कि बस थोड़े भाॅंग, धतूरे और बेलपत्र देने से ही मदद के लिए तैयार हो जाते हैं। हमारे जीवन की गतिविधियों संचालित  करने वाले नव ग्रह भी अपनी पसंद की भेंट-पूजा ले कर मन वांछित काम करा देते हैं। देवी, देवताओं , ग्रहों, उपग्रहों को उत्कोच दे कर अपना  काम कराने के लिए हमारे यहाॅं पण्डों, पुजारियों, और पुरोहितों आदि के रूप में लाईसेंसधारी अधिकृत बिचैलियों की सुदृढ़ परम्परा चली आ रही है। ऐसे देवी देवताओं की संतान भारतवासियों द्वा

सविता भार्गव की कविता

 "सविता  भार्गव की कविता -----=====≠========((( मैं अँधेरे पर भरोसा करती हूँ जो मुझे सहलाता है अज्ञात पंख से और मैं काँपती पलकों में सो जाती हूँ मैं उजाले पर भरोसा करती हूँ जो आँखें खोलते ही खिल उठता है और मैं बहती चली जाती हूँ उसकी तरफ मैं अपने इस घर पर भरोसा करती हूँ जिसमें मैं रहती हूँ सालों से और जो बस गया है मेरे भीतर मैं अपने शहर की गलियों पर भरोसा करती हूँ जो आपस में जुड़कर इधर से उधर मुड़ जाती हैं और जहाँ ख़त्म होती है कोई गली मुझे वहाँ मेरी धड़कन सुनाई पड़ती है ऐ आदमी! मुस्कुराते हुए जब तुम मुझमें खो जाते हो मैं तुम पर भरोसा करती हूँ." ______ राजकमल प्रकाशन संस्थान से प्रकाशित कविता संग्रह ‘अपने आकाश में’ (२०१७) की कविताएँ पढ़ते हुए मैंने कवयित्री सविता भार्गव को जाना, इन कविताओं ने एकदम से वश में कर लिया. प्रेम, सौन्दर्य, स्त्रीत्व और प्रतिकार से बुनी इन कविताओं का अपना स्वर है जो किसी संगीत-संगत की तरह असर डालता है. चकित हुआ यह देखकर कि इस बेहतरीन कवयित्री की कविताएँ डिजिटल माध्यम में कहीं हैं ही नहीं. उनसे कुछ नई कविताएँ समालोचन ने प्रकाशन के लिए मांगी थीं जो अब आपके सम

ताशकंद में हिंदी सम्मेलन 2012

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  तत्काल एक्सप्रेस डॉ.अभिज्ञात का ब्लाग Friday, 6 July 2012 पाँचवाँ अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ताशकंद में सम्पन्न ताशकंद।  सृजन-सम्मान, छत्तीसगढ़ और प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में (सृजनगाथा डॉट कॉम, निराला शिक्षण समिति, नागपुर और ओनजीसी के सहयोग से) पांचवा अन्तरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन 24 जून से 1 जूलाई तक सपलतापूर्वक संपन्न हुआ । मुख्य आयोजन उज़्बेकिस्तान की राजधानी ऐतिहासिक शहर ताशकंद के होटल पार्क तूरियान के भव्य सभागार में 26 जून, 2012 के दिन हुआ । यह उद्घाटन सत्र बुद्धिनाथ मिश्र, देहरादून के मुख्य आतिथ्य एवं प्रवासी साहित्यकार डॉ. रेशमी रामधोनी, मारीशस की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर श्री हरिसुमन बिष्ट, सचिव, हिंदी अकादमी,दिल्ली, डॉ. शभु बादल, सदस्य, साहित्य अकादमी, डॉ. पीयुष गुलेरी, पूर्व सदस्य, साहित्य अकादमी, कादम्बिनी से जुड़े रहे वरिष्ठ पत्रकार-सम्पादक डॉ. धनंजय सिंह, वागर्थ के सम्पादक व प्रतिभाशाली युवा कवि श्री एकांत श्रीवास्तव एवं निराला शिक्षण समिति, नागपुर के निदेशक डॉ. सूर्यकान्त ठाकुर, आयोजन के प्रमुख समन्यवयक डॉ. जयप्रकाश मानस विशिष्ट अत