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अप्रैल, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अब केवल यादों में डॉक्टर गिरिधारी जी

 स्मृति शेष / डॉ० गिरिधारी जी की रचनाएं नई पीढ़ी को जागरूक करती रहेगी /  विजय केसरी  डॉ० गिरिधारी राम गौंझू का जाना एक अपूरणीय क्षति है।  झारखंड की लोक कला, संस्कृति, रीति - रिवाज, रहन-सहन, भाषा आदि पर उनकी गहरी पकड़ थी। झारखंड की  लोक भाषा , कला - संस्कृति , नृत्य - संगीत विकास आदि के प्रति उनकी निष्ठा देखते बनती थी । उन्होंने  बाल काल से ही हिंदी को समृद्ध बनाने के लिए लेखन से नाता जोड़ा लिया था । उनका हिंदी से यह नाता  आजीवन बना रहा था।   वे नियमित रूप से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में झारखंड से संबंधित लेख लिखा करते थे ।  उनकी सामग्रियां  रांची सहित देश के विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में स सम्मान  प्रकाशित होती रही थी । रांची से प्रकाशित हिंदी दैनिक 'रांची एक्सप्रेस' में उनके लेखन के प्रारंभिक दिनों में कई लेख प्रकाशित हुए ।  सभी लेख बहुत ही महत्वपूर्ण व शोध परक हैं । उनके लेखों का संकलन पुस्तक रूप में आ जाए तो यहां के सुधी पाठकों के लिए एक संग्रहणीय पुस्तक बन जाएगी । जहां तक मेरी स्मृति में है कि गिरिधारी राम गौंझू का पहला लेख 'रांची एक्सप्रेस' में प्रकाशित हुआ 

सुनील सक्सेना की तीन रचनाएँ

कहानी / रंग दी कोरी चुनरिया / सुनील सक्‍सेना - “मां मैंने आपको फोन पर पहले ही कह दिया था कि इस बार होली पर अनरसे आप मेरे आने के बाद ही बनाना । मुझे सीखना है, आप कैसे बनाती हैं ? मैंने एकाध बार कोशिश भी की पर हमेशा बिगड़ जाते हैं ।  कोई स्‍वाद ही नहीं आता… क्‍या भाभी आपने भी मां को नहीं रोका… ।” शादी के बाद सुमन की मायके में पहली होली है । पतिदेव को अनरसे बेहद पसंद हैं । सुमन ने वादा किया था कि इस बार होली पर मां से लज्‍जतदार अनरसे का सीक्रेट पता करके ही आएगी । अब गई बात अगली होली तक । सुमन जानती है कि मां सिर्फ होली पर ही अनरसे बनाती हैं । विक्रम भैया तो अनरसे के दीवाने थे । फौज में थे । अक्‍सर छुट्टियों की प्‍लानिंग वो ऐसी करते थे कि होली का त्‍योहार  घर पर सबके साथ मिलकर सेलीब्रेट करें । वो होली का ही दिन था, जब हेडक्‍वार्टर से विक्रम भैया की शहादत की खबर आई थी । घाटी में आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में शहीद हो गए थे । किसी तेज भूकंप की तरह बुरी तरह से तहस-नहस हो गया था हमारा परिवार । भाभी प्रेगनेंट थीं । पापा को दिल का दौरा पड़ा । इस सदमें से मां आज तक उबर नहीं सकी हैं । बीते चार साल

आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री के संग कुछ प्रसंग / मुकेश pश प्रत्यूष praytush

 काश! मेरा कहा सच हो जाता : जानकी वल्लभ शास्त्री /  शास्त्री जी के संग मुकेश  प्रत्यूष की कुछ आत्मीय भेंट मुलाक़ातों की दास्तान  आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री से मेरी पहprtली म गया जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलन के वार्षिक अधिवेशन में हुईyush थी। अधिवेशन के बाद कवि-सम्मेलन का कार्यक्रम था। राज्य-भर के प्रतिष्ठित कवि आमंत्रित किये गये थे।  शास्त्रीजी उनमें सबसे अलग दिखते थे। उन्होंने अपनी उसी कविता का पाठ किया जो हमें पढ़ाई जाती थी और हमें प्रिय भी थी। उनके स्वरों की अनुगूंज अबतक जेहन में होती रहती है - कुपथ-कुपथ रथ दौड़ाता जो पथ निर्देशक वह है। चुनौति देता हुआ लहजा - उतर रेत में। कवि-सम्‍मेलन की अध्‍यक्षता और संचालन वही कर रहे थे मेरी कविता पर कुछ औपचारिक प्रतिक्रियाएं दी। अलग से कुछ कहा नहीं, मैंने भी पूछना उचित  नहीं समझा।  मंच पर कोई किसी को क्‍या कह सकता है।  कवि सम्मेलन के बाद मैं उनके कमरे तक साथ-साथ गया उन्हें तत्काल मुजफ्फरपुर के लिये निकलना था। आयोजकों ने अन्य चीजों के साथ-साथ उन्हें ले जाने के लिये तिलकुट भी दिचा जिसे देखते ही उन्होंने कहा यहां कि लाई भी अच्छी होती है वह मंगवा दे स

सब कुछ बदल रहा है / व्हाट्सप्प

 *दादी से पोती तक* मेरी दादी आई थी अपने ससुराल पालकी में बैठकर, माँ आई थी बैलगाड़ी में, मैं कार में आई,  मेरी बेटी हवाईजहाज से, मेरी पोती हनीमून की ट्रिप पर उड़गई अंतरीक्ष में। कच्चे मकान में दादी की जिंदगी गुजर गई पक्के मकान में रही माँ मुझे मिला मोजाइक का घर बेटी के घर में मार्वल पोती के घर में स्लैब लगे हैं ग्रेनाईट के। दादी पहनती थी खुरदरे खद्दर की साड़ी माँ की रेशमी और संबलपुरी मैंने पहनी हर तरह की फैशनेबुल साड़ियाँ बेटी की हैं सलवार-कमीज, जीन्स और टॉप्स मेरी पोती पहन रही स्किन फिटिंग टी-शर्ट और शर्ट्स। लकड़ी के चूल्हे में खाना पकाती थी दादी माँ की थी कोयले की सिगड़ी और हीटर  मेरे हिस्से में आया गैस का चूल्हा, जहाँ बेटी की रसोई होती माइक्रोवेव ओवन से पोती आधे दिन घर चलाती  डिब्बे के खाने से। दादा जी से कुछ कहने को दादी इंतजार करती थी सबेरे लालटेन के बुझने तक, माँ बात करती पिता जी से ऐसे मानो दीवार से बोल रही, मैं इनसे बात करती "अजी सुनते हो", मेरी बेटी दामाद जी को नाम से बुलाती, पोती आवाज लगाती दामाद को, "हाय हनी"। दादी बतियाती थी दादा जी से आधी बात सीने में दबाकर मा

कवि राजेश जोशी से मुकेश प्रत्यूष की बातचीत

 प्रिय कवि राजेश जोशी  से बात करना  हमेशा रूचिकर होता है।  बात से बात निकलती चली जाती है।  लगभग दो दशक पूर्व ऐसे  ही एकबार हमने लंबी बातचीत की थीी। टेप रिकार्डर आन था। बाद में यह कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई । पुराने कागजों में आज वह मिला। काफी लंबा है। कुछ अंश,  जो आज भी प्रासंगिक हैं, दे रहा हूं।    हिन्दी का  क्या भविष्य दिखता है आपको? जब नई अवधारणाएं आती हैं, नए तकनीक आते हैं, समाज में नए परिवर्तन होते हैं तो नए शब्द आते ही हैं। यह भाषा का विस्तार है। हिन्दी के बारे में पवित्रतावादी ढंग से सोचने की आदत को बदलना चाहिए और थेाडा लचीला रुख अपनाना चाहिए। रही बात हिन्दी के भविष्य की तो बाजार के पास हिन्दी केा अपनाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।  आज बाजार की नियामक शक्तियां आम आदमी की चेतना को कुंठित कर रहीं हैं। उसे उसकी वर्गीय चेतना और संघर्ष से दूर ले जा रहीं हैं। ऐसी स्थिति में  एक  रचनाकार होने के नाते आप किस भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं?  बाजार शब्द बहुत व्यापक है।  हम इसके इस्तेमाल से यह नहीं बता पाते कि हमारा विरोध बाजार से नहीं, नए बाजार से है,  जो हमारा बाजार नहीं है। ह

खूब लड़ी मर्दानी वो तो...../ सुभद्रा कुमारी चौहान

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   सुभद्रा कुमारी चौहान भारतीय कवि किसी अन्य भाषा में पढ़ें डाउनलोड करें ध्यान रखें संपादित करें     सुभद्रा कुमारी चौहान  ( १६ अगस्त   १९०४- १५ फरवरी   १९४८ )  हिन्दी  की सुप्रसिद्ध कवयित्री और लेखिका थीं। उनके दो कविता संग्रह तथा तीन कथा संग्रह प्रकाशित हुए पर उनकी प्रसिद्धि  झाँसी की रानी (कविता)  के कारण है। ये राष्ट्रीय चेतना की एक सजग कवयित्री रही हैं, किन्तु इन्होंने स्वाधीनता संग्राम में अनेक बार जेल यातनाएँ सहने के पश्चात अपनी अनुभूतियों को कहानी में भी व्यक्त किया। वातावरण चित्रण-प्रधान शैली की भाषा सरल तथा काव्यात्मक है, इस कारण इनकी रचना की सादगी हृदयग्राही है। Subhadra Kumari Chauhan सुभद्रा कुमारी चौहान सुभद्रा कुमारी चौहान जन्म 16 अगस्त 1904 इलाहाबाद ,  संयुक्त प्रान्त आगरा व अवध ,  ब्रिटिश भारत के प्रेसीडेंसी और प्रांत मृत्यु 15 फ़रवरी 1948 (उम्र 43) [1] सिवनी ,  भारत व्यवसाय कवयित्री भाषा हिन्दी राष्ट्रीयता भारतीय अवधि/काल 1904–1948 विधा कविता विषय हिन्दी जीवनसाथी ठाकुर लक्ष्मण सिंह चौहान सन्तान 5 जीवन परिचय कथा साहित्य सम्मान कृतियाँ कहानी संग्रह बिखरे मोती (१९३२) उन्