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मार्च, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

इक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है,

✌️✌️✌️👌👌👌👌👌✌️✌️✌️  इक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है, दिल के खुश रखने को गालिब ये खयाल अच्छा है. बीते मंगलवार को चेन्नई का अधिकतम तापमान 41.3 डिग्री सेल्सियस रिकार्ड किया गया। चेन्नई के लिए यह अधिकतम तापमान ऑल टाइम रिकार्ड है। यानी जब से वेधशाला में तापमान के आंकड़े लिए जा रहे हैं, तब से लेकर आज तक मार्च के महीने का यह सबसे गर्म दिन था। इससे पहले वर्ष 29 मार्च 1953 को अधिकतम तापमान 40.6 डिग्री सेल्सियस रिकार्ड किया गया था, जो कि ऑल टाइम रिकार्ड था। चेन्नई जैसे तटीय क्षेत्रों में 37 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाने के बाद ही हीट वेब या लू की घोषणा की जा सकती है। जबकि, दिल्ली जैसे क्षेत्रों के लिए यह तापमान 40 डिग्री सेल्सियस है।  इससे पहले, सोमवार 29 मार्च के दिन राजधानी दिल्ली का अधिकतम तापमान 40.1 डिग्री सेल्सियस रिकार्ड किया गया था। मार्च के महीने के लिए यह दूसरा ऑल टाइम रिकार्ड है। इससे पहले 1945 के 31 मार्च को अधिकतम तापमान 40.5 डिग्री सेल्सियस रिकार्ड किया गया था। जो कि ऑल टाइम रिकार्ड है। राजधानी दिल्ली में फरवरी का पिछला महीना भी बेहद गर्म साबित हुआ था। फरवरी महीने का औसत ता

केदारनाथ मिश्र प्रभात का खंड-काव्य - कर्ण

 केदारनाथ मिश्र प्रभात का खंड-काव्य कर्ण मैंने लगभग चालीस साल पहले पढ़ा था। पता नहीं क्यों  उसकी ये पंक्तियां पिछले कुछ दिनों से बार-बार याद आ रहीं थीं –  राजपाट की चाह नहीं है चाह न अपयश पाऊं जिस पथ पर चलता हूं उसपर आगे बढ़ता जाऊं मुकेश प्रत्यूष    प्रभातजी की यह कृति जितना हिन्‍दी भाषी प्रदेशों में लोकप्रिय थी उतनी ही अहिन्‍दीभाषी राज्‍यों में  भी । । उनके इस खंड-काव्‍य के नायक महाभारतकालीन पात्र कर्ण  का चरित्र  न जाने कितने  रचनाकारों को लिखने के लिए प्ररित और प्रोत्‍साहित  ही नहीं बल्कि बाध्‍य किया था।  शिवाजी सावंत ने अपनी  औपन्यासिक कृति मृत्‍युंजय में  आभार स्‍वीकार करते हुए  लिखा है - केदारनाथ मिश्र प्रभात का कर्ण खंडकाव्य हिंदी साहित्य का एकमात्र गहना है। मैं कविश्रेष्ठ के एक ही शब्द पर कई-कई महीनों तक विचार करता रहा।  मैंने केदारनाथ जी का कर्ण खंडकाव्य सौ-सौ बार रटा। सुप्त मन में किशोरावस्था से  सोए पड़े अंगराज कर्ण खड़े होकर मेरे जागृत मन पर छा गए थे। बार-बार मेरा अंतर्जगत झकझोरने लगा - तुझे लिखना ही होगा दानवीर, दिग्विजयी, अशरण अंगराज कर्ण पर।  मैंने सोचा, एक बार फिर से कर

पहली सुपर स्टार अभिनेत्री देविका रानी

 30 मार्च को पहली सुपर स्टार अभिनेट्री,पहली पद्मश्री व दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित अभिनेत्री/गायिका,दिवंगत देविका रानी जी के 30 मार्च जन्मदिन पर सादर नमन करते है। कुछ दिलचस्प बातें... 1)- *पहली सुपरस्टार अभिनेत्री* 2)- *पहली पद्मश्री से सम्मानित* 3)- *पहला दादासाहेब फाल्के अवार्ड से सम्मानित* 4)- *फ़िल्म इंडस्ट्री का पहला बोल्ड किस 4 मिनट का सीन फ़िल्म कर्मा 1933 में इन्होंने किया था,पति स्व.हिमांशु रॉय के साथ)* 5)- *फ़िल्म इंडस्ट्री की पहली व सबसे सुपरहिट जोड़ी देविका रानी-अशोक कुमार की रही,जिनकी सभी फिल्में सुपर डुपर हिट रही* 6)- *फ़िल्म इंडस्ट्री को दिलीप कुमार जैसे अभिनय सम्राट की प्रतिभा को देखते ही पहचानकर उन्हें पहली फ़िल्म ज्वार भाटा 1944 में काम देने वाली पारखी नज़र की धनी देविका रानी जी ही थी* 7)- *यूसुफ खान को दिलीप कुमार नाम देने वाली अद्भुत देविका रानी ही थी* ८)- *सोवियत रूस से सर्वोच्च सम्मानित अभिनेत्री देविका रानी ही थी* 9)- * शानदार व जानदार अभिनय के साथ साथ सुपरहिट गायिका भी स्व.देविका रानी रही है* 10)- *अनेक राजनेताओं की पहली पसंद देविका रानी रही है* ....देविका रा

सोनल 1975

 " सोनल (1973)" -भूली बिसरी/ अनजानी सी फिल्म कई ऐसी फिल्म्स बनती है, तैयार होकर बाजार में आ जाती हैं , फ़िल्म वितरण संस्थाएं प्रदर्शन हेतु क्रय कर लेती है । किन्तु थिएटर में प्रदर्शित न हो पाती है । चाहे कितनी भी प्रतिष्ठित वितरण संस्था क्यों न हो ,फ़िल्म प्रदर्शक अपने आर्थिक व थिएटर की प्रतिष्ठा का भी ध्यान रखता है ।सम्मानीय फ़िल्म प्रदर्शक तो क्या रिपीट रन फ़िल्म प्रदर्शित करने वाले सिनेमा हॉल के प्रबंधक भी इन्हें डेट्स नहीं देते । सो दर्शक वंचित रह जाते हैं इन फिल्मों को देखने से । ऐसी ही फिल्मों में मेरी स्मृति में बासु भट्टाचार्य की अपने निर्माण संस्था की पहली  फ़िल्म 'उसकी कहानी'('66) अभिनय किया अंजू महेंद्रू और तरुण घोष । इन दोनों कलाकारों की यह प्रथम कृति भी थी ।इस फ़िल्म में दो गीत थे संगीत कनु रॉय और गीत लिखे कैफ़ी आज़मी ।इसका गीता दत्त का गाया गीत  ' आज की काली घटा मस्त मतवाली घटा ', लोकप्रिय हुआ मित्रों ने अवश्य सुना होगा। किशोर साहू की फ़िल्म धुएं की लकीर('74) जो परवीन बॉबी की पहली फ़िल्म थी और नितिन मुकेश व वाणी जयराम की आवाज़ वाला मधुर गीत 'तेर

कोमेडियन वी. गोपाल

 वी. गोपाल... भारतिय फिल्मों मे  बहुत सारे कोमेडियन दिखाइ दिये...इस मे  एक कम सुना नाम  वी. गोपाल का भी हे.. होशियारपुर कोलेज मे वी. गोपाल पढते थे..उसे पढाइ से ज्यादा राग रंग और  तबला बजाने का शौक था.. पढाइ के वकत कोलेज के कलास रूम मे डेस्क को तबला  समजकर बजाते थे और प़ोफेसर  उसे कलास रूम से निकाल भी देते थे..!! बाद मे वी.गोपाल सन 1953 मे बंबई  आये और एक फिल्म कंपनी मे उसे प़ोडकशन कंटो़लर का काम मिल गया.. उस वकत एक फिल्म बन रही थी...शाही महेमान...! फिल्म के हिरो थे  रंजन...फिल्म  की शुटिंग हो  रही थी..एक कलाकार शाही ओहदेदार का रोल कर रहा था...वह ठीक तरह से डायलोग बोल नहि पा रहे थे.  संजोग से.उस कलाकार को हटाकर वी. गोपाल   को रोल दिया गया...और वी. गोपाल ने एक ही शोट मे पुरे डायलोग   बोल दिये.. !! लेकिन बाद मे वी. गोपाल को कोइ फिल्मे मिली नहि... काफी अरसे के बाद वी. गोपाल को अहम भुमिका वाली एक पंजाबी फिल्म जीजा जी  मिली..बाद मे वी. गोपाल ने अनेक पंजाबी फिल्मो मे काम किया.. एक पंजाबी फिल्म नीम हकीम का निर्माण भी किया.  फिल्म सफल नहि हुइ..! सुना हे दिलीपकुमार साहब ने वी. गोपाल को फिल्म  बै

लॉक डाउन का चेहरा

 लॉक डाउन के साइड इफेक्ट्स- 2 /:डा.. मधुकर तिवारी कोरोना का हर दिन रूप डरावना होता जा रहा है। दिल दहल जा रहा है। क्या होगा अभी भारत मे। सरकार के कदम संतोष जनक है। 21 दिन में दो दिन बीत गए । पूरा देश कैद है। यह कैद देशहित के लिए है। हर कोई टीवी चैनलों पर नजर गड़ाए बैठा है। कितने कोरोना के केश आज देश मे बढ़े ? बढ़ती हुई संख्या से हर कोई भविष्य के संकट को लेकर भयभीत है। अब क्या होगा इस देश का? कोरोना महामारी ने जो कुछ किया वह भारत की गरीब मध्यम और अमीर वर्ग  के जनता के जेहन में हमेशा के लिए जिंदा रहेगा। देश भर से एक दुखद तस्वीर सामने आ रही है। हर बड़े महानगर से पलायन की। मुंबई दिल्ली कोलकाता जैसे  महानगरों से लाखों गरीब दिहाड़ी मजदूर वर्ग अपने अपने परिवार व मित्रों के साथ पैदल पलायन कर चुका है। लाकडाउन ने हर आवागमन को बाधित कर दिया है। छोटे छोटे बच्चों को गोद मे लिए माँ बाप कामभर के समान का बोझा लिए अपने अपने गाँव को पैदल ही चल दिये है। भूखे प्यासे यह वर्ग शरीर में बची ऊर्जा भर कई किलोमीटर हर रोज चल रहे हैं। हाईवे रोड वीरान है। पर पैदल चलने वाले ये लोग ही दिख रहे हैं। उनके साथ चले बच्चे कभी मा

नवरत्न : क्या सच क्या झूठ

🙏👌 अकबर के नवरत्नों की कहानी का सच */ प्रस्तुति -:कृष्ण मेहता  अकबर के नौरत्नों से इतिहास भर दिया, पर महाराजा विक्रमादित्य के नवरत्नों की कोई चर्चा पाठ्यपुस्तकों में नहीं है ! जबकि सत्य यह है कि अकबर को महान सिद्ध करने के लिए महाराजा विक्रमादित्य की नकल करके कुछ धूर्तों ने इतिहास में लिख दिया कि अकबर के भी नौ रत्न थे । राजा विक्रमादित्य के नवरत्नों को जानने का प्रयास करते हैं ... राजा विक्रमादित्य के दरबार के नवरत्नों के विषय में बहुत कुछ पढ़ा-देखा जाता है। लेकिन बहुत ही कम लोग ये जानते हैं कि आखिर ये नवरत्न थे कौन-कौन। राजा विक्रमादित्य के दरबार में मौजूद नवरत्नों में उच्च कोटि के कवि, विद्वान, गायक और गणित के प्रकांड पंडित शामिल थे, जिनकी योग्यता का डंका देश-विदेश में बजता था। चलिए जानते हैं कौन थे। ये हैं नवरत्न – 1–धन्वन्तरि- नवरत्नों में इनका स्थान गिनाया गया है। इनके रचित नौ ग्रंथ पाये जाते हैं। वे सभी आयुर्वेद चिकित्सा शास्त्र से सम्बन्धित हैं। चिकित्सा में ये बड़े सिद्धहस्त थे। आज भी किसी वैद्य की प्रशंसा करनी हो तो उसकी ‘धन्वन्तरि’ से उपमा दी जाती है। 2–क्षपणक- जैसा कि इनके न

होली का अपना कोई रंग नहीं होता/ सुरेंद्र सिंघल

 होली का अपना कोई रंग नहीं होता/ सुरेन्द्र सिंघल  😃🙃😝😝😇😀😃😃😃😃😄😁🙂🙃🙃 होली का अपना कोई रंग नहीं होता  हवा में लटकी हुई  बादलों की बूंदों से  होकर गुजरती है जब रोशनी  खिलखिलाने लगता है आकाश में  सतरंगा फूल रोशनी का  रोशनी का अपना कोई रंग नहीं होता  यूं तो जिंदगी का भी नहीं होता है कोई रंग  आंसू और मुस्कान बना देते हैं उसे विविध रंगी वैसे होली का भी कोई रंग नहीं होता सराबोर हो जाती है होली  रंगों से  गले मिलते हैं जब  पंडित राधेश्याम  लाला अमीर चंद  दीनू मोची  जान मेसी  फखरुद्दीन  कसकर  इतना कसकर  नहीं गुजर पाती इनके बीच से  जहरीली हवा  जाति मजहब या पैसे की रंग छिटकने लगते हैं होली में  आंखें करने लगती है बातें  आंखों से  उंगलियां सुनने लगती हैं संगीत जिस्मो का  कुलांचे भरने लगता है पैरों में  फागुन का हिरन  थिरकने लगती है होठों पर  बांसुरी मोहब्बत की  खिलने लगते हैं देह पर  टेसू के फूल  गालों पर उग आते हैं  पीले , काले, लाल गुलाब  होली भीज जाती है  सर से पैर तक  अनगिनत रंगों से  होली का अपना कोई रंग नहीं होता                                 सुरेंद्र सिंघल              अब कि ज

होली का नाम मन में आते ही,

 जीवन में उल्लास भरती होली  होली का नाम मन में आते ही, मन प्रफुल्लित हो जाता है, होली मिलने - मिलाने का त्यौहार है,  बिछुड़े को फिर से मिला देती  है । होली दिल में उमंग पैदा करती है , होली जीने की कला बताती है, आनंद की नई राह दिखाती है, जीवन को बहार लाती है । होली रंग के महत्व को बताती है , गिले शिकवे को दूर भगाती है, नफरत को मिटाती है, प्रेम का पाठ पढ़ाती है। होली रिश्ते में नया रंग भरती है, होली दिलो-दिमाग को फ्रेश बना देती है,  होली देवर भाभी को करीब लाती है, जीवन में उल्लास भरती है। होली दुश्मनी को दोस्ती में बदल देती है, मिलजुल कर रहने का पाठ पढ़ाती है, सद्भावना का संदेश देती है, भेदभाव को मिटाती है । प्रेमी प्रेमिकाओं को मिलने का अवसर देती है, ठिठोली करने का सौगात लाती है, रिश्ते को गाढ़ा बनती है, दिलों के भेद को मिटाती है । होली शत्रुता को खत्म कर, मित्रता की राह दिखाती है, वसंत की महक भी संग लाती है, जीवन को खुशियों से भर देती है।  मां - बाप के पैर छूने का,  एक अवसर देती है ,  घर के कुल देवी - देवताओं के,  पूजन का एक अवसर प्रदान करती है।    होली नए-नए पकवानों के साथ,  जीवन में

अर्चना श्रीवास्तव की कुछ कविताएं

भारतीय होने के बावजूद पिछले एक दशक से मलेशिया मे रह रही अर्चना साहित्य सृजन कर रही है. वहां के भारतीय और मलेशिया के लेखकों के बीच सक्रिय है. हिंदी साहित्य के प्रति इनके प्रेम उत्साह का ही नतीजा है की इनलोगो ने एक साहित्यिक संगठन बनाकर हर महीने सब मिलते है और अपने लेखन को आपस मे साझा करते है.. मेरे निवेदन पर आरा बिहार की रहने वाली अर्चना ने अपनी कविताएं भेजी है. उन्होंने वहां के सक्रिय सभी लेखकों कवियों की रचनाएँ भी लगातार भेजते रहने का वादा भी किया है.🙏✌️👌 कविता----  (१) ---'तपस्या' ●•••●•••●••••●•••● तपस्या से तपस्वी, साधना से साधक है ऊंच कोटि के मुहावरे जो  आज भी प्रासंगिक है कल भी दैत्य-दानवों के विरुद्ध  अडिग-शाश्वत होने का छिडा  एकल अभियान था आज  भी अंत-बाह्य उपस्थित,  संकट एकसमान है सांस्कृतिक अतिक्रमण का  मौजूद अभेद्य-घातक हथियार हैं लालच, भय,दबाव के डंक मारता बाजारवाद है भीड से तन्हाई तक वैमनस्य से प्रेम तक स्वार्थ से परमार्थ तक प्रगतिशीलता से पारंपारिकता तक सत्य-मिथ्या और न्याय-अन्याय के बीच मचा निरंतर अंदरुनी कोहराम है गली-मुहल्ले मे ठनी प्रतिस्पर्धा का गलाफांस है  

साहित्यिक गोष्ठी के बहाने मूल्यांकन / मुकेश प्रत्यूष

 विष्णुपद मंदिर से बाहर निकलने के बाद गया की कविता शहर की सीमाओं की तरह तेजी से फैली।  काफी दिनों तक इसका स्वर शहर की प्राचीन मान्यताओं की तरह धार्मिक बना रहा । कविता  शगल के लिए लिखी जाती रही।  वक्त के साथ जब शहर ने करवटें बदलना शुरू किया और समकालीन मूल्यों पर अपनी परंपराओं को परखना शुरू किया तो यहां की कविता के स्वरूप में भी परिवर्तन हुआ और स्वर में भी।  एक शहर के सच को दुनिया के अन्य हिस्सों के सच के साथ जोड़कर देखने की कोशिश शुरू हुई।  गया जिला हिन्‍दी साहित्‍य सम्‍मेलन ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।  पुराना गया जिला (वर्तमान में गया, जहानाबाद, अरवल जिला) की साहित्यिक गतिविधियों का केन्‍द्र बन गया ।  नियमित साहित्यिक आयोजनों के अतिरिक्‍त इस जिले की रचनाशीलता को उजागर करने हेतु समय-समय पर महत्‍वपूर्ण पुस्‍तकों का प्रकाशन भी किया है।  लगभग तीन दशक पूर्व आदि काल से लेकर बीसवीं सदी के नवें दशक तक के उन कवियों, जिनकी जन्‍म-भूमि या कर्म-भूमि  यह रही है, की प्रतिनिधि कविताओं के तीन संकलन शहर से गुजरते हुए, अश्‍वत्‍थ खड़ा है आज भी, यह रेत चंदन है, का प्रकाशन  किया गया था। इन संग्रहों का

दिनेश चंद्र श्रीवास्तव की नजर मे रंग बिरंगी होली

✌️ पाठकों के लिए खासतौर पर इस बार पेश हैं दिनेश श्रीवास्तव का होली (पुराण ) साहित्य 👌🙏✌️  गीतिका                                       कैसे खेलूँ फाग                ---------------------- देश जला अपना यहाँ, कैसे खेलूँ फाग। प्रेम हुआ सपना यहाँ, कैसे खेलूँ फाग।। नष्ट हुआ पर्यावरण,धुआँ-धुआँ चहुओर, बंद हुआ दिखना यहाँ, कैसे खेलूँ फाग।। मंदिर तो अब बन गए,पर मुश्किल में आज, राम-नाम जपना यहाँ, कैसे खेलूँ फाग।। भाई-भाई लड़ रहे,लहु- लुहान है देश,  मुश्किल है रहना यहाँ, कैसे खेलूँ फ़ाग।। नफ़रत के परिवेश में,कौन सुनेगा गीत, छोड़ दिया लिखना यहाँ,कैसे खेलूँ फाग।। नहीं बचा है अब यहाँ, प्रेम और सौहार्द, किसे कहूँ अपना यहाँ, कैसे खेलूँ फाग।। बदरंगी दुनियाँ बनी, फैला पापाचार, सब कुछ है सहना यहाँ, कैसे खेलूँ फाग।। मंत्री संत्री सब यहाँ, लूट रहे सबओर। महाराष्ट्र पटना यहाँ, कैसे खेलूँ फाग।। कोरोना बढ़ने लगा,पुनः यहाँ पर आज। मुश्किल है बचना यहाँ, कैसे खेलूँ फाग।।                                       --------------                   होली है                 ------------ सज गए सब फागुनी बाजार ,होली है। पर नहीं क

पहली बोलती फिल्मआलम आरा 1931

 🌹#आलमआरा (1931 फ़िल्म ) आलमआरा 1931 में बनी हिन्दी भाषा और भारत की पहली सवाक (बोलती) फिल्म है।  इस फिल्म के निर्देशक अर्देशिर ईरानी हैं।  ईरानी ने सिनेमा में ध्वनि के महत्व को समझते हुये, आलमआरा को और कई समकालीन सवाक फिल्मों से पहले पूरा किया। आलम आरा का प्रथम प्रदर्शन मुंबई के मैजेस्टिक सिनेमा में 14 मार्च 1931 को हुआ था।  यह पहली भारतीय सवाक इतनी लोकप्रिय हुई कि "पुलिस को भीड़ पर नियंत्रण करने के लिए सहायता बुलानी पड़ी थी । 💐निर्देशक  अर्देशिर ईरानी 💐लेखक  जोसेफ डेविड- मुंशी जहीर  🌺अभिनेता 💐मास्टर विट्ठल 💐जुबैदा 💐पृथ्वीराज कपूर 🎼संगीतकार 💐फ़िरोज़शाह मिस्त्री 💐बहराम ईरानी आलमआरा एक राजकुमार और बंजारन लड़की की प्रेम कथा है। यह जोसफ डेविड द्वारा लिखित एक पारसी नाटक पर आधारित है। जोसफ डेविड ने बाद में ईरानी की फिल्म कम्पनी में लेखक का काम किया।। फिल्म में एक राजा और उसकी दो झगड़ालू पत्नियां दिलबहार और नवबहार है। दोनों के बीच झगड़ा तब और बढ़ जाता है जब एक फकीर भविष्यवाणी करता है कि राजा के उत्तराधिकारी को नवबहार जन्म देगी। गुस्साई दिलबहार बदला लेने के लिए राज्य के प्रमुख म

साहित्य, संस्कृति और भाषा की विवेचना करती एक किताब

 https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=10226129584857099&id=1562465622 साहित्य, संस्कृति और भाषा की विवेचना करती एक किताब #गुर्रमकोंडा_नीरजा     साहित्य, संस्कृति और भाषा – इन तीनों का परस्पर संबंध अटूट है क्योंकि देश-दुनिया की संस्कृति की जितनी प्रभावी अभिव्यक्ति साहित्य के माध्यम से संभव है, उतनी किसी अन्य माध्यम से नहीं; तथा यह अभिव्यक्ति भाषा पर निर्भर है। साथ ही, यह भी महत्वपूर्ण है कि ये तीनों सतत प्रवाहशील है, जड़ नहीं। साहित्य का मूल भाव ‘सहित’ है जो उसे संस्कृति का वाहक बनाता है। साहित्यकार अपने आस-पास के परिवेश से तथा अपने अनुभूत संसार से ही कथ्य ग्रहण करता है और उसे भाषाबद्ध करता है। वह अपनी संस्कृति और परिवेश को अपने अनुभवों के माध्यम से इस तरह शब्दों में पिरोता है कि पाठक को रोचक लगे। इसलिए जब हम किसी रचना को पढ़ते हैं तो उस देश-काल की स्थितियों एवं वहाँ की संस्कृति को आत्मसात करते चलते हैं। अतः इसमें कोई संदेह नहीं कि साहित्य मनुष्य की संवेदनात्मक क्षमता का परिणाम है। इसी प्रकार संस्कृति मानव जीवन को संस्कारित करने में सहायक सिद्ध होती है। संस्कृति जीवन के मानवीय

मुकेश प्रत्यूष की कुछ कविताएँ

 हाशिया                               जैसे उठाने से पहले कौर निकालता है कोई अग्रासन उतारने   से पहले बिछावन से  पैर  करता है कोई धरती को प्रणाम तोड़ने से पहले तुलसी का पत्ता  या लेने से पहले गुरु का नाम पकड़ता है कोई कान      वैसे ही, लिखने के पहले शब्द तय करता है कोई हाशिये के लिये जगह जैसे ताखे पर रखी होती है लाल कपड़े में बंधी कोई किताब गांव की सिवान पर बसा होता है कोई टोला  वैसे ही पृष्ठ पर रहकर भी पृष्ठ पर नहीं होता है हाशिया मोड़कर या बिना मोड़े दृश्य या अदृश्‍य तय की गई सीमा  अलंध्य होती है हाशिये के लिये रह कर भी प्रवाह  के साथ  हाशिया बना रहता है हाशिया ही तट की तरह  लेकिन होता नहीं है तटस्थ  हाशिया है तो निश्चिंत रहता है कोई बदल जाये यदि किसी शब्द या विचार का चलन  छोड़ प्रगति की राह यदि पड़ जाये करनी प्रयोग-धर्मिता की वकालत   हाशिये पर बदले जा सकते हैं रोशनाई के रंग हाशिये पर बदले जा सकते हैं विचार हाशिये पर किये जा सकते हैं सुधार  इस्तेमाल के लिये ही तो होता है हाशिया  बिना बदले पन्ना  बदल जाता है सब कुछ बस होती है जरुरत एक संकेत चिह्न की  जैसे बाढ़ में  पानी के साथ आ जाते ह

ममता कालिया और ब्लाइंड स्ट्रीट

 सुप्रसिद्ध कथाकार ममता कालिया ने हाल में प्रकाशित मेरे दृष्टिबाधितों की दुनिया पर केंद्रित उपन्यास ब्लाइंड स्ट्रीट को एक रात में पढ़ने के बाद ये टिप्पणी की है...     जब प्रदीप सौरभ जैसा हरफनमौला, जांबाज़ पत्रकार,छायाकार रचनासंसार में उतरता है तो पूरी तैयारी के साथ ऐसा करता है।"ब्लाइंड स्ट्रीट" प्रदीप का पांचवां उपन्यास है।आप कह सकते हैं कि यह एक दृष्टिसम्पन्न लेखक का दृष्टिबाधितों के संसार में आत्मीय प्रवेश है।मैंने खुद देखा है कि पिछले दो वर्षों में प्रदीप सौरभ की इस सूर-संसार में अच्छी खासी मित्र मंडली बन गयी है। जो लेखक पत्रकारिता के ऊबड़ खाबड़ जगत से रचनात्मक दुनिया में आता है,उसके पास हमेशा बेहतर बहादुरी और तैयारी होती है।वह अपना कैमरा और कलम हर मोर्चे पर तैनात रखता है,चाहे वह  अंधेरी दुनिया के उजाले दिखाए या उजली दुनिया के अंधेरे।कभी वह हमें झुग्गी माफिया की कारस्तानियां दिखाता है तो कभी जामिया मिलिया का परिसर। प्रायः समाज दृष्टिबाधितों को दयनीय,परनिर्भर और परास्त समझते हैं।सौरभ ने उनकी प्रतिभा,पराक्रम और आत्मनिर्भरता,विस्तार से बयान की है।महेश,नितिन त्यागी, राजेश ठाकुर सब

गब्बर सिंह का चरित्र चित्रण

 #p1 / परीक्षा में #गब्बरसिंह का चरित्र चित्रण करने के लिए कहा गया-😀😁 . दसवीं के एक छात्र ने लिखा-😉 . 1. सादगी भरा जीवन- :- शहर की भीड़ से दूर जंगल में रहते थे, एक ही कपड़े में कई दिन गुजारा करते थे, खैनी के बड़े शौकीन थे.😂 . 2. अनुशासनप्रिय- :- कालिया और उसके साथी को प्रोजेक्ट ठीक से न करने पर सीधा गोली मार दिये थे.😂 . 3. दयालु प्रकृति- :- ठाकुर को कब्जे में लेने के बाद ठाकुर के सिर्फ हाथ काटकर छोड़ दिया था, चाहते तो गला भी काट सकते थे😂 . 4. नृत्य संगीत प्रेमी- ;- उनके मुख्यालय में नृत्य संगीत के कार्यक्रम चलते रहते थे.. 'महबूबा महबूबा',😂 'जब तक है जां जाने जहां'. बसंती को देखते ही परख गये थे कि कुशल नृत्यांगना है.😂😂 . 5. हास्य रस के प्रेमी- :- कालिया और उसके साथियों को हंसा हंसा कर ही मारे थे. खुद भी ठहाका मारकर हंसते थे, वो इस युग के 'लाफिंग पर्सन' थे.😂 . 6. नारी सम्मान- :- बंसती के अपहरण के बाद सिर्फ उसका नृत्य देखने का अनुरोध किया था,😀😂 . 7. भिक्षुक जीवन- :- उनके आदमी गुजारे के लिए बस  अनाज मांगते थे, कभी बिरयानी या चिकन टिक्का की मांग नहीं की..