सोमवार, 27 जून 2022

मुक़ाबला / कृष्ण मेहता

 🐃मुसीबत का सामना🐃


जंगली भैंसों का एक झुण्ड जंगल में घूम रहा था , तभी एक  बछड़े (पाड़ा) ने पुछा , ” पिताजी, क्या इस जंगल में ऐसी कोई चीज है जिससे डरने की ज़रुरत है ?”


” बस शेरों से सावधान रहना …”, भैंसा बोला .


“हाँ , मैंने भी सुना है कि शेर बड़े खतरनाक होते हैं . अगर कभी मुझे शेर दिखा तो मैं जितना हो सके उतनी तेजी से दौड़ता हुआ भाग जाऊँगा ..”, बछड़ा बोला .


“नहीं , इससे बुरा तो तुम कुछ कर ही नहीं सकते ..”, भैंसा बोला


बछड़े को ये बात कुछ अजीब लगी , वह बोला ” क्यों ? वे खतरनाक होते हैं , मुझे मार सकते हैं तो भला मैं भाग कर अपनी जान क्यों ना बचाऊं ?”


भैंसा समझाने लगा , ” अगर तुम भागोगे तो शेर तुम्हारा पीछा करेंगे , भागते समय वे तुम्हारी पीठ पर आसानी से हमला कर सकते हैं और तुम्हे नीचे गिरा सकते हैं … और एक बार तुम गिर गए तो मौत पक्की समझो …”


” तो.. तो। .. ऐसी स्थिति में मुझे क्या करना चाहिए ?”, बछड़े ने घबराहट में पुछा .


” अगर तुम कभी भी शेर को देखो , तो अपनी जगह डट कर खड़े हो जाओ और ये दिखाओ की तुम जरा भी डरे हुए नहीं हो . अगर वो ना जाएं तो उसे अपनी तेज सींघें दिखाओ और  खुरों को जमीन पर पटको . अगर तब भी शेर ना जाएं तो धीरे -धीरे उसकी तरफ बढ़ो ; और अंत में तेजी से अपनी पूरी ताकत के साथ उसपर हमला कर दो .”, भैंसे ने गंभीरता से समझाया .


” ये तो पागलपन है , ऐसा करने में तो बहुत खतरा है … अगर शेर ने पलट कर मुझपर हमला कर दिया तो ??”, बछड़ा नाराज होते हुए बोला .


“बेटे , अपने चारों तरफ देखो ; क्या दिखाई देता है ?”, भैंसे ने कहा .


बछड़ा घूम -घूम कर देखने लगा , उसके चारों तरफ ताकतवर भैंसों का बड़ा सा झुण्ड था .


” अगर कभी भी तुम्हे डर लगे , तो ये याद रखो कि हम सब तुम्हारे साथ हैं . अगर तुम मुसीबत का सामना करने की बजाये , भाग खड़े होते हो , तो हम तुम्हे नहीं बचा पाएंगे ; लेकिन अगर तुम साहस दिखाते हो और मुसीबत से लड़ते हो तो हम मदद के लिए ठीक तुम्हारे पीछे खड़े होंगे .”


बछड़े ने गहरी सांस ली और अपने पिता को इस सीख के लिए धन्यवाद दिया।

हम सभी की ज़िन्दगी में शेर हैं … कुछ ऐसी समस्याएं हैं जिनसे हम डरते हैं , जो हमें भागने पर … हार मानने पर मजबूर करना चाहती हैं , लेकिन अगर हम भागते हैं तो वे हमारा पीछा करती हैं और हमारा जीना मुश्किल कर देती हैं . इसलिए उन मुसीबतों का सामना करिये … उन्हें दिखाइए कि आप उनसे डरते नहीं हैं … दिखाइए की आप सचमुच कितने ताकतवर हैं …. और पूरे साहस और हिम्मत के साथ उल्टा उनकी तरफ टूट पड़िये … और जब आप ऐसा करेंगे तो आप पाएंगे कि आपके परिवार और दोस्त पूरी ताकत से आपके पीछे खड़े हैं।

गुरुवार, 23 जून 2022

काला पहाड़ : मेवात की कथा और संस्कृति का जीवंत दस्तावेज / धीरेन्द्र asthanab

 मैं पहले ही स्वीकार कर लेता हूं कि वरिष्ठ उपन्यासकार भगवान दास मोरवाल का सन् 1999 में प्रकाशित और चर्चित उपन्यास काला पहाड़ विराट फलक वाले उपन्यासों की परंपरा का सशक्त पायदान होने के बावजूद मेरे पाठकीय स्वाद के उस पार रहता है।

यही वजह रही कि इसे पढ़ने में मुझे पूरे बीस दिन लगे,रुक रुक कर। चार सौ छह पन्नों में घुसने की हिम्मत बटोरने में ही दो साल गुजर गए। लेकिन अब जब मैं यह उपन्यास पढ़ चुका हूं तो कह सकता हूं कि अगर मैं यह उपन्यास नहीं पढ़ता तो मेवात की कथा, संस्कृति और जीवन को मिस करता।

 पूरा उपन्यास पढ़ने के दौरान मुझे ऐसा महसूस होता रहा कि मैं अपनी आंख में कौतूहल लिए एक विशाल कस्बाई मेले में घूम भटक रहा हूं। कितने लोग, कितने अरमान, कितने संघर्ष, कितने सपने,कितनी निराशाएं, कितने ध्वंस और कितने कितने दुर्भाग्य लेकर विचरण कर रहा है इसका कथानक। पचासों चरित्रों वाले इस उपन्यास में क्या नहीं है? सांप्रदायिक वैमनस्य की आहटें हैं, बेरोजगारी के कारण गांव कस्बों से होता युवा पलायन है, स्त्री मन की उलझनें और मुश्किलें हैं। दैनंदिन जीवन की दिक्कतें और दैन्य है। स्वस्थ शांत कस्बाई जीवन को जहरीला बनातीं राजनीतिक दुरभिसंधियां और चालबाज शरारतें हैं।

 सबसे अंत में एक करुण पटाक्षेप के तहत उपन्यास के केंद्रीय पात्र सलेमी का मरना है जिसकी कब्र के सिरहाने और पांयते दो पत्थर गाड़ दिये गये हैं।इस शिनाख्त के लिए ताकि भविष्य में यह पता रहे कि सलेमी यहां एक लंबी नींद में सोया हुआ है।सलेमी जैसों का काले पहाड़ के यही पत्थर तो बरसों तक साथ देते हैं वरना कौन उन्हें याद रखता है।

उपन्यास की बैक पर दिग्गज आलोचक उपस्थित हैं अपनी प्रशंसात्मक टिप्पणी के साथ। होना भी चाहिए।

 क्षमा कि किताब के पास पहुंचने में मुझे पूरे तेईस साल लग गए।

जन्मों का कर्ज / कृष्ण मेहता

 


          एक सेठ जी बहुत ही दयालु थे। धर्म-कर्म में यकीन करते थे। उनके पास जो भी व्यक्ति उधार माँगने आता वे उसे मना नहीं करते थे। सेठ जी मुनीम को बुलाते और जो उधार माँगने वाला व्यक्ति होता उससे पूछते कि "भाई ! तुम उधार कब लौटाओगे ? इस जन्म में या फिर अगले जन्म में ?"

          जो लोग ईमानदार होते वो कहते - "सेठ जी ! हम तो इसी जन्म में आपका कर्ज़ चुकता कर देंगे।" और कुछ लोग जो ज्यादा चालक व बेईमान होते वे कहते - "सेठ जी ! हम आपका कर्ज़ अगले जन्म में उतारेंगे।" और अपनी चालाकी पर वे मन ही मन खुश होते कि "क्या मूर्ख सेठ है ! अगले जन्म में उधार वापसी की उम्मीद लगाए बैठा है।" ऐसे लोग मुनीम से पहले ही कह देते कि वो अपना कर्ज़ अगले जन्म में लौटाएंगे और मुनीम भी कभी किसी से कुछ पूछता नहीं था। जो जैसा कह देता मुनीम वैसा ही बही में लिख लेता।

         एक दिन एक चोर भी सेठ जी के पास उधार माँगने पहुँचा। उसे भी मालूम था कि सेठ अगले जन्म तक के लिए रकम उधार दे देता है। हालांकि उसका मकसद उधार लेने से अधिक सेठ की तिजोरी को देखना था। चोर ने सेठ से कुछ रुपये उधार माँगे, सेठ ने मुनीम को बुलाकर उधार देने कोई कहा। मुनीम ने चोर से पूछा- "भाई ! इस जन्म में लौटाओगे या अगले जन्म में ?"  चोर ने कहा - "मुनीम जी ! मैं यह रकम अगले जन्म में लौटाऊँगा।"  मुनीम ने तिजोरी खोलकर पैसे उसे दे दिए। चोर ने भी तिजोरी देख ली और तय कर लिया कि इस मूर्ख सेठ की तिजोरी आज रात में उड़ा दूँगा।

          रात में ही सेठ के घर पहुँच गया और वहीं भैंसों के तबेले में छिपकर सेठ के सोने का इन्तजार करने लगा। अचानक चोर ने सुना कि भैंसे आपस में बातें कर रही हैं और वह चोर भैंसों की भाषा ठीक से समझ पा रहा है।

         एक भैंस ने दूसरी से पूछा- "तुम तो आज ही आई हो न, बहन !" उस भैंस ने जवाब दिया- “हाँ, आज ही सेठ के तबेले में आई हूँ, सेठ जी का पिछले जन्म का कर्ज़ उतारना है और तुम कब से यहाँ हो ?” उस भैंस ने पलटकर पूछा तो पहले वाली भैंस ने बताया- "मुझे तो तीन साल हो गए हैं, बहन ! मैंने सेठ जी से कर्ज़ लिया था यह कहकर कि अगले जन्म में लौटाऊँगी। सेठ से उधार लेने के बाद जब मेरी मृत्यु हो गई तो मैं भैंस बन गई और सेठ के तबेले में चली आयी। अब दूध देकर उसका कर्ज़ उतार रही हूँ। जब तक कर्ज़ की रकम पूरी नहीं हो जाती तब तक यहीं रहना होगा।”

           चोर ने जब उन भैंसों की बातें सुनी तो होश उड़ गए और वहाँ बंधी भैंसों की ओर देखने लगा। वो समझ गया कि उधार चुकाना ही पड़ता है, चाहे इस जन्म में या फिर अगले जन्म में उसे चुकाना ही होगा। वह उल्टे पाँव सेठ के घर की ओर भागा और जो कर्ज़ उसने लिया था उसे फटाफट मुनीम को लौटाकर रजिस्टर से अपना नाम कटवा लिया।

           हम सब इस दुनिया में इसलिए आते हैं, क्योंकि हमें किसी से लेना होता है तो किसी का देना होता है। इस तरह से प्रत्येक को कुछ न कुछ लेने देने के हिसाब चुकाने होते हैं। इस कर्ज़ का हिसाब चुकता करने के लिए इस दुनिया में कोई बेटा बनकर आता है तो कोई बेटी बनकर आती है, कोई पिता बनकर आता है, तो कोई माँ बनकर आती है, कोई पति बनकर आता है, तो कोई पत्नी बनकर आती है, कोई प्रेमी बनकर आता है, तो कोई प्रेमिका बनकर आती है, कोई मित्र बनकर आता है, तो कोई शत्रु बनकर आता है, कोई पङोसी बनकर आता है तो कोई रिश्तेदार बनकर आता है। चाहे दुःख हो या सुख हिसाब तो सबको देना ही पड़ता हैं। यही प्रकृति का नियम है।

रविवार, 19 जून 2022

पिता / अरविंद अकेला:


वह छोड़ गये हैं 

  

आज नहीं है मेरे पास,

मेरे पिता की कोई वसीयत,

कोई जमीन जायदाद,

नहीं है कोई बैंक बैलेंस,

नहीं कोई छोड़ी हुई हवेली,

या साधारण सा मकान। 


वह छोड़ गये है,

मेरे तन मन में अपना वजूद,

अपनी अजीम शख्शियत,

अपना अलौकिक व्यक्तित्व,

अपनी कर्मठता,ईमान, 

और अपनी ऊँची शान।


करता हूँ महसूस खुद में,

उनका जूझारुपन,

उनकी दयालुता,संघर्ष,

उनका दिया अनुशासन ,

उनकी सकारात्मक सोच,

और उनका सामजिक सम्मान।


आज उनकी बदौलत,

बन पाये एक इंसान,

मिल रही राष्ट्रीय प्रतिष्ठा,

स्वस्थ हैं अपने तन, प्राण,

बढ़ रही मेरी यश कीर्ति,

हो रहा मेरा कल्याण।

      ----0---

     अरविन्द अकेला,पूर्वी रामकृष्ण नगर,पटना-27:

 


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पिता घर के आसमान हैं  /  नेतलाल यादव


पिता घर के आसमान हैं

पिता परिवार के शान हैं

पिता बच्चों के अरमान हैं

पिता बहुत मूल्यवान हैं ।


पिता जीवन के संचित ज्ञान हैं 

पिता समाज के मान है

पिता संतानों के धनवान है

पिता के कदमों चारों धाम है


पिता मेहनत करते हैं

पिता तकलीफ को सहते हैं

पिता आशीर्वचन ही देते हैं

दुनियाँ दूसरे भगवान कहते हैं



पिता संस्कारों के बीज बोते हैं

पिता अनुशासन प्रिय होते है

पिता सिंधु-सा गंभीर होते हैं

पिता मुश्किलों में वीर होते हैं । ।


नेतलाल  यादव ।

शुक्रवार, 17 जून 2022

जंगल के जानवर |

 # जंगल के जानवर |

बीरबल की कहानी


प्रस्तुति -  रेणु दत्ता / आशा सिन्हा


एक बार बादशाह अकबर अपने सभी मंत्रियो के साथ शिकार को निकले , तभी पेड़ पर बैठे हुए उल्लू और उसके बच्चे ने उन्हें देखा और उन्होंने सभी जानवरों को सावधान कर दिया कि शिकार करने को बादशाह आ रहे है।


सभी जानवर पहले से सचेत हो गए।


और बादशाह को जब पूरा जंगल घूमने के बाद भी कोई जानवर नहीं मिला तो सब आश्चर्य मे थे कि ऐसा कैसे हो सकता है?


जरूर किसी ने पहले ही सभी जानवरो को हमारे आने की सूचना दे दी थी। इसी कारण कोई जानवर नहीं मिला हमें। फिर सब महल वापस आ गए। दूसरे दिन फिर सभी शिकार को निकले।


सैनिकों को पहले ही कह दिया गया था कि वह ध्यान रखे कि कौन हमारे आने की सूचना पहले ही दे देता है।


उल्लू और उसके बच्चे ने आज फिर देख लिया था। तो वह बताने के लिए जैसे ही उड़े। वैसे ही सैनिकों को पता चल चुका था। कि यही जानवरो के पहले से ही बता देते है।


उन दोनों को पकड़कर पिंजरे मे डाल लिया गया। तब वह जोर जोर से चिल्लाने लगे। उनको इस प्रकार देखकर बीरबल को बहुत दया आ रही थी। वह बादशाह से मना करना चाहते थे कि वह मासूम जानवरों का शिकार न करे।


पर वह कुछ कह नहीं पा रहे थे। जब उल्लुओं को इस प्रकार चिल्लाते देखकर बादशाह बोले। क्या बीरबल आप इनकी भाषा समझ पा रहे है?


तब बीरबल बोले यह कह रहे है। कि आगे आने वाले समय मे इंसान को जब जंगल की कीमत पता चलेगी। तब तक देर हो चुकी होगी। सारे जंगल काट दिए गए होंगे। उसमे रहने वाले जानवरो का शिकार किया जा चूका होगा।


इंसान के लिए कुछ नहीं बचेगा। तब उन्हें जंगल और उसमे रहने वाले बेचारे जानवरों का ख्याल आएगा। तब बादशाह यह सुनकर बहुत दुखी हुए। वह अपने मनोंरजन के लिए बेचारे जानवरों से उनका घर और उन्हें दोनों छीन रहे है।


उन्होंने बोला आज से किसी भी जानवर का शिकार नहीं किया जायेगा और यदि किसी ने ऐसा किया तो उसको कड़ी सजा मिलेगी। और इन उल्लुओं को भी पिंजरे मे से आजाद किया जाये।


उल्लू आजाद कर दिए गए। तब अकबर बीरबल से बोले आप वाकई लाजवाब है ‘बीरबल’. आप जैसा दूसरा और कोई हो ही नहीं सकता। कितनी अच्छी तरह से आपने हमें समझा दिया। और सभी जानवरों को बचा लिया।


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गुरुवार, 16 जून 2022

आत्मकथ्य सृजन लेखन और पठन पाठन का / धीरेन्द्र अस्थाना

 मैं कहानी में पठनीयता और रोचकता का कायल हूं। इन गुणों के बिना महान कथ्य भी अपठित रह जा सकता है।

मुझे कहानी में रोचकता का गुण दादा दादी से सुनी कहानियों से नहीं,उनके द्वारा दी गई किताबों से प्राप्त हुआ-- किस्सा तोता मैना,किस्सा हातिमताई,गुल सनौवर की कथा, विक्रमादित्य और बेताल। और बाद में चंद्रकांता संतति, भूतनाथ,लाल रेखा आदि। फिर गुलशन नंदा, प्रेम बाजपेयी,रानू, वेद प्रकाश शर्मा, सुरेंद्र मोहन पाठक, इब्ने सफी बीए, कर्नल रंजीत, जासूसी पंजा वगैरह।

  और इसके बाद तो साहित्य को आना ही था।

सोलह की उम्र तक प्रेमचंद, यशपाल, जयशंकर प्रसाद, अमृत लाल नागर, भगवती चरण वर्मा, जैनेन्द्र कुमार, निराला, हजारी प्रसाद द्विवेदी, उपेन्द्र नाथ अश्क, अमृता प्रीतम, फिराक गोरखपुरी, कमलेश्वर,मोहन राकेश, राजेंद्र यादव, धर्मवीर भारती, भीष्म साहनी, कृष्णा सोबती, फणीश्वर नाथ रेणु, भैरवप्रसाद गुप्त, निर्मल वर्मा, मार्कंडेय,शेखर जोशी, मुक्तिबोध और सोवियत साहित्य पढ़ा जा चुका था।

फिर तो सिलसिला चल निकला,जो आज रेत समाधि पढ़ने तक जारी है।



लाकडाउन भी अब हट गया है / उमाकांत दीक्षित

 कर्फ्यू अब खुल गया है

लाकडाउन भी अब हट गया है

गली में सब्जी, चूड़ी और पौधे

बेचने वालों की आवाजें आने लगी हैं... 


लेकिन अरशद कबाड़ी अब नहीं आता,

चौराहे पर गेंदे गुलाब की फूलमाला

बेचने ‌वाली फूलवती अब नहीं दिखती,

ओमी प्लम्बर, ईश्वर दूधवाला, गोरे पंडित जी,

गुप्ता जी कपड़े वाले अब कभी नहीं दिखेंगे...


कोरोना ले गया इन सबको चुन चुन कर

और जाने कितने बच्चे हो गए अनाथ... 

कितने ही घरों में अब चूल्हा नहीं जलता

और कुछ में तो दीपक भी नहीं...


मैं उन्हें कैसे बताऊं कि

अब मुझसे भी कुछ खाया नहीं जाता

उन सबकी आत्मा मुझसे पूछतीं हैं

क्या तुमने इन हालात में 

अपना इन्सानी फर्ज निभाया था...?


- उमाकांत दीक्षित

प्रेम रंजन अनिमेष की बारह ग़ज़लें........

 


1.


*कोई  धुन...*

                                   

                              💟

ग़म   भी   हो   तो    सरगमी   रहे

कोई    धुन    क्यों     मातमी   रहे 


दिल ही  हो  सबकी  किताबे पाक

सब     पढ़ें     ये     लाज़मी    रहे


सूखे    मत    बाहर    नदी   कोई 

आँखों    में     इतनी    नमी    रहे


आदमी      को      ढूँढ़े     आदमी

सबमें    ऐसी    कुछ    कमी   रहे


रख  हरी   इनसानियत  की  पौध

और    सब    कुछ    मौसमी   रहे


शर्त     इतनी   सी     ख़ुदाई   की

आदमी     सा       आदमी      रहे


ऐसा जग हो जिसमें सब हों साथ

क्या   हुआ   जो   हम   हमी   रहे


रच दे  सच की आँच  हर लब पर

बर्फ़    यूँ   कब   तक   जमी   रहे


कब    कहा   ये   नींद   ने   बोलो

अपना     बिस्तर     रेशमी     रहे


भीगी   आँखें   जागतीं   शब  भर

सुबह   भी   कुछ    शबनमी   रहे


ख़त  किसी का  ख़ैरियत  सबकी

अपनापन     ये     आलमी     रहे


बिछड़ें  ऐसे   मिल  सकें  फिर  से

चाहे      कितनी      बरहमी    रहे


दुधमुँहे   इन  होंठों  पर  'अनिमेष'

हश्र    तक    धरती     थमी    रहे

                              💔

                     



2.


*हर घर...*

                                    

                               🈴

हर घर  अपना  घर  लगता है 

इस  बस्ती  से  डर  लगता  है 


भूले  भटके    हँस   देता   जो

कोई     जादूगर    लगता    है 


होती  है  इक उम्र  कि जिसमें 

साया   भी   सुंदर   लगता   है 


सच में  प्यार  मिले तो  कर ले

दिल  इक  ले देकर  लगता  है


जीता जगता  ख़्वाब था  कोई  

अब    दीवारो  दर   लगता  है


पूछती है तितली क्या सचमुच  

सपनों  को  भी  पर  लगता है


बिरहन  सावन सा  ये  जीवन 

दुख   प्यारा  देवर   लगता  है


है  कितना  अपना  हर  लम्हा 

खो  पाना   दूभर   लगता   है


नीची  छतें  हैं  इन  रिश्तों  की 

आते  जाते    सर   लगता   है 


अकसर  होता  हद  में  अपनी

ख़ुद  से जो  बाहर   लगता  है


हाथ   की   दूरी   पर   हैं   तारे

रात  कभी  जग कर  लगता है


मन  की  चींटी  देख  ललकती

उसको जहाँ  शक्कर  लगता है


तेरी अगन में  दहके  हुओं  को

सूरज   एक   शरर   लगता  है


मुझको  पहन कर  इतराये  वो

प्यार  को  भी  पैकर  लगता है


यार   को   प्यार  बना  लेने  में 

बस  आधा   अक्षर   लगता  है


छूते   फिर   से   धड़क  उठेगा  

देखूँ    जो   पत्थर   लगता   है


हूँ  इस  पर  इक  साथ  तुम्हारे

फ़ासला  भी  बिस्तर  लगता है 


पानी    खोजता   है   ये  चेहरा

तर  होकर   बेहतर   लगता  है


अच्छा   लगता   है  जब   कोई 

अपने   से  बढ़ कर   लगता  है


दर्द    दिखाता    रस्ता   सबको

रहबर     पैग़म्बर     लगता    है


जिसका न कुछ किरदार वही अब 

सबसे      क़द्दावर    लगता   है


कैसे   रहे   इनसान   यहाँ   पर 

दहर   ख़ुदा  का  घर  लगता  है


उसको   ख़ुदा   मानें   तो  कैसे

जो  ख़ुद   से  बाहर  लगता   है


किससे आस और आसरा किसका

दर   से   ख़ाली   दर  लगता  है


जैसे    अकेला    बच्चा    कोई 

दिल ख़ुद से  अकसर लगता है


मान  बुरा  मत   भीड़  में  कोई 

हाथ  से  हाथ  अगर  लगता है


ठीकरे   जैसा   ये   जग   सारा 

अपनी   ठोकर  पर   लगता  है


होता दुखी दुख देख के सबका

दीवाना    शायर    लगता    है


लहजा अलग है इन ग़ज़लों का

सबसे  जुदा   तेवर   लगता  है


शहर के सहरा में कौन 'अनिमेष'

जो  भीतर  तक  तर  लगता  है

                               🧡

                                ✍️ *



3.


*इस दौर में...*

                       

                                    ~ *

                                🌿

इस  दौर  में  सवाल  ये  करना ग़लत  तो है

मुद्दत पे  मिल  रहे हो  कहो  ख़ैरियत  तो है


वे  सूखी रोटियों में भी  भर देती हैं  मिठास

माँओं के  हाथ में  भरी  कोई  सिफ़त तो है


रस्तों  पे  आते जाते ही  होता दुआ - सलाम

अब भी  बची हुई  कहीं  इनसानियत  तो है


चाहत की इस किताब को पढ़ सकते आज भी 

ऊपर  पड़ी  यूँ   धूल की  मोटी  परत  तो है 


इसको भी छोड़ने के लिए ज़िद करें न आप

ग़ुर्बत में  अपने पास  ये ग़ैरत  फ़क़त  तो है


ये ठीक है  ग़लत ही  सही  और सही  ग़लत 

क्या इतना कम कि अब भी सही और ग़लत तो है


कब किससे क्या कहा नहीं होता ये रखना याद

सच बोलने से सच में  कहीं कुछ बचत तो है


उपवास पर ही  रहती हैं  अकसर  ये औरतें 

कुछ इस तरह ही ख़ल्क़ में बरकत बढ़त तो है


खुलते  ही  आँखें  सुबह  यहाँ  देखते  सभी

सोये थे जिसके नीचे  सलामत वो छत तो है


दो जोड़े होंठ मिल के जला लेते कल की लौ

अब कुछ भी कह लो प्यार मुहब्बत में सत तो है


कोई  कहीं  तो  होगा   इसे  पढ़ने  के  लिए 

ये शायरी लहू से लिखा  दिल का ख़त तो है


'अनिमेष'  एक  सच को  ज़ुबां दे  हज़ारों में 

अब भी  क़लम कलाम की ये हैसियत तो है

                                🌱

                                ✍️ 



4.


*साये हैं...*

                                    ~ 

                               🌴


जिन  दरख़्तों  के  हम  पे  साये  हैं 

धूप   ख़ुद  सह  के   मुसकुराये  हैं 


उनसे शिकवे गिले भुला कर मिल

वो  जो  बरसों  के  बाद   आये  हैं 


आँख  से   टूट  कर   गिरे   भी  तो

आ   के   होंठों   पे   मुसकुराये  हैं 


तुमको  ख़ुशबू   न   रोक   पायेगी

मैंने    काँटें    कहाँ     बिछाये    हैं   


जाने  कब  तक  फ़ज़ाँ  में  गूँजेगा

वो जो  हम  तुमसे  कह न  पाये हैं


देखना   सुबह  अपनी  शबनम  ने

रात  में   कितने   गुल  खिलाये  हैं


ख़त  न होंठों के  पहुँचे  होंठों तक

यूँ    ही    बैरंग     लौट   आये    हैं


फिर से पलकों पे  उभरीं कुछ बूँदें 

फिर  से   सतरंग   झिलमिलाये  हैं 


सबसे  आख़िर  में  देखना  हमको

इतने  अपने   कि   हम   पराये  हैं


रोशनी  किरचों  की   तरह  चुभती

क्या   अँधेरों  ने   दिन  दिखाये  हैं 


हम पे इलज़ाम  हमने  लफ़्ज़ों को

ख़्वाब   अनदेखे   से   दिखाये   हैं 


कोई   क़द  ढूँढ़ना   इन्हीं  में  अब  

पैरहन    सब    सिले   सिलाये  हैं 


अपने  हाथों  से  थामा है  ख़ुद को 

ये  क़दम  जब  भी  लड़खड़ाये  हैं   


पूछने   देगा    क्या   सवाल   कोई 

हाथ   तो    हमने   भी   उठाये   हैं


दूधमुँहे   जिनके  थे   अभी  सपने 

फिर   गये    नींद   से    जगाये   हैं


अम्न    के    वास्ते     हुकूमत    ने

पहरे  अब  ख़्वाबों  पर  बिठाये  है  


बाग़बां    बन   गये    मुहब्बत   के

बैर    के     बेर    ही     उगाये   है


इनका   गिरना   तबाह   कर  देगा

ये   जो   जम्हूरियत   के   पाये   हैं 


धूल    में     खेलने     चले    बच्चे  

बस   अभी  जो   नहा के  आये  हैं 


देते  क़ुदरत  को  किसलिए  गाली

सब तो  इस  कोख के ही  जाये हैं   


प्यार  तो   रोशनी   है   भीतर  की 

सारे  सच   जिससे   जगमगाये  हैं


कल की  साँसें   सहेजने  के  लिए 

कुछ  शजर   हमने  भी  लगाये  हैं 


कर सके कुछ कहाँ मिला कर हर्फ़

दिल से दिल तक  ये पुल बनाये हैं 


आख़िरी   वक़्त    याद   ये  आया 

चार     काँधे     कहाँ    जुटाये   हैं  


छोड़   जायेंगे   औरों  की   ख़ातिर   

रस्ते    'अनिमेष    जो   बनाये   हैं 

                               🌱

                                ✍️ 



5.


*अपना आप...*                       

                                    

                                💟

अपना  आप   रखोगे   जग  कर

पर   सोओगे   किससे  लग  कर 


अंगुल  दो  अंगुल   क्या  बचाना

हाथों हाथ   वो  लेगा   ठग  कर


सच को  जान गया हूँ  कुछ कुछ 

गर्म  सलाख़ों  से   दग  दग  कर


दुनिया   चलती    उसके   चलते

नन्हे   पग   डगमग  डगमग  कर 


झिलमिल  अँधेरों  में  खो  रहना

जग  सारा  जगमग जगमग  कर


आ  न  सका  उँगली  में  तो क्या 

दिल में  कहीं  रख लेना  नग कर


प्यार   बना   लेगा    पथ  अपना 

सुभगे  तुमको  और  सुभग  कर


बह  वो  रहा है  और  कहाँ  अब

ख़ाली   यूँ   मेरी    रग  रग   कर


लगता     जैसे    धधक    उठूँगा

रह  जाता हूँ  फिर से  सुलग कर


क्या  ऐसा  कर  डाला  किसी  ने

रोता   है   ख़ुद से   लग लग  कर


दूसरी     दुनिया    देखी   किसने

मिल के इसी धरती को सरग कर


धो  दूँ   धूप  दिखा  के  पहन  लूँ 

मैली    ये   चादर    बग बग  कर


ढूँढ़    रहा   फिरने   की   सवारी 

पूरे    काम   सभी   लगभग  कर


जीवन  मौत  मिले  हैं   'अनिमेष'

देखो  न इन दोनों  को अलग कर

                               💔

                                ✍️ 



6.


*दर्द बाक़ी है...*                      

                             

                               🧡

सभी  बिछड़े  मगर  बन कर सहारा  दर्द बाक़ी है

गुज़र  जाने  तलक  होगा  गुज़ारा  दर्द  बाक़ी  है


कभी लगता मुहब्बत में कहा तो जा चुका सब कुछ 

कभी  लगता  है  ये  मेरा तो  सारा  दर्द  बाक़ी है


वो तश्ना लब जो इनसे आशना थे सिल गये कब के

कई  दिन से  मेरी आँखों में  खारा  दर्द  बाक़ी है


नहीं है वो तो उसके नाम पर झगड़े ये किस ख़ातिर 

अगर वो है तो फिर क्यों इतना सारा दर्द बाक़ी है


ज़रूरी क्या कि छूटे हाथ  तो फिर  साथ भी छूटे

मिला जो प्यार से अब भी वो प्यारा दर्द बाक़ी है


डुबोया मुझको  मेरी नेकियों ने  फिर से दरिया में 

मगर  मझधार  में  होकर  किनारा  दर्द  बाक़ी है


उन्हीं गलियों में लेता ज़िंदगी का नाम रोज़ो शब

भटकता फिरता अब भी मारा मारा दर्द बाक़ी है


लबों से मिलते ही लब ग़म भी सब घुल मिल से जाते थे

वही  मरहम  ज़रा  रख दे  दुबारा  दर्द  बाक़ी  है


मसीहाई ही करनी थी तो फिर आख़िर तलक करता

उसे   हर  मोड़  पर   मैंने  पुकारा  दर्द  बाक़ी  है 


मसर्रत कितनी थी  उन चंद लम्हों के मरासिम में 

सुलग  उठता  कहीं  कोई  शरारा  दर्द  बाक़ी  है


यहाँ तक  आते आते  सब उजाले  ज़र्द पड़ जाते

अँधेरी  रात  में   बन कर  सितारा  दर्द  बाक़ी  है


बहुत कुछ खो गया है फिर भी जीने का सबब क्या कम

कि दिल के पास कुछ अब भी तुम्हारा दर्द बाक़ी है


हुए दो जिस्म मिल कर जान इक दूजा रहा ही क्या

न  मेरा तेरा  कुछ भी  बस  हमारा  दर्द  बाक़ी  है


बिना सर पर उठाये आसमां कब उठती छत कोई 

कि हर इक घर में  बन कर ईंट गारा  दर्द बाक़ी है


न देखूँ अपने लेकिन देख दुख दुनिया के दुखता दिल

कि इस  खाते में तो  सबका  उधारा  दर्द बाक़ी है


तू इनसां है तेरे होने को लाज़िम उसका होना भी

उसी  से  तो  है  सब  करता  इशारा  दर्द  बाक़ी  है


जहां भी कह रहा जग जीत आया वो मगर सच ये

मेरे  अंदर  कहीं  पर   मुझसे  हारा  दर्द  बाक़ी  है


अभी हैं  धड़कनें  साँसें  अभी तक  ज़िंदगी ज़िंदा 

नज़र  है  और  अब  भी  है  नज़ारा  दर्द  बाक़ी है


मिटाना किस तरह  वो चाहता है  मुझको देखो तो

ख़ुशी  लेकर   नहीं  ये  भी  गवारा   दर्द  बाक़ी  है


यही  हीरा  तराशा  करता है  भीतर  के  हीरे  को

क्या ग़म 'अनिमेष' जब ख़ुद बन के चारा दर्द बाक़ी है

                                💗

                           



7.


*वो रखे...*

                                    ~ 

                              💧

पलकों  का  पानी   पिला कर

वो  रखे   कल को  जिला कर


भूखे    बच्चों     को    सुलाये

लोरियों   में   क्या   मिला कर 


आ   गले  लग  जा   न  पहले

फिर  जो  करना है  गिला कर 


ठीक   तो    है    नारियल   ये 

देखता   है    सर   हिला  कर 


काम    था   कोई    ख़ुदा  का   

हो  गया   कुछ  दे  दिला  कर 


ज़िद थी फिर बचपन को छू लें

आ   गये    घुटने   छिला  कर


बेटे     तो     परदेस    में    हैं 

कौन    देगा    पानी   ला कर 


हाथ   मिलने   पर   है   बंदिश

देख  दिल से  दिल  मिला कर 


यूँ   ही  रह  जाती  है  अकसर 

सारे   घर   को  वो  खिला कर 


चीख़     पड़ना     चाहिए   था

रह  गया  फिर  तिलमिला कर 


प्यार   तो   है   कहना   सुनना 

यूँ  न  लब  से  लब  सिला कर


राह     सूनी    तो    न    घबरा

हौसलों   को    क़ाफ़िला  कर


उनसे   अच्छा   आइना  कौन

दुश्मनों   से   भी    मिला  कर


और   क्या   फ़नकारी   हँसना 

आँसुओं  में   खिलखिला  कर 


जाना     तो    होगा     अकेले

रह ले  सबसे  मिल मिला कर 


आ   गया   दुनिया  में   यूँ  ही

जाऊँ   सबको   इत्तिला   कर


कर दी इक शुरुआत 'अनिमेष'  

अब  इसे  तू   सिलसिला  कर 

                               💔

                                ✍️ *



8.


*चल जायेगा ...*                      

                                    ~ l

                                🌐

आसमां  पर  आसमां वाला न हो  चल  जायेगा 

पर  न हो  इनसान में  इनसान तो  खल जायेगा


ख़ेमों ख़ानों सरहदों के  काँटे दो चुन कर निकाल

और भी ये बाग़ जग का फूल और फल जायेगा


पत्थरों  के  हैं   ख़ुदा   सारे   ये  जब  टकरायेंगे 

आग  इतनी  फैलेगी  सारा  जहां  जल  जायेगा


एक माँ  की  गोद में  दुनिया ये  बच्चे  की  तरह

वो बचायेगी  जहाँ तक  उसका आँचल  जायेगा


आज की हमने न जो परवाह मिल कर आज की

आने वाला कल भी कर के और बेकल जायेगा


सब भले  कहते  सियासत को बुरा  रहते हैं  दूर

इस तरह तो  और भी  बढ़ता ये दलदल जायेगा


दिल को समझाता हूँ मैं और दिल भी समझाता मुझे

इतना अच्छा  होने से तो  कोई भी  छल जायेगा


होगी क्या  लेकिन  ये रंगत रोशनी  ख़ुशबू बहार

काम  हस्ती का तो  चाहत के बिना चल जायेगा 


प्यास गर होती बुझानी झुक के तो आता वो पास

लगता है तरसा के ही फिर ये भी बादल जायेगा


उससे  पहले  ऐ वफ़ा  जाने दे अपनी  रूह तक 

वक़्त वरना  ख़ाक यूँ ही  ख़ाक में  मल जायेगा


याद  रखना   काल  का  पहिया  हमेशा  घूमता

कितना भी सूरज चढ़ा हो शाम को ढल जायेगा


आने जाने से  बना ये  ख़ल्क़  फ़ानी  सच  यही

आज  तेरे साथ  है जो  छोड़ कर  कल  जायेगा


बात  जाने  की  चली  है तो  ये  सोचा  पूछ  लूँ

क्या तुम्हारी  उम्र में  अपना  कोई  पल जायेगा


मुँदने ही वाली थीं लेकिन सोच कर रख लीं खुली

शायद इन पलकों पे सपना औरों का पल जायेगा


है कहाँ आशिक़ दीवाना शायर इस 'अनिमेष' सा

ज़िद है जिसकी आख़िरी मंज़िल भी पैदल जायेगा

                               💔

                                ✍️ 



9.


*ज़िंदगानी...*                       

                                    

                              💧

ये   जो   पानी   है

ज़िंदगानी         है


हैं     निशां    इतने

क्या   निशानी   है


रंग     धरती    का

सुर  भी  धा नी  है


आँखों  में   सपना

आसमानी        है


कोरा  कागद  तन 

मन   ही  मानी  है


मुझमें    मिट्टी   की

बोली    बानी     है


दिन को महकाती  

रातरानी          है 


प्यार   तो   ख़ुशबू

ज़ाफ़रानी        है


और  जवानी  क्या 

बस     रवानी    है 


पूछे   ख़ुद  मछली  

कितना   पानी   है


दौड़ती   दिल   पर

राजधानी          है


तंत्र  की  जन  पर

हुक्मरानी         है  


अब तो हर लब पर

बेज़ुबानी          है 


देख    ले    हालत

क्या    बतानी    है  


क्या    कहीं   कोई 

दुख  का  सानी  है


झाँस     देगी     ही

कच्ची    घानी    है 


बरसे   बच्ची   ज्यों 

दादी     नानी     है


कब  सुनी  ख़ुद की

सबकी    मानी    है


तुझमें   अपनी   ही

ख़ाक     छानी    है  


फूँका सब अब बस

राख    उठानी    है


तोड़    कर     मूरत

फिर    बनानी    है 


इश्क़  का  ये  रोग

ख़ानदानी         है


उसको शह दे ख़ुद

मात    खानी     है


अब  कफ़न में भी 

खींचातानी       है


फ़ानी   है   दुनिया 

आनी   जानी    है  


साथ   में     सबके

कुछ   कहानी    है 


जान की क्या फ़िक्र 

ये    तो   जानी   है


अनकही  सुन  ली

अब    सुनानी    है


शेर  हर  'अनिमेष'

इक    कहानी    है

                              💔

                                



10.


*जहाँ फिर भी...*                     

                               

                              🌐

यहाँ  हर  पल  मुसीबत  देखता  हूँ 

जहां  फिर भी  सलामत  देखता हूँ 


हवा के हाथ  उस माथे पे रख कर

है अब  कैसी   तबीयत  देखता  हूँ 


मुझे  भेजा   गया  था   रोकने  को

मैं   बच्चों  की   शरारत  देखता  हूँ


वे अपने साथ सब कुछ ले के गुज़रे

बुज़ुर्गों   की   वसीयत   देखता  हूँ


सहर तक  देखता  सपने नहीं बस

मैं  आगे  की  हक़ीक़त  देखता  हूँ


तुझे तो  जूझ कर  दुनिया से लाऊँ

पर अपने घर की  हालत देखता हूँ


मुझे  अहसास  मरने  का  नहीं  है  

मैं  ख़ंजर  की  नफ़ासत  देखता हूँ


अँधेरे   भी   हुए  जाते   हैं   रोशन

तेरी   हर  इक   इबारत  देखता  हूँ


अगर चाहे वो  क्या से क्या बना दे

मुहब्बत  की   इनायत   देखता  हूँ


किसी  सहमे हुए  बच्चे की मानिंद

हर इक बुत की  इबादत देखता हूँ


कहाँ  आँखें वे  जिनमें  देखूँ चेहरा

मैं   आईने   की   रंगत  देखता   हूँ


झलकता  रूह के  दरपन में  कोई 

बहुत   ही   ख़ूबसूरत    देखता   हूँ

 

टटोला करता दिल उम्मीद से फिर

कहीं  क्या  है  मुरव्वत   देखता  हूँ


जिसे लिख कर कभी भेजा नहीं था

हर इक धड़कन में वो ख़त देखता हूँ


वो तो  ख़ुशबू है  छू सकता नहीं मैं 

नहीं  क्या   ये  ग़नीमत  देखता  हूँ 


दुखों से भर गया है दिल का ये घर

हरेक दिन  इसमें बरकत देखता हूँ


हुआ अरसा मिले ख़ुद से किसी से

है कब मिल पाती फ़ुर्सत देखता हूँ


जहाँ मोहलत मिले मिल बैठ जाते

दिखाता  वो   मैं  जन्नत  देखता  हूँ


किसी का हाथ इन हाथों में लेकर

उसी में अपनी क़िस्मत  देखता  हूँ


हूँ  आदमज़ाद  छौंके छींके  जो वो

तो  उसमें  भी  बग़ावत  देखता  हूँ


खुले  में   सो के  तारे   देखता  था

उठायी  जबसे  है  छत  देखता  हूँ


सिवा  अपने  नहीं  शीशे  में  कोई  

इसी  से  कर के नफ़रत देखता  हूँ


जुनूने  तेज़  रफ़्तारी    किसे   कम

मगर  पहले   हिफ़ाज़त  देखता  हूँ


रही  होगी  कभी तो  रहने  लायक़

खँडहर  से   वो इमारत  देखता  हूँ


मेरी ख़ातिर ही  सबके हाथ ख़ाली

फ़रिश्तों   की   नदामत  देखता  हूँ


लुटा सब वक़्त और हालात में अब

बची  क्या  थोड़ी  ग़ैरत देखता   हूँ


बड़ी   मुद्दत   हुई   देखे  सहर  को

शबों   की   बादशाहत  देखता   हूँ


चराग़ों की तरह जल उठता हूँ फिर 

जिधर जिस ओर ज़ुल्मत देखता हूँ


हुआ  इस  दौर  में  इनसान सस्ता 

बढ़ी  जिंसों की  क़ीमत देखता  हूँ


ख़ुदा को  मोल जो  ले लूँ  ख़ुदी से

मिलेगी  क्या   रियायत  देखता  हूँ


झुके जो सर उन्हीं की होती गिनती

अजब  सी  ये  रिवायत  देखता  हूँ 


वो करता ख़ुद से ही वादाख़िलाफ़ी

बदलती  कब  ये आदत  देखता हूँ 


कहीं बेहतर  गँवारों की है सोहबत

ज़हीनों  की   जहालत   देखता  हूँ


भलाई  से   भरोसा   उठने  लगता

शरीफ़ों  की   शराफ़त   देखता  हूँ


बहुत  दिन  से  सुकूनो चैन  सा  है

अब आती कोई आफ़त  देखता हूँ


हुई सदियाँ  कोई  गंगा  न निकली

पिघलते    पीर  परबत  देखता  हूँ 


चमकते    जगमगाते    इंडिया   में 

कहाँ  खोया  है  भारत   देखता  हूँ


उसे  मैं  खोजने  जाऊँ  कहीं  क्यों

तेरे   क़दमों  में   जन्नत  देखता  हूँ 


ग़ज़ल से कब बदलती है ये दुनिया 

बदल  कुछ जाये  सूरत  देखता  हूँ


न होगा  कुछ भी  ऐसी  दोस्ती  से 

कोई  अच्छी   अदावत  देखता  हूँ


बदलना तो नहीं इस दिल को मुमकिन 

जो हो  सकती  मरम्मत  देखता हूँ 


गिरी इनसानियत  कहती  उठा लो

उठाये   कौन   ज़हमत   देखता  हूँ


दिमाग़ी   वहशतों  का   दौर  है  ये

दिलों  में  बढ़ती दहशत  देखता हूँ


मुखौटे  ही   नज़र  आते  हैं   हरसू

कहीं   सूरत  न  सीरत   देखता  हूँ


सियासत  ने  कई  चेहरे  तो बदले

मगर  बदली  न  सूरत   देखता  हूँ


निज़ामे मुल्क   करता   चौकीदारी

है  ये   कैसी  निज़ामत  देखता  हूँ  

 

रहे बस पास  ये काग़ज़ की कश्ती

कहाँ  दौलत या  शोहरत देखता हूँ


पड़ा   बेजान  सा   ईमान   लेकिन 

कहीं कुछ  होती हरकत  देखता हूँ


बने  आवाज़  हर इक  बेज़ुबां  की

क़लम तुझमें  वो ताक़त  देखता हूँ


जो  नंगा  है  उसे   कह  पाये  नंगा

है किसमें  इतनी हिम्मत  देखता हूँ


यहाँ कब मिल सका इनसाफ़ 'अनिमेष'

वही  आख़िर  अदालत  देखता  हूँ

                             🌀

                                ✍️ *



11.


*बहुत दिनों से...*                        

                                    ~ 

                                🌿

बहुत  दिनों  से  तो   आया  गया   नहीं  कोई

निगाह   जाये   जहाँ  तक   नहीं  कहीं  कोई 


मुझी  तलक   मेरी  आवाज़   लौट  आती  है

किसे  पुकारूँ  कि  अपने  सिवा   नहीं  कोई


ये  दोस्ती  ये  मुहब्बत   ये  रिश्ते  नाते  वफ़ा 

मकान   ख़ाली  हैं   सारे   नहीं   मकीं   कोई 


ये मेरा तेरा  ये उसका  इसी की धुन में  सभी

न  हमनवा  है  किसी  का  न  हमनशीं  कोई


ख़ुदा   तू   होगा   तेरा  आसमान  भी   सारा

मगर   न  पाँव  के  नीचे    कहीं  ज़मीं  कोई 


हो  ज़िंदगी से  कहीं मिलता  हू ब हू  न  सही

अँधेरी  रात  का   साथी   न   महजबीं  कोई 


कहा था  लौट के  आऊँगा  आ गया  लेकिन 

किवाड़   बंद   ये  कहता  कि  है नहीं   कोई 


ये  कौन   बेख़ुदी  में   करता  जा  रहा  सज्दे

है  आस्ताँ  कहीं  और  है  कहीं   जबीं  कोई  


वो कैसी शै कि लगे खो के खो दिया सब कुछ 

न जिसको  पा के भी  हो पाता  मुतमईं  कोई 


अभी  अभी  जो  गया  छोड़  मेरा  साया  था

अँधेरे   में    हूँ   अकेले    कहीं    नहीं   कोई 


है एक  उम्र  से  दुनिया  उम्मीद  से  'अनिमेष'

पर  आदमी को  है ख़ुद पर हाँक़ीं  

                              🌱

                         


12.


*आते ही...*

                                

                              🌿

आते   ही   फिर   जाना  होगा 

यूँ     ही     आबोदाना    होगा 


क्या मैं करूँ इस चाँद का बोलो

होते    सुबह     रवाना    होगा 


ख़ुद  से   बातें  करना   जूनूं  है

तनहाई     को     गाना    होगा 


इक लब पर ना इक लब पर हाँ

चूम के  इनको   मिलाना  होगा 


औरों   तक   जाने   से   पहले

अपने   को    अपनाना   होगा 


आसमां की परवाह किसे अब

पिंजरा    होगा     दाना   होगा 


थोड़ा  सा  बरताव  जो  बदले

नाता    है  जो    ताना    होगा 


सबसे  ज़्यादा दुखी  है  वो ही

उसने    अपना    माना   होगा 


रिश्ता    अपना   आँसू   जैसा

पलकों   पलकों   छाना  होगा


अपनी  अपनी भटकन सबकी

आख़िर  एक   ठिकाना   होगा


जग  को   बदलने  वाला  कोई 

आशिक़    या   दीवाना    होगा


देर    से   आते    जल्दी   जाते

भरना     तो     हर्जाना    होगा 


होंठों   ने  जो   रचा  होंठों  पर

होंठों   से   ही   मिटाना   होगा


ख़ुद को  जोड़ना  है  तो  पहले

ख़ुद से  ख़ुद को  घटाना  होगा 


जो बचपन को रखेगा बचा कर 

सबसे   वो  ही   सयाना   होगा 


दिल में  जितनी  हूक  भरी  हो

मीठा    उतना    तराना   होगा 


होंठों   होंठों   जाता  सब  तक

अपना   ही   अफ़साना   होगा 


इतनी   ख़ुद्दारी   से   जिये   तो

काँधा  ख़ुद  को  लगाना  होगा


हाथ  मिलाना तो   है  मना अब

दिल से दिल को  मिलाना होगा


अपनी राह चला चल  'अनिमेष'

पीछे     सारा    ज़माना    होगा

                             💔

                                ✍️ *प्रेम रंजन अनिमेष*


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संपर्क :  एस 3/226, भारतीय रिज़र्व बैंक अधिकारी आवास,  गोकुलधाम, गोरेगाॅव ( पूर्व ), मुंबई 400063

मो : 9930453711

ईमेल : premranjananimesh@gmail.com 

ब्लॉग: *अखराई* ( akhraai.blogspot.in) तथा *बचपना* ( bachpna.blogspot.in )

[6/9, 12:35] PRA - प्रेम रंजन अनिमेष: *प्रेम रंजन अनिमेष*   

                                                                   

                               *संक्षिप्त परिचय* 

*जन्म*   :  आरा (भोजपुर, बिहार)

*शिक्षा* : विद्यालय स्तर तक आरा में, तदुपरांत पटना विश्वविद्यालय से अंग्रेजी भाषा साहित्य में स्नातकोत्तर 


*स्थायी आवास*: 'जिजीविषा', राम-रमा कुंज, प्रो. रमाकांत प्रसाद सिंह स्मृति वीथि, विवेक विहार, हनुमाननगर, पटना 800020  


बचपन से ही साहित्य कला संगीत से जुड़ाव । सभी विधाओं में लेखन ।  


*प्रकाशित कविता संग्रह* : मिट्टी के फल,  कोई नया समाचार,  संगत,  अँधेरे में अंताक्षरी, बिना मुँडेर की छत 


*ईबुक* :  'अच्छे आदमी की कवितायें' एवं 'अमराई' ईपुस्तक के रूप में वेब ( ' हिन्दी समय ' एवं  ' हिन्दवी ' ) पर 


*आने वाले संग्रह* : कुछ पत्र कुछ प्रमाणपत्र, प्रश्नकाल शून्यकाल, अवगुण सूत्र,  नींद में नाच,  माँ के साथ, मरुकाल का मेघदूत, नयी कवितावली, बचपन का महाकाव्य, स्त्री पुराण स्त्री नवीन, पाखी, प्रेमधुन, प्रेमसूत्र, अंतरंग अनंतरंग, वृत्त अनंत, रेजगारियाँ, रात और फुटपाथ,  कवितायें जिनसे झगड़ती हैं कहानियाँ, संक्रमण काल की कवितायें, आज राज समाज आदि


*अनेक लम्बी कविता श्रृंखलाएँ* चर्चित : ऊँट, सायकिल, आवाजें, एक लड़की का खंडकाव्य, स्त्रीसूक्त, नींद में कुछ कवितायें, कुछ हार्दिक, जीवन खेल, जीवन श्रृंखला, अकेले आदमी की कवितायें, ईश्वर की कवितायें, पसीना, कुछ जलचित्र कुछ जलचिह्न, मध्यस्थ, दाढ़ी बनाते हुए, बेकार की कवितायें, आदमगाड़ी, बची हुई आत्मा का संगीत, रक्त संबंध,  वे नर मर चुके, बरसों बाद गाँव लौटे लड़की की डायरी, आदि


*कविता के लिए भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार* 

कई कहानियाँ भी प्रकाशित पुरस्कृत


*कहानी संग्रह* 'लड़की जिसे रोना नहीं आता था', 'माई रे...',  'एक मधुर सपना' , 'एक स्वप्निल प्रेमकथा', 'पानी पानी' तथा ‘किसी असमय की बात है’  एवं  *उपन्यास* 'स्त्रीगाथा', ' परदे की दुनिया', 'नौशीन', 'दि हिंदी टीचर' तथा 'द एविडेंस' प्रकाश्य  


*बच्चों के लिए कविता संग्रह* 'माँ का जन्मदिन' प्रकाशित । 'आसमान का सपना', 'मीठी नदी का पानी', 'कुछ दाने कुछ तिनके', 'कच्ची अमियाँ पकी निंबोलियाँ' तथा और भी बाल पुस्तकें प्रकाश्य ।


*संस्मरण* : 'अगली दुनिया की पहली खबर' तथा 'कुछ दिन और' 

*गीत संग्रह* 'हमारे समय के लिए कुछ गीत', 'नयी गीतांजलि' एवं ‘अभिनव छंद’ और *ग़ज़ल संग्रह* 'पहला मौसम', 'धानी सा', 'बातें बड़ी छोटी बहर', 'कोई अपना सा', 'हैं हम तो इश्क़ मस्ताने', ‘पत्थरों के पड़ोस में' एवं 'देर तक और दूर तक'  आने वाले 

*दोहा संग्रह* : 'नयी दोहावली'

*विचार* : 'अनुभव की स्लेट'


*आलोचनात्मक लेखन* : 'चौथाई'  एवं  'ऊँचा सोचना' 

*नाटक* : 'प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष अन्य पुरुष'


प्रतिष्ठित कवि अरुण कमल की प्रतिनिधि कविताओं का *सम्पादन* 


विलियम कार्लोस विलियम्स एवं  सीमस हीनी की कविताओं का *अनुवाद* ।  


कई रचनाओं को स्वरबद्ध किया है । अलबम *'माँओं की खोई लोरियाँ'* और *'धानी सा'* में अल्फ़ाज़ के साथ तर्ज़ और आवाज़ भी अपनी । एक और अलबम *'एक सौग़ात'*


*ब्लॉग* : 'अखराई' (akhraai.blogspot.in) तथा 'बचपना' (bachpna.blogspot.in)


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बुधवार, 15 जून 2022

मौसमी-कविता :/ सलिल पाण्डेय

 

--

*बादल-परिवार का मौनव्रत*

-

'न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी'

मुहावरे के 'ऐप' को 

बादलों ने भी अपने 'लैपटॉप' में

'डाऊनलोड' कर लिया

कटते हरे-भरे पेड़ों को

'गूगल' में देख-देख कर

पथरा गईं बादल-परिवार की आंखें

धरती को सूरज के हवाले कर

'मौन के योगाभ्यास' के लिए 

तान ली चादर

न झूमेंगे, न बरसेंगे

और न बहेगी ठंडी-ठंडी हवा

जीने के लिए 

मिल तो जाएगा ही इंजेक्शन और दवा।

-

*सलिल पांडेय, मिर्जापुर।*

सोमवार, 13 जून 2022

रवि अरोड़ा की नजर से........

 कुछ तो कहिए मोदी जी .. प्लीज़ / रवि अरोड़ा


देश के मुस्लिम नेतृत्व ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उनकी अक्ल घास चरने गई हुई है । जुम्मे की नमाज़ के बाद जगह जगह उत्पात मचवा कर उन्होंने ठीक वही काम किया जो उनके विरोधी चाहते थे । नतीजा अब वे लोग भी उनसे छिटक रहे हैं जो नूपुर शर्मा के जहरीले बयान के बाद साथ खड़े थे । आम चुनावों को आधार मानें तो आंकड़े बताते हैं कि देश का 63 फीसदी मतदाता 2019 तक भगवा ब्रिगेड को पसंद नहीं करता था और उसकी साम्प्रदायिक नीतियों के खिलाफ और सौहार्द का हामी था । जुम्मे की नमाज़ के बाद की गई हिंसा और तोड़फोड़ से यकीनन इस संख्या में अब भारी कमी ही आई होगी । कहना न होगा कि दंगा करके उपद्रवियों ने अपनी कौम का कितना बड़ा नुकसान कर डाला है, इसका उन्हें अंदाजा भी नहीं है । 


बेशक यह मुल्क संविधान और कानून से चलता है मगर उसकी निगेहबानी करने वाली सत्ता विचारधारा के अनुरूप मिलती अथवा छिनती है । विचारधाराओं का संघर्ष निरंतर चलता रहता है और कभी कभी वह विचार भी प्रभावी हो उठता है जिसे इतिहास में कभी स्वीकारा नहीं गया हो । आज का दौर कुछ ऐसा ही है । इस दौर में बहुसंख्यक अनावश्यक रूप से उत्साही और वाचाल हो रहे हैं तो अल्पसंख्यकों के समक्ष बार बार अपनी सदायशता साबित करने की चुनौती दरपेश हो रही है।

जुम्मे की नमाज़ के बाद हुई खुराफातों से देश का अल्पसंख्यक वर्ग अपनी इस सदाशयता सिद्ध करने में यकीनन असफल रहा है। किसी से छिपा नहीं है कि आज की सत्ता पर बैठे लोग क्या सोच रखते हैं और इसी का परिणाम है कि अब शहर शहर बुल्डोजर सड़कों पर उतर आए हैं । इस माहौल में भला कौन गारंटी ले सकता है कि गेहूं के साथ घुन नहीं पिसेगा ? बेशक विरोध प्रदर्शन मुस्लिमों का लोकतांत्रिक अधिकार था और उससे किसी को एतराज भी नहीं है मगर पथराव, तोड़फोड़ और आगजनी भला कौन बर्दाश्त करेगा ? ठीक है कि मुस्लिम अपने नबी से बहुत प्यार करते हैं और उनकी शान में कोई गुस्ताखी बर्दाश्त नहीं कर सकते मगर ऐसा करने वाले की जबान काटने, गला काटने अथवा हत्या करने की बात को कैसे जायज़ ठहराया जा सकता है ? यह भारत है , पाकिस्तान नहीं और यहां ईश निंदा जैसा कोई अमानवीय कानून भी नहीं है । तो फिर ..? वैसे क्या यह सही तरीका नहीं होता कि नूपुर शर्मा और नवीन जिंदल जैसों को कानून को अपने हिसाब से निपटने दिया जाता और यदि उस पर भी विश्वास नहीं था तो कम से कम कुदरत के इंसाफ पर ही भरोसा कर लिया जाता ? 


वैसे एक सवाल यह भी है कि क्या सारी फटकार की हिस्सेदार नूपुर शर्मा ही है या उनका भी गिरेबान पकड़ा जाएगा जो सारा दिन टीवी चैनलों पर बैठ कर हिंदू मुस्लिम करते रहते हैं ? यदि सरकार की नीयत साफ है तो क्यों नहीं वह ऐसी बहसों पर रोक लगाती ?

चोर को मार रहे हो तो उसकी मां को भी तो पकड़ो , जो उससे जबरन यह कराती है ? चलिए इसे भी जाने दीजिए मगर यह तो पता चले कि हर आलतू फालतू बात पर ज्ञान बांटने वाले हमारे प्रधानमंत्री इस मुद्दे पर अभी तक क्यों खामोश हैं ? दुनिया भर में भारत के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा है और देश में दंगे फसाद की नौबत आ गई है फिर भी अभी तक उनकी बोलती क्यों बंद है ? आम काट कर खाते हैं अथवा चूस कर , जब यह बता सकते हैं तो इस संकट की घड़ी पर दो शब्द क्यों नहीं बोल सकते ? कुछ तो कहिए मोदी जी .. प्लीज़

कंही गांव हार ना जाय..


कहीं शहर जीत न जाए और गाँव हार न जाए। 🙏


प्रस्तुति - अश्विनी जारूहार



महेश के घर आते ही बेटे ने बताया कि वर्मा अंकल आर्टिगा गाड़ी ले आये हैं। पत्नी ने चाय का कप पकड़ाया और बोली पूरे सत्रह लाख की गाड़ी खरीदी और वो भी कैश में। महेश हाँ हूँ करता रहा। आखिर पत्नी का धैर्य जवाब दे गया, हम लोग भी अपनी एक गाड़ी ले लेते हैं, तुम मोटर साईकल से दफ्तर जाते हो क्या अच्छा लगता है कि सभी लोग गाड़ी से आएं और तुम बाइक चलाते हुए वहाँ पहुंचो, कितना खराब लगता है। तुम्हे न लगे पर मुझे तो लगता है।


देखो घर की किश्त और बाल बच्चों के पढ़ाई लिखाई के बाद इतना नही बचता कि गाड़ी लें। फिर आगे भी बहुत खर्चे हैं। महेश धीरे से बोला। 


बाकी लोग भी तो कमाते हैं, सभी अपना सौख पूरा करते हैं, तुमसे कम तनखा पाने वाले लोग भी स्कोर्पियो से चलते हैं, तुम जाने कहाँ पैसे फेंक कर आते हो। पत्नी तमतमाई।


अरे भई सारा पैसा तो तुम्हारे हाथ मे ही दे देता हूँ, अब तुम जानो कहाँ खर्च होता है। महेश ने कहा।


मैं कुछ नही जानती, तुम गाँव की जमीन बेंच दो ,यही तो समय है जब घूम घाम लें हम भी ज़िंदगी जी लें। मरने के बाद क्या जमीन लेकर जाओगे। क्या करेंगे उसका। मैं कह रही कल गाँव जाकर सौदा तय करके आओ बस्स। पत्नी ने निर्णय सुना दिया।


अच्छा ठीक है पर तुम भी साथ चलोगी। महेश बोला । पत्नी खुशी खुशी मान गयी और शाम को सारे मुहल्ले में खबर फैल गयी कि सरला जल्द ही गाड़ी लेने वाली है।


सुबह महेश और सरला गाँव पहुँचे। गाँव में भाई का परिवार था। चाचा को आते देख बच्चे दौड़ पड़े। बच्चों ने उन्हें खेत पर ही रुकने को बोला, चाचा माँ आ रही है। तब तक महेश की भाभी लोटे में पानी लेकर वहाँ आईं और दोनों के जूड़ उतारने के बाद बोलीं लल्ला अब घर चलो। 


बहुत दिन बाद वे लोग गाँव आये थे, कच्चा घर एक तरफ गिर गया था। एक छप्पर में दो गायें बंधीं थीं। बच्चों ने आस पास फुलवारी बना रखी थी, थोड़ी सब्जी भी लगा रखी थी। सरला को उस जगह की सुगंध ने मोह लिया। भाभी ने अंदर बुलाया पर वह बोली यहीं बैठेंगे। वहीं रखी खटिया पर बैठ गयी। महेश के भाई कथा कहते थे। एक बालक भाग कर उन्हें बुलाने गया। उस समय वह राम और भरत का संवाद सुना रहे थे। बालक ने कान में कुछ कहा, उनकी आंख से झर झर आँसू गिरने लगे, कण्ठ अवरुद्ध हो गया। जजमानों से क्षमा मांगते बोले, आज भरत वन से आया है राम की नगरी। श्रोता गण समझ नही सके कि महाराज आज यह उल्टी बात क्यों कह रहे। नरेश पंडित अपना झोला उठाये नारायण को विश्राम दिया और घर को चल दिये।


महेश ने जैसे ही भैया को देखा दौड़ पड़ा, पंडित जी के हाथ से झोला छूट गया, भाई को अँकवार में भर लिए। दोनो भाइयों को इस तरह लिपट कर रोते देखना सरला के लिए अनोखा था। उसकी भी आंखे नम हो गयीं। भाव के बादल किसी भी सूखी धरती को हरा भरा कर देते हैं। वह उठी और जेठ के पैर छुए, पंडित जी के मांगल्य और वात्सल्य शब्दों को सुनकर वह अन्तस तक भरती गयी।


दो पैक्ड कमरे में रहने की अभ्यस्त आंखें सामने की हरियाली और निर्दोष हवा से सिर हिलाती नीम, आम और पीपल को देखकर सम्मोहित सी हो रहीं थीं। लेकिन आर्टिगा का चित्र बार बार उस सम्मोहन को तोड़ रहा था। वह खेतों को देखती तो उसकी कीमत का अनुमान लगाने बैठ जाती।


दोपहर में खाने के बाद पण्डित जी नित्य मानस पढ़ कर बच्चों को सुनाते थे। आज घर के सदस्यों में दो सदस्य और बढ़ गए थे। अयोध्याकांड चल रहा था। मन्थरा कैकेयी को समझा रही थी, भरत को राज कैसे मिल सकता है। पाठ के दौरान सरला असहज होती जाती जैसे किसी ने उसकी चोरी पकड़ ली हो। पाठ खत्म हुआ। पोथी रख कर पण्डित जी गाँव देहात की समसामयिक बातें सुनाने लगे। सरला को इसमें बड़ा रस आता था। उसने पूछा कि क्या सभी खेतों में फसल उगाई जाती है? पण्डित जी ने सिर हिलाते हुए कहा कि एक हिस्सा परती पड़ा है। सरला को लगा बात बन गयी, उसने कहा क्यों न उसे बेंच कर हम कच्चे घर को पक्का कर लें। पण्डित जी अचकचा गए। बोले बहू, यह दूसरी गाय देख रही, दूध नही देती पर हम इसकी सेवा कर रहे हैं। इसे कसाई को नही दे सकते। तुम्हे पता है, इस परती खेत में हमारे पुरखों का जांगर लगा है। यह विरासत है, विरासत को कभी खरीदा और बेंचा थोड़े जाता है। विरासत को संभालते हुए हम लोगों की कितनी पीढ़ियाँ खप गयीं। कितने बलिदानों के बाद आज भी हमने अपनी मही माता को बचा कर रखा है। तमाम लोगों ने खेत बेंच दिए, उनकी पीढ़ियाँ अब मनरेगा में मजूरी कर रही हैं या शहर के महासमुन्दर में कहीं विलीन हो गए। तुम अपनी जमीन पर बैठी हो, इन खेतों की रानी हो। इन खेतों की सेवा ठीक से हो तो देखो कैसे माता मिट्टी से  सोना देती है। 

शहर में जो हर लगा है बेटा वो सब कुछ हरने पर तुला है, सम्बन्ध, भाव, प्रेम, खेत, मिट्टी, पानी हवा सब कुछ। आज तुम लोग आए तो लगा मेरा गाँव शहर को पटखनी देकर आ गया। शहर को जीतने नही देना बेटा। शहर की जीत आदमी को मशीन बना देता है। हम लोग रामायण पढ़ने वाले लोग हैं जहाँ भगवान राम सोने की लंका को जीतने के बाद भी  उसे तज कर वापस अजोध्या ही आते है, अपनी माटी को स्वर्ग से भी बढ़कर मानते हैं।


तब तक अंदर से भाभी आयीं और उसे अंदर ले गईं। कच्चे घर का तापमान ठंडा था। उसकी मिट्टी की दीवारों से उठती खुशबू सरला को अच्छी लग रही थी। भाभी ने एक पोटली सरला के सामने रख दी और बोलीं, मुझे लल्ला ने बता दिया था, इसे ले लो और देखो इससे कार आ जाये तो ठीक नही तो हम इनसे कहेंगे कि खेत बेंच दें। 


सरला मुस्कुराई, विरासत कभी बेंचा नही जाता भाभी। मैं बड़ों की संगति से दूर रही न इसलिए मैं विरासत को कभी समझ नही पाई। अब यहीं इसी खेत से सोना उपजाएँगे और फिर गाड़ी खरीदकर आप दोनों को तीरथ पर ले जायेंगे, कहते हुए सरला रो पड़ी, क्षमा करना भाभी। दोनो बहने रोने लगीं। बरसों बरस की कालिख धुल गयी। 


अगले दिन जब महेश और सरला जाने को हुए तो उसने अपने पति से कहा, सुनो मैंने कुछ पैसे गाड़ी के डाउन पेमेंट के लिए जमा किये थे उससे परती पड़े खेत पर अच्छे से खेती करवाइए। अगली बार  उसी फसल से हम एक छोटी सी कार लेंगे और भैया भाभी के साथ हरिद्वार चलेंगे।


शहर हार गया,  जाने कितने बरस बाद गाँव अपनी विरासत को  मिले इस मान पर गर्वित हो उठा था।


Copied 🙏

शनिवार, 11 जून 2022

उमाकांत दीक्षित की 12 गीत ग़ज़लें

 रे  दीप !   तुम्हारा   धन्यवाद !

रे  दीप !   तुम्हारा   धन्यवाद !


तुम लड़े तिमिर से पूर्ण निशा

आलोकित कर दीं दशों दिशा

सीखी प्रकाश  की  परिभाषा

यूँ   उदित  हुई   नूतन  आशा

जीवन का प्रथम उदाहरण हो

जीवन  जीने  का  कारण  हो


रे  दीप !   तुम्हारा   धन्यवाद !

रे  दीप !   तुम्हारा   धन्यवाद !


ठेला  था  तुमने   घोर  तिमिर

टूटी  थी  आशा भी फिर फिर

लेकर  अपनी   हर  थाती को

जो संग  जली  उस  बाती को

वह तैल तरल था जीवन जल

पर  युद्ध  तुम्हारा  था  एकल


रे  दीप !   तुम्हारा   धन्यवाद !

रे  दीप !   तुम्हारा   धन्यवाद !


अब संग खड़ी नव स्वर्णभोर

तुम थमा सूर्य को अंगुष्ठ पोर

यह कठिन भार शीश पर धर

जीवन की  राह  उजागर कर

विश्वास विजय का तम पर ले

यह प्रकृति स्वयं झोली भर ले


रे  दीप !   तुम्हारा   धन्यवाद !

रे  दीप !   तुम्हारा   धन्यवाद !


सामर्थ्य ना  सब कुछ होता है

साहस  ही   विजया  बोता है

संघर्ष  समय   से  सतत सदा

संदेश  सहित   हो  रहे  विदा

तम तौल तुम्हें  तद त्राहिमाम

प्रकाशित पल्लव  पद प्रणाम


रे  दीप !   तुम्हारा   धन्यवाद !

रे  दीप !   तुम्हारा   धन्यवाद !


2


: कुछ दोहे मिठास पर...


चीनी में  चींटी घुसीं,  गुड़ में  घुसी गिंडार,

ज्यादा मीठा होन सों,  कीड़ों की भरमार।


मक्खी, चींटे, सुरसुरी,  कीड़े  और तितार,

मीठे बनकर परखिये, मिलिहें मित्र हजार।


गन्ना  मीठा  क्या  भया,  कोल्हू  दीना  पेर,

जो भल  चाहवे आपनो,  मीठे सौं मुंह फेर।


मधुमक्खी ने भूल की, मधु गुण का भंडार, 

या ही  मधु  के  कारणे,  खो  बैठी घरबार।


आसमान  से  टूटकर, उबला  खूब  खजूर,

मीठे हो ना बचोगे, चाहे जाय बसो तुम दूर।


ईख औ माणस एकसे, गति भाग इकसार,

तब लग पेरे जाएंगे,  जब लग  बाकी सार।


खोद जमीं से कंद को, भूना धरकर आग,

सारे   मीठे   जनन  के,   ऐसे  फूटे  भाग।


मीठे माणस, आम की, गती एक सी जान।

यूं  ही  निचौड़े  जायेंगे,  होते  ही  पहचान।


3

:

एक   पेड   पर  कितने  घर।  

फिर  भी  है  कटने  का डर। 


कीड़े, चिड़िया और गिलहरी 

करते  इस  पर  गुजर  बसर। 

 

फल,  फूल,  लकडी,  छाया,   

मुफ्त  में  देते   सभी  शज़र।

 

संग  चिता  में  पहले जलता 

फिर भी  ना समझा ये बशर।  


बिन   पेडों   के  होगा  क्या? 

होना  है   मौसम  का  कहर। 


प्राणी   सांस   ना  ले  पायेगें,

हवा  में   होगा  सिर्फ  ज़हर।

4


 कहो, मुझे  पहचाना  क्या ? 

याद   नहीं   दीवाना  क्या ?   


आँख  उठाकर  देख  जरा,

मुझसे  भी  शरमाना  क्या ?  


राजनीति   के   जंगल   में,

अँधा क्या और काना क्या ?

                  

सब   चोरों   के  घर  जैसे, 

कोर्ट, कचहरी, थाना  क्या ?


सब   रक्खा   रह  जाएगा,      

माल,असबाब,खजाना क्या ?


दुनिया   भूल   भुलैया   है,

वापस घर नहीं जाना क्या ?


 5


: एक प्रश्न चिन्ह ...?


कौन है जो  वक़्त के  पहिये को घुमाता है ?

कौन दीपक की तरह सूरज को जलाता है ?


धूप दबे पाँव चली आती है जगाने मुझको,

चांद  हर   रात   मुझे  लोरियाँ   सुनाता  है ।


भूख  के वक़्त बख्शता है निवाला सबको,

प्यास  के  वक़्त  वो  प्यास  भी  बुझाता है ।


जिंदगी  के  लिए  अहम  है सांस लेना भी,

हर शय  के  लिए  बराबर  हवा  चलाता है ।


कौन आएगा, किसे जाना है,  रजा उसकी,

कौन  है  जो  सारे  जहाँ   को   बताता  है ?


उसके ही हुक्म से आग उगलती है ये जमीं,

कौन  जो  आसमां  से  पानी भी गिराता है ?


कोई तो है, जो  महसूस भी  होता है, मगर,

बहुत   ढूंढा,   बस   नज़र   नही  आता  है


6

कुछ दोहे....


समय  चक्र  गतिशील है, है  यह  विधि  विधान।

परिवर्तन    स्वीकारिये,   स्वागत    से   श्रीमान।।


क्या, कैसे, कब हो गया? किसने किया कमाल।

सूक्ष्म बीजकण मात्र से, विकसित वृक्ष विशाल।।


लघु  को  लघु  ना  जानिये, लघु  की भारी चोट।

नागा  साकी  याद  है? और  वो  अणु विस्फोट।।


आज शिशु, कल युवक है, परसों  वृद्ध  कहाय।

कब आया कब चल दिया, ये कोई जानत नाय।।


नयन  मूंद   साजन  लखै,  मूक   रह  बतियाय।

परिमल   सौं   पहचानिये,  प्रेम   परे  पतियाय।।


जल  सौं  सींची  लाकड़ी,  काठ  भई  अब देह।

अपनी   पत   तो   राखिबै,  कैसे   बूड़न   देह।।


धूल  धूसरित  हो गया,  स्वर्णिम  सा  व्यक्तित्व। 

रजनी  ने  बिसरा  दिया,  चंदे   का   अस्तित्व।।


रात   चांदनी   छत्त   पर,  मुझे   रही   थी   टेर।

बादल  आकर  ले गया,  सब  किस्मत का फेर।।


व्यवहारिक  होता  नहीं,  बिना  गुरू  का  ज्ञान।

अंतरमन  बाजी   करे,  कर  ना   पाऊं   ध्यान।।


अवगुण  मम  बिसराइए, पतित पावन  उद्धार। 

पातक  प्राणी  प्यास  ले,   शरणागत  है  द्वार।।


7


 काला  ये  सवेरा  क्यों  है ? 

होते   सूरज  के  अंधेरा  क्यों  है ? 


मैने  तो  राज  को  राज ही रखा,

कत्ल  में  मेरे  नाम तेरा  क्यों  है ? 


अजब  सवाल  है  इन  परिंदो से, 

बिजली के तारों पे बसेरा क्यों है ? 


पेड  पर  फल  नहीं  मुर्दे  लटके,

सख्त ऐसा कर्ज का घेरा क्यों है ? 


माना तुम्हें मुझसे वास्ता ही नहीं, 

मेरा  हर  गम  फिर  तेरा क्यों है ? 


सांप आकर कुर्सियों पे बैठ गए,

बंद  पिटारी  में  सपेरा  क्यों  है ?


8

 

तुम सागर मैं बूंद तिहारी।

तुम सौं निकस समानी तुमहि, क्षण पहचान निकारी।

भाप  भई, भई  भुुवन  बदरिया, पाखी  पंख  पछारी।

सीत  सताय  सरि   सौं  सोई,   सच्ची  सरण  सहारी।

गुन औगुन  हमरी  परछाई, सब  विधि  की बलिहारी।

शोध  शोध  करि  हारी  प्रभु जी, मैं  खारी  की खारी।

आतम  लौट  आतम सो मिलिहै, बूंद मिलै ज्यों वारी।

'कंंत'  कहै  कलि काल  करावै,  कर  में कसे कुठारी।



9


साधौ नाय सधौ इकतारा।

वीणा और सितार बजाए,  मिला ना सुर आधारा।

गठरी भरभर पाप कमायौ,  मिलि है परखनहारा।

जब  गठरी की  होय तलाशी,  भेद खुलेगा सारा।

बचपन बीता,  गई  जवानी,  आवन को हरकारा।

जितना अपने  अंतर उतरूँ,  है केवल अंधियारा।

ना कोई  राह,  ना  पगडंडी,  ना  कोई गलियारा।

ना साथी,  ना कोई सतगुरु,  तुम ही एक सहारा।

आपई दीप, आपही ज्योति, आप करो उजियारा।

मूरख "कंत",  अज्ञानी प्राणी,  तुम ही तारणहारा।


10


इस  रहमो करम  पर  ऐ  खुदा  कुर्बान  हो जाऊं ।

ख्वाहिश  ये है,  इक  मुकम्मल  इंसान  हो जाऊं ।


कोशिश  तो  है  इंसानियत  की  हद  में रहने की, 

मगर   दुनिया   चाहती   है  मैं   हैवान  हो  जाऊं ।


इरादा  बदल  लिया  मैने,  जुनूने जिहाद देखकर,  

वर्ना  दिल  था  कि  मैं  भी  मुसलमान हो जाऊं ।


बदन  नंगा,  खेत  नंगे  और   पथरा  गई   आंखे,

किसी तरहा  किसानों के लिए भगवान हो जाऊं ।


जीने   दे   गर   दुनिया   मुझे    मेरे   सलीके  से,

कहीं  मैं  राम  हो जाऊं,  कहीं  रहमान हो जाऊं ।


जिस  घर   का   चुल्हा   कई  दिन  नहीं  जलता,

उस  घर  की  रोटियों  का  इत्मिनान  हो  जाऊं ।


गम  ने  तह्जीब  से  पूछा,  तो  कैसे मना करता?

“इजाजत हो तो आपके दिल का मेहमान हो जाऊं ।”


11


मैं   रहा   तुम   से  अपने   गम   छिपाने   में। 

भीड़  बढ़ती  ही  गई  दिल  के  आशियाने में।


वही तसल्ली,वही दिलासा,वही वादा,वही इंतजार 

मेरे  लिए  यही  बचा  था  तेरे  मय  खाने  में। 


मैंने कब पूछा तुझसे तेरी बेवफाई का  सबब,

हाँ  मगर  कुछ  राज  था  तेरे  सकपकाने  में।


चार  दिन  की  ज़िंदगी  थी इस तरह पूरी हुई, 

ढूँढने  में  दो  लगे   और  दो  तुझे  मनाने  में।


दो पल में खारिज की तूने दास्ताने दिल-लगी,

उम्र पूरी  लग  गई  जिसको  तुम्हें  सुनाने  में। 


हमको मालूम था अंजाम तलाशे-वफा लेकिन 

ढूँढने  फिर  भी  चले  थे  हम  इस  जमाने में। 


12


अँधियारा मुख चूम गया 

जब से अल्हड़ नवभोर का 

सकुचाई घबराई 

उषा के मुख पर देख अरुणाई 

क्रोध सातवें आसमान पर 

साथी सूरज किशोर का..... 


खिसियाकर फोड़ रहा अब

दुनिया के सिर पर अंगारे

इसीलिए डर के मारे 

छांव छिपी छप्पर के नीचे 

दौड़ी दुबकी दीवार के पीछे 

बैठ गई ओढ़ पेड़ों की चुनरिया...

  

संगी सूरज संग

पगलाया पवन भी 

बौखलाए बवंडर बोल

डोल रहा यहाँ वहाँ 

खोजता हो जैसे 

अँधियारा है कहाँ…..

@ उमाकांत दीक्षित

रवि अरोड़ा की नजर से.........

 नूपुर शर्मा के बहाने बैजा बैजा / रवि अरोड़ा


अदब और साहित्य की दुनिया हजारों साल से जिस अंदाजे बयां की दुहाई देती रही है वह एक बार फिर निलंबित भाजपा प्रवक्ता नुपुर शर्मा की सांप्रदायिक टिप्पणी से दरपेश हुआ है । बेशक नूपुर शर्मा ने अपने अंदाज में जिस बात को कहा , उसे मुस्लिम उलेमा भी जमाने से बताते आए हैं और इसकी तस्दीक करते मुस्लिम स्कॉलर के अनेक वीडियो भी यू ट्यूब पर उपलब्ध हैं मगर बात तो नूपुर शर्मा के अंदाजे बयां और मंशा से ही बिगड़ी । यूं भी जब दूसरे धर्म और उसके मानने वालों को बात बात पर पानी पी पी कर कोसा जाए अथवा उन पर कीचड़ उछाला जाए तो कभी न कभी तो चीजें ट्रिगर होनी ही थीं । मुस्लिम दुनिया बेशक आज नूपुर शर्मा की टिप्पणी से नाराज़ दिख रहा है मगर सच्चाई यही है कि यह एक दो बातों की नहीं वरन उन हजारों बातों की प्रतिक्रिया है जो भगवा पार्टी जमाने से मुस्लिमों के खिलाफ करती आ रही है ।


भाजपा प्रवक्ता की टिप्पणी से उठे तूफान पर तमाम तरह की बातें की जा रही हैं । जहां मुस्लिम जगत इससे बेहद नाराज़ है वहीं हजारों कट्टरपंथी हिंदू भी अब नूपुर के बचाव में आगे आ गए हैं । मेरी नज़र में इस मामले के एक दो नहीं वरन पूरे आधा दर्जन पहलू हैं । पहला पहलू तो बेशक स्वयं नूपुर शर्मा ही है मगर दूसरा भाजपा, तीसरा देश, चौथा समाज, पांचवा परंपराएं और छठा पहलू विपक्षी दल भी हैं । पहले पक्ष नूपुर की करें तो उसका भविष्य अब उज्ज्वल ही उज्ज्वल है । मुल्क में जिस तरह की राजनीति अब हो रही है उसमें अब नूपुरों के लिए ही तो स्कोप बचा है । बेशक अब वह जेल भी चली जाए मगर देश की राजनीति का बड़ा चेहरा होने से अब स्वयं भाजपा नेतृत्व भी उसे रोक नहीं पाएगा । दूसरे पहलू भाजपा की बात करें तो सतही तौर पर लग रहा है कि पार्टी अपने बड़बोले प्रवक्ताओं की वजह से फंस गई है और बचाव की मुद्रा में है मगर यह सच को अधूरा देखने जैसा ही होगा । हकीकत यह है कि जिस सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की नाव पर बैठ कर वह केंद्र और राज्यों में बार बार अपनी सरकारें बनाने में सफल होती है, यह मामला उसे और तेज करता है और तमाम असफलताओं के बीच 2024 में भाजपा का खेवनहार इसी ध्रुवीकरण को ही तो होना है । तीसरे पहलू देश की बात करें तो उसके हिस्से तो हार ही हार आनी है । खाड़ी देशों से 60 फीसदी तेल आता है , वहां काम कर रहे एक करोड़ भारतीयों से देश की आधी आमदनी होती है और निर्यात की भी बात करें तो अमेरिका के बाद सर्वाधिक निर्यात भी वहीं होता है । नूपुर शर्मा और नवीन जिंदल को लेकर गुस्साए 15 मुस्लिम देश भाजपा के फ्रिंज एलिमेंट जैसे बयान से संतुष्ट नहीं हुए, जैसा कि लग भी रहा है तो इसकी भारी कीमत देश को चुकानी पड़ सकती है । बात समाज की करें तो उसकी भी झोली से बचा खुचा सौहार्द जाता दिख रहा है । अब से पहले देश का मुस्लिम अधिक वाचाल नहीं था मगर अब उसके नेताओं को भी तल्ख़ और जहरीली बातें कहने का मौका मिल गया है । परंपराओं के हवाले से बात करें तो भी हम किस मुंह से डेड हज़ार साल पहले हुए निकाह में दुल्हन की उम्र की बात कर सकते हैं क्योंकि मात्र सौ साल पहले यानी पहले विश्व युद्ध तक तो सभी धर्मों और देशों में ऐसा होता ही रहा है । बेशक आज हम खुद को प्रगतिशील समाज होने का दावा कर रहे हैं मगर हमारी आने वाली नस्लें ही हमें दहेज और महिलाओं को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने जैसे तमाम दकियानूसी क्रियाकलापों के चलते कटघरे में खड़ा करने वाली हैं । अब बात करें मुल्क के विपक्षी दलों की तो उसके तो जैसे राहजनी ही हो गई है । मुस्लिम परस्त दिखने का साहस कोई दल अब कर नहीं सकता और सॉफ्ट हिंदुत्व को हिंदू समाज भाव ही नहीं दे रहा । कुल जमा बात करें तो इस प्रकरण से भाजपा और नूपुर की तो बैजा बैजा हो गई मगर बाकी सबकी मंडी लुट गई ।

जब मैं रोमांचित हो गया डॉ धनंजय singhv

 बात १९६८-६९ या १९६९-७० के शिक्षा-सत्र की है ! महानंद मिशन हरिजन महा विद्यालय,गाज़ियाबाद में कवि-सम्मलेन आयोजित था! कविवर श्रद्धेय श्री भवानी प्रसाद मिश्र अध्यक्षता कर रहे थे! तीन-चार कवियों के काव्य-पाठ के बाद एक छात्र कवि को कविता-पाठ के लिए आमंत्रित किया गया ! उसने एक गीत सुनाया और मंच से चला गया ! उसका काव्य-पाठ समाप्त होते ही भवानी दादा उठकर माइक पर आये ! अध्यक्ष का बीच में माइक पर आना असाधारण बात थी ! माइक पर आते ही दद्दा ने बोलना आरम्भ किया , " चौंकिए नहीं, मैं कविता-पाठ करने नहीं आया हूँ ! मुझे तो अभी जो छात्र कविता -पाठ करके गया है, उसने माइक पर आने को विवश कर दिया है! उसने जब गीत आरम्भ किया तो गीत की पहली पंक्ति सुन कर मैं डर गया ! डरा मैं यों कि जहां से उसने गीत आरम्भ किया था , सामान्यतः गीत का वहां समापन होता है ! मैंने सोचा कि अब गीत इससे आगे क्या कह पाएगा ? लेकिन वह गीत पढता गया और गीत उतरोत्तर आगे बढ़ता गया ! ऐसी स्थिति में मैं उसे आशीर्वाद न दूँ , तो यह अपराध होगा ! मैं इस छात्र कवि को अपने हृदय से शुभाशीर्वाद देने आया हूँ !"

                                  वह छात्र कवि मैं था !

इस घटना को याद करके मैं आज भी रोमांचित हो उठता हूँ ! 

                                       ------- धनञ्जय सिंह.

शुक्रवार, 10 जून 2022

सच तो यह है कहने को मैं जिंदा हूँ !/ उमाकांत दीक्षित

 सच तो यह है कहने को मैं जिंदा हूँ !

लेकिन खुद के  होने  पर शर्मिंदा हूँ !


मेरी कोशिश  बेहतर  इंसां  होने की,

दुनिया की नज़रों में सिर्फ दरिंदा हूँ !


जिसको मैंने अपनी ये दो आंखें  दीं,

वह कहता है,  मैं आंखों से अंधा हूँ !


मेरा अच्छा बुरा तो सब ईश्वर जाने,

मैं तो उसके दर का बस कारिंदा हूँ !


एक ना खाए, तो सब भूखे सोते हैं,

मैं तो  ऐसी  दुनिया का बाशिंदा हूँ !


तुझमें मुझमें फर्क भला कैसे होगा,

मैं भी आखिर अल्लाह का ही बंदा हूँ !

@ उमाकांत दीक्षित

गुरुवार, 9 जून 2022

भाग्यशाली का अर्थ

 *🌷#दान_भोग_व_नाश🌷*

*जो भोगे सो भाग्यशाली*

कृष्ण मेहता 


65 वर्ष की उम्र में एकांकी जीवन जीने वाला एक बुजुर्ग अवसाद(डिप्रेशन) की बीमारी से पीड़ित हो गया।उसको इलाज के लिए मनोचिकित्सक डॉक्टर 

के पास ले जाया गया।

डॉक्टर:आपके बच्चे क्या करते हैं?

बुजुर्ग: मैने उनकी शादी कर दी और वो सुखी जीवन व्यतीत कर रहे हैं। मेरी पत्नी गुजर चुकी है और मेरे जीवन में कोई खुशी, आनन्द नहीं है।

डॉक्टर: आपकी ऐसी कोई ईच्छा जो पूरी नहीं हुई हो।

बुजुर्ग: मेरी एक ख्वाहिश थी की में एक दिन फाइव स्टार होटल में रहूं।

डॉक्टर: आपके पास संपति कितनी है?

बुजुर्ग: मैं अभी एक फ्लैट में रह रहा हूं और 1000 मीटर का एक प्लॉट है जिसकी कीमत आज 8 करोड़ रुपया है। 

डॉक्टर:क्या आपको कभी ऐसा नहीं लगता है कि ये संपति बेच कर मैं मजे की जिंदगी जीऊं।अगर मेरी राय मानो तो ये प्लॉट 8 करोड़ में बेच कर 4 करोड़ की दूसरी संपति खरीद लो और बाकी के चार करोड़ खर्च करो।

एक फाइव स्टार होटल में,जिसका रोज का भाड़ा 10000.00 रुपया हो उसमें रहने लगो। उसमें आपको स्विमिंग पूल, जिम,विभिन्न प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन मिलेंगे और रोज नए नए लोगों से मुलाकात होगी सो अलग।

हर महीने शहर बदल बदल कर रहो।जितना ज्यादा हो सके जिंदगी का आनन्द उठाओ। आपको अपने जीवन के प्रति प्रेम पैदा होगा और आप अवसाद(डिप्रेशन) से बाहर आ जाओगे।

बुजुर्ग डॉक्टर की नसीहत मान कर  एक फाइव स्टार होटल में 10000 रुपए के भाड़े वाला कमरा लियाऔर  आनन्द से रहने लगे।उनकी खुशी का कोई पार न था।

73वें साल की उम्र में उनका निधन हो गया। तब तक उनकी 4 करोड़ वाली संपति की कीमत बढ़ कर 8 करोड़ हो गई और खुल कर खर्च करने के बाद भी उनके पास 1.5 करोड़ बचे रह गए।

*कहने की जरूरत नहीं है कि उनको अवसाद से पूर्णतया मुक्ति मिल गई  और साथ में जीने के अनेक बहाने भी मिलते गए।*


*शिक्षा: कमाई हुई संपति मरने से पहले खर्च करलो और आनन्द के साथ बुढ़ापे की जिंदगी जियो।अगर आप कमाए हुए धन का अपने लिए जीते जी उपयोग नहीं करते तो आपका कमाना बेकार है।*


*जो भोगे वही भाग्यशाली*

*शुभेच्छु*🙏🏻


*

सभी महिलाओं को समर्पित 💗/ अज्ञात

 💗 सभी महिलाओं को समर्पित 💗


रसायनशास्त्र से शायद ना पड़ा हो पाला

पर सारा रसोईघर प्रयोगशाला


दूध में साइटरीक एसिड डालकर पनीर बनाना या 

सोडियम बाई कार्बोनेट से केक फूलाना

चम्मच से सोडियम क्लोराइड का सही अनुपात तोलती 

रोज कितने ही प्रयोग कर डालती हैं

पर खुद को कोई  वैज्ञानिक नही 

बस गृहिणी ही मानती हैं


रसोई गैस की बढ़े कीमते या सब्जी के बढ़े भाव

पैट्रोल डीजल महँगा हो या तेल मे आए उछाल

घर के बिगड़े हुए बजट को झट से सम्हालती है

अर्थशास्त्री होकर भी

खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं


मसालों के नाम पर भर रखा

आयूर्वेद का खजाना

गमलो मे उगा रखे हैं

तुलसी गिलोय करीपत्ता

छोटी मोटी बीमारियों को

काढ़े से भगाना जानती है

पर खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं।


सुंदर रंगोली और मेहँदी में 

नजर आती इनकी चित्रकारी

सुव्यवस्थित घर में झलकती है

इनकी कलाकारी

ढोलक की थाप पर गीत गाती नाचती है

कितनी ही कलाए जानती है पर 

खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं


समाजशास्त्र ना पढ़ा हो शायद

पर इतना पता है कि

परिवार समाज की इकाई है

परिवार को उन्नत कर

समाज की उन्नति में

पूरा योगदान डालती है

पर खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं।


मनो वैज्ञानिक भले ही ना हो

पर घर में सबका मन पढ लेती है

रिश्तों के उलझे धागों को

सुलझाना खूब जानती है

पर खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं।


 योग ध्यान के लिए समय नहीं है

 ऐसा अक्सर कहती हैं

और प्रार्थना मे ध्यान लगाकर

 घर की कुशलता मांगती है

 खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं।


ये गृहणियां सच में महान है

कितने गुणों की खान है

सर्वगुण सम्पन्न हो कर भी

अहंकार नहीं पालती है

खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं।


साभार..  @A...k


#हर_बेटी_मेरी 

🙏🙏🙏

तुम्हीं से मोहब्बत, तुम्हीं से लड़ाई

 तुम्हीं  से मोहब्बत,  तुम्हीं से लड़ाई


(नंदकिशोर नवल का पुण्य स्मरण)  / गोपेश्वर सिंह


अजीब रिश्ता रहा नंदकिशोर नवल से . वे हमारे अध्यापक भी थे और वरिष्ठ सहकर्मी भी. उनसे वैचारिक- साहित्यिक  हमारी लड़ाइयाँ  भी  ख़ूब हुईं और हमने एक- दूसरे से बेपनाह मोहब्बत भी  की. लगभग चार दशकों के संग- साथ में अनेक चढ़ाव- उतार आए. हम एक- दूसरे को कभी पसंद ,कभी नापसंद करते रहे. एक- दूसरे की रूचियों को सराहते रहे और मजाक़ उड़ाते रहे. अब जब कि वे नहीं हैं तो लगता है कि पटना से लगाव का एक बड़ा आधार ख़िसक गया. वह पटना जिसे वे बेहिसाब प्यार करते थे और मेरे लिए जो कभी ‘सिटी ऑफ़ जॉय’ था. हमारे बहुत ही बेतकल्लुफ़ गुरु और साथी थे नंदकिशोर नवल, जिन्हें याद करता हूँ तो अपने जीवन का धड़कता हुआ अध्याय खुलने लगता है.

   

1990 और 1998 के बीच की कोई तारीख थी. इतना ही याद है कि नवल जी तब विश्वविद्यालय की सेवा में थे. यह भी याद है कि अप्रैल महीने का कोई गर्म दिन था. रात के क़रीब आठ बजे मैं और तरुण कुमार नवल जी के साथ आरा रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर खड़े थे. हम एक सेमिनार से निकले थे और हमें पटना के लिए ट्रेन पकड़नी थी. ट्रेन के आने में एक घंटे की देर थी. गर्मी से ऊपर का  ए   स्बेसटस और प्लेटफ़ॉर्म तप रहे थे. ट्रेन की प्रतीक्षा और ऊपर से गर्मी . हम परेशान हो उठे. तभी नवल जी ने एक ऐसी बात कही जिसके कारण हम दोनों अपनी परेशानी भूल गए. उन्होंने कहा: “आप लोगों को एक बात बताना चाहता हूँ. ‘निराला रचनावली’ के संपादन के दौरान मुझे कई शहरों की यात्रा करनी पड़ी. कई बार इसी तरह के तपते हुए प्लेटफॉर्म पर रात में गमछा बिछाकर सोना पड़ा. लगता था कि मेरी पीठ जल गयी हो. जो रचनावली हिंदी संसार के सामने है उसके संपादन में जितने कष्ट झेलने पड़े उनमें से एक इस तरह के प्लेटफॉर्म पर गमछा बिछाकर सोना भी था’’. 


‘निराला रचनावली’ के संपादन में नवल जी ने बहुत मिहनत की. प्रायः सभी रचनाओं के प्रकाशन के संदर्भ और समय का उल्लेख किया. रचनाओं के क्रम-निर्धारण का काम भी सावधानी के साथ किया.  निराला-साहित्य के परिप्रेक्ष्य को ठीक से हिंदी संसार के सामने रखने के लिए रचनावली की लम्बी भूमिका लिखी. मैं कह सकता हूँ कि हिंदी में जो सुसंपादित रचनावलियाँ हैं उनमें ‘निराला रचनावली’ का ऊँचा स्थान है. नेमिचंद्र जैन के संपादन में तब ‘मुक्तिबोध रचनावली’ निकल चुकी थी. वह भी सुसंपादित रचनावली है. नवल जी के सामने संभव है कि वह आदर्श उदहारण के रूप में रही हो. बाद के दिनों में विजय बहादुर सिंह ने ‘नंद दुलारे वाजपेयी रचनावली’, ओमप्रकाश सिंह ने ‘रामचंद्र शुक्ल रचनावली’, और मस्तराम कपूर ने ‘राममनोहर लोहिया रचनावली’ के संपादन द्वारा आदर्श उदहारण पेश किए . इस क्रम में  सुसंपादित अन्य रचनावलियों का भी नाम लिया जा सकता है. लेकिन हिंदी में निकली सभी रचनावलियों को आदर्श के रूप में नहीं याद किया जा सकता. बहरहाल, नवल जी ने रचनावली के साथ कई पुस्तकों के संपादन में इसी आदर्श का निर्वाह किया. वे मानते थे कि मिहनत का कोई विकल्प नहीं है. संपादन का उद्देश्य और उसके पीछे काम करने वाली दृष्टि स्पष्ट होनी चाहिए. शायद यही कारण था कि मेरे द्वारा संपादित दो किताबें- ‘भक्ति आंदोलन के सामाजिक आधार’ और ‘कल्पना का उर्वशी विवाद’ उन्हें ख़ूब पसंद आयीं. 


उनकी संपादन- कला उनके द्वारा संपादित पत्रिकाओं में भी देखी गई. पत्रिका निकालना उनका प्रिय काम था. अपने युवा काल में अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर उन्होंने ‘ध्वजभंग’ नाम से एक पत्रिका निकाली थी. तब उन पर राजकमल चौधरी की संगति का असर था. भूखी पीढ़ी, नंगी पीढ़ी आदि का भी कुछ असर होगा. पटना में राजकमल के घर पर नंदकिशोर नवल, कुलानंद मिश्र, सिद्धिनाथ मिश्र और शिव वचन सिंह की बैठक हुई और एक पत्रिका निकालने का निर्णय लिया गया. राजकमल ने पत्रिका का नाम सुझाया- ‘प्रचोदयात’. राजकमल ने कहा कि गायत्री मंत्र का यह शब्द है जिसका अर्थ होता है- प्रेरित करना, आगे बढ़ाना आदि. लेकिन नवल जी और उनके साथी राजकमल जैसे साहसी नहीं थे. उनकी राय थी कि ‘ध्वजभंग’ नाम से पत्रिका निकले. तब नवल जी विश्वविद्यालय के शोध छात्र थे. अपने शोध के सिलसिले में वे कुछ हफ़्तों के लिए पटना से बाहर गए. इसी बीच राजकमल चौधरी का असामयिक निधन हो गया. यह 1967 के आसपास की बात है. बाद में ‘ध्वजभंग’ नाम से ही पत्रिका निकली. तीन-चार अंक निकलने के बाद पत्रिका बंद हो गई. ‘ ध्वजभंग’ गढ़ा हुआ नाम था, इससे कई अर्थ निकलते थे. एक अर्थ अकवितावादी संस्कार का भी था. बाद के वर्षों में ‘सिर्फ’, ‘धरातल’, और ‘उत्तरशती’ का उन्होंने संपादन किया.  नामवर सिंह के साथ सह संपादक के रूप में वे ‘आलोचना’ से भी जुड़े. अवकाश ग्रहण के बाद उन्होंने ‘कसौटी’ के पंद्रह अंक निकाले. 


 कुल मिलाकर यह कि पत्रिका निकालना नवल जी का प्रिय शौक़ था. अपने इस शौक़ को वे बहुत जतन से निभाते थे. रचनाओं के संपादन से लेकर प्रूफ़ रीडिंग तक का काम वे स्वयं करते थे. एक- एक शब्द की जाँच-परख करते थे. अपना बहुत-सा समय और पैसा उन्होंने पत्रिका निकालने में ख़र्च किया. क्यों किया? मुझे लगता है कि पत्रिका के जरिए नए रचनाकारों से जीवंत संवाद का आकर्षण उनके भीतर प्रबल था. वे हमेशा नये रचनाकारों का संग- साथ पसंद करते थे. वे गुरुडम के शिकार नहीं थे. उसी आदमी ने दो साल पहले एक ऐसी बात कही जो मुझे झकझोर गयी. उन्होंने पूछा कि अब आपका रिटायर्मेंट करीब आ रहा है तो क्या करने की योजना है? मैंने कहा कि सोचा नहीं है, मन हुआ तो कोई पत्रिका निकालूँगा. उन्होंने कहा कि अपनी पसंद के विषय पर क़िताब लिखिए. किसी कवि-कथाकार या आलोचक पर एकाग्र होकर काम कीजिए. अब तक यह काम आपने नहीं किया है. फुटकल लेख लिखने से कोई आलोचक नहीं बनता. पत्रिका हर्गिज मत निकालिए. यह ‘थैंकलेस जॉब’ है. होशियार लेखक कभी पत्रिका नहीं निकालते हैं, जैसे  ज्ञानेंद्रपति, आलोकधन्वा और अरूण कमल. इसी के साथ यह भी कहा कि दूसरों की रचनाओं को सुधारते रहने से अच्छा है कि आदमी अपने मन का पढ़े-लिखे. मैं चकित हुआ कि यह बात वह आदमी कह रहा है जिसने जीवन भर पत्रिकाएँ निकाली हैं. वे मुझसे , तरुण कुमार और अपूर्वानंद से उम्मीद करते थे कि हम ख़ूब लिखें, लेकिन जब हम उनकी उम्मीदों पर खरे उतरते नहीं नहीं दिखे तो हमारी हल्की- सी  आत्मीय शिकायत भी करने लगे. कहते कि बाबू साहेब को गप, अड्डेबाजी और भाषण से फ़ुर्सत नहीं है, तरुण जी लिखने में आलसी हैं और अपूर्वानंद की दिलचस्पी का क्षेत्र साहित्य नहीं, राजनीति है.( वे अक्सर मुझे ‘बाबू साहेब’ कहते थे. उनकी देखा- देखी तरुण कुमार, अपूर्वानंद, सत्येन्द्र सिंहा आदि भी कभी- कभी ‘बाबू साहेब’ कहते थे.)     


बहरहाल, नवल जी जितने समर्पित और मिहनती संपादक थे उससे अधिक मिहनती और समर्पित शिक्षक थे. समय से कक्षा में आना और निर्धारित विषय पर पूरे समय केन्द्रित होकर ठहर-ठहर कर बोलना उनकी आदत थी. वे हमें निराला और मुक्तिबोध की कविताएँ पढ़ाते थे. एक-एक शब्द की व्याख्या के साथ कविता को पूरे विस्तार से खोलते थे. कविता का सामाजिक संदर्भ भी बतलाते थे पर सबसे पहले कविता के धरातल पर हमें ले जाते थे.  छुट्टी पर जाने वाले अध्यापक की जगह पर भी वे अक्सर आ जाते थे. पटना विश्वविद्यालय में तब कोई कक्षा ख़ाली नहीं जाती थी. हम  जब उस खाली पीरियड का आनंद उठाना चाहते, तभी नवल जी कक्षा में हाज़िर. हम तब उन्हें ‘फिल अप द ब्लैंक’ के नाम से याद करते. हमारे हाव-भाव से वे समझ जाते कि हम कोई गंभीर व्याख्यान सुनने के मूड में नहीं हैं. तब वे किसी दिलचस्प साहित्यिक विषय पर बातचीत करते. एक दिन उन्होंने यह बताया कि किस लेखक-कवि का असली नाम क्या है; जैसे सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का मूल नाम सूर्य कुमार तिवारी, सुमित्रानंदन पंत का गुसाईं दत्त पंत, शांतिप्रिय द्विवेदी का मूंछन दुबे, जैनेंद्र कुमार का आनंदी लाल, मलयज का भरतजी लाल  श्रीवास्तव आदि-आदि. यह सब वे बता रहे थे तभी एक शरारती छात्र ने पूछा: “ सर, आपका मूल नाम?’’ वे मुस्कुराए. लेकिन इत्मीनान से जवाब दिया: “नंदकिशोर सिंह. लेकिन मैंने मैट्रिक का फॉर्म भरते समय अपने नाम से ‘सिंह’ हटाकर ‘नवल’ लगा लिया.’’ हमारे साथी ने रचनात्मक सवाल किया:  ‘तख़ल्लुस तो कवि लगाते हैं. आप ठहरे प्रगतिशील आलोचक?’ इस बार उन्होंने उस शरारती छात्र को ठहर कर देखा और कहा: “पहले मैं कवि था. मेरा एक काव्य संग्रह छप चुका है.’ उस छात्र ने कहा: “ओह, आप कवि थे! तभी तो!’’ नवल जी ने यह नहीं पूछा कि ‘क्या तभी तो’, लेकिन यह समझ गए कि छात्र पढ़ने के मूड में नहीं हैं. फिर भी पढ़ाते रहे. बाद के दिनों में भी वे आते और किसी दिलचस्प साहित्यिक विषय पर चर्चा करते. हमने भी मान लिया था कि गुरूजी लोग बिना पढाये नहीं मानेंगे, सो मन मारकर पढ़ने लगे. लेकिन जहाँ चाह, वहाँ राह जैसी कहावत छात्रों ने सुन रखी थी.


असल में ख़ाली पीरियड कम मिलते थे. दस बजे से दो बजे तक लगातार चार पीरियड होते थे. ख़ाली पीरियड में लडके अपनी कक्षा की लड़कियों से बात करना चाहते थे जिनकी संख्या लड़कों के बराबर ही थी. दो बजे के बाद सभी लड़कियाँ घर में अच्छी बनी रहने के लिए जल्दी घर भाग जाती थीं . देर से पहुँचने पर माता-पिता की डांट सुननी पड़ती. छुट्टी के दिन मिलने का तो सवाल ही नहीं था. सो, लड़कों के पास अपना ख़ाली पीरियड ही होता लड़कियों को प्रभावित करने के लिए. लेकिन नवल जी की अधिक तत्परता हमें भारी पड़ने लगी. लड़कों ने तय किया कि ख़ाली पीरियड में हम लोग गंगा किनारे बैठेंगे जो विभाग के पीछे ही था. लेकिन एक भक्त किस्म के छात्र ने उन्हें इसकी सूचना दे दी.  ग़नीमत रही कि उन्होंने इस पर ध्यान न दिया. मामले की नजाकत शायद वे समझ गए थे. 


  मैं जब वहीं अध्यापक हो गया तो वे मुझे भी तैयार होकर कक्षा में जाने के लिए प्रेरित करते थे. थोड़ी भी देर होती तो वे हमें टोकते थे. कहते थे कि शिक्षक को कक्षा में समय से जाना चाहिए और निर्धारित समय और निर्धारित विषय पर बोलना चाहिए. वे यह भी बताते थे कि जो विषय अगले दिन पढ़ाना है उसकी तैयारी एक दिन पूर्व कर लेनी चाहिए. वे यह भी कहते थे कि अपने व्याख्यान का आदि और अंत बिलकुल सुचिंतित होना चाहिए. यह सब मैंने  कितना सीखा यह तो नहीं कह सकता , लेकिन यह कह सकता हूँ  कि नवल जी इसका पालन जीवन भर करते रहे. वे कक्षा को जितनी गंभीरता से लेते थे उतनी ही गंभीरता से साहित्यिक आयोजनों को भी. विभाग में जब भी वे आयोजन करते उसकी पूरी रूपरेखा गंभीर होती. विश्वविद्यालय के बाहर प्रगतिशील लेखक संघ के बैनर तले या व्यक्तिगत रूप से भी उन्होंने जो विचार गोष्ठियाँ पटना में आयोजित कीं, उनकी बड़ी भूमिका नगर के युवाओं को प्रशिक्षित करने में रही. उन्हीं के जरिए उन आयोजनों में हमने नामवर सिंह के ऐतिहासिक भाषण सुनें. हमने केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह, नागार्जुन, त्रिलोचन, अमृतलाल नागर, रघुवीर सहाय, आदि को सुना और अपने को समृद्ध किया. मैं कह सकता हूँ कि नंदकिशोर नवल जैसा सुरुचि सम्पन्न आयोजक मैंने कम देखा  है.

 लेकिन इसी के साथ मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि नंदकिशोर नवल पर प्रगतिशील लेखक संघ और कम्युनिस्ट पार्टी का ऐसा असर था कि वे अपने से भिन्न मत के विरोधियों को बर्दाश्त नहीं कर पाते थे. एक बार पटना विश्वविद्यालय कीn ओर से सात दिनों का सेमिनार हुआ. विषय था ‘लोक चेतना और हिन्दी साहित्य’. हिन्दी के तमाम छोटे-बड़े लेखक-विद्वान उसमें आमंत्रित हुए. डॉ. नगेन्द्र ने उद्घाटन किया और समापन डॉ. नामवर सिंह ने. रमेश कुंतल मेघ, शिव कुमार मिश्र, विष्णुकांत शास्त्री, मैनेजर पाण्डेय, मधुरेश, सुरेंद्र चौधरी, आदि की याद मुझे है, जिन्होंने वक्ता के रूप में शिरकत की थी. ढाई-तीन सौ लोग सुबह दस बजे से शाम पाँच बजे तक वक्ताओं को सुनते थे. बीच में लंच की व्यवस्था नहीं थी. तब भी श्रोता सुनने के लिए डटे रहते. इससे इस सेमिनार की बौद्धिक गुणवत्ता का अंदाजा किया जा सकता है. लेकिन अचानक एक ऐसा दृश्य उपस्थित हुआ जिसकी कल्पना किसी को नहीं थी. विष्णुकांत शास्त्री जब लोक चेतना की आस्थामूलक व्याख्या कर रहे थे तो नवल जी का धैर्य जवाब दे गया. वे उठे और शास्त्री जी को टोकते हुए उन्होने कहा कि यह संघ का मंच नहीं है और हम संघ के कार्यकर्ता भी नहीं हैं, यहाँ पढे-लिखे लोग बैठे हैं,आदि  . इसके बाद वह सत्र बाधित हो गया. बहुतों को नवल जी की यह हरकत अच्छी नहीं लगी. इसका बदला दक्षिण पंथी सोच के विभागाध्यक्ष  राम खेलावन राय ने अगले सत्र में  लिया. रमेश कुंतलमेघ जब बोल रहे थे तो लोक चेतना की उनकी जनवादी व्याख्या को राम खेलावन राय ने बीच में टोककर चुनौती दी और कहा कि यह कम्युनिस्ट पार्टी का मंच नहीं है. इसके बाद हंगामा हुआ और वह सत्र भी नष्ट हो गया. इसी तरह फिर एक बार रघुवीर सहाय का व्याख्यान पटना प्रगतिशील लेखक संघ ने कराया. रघुवीर सहाय किस विषय पर बोले यह तो याद नहीं है लेकिन यह याद है कि उन्होंने कहा था कि प्रगतिशील लेखक संघ एक सांप्रदायिक संगठन है. सांप्रदायिक संगठन से उनका आशय यह था कि जैसे पहले साधु-संतों के संप्रदाय हुआ करते थे वैसा ही यह संगठन है. उनका आशय यह भी था कि संगठन की प्रगतिशीलता संबंधी समझ संकीर्ण है. नवल जी से रघुवीर सहाय की अपने संगठन की यह आलोचना बर्दाश्त नहीं हुई. धन्यवाद ज्ञापन में उन्होंने रघुवीर सहाय की ‘भूरी-भूरी निंदा’ की. रघुवीर चुपचाप सुनते रहे. इसे श्रोताओं ने अच्छा नहीं माना. 


 कुल मिलाकर नंदकिशोर नवल जितने अच्छे अध्यापक, संपादक और आयोजक थे उतने ही ‘अच्छे’ असहिष्णु मनुष्य थे. जितने लोगों से उनकी पटती थी उससे अधिक लोगों से उनकी खटपट रहती थी. नवल जी लिख कर और बातचीत की अपनी टिप्पणियों से अपने दुश्मन स्वयं बनाते थे. नगर के जो भी कवि –लेखक थे उनमें कइयों से उनके सम्बन्ध शिथिल थे. कुमारेंद्र पारसनाथ सिंह, ज्ञानेंद्रपति, आलोकधन्वा, प्रेम कुमार मणि, नचिकेता, जितेन्द्र राठौर आदि से अबोला जैसा था. वे तब अरुण कमल की कविता पसंद करते थे और उन्हें साथ लेकर घूमते थे. उस समय एक चतुष्पदी पटना के साहित्यिक हलके में सुनी-सुनाई जाती थी-

आलोचना की नवल शैली चली है

कुछ लोचनों को रचना खली है 

कुछ पालतू हैं, बाकी फालतू हैं

भले हैं वे जिनकी दाल गली है. 

कहा जाता है कि यह चतुष्पदी ज्ञानेंद्रपति की लिखी हुई है. बाद के दिनों में अरुण कमल को नवल जी कम पसंद करने लगे और ज्ञानेंद्रपति तथा आलोकधन्वा उनके प्रिय हो गए. वैसे आठवें दशक के कवियों में अंतिम दिनों में उनके सर्वाधिक प्रिय भोपाल के राजेश जोशी हो गए थे. 


 आयोजनों की बात चली है तो यह भी बताता चलूँ कि 1970 में नवल जी ने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर एक विराट युवा लेखक सम्मेलन किया. इसमें नामवर सिंह, धूमिल, वेणु गोपाल, विजेंद्र, कुमारेन्द्र आदि लगभग पचास लेखकों ने भाग लिया. यह नवल जी की आयोजन क्षमता थी जो अत्यंत व्यवस्थित थी. इसी के साथ यह भी बताना चाहता हूँ कि नवल जी को सुंदर काव्य- पंक्तियाँ और शेर ख़ूब याद थे. बातचीत में सही जगह पर वे उनका प्रयोग करते थे. एक बार हम दोनों राजेंद्र नगर स्टेडियम में सुबह घूम रहे थे. सामने से सुंदर काया वाली स्त्री आती हुई दिखी. नज़दीक आने पर मैंने देखा कि चेचक के गहरे गड्ढों से उसके चहरे का सौंदर्य बिगड़ गया है. मेरे मुंह से दुःख सूचक ‘आह’ की ध्वनि निकली. नवल जी ने मेरे दुखी होने पर एक शेर सुनाया जिसकी दूसरी लाइन याद है-‘ देखा है आशिकों ने आँखें गडा गडा कर’. मतलब यह कि चहरे पर जो गड्ढे  हैं वे आशिकों की गहरी निगाहों के कारण बन गये  हैं.  उसके बाद मैं अपना दुःख भूल गया.


 नवल जी का वस्त्र विन्यास भी बहुत सुंदर और सुसंपादित होता था. वे सूट -टाई, धोती-कुर्ता और पाजामा-कुर्ता तीन तरह का पोशाक पहनते थे. घर पर लूंगी. जाड़े में सूट और टाई तथा शेष महीनों में धोती-कुर्ता या कुर्ता-पाजाम या पैंट शर्ट. वे जो भी पहनते कपड़े बहुत ही साफ-सुथरे होते और उनके व्यक्तित्व पर फबते थे. उनका व्यक्तित्व अत्यंत सुदर्शन था. जाड़े में सूट, टाई पहनकर जब वे साइकिल चलाते हुए विभाग आते थे तो बहुत लोग उत्सुकता से उन्हें देखते थे. वे टाई का नॉट बहुत बढ़िया बनाते थे.मुझे टाई का नॉट बनाना उन्होंने ही सिखलाया था. उनका व्यक्तित्व इतना चमकता हुआ रहता था कि हम लोग कहते थे कि उनकी मैडम उन्हें ठाकुर जी की बटिया तरह धो-पोंछकर रखती हैं. इसके पीछे कारण यह था कि नवल जी घर-गृहस्थी की चिंता से प्रायः मुक्त रहते थे. उनकी पत्नी रागिनी शर्मा सब कुछ संभालती थीं. यहाँ तक कि कई दफा नवल जी का दिया हुआ डिक्टेशन भी वे लेती थीं. वे सही अर्थों में नवल जी की ‘सचिव-सखी-सहचरी’ रहीं. 


 नवल जी में अनुशासन और अराजकता दोनों का अद्भुत मेल था. वे अपने लिखने-पढ़ने के समय में कोई कटौती नहीं करते थे. इसके चलते कई दफा उनके संबंधी, मित्र और छात्र नाराज हो जाते थे. लेकिन कभी-कभी उनकी अराजक मस्ती देखते हुए बनती थी. छुट्टी के दिन एक बार तरुण कुमार के साथ सुबह टहलते हुए मेरे घर आए. गपशप का सिलसिला शुरू हुआ तो लंबा हो गया. उन्होंने मेरे घर के एक लड़के को भेजकर कचौड़ी और जलेबी मंगाई. नाश्ता करने के बाद हम लोग फिर गपशप में जुट गए. यह क्रम तब टूटा जब एक बजे के लगभग उन्हें कई जगह खोजते हुए  परेशान रागिनी शर्मा मेरे घर आयीं. तब मोबाइल का जमाना नहीं था. और हम लोगों के घर फोन भी नहीं था. इसी तरह की एक और घटना याद आती है. दो बजे जब कक्षाएँ समाप्त हो जाती थीं तो हम बैठकर साहित्य, समाज और राजनीति पर गपशप करते थे. बीच में चपरासी को भेजकर भूंजा मंगाते थे. भूंजा  खाने के बाद कभी-कभी गुलाब जामुन खाने की हमारी आदत थी. यूनिवर्सिटी के बाहर लालजी की दुकान पर हम पान खाते और तब अपने-अपने घर जाते. कभी- कभी हमारी बैठक राजकमल प्रकाशन में होती. महीने -डेढ़ महीने पर हम कभी-कभी पटना की मशहूर मिठाई की दुकानों में जाते और कई तरह की मिठाइयाँ तब तक खाते रहते जब तक कि हम थक न जाते. इसी क्रम  में एक बार ऐसा हुआ कि हमने मिठाइयाँ खूब खा लीं. पैसे देने की बारी आई तो किसी की जेब में पैसे नहीं थे. दुकान यूनिवर्सिटी इलाके में नहीं, रेलवे स्टेशन के पास थी. दुकानदार हमें बिलकुल नहीं जानता था. नवल जी ने अपने सुदर्शन और सूट-टाई वाले व्यक्तित्व का उपयोग किया और दुकान मालिक से कहा कि हम पैसे कल भेज देंगे. दुकानदार हमें पहचानता तो नहीं था, लेकिन वह समझ गया कि ये यूनिवर्सिटी के विद्वान लोग हैं.


वे बहुत संयमी थे. बाहर कभी कुछ नहीं खाते थे. लेकिन कभी – कभी यह संयम ढीला पड़ता था तब अराजक रूप ले लेता था. एक बार मेरे घर हम दोनों मछली खाने बैठे. उत्साह में पांच लोगों का हिस्सा हम दो ही खा गए. मेरे घर के बाकी लोग हमारा यह रूप देखकर मुस्कुराते रहे.उनको अंचार के साथ भोजन करना पड़ा. उस अति का फल यह हुआ कि उसको पचाने के लिए मुझे चौबीस घंटे और नवल जी को अड़तालीस घंटे का उपवास  करना पड़ा. मैडम रागिनी शर्मा ने हमारी इस आदत को देहातीपना कहा तो हमने चुपचाप मान लिया. आखिर हम गाँव के तो थे ही. इसी तरह एक बार सोनपुर का विश्व प्रसिद्ध पशु मेला देखने का उनका  मन हुआ. उनके साथ उनके आग्रह पर उनके तीन शिष्य हृषीकेश सुलभ, तरुण कुमार और गोपेश्वर सिंह तथा चौथे  कवि मदन कश्यप मेला देखने गए. दो बजे से लेकर रात दस बजे तक हमने मस्ती काटी. तरह- तरह के व्यंजन चखे, तरह- तरह के कौतुक किए और तरह- तरह के पशु- पक्षी देखे.तरुण जी, सुलभ और मैंने भंग खायी और झूले पर झूले. तरुण कुमार ने तीन सौ की एक कश्मीरी टोपी अपनी अद्भुत मोल- तोल वाली क्षमता के बल पर दस रुपये में खरीदी. धोती- कुर्ता के साथ कश्मीरी टोपी जब उन्होंने पहनी तब उनके उस रूप की प्रशंसा में हम सबने  सामूहिक रूप से एक कुंडलिया लिखी- ‘धोती कुर्ता टोपी में ही फबते तरुण कुमार’. वह कुंडलिया अब भी  याद है जिसका अंत होता है  इस पंक्ति से –‘ वस्त्र राशि में वैसे ही टी के. की  धोती’. उस दिन तरुण जी कुछ नहीं बोले, अपने ऊपर बनी कुंडलिया का आनंद उठाते रहे. बाद के. दिनों में हमने सामूहिक रूप से पटना के साहित्यिक संसार पर बहुतेरी कुंडलिया लिखीं जो हमारी रचनात्मक आवारगी का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं. सब कुछ इस मेला यात्रा का आनंददायी रहा लेकिन अंत बड़ा ही तनाव पूर्ण हुआ. नवल जी की ज़िद पर सोनपुर से पटना तक लगभग पचास किमी की यात्रा रिक्सा पर करने का फ़ैसला हुआ . एक रिक्सा पर  नवल जी और तरुण कुमार निकल गए. हमें रिक्सा मिलने में देर हुई . जब हम तीनों  रात क़रीब दो बजे गंगा पुल से उतर रहे थे, तभी हमारा रिक्सा तेजी से नीचे गिर पड़ा. हम तीनों और रिक्सावाले को चोट तो बहुत लगी लेकिन जान बच गयी. नवल जी की मस्ती की वह रात  मुझे , सुलभ और मदन कश्यप को जब भी याद आती है हमारे भीतर सिहरन- सी दौड़ जाती है.                  


 नवल जी की साहित्यिक रुचि कई पड़ावों से होकर गुजरी थी. पहले वे उत्तर-छायावादी कवियों  की भावभूमि पर कविता लिखते रहे. उसके बाद राजकमल चौधरी के संग-साथ के कारण अकविता के प्रभाव में आए. उसके बाद नक्सलबाड़ी आंदोलन की ओर घूम आए. बाद में अज्ञेय का प्रभाव उन पर रहा. प्रगतिशील लेखक संघ और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता लेने के बाद वे प्रगतिवादी सोच के आलोचक हो गए. शमशेर, नागार्जुन, केदार, मुक्तिबोध, त्रिलोचन आदि को खूब पसंद करते थे और गैर-प्रगतिशीलों को रूपवादी यानी वर्ग शत्रु मानते थे. बाद में राजेश जोशी, अरुण कमल, उदय प्रकाश आदि उनके प्रिय युवा कवि थे. आलोकधन्वा, वीरेन डंगवाल, मंगलेश डबराल आदि की खूब आलोचना करते थे . उनकी नज़र में अशोक वाजपेयी तब रूपवादी कैंप के नेता  थे. लेकिन एक गुणात्मक बदलाव 1990 के दशक में नवल जी में आया. इस बदलाव के मूल में सोवियत संघ का पतन एक कारण तो था ही, बड़ा कारण था नागार्जुन का विरोध. उन दिनों  नागार्जुन भाकपा और प्रलेस  के  खिलाफ ख़ूब बोलते थे. सोवियत संघ के खिलाफ भी वे बोलते थे. नागार्जुन का यह ‘राजनीतिक भटकाव’ नवल जी से बर्दाश्त नहीं हुआ. वे लिखकर और बोलकर नागार्जुन की आलोचना करने लगे. उसका परिणाम यह हुआ कि नवल जी को पार्टी और संगठन से हटना पड़ा या विरोध को देखते हुए वे खुद हट गए. यही दौर था जब नवल जी प्रगतिशीलता बनाम गैर प्रगतिशीलता, कंटेन्ट बनाम फार्म के रूढ विभाजन से मुक्त हुए और पाठ केन्द्रित आलोचना की ओर मुड़े. 


असल में नवल जी बीच का रास्ता नहीं जानते थे. इधर या उधर- या तो आप मित्र हैं या शत्रु . यही कारण था कि नगर के कवियों- लेखकों में से कुछ उनके मित्र थे, शेष से संवादहीनता थी. उनके छात्र रहे लेखकों में से कई लोग थे, जिनसे बातचीत बंद थी. बलराम तिवारी,  राणाप्रताप, भृगुनंदन त्रिपाठी, कर्मेंदु शिशिर. अरविंद कुमार, आनंद भारती, हृषीकेश सुलभ आदि से बहुत दिनों तक मुँह फुलौवल की स्थिति रही. अपनी टिप्पणियों से दूसरों को चिढ़ाने में नवल जी का कोई जवाब नहीं था. ऐसा करके उन्हें शायद मजा आता था. लेकिन ऐसा करके वे अपने प्रशंसकों को खो रहे हैं, इसकी चिंता उन्हें नहीं थी. मेरे साथ सम्बन्धों में उतार- चढ़ाव तो आया, लेकिन मुझसे  बातचीत कभी बंद नहीं हुई. इसे मैं उनका बड़पन मानता हूँ. बाद में उन्होंने आगे बढ़कर सबसे सम्बन्ध ठीक किये. एक बार दिल्ली में अपूर्वानंद के घर पर मुझे गले लगाकर रोने लगे. बोले कि आपको ठीक से मैंने देर से समझा. यह कम उन्होंने कई लोगों के साथ किया. तब भी गोपाल राय और खगेन्द्र ठाकुर से सम्बन्ध- सुधार की दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई. उसे अपवाद कहा जाएगा. उन दोनों ने अपनी ओर से पहल की, लेकिन नवल जी का अंत- अंत तक क्रोध शांत नहीं हुआ

.बहरहाल, नवल जी में बदलाव आया. लेकिन  शायद उन्होंने देर से यह बात समझी कि जीवन सिर्फ़ सफ़ेद और स्याह रंगों से नहीं बना है, वह अनगिनत रंगों के मेल का नाम है. इस बदलाव के बाद जो नंदकिशोर नवल दिखाई देते हैं, वह ‘उत्तर नवल पक्ष’ है- जीवन में भी और अपनी आलोचना में भी. लेकिन जो भी कहा जाए , नवल जी की पूर्व पक्ष की गतिविधियों से पटना का साहित्य जगत गुलज़ार रहता था. दूसरों को जब वे चिढ़ाते थे तो लोगों को मजा आता था.     


 नवल जी मूलतः कविता के आलोचक थे. कविता में भी छायावाद, उत्तर-छायावाद, नई कविता और आठवें दशक की कविता पर लिखना – बोलना उनकी रूचिकर लगता था. इस दौर के बहुतेरे कवियों पर उन्होंने लिखा है और कविता पढ़ने की एक पद्धति विकसित की है. ‘निराला: कृति से साक्षात्कार’ तथा ‘मुक्तिबोध: ज्ञान और संवेदना’ न सिर्फ नवल जी की श्रेष्ठ आलोचना पुस्तके हैं, बल्कि हिन्दी आलोचना के विकास का  श्रेष्ठ उदाहरण भी हैं. मुक्तिबोध की कविताओं की, विशेषत: ‘अँधेरे में’ की उन्होंने जो व्याख्या की है, वह हिन्दी आलोचना में अन्यतम है. मुक्तिबोध के किसी आलोचक के यहाँ वैसी सुंदर और आत्मीय व्याख्या नहीं मिलती है. उनकी मुक्तिबोध वाली क़िताब पढ़कर मैंने एक दिन कहा कि आपने इस क़िताब के जरिए मुक्तिबोध के ‘मनस्विन रूप’ की ख़ोज की है. मेरी बात सुनकर वे देर तक मुझे देखते रहे. फ़िर कहा – शुक्रिया. मैंने बाद में  ‘मुक्तिबोध का मनस्विन रूप’ शीर्षक से ‘ हिंदुस्तान’ अख़बार में समीक्षा लिखी. अख़बार पढ़ने के बाद वे  सुबह- सुबह मेरे घर आए और देर तक बैठे रहे. उस समीक्षा की कोई चर्चा नहीं हुई. यही बात निराला की कविताओं की व्याख्या के संदर्भ में भी कही जा सकती है.


निराला की कविता के महत्त्व की चर्चा करते हुए नवल जी ने एक ज़रूरी पक्ष की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है कि श्रेष्ठ कविता गद्य की शक्ति को आत्मशात करके चलती है. नवल जी की पाठ केन्द्रित आलोचना का एक सुंदर उदाहरण राजकमल चौधरी की लंबी कविता ‘मुक्ति प्रसंग’ की व्याख्या भी है, जिसके जरिए वे मुक्ति प्रसंग को ‘अँधेरे में’ के बाद हिन्दी कविता की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि बताते हैं. नवल जी ने अपनी पाठ केन्द्रित आलोचना के जरिए हिन्दी कविता के पाठक को ऐसे समय में पाठ प्रेमी बनाने का काम किया,जब देश में एक विश्वविद्यालय की कृपा से हिंदी आलोचना में रचना की कम, साहित्य- सिद्धान्त का अधिक बोलबाला हो गया था और विदेशी साहित्य चिंतकों के नाम गोष्ठियों में और लेखों में पटापट गिरने लगे थे. 

नवल जी ऐसे आलोचक थे जिनसे कालिदास से लेकर संजय कुंदन तक की कविता पर बात की सकती थी. उतने बड़े फ़लक बात करने वाले आलोचक- अध्यापक आज कितने हैं ! लेकिन निराला, दिनकर, अज्ञेय, मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय, राजकमल आदि पर वे  बहुत प्रेम से लिखते- बोलते थे. वे साहित्य- सिद्धांत का प्रतिपादन करके आलोचना का नैरेटिव बदलने में विश्वास नहीं करते थे. वे रचना की नयी व्याख्या के जरिए नयी काव्य- रूचि का विकास करने में विश्वास करते थे. वे आलोचना से आलोचना पैदा करने के खिलाफ़ थे. वे ‘तेजाबी आलोचना’ लिखने वालों से कहते थे कि मूल टेक्स्ट शुरू से अंत तक एक बार पढ़ लो, तब लिखो. रचना की व्याख्या आलोचना का व्यावहारिक पक्ष है. इसे दृष्टि से उन्होंने कभी ओझल नहीं किया.    

 नवल जी को पटना शहर बहुत प्रिय था. उस नगर का साहित्यिक इतिहास उनकी जुबान पर था. उन्होंने अध्यापन कार्य के अलावा दूसरी कोई इच्छा नहीं पाली. वे पटना विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से बहुत प्रेम करते थे. वे कहते थे कि इसे गुरुदेव नलिन विलोचन शर्मा ने बनाया है. नलिन जी की अध्यापन कला और वैदुष्य के वे कायल थे. वे बार- बार यह बताते थे कि नलिन जी दुनिया के लिटररी प्रॉब्लम से अपने छात्रों को परिचित करा देते थे.


नवल जी की अंतिम इच्छा थी कि श्मशान  घाट ले जाने के पूर्व उनका शव थोड़ी देर के लिए हिंदी विभाग ले जाया जाए. उनकी यह इच्छा पूरी हुई. आजकल मेरा मन पटना विश्वविद्यालय के परिसर में, वहाँ के हिंदी विभाग में और सामने के अशोक राजपथ पर घूम रहा है, जहाँ नवल जी के साथ हमने सबसे अधिक समय बिताए. मेरी आँखों में रिक्शा पर बैठे हुए नवल जी दिख रहे हैं. रिक्शा का हूड गिरा हुआ है और वे छाता लगाए हुए विश्वविद्यालय की ओर जा रहे हैं. लोगों को आश्चर्य होता कि यह आदमी रिक्शा पर बैठकर छाता क्यों लगाता हैं ! या सूट-टाई में साइकिल चलाते हुए हिंदी विभाग की ओर आते हुए नवल जी दिखाई दे रहे हैं और लोग आश्चर्य से उन्हें देख रहे हैं और सूट-टाई तथा साइकिल का सामंजस्य नहीं बैठा पा रहे हैं!

प्रेम जनमेजय होने का मतलब /

  मैं अगस्त 1978 की एक सुबह पांच बजे दिल्ली के अंतर्राज्यीय बस अड्डे पर उतरा था, किसी परम अज्ञानी की तरह, राजधानी में पहली बार,वह भी एकदम अक...