शनिवार, 31 जनवरी 2015

रॉबिन शॉ पुष्प

 

 

 

 रॉबिन शॉ पुष्प के साथ एक युग का अवसान हो गया!

कल हिंदी के वरिष्ठ लेखक रॉबिन शॉ पुष्प का निधन हो गया. आजीवन मसिजीवी रहे इस लेखक ने बिहार की कई पीढ़ी के रचनाकारों को प्रभावित किया. उनको याद करते हुए आज प्रसिद्ध लेखक हृषिकेश सुलभ ने अच्छा लिखा है. 'दैनिक हिन्दुस्तान' से साभार यह लेख आपके लिए- मॉडरेटर 
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हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक, कथाकार और उपन्यासकार रॉबिन शॉ पुष्प का अवसान साहित्य कीएक ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई संभव नहीं। वह उस पीढ़ी के लेखक थेजिसने साहित्य को मनसावाचा कर्मणा जिया। उन्होंने कहानी, उपन्यास, नाटक, रेडियो नाटक, बाल साहित्य, संस्मण से लेकर साहित्य की लगभग तमाम विधाओं में लिखा। वह पूर्णकालिक लेखक थे। उनकी पहली कहानी 1957 में धर्मयुग में छपी। तब से वह अनवरत लिखते रहे। लेकिन आज उनकी यात्रा सदा के लिए थम गई।
पटना से बाहर हूं। मोतीहारी के पास एक गांव में। कुआं के जगत की मुंड़ेर पर बैठा एक युवा सेमल के कांटेदार तने को एकटक निहार रहा हूं। सामने कई तरह के वृक्षों का सघन विस्तार है। सूर्य अस्ताचल को जा रहे हैं। कल सांझ असंख्य लोगों ने विदा और आज सुबह ही स्वागत किया है जिनका, वे विदा हो रहे हैं। खिन्न, उदास मन जाते सूर्य को निहार रहा हूं। भीतर कुछ टूट रहा है। जलते बांस की तरह चटख रहा है कुछ मेरी आत्मा के अतल में! कि अचानक एक मित्र का फोन आता है। पुष्पजी नहीं रहे।
बहुत दिनों से उनसे मुलाकात नहीं हुई थी। हां, फोन पर कभी-कभार बातें होती रहीं, पर यह सिलसिला भी इन दिनों बन्द ही था। अपने को कोस रहा हूं। स्वार्थी..कृतघ्न! आज का काम कल पर टालकर समय से मुंह चुरा कर जीने की अपनी आदत पर स्यापा कर रहा हूं! अचानक उनकी छवि कौंधती है। अंगुलियों में फंसी सिगरेट ,मुट्ठी बांध कर लम्बा कश और बेफिक्री के आलम में सिगरेट का धुआं। वे सन् 1976 के दिन थे। प्रेमचंद के बड़े सुपुत्र श्रीपत राय की पत्रिका ‘‘कहानी‘‘ में मेरी एक छोटी-सी कहानी छपी थी और उनसे आकाशवाणी पटना में मुलाकात हो गई। यह पता चलते कि उस कहानी का लेखक मैं हूं, उन्होंने मेरे कांधे पर अपना हाथ रखा था। उनकी हथेली का वो स्पर्श आज तक जिन्दा है, एक भरोसे की तरह। वे मुझसे मेरे बारे में पूछते रहे थे। मैं प्रतीक्षा में था कि शायद कहानी के बारे में कुछ कहें, पर ऐसा कुछ नहीं कहा उन्होंने। हमने साथ चाय पी। वे मुझे दुनिया की श्रेष्ठ कहानियों के बारे में बताते रहे। मैंने अब तक क्या-क्या पढ़ा है और अब मुझे क्या-क्या पढ़ना चाहिए पूछते और बताते रहे। मैं उन्हें निहारता रहा़..उनकी लम्बी ज़ुल्फों को अपनी उत्सुक नजरों से टेरता रहा। उनकी सिगरेट पीने की अदा और आत्मीयता भरी बातों पर मुग्ध होता रहा। विदा के समय़..चलते हुए उन्होंने शायद मात्र एक छोटे से वाक्य में मेरी कहानी की प्रशंसा की और घर आने का निमंत्रण दिया। अगले ही दिन मैं सब्जीबाग स्थित उनके घर पर था। मैं एक लेखक के घर में था, जिसकी कई कहानियां पढ़ चुका था़...रेडियों पर जिसके नाटक सुन चुका था, धर्मयुग और सारिका जैसी ख्यात पत्रिकाओं में जिसकी तस्वीरें और कहानियां लगातार देखता-पढ़ता रहता था,....जिसकी आंखों पर चढ़े काले चश्में के भीतर छुपी अनन्त कथाओं की दुनिया मेरे लिए कौतूहल का विषय थी! ...चाय आई। बेहद सुघड़ ढंग से व्यवस्थित कमरे में बैठे थे हमदोनों। कहीं कोई अतिरेक नहीं,...प्रदर्शनप्रियता नहीं। मेरी हर उत्सुकता के प्रति सम्मान-भाव और मेरी हर जिज्ञासा के लिए आत्मीय लहजे में समाधान।
वह जो थोड़ी देर पहले मेरी आत्मा के अतल में जो चटख रहा था, अब भी चटख रहा है।.... यादों की कौंध के साथ। ....अमली के प्रकाशित होते ही एक पोस्टकार्ड, जिसमें आशीष और शुभकामनाएँ और जल्दी मिलने का निमंत्रण था, मिला। ....मैं पहुँचा। मैंने कहा, मैं आपकी तरह आत्मीय कथाएँ लिखना चाहता हूँ। उन्होंने कहा, अपनी तरह लिखो। ज्यादा से ज्यादा पाठकों का भरोसा अर्जित करो।....वे जीवन भर अपनी तरह ही लिखते रहे। उन्होंने बदलते दौर के ट्रेंड की फिक्र किए बग़ैर अपनी भाषा की संवेदना, शिल्प के हुनर और कथ्य की बहुस्तरीयता को बरक़रार रखा। वे अपनी कथाओं को रचते हुए एक छोर पर कथ्य के अंतर्द्वंद्वों के लिए बेहद निर्मम होते थे तो दूसरे छोर पर इतने आत्मीय कि पाठक उनकी बाँह पकड़ चलता था।.... वे पाठकों के सहचर बने रहे। उन्होंने कभी आलोचना की दुरभिसंधियों की चिन्ता नहीं की और न ही उसका मुखापेक्षी बने।
    

....सूरज जा चुका है। क्षितिज की गोद में।.... मैं वसंत की उस दोपहर को याद कर रहा हूँ....सन् 1985 की दोपहर को, जब अपने द्वारा सम्पादित बिहार के युवा हिन्दी कथाकारपुस्तक की प्रति मुझे देते हुए उन्होंने कहा था कि ‘‘लेखक का काम केवल लिखना नहीं, अपने समय की युवा पगघ्वनियों की आहट को सुनना भी होता है!‘‘....मेरी यादें आत्मीयता के इस दुर्भिक्ष-काल में जीते हुए आदमी की यादें हैं। ....मैं जल्दी से जल्दी उन्हें एक बार फिर से पूरा का पूरा पढ़ना चाहता हूँ। नमन!

2 comments:

  1. राविन शा पुष्प ऐसे लेखको में रहे है जिन्हें शुरू से पढता रहा हूं.साथ साथ गीता शा पुष्प को भी.एक जमाने में वह धर्मयुग सारिका हिदुस्तान जैसी पत्रिकाओं में छाये रहे..अब वह पीढी धीरे धीरे हमसे दूर जा रही है.लेकिन हमारी स्मृति में सुरक्षित है।
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शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

साहित्य झरोखा / संस्मरण




Category: संस्मरण

श्यूं-बाघ : देवेंद्र मेवाड़ी

meri yadoon ka pahad
कथाकार देवेंद्र मेवाड़ी की पुस्तक ‘मेरी यादों का पहाड़’ नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया से प्रकाशित हुई है। इसमें पचास-साठ वर्ष  पहले के उनके गाँव, वहाँ के लोग, उनके सुख-दुख का सजीव चि‍त्रण हुआ है। यह पुस्‍तक पहाड़ी संस्‍कृति‍ को जानने-समझने में भी सहायक है। इस पुस्‍तक का एक अंश-
द ऽ, श्यूं-बाघों के तो किस्से ही किस्से ठैरे मेरे गाँव में। मुझे जैंतुवा ने कई बार रात में जंगल से आती ‘छां’ फाड़ने की गज्यांठि की जैसी घुर्र, घुर्र, घुर्र की आवाज सुना कर बताया, “ददा, बाघ बासनारो।” पहाड़ के गाँव में थे तो बकरियाँ और कुत्ते चुराने वाले वे छोटे-मोटे बाघ सचमुच मट्ठा मथने की फिरकी की तरह ही घुर्राते थे। लेकिन, सर्दियों में जब हम श्यूं-बाघों के असली इलाके मतलब अपने सर्दियों के गाँव ककोड़ जाते थे और भुंयारे यानी एक ही तल्ले के कोप के पत्थरों से बने अपने मकान या घास-फूस के मजबूती से बने बड़े से गोठ में रहते थे तो रात को पास ही से निकलती कच्ची सड़क पर, साज के पेड़ के सामने, उध्योंन के बड़े पत्थर के पास रुक कर दहाड़ते श्यूं की दिल दहलाने वाली आवाज सुनते रहते थे….आ..ऊ ऽऽऽ। टांड़ यानी दुछत्ती में  सोए हुए हम तो सहम ही जाते थे, नीचे सो रही हमारी गाय-भैंसें भी सिहर उठती थीं। न हम मुँह से कोई आवाज निकालते थे, न हमारी गाय- भैंसें। वे तो बस परेशान होकर दाँए-बाएँ सिर हिलातीं या डर कर थोड़ी देर खड़ी हो जाती थीं। श्यूं शायद गोठों की ओर से आती जानवरों और आदमियों की मिली-जुली गंध सूँघ कर जता जाता था कि मुझे पता है तुम लोग यहाँ हो। फिर आगे कनौट की संकरी गीली गली से होकर उस पार के जंगलों में चला जाता था। अगली सुबह गीली मिट्टी में बड़े-बड़े खोज देख कर पता लग जाता कि रात में सड़क से कौन गुजरा। श्यूं अकेला था या उसका पूरा परिवार भी साथ था, या केवल मादीन अपने बच्चे लेकर जा रही थी- सब कुछ पता लग जाता।
आगे शाल, शौंर्यां और भेष आदि के पेड़ों का जंगल था। मैंने शाल के वे ऊँचे पेड़ देखे थे, जिन पर शिकारियों के लिए मचान बाँधा जाता था ताकि रात में अगर श्यूं कनौट से निकले तो उनकी बंदूक की ज़द में आ जाए। पता नहीं, उन शिकारियों को कोई श्यूं मिला या नहीं।
उन दिनों, कालाआगर से ककोड़ तक यानी मेरे दोनों गाँवों के बीच आदमी और श्यूं-बाघों के जीने की जंग जारी थी। दोनों अपने अस्तित्व के लिये लड़ रहे थे। कभी पलड़ा एक ओर झुकता तो कभी दूसरी ओर। कभी शेर जीतता, कभी आदमी। आप विश्‍वास करेंगे, एक बार गाँव के ही मेरे एक रिश्तेदार पहाड़ में हमारे घर में आए। खाना बना। उन्हें खाने के लिये बुलाया। चीड़ के छ्योंल (छिलके) के हलके उजाले में मैं देख रहा था, वह रोटी का ग्रास चबाते और गले पर हाथ रख कर निगल लेते। ठुलि भौजी ने पूछा, “क्या हुआ? ऐसे क्यों खा रहे हैं?”
वह बोले, “कुछ नहीं, श्यूं ने दाड़ दिया था। असत्ती दुश्मन ने गला फाड़ दिया!” शेर के नाखूनों से उनके गले में छेद हो गया था! पता लगा, वे जैराम दा थे।
बकण्या गाँव के सोबन सिंह अपनी सैंनी (पत्नी) को श्यूं के पंजों से छुड़ा लाए ठैरे। श्यूं उनकी सैंनी को नीचे की ओर घसीटता और वह ऊपर को खींचते। आखिर श्यूं हार गया। उनकी न जाने कितनी गाय-भैंसें श्यूं ने मार दी ठैरीं। वे दिन थे, जब माल-ककोड़ निपट जंगल हुआ। तब गिने-चुने परिवार ही वहाँ रहते थे।
और, टकार के रमदा? रमदा तो अपनी घिंगारू की लाठी से श्यूं को पीट-पीट कर घायल श्याम सिंह को छुड़ा लाए ठैरे! गाजा से अद्वाड़ को जाने वाली सड़क आगे चल कर दो-फाट हो जाती थी। एक रास्ता अद्वाड़ को जाता था और दूसरा हल्द्वानी को वाया हैड़ाखान। घने जंगल से गुजरते अद्वाड़ के रास्ते में तो श्यूं ने न जाने कितने लोग मारे ठैरे, लेकिन उस दिन वह दो-फाट से थोड़ा आगे झाड़ी में घात लगा कर बैठा होगा। आगे-आगे राम सिंह, बीच में घोड़ा और पीछे श्याम सिंह। हल्द्वानी जा रहे ठैरे। उसने उन तीनों को आते हुए देखा होगा। पास आते ही उन पर छलाँग लगाई और श्याम सिंह को दबोच लिया। श्याम सिंह की चीख से घोड़ा बिदका और राम सिंह ने पीछे पलट कर देखा। देखा कि श्यूं श्याम सिंह को घसीट रहा है। कोई और जैसा होता तो शायद डर कर भाग जाता। लेकिन, वह डर कर नहीं भागे। बस, लाठी उठाई और टूट पड़े श्यूं पर। ले दनादन, ले दनादन। राम सिंह मजबूत काठी के आदमी थे। श्यूं सह नहीं पाया उनकी लाठी की मार। दहाड़ मार कर झाड़ियों में घुस गया। राम सिंह ने बुरी तारह घायल श्याम सिंह को उठा कर घोड़े की गून पर बैठाया और 6-7 मील दूर गाँव की ओर वापस लौट पड़े। गाँव में ही देशी दवा-दारू की। श्याम सिंह के घाव भर गए और कुछ समय बाद वह ठीक हो गए। श्यूं से भिड़ने वाले रमदा और उसके पंजों से बच कर आए श्याम सिंह पूरी उम्र जिए।
माल-ककोड़ के श्यूं-बाघों के तो इतने किस्से हुए कि आप पूरी रात सुनते रह जाएंगे। आदमी और जंगली जानवरों की जिंदगी की लड़ाई ठैरी। जो जीत गया, जी गया। उन दिनों वहाँ घनघोर वन थे और वनों में हर तरह के जंगली जानवर थे सूअरों से लेकर हिरन और श्यूं-बाघ तक। गाँव के लोग जानवर चराने जंगल जाते और श्यूं कई बार वहीं किसी गाय-भैंस का शिकार कर देता। बस, यहीं से दुश्मनी ठन जाती। गाँव में दो-एक भरवां बंदूकें होती थीं। उनसे कई बार रात-बिरात घात लगा कर लोग श्यूं-बाघ पर फायर कर देते। अक्सर वह घायल हो जाता और पालतू जानवरों या आदमी का शिकार करने लगता। बूढ़े बाघ भी पालतू जानवरों को मारते या आदमखोर हो जाते। लोग कहते थे, कुछ लोगों को तो जंगल में तरूड़ खोदते-खोदते खाड़ (गड्ढ़ा) में ही श्यूं ने दबोच लिया था।
लेकिन, रहना तो उन्हीं के बीच था। क्या करते? याद करके दुखी होते रहते। एक ही बात ध्यान में रहती कि इस दुश्मन ने मेरे इतने जानवर मारे या इलाके के इतने लोग मारे। श्यूं-बाघ मारना जुर्म था। जुर्माना और सजा हो सकती थी। इसलिए गाँव के लोगों ने श्यूं-बाघ से छुटकारा पाने का अपना अलग रास्ता निकाल लिया। वे ‘जिबाला’ सिलाने लगे। गजब की चीज थी, जिबाला। हम बच्चों ने उसका छोटा नमूना बनाना सीख लिया था। बड़ों ने ही सिखाया। आलू, पिनालू के खेतों में भी सौल मारने के लिए जिबाला सिलाते थे। वही बड़े आकार में श्यूं मारने के लिए बनाया जाता। जिबाले में तिकोन की तरह तीन मजबूत लट्ठे बांधे जाते। बीच में डंडियाँ और पटरे बाँधते। एक मजबूत लट्ठा त्रिकोण के सिरे में फँसाया जाता। उसके पीछे मजबूत डोरी के साथ एक गिल्ली बाँधी जाती। उस गिल्ली को फँसाने की ‘किदल’ यानी युक्ति में ही जिबाले का असली हुनर छिपा होता था। जिबाले के पूरे तिकोन को आगे से उठा कर, उसे पीछे तक जा रहे मजबूत लट्ठे के नीचे टेक पर टिकाते, तिकोन की पीठ पर भारी-भरकम पत्थर रखे जाते और पीठ पर बँधी गिल्लियों के बीच ऊपरी डंडे की गिल्ली फँसा दी जाती। इस तरह कि नीचे की गिल्ली पर मारे हुए जानवर से बंधी रस्सी अगर जिबाले के भीतर से जरा भी खींच दी जाती तो जिबाला अपने पूरे वजन के साथ धम्म से जमीन पर आ गिरता। जिबाला सिलाने वाले उसके चारों ओर हलका गड्ढा-सा बना देते और श्यूं के मारे हुए जानवर का बचा-खुचा हिस्सा निचली गिल्ली के सहारे लटका देते। रात को श्यूं दबे पाँव अपने मारे हुए शिकार के पास आता। अगर आदमी की कुड़बुद समझ गया तो वापस लौट जाता। लेकिन, अगर भूखा हुआ और शिकार का मोह नहीं  छोड़ पाया तो धीरे से जिबाले के नीचे जाकर शिकार को खींचता और दब कर खुद शिकार हो जाता।
गाँव के लोग कहते थे, एकाध बार तो ऐसा हुआ कि श्यूं आया भी और समझ भी गया। फिर भी चालाकी दिखा कर बगल से पंजा डाल कर शिकार खींचने की कोशिश की होगी। तभी, जिबाला गिरा होगा और तिकोन के मजबूत लट्ठे के नीचे श्यूं के पंजे दब गए। छूटना तो सम्‍भव था ही नहीं, चीखता, चड़फड़ाता वहीं फँस गया। कहते हैं, एकाध बार तो ऐसा भी हुआ कि श्यूं जिबाले के भीतर आया, देखा-भाला और धीरे से हाथ लगाया। गिरते जिबाले से एकदम बाहर छलांग लगाई, लेकिन पूँछ पकड़ में आ गई। जड़ से ही जिबाले के नीचे दब गई। पूरा श्यूं बाहर, पूँछ अंदर। अगले दिन लोगों ने देखा तो सिर पर पैर रख कर भागे। वापस लौटे तो देखा अधमरा श्यूं फिर वहीं। तब मामला समझ में आया।
लोगों का कहना था, बाद-बाद में जिबाला­ की जरूरत खतम हो गई क्योंकि जंगलात विभाग श्यूं-बाघ पकड़ने के लिए लोहे के मजबूत पिंजरे लगाने लगा। दो तरह के पिंजरे होते थे- एक कमरे और दो कमरे वाले। एक कमरे वाले में शिकार या चारा बाँध दिया जाता। श्यूं आता और शिकार के लालच में ज्यों ही भीतर जाता तो उसका गेट गिर कर बंद हो जाता। वह लाख सिर-पैर मारे लेकिन लोहे की उन मोटी-मजबूत छड़ों से बने पिंजरे से बाहर नहीं निकल सकता था।
दूसरी तरह के पिंजरे के बीचों-बीच में लोहे की मोटी छड़ों का पार्टिशन होता था। पिंजरे के पीछे के कमरे में कोई आदमी बैठता जिसे इस काम के लिए पैसे मिलते थे। वह आगे के कमरे में श्यूं आ जाने पर बैठे-बैठे ही उसका आगे का लोहे का फाटक गिरा देता। गिरते ही आगे का कमरा बंद हो जाता। पिंजरा जंगल में या श्यूं-बाघ के सुनसान रास्ते में रखा जाता था। उसके भीतर बैठने के लिए बहुत हिम्मती आदमी चुना जाता था जिसका हो-हल्ला या चीख-पुकार सुन कर श्यूं-बाघ आए और उसके लालच में पिंजरे में फँस जाए। मगर, ऐसे मजबूत कलेजे वाला आदमी कहाँ से आए जो रात के सन्नाटे में श्यूं-बाघ का चारा बनने का स्वांग कर सके?
लोग कहते थे- झाझ्, खुड़ानी के इलाके में डर-भर हुई ठैरी। श्यूं वारदात कर चुका था। उसे पकड़ने के लिए दो कमरों वाला लोहे का पिंजरा आ गया। उसमें बैठने के लिए मजबूत कलेजे वाले आदमी की ढूँढ-खोज शुरू हुई। वहीं आसपास कुछ डोटियाल यानी नेपाली मजदूर भी काम कर रहे थे। एक डोटियाल ने सुना तो बोला, बल, “हुजूर, मैं भैटन्या छ।”
जंगलात वालों ने पूछा, “तुम? तुम बैठोगे? डरोगे तो नहीं?”
“नैं हुजुर, मैं त नैं डरन्या छ। हाँ, श्यूं से भी जरूर पुछ लेना हुजूर!” हँसते हुए जंगबहादुर ने कहा। फिर पूछा, “रुपिया तो टैम पर मिल जाएगा न हुजूर? ”
“बिलकुल मिल जाएगा। तुम्हें लोगों की दुआ भी मिलेगी। श्यूं फँस जाने पर बहुत लोगों और मवेशियों की जान बच जाएगी।”
“मैं राजी छ हुजूर।”
“तो ठीक है जंग बहादुर। आज की रात तुम पिंजरे के इस पीछे के कमरे में बैठोगे। तुम्हें कुछ नहीं होगा। श्यूं तुम्हारे पास तक पहुँच ही नहीं सकता। रात में तुम्हें कुछ न कुछ बोलते रहना पड़ेगा। चाहो तो गीत भी गा सकते हो।”
“हुजुर श्यूं का सामने त ठुला-ठुला लोगों का गीत बंद ह्वै जान्या भयो। लेकिन, फिकर नहीं, जंग बहादुर जरूर गाएगा।”
“अगर आज की रात श्यूं नहीं आया तो दो-तीन रात बैठना पड़ सकता है। समझ लो तुम्हारी आवाज सुन कर उसे आना है।”
“ठीक छ। मैं एता बैठन्या भयो।”
बैठा, जंग बहादुर रोज-रोज की ध्याड़ी के बदले एकमुश्त रकम कमाने के लिए पिंजरे में बैठ गया। रात घिरने के बाद वह पिंजरे में जोर-जोर से बोलने लगा। बीच-बीच में कभी ‘नेवल्या ऽऽ’ की टेक पर नेपाली गीत गाने लगता।
लेकिन, रात बीत गई। श्यूं नहीं आया। अगली दो रातें भी खाली गईं। जंग बहादुर की हिम्मत बढ़ गई। मगर चौथी रात जब वह अपने ही सुर में डूब कर गा रहा था तो अचानक ‘आ…ऊ ऽऽऽ’ की दिल को चीर देने वाली आवाज और लोहे की छड़ों के पार्टीशन पर जबर्दस्त झन्नाटे से झनमना कर उठ खड़ा हुआ। अंधेरे में मुँह के सामने मौत खड़ी थी। मौत ने उसे पकड़ने के लिए पार्टीशन पर झपट कर फिर पंजे मारे। अंधेरे में उसकी आँखें चूल्हे के तपते अंगारों की तरह चमक रही थी। तभी, जंगबहादुर को होश आया कि फाटक गिराना है। उसने फाटक गिरा दिया। श्यूं पिंजरे में बंद हो गया। अब मौत और उसके बीच बस लोहे की छड़ों की रुकावट थी। श्यूं फिर दहाड़ा और जंग बहादुर का मजबूत कलेजा काँप उठा। वह धीरे-धीरे बेहोश हो गया। होश में आता और सामने मुँह फाड़े मौत को देखता।
वह गला फाड़ कर चीखता, “बचाओ! बचाओ! श्यूं खै (खा) दिन्या छ! हुजूर, बचाओ! ” और, चीखते-चीखते फिर बेहोश हो जाता।
सुबह भी होश में आया जब चारों ओर लोगों की आवाजें सुनीं। धीरे से उठा और एकटक हवा में ताकने लगा। फिर उसे अचानक जैसे कुछ याद आ गया और वह जोर-जोर से चीखने लगा, “खै दिन्या छ! खै दिन्या छ! बचावा! बचावा! ” चीखने के बाद फिर एकटक हवा में ताकने लगा। चारों ओर आदमी थे, लेकिन वह किसी की ओर नहीं देख रहा था। मूर्ति की तरह बैठा था। लगता था, जैसे उसे पता ही नहीं था कि वहाँ और आदमी भी हैं। वह बहुत डर गया था और गहरे सदमे में था।
उसे पिंजरे से निकाल लिया गया। श्यूं को भी पकड़ कर कहीं और भेजने की तैयारी की जाने लगी। जंगबहादुर किसी से कुछ नहीं बोला। बस, वह थोड़ी-थोड़ी देर बाद चीख उठता, “खै दिन्या छ! बचावा! बचावा! ” फिर हवा में ताकने लग जाता। कुछ लोग उसे साथ लेकर अस्पताल में दिखाने के लिए चल पड़े। अस्पताल उन जंगलों से बहुत दूर था। लोग कहते थे, जंगबहादुर वहाँ पहुंचने तक बीच-बीच में उसी तरह चिल्लाता रहा, “बचावा! बचावा! खै दिन्या छ! ”
रनजीत सिंह जी के कई जानवर मार डाले थे श्यूं ने। उनकी और श्यूं की लाग लग गई। गाँव के लोग कहते थे, श्यूं उनकी गाय-भैंसों की घंटियों की आवाज तक पहचानता था। वह जंगल में जानवरों को बुलाने के लिए ‘टेल’ (टेर) भी नहीं दे सकते थे क्योंकि श्यूं उनकी भी आवाज पहचानता था और बदला लेने पहुँच जाता था। कहते हैं, एक बार तो वह आमने-सामने मुकाबले में श्यूं की पूँछ काट कर ले आए थे!
और, नैथन गाँव के शेर सिंह जी पूँछ काट कर तो नहीं लाए लेकिन बकरी दबोचने की फिराक में गोठ के दरवाजे पर टकटकी लगाए बाघ को उन्होंने पूँछ से पकड़ कर, बाहर जरूर छटका दिया था! घर में दो दरवाजे थे- इधर और उधर। उनके ठीक नीचे गोठ के दरवाजे थे। गोठ में बकरियाँ थीं। उनकी बास चिता कर, मतलब गंध महसूस करके बाघ चुपचाप आकर ऊपर दरवाजे के सामने किसी बकरी की ताक में बैठ गया। दूसरे दरवाजे से शेर सिंह जी की नजर पड़ी।
वह भीतर ही भीतर दबे पाँव बाघ के पीछे पहुँच गए। जब तक बाघ कुछ समझे, उन्होंने कस कर उसकी पूँछ पकड़ ली और एक ही झटके में चौतरे से बाहर छटका दिया, बल।
एक ओर श्यूं-बाघ का इतना डर-भर और दूसरी ओर इसी डर में मेरे गाँव के लोगों के जीने का जीवट। डर-भर को हलका करने के लिए वे कैसे-कैसे किस्से गढ़ लेते थे! आखिर जीना तो वहीं था- उन्हें श्यूं-बाघों के बीच। तो, हँस-बोल कर ही क्यों न जी लिया जाये? इसलिए ऐसे किस्से भी खूब चल पड़े।
एक किस्सा कुछ यों था…
उस साल डर-भर हुई ठैरी। फिर भी उस आदमी को चोरगलिया से ऊपर गाँव लौटने में हो गई देर। नंदौर नदी का रौखड़ पार कर रहा था तो दूसरी ओर से छिप-छिपा कर आते, पीछा करते श्यूं पर नजर पड़ गई। अब क्या करता? कुछ कदम आगे चल कर फटाफट पेड़ में चढ़ गया। वहां दुफंगिया (दो शाखा) में आराम से बैठ गया। सामने रास्ते की ओर देखा। वहाँ श्यूं का कोई अता-पता नहीं। अचानक नीचे पेड़ की जड़ पर नजर पड़ी। वहाँ बैठ कर श्यूं जीभ से पंजे चाट रहा ठैरा! अरे, अब क्या हो? बहुत देर हो गई। लेकिन, श्यूं वहाँ से हिला नहीं। सोचता होगा, कभी तो उतरेगा! समय काटने के लिए जेब से सुलपाई (चिलम) निकाली, सुरकौन्या थैली में से तमाखू निकाला और सुलपाई में भरा। डाँसी पत्थर के टुकड़े पर ठिनका घिस कर ‘झूला’ जलाया, तमाखू में आग टेकी। दो-चार कस मारे और तमाखू पीने लगा। श्यूं टस से मस नहीं हुआ।…अब क्या हो? आसपास कोई आदमी नहीं। दिन ढल रहा ठैरा। कुछ देर बाद फिर सुलपाई भरी, तमाखू पिया। श्यूं फिर भी वहीं।…तीसरी बार फिर तमाखू भरा, पिया और श्यूं को देखते हुए तने पर खट-खट सुलपाई टटक्याई।…अचानक देखा, श्यूं सिर पर पैर रख कर भाग रहा था। थोड़ी देर बाद मामला समझ में आया। इस बार तमाखू की जलती हुई गट्टी का अँगारा नीचे आराम से लेटे श्यूं के पेट पर पड़ गया होगा। और, आग से जो चिसकाटी लगी होगी, उसके होश ही ठिकाने आ गए होंगे। श्यूं कूच कर गया वहाँ से! और वह आदमी? वह पेड़ से उतरा और पूरा जंगल पार करके, उकाव चढ़ कर तल्ली ककोड़ होता हुआ घर पहुँच गया। इतना ही नहीं, जब पूछा गया कि श्यूं फिर पीछे पड़ जाता तो? तो जानते हैं क्या जवाब दिया बल उसने? “द क्याप बात। कहाँ से आ जाता? जाने कहाँ कूच कर गया ठैरा। फिर गट्टी की चिसकाटी थोड़े ही भूल जाता? जनम भर नहीं भूलेगा वह। बंदूक की गोली क्या ठैरी चिसकाटी के सामने।…और, फिर रात भर मैं  भी क्या करता पेड़ पर! ”
लोग यह किस्सा भी सुन कर खूब हँसते थे…एक आदमी ने बहुत बकरियाँ पाली हुई थीं। शाम हुई और बकरियों का झुंड में-में करता हुआ लौट आया। आदमी ने उन्हें गोठ में गोठिया (बंद) कर टूटा हुआ दरवाजा फेर दिया। बकरियाँ गोठ की गरमाहट में बैठ कर आराम करने लगीं।…एक बाघ बकरियों की बास चिता (महसूस) कर दबे पाँव गोठ के दरवाजे पर आया और टूटे दरवाजे से धीरे से भीतर घुस गया। बकरियों की बकरैंन बास से भरे गोठ में बाघ की बास का पता नहीं लगा। बाघ अपने खाने के लिए अंधेरे में आँख घुमा कर मोटा-तगड़ा बकरा खोज रहा होगा कि अंधेरी रात में किसी पहर दो बकरी चोर भी दबे पाँव गोठ में घुस आए। उन्होंने भी अंधेरे में मोटा-तगड़ा हेलवान (बकरा) टटोलना शुरू कर दिया। अंधेरे में  ही सहलाते हुए एक चिकना-चुपड़ा हेलवान हाथ लगा तो उसके गले में रस्सी बाँध कर दरवाजे से चुपचाप बाहर निकल गए। घुप्प अंधेरे में गिरते-पड़ते चलते गए। एक रस्सी खींचता और दूसरा छड़ी मार कर पीछे से हाँकता, ‘मुना (बकरा) चल! चल! चलते-चलते रात ब्या (खुल) गई। हलका उजाला हुआ तो ‘बकरे’ पर नजर पड़ते ही दोनों बकरी चोर चीख मार कर भाग खड़े हुए! जिसे वे हेलवान समझ कर पकड़ लाए थे, वह मोटा-तगड़ा बकरिया-बाघ निकला!
ये तो हुआ खैर मन हलका करने के लिए हलका-फुलका किस्सा लेकिन कैसी कलकली लगती होगी दिल में, जब बाघ किसी की भरपूर दूध देने वाली गाय- भैंस को मार डालता होगा? लोग उस पार के पहाड़ों पर बसे कड़ैजर गाँव के टिकराम रुवाली ज्यू का किस्सा सुनाते थे। कड़ैजर गाँव देवगुरु पहाड़ के घने जंगलों की गोद में हुआ।…अब महाराज एक दिन ऐसा हुआ बल कि टिकराम रुवाली ज्यू के गोरु-बाछ जंगल में चरने गए हुए थे। वहाँ उन पर श्यूं की नजर पड़ गई ठैरी। उस दुश्मन ने मारने के लिए सबसे अच्छी दुधारु गाय छाँट ली। बस, उस पर झपटा और उसे चित्त मार दिया।
टिकराम पंडिज्जी ने सुना तो बौखला उठे। पकड़ा एक बाँज का मोटा-मजबूत और भारी कांगा (तीखा डंडा) और पहुँच गए सीधे जंगल। गाय मरी ठैरी। श्यूं का पता नहीं। उनका गुस्सा भड़क गया। पत्थर पर खड़े होकर जोर से धाद दी- “हं रै, कहाँ है तू? चोरी से मेरी गाय मार दी। आ, हिम्मत है तो सामने आ…”
श्यूं सिर झुका कर सामने आ गया बल। उसे देखते ही वे चिल्लाए, “अब क्या मूंड़ झुका कर आ रहा है? मुँह ऊपर उठा।”
श्यूं का सामने देखना और उनका दोनों हाथों को उठा कर पूरी ताकत से बाँज का काँगा मारना। खोपड़ी फट कर दो हो गई बल! श्यूं  वहीं ढेर हो गया।
रात-बिरात दीदी से एक और गाँव की उस सैंनी (औरत) का किस्सा सुन कर तो रौंगटे ही खड़े हो जाते थे।…
गाँव की चार-छह सैंनियां (औरतें) घास काटने जंगल में  गई हुई थीं, बल। सब आसपास ही घास काटने लगीं। श्यूं दुश्मन छिप कर उनके पीछे लग गया। मौका पा कर एक सैंनी पर झपट पड़ा और उसे घसीट कर ले गया। बाकी सैंनियां चीखती-चिल्लातीं भाग कर वापस गाँव पहुंच गईं। वहां रो-धो कर लोगों को बताया। कुछ लोग इकट्ठा होकर, लाठी-कुल्हाड़ियों से लैस होकर उस सैंनी को खोजने जंगल पहुँचे। शाम ढल चुकी थी। चारों ओर अंधेरा घिरने लगा। लोगों ने म्याल जला कर सैंनियों की बताई हुई जगह के आसपास उस सैंनी के कपड़े और शरीर के बचे-खुचे टुकड़े ढूँढना शुरू किए। सभी जानते थे कि अब तक तो उस बेचारी को श्यूं चबा-चुबू कर चट कर चुका होगा। लेकिन, न खून के निशान दिखे, न फटे कपड़े और न शरीर के टुकड़े। यहीं से तो घसीट कर ले गया था श्यूं? तो, फिर उस सैंनी का हुआ क्या?
तभी जंगल के सन्नाटे में कुछ दूर से दर्द भरी आवाज आई, “अरे, कोई छा, बचावा मैंकें, मैं ज्यूनी छों!” (कोई है, बचाओ मुझे, मैं जीवित हूँ) आवाज सुन कर सभी धक्क से रह गए। यह कौन है? किसकी आवाज है सुनसान जंगल के इस अंधेरे में?
लोग सोच ही रहे थे कि फिर आवाज आई, “अरे, मैं छौं, पारभति (पार्वती), ज्योंनी छौं मैं। आओ, ले जाओ मुझे…” कोई कातर आवाज में  पुकार रहा था।
दो-एक आदमियों से रहा नहीं गया। बोले, “उसकी आत्मा आवाज दे रही है शायद। उसे तो श्यूं कब के जो खा चुका होगा…”
किसी ने उनकी हाँ मैं हाँ मिलाई। कहा, “भूत-परेत की आवाज लगती है। बेचारी की अकाल मौत हुई है, तभी तो…”
डर कर वे लोग गाँव लौट गए। वहाँ बाकी लोगों से कहा। कुछ लोगों का मन नहीं  माना। उन्होंने साथ की सैंनियों से फिर पूछा। सैंनियों  ने कहा कि खुद उन्होंने देखा। उनकी आँखों के सामने उसे श्यूं ने पंजों से दबोचा और घसीट कर ले गया।
“तब कहाँ बचती,” उन लोगों ने कहा, “सुबह ज्यादा लोग चलेंगे। हल्ला-गुल्ला मचा कर खोजेंगे। कुछ तो मिलेगा? कपड़े जो क्या खा जायेगा श्यूं? वे तो मिलेंगे ही।”
गए, सुबह वे लोग हथियार लेकर, ढोल-कनिस्तर बजाते हुए वहाँ गए। चारों ओर फिर ढूंढा़। और, तभी फिर वही कातर आवाज आई, “अरे यहाँ हूँ मैं। मुझे ले जाओ…बचाओ…बचाओ मुझे! ”
“हैं, दिन में भी? दिन में तो आत्मा की आवाज नहीं आनी चाहिए। चलो, वहाँ जाकर देखते तो हैं,” किसी आदमी ने कहा।
“हाँ-हाँ चलो,” कह कर सब लोग उस तरफ गए कि आखिर आवाज आ कहाँ से रही है?
और, वहाँ जाकर दूर से देखते क्या हैं कि पारभती तो ज़िंदा है! एक ऊँचे पेड़ के दो-फाँगे में तने को कस कर बैठी हुई थी।
पास जाने पर वह जोर से चिल्लाई, “पेड़ की जड़ में श्यूं बैठा हुआ है। जरा देख कर आना…”
लोगों ने देखा पेड़ की जड़ पर सचमुच श्यूं बैठा हुआ था। वह कभी उनकी ओर देख रहा था और कभी ऊपर पेड़ में बैठी पारभती की ओर। अब क्या किया जाए? लोगों ने ढोल और कनिस्तर जोर-जोर से पीटना शुरू किया और ‘हुई-हुई’ की आवाजें लगा कर श्यूं को भगाने की कोशिश की। लेकिन, रात भर पेड़ पर से शिकार के उतरने का इंतजार करने वाला वह भूखा श्यूं वहां से नहीं हिला। तब लोगों ने आग जलाई। जलती हुई लकड़ियां उसकी ओर फेंकीं। आखिर हो-हल्ला सुन कर और आग से डर कर श्यूं वहाँ से हट कर दूर जाकर बैठ गया। तब एक-दो आदमी हिम्मत करके पेड़ के पास पहुँचे। श्यूं ने गुस्से में पेड़ को नाखूनों से बुरी तरह नोचा हुआ था। कई जगह शायद दाँतों से भी पपोड़ दिया था।
एक आदमी रस्सी लेकर पेड़ में चढ़ा और दो-फाँगे पर पहुँच कर रात भर डर से काँपती, भूखी-प्यासी पारभती के पास पहुँचा। उसने धोती से अपने-आप को पेड़ के तने पर कस कर बाँधा हुआ था ताकि डर से बेहोश होकर नीचे न गिर पड़े। वह आदमी पारभती को पीठ पर बाँध कर नीचे उतार लाया और लोग हो-हल्ला मचा कर उसे गाँव में वापस ले आए।
लेकिन, हुआ क्या? श्यूं तो उसे घसीट कर ले गया था? तो, खाया क्यों  नहीं? उसका खून तक नहीं पिया?
जो हुआ, वह पारभती ने गाँव वालों को बताया।
उसने बताया, “श्यूं मुझे घसीट कर उस पेड़ के पास तक ले गया होगा। वहाँ पर थोड़ा मैदान जैसा है। मैं बेहोश थी। होश आया तो देखा, मुझे उस पेड़ के तने पर टिका कर, वह अपने पंजों से कुतक्याली (गुदगुदी) जैसी करके वापस पीछे को दौड़ रहा था। दूर जाकर वह पलटा और जमीन पर पंजे फैलाए। उन पर मुँह रख कर इधर-उधर सिर हिलाते हुए मेरी ओर देखा। पूँछ हिला कर फिर तेजी से दौड़ता हुआ मेरे पास आया और मुझे पंजों से पकड़ कर हिलाने लगा। उसे देख कर मैं फिर बेहोश हो गई। होश आया तो देखा वह फिर वापस दौड़ रहा था। मेरे साथ वह बिल्ली और चूहे का जैसा खेल, खेल रहा था।…थोड़ी देर खेल खेलता, फिर बैठ कर मेरा हाड़-माँस चबाता।
“जब तीसरी बार होश में आई और उस दुश्मन को दूसरी ओर दौड़ते हुए देखा तो मुझमें हिम्मत आ गई। मन ने कहा, पारभती तू बच सकती है। सारा आँग (शरीर) डर के मारे थर-थर, थर-थर कर रहा था। लेकिन, मैंने हिम्मत जुटाई और पेड़ में चढ़ गई। लगता था उस दुश्मन ने अब नीचे घसीटा, अब नीचे घसीटा। ऊपर दो फाँगे पर पहुँच कर मैंने कमर से धोती खोली और उससे अपने आप को तने के साथ बाँध लिया कि डर से बेहोश होकर गिर न पड़ूँ।
“उधर वह असत्ती दूसरे किनारे पर पहुँचा। पंजों पर सिर रख कर खेल-खेलने लगा तो देखा-पेड़ के नीचे तो कुछ है ही नहीं। बस, वह बौखला कर दहाड़ता हुआ वापस पेड़ की जड़ की तरफ दौड़ा। इधर-उधर सूँघा कि कहाँ भाग गई। कुछ पता नहीं लगा। गुस्से में ‘आऊ ऽऽ आऊ ऽऽ’ करके बुरी तरह दहाड़ता रहा। फिर पेड़ को सूँघ कर ऊपर की तरफ देखा तो मुझ पर नजर पड़ गई। अरे, कैसा जो बौली (बौरा) गया ठेरा! आसमान की ओर उछाल मारने लगा। गुस्से से पागल होकर दाँतों से पेड़ की छाल पपोड़ दी, नाखूनों से उसे चीरने लगा। ऐसी ‘आऊ ऽऽ’ करता था कि मेरा कलेजा बैठ जाता था।
“कुछ देर बाद मैंने आदमियों का बोलना जैसा सुना। म्याल की आग दिखाई दी। तब मैंने जोर से आवाज लगाई, ‘अरे कोई छा? बचावा मैं कैं!’ लेकिन, शायद किसी ने नहीं सुना। आदमियों की आवाज सुन कर नीचे बैठा वह दुश्मन उस समय चुप हो गया। सुबह फिर आप लोग आ ही गए।”
दीदी कहती थी, कई महीनों तक वह श्यूं रात को उस सैंनी के मकान तक आता रहा, बल। उसके मुँह का शिकार जो छूटा ठैरा।
मगर एक असली और मजेदार किस्सा तो ठुल ददा भी सुनाते थे। जाड़ों में गोरु- भैंसों के साथ ककोड़ गए थे। तब तक वहाँ पहाड़ से कम ही लोग पहुँचे थे। वनों में खूब चारा उगा हुआ था। ददा जानवर चराने कभी टीले की तरफ जाते, कभी उससे आगे म्यलगैर के वन में, कभी गैन के घने जंगल की ओर और कभी औंसानि धार। उस दिन म्यलगैर गए हुए थे। डर-भर के दिन थे। श्यूं रौंती रहा था। बुरी तरह बौराया हुआ था। हर समय डर लगा रहता था, न जाने कब कहाँ किस पर टूट पड़े। मगर जब म्यलगैर पहुँचे तो देखा पानी के स्रोत के पास देबुवा सोया ठेरा! श्यूं-बाघ से बिलकुल बेखबर। ददा ने सोचा, पगली गया है क्या? परसुद्द (बेफिक्र) होकर सो रहा है।
उन्होंने पास जाकर मजाक में उसके सीने पर दोनों हाथों की अंगुलियां गड़ाते हुए श्यूं की आवाज निकाली- आ ऽऽ ऊ ऽऽ! देबुवा हड़बड़ा कर उठा और गला फाड़ कर चीखने लगा, ‘बचावा! बचावा! खै हालि छों! श्यूं लि खै हालि छों…’ मतलब, ‘बचाओ, बचाओ, शेर ने खा लिया। ददा हैरान-परेशान। वे दोनों हाथ हिलाते हुए चिल्लाए, “देबुवा! देबुवा! मैं हूँ। उठ।” लेकिन, उन्हें अविश्वास से देखते-देखते देबुवा डर के मारे बेहोश हो गया। ददा भी परेशान। उसे वहीं अकेला छोड़ कर जा नहीं सकते थे। समझ में नहीं आ रहा था, क्या करें?
मैंने पूछा, “तो फिर क्या किया? ”
बोले, “सामने ही कुछ दूर, एक पेड़ गिरा हुआ था। मैं जाकर उसके मोटे तने पर बैठ गया। सोचा, देबुवा होश में आएगा तो खुद ही देख लेगा। मैं तने पर उकडूं बैठ कर देबुवा के होश में आने का इंतजार करने लगा। थोड़ी देर बाद वह होश में आया। उसने चौंक कर अविश्वास से इधर-उधर देखा। तभी मुझ पर नजर पड़ गई। मैंने हँस कर कहा- क्यों उठ गया? लेकिन, मुझे हिलते हुए देख कर मेरी ओर इशारा करके देबुवा फिर जोर से चीखने लगा-‘य छ! य छ! ये मुझे खा देता है! अरे, बचाओ, बचाओ…हुई ऽऽ हुई ऽऽ।’ इसके साथ ही वह फिर बेहोश हो गया।“
“मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा था, उसका क्या करूँ? लगता था, वह रात भर सोया नहीं था। निनभंग (अनिद्रा) का मांच लगा था। लेकिन, अब क्या हो? उसकी कहाँ गोरु-भैंसें, कहाँ क्या? फिर ख्याल आया, उसके मुँह पर पानी के छींटे मारूँ तो शायद होश आ जाए। वही किया। अंजुलि में थोड़ा-सा पानी लिया और उसके मुँह पर छींटे मारे। डर मैं भी रहा था कि बचने के लिए कहीं मुझ पर न टूट पड़े। लेकिन, पानी के छींटे पड़ते ही वह जागा। धीरे से आँखें खोलीं। मुझे घूर कर देखा। फिर बदहवास होकर चारों ओर देखा और रोता हुआ मुझसे चिपट गया। बोला, ‘काकज्यू आज तुम नहीं होते तो श्यूं ने मुझे खा ही लिया होता। तुमने बचा लिया! ”
श्यूं-बाघ सामने ही टपक पड़े तो उसे भगाने का एकमात्र तरीका था- पूरी ताकत से चीखना ‘हुई ऽऽ हुई ऽऽ।’ ददा बताते थे, एक बार वे गैन के घने वन में गए हुए थे। पेड़ों की टहनियां काट कर गाय-भैंसों को चरा रहे थे। वह आगे बढ़ते और गाय-भैंसें भी उनके साथ-साथ आगे बढ़तीं। एक पेड़ का तना पकड़ कर खड़े हुए। पास में झाड़ी थी और जमीन पर थोड़ा गहरी गल्ली बनी हुई थी। अचानक गल्ली में से श्यूं ने दो पंजे ऊपर रख दिए और पूरा मुँह फाड़ कर दहाड़ा। ददा कहते थे, “लाल खाप (मुख) दिखती थी उसकी और भाप सीधे मुँह पर आ रही थी। निंगुरी (बुरी) बास आ रही थी। हाथ में तेज दात था टहनियाँ काटने के लिए। उसे उठा कर मैं पूरी ताकत से चिल्लाया-????? लेकिन, गले से आवाज ही नहीं  निकली। मुँह चल रहा था लेकिन हुई ऽऽ हुई ऽऽ नहीं  हुई। श्यूं आगे बढ़ा, जानवर बिदके और उसने अलग-थलग पड़ी भैंस की थोरी (बच्चा) को थप्पड़ मार कर फेंक दिया। उसकी गर्दन तोड़ दी। तभी भैंसों ने घेरा बना लिया। वे सींगों से श्यूं पर टूट पड़ीं। श्यूं तो खिसक लिया मगर वे श्यूं की गंध के कारण मरी हुई थोरी पर सिर मारने लगीं। उन्हें मुश्किल से हटाया। मेरे मुँह से तो बहुत देर बाद आवाज निकली। और, निकली तो वह बिल्कुल बदली हुई थी। गले की नसें बुरी तरह खिंच गई थीं। मैं डरी-बिदकी गाय-भैंसों को किसी तरह हाँक कर घर वापस लाया।”
लेकिन, श्यूं-बाघ भी वहीं, वह भी वहीं । रहना तो सभी को वहीं था। इसलिए उनसे भेंट होती ही रहती थी। बताते थे कि एक बार म्यलगेर के वन से लौट रहे थे। सबसे आगे चौड़े सींगों वाली बड़ी कद-काठी की ‘फूल’ भैंस। उसके पीछे दूसरी भैंसें और थोरियाँ। उनके साथ ठुल ददा। अचानक फूल बेचैन हो उठी। नथुनों से ‘फ्वां-फ्वां’ करके कभी इधर देखती, कभी उधर। फिर मुड़ी और पीछे आ गई। ददा उसे आगे जाने के लिए हकाते, लेकिन वह अड़ गई। ददा को सिर से धकेल कर बीच में भेज दिया और खुद सबसे पीछे लग गई। हर कदम पर पीछे मुड़ कर देखती। फुँकारती। ददा समझ गए कि गड़बड़ है। जानवर डुडाने (रंभाने) लगे। थोड़ा आगे ऊँची जमीन में पहुँचे तो देखा, पीछे-पीछे दूर एक श्यूं भी आराम से चला आ रहा है। फूल फ्वां-फ्वां करती हवा में सींग मारती, पीछे मुड़-मुड़ कर खड़ी हो जाती, फिर आगे बढ़ती। इसी तरह वे धार के खेत में खरक (छप्पर) तक पहुँचे।
मैंने पूछा, “ और श्यूं?”
बोले, “वह भी पहुँच गया। जितनी दूर चल रहा था, उतनी ही दूरी बना कर खेत के किनारे जरा ओट में को बैठ गया। गाय-भैंसों की हालत खराब। किसी तरह उन्हें शांत किया। घास-पात डाला। लेकिन, बीच-बीच में वे फिर बेचैन होने लगतीं। डुडाने लगतीं। मैंने आग जलाई। धुवां-हुवां निकला। मगर, न जाने कैसा श्यूं था, वहाँ पर बैठा ही रहा, जैसे पालतू हो। आग जला कर रात भर जागना पड़ा। सुबह का उजाला होते-होते मैंने भैंसों का दूध दुहा। भद्याली (बड़ी कढ़ाई) में गरम करने के लिए आग पर चढ़ाया और उसके उबलने का इंतजार करने लगा।
“बैठे-बैठे आँख लग गई होगी। रात भर की निनभंग हुई। आँख खुली तो देखा, सूरज आसमान पर चढ़ आया था। आग बुझ चुकी थी। भद्याली में दूध उबल-उबल कर सूख गया था। तले में बस घी जैसा रह गया था।”
“और, श्यूं? गाय-भैंसें?”
“उजाला होने पर श्यूं उठ कर चला गया होगा और गाय-भैंसें खूंटों पर ही बंधी ठैरीं। अड़ाती होंगी लेकिन सुने कौन? मैं तो नींद के भरमस्के में पड़ा ठैरा। फिर सोचा होगा, ये तो उठता नहीं, क्या फायदा अड़ाने का।…बड़े समझदार होते हैं जानवर। अब देखो, मुझे धकेल-धकेल कर अपने बच्चों के साथ झुंड के बीच में पहुँचा दिया और वैसे ही चलते-चलते घर तक ले आईं! कौन कहता है, जानवर कुछ नहीं समझते? अपने ग्वाले के लिए इतना प्रेम? ”
लेकिन, जंगल के जीवन में हर जानवर इतना भाग्यशाली नहीं होता।…उस दिन  मैं पिताजी के साथ शाम को अपने मकान के आगे खड़ा था। दिन ढलने को था। सूरज साज और भीमुल के पेड़ों की फुनगियों के पीछे छिप चुका था। पिताजी की आँखें हर रोज की तरह पार शिमल धार पर टिकी हुई थीं, जहाँ अब भी ढलती पीली धूप दिखाई दे रही थी। आज गाय-भैंसें लेकर ददा उधर ही गए थे। अब उनके लौटने का समय हो गया था। पिताजी धार के पार से वापस आती गाय-भैंसों को एक-एक करके गिन लेते थे।…एक…दो…तीन…उस दिन भी धार पर पहली भैंस दिखाई दी, फिर दूसरी, फिर तीसरी गाय भी, बैल भी। लेकिन, अचानक चौंके- गिनती में एक कम क्यों है? फिर गिना, फिर भी एक कम। परेशान होकर बोले, ‘कौन कम है?’ आगे से पीछे तक नजर दौड़ाई। ध्यान से देखने पर घर को लौटती गाय-भैंसों की उस कतार में सफेद ‘सेतुवा’ को न देख कर बोले, ‘सेतुवा नहीं रहा शायद। वह तो दूर से ही साफ-सुकीला चमकता था।’ फिर वहीं से ददा को लंबी धाद लगाई, “बच्या! सेत्व काँछ? ”
किसी ने कहा, “आने तो दीजिए, खुद ही बताएंगे।” सेतुवा और गुजार हमारे दो बैल थे। सेतुवा झक सफेद रंग का था।
ददा ने आकर बताया, “सभी गाय-भैंसें चर रही थीं। मैं जिस पेड़ से पत्तियां-टहनियाँ काट-काट कर गिरा रहा था, उसके पास ही सेतुवा चर रहा था। वह जरा-सा किनारे को बढ़ा झाड़ी की तरफ। वहाँ पर हलकी ढलान जैसी थी। सेतुवा ने झाड़ी के पास उगी हरी घास के तिनाड़ लपकने के लिए शायद जीभ निकाली कि तभी वह पीड़ा से तिरछा हो गया। पलटी खाने लगा। घों-घों की जैसी आवाज आई, तब मुझे पता चला। मैंने सोचा किसी चीज ने काट खाया है। नीचे उतरा। देखा तो मुँह से खून की धार फूट रही थी। सेतुवा डर कर झाड़ी की ओर देख रहा था। मैंने उधर देखा तो श्यूं दुश्मन की आँखें चमकीं। मामला समझ गया। सेतुवा ने जीभ लपकाई होगी और श्यूं ने पंजा मार कर जीभ खींच ली। बेचारा सेतुवा चीख भी नहीं  पाया। बिना जीभ के घों-घों कर पाया, बस। बाकी जानवरों को तो तब तक पता भी नहीं  चला था। मैं झटपट पेड़ में चढ़ा और धाद लगा कर बाकी लोगों को सावधान किया कि यहाँ श्यूं आया है। मेरा बैल दाड़ दिया है। मैं पेड़ में  क्या चढ़ा कि वह दुश्मन झाड़ी से निकला और उसने थप्पड़ मार कर सेतुवा की गर्दन तोड़ दी। तब तक बाकी जानवरों को भी पता लग गया। सभी डुडाने लगे। उस अफरातफरी में असत्ती श्यूं एक ओर को कूद गया।
“सेतुवा में अभी प्राण थे। वह कातर आँखों से मुझे देख रहा था। आँसू बहा रहा था। लेकिन, मैं कुछ नहीं कर सकता था। उसके मुँह को थपथपाया और कहा- तेरा-मेरा इतना ही साथ रहा होगा सेतुवा। जा, बेटा जा।”
ददा का गला भर आया। आगे नहीं बोल पाए। पिताजी ने गुस्से से भड़क कर कहा, “असत्ती, दुश्मन!”
मैं वन में श्यूं के पास छूट गए अपने सेतुवा के बारे में डर कर तरह-तरह की कल्पनाएं करने लगा।….उन घने जंगलों में हमारी रक्षा भला कौन करता? “किले, हमार द्यौ-द्याप्त,” मतलब हमारे देवी-देवता, लोग कहते थे।
कौन थे हमारे देवी-देवता? बताऊँ?
“ओं”
पुस्‍तक : मेरी यादों का पहाड़
लेखक: देवेंद्र मेवाड़ी
मूल्‍य : 140 रुपये, पृष्‍ठ: 288
प्रकाशक: नेशनल बुक ट्रस्‍ट, इंडि‍या, 5, नेहरू भवन, इंस्‍टीट्यूशनल एरि‍या, वसंत कुंज, नई दि‍ल्‍ली- 110070

मि‍ष्‍ठान्‍न महाराज : हेमंत शर्मा

बनारस में ‘मिष्ठान्न महाराज’ के नाम से मशहूर राज कि‍शोर गुप्‍त उर्फ बचानू साव पर पत्रकार हेमंत शर्मा का संस्‍मरण-
दीपावली पर खूब मिठाइयाँ खाना। बाँटना और बटोरना। ऐसा बचपन से देखता आया था। लेकिन इस दफा अपनी दीपावली बिना मिठाई के बीती, क्योंकि अखबार में यह खबर पढ़ ली थी कि इस साल दीपावली पर छह हजार करोड़ का मिठाइयों का कारोबार हुआ और इसमें सत्तर फीसदी मिठाइयाँ मिलावटी थीं। लेकिन मिठाई न खाने की बड़ी वजह थी अपने मित्र बचानू साव का दुनिया से चले जाना। बचानू काशी के ‘मिष्ठान्न पुरुष’ थे। बनारसियों के ‘मिष्ठान्न महाराज।’ बचानू इसलिए बिरले थे कि मेरे जैसे सैकड़ों लोगों में मिठाई खाने-खिलाने की समझ और संस्कार उन्हीं ने बनाए।
राज किशोर गुप्त उर्फ बचानू साव बनारस की रईस परम्‍परा के हलवाई थे। बनारस की मिठाई का डेढ़ सौ साल का इतिहास बचानू की परम्‍परा में था। मिठाई में शोध, प्रयोग और पौष्टिकता बढ़ाने के उपायों में इनका कोई सानी नहीं था। उनकी कोशिश होती थी कि मिठाइयों को कैसे सेहतमंद बनाया जाए। वे बनारस की विभूति थे। महात्मा गाँधी हों या पंडित नेहरू, मार्शल टीटो हों या इंदिरा गांधी या फिर सीरीमावो भंडारनायके या दलाई लामा, बचानू सबको खुद पका कर भोजन करा चुके थे। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब तिरंगा फहराना जुर्म था, तब बनारस में बचानू साव ने तिरंगी बर्फी का ईजाद किया। लेकिन मिठाइयों मे रंग डाल कर नहीं। काजू से सफेद, केसर से केसरिया और पिस्ते की हरी परत से तिरंगी बर्फी बनाई जो बाद में राष्ट्रीय आंदोलन की मिठाई बन गई। एक हलवाई का स्वतंत्रता संग्राम में इससे बेहतर योगदान क्या हो सकता है!
वे मिठाइयों के अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र का भी खयाल रखते थे। अगर काजू का मगदल गरीब आदमी की पहुँच से बाहर है तो वे काजू हटा बाजरे का मगदल बना, उसकी तासीर और स्वाद वैसा ही रख उसे सामान्य आदमी की पहुँच के भीतर कर देते थे। मगदल उड़द दाल, काजू, जायफल, जावित्री, घी और केसर से बनती है। यह स्मृति और पौरुष बढ़ाने वाली मिठाई मानी जाती है। आयुर्वेद और यूनानी ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। आपको कब्ज है तो काजू की मिठाई से रोग और बढ़ सकता है। पर अगर उसके साथ अंजीर मिला कर बर्फी बने तो यह दवा बनी जो फायदेमंद होगी। ये बचानू के फॉर्मूले थे।
कब कौन-सी और कैसी मिठाइयाँ खानी चाहिए, इसका ज्ञान मुझे उन्हीं से हुआ था। ठंड में वात नाशक, वसंत में कफ नाशक और गर्मियों में पित्त नाशक मिठाइयाँ होनी चाहिए। वात, पित्त और कफ। पूरा आयुर्वेद का चिकित्सा विज्ञान इसी में संतुलन बिठाता है। बादाम सोचने-समझने की ताकत बढ़ाता है, पर उसका पेस्ट कब्ज बनाता है। बादाम के दो भागों के बीच अनन्नास का पल्प डाल उन्होंने एक मिठाई बनाई ‘रस माधुरी।’ इसमें फाइबर भी था और एंटी-ऑक्सीडेंट भी। नागरमोथ, सोंठ, भूने चने के बेसन और ताजी हल्दी से वे एक लड्डू बनाते थे ‘प्रेम वल्लभ’, जो कफ नाशक था। स्वाद में बेजोड़। मिष्ठान्न निर्माण में सिर्फ ऋतुओं का ही ध्यान नहीं, वे और विस्तार में जाते थे। सूर्य के उत्तरायण और दक्षिणायन होने से भी उनकी मिठाइयों की तासीर और तत्त्व बदल जाते।
बचानू मिठाई के साथ ही दुनिया छोड़ना चाहते थे। दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में जब उनका दिल का ऑपरेशन हुआ तो एक रोज वे डॉक्टर से उलझ पड़े। उनके कमरे में मिठाइयों के ढेर सारे डिब्बे रखे थे। आने वाले को खिलाने के लिए। डॉक्टर ने समझा हृदय की धमनियाँ बंद हैं और इतनी मिठाई! कहीं वे खा तो नहीं रहे हैं! इसे कमरे से हटाएं। वे हटाने को तैयार नहीं। पंचायत करने मैं गया। उन्होंने कहा- ‘जान भले चली जाए, पर मैं मिठाई को अपने से दूर नहीं करूँगा।’ मैंने डॉक्टर से कहा- ‘वे खाते नहीं हैं, सिर्फ देखते हैं। मिठाइयों से उनका गहरा नाता है। इसके बिना उनकी जिजीविषा कम हो सकती है। उसे रहने दें।’ बचानू साव का ऑपरेशन हुआ। वे ठीक होकर बनारस लौट गए।
बचानू ‘सेमी लिटरेट’ थे। पर धर्म, दर्शन, साहित्य और संगीत पर वे हर बनारसी की तरह बहस कर सकते थे। काशी विश्‍वनाथ मंदिर से जो ‘सुप्रभातम’ पिछले चालीस वर्षों से प्रसारित हो रहा है, वह उन्हीं की देन है। पूरे देश के संगीतकारों-गायकों से मिठाई खिला ‘सुप्रभातम’ गवा लिया। जब वे एमएस सुबुलक्ष्मी के पास पत्रमपुष्पम का चेक लेकर पहुँचे तो सुबुलक्ष्मी ने चेक लौटा दिया और कहा इसे आप अपने ट्रस्ट में लगाएं। दिन के हिसाब से यह प्रसारण हर रोज बदलता है। आज भी ‘सुबहे बनारस’ की शुरुआत इसी ‘सुप्रभातम’ से होती है।
गलियों और गालियों के बाहर बनारस के वे सांस्कृतिक लिहाज से रत्न थे। हर साल ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को देश की सभी नदियों से जल लाकर वे काशी विश्‍वनाथ का अभिषेक करवाते थे। अभिषेक में प्रमुख जल बारी-बारी से जिस ज्योतिर्लिंग से आता था, उसी के पुजारी काशी विश्‍वनाथ का अभिषेक करते थे। देश की सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने में यह एक अनूठा प्रयास था। मिठाइयों के एवज में हम उन्हें लिफाफा देते जिसमें कुछ शब्द होते, अर्थ नहीं। वे कहते कि शब्द में भी तो अर्थ ही होता है!
(जनसत्‍ता, 19 नवम्‍बर 2012 से साभार)

खट्टी-मीठी यादें : चंद्रकला जोशी


लूकरगंज, इलाहाबाद में अपने घर में चंद्रकला जोशी और शेखर जोशी, नवम्‍बर, 1999।
कथाकार शेखर जोशी की पत्‍नी और हमारी इजा(माँ) चंद्रकला जोशी जी का 23 अक्‍टूबर, 2012 की रात नि‍धन हो गया। मैं उन भाग्‍यशाली लोगों में से हूं जि‍न्‍हें उनकी आत्‍मीयता और स्‍नेह मि‍ला। अपने बारे में लि‍खा उनका संस्‍मरण श्रद्धांजि‍ल स्‍वरूप दे रहे हैं- 
मेरा बचपन राजस्थान के छोटे शहर अजमेर में बीता। मेरे बाबूजी वहाँ एक गवर्नमेंट स्कूल में अंग्रेजी व हिन्‍दी के अध्यापक थे। आठ भाइयों के बीच में मैं ही अकेली बहिन थी। बाद में 18 वर्ष के जवान भाई की मृत्यु के बाद दो बहिनें हुईं। बाबूजी ने तो मेरा पालन-पोषण बिल्कुल लड़कों की तरह किया था। वे पिता कम मित्र अधिक थे।
सन् 1955 में जब मैं बीए में थी तो प्राय: हम वयस्क सहेलियाँ आपस में होने वाले पति के बारे में बहस किया करती थीं। मेरी एक सहेली तो यह भी कहती थी कि भले ही पति काना हो पर पैसे वाला हो। मेरी राय उससे भिन्न थी। मैं कहती थी कि जीवनसाथी जैसा भी मिले मित्र जैसा हो और उसकी रुचि पढऩे-लिखने में हो, भले ही वह पैसा कम कमाता हो।
सावित्री कॉलेज, अजमेर में तो मैंने यूनियन के चुनाव में भी भाग लिया था और सर्वसम्मति से सेकेट्री पद के लिये चुन ली गई थी। सावित्री कॉलेज में एमए की कक्षाएं नहीं थीं। अत: एमए में मैंने अजमेर के गवर्नमेंट कॉलेज में प्रवेश लिया। वहाँ उस समय प्रिंसिपल साहब वी.वी. जॉन थे। वे बहुत नामी शिक्षाविद् थे। वहाँ वर्ष में एक सप्ताह सोशियल वीक भी मनाया जाता था। उसमें अनेक प्रकार के क्रियाकलाप भी होते थे। मैंने भी डिबेट और नाटकों में भाग लिया था। उसी सप्ताह में एक दिन कवि सम्मेलन और एक दिन मुशायरा भी होता था।
हमारे बड़े भाई साहब इन सम्मेलनों में हमें वहाँ ले जाते थे। वे रात-रात भर वहीं चलते थे। कवि बच्चन जी,  नीरज और राजस्थानी कवि मेघराज ‘सेनाणी’ को तब मैंने पहली बार वहीं सुना था। मुशायरे में अली सरदार जाफरी भी आए थे और उनका ‘नींद क्यों रात भर नहीं आती मुझे’ आज भी याद है।
बाबू जी ने क्योंकि गवर्नमेंट कॉलेज घर से दूर था,  अत: एक लेडी साइकिल भी मुझे दिलवा दी थी। उस जमाने में स्कूटर आदि का रिवाज नहीं था।
जॉन साहब ने एक और अच्छा काम छात्र-छात्राओं के हित में किया था। कॉलेज की लाइब्रेरी में ओपन सिस्टम कर दिया था। अब हम लोग अपनी पुस्तकें काउंटर पर रखकर जो मन में आए वही किताबें और पत्रिकाएं पढ़ सकते थे। वहीं मैंने ‘कहानी’ पत्रिका में अमरकांत जी की पुरस्कृत कहानी ‘डिप्टी कलेक्टरी’ और कमलेश्‍वर जी की ‘राजा निरबंसिया’ पढ़ी। भैरव जी ‘कहानी’ पत्रिका के संपादक थे। ‘कहानी’ के ही दूसरे अंक में शेखर जी की ‘कविप्रिया’ पढ़ी। अमरकांत जी की कहानी पढ़कर तो मुझे उस उम्र में भी रोमांच-सा हो आया था।
शेखर जी और मैं विवाह के 8-10 वर्ष पूर्व भी एक-दूसरे से परिचित थे। मेरे बाबूजी और इनके मामा एक-दूसरे के मित्र थे। पढ़ाई इन्होंने भी मामा के यहाँ रहकर ही की थी। अर्थशास्त्र से एम.ए. करने के बाद मैंने फिर मीरशाली से बी.एड. किया था। मीरशाली में हमारा बी.एड. का पहला बैच थ।
सन् 58 में ही मेरी नियुक्ति बीकानेर से लेडी एलगिन में अर्थशास्त्र की प्रवक्ता के पद पर हो गई थी। वहीं ‘कोसी का घटवार’ की एक प्रति इन्होंने मेरे लिए भेजी थी। बाबूजी रिटायर होने के बाद बीकानेर में एक जैन स्कूल के प्रिंसिपल होकर आ गये थे। मैं उनके साथ ही थी। मैंने वह प्रति बाबूजी को भी दिखलाई।
मैंने ‘कोसी का घटवार’ पुस्तक के लिये एक धन्यवाद का पत्र लिखा। वहीं मेरी एक बुआ (स्व. मोहन बल्लभ पंत जी की पत्नी) रहती थीं। मोहन बल्लभ जी वहाँ एक डिग्री कॉलेज में हिन्‍दी के प्रोफेसर पद पर थे। किताब पढ़कर बुआ व फूफाजी की प्रतिक्रिया हुई कि ‘‘क्या इस युवक से तुम्हारा विवाह नहीं हो सकता है?’’ मैंने बाबूजी को अपना विचार बतलाया। विवाह के बारे में इलाहाबाद पत्र लिखा गया। इलाहाबाद से फिर इनका पत्र मेरे लिए आया था। ‘‘कहीं तुम शेखर जोशी के लेखकीय व्यक्तित्व से प्रभावित होकर तो विवाह के लिये तैयार नहीं हो। वह जीवन भर का फैसला है। कहीं तुम्हें बाद में पछताना न पड़े।’’ पर मैं अपने निर्णय पर अडिग थी। बाबूजी भी थोड़ी सी आनाकानी के बाद तैयार हो गये थे। सम्‍भवत: उनका स्वप्न किसी ऊँचे अधिकारी पद वाले दामाद का रहा होगा। इलाहाबाद रहने का आकर्षण तो ‘कहानी’ पत्रिका पढ़कर भी बहुत हो गया था।
सन् 60 में हमारा विवाह भी हो गया था। विवाह से पूर्व मैंने बीकानेर की नौकरी भी छोड़ दी थी। इलाहाबाद आकर तो मैं बहुत ही प्रसन्न थी। इलाहाबाद में इनके सभी मित्रों अमरकांत जी, भैरव जी, मार्कण्डेय जी ने छोटे भाई की पत्नी की तरह मुझे स्नेह सम्मान दिया। दो वर्ष करेलाबाग में रहकर फिर हम लोग भैरवजी के घर में आ गये थे। भैरव जी लूकरगंज में रहते थे। वे ‘नई कहानियाँ’ पत्रिका का सम्‍पादन करने दिल्ली चले गये थे। अश्कजी तो प्राय: टहलते हुए हमारे यहाँ आ जाते थे और बार-बार कहते थे, ‘‘शेखर इस पढ़ी-लिखी लड़की को तुमने घर में बिठा रखा है?’’ उस समय इलाहाबाद तो साहित्यकार का अड्डा था। विभिन्न मत वाले साहित्यकार वहीं थे। अश्क जी के घर में साहित्यकारों की बैठकें हुआ करती थीं। बाहर से भी साहित्यकार वहाँ आते थे। साहित्यिक गोष्ठियों में ये हमेशा मुझे अपने साथ ले जाते थे।
सन् 60 के ही अप्रैल माह में अश्क जी के बड़े पुत्र उमेश जी के विवाह में साहित्यकार सम्मिलित हुए थे। राजेन्‍द्र यादव, मन्नू जी, मोहन राकेश, राजेंद्र सिंह बेदी आये थे। मोहन राकेश के ठहाके मैंने तभी सुने थे।
विवाह के तुरन्‍त बाद बाबू जी ने मेरी साइकिल पार्सल करके भेज दी थी। ‘‘पर साइकिल तुम इलाहाबाद में नहीं चलाओगी।’’ यह इनका कहना था।
सन् 62 में ही प्रतुल पैदा हो गया था और लूकरगंज के ही एक स्कूल विद्यावती दरबारी बालिका इंटर कॉलेज से मेरे लिये नियुक्ति का पत्र आ गया था। ‘‘मैं प्रात: 7 बजे से 5 बजे सायं तक वर्कशाप से लौटता हूँ। प्रतुल आया के भरोसे पर नहीं पलेगा। जब मैं 8 वर्ष का था मेरी माँ दिवंगत हो गई थी। मैं चाहूँगा कि मेरे बच्चों को उनकी मां मिले।’’
जीवन में कितनी ही बार अवसर नौकरी करने के आए पर ये हमेशा मेरी नौकरी के विरोध में रहे। कहने लगे सुधाजी  (स्व. अमृतराय की पत्नी) ने भी तो बच्चों के पीछे विधायकी छोड़ दी थी।
विवाह आप चाहे अपने मन से करें अथवा माता-पिता या मित्रों द्वारा तय किया गया हो, आपको सुखी वैवाहिक जीवन के लिए बहुत से समझौते करने पड़ते हैं।
सावित्री कॉलेज और गवर्नमेंट कॉलेज में तो जागरुक छात्रा की तरह नेतागिरी करती रही थी। यहाँ आकर परिवार की शांति के लिए मेरी नेतागिरी ठप्प हो गई थी।
यूँ 45 वर्ष के वैवाहिक जीवन की अनेक खट्टी-मीठी यादें हैं। शेखर जी को जो मैंने निकट से देखा, वे अपने लेखक मित्रों भैरव जी, अमरकांत जी और मार्कण्डेय जी के साथ जीवन में जब भी सुख-दुख के अवसर आये छोटे भाई की तरह विनम्र और संकोची ही रहे।
वर्कशाप के साथियों शर्मा जी, बसरा जी, गोयल साहब और विनोद जी के बीच ये हमेशा बड़े भाई की तरह रहे। भैरवजी व भाभी जी को दिवंगत हुए कई वर्ष हो गये पर उनके बच्चे, बहुएँ जब भी मिलते हैं, वही पुराना आदर-सम्मान देते हैं।
मेरे मायके और ससुराल के लोग हमेशा सहायक रहे हैं। मेरे छोटे भाई की किडनी फेल हो गई थी। इन्होंने मुझे हमेशा उत्साहित ही किया कि अगर मैं उसे अपनी किडनी दे दूँ तो उन्हें प्रसन्नता ही होगी, उस समय तीनों बच्चे छोटे ही थे।
आज जबकि मेरी दोनों बहुएं नौकरी वाली हैं और इस कारण उन्हें बच्चों को पालने में खासी दिक्कत हो रही है। मुझे लगता है कि उस समय मेरा नौकरी न करना ठीक ही था। लेकिन अब महिलाएं शौक के लिये नहीं, दिन-प्रतिदिन की घर की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये नौकरी कर रही हैं।
अब जबकि सब बच्चे अपने-अपने इस संसार में व्यवस्थित हो गये हैं। एक-दूसरे का साथ एक पल का भी नहीं छोड़ा जा रहा है। अब यह साथ न छूटे यही कामना है।
(सर्वनाम : 79/ जुलाई, अगस्‍त, सि‍तम्‍बर 2005 से साभार)


गोवा में बेटी कृष्णा और नाती ऋतुराज व देवराज के साथ चंद्रकला जोशी।

रामलीला में बंदर : कमल जोशी


बचपन को याद कर रहे हैं फोटो जर्निलिस्‍ट और लेखक कमल जोशी-
बचपन के दिनों में हमारी सबसे बडी़ कोशिश होती थी रामलीला में बंदर बनने की । तब हमारा शरीर या रसूख इतना नहीं होता था कि हम हनुमान बनने की सोचें। हाँ, सपना जरूर था। रामलीला में बंदर बनने के लिये भी कितने पापड़ बेलने पड़ते थे, यह हमको ही पता है।
रामलीला में बंदर बनने की आकांक्षा की सबसे पहले अड़चन घर से ही होती थी। रामलीला रात नौ बजे से शुरू होती थी। बंदर या राक्षस बनने के इच्छुक बच्चों को साढे़ आठ बजे तक रामलीला मुख्य स्टेज के पीछे मेकअप रूम में पहुँचना पड़ता था। उसके बाद एन्ट्री बन्द हो जाती थी। हमारे घर वाले हमें साढे़ आठ बजे तक खाना देते ही नहीं थे जिससे हम समय पर रामलीला स्टेज में पहुँच कर बंदर बनने का मेकअप कर सकें। घर में पिताजी को खाना मिलता था। रसोई से गर्म-गर्म रोटी ले जाने की जिम्मेदारी मेरी या अनिल की होती। पिताजी साढे़ आठ के बाद खाना खाते। उसके बाद ही हमें खाना मिलता। तब खाना खाने के बाद ही जा सकते थे। हम तो बंदर बनने के लिये रात के खाने की बलि‍ तक देने को तैयार थे। पर माँ थीं कि हमें बिना खाना खिलाये जाने नहीं देतीं।
साढे़ आठ बजे रामलीला पहुँचने की गर्ज में मैंने तथा अनिल ने तय किया कि हम कहेंगे कि हमारी खाना खाने की इच्छा नहीं है। पेट भरा है जिससे माँ हमें खाना खाने के झंझट से मुक्त कर दें। पर हुआ उल्टा ही। दोनों भाइयों के एक साथ खाना नहीं खाने की इच्छा तथा पेट भरे होने की शिकायत पर माँ को लगा कि हमारी तबियत खराब हो रही है। तुरंत हमारे पेट पर गयान्धूँ (गाय के दूध का घी) मलकर रजाई ओढ़ा कर सुला दिया। हमने कि‍तना कहा कि तबियत ठीक है पर माँ कहाँ मामने वाली। हमने खाना खाकर भी दिखा दिया पर माँ ने रामलीला नहीं जाने दिया। रातभर मेरी फ्लॉप तरकीब पर अनिल मुझसे लड़ता रहा।
इन विषम परिस्थितियों के बावजूद हम मेकअप रूम में दाखिल हो जोने में सफल हो जाते थे। यहाँ भी लोचा था। सब बंदर बनना चाहते थे क्योंकि रामलीला मास्टर की साफ-साफ ताकीद होती थी कि मंच पर बंदर ही राक्षसों का संहार करेंगे यानी वानर-राक्षस युद्ध होने पर राक्षस ही पिटेंगे। राक्षस पात्र वानरों को नहीं मारेंगे। यद्यपि कई बार ऐसा भी हुआ कि ज्यादा पिट जाने पर राक्षस को गुस्सा आ गया और उसने मंच की मर्यादा के विपरित दर्शकों के सामने ही वानर को पीट डाला और वानर रोने लगा। दर्शकों का हँसी के साथ-साथ सीटियाँ बजाना आम बात थी। ऐेसे में मंच की व्यवस्था सम्भालने वाले मुस्टंडे आकर वानर-राक्षस द्वन्द को तुरन्त मंच के अंदर खींच लेते। मंच मर्यादा तोड़ने के फलस्वरूप तबियत से उनकी पिटाई होती और दोनों को भविष्य में वानर या राक्षस बनने से अलग कर दिया जाता।
हमारे नसीब में अधिकांशतः राक्षस बनना था और पिटना भी बदा था। परन्‍तु वानर भी हम बनें इसलिये सब जल्दी पहुँचने के साथ-साथ लाल स्वेटर की व्यवस्था में लग जाते। क्योंकि घुटना तो रामलीला की ड्रेस में मिल जाता जो अमूमन हनुमान के पुराने कच्छे होते। हर साल भक्‍त नये कच्छे चढा़ते और हनुमान हर साल नये कच्छे में रोल करता। कभी-कभी तो एक वर्ष की रामलीला में वह दो बार नये कच्छे बदल देता। पुराने घुटने वानर सेना की ड्रेस बन जाते।
हाँ तो हमारे पास लाल स्वेटर के नाम पर स्कूल की ड्रेस की लाल स्वेटर ही होता। वानर बनने के लिये हमें घर से स्कूल स्वेटर ले जाने की मनाही थी क्योंकि वानर-राक्षस युद्ध में कई बार हम स्वेटर को फड़वा चुके थे। फिर भी हम घरवालों से आँख चुराकर स्वेटर स्मगल कर लेते थे तथा वानर बनने को हाजिर हो जाते। वानर बनने के सब सुख थे, पर एक परेशानी थी। वानरों को मुखौटे पहनने पड़ते थे। जिससे वे बंदर जैसे दिखें। मुखौटे पहनने के बाद दर्शक दीर्घा से हमारे दोस्तों को पता ही नहीं चलता था कि आज वानर कौन बना है? अपनी उपलब्धि को दिखाने के लिये यह बहुत जरूरी होता था कि हम हनुमान की टीम में बीच-बीच मे मुखौटे उठाकर अपने दोस्तों-परिचितों को अपनी शक्ल दिखाते रहें कि‍ कन्फर्म हो सके कि इस रात में मैं ही बंदर बना हूँ। हमारी इस हरकत को यदि हनुमान देख लेता तो वह एक चपत जड़ देता। हम झट से मुखौटा नीचे कर देते थे। हनुमान-वानरों की इस हालत पर दर्शक हँसते। हम उदास होते कि पता नहीं कितने देख पाये हमारी शक्ल।
राक्षस बनने की नियति तो सार्वजनिक रूप से पिटने की थी। पर वानर बनकर भी सुरक्षित नहीं रहा जा सकता था। होता ये था कि हम अति उत्साह में अपने से बडे़ लड़कों को बंदर के रूप में ज्यादा ही पिट दिया करते थे क्योंकि वे राक्षस बनते थे। शायद वो उनकी ज्यादती जो हम रोज सहते थे, उसका परिणाम होती थी। राक्षस मंच मर्यादा की वजह से उस वक्त संयमि‍त और चुप रहते पर बाद में हमारी बहुत ठुकाई होती। फिर हम घर की राह पकड़ते। अगले दिन पीठ में दर्द रहता चाहे हम बंदर बने हों या राक्षस। भरत मिलाप के दिन बंदर बनना सबसे बडी़ उपलब्धि थी। झाँकी में हनुमान की सेना बनकर हिस्सा लेने के लिये बहुत से तिकड़म लगानी पड़ती। झाँकी के लिये बहुत बेगारी करनी पड़ती तब कहीं रामलीला मास्टर का दि‍ल पि‍घलता। और हम बंदर बनते। उस दिन हनुमान के साथ बैठने का सुख तो मिलता ही साथ ही सारे शहर में घूमने का और मुखौटा उठा-उठाकर लोगों को पहचानने का मौका भी मिलता।
पता नहीं रामलीला की एक घटना का जिक्र करना उचित है कि नहीं। रामलीला में सीता स्वयंवर का दृश्य था। एक व्‍यक्ति‍ को एक देश के राजा का रोल दिया गया तो आदत के अनुसार वह शराब की घुट्टी लगाकर आया। राजाओं में से किसी ने उसका किसी बात पर मूड ऑफ कर दिया। राजा बेचारा गुस्से में क्या करता। उसने शिव धनुष तोड़ने की एक्टिंग नहीं की बल्कि तोड़ ही डाला। मंच पर सीता-दशरथ हतप्रभ। राम-लक्ष्मण हक्के-बक्के पर सीता को उसके साथ कैसे भेजा जा सकता था। पर्दा गिराया गया। पीछे उस राजा की पिटाई की गयी। दूसरी पार्टी ने शिवधनुष रिपेयर किया तब लीला शुरू हुई।
हमारा बचपन अभाव में तो नहीं गुजरा परन्तु हमें उतनी सुविधायें तथा रिसोर्स नही मिलते थे जो हमारे साथ के सम्पन्न घरों के दोस्तों को मिलते थे। सन् साठ में हम बचपन के अन्तिम मोड पर थे तो अहम जाग रहा था। हम क्यों किसी से कम हों, यह भाव था।
हमारे सम्पन्‍न दोस्त कोटद्वार के सबसे महंगे ओके टेलर तथा दून टेलर्स से कपडे़ सिलवाते थे। इन टेलरों ने कॉलर के पीछे अपना लेबल लगाना शुरू किया। इसी बिल्ले से पता चलता था किसकी कमीज महंगे टेलर ने सिली है। सम्पन्‍न घर के लड़के लेबल दिखा-दिखा तडी दिखाते।
हमारे कपडे़ मकान के बाहर पटरी पर बैठने वाले दर्जी सिला करते थे। उन बेचारों की हैसियत इतनी नहीं कि लेबल बनवाते। इसी बीच हमें नई ड्रेस सिलवानी थी। उस पर बिल्ला नहीं लगा तो बेइज्जती हो सकती थी। सवाल तडी़ का था। घर वाले तो दून टेलर से कमीज सिलवाने से रहे। ऐसे में हम कहाँ से बिल्ले लगवाते। अपने दर्जी को हमने बिल्ले के लिए परेशान करना शुरू किया। उसने चिढ़कर कहा कि‍ कहीं से बिल्ला मांग कर ले आओ। मैं सिल दूँगा। दर्जी लेबल सिलने को तैयार था। अब सवाल यह लेबल कहाँ से आये। इसी उधेड़ बुन में था। तभी युक्ति आई कि हमारे पिताजी जो अन्डरशर्ट पहनते थे, उसके पीछे गर्दन के पास लेबल लगा रहता था। हौजरी की कम्पनी का। उस समय महिलायें भी सैंडो बनियान पहनती थीं ब्लाउज के ऊपर। हमें इससे मतलब नहीं था कि बिल्ले में क्या लिखा है। वैसे भी तो अंग्रेजी में होता था। हमने चुपचाप माँ-पिताजी की बनियानों से बिल्ले काटकर टेलर को कमीज में सिलने को दे दिये। घर में बनियान पीछे से कटी देखकर कोहराम मचा कि किसने काटे क्यों काटे ? मैं चुप। खैर, हमने कमीज पर बिल्ले लगवाये।
अगली बार हम भी लेबल वाली कमीज पहनकर स्कूल गये। हर बात पर कॉलर पीछे बिल्ले दिखाते रहे। अब हमारी भी तडी़ थी कि बाहर के टेलर से कमीज सिलवाई। पर एक बार जब पिताजी दर्जी के पास पैसे देने पहुँचे तो उसने बातों ही बातों में कहा, ‘‘अब बच्चे कपडे़ की सिलाई कम फैशन ज्यादा देखते हैं। आपके बच्चे भी बिगड़ गये है। दोनों बिल्ले के चक्कर में किसी की बनियान से बिल्ले लाये और सि‍लवाये।’’
पिताजी की समझ में आ गया कि उनकी बनियान किसने काटी। घर आये। कमीज मंगवाई पूछा, ‘‘ये लेबल कहाँ से आये ?’’ मैं चुप रहा। पिटाई हुई, ‘‘उधेडो ये बिल्ले, पढा़ई में जीरो हैं और फैशन करने में सबसे आगे।’’ मुझे पिटाई का दर्द कम हुआ पर बिल्ले उखाडे़ जाने का डर ज्यादा सताने लगा। मैं जोर-जोर से रोने लगा। माँ ने बिल्ले उखाड़ने से मना कर दिया।
ऐसे ही क्रियटिविटी का एक और किस्सा। हम बचपन में अपने घर के बगलवाली नहर में नहाते थे। तैरना वहीं सीखा हमने। छोटे रहे होंगे तो नंगे नहाते थे। नंगे नहाते-नहाते तैरना भी सीख गये। जब छठीं-सातवीं में पढ़ने लगे तब हॉफ पैंट पहनकर नहाने लगे। लड़कियों की नजर में नोटिस होना जरूरी है इसलिये उनके आते ही डुबकी लगाना और तैरने की कलाबाजी के करतब दिखाना शुरू हो जाता । मैं ही नहीं सभी ऐसा करते।
इन्हीं दिनों हमारा साथी जो सबसे बडे़ व्यापारी का लड़का था, एक वी शेप वाली चड्डी ले आया। अन्य लड़के हमारी तरह पुरानी हॉफ पैंट में या धारी घुटनों में नहाते थे। सभी लड़के उसके कच्छे पर मरते थे। तैरना उसे कम आता था पर उसके वी शेप के कच्छे के चक्कर में उसका ज्यादा बडा़ रौब हो गया। वह अपने गुट के साथ तैरता और हमारी जगह कम कर देता। अब हमारे लिये यह सम्मान का प्रश्‍न हो गया। कैसे उसके वी शेप की चड्डी से टक्कर ली जाये।
उन्हीं दिनों मेरे चचेरे भाई आये थे। उनके पास वैसी ही वी शेप चड्डी थी। वह दो दिन के लिये आये थे। मैंने उनका कच्छा चुरा लिया। जब वह जाने लगे तो कच्छे की ढूंढ़ हुई, वो कहाँ से मिलता। अब वो मेरा था। पर उसे मैं पहन नहीं सकता था। वो मेरे साइज से बहुत बडा़ था।
अब अपनी क्रि‍यटि‍वि‍टी का इस्‍तेमाल की जरूरत थी। उसे अपने साइज का काटकर बना लि‍या। अगले दि‍न में इसे पहनकर नहर में चला गया। सबने पूछा, ‘‘कहाँ से ले आया यह ?’’
‘‘भाईजी फौज से लाये हैं।’’ मैंने कहा।
‘‘अब फौज में बच्‍चे के कच्‍छे मि‍लते हैं ?’’ प्रति‍द्वन्‍दी लड़के ने पूछा।
मैंने अकड़कर कहा, ‘‘तू क्‍या जाने फौज के बारे में। तू तो मूंग तोल मूंग। मेरी फिर धाक जम गई।
वे कत्‍ल के पाँच दि‍न थे। उतने भारी दि‍न उससे पहले कभी नहीं गुजरे थे। इतनी ग्‍लानि‍ मुझे कभी नहीं हुई थी। कि‍स्‍सा यूँ हुआ कि‍ मैं स्‍काउटिंग के शि‍वि‍र में गया था। दस दि‍वसीय शि‍वि‍र स्‍काउटिंग गति‍वि‍धि‍यों को हि‍स्‍सा था। मैं क्रि‍याकलापों का नेता था। कम वजन होने के कारण मुझे पि‍रामि‍ड बनाते हुए सबसे ऊपर लड़कों के कन्‍धों पर खड़ा होना था। गढ़ देवा का प्रमुख रोल होता है इस कि‍स्‍से में। शि‍वि‍र में पि‍ताजी भी आये थे। जैसे कि‍ अन्‍य अभि‍भावक भी आते थे। वे साथ में चने-लैचीदाणे(चने-इलायची दाने) भी लेकर आये। गढ़ देवा लैंसडाउन होना था। उन्‍होंने कहा, ‘‘ठीक है मैं तेरे लि‍ये गर्म पैंट सि‍लवा देता हूँ।’’ पैंट का नाम सुनते ही खुशी में नींद उड़ गई। अब तक हॉफपैंट ही पहनते थे। पहली बार पैंट सि‍लवाई जा रही थी। पैंट टेलर के पास थी। मैं इंतजार करते-करते सो गया। सुबह उठकर माँ से पूछा तो उन्‍होंने कहा, ‘‘मैं पि‍ताजी से पूछ कर बताऊँगी। कहाँ रखी है।’’ वह पि‍ताजी से पूछकर पैंट ले आईं। अगले दि‍न लैंसडाउन पहुँचे। हम कोटद्वार की स्‍पोर्ट्स लड़कि‍यों की भी देखभाल करते। शाम को मैंने नई पैंट नि‍काली, पहनी। तभी एक लड़के ने कहा कि‍ नई पैंट नहीं है। इसके पीछे तो टल्‍ला लगा है। कमरे में गया। उदास नजरों से टल्‍ले को देखा। मैं रोने लगा। दरअसल बडे़ भाई साहब की पैंट उधेड़कर मेरे लि‍ये बनवाई गई थी। पर उसी पैंट को पहनकर जाना पड़ा। लड़के मजाक बनाते थे। कहाँ तो मैं जोर-जोर से नारे लगाता था, पर उस साल गढ़ देवा की अवधि‍ में डर-डर कर रहा। धीरे-धीरे टल्‍ले वाली पैंट पहनने की आदत बन गई।
रामलीला में बंदर बनने का कि‍सी ने सरल रास्‍ता बताया कि‍ अगर तुम अपनी पलकों के ऊपर के बाल और भौं के बाल नोंच कर दो पत्‍थरों के बीच रख दोगे तब तुम्‍हारी मनोकामना पूरी होगी। मैं और अनि‍ल इस काम में लग गये। रोज आँखों के बाल नोंचते और जब लोगों के सामने जाते तो बि‍ना बालों और पलकों की भौंहे देखकर वे आश्‍चर्य भी करते और हँसते भी। हमारे लि‍ये हँसी-मजाक को मौका नहीं था पर अपना ही चेहरा आइने में देखकर पहचाना नहीं जाता। यह सि‍लसि‍ला कैसे खत्‍म हुआ, याद नहीं पर बचपन याद है।
(अतुल शर्मा द्वारा सम्‍पादि‍त शीघ्र प्रकाश्‍य पुस्‍तक से)  

आदमी को आदमी का साथ चाहिए : सुधीर सुमन


पिछले साल आज ही यानि 2 अक्तूबर को चर्चित कवि-मीडियाकर्मी कुबेर दत्त का असामयिक निधन हो गया था। उन पर लि‍खा युवा लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन का संस्‍मरण-  
सुबह उठता हूँ, आदतन मोबाइल के स्क्रीन को अपनी आँखों के करीब लाता हूँ, कोई मिस्ड कॉल नहीं, कोई एसएमएस नहीं। अब कौन रातों को पुकारेगा, कौन इस देश में वामपंथ और जनता के रिश्ते को लेकर लड़ पड़ने की हद तक बहसें करेगा, मुझे चिढ़ाएगा और रूठ जाने पर मनाएगा! उनकी जिस आदत से कभी-कभी उनके मित्रों की तरह मैं भी झल्ला उठता था, आज उसी की कमी बेहद सता रही है।
आदमी को आदमी का हाथ चाहिए, आदमी को आदमी का साथ चाहिए- यह गीत कुबेर जी को बहुत प्रिय था। हम जब भी साथ बैठे होते थे तो वह इसे पूरे सुर में गाकर सुनाते थे। यह जैसे उनका घोषणा-पत्र था। शायद इसी साथीपन की चाह ने उनके चाहने वालों की बड़ी कतार पैदा की। जब कभी मैं किसी खास मनोदशा में कोई गीत या गजल गुनगुना उठता, तो वह उसकी खुलकर सराहना करते। मैं कहता कि आवाज अच्छी है, तो इससे क्या होगा, मुझे तो कोई वाद्ययंत्र बजाना या उसके साथ संगत करना आता नहीं, तो उनका प्रस्ताव होता, चलो अगले महीने से हारमोनियम बजाने का अभ्यास शुरू करते हैं। उन्हें संगीत की गहरी समझ थी, जैसे उनके अवचेतन में हमेशा संगीत का कोई समुंद्र हिलोरें लेता रहता था। हमारा संगीत अभ्यास शुरू भी हो गया होता, अगर मेरे पैर कायदे से एक जगह टिके रहते।
आज सोचता हूं कि किस तरह उनसे मुलाकात हुई, तो मिलने से पहले की कुछ बातें याद आती हैं। मधुकर सिंह की पत्रिका ‘इस बार’ में छपने को उनकी कविताएं आई थीं, कविताएं तो आईं ही, उनकी खूबसूरत हैंडराइटिंग का भी अलग ही आकर्षण था। जब 2001 में नये रंग रूप में ‘जनमत’ के सम्‍पादन की जिम्मेवारी मुझे मिली, तब फिर उसी खूबसूरत हैंडराइटिंग में एक कविता मिली, जिसे हमने प्रकाशित भी किया। इसके अतिरिक्त उनसे कोई संबंध नहीं था।
दिल्ली जब आया, तब मेरे मोबाइल में कुबेर दत्त का नाम दर्ज नहीं था। वह डीडीभारती के चीफ प्रोड्यूसर थे। अधिकारियों से मिलने में मुझे हमेशा संकोच होता रहा है। साहित्य संस्कृति की दुनिया में जो तरह-तरह के अधिकारी सक्रिय हैं, उनके कारनामों को देखकर वैसे भी एक दुराव बने रहना स्वाभाविक है। अपने जरूरी खर्चे के लिए मैं किसी पर निर्भर नहीं रहना चाहता था, मुझे किसी ऐसे काम की जरूरत हमेशा महसूस होती थी, जिससे कुछ पैसे भी मिल जाएं और साहित्य-संस्कृति और संगठन का कामकाज करने की भी फुर्सत रहे। लेकिन आजीविका की तलाश में दिल्ली आया नहीं था। यारों की कोई कमी नहीं थी, कई घर मेरे लिए खुले थे, पर कोई कितनी देर तक एफोर्ड करता। उसी वक्त शुभचिंतकों ने मुझे कुबेर जी से मिलवाया। वहाँ गया तो वेणु गोपाल मिल गये। नहीं, सशरीर नहीं। कुबेर जी ने मुझे कहा कि ट्रांस्क्रिप्शन कर सकते हो। मैंने कहा कि छोटे वाले रिकार्डर से कई बार किया है। वहाँ मैंने वेणु गोपाल पर केंद्रित एक कार्यक्रम का ट्रांस्क्रिप्शन किया। डीवीसी मशीन से ट्रांस्क्रिप्शन करना ज्यादा सहज था। खैर, संकोचवश उस ट्रांस्क्रिप्शन के मेहनताने के लिए कुबेर जी को मैंने कभी याद नहीं दिलाई। मैं तो इसी से संतुष्ट था कि वेणु गोपाल जैसे क्रांतिकारी कवि के जीवन पर आधारित कार्यक्रम को देखा-सुना और उसे कागज पर उतारा। हमारी इस प्रत्यक्ष मुलाकात के बीच वेणु गोपाल का वह कार्यक्रम था और उसके संदर्भ थे। बाद में साहित्य-संस्कृति और राजनीति के ऐसी ही कितनी चर्चाएं हमें एक दूसरे के करीब लाती गईं। लेकिन वह भी तुरत नहीं हुआ।
संयोगवश उस मुलाकात के कुछ माह बाद मुझे कुबेर जी की जीवनसंगिनी प्रसिद्ध नृत्य निर्देशक और दूरदर्शन अभिलेखागार की निदेशक कमलिनी जी के साथ काम करने का मौका मिला। उन्होंने मुलाकात का जो समय दिया था, उसके दो’तीन हफ्ते बाद मैं पहुँचा, तो मीठी डाँट पड़ी कि काम करना है या नहीं। मैंने कहा कि देखिए कितने दिनों तक काम कर पाता हूँ। उन्होंने कहा कि यहाँ आने के बाद लोग लौटते नहीं। अब तक कमलिनी जी की बात सही निकली है। अक्सर दिल्ली से भागने की सोचता रहा हूँ। जब भी यहाँ से भागने का मौका मिलता है, मौका छोड़ता नहीं हूँ। आज सोचता हूँ कि वह क्या था जिसने दिल्ली जैसे महानगर में मुझे टिकाए रखा, तो लगता है कि वह कमलिनी दत्त और कुबेर दत्त का गहरा स्नेह भी था। कुबेर जी को कमलिनी जी के बगैर समझा नहीं जा सकता। कमलिनी जी न होतीं, तो कुबेर जी शायद इतने हरफनमौला संस्कृतिकर्मी न हुए होते। कुबेर जी के अभिन्न सहयोगी श्याम सुशील भी यहीं मिले और ऐसे मिले कि जैसे कितनी पुरानी मुलाकात हो।
अपने नि‍ब्‍याज प्रेम से कुबेर जी ने पिछले एक-डेढ़ साल में मुझे अपने परिवार के एक सदस्य की तरह बना लिया था। इस महानगर के उपभोक्तावादी समाज से मुकाबिल होने के बाद जिस अकेलेपन, उदासी, अवसाद और विक्षोभ ने मेरे भीतर घर किया, उसकी उन्हें हमेशा थाह रहती थी। जब भी मैं खुश दिखता था, तब उनकी खुशी देखते ही बनती थी। श्याम सुशील ऐसे कितने ही प्रसंगों के साक्षी हैं। पता नहीं क्यों उन्हें मुझ पर बेहद यकीन था। उन्हें यकीन था कि यह एक ऐसा आदमी है जो अगर रात में जगा होगा तो कॉल रिसिव करेगा और पूरे धैर्य से उन्हें सुनेगा।
एक ही दिन पहले तो उनसे मुलाकात हुई थी। वह मुझे हँसाने की कोशिश कर रहे थे। माहौल कुछ इस तरह का था, जैसे ‘जंजीर’ फिल्म के इंस्पेक्टर और उसके पठान दोस्त के बीच था, उस मशहूर गीत- यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिंदगी जैसा। शनिवार को मैं निकला था चंडीगढ़, जनता के नाटककार गुरुशरण सिंह की शोकसभा में शामिल होने। उसी रोज शाम में उनका आखिरी एसएमएस मिला था- कब लौटोगे? मैंने जवाब दिया- रविवार की रात तक। रविवार को जनता के संस्कृतिकर्म के एक इंकलाबी नायक को चाहने वाले हजारों लोगों के बीच मैं बेहद खुश था, सोच रहा था कि कुबेर जी को लौटकर बताऊँगा, तो वे बेहद उत्साहित होंगे। लेकिन शोकसभा के आखिर में अचानक एक एसएमएस आया- कुबेर जी नहीं रहे। गुरशरण सिंह की बेटी मंच से बोल रही थीं, अब कोई शब्द अपने अर्थ के साथ मुझ तक पहुँच नहीं रहा था, जेहन में एक शोर का चक्रवात-सा था, जिसमें सिर्फ एक ही अहसास गूँज रहा था- ओह, मैंने एक अभिभावक-सा दोस्त खो दिया, जिसने कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि हमारी और उसकी उम्र के बीच बाइस साल का फासला है। उन्होंने कभी भी अपने अनुभवों का बोझ नहीं लादा। वह मुझे ऐसे चाहते थे, जैसे कोई अपना चिरसंचित स्वप्न पूरा करने वाले किसी संभावनाशील शख्स को चाहता है। मालूम नहीं अपने इस कामरेड की उम्मीदों को किस हद तक पूरा कर पाऊँगा। कामरेड का सम्‍बोधन उन्हें प्रिय था।
बेशक वह किसी संगठन के सदस्य नहीं रहे, लेकिन जनता की जिंदगी को बेहतर बनाने वाली हर ईमानदार प्रक्रिया उन्हें अपनी ओर खींचती थी। तमाम तरह के आरोपों और आशंकाओं वाले लेख और इंटरव्यू सामने आने के बावजूद अन्ना के आंदोलन में उमड़ी जनता को उन्होंने बड़ी उम्मीद से देखा था। वह अन्ना के भी प्रशंसक थे। वह कई बार ‘जनमत’ को हमारी पत्रिका कहते, कई बार सीपीआई (एमएल) को हमारी पार्टी कहते। उन सारे साथियों को याद करते जो अब सांगठनिक तौर पर निष्क्रिय हो चुके हैं। दरअसल इस देश में वामपंथी संस्कृतिकर्म की जितनी धाराएं हैं, सबके साथ कुबेर जी का बेहद अंतरंग नाता रहा। जो भी किसी किस्म के एक्टिविज्म में लगा होता था, वह उसे बेहद चाहते थे। विचारों में वह काफी लचीले थे और अपनी संस्कृति और परम्‍परा के प्रति छत्तीस का संबंध रखने वाले मार्क्सवादियों को कतई पसंद नहीं करते थे। उन्हें एक ओर विवेकानंद पसंद थे तो दूसरी ओर भगतसिंह। हंसराज रहबर को तो वह अपना गुरु ही मानते थे। कम्युनिस्ट राजनेताओं और लेखकों की सत्तापरस्ती और समझौतापरस्ती से उन्हें बेहद घृणा थी। निजी बातचीत में वह कई नामवर लेखकों के प्रति अपना रोष जाहिर करते रहते थे। उनका यह क्षोभ, गुस्सा और शिकायत उनकी कविताओं में अनेक जगहों पर अभिव्यक्त हुआ है।
दूरदर्शन के लिए बनाए गये कार्यक्रमों में भी उनकी जनपक्षीय प्रतिबद्धता साफ तौर पर जाहिर होती है। वह सारे कार्यक्रम हमारी सांस्कृतिक थाती हैं। उन्होंने अपने समय की अनेक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक गतिविधियों और सक्रियताओं को दर्ज किया। उन कार्यक्रमों पर तो अलग से बात होनी चाहिए। विडम्‍बना देखिए कि जो शख्स कैमरा टीम लेकर जगह-जगह भागता रहा, उसकी विदाई के वक्त दूरदर्शन के अधिकारी तो थे, लेकिन दूरदर्शन का एक भी कैमरा नहीं था। कुबेर दत्त ने जो हजारों चित्र बनाए हैं, उनका भी मूल्याँकन अभी बाकी है। उन्होंने अपने लेखक और सम्‍पादक मित्रों को अपनी पेटिंग बिना किसी कीमत के दी, हाँ, उसके बदले सिर्फ उनका स्नेह चाहा। उनके चित्रों से कई किताबों और पत्रिकाओं के आवरण बने। ‘काल काल आपात’, ‘कविता की रंगशाला’, ‘केरल प्रवास’, ‘धरती ने कहा फिर’ और ‘अंतिम शीर्षक’ नामक कविता संग्रहों में मुक्तिबोध, नागार्जुन, धूमिल, शमशेर आदि तमाम कवियों की परम्‍पराएं नजर आती हैं। अपने समय का पतन, संकट, खौफ, अवसाद, युगुप्सा, विक्षोभ और मुक्ति की एक तड़प है उनमें। ‘भाषा’ और ‘कविता‘ शब्द अनेक बार उनकी कविताओं में आता है। उनकी एक कविता की पंक्ति है- मैं अपनी भाषा में/मुक्त होना चाहता हूँ। कवियों को संबोधित जितनी रचनाएं और जितनी पंक्तियाँ उन्होंने लिखीं, शायद उनके समकालीनों में किसी ने नहीं लिखा है।
वह ऐसे थे जिनसे आप इस हद तक प्रेम कर सकते थे कि उनसे किसी हद तक जाकर लड़ सकते थे, वह ऐसे थे जिन्हें भीषण लड़ाई के बाद भी उतनी ही शिद्दत से चाह सकते थे। पाक-विद्या और खिलाने-पिलाने के उनके किस्से तो जगजाहिर ही हैं। उनकी दुनिया में प्यारी बिल्लियों और बिल्लों की भी एक भरी-पूरी दुनिया मौजूद थी, जिनके करतब तो वही जान सकता है, जो कभी उस संसार में दाखिल हुआ है। आज सब उदास हैं।

शेखर जोशी-कहा बापुरो इंद्र! विश्‍वनाथ त्रिपाठी


कथाकार शेखर जोशी
‘दाज्‍यू’, ‘कोसी का घटवार’, ‘बदबू’ और ‘आशीर्वचन’ जैसी कालजयी रचनाओं के लेखक शेखर जोशी 10 सि‍तम्‍बर को 80 वर्ष के हो गये हैं। इस अवसर पर वरि‍ष्‍ठ आलोचक वि‍श्‍वनाथ त्रि‍पाठी का संस्‍मरण-
शेखर जोशी को मैंने पहली बार देखा तो वे अमरकांत के ही साथ थे। अनुमानत: 1956 या 57 का बात होगी। काशी विश्‍वविद्यालय में एम.ए. फाइनल में रहा हूंगा या रिसर्च ज्वाइन करने की तैयारी में। मेरे मित्र थे अक्षोभ्येश्‍वरी प्रताप, जो बहुतों के मित्र थे। भारत के सीमावर्ती नेपाल क्षेत्र के समृद्ध ब्राह्मण जमींदार के घर के। एक मकान गोरखपुर-बेतिया हाता में। चलते-पुर्जे। बढ़-चढक़र बोलने वाले। विजयमोहन सिंह के साथी। कहानियाँ लिखते थे। साहित्यकारों से मेल-जोल बढ़ाने में माहिर। कालांतर में दूरदर्शन में उच्च पदाधिकारी- शायद समाचार सम्‍पादक हो गये थे। तब यानी विद्यार्थी जीवन में बिड़ला हॉस्टल में रहते थे। उन्हीं के कमरे में अमरकांत और शेखर जोशी मिले। अक्षोभ्‍येश्‍वरी प्रताप ही मुझे भैरव जी (भैरव प्रसाद गुप्त) के घर ली ले गये थे। इन दोनों का नाम मैंने सुन रखा था। अक्षोभ्येश्‍वरी ने रोब जमाने हुए कि इलाहाबाद के मशहूर साहित्यकारों से उनका रब्त-जब्त है, मुझसे कहा- ये हैं शेखर जोशी और ये हैं-अमरकांत। मिलिए। कल रात को मेरे कमरे में ही थे। मेरे ऊपर यथोचित प्रभाव पड़ा। शेखर जोशी बिल्कुल किशोर लगते थे। देखनउस। नाजुक सुंदर। अच्छे अमरकांत भी लगते थे। वे किशोर नहीं युवक लगते थे। मुझे याद है, मैंने कहा- अमरकांत की कहानी पढ़ी है और शेखर जोशी की फोटो पत्रिका में देखी है। अमरकांत ने चुटकी ली। हँसते रहे। मैंने गौर किया कि शेखर जोशी इस पर दब कर शर्माए नहीं। सहज बने रहे। मुझे लगा कि यह बाहर से देखनउस किशोर अंदर से मजबूत हैं।
इलाहाबाद मैं बहुत जाता था। 1956 में मेरी शादी इलाहाबाद में ही हुई। सबसे ज्यादा भेंट मार्कण्डेय से होती थी। क्योंकि मिंटो रोड मेरी ससुराल से बहुत नजदीक थी। एक बार मार्कण्डेय ने बताया- हम लोग बैठे थे। बालकृष्ण राव आये। सब लोग उठ पड़े। शेखर बैठा रहा। मैंने चुपचाप नोट किया- यह भी अंदर की मजबूती की ही बात है। राव साहब ने ऐसा कुछ किया होगा, वरना शेखर किसी को सम्मान देने में कभी पीछे नहीं रहते। और सम्मान देना वही जानता है, जो अपमाननीय व्यक्तियों का अपमान करना भी जानता हो। यह दृढ़ता महंगी है। कसाला करना पड़ता है। ‘दाज्यू’ की दृढ़ता उसकी वैचारिक एवं जातीय दृढ़ता है। जगदीश्‍ बाबू को देखते ही मदन पर जाता था। जगदीश बाबू के रौब-दाब या टिप पाने के लिये नहीं। मदन का पता चला कि जगदीश बाबू डोटा लाग्यों गाँव के निकटवर्ती गाँव के रहने वाले हैं, तो उसे इतनी खुशी हुई कि संभालता न तो ट्रे उसके हाथों से छूट पड़ती। इसी को आत्मीयता कहते हैं। यह आत्मीयता तोड़ी जागदीश के ‘बाबूपने’ ने। वे इसे संभाल नहीं पाए। उनमें वैसी आंतरिक दृढ़ता नहीं थी। आत्मीयता का प्रतीक रिश्ता था- ‘दाज्यू’ होना। जब उन्होंने ‘दाज्यू’ होने से इन्‍कार किया तो मदन की आत्मीयता अपने आप टूट गई। तुम अगर दाज्यू नहीं तो मेरे कुछ नहीं हो सकते।

आलोचक वि‍श्‍वनाथ त्रि‍पाठी
पात्र रचनाकारों के आत्मीय होते हैं। चारित्रिक दृढ़ता विवेक से आती है। विवेक सकर्मकता के बिना सार्थक नहीं होता।
शेखर की एक कहानी है ‘हलवाहा’। विपत्ति के समय लोग अपनी गृहणी से सलाह-मशविरा करते हैं लेकिन जीवानंद का स्वभाव इसके ठीक विपरीत था। जितनी ज्यादा विपत्ति उस पर पड़ती, वह अंतर्मुखी होता जाता था। गृहणी उसकी मन:स्थिति को समझ रही थी लेकिन कुछ कहने का साहस उसे नहीं होता था।
जीवानंद ने गोठ में घुसकर अपने बैल को थपथपाया। बहुत दिनों बाद उसने इतने ध्यान से अपने इस पशु को देखा था। स्वयं जीवानंद को आश्‍चर्य हुआ कि उसने गाय के अतिरिक्त और किसी पशु की ओर कभी इतना ध्यान ही नहीं दिया था। मालिक का दुलार पाकर खैरा जुलाली करता हुआ टुकुर-टुकुर उसे ताकने लगा, जैसे कह रहा हो- तुम जो कहो, मैं करने को तैयार हूँ।
बैल के बाद जीवानंद गोठ की दीवार पर टंगे हल को देखता है। जीवानंद ब्राह्मण है। ब्राह्मण हल नहीं पकड़ते। अवर्ण हलवाहे छोटे ब्राह्मण किसान जीवानंद का मखौल उड़ाते हैं। कहानी में जीवानंद को हल के बारे में सोचते, बहुत कुछ याद करते चित्रित किया गया है। जीवानंद को निश्‍चय करना है कि वह खेत बेचकर छोटी किसानी से छुट्टी ले कि नहीं। खेत को बिकवाने के लिये दलाल उसे घेरे हैं।
फिर कहानी की घटना- सरणि में अवकाश (स्पेस) है। उसके मन में क्या चल रहा है, यह बिल्कुल नहीं बताया जाता। ऐक्शन भी नहीं वर्णित है। सिर्फ सूचना है। शेखर जोशी द्वारा दी गई सुचना पढऩे के पहले यह जान लेना जरूरी है कि बद्री प्रधान खेत खरीदने की ताक में रहने वाले छद्म हितैषी हैं और पदम जीवानंद से बहाने बनाने वाला अवर्ण हलवाहा।
दूसरे दिन सुबह तडक़े ही अपने आंगन के द्वार पर खड़े बद्री प्रधान ने एक नजर नदी किनारे के अपने खेतों पर डाली। उनका हलवाहा अभी खेत में नहीं पहुँचा था लेकिन बगलवाले जीवानंद के खेत में जुताई शुरू हो गई थी। उन्हें यह सोचकर थोड़ी निराशा हुई कि जीवानंद ने पदम को आखिर राजी कर ही लिया है। बद्री प्रधान अपनी उत्सुकता नहीं रोक पाये। टहलते-टहलते नदी की ओर चले गये। जो कुछ उन्होंने देखा उसे देख कर उन्हें सहसा विश्‍वास नहीं हुआ और क्रोध, घृणा तथा ग्लानि के कारण उनका सारा शरीर काँपने लगा। कुलघातक जिबुआ स्वयं हल चला रहा था। फाल की टेढ़ी-मढ़ी लकीरें उसके नौसिखुआपन की गवाही दे रही थीं।
जीवानंद के चरित्र में स्वाभिमान के साथ सांस्कृतिक शिष्टता है। स्थितियों का चुपचाप जायजा लेना- दुखों के दागों को तमगा न बनाना और करुणा की याचना न करना। अपने दुख में दूसरों को शरीक न करना, चुपचाप निर्णय लेना और उसे चुपचाप कार्यान्वित करना। शेखर जोशी की आंतरिक दृढ़ता का उनकी सांस्कृतिक शिष्टता से गहरा संबंध है।
मैंने उन्हें उत्तेजित होते कभी नहीं देखा। शब्दों का अपव्यय करते- न वाचन में, न लेखन में देखा। कहते हैं कि सुंदरता किसी तरह के ‘अतिरिक्त’ (सरप्लस) को सहन नहीं कर सकती। आवश्यकता से अधिक यानी बड़बोलापन उनमें है ही नहीं। यही उनकी सुंदरता का कारण और रहस्‍य है। एक खास तरह की सहज प्रसन्नता, मुदित भाव उनमें है, जो वस्तुत: बहुत महंगा सौदा है।
शेखर जोशी को नौकरी, पुरस्कार, सम्मान के लिए जुगाड़ करते किसी ने नहीं देखा। 109 लूकरगंज भैरव प्रसाद गुप्त का पता था। 100 लूकरगंज शेखर का। जब भैरव जी कुछ दिनों के लिए दिल्ली आ गये ‘नई कहानियाँ’ का सम्‍पादन करने, तब 109 में शेखर जी आ गये। भैरव जी दिल्ली से वापस चले आये, तब शेखर फिर 100 लूकरगंज में लौट गये। दोनों किराये के मकान। शेखर जोशी ने अपना पता मुझे देते हुए कहा- भैरव जी का पता मालूम है न। 109 लूकरगंज। उसमें से फालतू अंश निकाल दो तो मेरा पता हो जायेगा। भैरव, मार्कण्डेय, शेखर और अमरकांत में कितनी पटरी बैठती थी! इस चतुष्टयी ने हिन्‍दी कहानी का इतिहास रचा है। इस पर तो अलग से बातचीत होनी चाहिए। मैं भैरव जी के यहाँ जाता तो या तो शेखर वहाँ आ जाते या भैरव जी मुझे शेखर के यहाँ ले जाते। शेखर के यहाँ जाता तो वे अकसर मुझे अमरकांत के यहाँ ले जाते। भैरव जी ने बेनीगंज में मकान बनवाया। वहाँ मुझे पहली बार शेखर ही ले गये। भैरव जी मुझसे नाराज हो गये थे। इसलिए मैं उनसे मिलने में हिचक रहा था। शेखर ने कहा, ‘चलिए, वे कुछ नहीं कहेंगे। आपके आने से वे खुश ही होंगे।‘ मैं भैरव जी के यहाँ गया और रूहअफजा का शर्बत पीने को मिला।
भैरव जी जिससे नाराज होते थे पानी तक नहीं पूछते थे। घर से भगा भी देते थे। एक बार मेरा ऐसा ही स्वागत हो चुका है उनके यहाँ। तब भी शेखर मुझे 109 लूकरगंज ले गये थे। भैरव जी ही मिले। हालचाल पूछा। लेकिन आध घंटा बीतने पर भी कुछ नहीं आया तो शेखर ने ही कहा,  ‘अरे भैरव जी, वे दिल्ली से आये हैं। कुछ पानी, चाय।’ भैरव जी ने कहा, ‘ये तुम्हारे यहाँ से पी आये होंगे।’
मैं उनके पुत्र बबुआ की शादी में नहीं गया था इसी से वे नाराज थे।
भैरव जी जब दिल्ली आये तो उन्हें रहने के लिये सी ब्लॉक मॉडल टाउन में किराये के मकान की व्यवस्था हुई। शेखर दिल्ली आये तो हम और वे भैरव जी का घर ढूँढ़ने निकले। सी ब्लॉक तो पहुँच गये लेकिन मकान नम्‍बर शेखर को ठीक से नहीं याद था। फिर भी हम अनुमान से मकान ढूँढ़ते रहे। लगभग एक घंटे तक ढूँढ़ने पर भी मकान नहीं मिला। हम निराश होकर लौट पड़े। लौटते समय एक मकान को गौर से देखने के बाद शेखर बोले, ‘रुकिए रुकिए, यही मकान भैरव जी का होगा।’ दरवाजे पर एक बहुत पुराने किस्म का ताला लगा था जिसमें कलछुल जैसी लम्‍बी चाभी डालकर उसे खोला जाता था। शेखर ने कहा, ‘इस ताले को मैं पहचानता हूँ। यही 109  लूकरगंज में भी लगता था। भैरव जी वही ताला यहाँ ले आए हैं। नेम-प्लेट की जरूरत नहीं पड़ेगी। यह ताला तो नेम-प्लेट का भी काम करता है।’
शेखर जोशी कम बोलते हैं। मुस्कराते थोड़ा ज्यादा हैं। जिस स्थिति में लोग 20-25 मिनट तक बोलें, उस स्थिति में शेखर सिर्फ कैंची मुस्कराहट से काम लेते हैं। जब वे मुस्कराएं और साथ में चुटकी से राख झाडक़र सिगरेट का कश मारें तब समझ जाइए। (गनीमत है कि अब सिगरेट करीब-करीब छोड़ चुके हैं।) एक बार उनकी मुस्कराहट का फल भोग चुका हूँ। हुआ यों कि दूधनाथ सिंह ने मुझे कविता सुनाने के लिये घर पर निमंत्रित किया। उन्‍होंने ‘कृष्णकांत’ नामक कविता लिखी थी, सम्‍भवत: श्रीकांत वर्मा पर। कहा कि वे भैरवजी के यहाँ से मझे ले लेंगे। दूधनाथ जी को मैं वामंपंथी के रूप में नहीं जानता था। सो भैरव जी से उनका सम्‍पर्क देखकर मैने सचमुच प्रसन्नतापूर्वक कहा- अच्छा, क्या अपने कोई वाम विचार को कविता लिखी है? लेकिन पता नहीं क्यों, शेखर यह सुनकर मुस्करा दिये। बस, मेरी अभिधा ने नया अर्थ ग्रहण कर लिया। बहरहाल, मुझे उस दिन दोपहर का भोजन तो नहीं मिला, एक लम्‍बा पत्र मिला आतिथेय का। अपनों से असहमति या क्षोभ प्रकट करने का तरीका है!
तब भैरव जी की अश्क से गहरी छनती थी। और शेखर तो भैरव मंडल के सनातन सदस्य। उपेंद्रनाथ अश्क पर एक संस्मरणात्मक टाइप की पुस्तक निकली और जैसा कि होना ही था, अश्क के अनेक रंगीन चित्रों के साथ। शेखर उसमें लिखने का आग्रह नहीं टाल सकते थे। और शेखर ने अश्क पर लिखा। उनके लेख का शीर्षक अश्क की ही एक काव्य पुस्तक से लिया गया था-  ‘मैं चिरका चला’। अश्क की पंक्ति भी यही थी। अंतर केवल ‘चिरका’ और ‘चिर का’ में था।
यहाँ होठों की नहीं कलम की मुस्कान है।
शायद यह मेरे अपने कुटिल मन की लहर हो लेकिन मुझे ‘वर्ष’ में अमरकांत पर लिखे गये लेख का शीर्षक भी कुछ ऐसा ही दिखलाई पड़ता है। अमरकांत होली पर ‘जरि गइले एरी से कपार’ गाते थे। यही शीर्षक शेखर ने अमरकांत के लेख का दिया है। मुझे लगता है- ऐसा तो नहीं कि भैरव मंडली अमरकांत केंद्रित ‘वर्ष’ की योजना से बहुत खुश नहीं थी। खासतौर पर इसलिए कि उसे रवींद्र कालिया निकाल रहे थे। अमरकांत पर शेखर कैसे न लिखें। लेकिन शीर्षक?
आशा करता हूँ कि मेरा यह अनुमान गलत है।
सो शेखर जोशी दिखनउस हैं, प्रतिबद्ध हैं। मित्र-वृती हैं किंतु सपाट नहीं
हैं। काम भर के इलाहाबादी भी हैं और यह कि आप जो भी हों अपनी इच्छा से उन्हें चालित नहीं कर सकते। कांट बी टेकेन फार ग्रांटेड। चंद्रकलाजी से मेरी इस विषय पर बात नहीं हुई है लेकिन मेरा ख्याल है कि सामान्यत: संतुलित शेखर कभी-कभी अपना घोर जिद्दी रूप भी प्रकट करते होंगे।
स्वातंत्रयोत्तर भारत में मध्यवर्ग की संपत्ति में बढ़ोतरी हुई है। हममें से अधिकांश पहले से बेहतर आर्थिक स्थिति में हैं। इस बढ़ोतरी में हिस्सा सिर्फ तिकड़मियों, उठाईगीरों और अवसरवादियों को ही नहीं मिला है। सीधे-सादे ईमानदार लोगों को भी मिला है। निराला और मुक्तिबोध आज होते तो शायद उन्हें वैसी जिंदगी जीने के लिये विवश न होना पड़ता। नागार्जुन, त्रिलोचन उपेक्षित ही नहीं रहे, उन्हें सम्मान-पुरस्कार भी मिले। लेकिन बढ़ोतरी के लुटेरों में और इनमें अंतर है। अंतर कहाँ और किस बात में है?
विचारधारा और प्रतिबद्धता के साथ उसकी आचार संहिता होती है। विधि-निषेध होते हैं। एक बार उत्तरी कोरिया के दूतावास की ओर से दिये गये भेज में गया। भोज ओबेराय में था। वहाँ पीने की भी व्यवस्था थी। मैंने भी एक-दो जाम लिये। अगले दिन पार्टी की ब्रांच मीटिंग में मुझे बताया गया कि भाकपा की आचरण संहिता में विदेशी दूतावासों के प्रीति भोज में शराब पीना निषिद्ध है। आम दुश्प्रचारकों की तरह में भी सोच रहा था कि पार्टी के लोग तो विदेशी दूतावासों में खूब शराब पीते हैं। सो प्रतिबद्धता की आचार संहिता जरूर होती है। कला अपने उत्पादकों और प्रशंसकों को यह संहिता जरूर देती है। कह कर न देती हों किंतु वह सामाजिक चेतना की जलवायु और मौसम में गंध की तरह रची-बसी रहती है। शेखर उन साहित्यकारों में हैं जो निहायत सहज एवं स्वाभाविक ढंग से साहित्य द्वारा दी गई आचार-संहिता का पालन करते हैं। नहीं तो यारों ने- साहित्यकारों ने पिछले अनेक दशकों में क्या-क्या जुगाड़ नहीं किये हैं। ‘अंधेरे में’ के जुलूस बिम्‍ब में मंत्री, उद्योगपति, सेना, पुलिस, गुंडे के साथ आलोचक, कविगण का होना यों ही नहीं। फैंटेसी का यथार्थ आधार है। मुक्तिबोध ने चमचमाते प्रकाश में सुंगधित ईमान की बात की है। और शेखर जोशी की कहानी है ‘बदबू’। यह बदबू कला की नैतिकता का प्रतीक है। जब तक इस बदबू का बोध है, तब तक साहित्यकार की अग्नि जीवित है। शोषक की पूँछ से बांधने वाली रस्सी से अपने को काटकर अलग करने की क्षमता की प्रतीक यह बदबू है।
देखने की बात यह है कि शेखर जोशी ने ‘बदबू’ कहानी लिखी तो उसके अहसास बोध को बनाए रखा। इसी को पूर्ण कलाकार होना कहा जाता है। अब यह न पूछिए कि इस अहसास को बनाये रखने के लिये क्या-क्या करना पड़ता है। और कहीं ज्यादा जरूरी यह जानना है कि क्या-क्या नहीं करना पड़ता।

मध्यवर्गीय ईमानदार लेखक के मन में छोटी-छोटी सुविधा इच्छाओं से उसके आदर्श का निरंतर युद्ध होता है। स्वाधीन भारत में सुविधाएं बढ़ी हैं, चारों तरफ बढ़ी हैं, उन्हें हथियाया गया है। जो लोग इन सुविधाओं को गांजने में सफल हुए हैं, वे पदासीन हैं। उनके बंगलों में गाड़ि‍यां हैं, कुत्ते हैं, बच्चे हैं जो या तो ड्रग्स से आदी हैं या अमेरिका में हैं, प्रेमिकाएं हैं। पुस्तकों के लोकार्पण होते हैं,  सेठों-मंत्रियों की उपस्थिति में उनके सम्मान समारोह होते हैं। साक्षात्कार में पूछा जाता है- देश में सूखा है, सांप्रदायिक दंगे हैं, आपकी क्या राय है? तो वे मुँह बिचका देते हैं। कहते है, ‘‘हम चुप रहेंगे। हमारी कृतियाँ देखो।’’
होंगे ये कुछ लोगों के लिये ईर्ष्‍या के पात्र। इनसे ईर्ष्‍या वे करते होंगे जो इन्हीं की बिरादरी के किंतु असफल लोग हैं। मौका पाते ही ये सब हथिया लेने की फिराक में रहते हैं। कहा भी है :
जहाँ आप पहुँचे छलांगें लगा कर
वहाँ मैं भी पहुँचा मगर धीरे-धीरे।
शेखर जोशी जैसे लोग इन सफल लोगों पर मुँह बिचका कर हंसते हैं।
जो तुम्हारा अन्न है मेरे लिये विष है,
और जो मेरा विष है वह तुम्हारा अन्न है।
यह सब लिखने से एक साहित्य नायक जैसे रोमानी संघर्ष पुरुष का जो चित्र बनाता है, शेखर जोशी की मुद्राएं बिल्कुल उससे भिन्न और विपरीत हैं। जिस संघर्ष पुरुषत्व की बात की जा रही है, वह उनके साहित्य और व्यक्तित्व की अंतर्वस्तु है, रूपमुद्रा नहीं।
और यह रूपमुद्रा विहीनता प्रगतिशील जनवादी साहित्यकारों की विशेषता है। साहित्यिक मुद्राओं से रहित सहज व्यक्तित्व। आत्ममुग्धता और आत्मश्रंगार से दूर। नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन, शमशेर, शील, भैरवप्रसाद गुप्ता, अमरकांत, हृदयेश, इजरायल आदि ऐसे ही हैं। शेखर भीड़ में अकेले नहीं हैं। उनके व्यक्तित्व और साहित्य में निजता भी हो यह अलग बात है। यह निजता महत्वपूर्ण है। नागार्जुन, केदारनाथ, त्रिलोचन, मुक्तिबोध, शमशेर सब प्रगतिशील हैं लेकिन इनकी कविताओं में निजता है। मुझे कबीर, तुलसी, सूर, मीरा याद आते हैं, निराला, प्रसाद, पंत, महादेवी याद आते हैं- जो एक ही साहित्यिक आंदोलन के थे, लेकिन उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के तेवर अलग हैं।
शेखर की पटरी सबसे ज्यादा अमरकांत से बैठती है। लेकिन उनकी कहानियों के स्वर बिल्कुल अलग हैं। अमरकांत निम्न मध्य वर्ग और निम्न वर्ग के काइयाँपन, निरीह मूर्खता के उद्घाटक हैं, तो शेखर उसी वर्ग की टूटती हुई आस्था को जैसे पात्र में निहित विवेक की शक्ति से जोड़ते हैं। इस जोड़ में रोमान, आदर्श कम, सामान्य भारतीय का विवेक और उसकी व्यावहारिक बुद्धि है। रोमानी पात्र असामान्य होते हैं। वे लाखों में एक होते हैं। लेकिन रोमान आदर्श असंख्य, सामान्य न चमकने वाले व्यक्तियों में भी होता है। शेखर उनको प्रस्तुत करने वाले कथाकार हैं। ये पात्र संकटों से अपने ढंग से लड़ते हैं और उन्हें पार करने का रास्ता भी ढूँढ़ लेते हैं। शेखर की कहानियों में ये न चमकने वाले पात्र कृतिम चकाचौंध को मलिन कर देते हैं। यह निम्नमध्यवर्गीय और निम्नवर्गीय जीवन की सहजता और श्रम मूल्यों की खोज और स्थापना है- ‘डांगरी वाले’, ‘चिडुआ’ जैसी कहानियों में इसे देखा जा सकता है। शेखर के वृद्ध पात्र हिन्‍दी कथा-साहित्य में अनुपम हैं। स्वतंत्रता के उपरांत जिस द्रुति से जीवन और उसके संबंध बदले हैं, उसकी चोट व्यतीत हुए पात्र कैसे झेल रहे हैं- इसे शेखर जोशी से ज्यादा हिन्‍दी के किसी कथाकार ने नहीं समझा और चित्रित किया है।
गतकालिक संबंधों में जी रहे पात्रों को पुराने संबंधों-संदर्भों में फिर से जीने की छटपटाहट उनकी व्यथा को और मार्मिक बना देती है। उन्हें महाकाल के सामने असहाय खड़ा कर देती है। कहानीकार उस असहायता को अपनापा, सम्मान और करुणा देता है, जिसमें थोड़ा विनोद भी होता है। वृद्धजनों पर लिखी हुई शेखर की कहानियों में विभिन्न कोणों और बोधों के अनेकानेक संश्‍लेष हैं। वे सब मिलकर इन कहानियों की अंतर्वस्तु को जटिलता देते हैं और यह संश्‍लि‍ष्‍ट जटिलता रूप की सहजता का आधार है। ऐसी कहानियाँ राजेंद्र यादव जैसे भूतपूर्व कथाकार नहीं लिख सकते। लिख पाते तो शेखर जोशी को उचित से अधिक मूल्यांकित कहानीकार न कहते।
रचनाकार अपनी रचना में जीता है, अपने पात्रों में जीता है- एक सीमा तक। वह अपनी रचना से स्वतंत्र नहीं होता। रचना में मुक्ति पाने का मतलब- रचना में मन, प्राण का वास करना होता है- यह सब छद्म रचनाकारों को छद्म लगता है लेकिन रचना केवल पाठकों को जीवन नहीं देती, अपने रचयिता को भी देती है।
मैंने शेखर को गम्‍भीर क्षुब्ध तो देखा है, दीन-हीन या ईर्ष्‍यादग्‍ध कभी नहीं देखा। छोटे-से-छोटा पुरस्कार मिलगया तो उसे चुपचाप ग्रहण कर लिया। दूसरों को बड़ा पुरस्कार, सम्मान, नाम मिला तो भी सहज, प्रसन्न, अविचलित। एक बेटी, दो बेटों, पत्नी और अनेक मित्रों, रिश्तेदारों को अपने लेखकीय, गैर लेखकीय अपनापे में समेटे शेखर जोशी किसी मित्र, रिश्तेदार, लेखक की किसी मामूली सी घटना पर मनोयोगपूर्वक घंटों बातें कर सकते हैं- उनकी कोई रिश्तेदार मौसी हलुआ कैसे बनाती हैं, किसी के यहाँ रोटी में कोई खास बात कैसे पैदा हो जाती है, कभी कभार समझा भी देंगे कि चूँकि बात कुमायूँ गढ़वाल की है, आप ठीक से नहीं समझ सकते।
मैं उनके घर बैठा बात कर रहा था कि एक लडक़ी नल से पानी भरते दिखलाई पड़ी। वह किसी से बात भी कर रही थी, पानी भी भर रही थी- शेखर लगभग एक घंटा मुझे बताते रहे कि इस दृश्य को अमरकांत किस तरह लिखते। भैरव जी को पश्‍चि‍म बंगाल की सरकार ने कोई पुरस्कार दिया। वे अपने पोते को लेकर सम्मान ग्रहण करने गये। वहाँ का ब्यौरा विस्तार से दिया।
नागार्जुन की एक प्रेम कथा का वर्णन मौका मिले तो उनसे जरूर सुनिए। नागार्जुन कमरे में हैं- ऊपर कमरे में युवक लेखक और प्रेमिका धमाचौकड़ी मचा रहे हैं। नागार्जुन कहते हैं- बेटी, मैं उपन्यास लिख रहा हूं। फिर मार्कण्डेय के किस्से। लेकिन सभी में मित्रों के प्रति कोई द्वेष नहीं, दुराव नहीं। ईर्ष्‍या तो उनके पास फटकी ही नहीं। मैं उनकी इस चारित्रिक विशेषता, दृढ़ता से अभिभूत रहता हूं। सोचता हूँ आंतरिक तौर पर इस आदमी में बहुत आत्मविश्‍वास होगा। यानी इसे अपने समाज और साहित्य परम्‍परा पर विश्‍वास होगा, जिससे जुड़ा है- कहा बापुरो इंद्र!
(भारतीय लेखक, जनवरी-मार्च 2003 में प्रकाशि‍त)

त्रिलोचन.. .उर्फ त्रिलोचनजी के भाई! : प्रकाश मनु


हिन्दी साहित्य की प्रगतिशील काव्यधारा के प्रमुख हस्ताक्षर कवि‍ त्रि‍लोचन पर कथाकार प्रकश मनु का संस्‍मरण-
त्रिलोचनजी से मुलाकात हुए कई महीने हो चुके थे। दोस्त चित्रकार हरिपाल त्यागी के साथ मैं यमुना विहार वाले उनके निवास पर मिलने गया था और उस लम्‍बी और अनोखी मुलाकात का पूरा हाल मैंने विस्तार से ‘पहल’ में लिखा भी था। यह अजब संजोग है कि ‘त्रिलोचनजी के भाई’ से मेरी एक गजब की मुलाकात भी हरिपाल त्यागी के साथ ही हुई— उनके घर में। बल्कि कहना चाहिए कि हरिपाल त्यागी ने ही प्रसन्नता से चहकते हुए उनसे मेरी मुलाकात कराई थी, ‘‘इनसे मिलिये, आप हैं त्रिलोचनजी के भाई।’’
मैं कुछ कौतूहल, कुछ विस्मय, कुछ झिझक के साथ ‘उनसे’ मिला। सफाचट दाढ़ी वाले कुछ श्याम वर्ण के थे वे सज्जन, जिन्हें त्रिलोचनजी का भाई बताया जा रहा था। मन में कहीं एक हल्की खुदबुद भी थी, ‘अच्छा, त्रिलोचनजी के कोई भाई भी हैं, मैं तो जानता ही न था। धन्य हैं चित्रकार श्री हरिपाल त्यागी, जिनकी वजह से उनसे मिल पा रहा हूँ।’
मेरे लिये यह एक आनंददायक दिन था और मैं उस एक और प्रसन्न दिन की स्मृतियों में खोया जा रहा था, जब त्रिलोचनजी से मेरी मुलाकात हुई थी। मन ही मन दोनों की तुलना भी चल रही थी—त्रिलोचनजी के यहाँ सफेद दाढ़ी का लहलहाता जंगल था और त्रिलोचनजी के भाई पूरी तरह दाढ़ी मुँड़ाए हुए। जैसे अभी-अभी शेव करके आए हों। दोनों की शक्लें काफी कुछ मिलती हैं, लेकिन त्रिलोचनजी के भाई कुछ छोटी उम्र के लगते हैं। पाँच-सात साल तो जरूर छोटे होंगे त्रिलोचनजी से, या हो सकता है, दस-बारह साल छोटे हों।
दोनों के व्यक्तित्व की आधारभूत रेखाओं पर गौर करता हुआ, मैं मन ही मन हिसाब लगा रहा था।
त्रिलोचनजी से हुई पहली मुलाकात ने उनसे मिलकर बात करने की तेज इच्छा और अतृप्ति और बढ़ा दी थी। मैं त्रिलोचन जी से मिलने के लिए व्यग्र था। हरिपाल त्यागी यह जानते थे। लिहाजा उन्होंने अपने नये चित्र देखने के लिये सादतपुर निमंत्रित किया तो साथ ही जोड़ दिया, ‘‘इन दिनों अकसर त्रिलोचनजी भी घूमते-घामते आ जाते हैं, क्योंकि पास ही उनका निवास है। हो सकता है,  उनसे भी आप की मुलाकात हो जाये।’’ तो मैं त्रिलोचनजी से मिलने की एक अव्यक्त इच्छा लिये हुए ही सादतपुर आया था।
‘‘चलो त्रिलोचनजी न सही, उनके भाई से ही मुलाकात हो गई।’’ मैं मन ही मन मगन था।

2

लेकिन त्रिलोचनजी के भाई से वह अद्भुत मुलाकात हुई किस ढब से—इसका जिक्र तो भूल ही गया। चलिए, अब बताता हूँ। वह रंगमंच, जिस पर त्रिलोचनजी के भाई ने प्रवेश किया था, कुछ यूँ था कि हरिपाल त्यागी के घर के आँगन में उनकी तमाम चित्रकृतियाँ कतार में लगी हुई थीं और उन पर त्यागीजी से मेरा गहन वार्तालाप चल रहा था। त्यागीजी ने एक-एक कर अपनी सारी नई चित्रकृतियों को बाहर ला-लाकर बाकायदा उनकी प्रदर्शनी-सी लगा दी थी और हम एक-एक चित्र पर घंटों माथापच्ची कर रहे थे। त्यागीजी एक-एक चित्र पर मेरी राय पूछते, फिर अपना ‘आइडिया’ बताते, फिर अपने-अपने रिफ्लेक्सेज पर जोर देते हुए हम एकबारगी बहस में उलझ जाते। इस तरह की पेचीदा स्थिति थी। याद पड़ता है, युवा कथाकार संजीव ठाकुर भी उस दिन साथ था और हम दोनों मिलकर त्यागीजी का एक लम्‍बा इंटरव्यू करने की फिराक में थे।
इस बीच ‘उन’ का आगमन हुआ था। वे, जो त्रिलोचनजी के भाई थे और बड़े अनौपचारिक ढंग से अचानक टहलते-टहलते रंगमंच में दाखिल हुए थे। कुछ देर वे चुपचाप त्यागीजी की वक्तृता सुनते रहे, फिर मेरी तरह वे भी ‘खेल’ में शामिल हो गये। यानी उन चित्रकृतियों पर अपनी राय बताने लगे और चित्रकार से उसके खास मंतव्य या आइडिया को लेकर बातचीत करने लगे। हरिपाल त्यागी, जैसी कि उनकी आदत है, हर चित्र पर हमें दिमाग लड़ाने और राय प्रकट करने की काफी खुली छूट दिये जा रहे थे। और हमारी बातों की कहीं ताईद करते, कहीं काटते भी जा रहे थे। उन्हें हक था, वे उस रंगमंच पर चित्रकला के ‘प्रथम पुरुष’ यानी सूत्रधार की हैसियत से विद्यमान जो थे।
मैंने देखा त्रिलोचनजी के भाई भी आहिस्ता-आहिस्ता, लेकिन बड़े उत्साह से अपनी टिप्पणियाँ दिये जा रहे हैं और कुछ इस ढंग से कि कला की उनकी गहरी समझ प्रकट होती थी।
‘‘अच्छा, चित्रकला में इनकी भी अच्छी रुचि है, ठीक त्रिलोचनजी की तरह।’’ मुझे सुखद आश्‍चर्य हुआ।
लेकिन अब एक दिक्कत आने लगी। उन चित्रकृतियों पर मेरी राय और त्रिलोचनजी के भाई की राय अकसर नहीं मिलती थी। मुझे चित्रों में तीखे कंट्रास्ट, कठोर आघात, परुषता और तीव्र गत्यात्मकता या शक्तिशाली रेखाएँ ज्यादा आकर्षित कर रही थीं, जबकि त्रिलोचनजी के भाई को शायद थिराई हुई रेखाएँ और प्रकृति के शांत चित्र ज्यादा भा रहे थे। बार-बार मैं बड़े हड़बडिय़ा उत्साह और कठोरता से उनकी बात काटकर अपनी बात आगे कर देता। वे चुपचाप सुन लेते या मुसकराकर रह जाते, लेकिन बात का जवाब नहीं देते थे।
मैं उनकी विनय को आसानी से अपनी जीत समझकर तना जा रहा था।
‘‘हम त्रिलोचनजी की इज्जत करते हैं तो क्या जरूरी है कि उनके भाई की भी हर बात माननी होगी?’’ मैंने अभिमान से भरकर सोचा और उनकी बातों को और अधिक तीखेपन से काटने लगा।
दो-तीन बार यह हुआ तो त्यागीजी चौंके। उन्होंने कोई ‘छिपा हुआ संकेत’ देना चाहा,  जिसे ग्रहण करने से मैंने पूरी बदतमीजी और उजड्डता से इनकार कर दिया और अपनी दबंगी और रोब बराबर कायम रखा। यहाँ तक कि त्रिलोचनजी के भाई ने मेरी ‘कलाभिरुचि’ की दो-एक बार दाद दी कि, ‘‘नहीं-नहीं, आप ही ठीक हैं।…मने मनुजी में कला की अच्छी समझ है।’’
मेरा गुब्बारा थोड़ा और फूल गया, लगभग फूटने की हद तक। इस बीच त्यागीजी ने सूचना दी कि कुछ युवाओं द्वारा पड़ोस की बस्ती में एक गम्‍भीर प्रयोगधर्मी नाटक किया जाने वाला है, जिसमें ‘दो शब्द’ त्रिलोचनजी के भाई कहेंगे और वही अध्यक्षता भी करेंगे। पता यह भी चला कि यों तो यह अध्यक्षता त्रिलोचनजी को करनी थी, पर वे आ नहीं सके, तो त्रिलोचनजी की जगह उनके भाई ही सही। मैंने मन ही मन झुँझलाहट महसूस की, ‘‘क्या त्रिलोचनजी के भाई उनके ‘डमी’ हैं जो उन्हें त्रिलोचनजी की जगह अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठाया जा रहा है? त्रिलोचनजी नहीं आ सके, तो क्या इन नाटक वालों को और कोई ढंग का आदमी नहीं मिला जो कला, संस्कृति, नाटक-वाटक की अच्छी समझ रखता हो!’’
खैर, इतने में मालूम पड़ा, भोजन तैयार है। समय पर नाटक देखने पहुँचना है तो जल्दी से भोजन कर लिया जाये। हम लोग भोजन के लिये बैठे, थालियाँ आईं तो भोजन के साथ-साथ चर्चा का विषय अब भी त्रिलोचनजी ही बने हुये थे। त्यागीजी सूचना देते हैं कि, ‘‘त्रिलोचनजी एक साथ बीस-पचीस तक रोटियाँ मजे में खा सकते हैं, और न खाएँ तो हफ्ता-हफ्ता भर बगैर अन्न के, सिर्फ पानी पी-पीकर काम चला लेंगे।’’ सुनकर मैं त्रिलोचनजी के भाई की ओर प्रतिक्रिया जानने की इच्छा से देखता हूँ। वे सरलता से मुसकराते हैं। इसका भाव यह है कि कुछ तो यह हकीकत है और कुछ लोग बढ़ा भी देते हैं जेबेदास्ताँ के लिये। ‘‘मने…त्यागीजी एकदम झूठ तो नहीं कह रहे।’’ त्रिलोचनजी के भाई हल्की-सी थाप लगा देते हैं, कुछ-कुछ शास्त्रीय अंदाज में।
सुनकर मैं हल्के-से चौंकाता हूँ, ‘‘मने…मने…मने…यह अंदाज तो एकदम त्रिलोचन वाला है। मने त्रिलोचनजी के भाई का साहित्य और कलाओं का ज्ञान ही नहीं, बात करने का अंदाज भी त्रिलोचनजी से एकदम मिलता है।’’
अब तो बात करने में मुझे मजा आने लगा। बात-बात पर मैं त्रिलोचनजी के भाई की प्रतिक्रियाएँ जान रहा हूँ और उन्हें चुपचाप मन में नोट करता जा रहा हूँ। साथ ही साथ एक दिलचस्प तुलना भी शुरू हो गई है—त्रिलोचनजी बनाम त्रिलोचनजी के भाई! ‘मने दोनों का बात करने का अंदाज किस कदर मिलता है—शक्ल भी। हाँ, त्रिलोचनजी के भाई काया में जरूर कुछ उन्नीस हैं। चेहरा भी कुछ ज्यादा कसा हुआ है, जरूर पाँच-सात साल छोटे होंगे।’
इस बीच बात चक्करदार रास्तों पर होते हुये न जाने कब, कैसे लोकसाधक और चिर लोकयात्री देवेंद्र सत्यार्थी पर आ गई और फिर वहाँ से उछलकर ‘देवेंद्र सत्यार्थी : तीन पीढिय़ों का सफर’ ग्रंथ पर, जिसका सम्‍पादन मैंने संजीव ठाकुर के साथ मिलकर किया था।
अब त्रिलोचनजी के भाई उस पर विस्तार से अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं, ‘‘मने…मनुजी, एक बात तय है। सत्यार्थीजी पर पुराने लोगों ने जिस गम्‍भीरता और तल्लीनता से लिखा है, नये लोगों के लेखों में वह बात नहीं। आपने जिन पुराने लेखों को शामिल कर लिया, किताब की जान असल में वही हैं।’’
सुनकर मैं चौंका, क्या त्रिलोचनजी के भाई भी इस कदर ‘पढ़ाकू’ आदमी हैं जो इतनी आधिकारिक टिप्पणी दिये जा रहे हैं, सो भी पुस्तक के सम्‍पादक के सामने! मेरा सम्‍पादकीय अहं थोड़ा चौड़ा हुआ। सोचा, ‘त्रिलोचनजी ने ‘इंडिया टुडे’ में उसकी समीक्षा लिखी थी, तो त्रिलोचनजी के भाई ने उन्हीं से लेकर थोड़ी उलट-पुलट ली होगी और अब ऐसे बन रहे हैं कि जैसे सर्वज्ञानी हों।’
अबके मैंने सीधे-सीधे पूछ लिया, ‘‘क्या आपने पढ़ी है यह पुस्तक?’’
‘‘हाँ, और क्या!’’ त्रिलोचनजी के भाई सरलता से जवाब देते हैं, ‘‘पढक़र ही तो लिखी है समीक्षा इंडिया टुडे में। मैंने एक-एक शब्द पढ़ा है आपकी पुस्तक का।…मने मनुजी, बगैर पढ़े तो मैं कभी नहीं लिखता।’’
‘‘ऐं! लेकिन वह तो आपने नहीं, वह…वह तो त्रिलोचनजी ने…’’
जाने कैसे मुड़े-तुड़े शब्द मेरे होंठों से निकले और मैं कुछ और कह पाता, इससे पहले ही त्यागीजी का जगविख्यात ठहाका किसी बम के धमाके की तरह पैदा हुआ और कमरे के फर्श से उठकर छत तक फैल गया, जिसमें त्रिलोचनजी के भाई—सॉरी त्रिलोचनजी का थोड़ा मंद लेकिन प्रसन्न हास्य भी शामिल हो चुका था। और तो और, ‘बुद्धूपने’ से भरा मेरा निरा झेंपू ठहाका भी उसमें घुल-मिल चुका था।

3

गजब! क्या गजब नाटक हुआ मेरे साथ, अब इसका अंदाजा हो रहा है। इतने में बगल की रसोई से निकलकर शीलाजी बाहर आ गईं। त्यागीजी के बच्चे किसी चमत्कार भरे जादू से खिल-खिल करते हुए मेरे इर्द-गिर्द उपस्थित हो गये। और अब मेरे भोंदूपने पर सार्वजनिक रूप से तरस खाया जा रहा था और हँसी की ऐसी प्रसन्न धाराएँ-अंतर्धाराएँ बह रही थीं, जिनमें त्रिलोचन सबसे अधिक रस ले-लेकर आनंद लूटे जा रहे थे।
ऐसे क्षण जिनमें त्रिलोचनजी की दुर्गम शास्त्रीय व्याख्याओं और विद्वत्ता का बोझ एकबारगी बह गया है और अभी-अभी पतंग लूटकर आये शरारती बच्चे का अक्स उनके चेहरे पर कहीं ज्यादा साफ नजर आता है।
अलबत्ता, वह तिलिस्म जिसे हरिपाल त्यागी ने इतनी देर में मेरे और त्रिलोचनजी के बीच में किसी काँच की दीवार की तरह खड़ा कर दिया था, झन्न से टूटकर बिखर जाता है और अब त्रिलोचनजी बड़ी स्नेहिल निगाहों से मुझे देखते, बल्कि अपने स्नेह से नहलाने लगते हैं और ‘त्रिलोचनजी के भाई’ का जो चमत्कारी बिम्‍ब इतनी देर में बना था, वह देखते-देखते शून्य में बिला गया। अब समझ में आया, जिन्हें त्रिलोचनजी का भाई मैं समझ रहा था, वह कला, साहित्य और शास्त्र में इतनी गहरी रुचि और इतना ज्यादा दखल क्यों रखते थे और उनका बात करने का अंदाज त्रिलोचनजी से कदर मिलता क्यों था? और क्यों ‘दाढ़ीदार’ त्रिलोचनजी की जगह सफाचट चेहरेवाले ‘त्रिलोचनजी के भाई’ नाटक की अध्यक्षता करने जा रहे थे!
‘‘इस दाढ़ी ने सचमुच मुझे बहुत छकाया।’’ मैं भुनभुनाकर कहता हूँ। त्रिलोचनजी उस पर स्नेहपूर्ण थाप लगा देते हैं, ‘‘मने…ऐसा तो बहुतों के साथ हुआ है मनुजी, सिर्फ आपके साथ नहीं।’’
‘‘लेकिन दाढ़ी कटवाकर आप पाँच-सात साल छोटे जरूर लगने लग जाते हैं।’’ मैंने अपनी राय प्रकट की।
‘‘अजी, कहिए जवान, एकदम जवान! दाढ़ी कटते ही यह जादू।’’ हरिपाल त्यागी अब छेड़छाड़ पर उतर आये हैं और पूछते हैं, ‘‘सच-सच बताइए त्रिलोचनजी, अब आपने नाई से कहा दाढ़ी साफ करने के लिये तो वह डरा, झिझका या चौंका नहीं, आसानी से तैयार हो गया?’’ फिर वह मासूम चेहरा बनाकर पूछते हैं, ‘‘अच्छा त्रिलोचनजी, इस दाढ़ी काटने के पैसे आपने दिये नाई को, या बदले में नाई से ही…? आखिर ऐसे शुभ्र, स्वच्छ बाल! कोई धूप में तो ये सफेद हुये नहीं हैं।’’
कुछ देर में उन्होंने आखिरी छक्का लगाया, ‘‘रहने दीजिए त्रिलोचनजी, क्यों नाटक का उद्घाटन करने जा रहे हैं? वहाँ लोग कहेंगे, हमने तो त्रिलोचनजी को बुलाया था, यह उनकी जगह कौन सज्जन आ गये।…जब मनुजी ही नहीं पहचान पाये, तो वहाँ भला कौन पहचानेगा?’’
जवाब में त्रिलोचनजी की मंद हँसी का झरना झरता रहा और मैं झेंपा-झेंपा-सा उसमें नहाता रहा। मन ही मन मुझे गुस्सा आ रहा था, मैं इस कदर बेवकूफ बन कैसे गया?
साथ ही मुझे ताज्जुब भी हो रहा था कि किस तरह मुझे जान-बूझकर और कितनी सफाई से बुद्धू बनाया जा रहा था और इस ‘खेल’  में जो हरिपाल त्यागी का रचा हुआ था, त्रिलोचन किस तरह खुद-ब-खुद शामिल हो गये और दोनों मिल-जुलकर मुझे हक्का-बक्का और परेशान करने पर तुले थे।
बहरहाल, त्यागीजी के उस ‘जादुई’ खेल की बदौलत ही समझिए, उस पूरे दिन त्रिलोचनजी की भाई की छाया से मैं मुक्त नहीं हो पाया।

4

हालाँकि खाना खाकर जब हम नाटक देखने जा रहे थे, त्रिलोचनजी के भाई, सॉरी त्रिलोचनजी, से मेरी खूब घुटकर बातें हुईं। पूरे रास्ते भर मेरा हाथ थामे हुये वे मुझे राह पर के पेड़ों, फूलों और मौसमों की भरपूर रसात्मक जानकारी देते रहे। अशोक के पेड़ की चर्चा हुई तो सुंदरियों के पाद-प्रहार से उसके फूल उठने की कहानी भी कही गई, जिसका आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘अशोक के फूल’ में वर्णन किया है।
‘‘असली अशोक का पेड़ आजकल मिलता कहाँ है! उलटे लहरीली पत्तियों वाले एक निफूले पेड़ को अशोक कहकर इसका मजाक उड़ाया जाता है।’’ मैंने आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का सन्‍दर्भ देकर कहा। उत्तर में त्रिलोचनजी ने जो कहा, उसे सुनकर मैं चकित रह गया था, ‘‘हाँ, यह तो ठीक है कि अशोक के असली पेड़ ज्यादा नहीं मिलते, लेकिन वे बिलकुल नहीं है, ऐसा तो नहीं है। मने कुछ पेड़ तो मनुजी खुद मैंने देखे हैं।’’ और असली अशोक के पेड़ उन्होंने कहाँ-कहाँ देखे, त्रिलोचनजी इसका पूरे विस्तार और तल्लीनता से वर्णन करने लगते हैं।
‘‘लेकिन हजारीप्रसाद द्विवेदी तो लिखते हैं, असली अशोक का पेड़ तो अब गायब हो गया है। वह सभ्यता ही खत्म…!’’
मैं उनकी विद्वत्ता के ‘महासिंधु’ में शंका का एक क्षुद्र तिनका छोड़ देता हूँ।
‘‘हो सकता है, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इनको देखा ही न हो…या लिखते वक्त उन्हें ध्यान न रहा हो। लेकिन हैं वे असली अशोक ही, जिनका जिक्र मैंने किया है।’’ त्रिलोचनजी आचार्य द्विवेदी की विद्वत्ता से आतंकित हुए बगैर दृढ़ता से अपनी बात पर टिके हैं और अब विस्तार से अशोक के फूलों के बारे में बता रहे हैं कि  वे कैसे आकार-प्रकार और किन-किन रंगों के होते हैं।
और फिर सिर्फ अशोक ही नहीं, मुझे अच्छी तरह याद है, पूरे रास्ते भर वे फूलों, पेड़ों और वनस्पतियों के बारे में मेरा विपुल ज्ञानवर्धन करते रहे। मजे की बात यह है कि इस प्रसंग में ठेठ ग्रामीण कहावतों और लोककथाओं से लेकर कालिदास, भवभूति और वाल्मीकि तक इस सहज भाव से आ-जा रहे थे कि लगता था, ये सभी उनके खूब अच्छी तरह देखे हुये घर हैं और ग्रामीण कवियों और वाल्मीकि, कालिदास की सहजानुभूति में कोई खास फर्क नहीं है। वे एक ही परम्‍परा की अलग-अलग स्वत:स्फूर्त अभिव्यक्तियाँ हैं।
पूरे रास्ते वे प्रेम से मेरा हाथ पकड़े रहे थे और बार-बार कंधे पर धौल जमा देते थे।
आज याद करता हूँ तो त्रिलोचनजी की वह अकुंठ मस्ती और वह अहेतुक प्यार मुझे किसी आशीर्वचन का-सा लगता है। हालाँकि उसमें कोई दिखावटी बड़प्पन कतई न था।
त्रिलोचनजी से पहली मुलाकात में मैं ज्यादा खुल नहीं पाया था जिसका शुरू-शुरू में हल्का-सा मलाल मुझे था और जिसका जिक्र भी उन पर लिखे एक लेख में मैंने किया था। तब क्या जानता था कि अगली ही मुलाकात में वे मुझसे इस कदर घुल-मिल जाएँगे कि मैं उनके प्रेम में नहा उठूँगा।

5

बहरहाल, थोड़ी देर में हम नाटकस्थली पर पहुँचे, तो पता चला कि नाटक अभी-अभी शुरू हो चुका है। हम लोग थोड़ा विलम्‍ब से पहुँचते हैं, इसलिए बगैर ज्यादा व्यवधान पैदा किये एक तरफ बैठ गये और थोड़ी देर में नाटक ने हमें अपनी गिरफ्त में ले लिया।
नाटक काफी अच्छा था। वह एक प्रयोगधर्मी और दुस्साहसी नाटक था जिसमें दर्शकों और कलाकारों के बीच का फर्क पूरी तरह मिट जाता है। दर्शकों के बीच से एक-एक कर लोग उठकर जाते हैं और नाटक को अपने अपने हिसाब से ‘चलाने’ लग जाते हैं। शुरू में लोग भीड़ के इस हस्तक्षेप या भगदड़ से परेशान हुये, फिर समझ में आया, यह नाटक की एक शैली है। नाटक में आज के बद्धिजीवियों पर जमकर कटाक्ष किया गया था। उसमें जितने भी बुद्धिजीवी पात्र हैं, उनकी लगातार आपस में खींचातानी, टाँग खिंचाई, झगड़े-झंझट, असहमतियाँ अंतर्विरोध, आलोचना-प्रत्यालोचना कुछ इस कदर चलती रहती हैं कि पूरे माहौल में एक-दूसरे के प्रति अविश्‍वास और टूटन है। सभी एक-दूसरे का मजाक बना रहे हैं और जो कला या मीडिया जितना शक्तिशाली है, वह दूसरे को नीचा दिखाने में उतना ही क्रूर और निर्मम है। फिर एकाएक शोर मचता है, ‘अखबार…अखबार…अखबार!’ देखते ही देखते सब पात्र फ्रीज हो गये हैं और पूरे परिदृश्य में सिर्फ उड़ते-उछलते और हड़बड़ाते हुये अखबार और उनके ताजा समाचार हैं। पार्श्‍व से सूत्रधार की कुछ-कुछ क्रूरता से भरी आवाज आती है, ‘‘अब कविता, कहानी और साहित्य का अंत हो चुका है। आज का असली साहित्य तो अखबार ही है।’’
लीजिए, अब मध्यांतर। मैं हरिपाल त्यागी, रामकुमार कृषक और सादतपुर के बहुत-से मित्र त्रिलोचनजी को घेरकर बैठे हैं और छेड़छाड़ का मजा ले रहे हैं, ‘‘लीजिये त्रिलोचनजी, आपकी कविता तो गई। अब उसका कोई मतलब नहीं रह गया है। अखबार की रिपोर्ट है आज का असली साहित्य। आपकी कविता-वविता झूठ…!’’
‘कविता-वविता झूठ, अपन से कुश्ती लड़ लो।’ मुझे एक तुक्कड़ कवि की लाइन याद आ जाती है, जिसे बचपन का मेरा कवि-मित्र अनिल उदित बड़े नाटकीय अंदाज में सुनाया करता था। मैं शरारतन यह लाइन हवा में उछालता हूँ। एक सम्मिलित ठहाका।
जवाब में त्रिलोचनजी मंद-मंद मुसकराते हैं। एक अकुंठ, प्रसन्न हँसी के साथ छेड़-छाड़ का आनंद ले रहे हैं।
मध्यांतर खत्म। अब त्रिलोचनजी को आमंत्रित किया जा रहा है कि वे अध्यक्ष के रूप में नाटक पर ‘दो शब्द’ कहें। बाद का आधा नाटक उनके भाषण के बाद होगा।
त्रिलोचनजी सहजता से उठ खड़े हुए। सीधी, तनी हुई पीठ। चेहरे पर तपा हुआ, खुरदुरा आत्मविश्‍वास।
‘‘अब आपके बोलने के लिए क्या रहा? कविता-वविता झूठ…!’’ भीड़ में से एक चहकता हुआ स्वर उठा है। लगता है, नाटक का असर लोगों पर हावी है।
‘‘अब बोलिए, इसी का जवाब दीजिए। आज तो अखबार का ही बोलबाला है।’’ भीड़ में से एक दूसरा खिलंदड़ा स्वर। शायद हरिपाल त्यागी हैं।
त्रिलोचनजी उसी तरह हँसते हैं—एक शांत, निश्छल हँसी जिसमें गर्व नहीं, विद्वत्ता का बोझ नहीं, चोट करने की तेजी और घात-प्रतिघात नहीं, एक निष्कवच सादगी है।
‘दूर से देखने पर उनकी हँसी एक झेंपभरी हँसी लग सकती है।’ मुझे लगा।
‘‘अब आये चक्कर में…!’’ मेरे आसपास फुसफुस हो रही है।
‘‘ऐसा है, आप लोग नाटक का आनंद ले रहे हैं,  इसलिए मैं ज्यादा देर तो लूँगा नहीं। आपके धैर्य की परीक्षा नहीं लेना चाहता।’’ त्रिलोचनजी धीरे से शुरू करते हैं, ‘‘लेकिन यह जो अखबार वाला मुद्दा है, इसका जवाब देना तो भाई, जरूरी है।’’ वे हँसकर कहते हैं, ‘‘ऐसे बहुत-से पाठक हैं मेरी कविताओं के, जो कविताएँ पढ़कर पत्र लिखते हैं या अपनी राय बताते हैं। उनमें ऐसे बहुत-से लोग हैं, जिन्होंने मेरी एक-एक कविता को दस-दस, बीस-बीस बार पढ़ा है और मिलने पर कहते हैं कि ‘अभी तो जी नहीं भरा। अभी इसे और पढऩा चाहते हैं। इसलिए कि हम जितनी बार इन कविताओं को पढ़ते हैं, उतनी बार इनमें से नये-नये अर्थ झाँकते हैं।’ जबकि अखबार आज पढ़ा तो कल बासी हो जाता है। फिर कोई उसे उठाकर देखना भी नहीं चाहता। कल्पना कीजिए, आप एक कमरे में बंद हैं और आपके हाथ में कविताओं की एक किताब है। इसके अलावा कमरे में कोई और चीज पढऩे लायक नहीं है। तो महीने भर भी अगर आपको उस कमरे में अकेले बंद रखा जाये, तो तीस बार आप उस किताब को पढ़ सकते हैं, फिर भी ऊबेंगे नहीं। लेकिन अगर उसकी जगह एक अखबार है और वही अगर आपको तीस दिन पढऩा पड़े, तो मेरा खयाल है, आप जरूर पागल हो जाएँगे। (हँसी)…मने अखबार सिर्फ एक बार पढ़ा जा सकता है, मगर कविता जितनी बार पढ़ेंगे, नया अर्थ देगी। बल्कि मेरा तो कहना है, कविता हजार, दस हजार, लाख बार पढ़ी जाये, तो भी पुरानी नहीं होती। कालिदास, वाल्मीकि और तुलसी हमें आज भी आनंद देते हैं। इसलिए अखबार और कविता की कोई तुलना नहीं हो सकती। अखबार कभी भी कविता की जगह नहीं ले सकता, यानी पत्रकारिता हमेशा साहित्य के पीछे-पीछे चलेगी। जो लोग यह समझते हैं कि साहित्य को उससे कोई खतरा है या पत्रकारिता साहित्य को खा जाएगी, वे मूर्खों के स्वर्ग में रह रहे हैं!’’
कहकर त्रिलोचनजी बैठे तो सारा हाल तालियों की गडग़ड़ाहट से गूँज उठा। त्रिलोचनजी ने बगैर किसी उत्तेजना या अहंकार के, मंद-मंद मुसकराते हुए इतने आहिस्ता से अपनी बातें कहीं और साहित्य-विरोधी तर्कों को इस कदर धराशायी कर दिया कि मैं भौचक! त्रिलोचनजी के उस्तादाना फन ने मुझे मोह लिया। बातें इस ढंग से भी कही जा सकती हैं और ‘शत्रु’ को इस ढंग से भी ‘पटरा’ किया जा सकता है, मैं इससे पहले जानता ही न था।
और मजे की बात यह है कि त्रिलोचनजी ने जो कुछ भी कहा, कुछ इस अंदाज में कहा कि उससे नाटक की ‘लय’ खंडित नहीं होती, बल्कि वह नाटक का एक हिस्सा ही लगता है। वह विजेता के दर्प से नहीं, एक ‘कालचेता’ के गम्‍भीर अंतर्ज्ञान और अंतर्मंथन के साथ अपनी बात कह रहे थे।
इसका सबूत यह है कि ‘मध्यांतर’ के बाद जब नाटक फिर से शुरू हुआ और अखबार वाले बुद्धिजीवी यानी पत्रकार के तर्कों का जवाब जब लेखकनुमा पात्र को देना था, तो उसने अपने तयशुदा संवादों को छोडक़र हू-ब-बू त्रिलोचनजी के शब्द दोहरा दिये।
नाटक में एक और नाटक!
यह नाटक का जबरदस्त नाटकीय या ‘उत्कर्ष क्षण’ था, जब सारा हाल पहले से बढक़र तालियों की गडग़ड़ाहट से भर गया था।

6

नाटक खत्म होने पर लौटे तो सभी की जुबान पर त्रिलोचनजी की वक्तृता की तारीफ ही थी।
बहुत-से दर्शक सादतपुर के ही थे, इसलिये लौटे तो त्रिलोचनजी के इर्द-गिर्द, ‘बतकही’ करते लौटने वालों का पूरा एक जुलूस था। लगभग एक किलोमीटर पैदल चलकर हम सादतपुर पहुँचे, जहाँ त्रिलोचनजी ने हमसे विदा ली। उन्हें यमुना विहार जाना था, जहाँ अपने बेटे के साथ वे उन दिनों रह रहे थे।
मुझे उस क्षण की अनुभूति आज भी ठीक-ठीक याद है। मुझे लग रहा था, मैं त्रिलोचनजी के साथ-साथ ‘त्रिलोचनजी के भाई’ को भी प्रणाम कर रहा हूँ। बल्कि उसी क्षण मेरे भीतर यह बात कौंधी थी कि असल में त्रिलोचनजी में ‘दो’ व्यक्तित्व हैं। वे कहीं आपस में मिलते हैं तो कहीं टकराते भी हैं। जब वे ‘दाढ़ीदार’ होते हैं तो त्रिलोचन होते हैं और जब बगैर दाढ़ी के तो त्रिलोचनजी के भाई!
हरिपाल त्यागी ने तो अपनी सदाबहार तबीयत से एक हल्का-सा मजाक किया था, पर वह मजाक अजब ढंग से मेरे लिये हकीकत बन गया। उस दिन मैं घर लौटने पर देर रात तक सोचता रहा था, त्रिलोचनजी की दाढ़ी न रहने पर उनमें क्या कुछ बदल जाता है? और कोई चार साल बाद यह लेख लिखते समय भी मैं उसी सवाल पर अटका हूँ और जवाब अभी तक नहीं मिला।
मुझे याद है, विदा के समय चलते-चलते त्यागीजी ने फिर चुहल की थी, ‘‘आज तो मनुजी को खूब छकाया।’’ और इस बार त्रिलोचनजी के साथ-साथ उपस्थित समूह ने भी इस ‘विचित्र वृत्तांत’ का पूरा रस लिया।
अचानक हरिपाल त्यागी का कटाक्ष फिर त्रिलोचन की ओर मुड़ गया था, ‘‘आपको कब लगता है त्रिलोचनजी, कि अब दाढ़ी कटवा लेनी चाहिये।’’
‘‘यह तो नहीं पता, पर जिस दिन भी लगता है, नाई की दुकान पर जाकर बैठ जाता हूँ और,’’ त्रिलोचनजी नहले पर दहला जमाते हैं, ‘‘इसकी भी क्या परवाह की जाये। दाढ़ी तो आनी-जानी है।’’
और उनका शुभ्र ठहाका उनके साँवले चेहरे के साथ-साथ आसपास के पूरे परिवेश को एक उजास से भर देता है।
सत्यार्थीजी को उनके अनेक प्यार करने वाले मित्र-शुभचिंतक ‘दाढ़ीदार शिशु’ कहकर संबोधित करते हैं। त्रिलोचनजी में भी बचपना सत्यार्थीजी से कम तो नहीं, मैं मन ही मन हिसाब लगाता हूँ। इसीलिये नहले पर दहला लगाते हुए भी उनके मन में जवाबी चोट करने की इच्छा नहीं, एक निर्मल आनंद ही होता है। इसी ‘निर्मल आनंद’ के बूते त्रिलोचनजी कवि हैं, तो साथ ही साथ नाटककार भी। वे तमाम अनलिखे नाटकों के नाटककार लगते हैं। उनके निकटस्थ मित्र और परिचित जानते हैं कि बतकही के बीच में उनका ‘शरारती’ अंदाज उन्हें कभी भी किसी भी क्षण एक उस्तादाना फन वाले नाटककार में बदल सकता है।
लिहाजा उस दिन विदा लेते हुये त्रिलोचनजी के साथ-साथ उनके ‘नाटककार’ को भी मैंने प्रणाम किया था, जिसे मैं कभी न जान पाता, अगर ‘त्रिलोचनजी के भाई’ से त्यागीजी ने मेरी मुलाकात न करवाई होती।

7

उसके बाद सादतपुर में त्यागीजी के घर पर ही त्रिलोचनजी से तमाम मुलाकातों की तमाम-तमाम मनोरंजक और आश्‍चर्यजनक स्मृतियाँ आज तक मेरे मन में ताजा हैं।
उनसे दूसरी या तीसरी मुलाकात में ही मैंने जान लिया था कि त्रिलोचनजी पहली बार जरूर कुछ ज्यादा खुलते नहीं हैं, लेकिन फिर जल्दी ही वे आपसे कुछ ऐसा अपनापा साध लेते हैं और फिर इतने खुलेपन से बगैर किन्‍तु-परन्‍तु के इतना बेधडक़ होकर बोलते हैं कि आश्‍चर्य होता है। उनसे बातचीत का एक मजा यह भी है कि जल्दी ही बातों के सारे सूत्र वे अपने हाथ में ले लेते हैं और एक विषय की ‘उठान’ पर वे आ जाएँ, तो उसमें से खुद-ब-खुद अनेक विषय, प्रसंग और व्यक्तित्व निकलते चले जाते हैं और त्रिलोचन को आप एक साथ तमाम वेगवान हवाओं के घोड़े पर सवार देख सकते हैं। वे एक साथ कई दिशाओं में बह जाना चाहते हैं—समय को लगभग पूरी तरह संक्रमित करते हुये। इसीलिए त्रिलोचनजी के साथ बैठकर समय का कुछ पता नहीं चलता।
मुझे याद है, एक बार विष्णुचंद्र शर्मा के यहाँ उनसे मुलाकात हुई। कोई प्रसंग छिड़ जाने पर बनारस की यादों की लडिय़ों पर लडिय़ाँ उन दोनों कवि-मित्रों की बातें में ऐसे झलमलाकर प्रकट हो रही थीं और त्रिलोचनजी इतने सजीव ढंग से रस ले-लेकर वे विगत प्रसंग सुना जा रहे थे कि लगता था, वर्तमान से निकलकर मैं इतिहास के उन बेछोर फैले हुए बरामदों में चला आया हूँ, जहाँ मिठास में पगे दिन और पानी पर तैरती सुनहली संध्याएँ होती हैं और बातों के ओर-छोर कभी नहीं मिलते।
शायद इसीलिये त्रिलोचनजी को पढऩा या सुनना एक ऐसे महाकाव्य को पढऩा है, जिसके कुछ नये पन्ने हर बार चकित करते हुये आँखों के आगे से गुजर जाते हैं।
यों हमारी बातों में साहित्य-चर्चा के अलावा त्रिलोचनजी की घुमक्कड़ी के अनेक सुख-दुख भरे अनुभव, उनके अतीत के तमाम आत्मकथात्मक प्रसंगों की दास्तानें भी शामिल होती थीं, जिनमें एक ‘यवनिका पतन’ के बाद फिर एक नया युग सामने खड़ा नजर आता है और त्रिलोचनजी की यात्रा ‘अबाध’ लगती है तथा उनका व्यक्तित्व ‘अजेय’। काशी नगरी प्रचारिणी सभा, बनारस और धूमिल को लेकर त्रिलोचनजी के संस्मरण तथा अपने समकालीन लेखकों पर उनकी बेबाक टिप्पणियाँ तो होती ही थीं। इसके अलावा भाषा पर उनकी आधिकारिक शास्त्रीय चर्चा और ग्रामीण तथा देशज शब्दों के सही-सही अर्थ या भंगिमाओं या अर्थ-छटाओं के लिये उनका मोह जरूर उझक-उझककर सामने आता था। और इस सबके अलावा एक ‘तिलिस्म’ वहाँ हर बार कुछ और मोहक होकर आता था, जिसे तीन या चार शब्दों का एक प्यारा-सा नाम मैंने दे रखा है, ‘त्रिलोचनजी के भाई।’
इस ‘गड़बड़’ प्रसंग को मेरे लिये और ज्यादा प्रिय बना दिया था त्रिलोचनजी की स्निग्ध हँसी ने, जिससे हरिपाल त्यागी का गढ़ा हुआ यह तिलिस्म हर बार कुछ अधिक मोहक और रंगीन और मीठा हो जाता था। एक ऐसा प्रसंग, जिसके बाद मैं त्रिलोचनजी को अपने बहुत निकट महसूस करने लगा था और उनकी अंतरंगता का ‘सेक’ महसूस करने के साथ-साथ उनसे थोड़ी-बहुत छेड़छाड़ का अधिकार भी मैंने ले लिया था।
अलबत्ता, इस प्रसंग के चलने पर हर बार त्रिलोचनजी और हरिपाल त्यागी का जो सम्मिलित ठहाका मुझे सुनने को मिलता था और मुझे झेंपकर हर बार जिस तरह ठहाके में शामिल हो जाना पड़ता था, अब भी उसके ‘आनंद संगीत’, बल्कि ‘आनंद लीला’ से मैं मुक्त नहीं हो पाया। यही वह ‘रसात्मक भूमि’ है जहाँ त्रिलोचनजी की सरलता उन्हें तमाम दूसरे प्रगतिवादी कवियों से अलग खड़ा कर देती है और उनके वाद को ‘वाद’ कम, ‘प्रगति’ अधिक बना देती है। वही अब भी इस प्रसंग को लिखते समय मुझे गाढ़े-गाढ़े काव्य-रस में भिगोए दे रही है।
एक लम्‍बी और कष्टकर बीमारी का दुख झेलकर त्रिलोचन गये। पर मुझे सरीखे बहुत-से लेखक-पाठकों के दिलों में वे अब भी हैं और हमेशा रहेंगे।
धरती की सरलता से निर्मित काव्य-देह में उनकी उपस्थिति और धडक़न अब भी महसूस होती है। ठीक वैसे ही, जैसी तब महसूस होती थी जब त्रिलोचन थे। तो त्रिलोचन अब गए कहाँ? फिर भी एक शून्य है जो पाटने में नहीं आता और भीतर गहरी अकुलाहट-सी है।
एक-दूसरे को तिर्यक काटते संशयों और हताशा के इस बुरे दौर में त्रिलोचन के होने के मानी क्या थे और कैसे उनकी सरलता देखते-देखते अनायास हमारे पूरे व्यक्तित्व पर नक्श हो जाती थी, शायद अब मैं थोड़ा-थोड़ा जान पाया हूँ। बहुत खोकर ही शायद यह अहसास होता है कि हमने क्या खो दिया है। इक्कीसवीं सदी में मुझे लगता है, हमें प्रगति ही नहीं, प्रकृति और प्रेम को भी नये सिरे से सीखने की शुरुआत करनी होगी। तब त्रिलोचन और उनकी सीधी-सरल लगती गुरुतर कविता के मानी हमें और ज्यादा साफ समझ में आएँगे।
(‘यादों का कारवाँ’ से साभार)
चि‍त्र: श्‍याम सुशील

100 की जोहरा- नयेपन की तलाश है उनकी खासीयत : योगराज टंडन


जोहरा सहगल
चर्चित लेखक और नाट्यकर्मी योगराज टंडन रेडियो और दूरदर्शन में नाट्य लेखन व प्रस्तुति संबंधी कार्यों से जुड़े रहे हैं। 1950 में पृथ्वी थियेटर में इन्होंने जोहरा सहगल के साथ काम किया था। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से ‘थियेटर के सरताज पृथ्वीराज’ नाम की इनकी महत्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित हुई है, जिसमें जोहरा सहगल से संबंधित प्रसंग भी हैं। यह संस्मरण सुधीर सुमन और श्याम सुशील के साथ बातचीत करते हुए उन्होंने सुनाया-
मैं जब 1950 में बंबई गया, तब मुझे शॉट स्टोरी लिखने का शौक था। हमारा परिवार 1947 में विभाजन के बाद भारत आया था। पिता चाहते थे कि एक्साइज इंस्पेक्टर की नौकरी से उनके रिटायर होने से पहले मैं कोई काम करने लगूँ। हालाँकि चाबड़ी बाजार में एक प्रेस भी था, पर पिता चाहते थे कि मिथिलेटेड स्पीरिट का लाइसेंस ले दें और मैं वहाँ बैठूँ। पृथ्वीराज कपूर से हमारे पारिवारिक रिश्ते थे। वे जब भी दिल्ली आया करते थे, तो हमारे घर ठहरा करते थे। वे कहते कि गुग्गू तुम पढ़ने-लिखने वाले हो, इस घर में कैसे पैदा हो गये। वे कहते कि इसे मेरे पास भेज दो। लेकिन बड़े भाई लेख टंडन पहले ही वहाँ जा चुके थे और तब उनकी स्थिति अच्छी नहीं थी। खैर, मैं जब बंबई पहुँचा तो वहाँ नेपथ्य में मुझे भूमिका मिली, मुझे अभिनेताओं के अभिनय और प्रॉपर्टी वगैरह पर नजर रखनी थी। वहीं पहली मुलाकात जोहरा सहगल से हुई। नाटक ‘गद्दार’ में वे बड़ी बी बनती थीं। हफ्ते दो हफ्ते बाद मैंने एक दिन उन्हें टोका कि ये डायलॉग आपने गलत बोला। आपका किरदार तो यह बोल ही नहीं सकता। बिना किसी बहस के वे मेरी बात से सहमत हो गईं।
पृथ्वी थियेटर में शामिल होने से पहले जोहरा सहगल और उनकी छोटी बहन अजरा मुमताज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर भारतीय नर्तक उदय शंकर के बैले ग्रुप में थीं और इस ग्रुप में काफी महत्वपूर्ण स्थान रखती थीं। खासकर जोहरा जी तो अल्मोड़ा में उदय शंकर जी की नृत्य एकेडमी की सक्रिय कार्यकर्ता थीं। वहाँ नृत्य की शिक्षा के लिये जो कायदे-कानून बनाये गये थे, वे उस सिलेबस की इंचार्ज थीं। वहीं उन्होंने अपने से आठ साल छोटे एक नवयुवक नर्तक और चित्रकार साथी कामेश्‍वर सहगल से शादी की। उन दिनों यह शादी अपने प्रकार की पहली शादी कही जा सकती थी। इसमें किसी को अपना धर्म बदलने की आवश्यकता नहीं पड़ी। उनके परिवार के लोग चाहते थे कि वे धर्म परिवर्तन कर लें। लेकिन उन्होंने बिना धर्म परिवर्तन किये साथ रहना तय किया और इसकी बहुत चर्चा थी। इसे लोगों ने बड़ा सराहा और एक प्रगतिशील कदम बताया। इसके बाद जोहरा जी और कामेश्‍वर सहगल अल्मोड़ा छोड़कर लाहौर चले गये और वहाँ नृत्य की शिक्षा के लिये एकेडमी खोल ली। आरम्‍भ में तो अपनी आजादख्याली और प्रगतिशील दृष्टिकोण के कारण लाहौर के सामाजिक लोगों ने उनको हाथोंहाथ लिया। जगह-जगह उनके सम्मान में दावतें हुईं। उनको जनसभाओं और घरेलू किस्म की बैठकों में बुलाया गया, उनके विचार सुने गये। एक हिन्‍दू तो दूसरा मुसलमान, फिर भी एक साथ जीवन बसर कर रहे हैं, घर-घर में उनकी शादी के बड़े सुखद चर्चे होने लगे थे। उस वक्त माहौल ऐसा था भी कि होली हिन्‍दू-मुस्लिम साथ मिलके मनाते थे। दीवाली के दिन मुसलमान भी दीये जलाते थे। हमारे ननिहाल में तजिया निकलता था और उसके लिये जो घोड़ा पाला जाता था, वह हिन्‍दू नंबरदार पालते थे। वही मुसलमान थे जिन्होंने दंगे-फसाद के दौरान हिन्‍दुओं को बचाया और हिन्‍दुओं ने मुसलमानों को। खुद मेरे पिता को भी उनके मुस्लिम दोस्त ने अपने पास रखा। दोस्त की बीवी रोज काफिर कहके उन्हें गालियाँ देतीं। एक दिन दोस्त ने अपनी बीवी को गालियाँ बकते सुन लिया और उसने कहा कि तुमसे पहले मेरा दोस्त है और उसी वक्त तलाक, तलाक, तलाक कहके तलाक दे दिया। बाद में फिर मौलवी आये, उन्होंने कहा कि गुस्से में कहा है इसलिए यह तलाक मंजूर नहीं होगा। लेकिन राजनीतिक परिस्थितियाँ तो बदल चुकी थीं। मुस्लिम लीग और कट्टर किस्म के मौलानाओं का प्रभाव उभरने लगा तो लोगों की दृष्टि बदलने में देर नहीं लगी। तारीफ के बजाए अब नुक्ताचीनी होने लगी। शको-शुब्हात के घने बादल चारों ओर मंडराने लगे। बहानों-बहानों जोहरा सहगल और कामेश्‍वर सहगल का सोशल बाइकॉट भी होने लगा। इसके बाद ही दोनों सबकुछ समेटकर लाहौर से बंबई आ गये।
जोहरा जी को अपनी सूझबूझ और नृत्य में निपुणता के कारण फिल्मों में काम मिलने लगा, पर वह उस काम से भिन्न था, जिसे उन्होंने उदय शंकर के साथ किया या लाहौर में जिसे करने के लिए उत्साह के साथ लगी थीं। जोहरा जी की छोटी बहन अजरा अब तक पृथ्वी थियेटर में शामिल हो चुकी थीं। पृथ्वी थियेटर के अब तक दो नाटकों के शो हो चुके थे। जोहरा जी जब वहाँ पहुँची तो दूसरे नाटक की ही आगामी प्रस्तुतियों की तैयारियाँ जोर-शोर से चल रही थीं। नाटक की कास्ट तय थी। एक्टिंग जोहरा जी का पहला शौक था, वे पृथ्वी थियेटर में आना चाहती थीं। मगर पृथ्वीराज कपूर के मन में एक झिझक थी कि अजरा उनकी दोनों नाटकों की हीरोइन थीं, वे जो मासिक वेतन अजरा जी को दे रहे थे, उससे कम या ज्यादा वेतन वे जोहरा जी को दे नहीं सकते थे। आखिरकार जोहरा जी अभिनेत्री के बतौर नहीं, बल्कि नाटकों में नृत्य की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये पृथ्वी थियेटर में शामिल हुईं, लेकिन बहुत जल्द ही उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से अपना एक खास स्थान बना लिया। डाँस में तरतीब देने के साथ-साथ बाकायदा नृत्य सिखाने के लिये रोजाना कलाकारों को अभ्यास भी कराती थीं। हर अभिनेता-अभिनेत्री को निजी रूप से एक-एक शारीरिक हरकत का अभ्यास कराती थीं।
जब मैंने पृथ्वीराज जी का घर छोड़ा तो मुझे सर छुपाने के लिए कोई जगह चाहिये थी। जोहरा जी ने कहा कि मेरे सर्वेंट क्वाटर में रह लो। पैरी रोड पर वह बंग्ला था। मैंने कहा कि मैं कहाँ से उसका किराया दे पाऊँगा। छूटते ही वे बोलीं- जो बन सके वह दे देना। वहाँ रहना शुरू किया। रोज सुबह ही निकल जाता था। जोहरा जी अपने नौकर से हमेशा यह कहती थीं कि इसका ख्याल रखना। बल्कि अक्सर वे कहती रहती थीं कि- कभी तो मेरे साथ बैठकर खा। यह सम्‍भव नहीं हो पाता था। लेकिन उनकी एक क्रिश्चन सहेली कई बार मुझे भोजन करा देती थीं, उनका तर्क होता कि क्रिश्चन हूँ, अकेले कैसे खा सकती हूँ। मुझे लगता है कि यह सब जोहरा जी के इशारे पर होता था। वे हमारे लिए आइडियल हैं। व्यवहार उनका बहुत अच्छा रहा है। वे मेरा पूरा ख्याल रखती थीं। मुझे याद है कि जब मुझे महीने में 75 रुपये मिलते थे जिनमें 25 रुपये मैं घर भेज देता था। मेरे बड़े भाई की शादी होनी थी। मैं सोच रहा था कि जब मैं कुछ कंट्रिब्यूट नहीं कर सकता, तो क्यों जाऊँ? जोहरा जी को शादी के बारे में पता चला, तो पूछने लगीं कि कब जा रहा है? मैंने कहा- मैं तो नहीं जा रहा। उन्होंने कहा कि ये तो कोई बात नहीं। लेकिन उनका वश नहीं चला। फिर उन्होंने पापा जी- पृथ्वीराज जी से कहा कि ये अपने भाई की शादी में नहीं जा रहा है। खैर, पृथ्वीराज जी ने समझाया कि तुम कुछ नहीं दे सकते, यह तो ठीक है, पर तुम नहीं जाओगे तो जान-पहचान वाले क्या कहेंगे? लोग सोचेंगे कि तुम भाई की शादी में क्यों नहीं हो? बड़ी बदनामी होगी। ये जो तुम बोझ बनने से परेशान हो, उससे तो ज्यादा बुरा होगा न! खैर, मैं गया। अगर जोहरा जी ने पहल न की होती, तो मैं अपने भाई की शादी में न गया होता। इसे मैं कभी नहीं भुलता। अजरा जी की आपा तो वे थी हीं, वे सबके लिये आपा जैसी ही थीं। बड़ा ह्यूमन व्यक्तित्व है उनका।
‘दीवार’ में पहले जो भूमिका बलराज साहनी की पत्नी करती थीं, उनकी मृत्यु के बाद जोहरा वह रोल करने लगीं। पहले किसी द्वारा निभाई गई भूमिका के बाद उसी भूमिका को निभाना और अपना प्रभाव छोड़ना बहुत मुश्किल होता है, जो उन्होंने किया। एक थियेटर आर्टिस्ट के लिए बॉडी मूवमेंट्स और कैरेक्टर की समझदारी, कि कौन सा रोल निभाना है, उसकी भाषा कैसी होनी चाहिए, यह सब उनमें है। आप जान लीजिए कि मैं तो मामूली असिस्टेंट था, मैंने कोई बात कही, तो वे उसे सुनती थीं। यूँ सर पर सवार होकर कभी पेश नहीं आतीं थीं। जब वे ‘दीवार’ नाटक में विदेशी औरत का रोल करती थीं, तो बाल कैसे बनाने हैं, टोपी कौन सी लगानी है, हमेशा यह सोचती रहती थीं। कहीं न कहीं नयापन लाने की कोशिश वे हमेशा करती थीं। वह तलाश अब भी उनकी जारी है। उनकी क्रिएटिविटी थकती नहीं। इस उम्र में भी वे वोकल और बॉडी एक्सरसाइज करती हैं, जबकि वे अपने आप चल नहीं सकतीं। ह्विल चेयर पर चलती हैं। याददाश्त उनकी गजब की है। लगता ही नहीं कि बूढ़ी हैं। मुझे तो हमेशा उसी तरह से यंग लगती हैं। मुझे उनकी हर परफामेंस नई लगी। रोल तो एक ही होता था और हफ्ते में उसकी तीन-तीन प्रस्तुतियाँ होती थीं। मगर हर बार वे कुछ न कुछ चेंज कर देती थीं। कभी कास्ट्यूम तो कभी कुछ, और यह सब बड़ा कन्विसिंग लगता था। इतना ही नहीं कि खुद अपने में चेंज कर लेती थीं, बल्कि उस परिवर्तन के बारे में साथी कलाकार से बात भी करती थीं कि अगर ऐसा बदलाव किया जाये तो कैसा रहेगा, ताकि वह भी उसके अनुरूप अपनी भूमिका को निभाए।
बाद में उनके और उनके पति के बीच टकराव पैदा हुआ। कामेश्‍वर कुछ ज्यादा ही आत्मकेंन्‍द्रि‍त थे। उन्हें लगता था मानो वो समय से बहुत पहले आ गये हों और उनके प्रशंसक अभी उतनी सूझबूझ नहीं रखते कि उनकी रचना को समझ सकें। वे यह नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी आर्टिस्ट बने, यह भी तनाव की वजह थी। एक बड़ी वजह यह भी रही होगी कि जितना जोहरा लाइम लाइट में थीं, वे उतने नहीं थे। तंग आकर उन्होंने खुदकुशी कर ली। अब घर जोहरा जी को काटने के लिये दौड़ता था। कुछ दिन वे अजरा जी के साथ रहीं। पृथ्वी थियेटर तब ‘पृथ्वी हट’ बन गया था। कुछ दिन वहाँ रहने की कोशिश की, पर बंबई शहर में रह पाना मानसिक रूप से उनके लिये बहुत कष्टकर था। लेकिन वे जीना चाहती थीं अपने बच्चों के लिये। उन्होंने बंबई शहर और पृथ्वी थिएटर दोनों को छोड़ दिया। पृथ्वीराज कपूर चाहकर भी उन्हें रोक नहीं सके। पहले वे दिल्ली आईं और फिर लम्‍बे समय के लिये लंदन चली गईं। भारत वापस आने के बाद उन्होंने दिल्ली शहर को ही अपना घर बना लिया। पति की मृत्यु के बाद खुद ही बच्चों को पाला, नाटक किया, उन्हें पढ़ाया। जैसी वे थीं, वैसा ही बच्चों को बनाया। पति के साथ तनाव के दौरान भी कभी बच्चों को पति के खिलाफ भड़काया नहीं।
1983 में जब मैं दूरदर्शन में ड्रामा प्रोड्यूसर था तब उनसे मुलाकात हुई। मैंने कहा कि जोहरा जी मैं चाहता हूँ कि आप नाटक में काम करें। लेकिन आपकी जितनी फीस है वह दे नहीं पाऊँगा। दूरदर्शन में दूसरी मुश्किलें थीं। अधिकारियों का यह कहना था उनकी आवाज अप्रूव्ड नहीं है। मेरे यह बताने का भी उन पर असर नहीं पड़ रहा था कि वे फिल्मों में काम कर चुकी हैं, पृथ्वी थियेटर में काम कर चुकी हैं। उनकी पोजिशन ऐसी है कि आवाज के एप्रूवल की जरूरत नहीं है। खैर, बड़ी मुश्किल से फाइल पहुँची अपनी जगह पर। उस वक्त उनको प्रति नाटक 1000 रुपये देना तय हुआ। 1989 में अपनी रिटायरमेंट के बाद मैं उनके यहाँ आता-जाता रहा। वहीं उन पर केन्‍द्रि‍त एक किताब पढ़ने को मिली। मैंने उनकी जीवनी लिखनी शुरू की थी, पर मेरी कमजोरी कहिए कि 50-60 पन्नों के बाद आगे नहीं लिख पाया। मुझे लगा कि पुनरावृति हो रही है, पृथ्वीराज कपूर वाली किताब के ही प्रसंग बार-बार आ जा रहे थे। मुझे लगा कि उन्हीं प्रसंगों को लेकर दुबारा एक किताब लिखना ईमानदारी नहीं होगी। फिर भी क्या जीवन है उनका! अपनी फैमिली में सबसे ज्यादा आधुनिक और रिवोल्ट करने वाली महिला हैं वे। पहले एयर सर्विस तो थी इस तरह थी नहीं, पानी के जहाज से ही जाना पड़ता था। वे पानी के जहाज से ही देश-दुनिया में गईं। उन्होंने कार चलाना सीखा। नाम याद नहीं आ रहा, एक बार तो एक मुस्लिम मुल्क में वे यहाँ से कार से ही गईं। एडवेंचर उन्हें पसंद है। उनकी बेटी उन्हें प्यार से फैटी कहती है, पर वे वैसे मोटी नहीं रहीं कभी भी। वे अब भी रियाज करती हैं। डांस वाली बॉडी है उनकी। अभी भी फैज और हफीज जालंधरी उन्हें याद हैं। उनकी आवाज की गूँज अभी भी पहले जैसी ही है।
हाँ, अजरा जरूर उनसे ज्यादा खूबसूरत थीं, लेकिन वे नाटक में अपनी निरंतरता बरकरार नहीं रख सकीं। बेशक जोहरा जी देखने में अधिक सुंदर नहीं थीं, लेकिन उनमें आकर्षण भरपूर रहा है। उनके बातचीत करने में अद्भुत किस्म का अपनापन और आकर्षण है। जब वे नृत्य करती थीं, तो आकर्षण की सारी सीमाएं टूट जाती थीं। आयु का बंधन टूट जाता था।
आज के दौर में आर्ट थोड़ा पीछे रह गया है, शोमैनशिप और ग्लैमर आगे आ गया है। आज के दौर में किसी जोहरा सहगल को आना होगा, तो उसे उनसे भी ज्यादा ग्रेट होना होगा, क्योंकि जमीन हमवार नहीं है, उबड़-खाबड़ रास्ते हैं। लाइटिंग और कपड़े ही जरूरी हो गये हैं। कहानी, डायलॉग और कैरेक्टर पीछे रह गये हैं। पहले स्क्रिप्ट पर कितनी बहसें होती थीं, लेकिन आज किसके पास फुर्सत है! एक खला है, एक गैप है। ऐसे दौर में हम परफार्म करती जोहरा सहगल को बहुत मिस करते हैं। आज तो बस उन्हें बोलते हुए ही हम सुन पा रहे हैं।
(‘समकालीन जनमत’, मई 2012 से साभार)

अभियान : गोपाल प्रधान


गोपाल प्रधान
अस्सी के दशक में बनारस में नाट्य संस्‍था ‘अभि‍यान’ ने सांस्‍कृति‍ हलचल पैदा की थी। इसके सदस्‍य रहे युवा लेखक गोपाल प्रधान का संस्‍मरण-
हिन्‍दी कवि एक लम्‍बे अरसे से कविता के जरिये जनता से जुड़ने की कोशिश करते रहे और कविता में बड़ी-बड़ी क्रान्‍ति‍याँ करते रहे जो उन्हें लगातार जनता से दूर खींचती रहीं । वे यह नहीं समझ पाये कि कविता का उपनिवेशवादी चंगुल से तब तक छुटकारा नहीं हो सकता, जब तक संस्कृति के क्षेत्र में साम्राज्यवाद और सामंतवाद से सीधी टक्कर न ली जाये । सांस्कृतिक क्षेत्र को इन ताकतों ने बुरी तरह से प्रभावित कर रखा है, यह देखकर वाराणसी के सांस्कृतिक कर्मियों ने जनता की लोक संस्कृति को स्थापित करने के लिये एकजुट होने का प्रयत्न किया। संयोग से राष्ट्रीय स्तर पर जनवादी संस्कृति का पक्षधर ‘राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा’ उभरा । इससे प्रेरित होकर वाराणसी के संस्कृति कर्मियों ने इसकी वाराणसी इकाई ‘अभियान’ गठित की ।
अभियान की बुनियाद में ही यह था कि जनता के बीच मौजूद जन संस्कृति को साम्राज्यवादी सामंतवादी संस्कृति के विरुद्ध लड़ाई का हथियार बनाकर प्रस्थापित किया जाये। इसलिये ये कलाकार अल्प साधनों के साथ ही जनता में नुक्कड़ नाटक और जन गीत लेकर उतर गये। नाटक विधा का उपयोग इस संस्था ने कला को जनता तक पहुँचाने के लिए बखूबी किया। जन संस्कृति की अल्प ज्ञात निधि के बल पर इन योद्धाओं ने तामझाम की दुनिया से दूर नाटक को स्टेज पर से उतारकर जनता के बीच खड़ा किया । संस्कृति की धनी वाराणसी की बंगाली जाति ने इस प्रयास में बहुत सहयोग किया। ये सांस्कृतिक कर्मी किसी भी मुहल्ले में जाकर एक खुले स्थान को चुनकर अपने कार्यक्रम की मुनादी जनता में ढोल पीटकर करते थे । नियत समय पर सबसे पहले गीत गाया जाता था। तत्पश्‍चात नाटक होता था । एकत्र होने वाली जनता की संख्या व उत्साह देखकर ये वीर इस काम में प्रबल रूप से जुट गए ।
‘अभियान’ ने ‘अब न सहेंगे जोर’ नाटक जनता के बीच खेला । इसमें मजदूर, किसान, छोटा दुकानदार और टाइपिस्ट अपना-अपना दुखड़ा रोते हैं और आपस में अद्भुत समानता पाकर मजबूत एकता में बँध जाते हैं । इनकी एकता देखकर व्यवस्था गुर्राते हुए पुलिस के हवलदार को बुलाती है और जनता को कुचलने का आदेश देती है । वह जनता को सामने देखकर हड़ताल कर देता है और अंत में जनता की तरफ मिल जाता है। इस पर व्यवस्था फौज से मार्च कराती है । फौज जनता से लड़कर हार जाती है और फौज पर टिकी व्यवस्था भी खत्म हो जाती है । जनता उत्साह में गाती है-
होगी दुश्मनों की हार एक दिन/हो हो मन में है विश्‍वास/पूरा है विश्‍वास/होगी दुश्मनों की हार एक दिन
एक और नाटक ‘गिरगिट’ भी ‘अभियान’ जनता के बीच खेलता था । यह नाटक चेखव की कहानी का रमेश उपाध्याय द्वारा किया गया नाट्य रूपांतरण था । इसके पात्रों का भारतीय नामांतरण करके इसे जनता के योग्य बना दिया गया था । इसमें नौकरशाही द्वारा गिरगिट की तरह रंग बदलने की कहानी है । इस नाटक में एक कुत्ता एक जेबकतरे को काट लेता है । बड़ा अफ़सर कुत्ते के मालिक से हरजाना दिलवाने की बात कहता है, पर अचानक बड़े अफ़सर को बताया जाता है कि कुत्ता सेठ जी का है । इस पर अफ़सर जेबकतरे को डाँटता है । जेबकतरा छोटे अफ़सर को जेब से निकालकर नोट दिखाता है। तब छोटा अफ़सर बताता है कि कुत्ता सेठ जी का नहीं है । बड़ा अफ़सर कुत्ते को गोली से उड़वा देने की बात करता है । फिर सेठ जी का ही कुत्ता है पता चलने पर कुत्ते को सेठ जी के यहाँ पहचान के लिए भिजवाता है । तभी सेठ जी का नौकर आकर बताता है कि ये हमारे सेठ जी का नहीं है । आगे बोलने का अवसर न देकर बड़ा अफ़सर अपनी पुरानी धमकियों को दोहराने लगता है । नौकर हस्तक्षेप करते हुए बताता है कि यह उनके बड़े भाई का है । बड़े अफ़सर के हाथ-पाँव फूल जाते हैं । वह कुत्ते को सेठ जी के पास भिजवाता है और जेबकतरे को पीटकर भगा देता है । यहीं नाटक खत्म हो जाता है । छोटे-छोटे वाक्यों से उभरने वाले इस नाटक के सहज व्यंग्य को जनता आसानी से समझ लेती है । ‘अभियान’ के पास एक और नाटक था ‘हवाई गोले’ । इस नाटक को पंजाब के जनवादी लेखक गुरशरण सिंह ने लिखा है । इस नाटक में सरकार और विपक्ष को जनता की प्रमुख समस्याओं से विमुख होकर केवल बहस करते हुये दिखलाया जाता है । लोकसभा में बहस करते हुये ये आपस में अपनी हर एक बात को जनता की आवाज बताते हैं और खूब लड़ते हैं । अंत में जनता क्रोधित होकर इनको मार डालती है । सरकार व विपक्ष की पराजय होती है तथा जनता की जीत होती है ।
इस दौर में गरीब जनता का जितना सहयोग मिला वह अपूर्व है । जनता ऐसे कलाकारों को प्यार करती है । जनता को इस बात की समझ है कि कौन उसका दोस्त है, कौन उसका दुश्मन । यह जानकर ‘अभियान’ के साथी विस्मित हुये । इन्हें डर था कि सड़क पर जनता के बीच नाटक करने पर जनता इन्हें पागल न समझ ले । पर जनता ने इन्हें सम्मान दिया । सबसे बड़ी बात यह कि इन्होंने अपने कार्यक्रम के बाद जनता से एक पैसा नहीं लिया । इसी समय ‘अभियान’ ने अपने बिरादराना संगठनों को सहयोग देने की नीति अपनाई । लोक सभा चुनाव में देशभक्त लोकतांत्रिक मोर्चा के प्रतिनिधि राम नारायण शुक्ल के लिये इस संस्था ने घूम-घूम कर चुनाव प्रचार किया । कौन जीता इसकी बजाय यह महत्वपूर्ण था कि इसने बिना पैसे के मेहनत से प्रचार किया। काशी हिन्‍दू विश्वविद्यालय के छात्र संघ चुनावों में प्रगतिशील छात्र संगठन के प्रतिनिधियों के लिये भी इस संस्था ने बड़ी मेहनत की और चुनाव प्रचार की जनवादी रीति की मिसाल कायम की । मृत्युंजयी शहीदों की पुण्य तिथि भी मनाने का इस संस्था ने निश्‍चय किया । इसी सिलसिले में भगत सिंह की पुण्य तिथि लंका पर मनाई गई जिसमें अभियान और प्रगतिशील छात्र संगठन ने मिलकर काम किया ।
अब तक राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा की काफी इकाइयाँ बन चुकी थीं पर इनका सारा प्रबंध तदर्थ समिति की ओर से होता था । अब सोचा यह गया कि इसका एक वृहद स्थापना सम्मेलन हो जिसमें सभी इकाइयाँ एक दूसरे की कलात्मक बारीकियों को देख पहचान सकें । ‘अभियान’ ने इसमें पहल लेते हुए प्रेमचंद शत वार्षिकी के उपलक्ष्य में प्रेमचंद के गाँव लमही में स्थापना सम्मेलन का दिन 9-11 जून, 1980 निश्‍चि‍त करवाया । सम्मेलन के अंतिम दिन प्रेमचंद मेला का भी आयोजन किया गया । इस सम्मेलन में ‘अभियान’ ने कड़ी मेहनत की और मेजबान का कर्तव्य निभाया । इसमें पंजाब के जनवादी नाटककार गुरशरण सिंह, आंध्र प्रदेश के क्रान्‍ति‍कारी कवि ज्वालामुखी तथा निर्मलानंद और भारत-चीन मैत्री संघ के लाजपत राय तथा अग्निवेश ने सांस्कृतिक दुश्मन को सही तौर पर पहचानने में बड़ी सहायता की । इन्होंने अपने लम्‍बे अनुभव से हमें कुछ सिखाया । गोरखपुर तथा दिल्ली की टीमों की कलात्मक बारीकियों और काम करने की धुन से ‘अभियान’ ने बहुत कुछ सीखा । लेकिन भोजपुरी गीतों के मामले में ‘अभियान’ अव्वल रहा । स्थापना सम्मेलन के उपरांत एक-दूसरे के बीच बराबर जीवन्‍त सम्‍कर्क बना रहा । एक राष्ट्रीय संस्था की तरह एकता और सहयोग की भावना लोगों में उभरी । मोर्चे की प्रसिद्धि और कर्मठता के कारण सम्मेलन के बाद इसकी तमाम इकाइयों को बाहर से बुलावे आने लगे । इन आमंत्रणों पर ‘अभियान’ ने जगह-जगह अपने कार्यक्रम पेश किये ।
स्थापना सम्मेलन के बाद आमंत्रण मिला मऊ के स्वदेशी काटन मिल के मजदूर यूनियन का । लोकतांत्रिक माँगों के समर्थन में हुई हड़ताल के अवसर पर 12 अक्टूबर को ‘अभियान’ ने वहाँ कार्यक्रम पेश किया । खुले आकश के नीचे रात नौ दस बजे तक शान्‍ति‍ के साथ लगभग 900 लोगों ने कार्यक्रम देखा और सुना । ‘अभियान’ ने अपना सही आधार चुना और पहचाना था ।
दूसरा आमंत्रण मोर्चे की बलिया इकाई शहीद भगत सिंह सांस्कृतिक एवं स्पोर्टिंग क्लब का था । सतीश चंद्र डिग्री कॉलेज के सभा भवन में 30 अक्टूबर को कार्यक्रम करना तय हुआ । यह कार्यक्रम प्रेमचंद जन्म शताब्दी समारोह के अवसर पर आयोजित किया गया था । 29 अक्टूबर की रात बनारस से प्रस्थान करके ‘अभियान’ के कार्यकर्ता 30 अक्टूबर की सुबह बलिया में उतरे । थोड़ी देर आराम करने के बाद डिग्री कॉलेज के चित्रकला भवन में चित्रों की प्रदर्शनी लगायी गयी । भवन की एक दीवार पर प्रेमचंद की कहानियों पर बने चित्र तथा शेष दीवारों पर विश्‍व के श्रेष्ठ जनवादी लेखकों के उद्धरण लगाये गये । ये उद्धरण एक ही भवन में एकत्र होकर उन लेखकों की देश काल को लाँघती दृढ़ एकता को घोषित कर रहे थे । लगभग साढ़े पाँच बजे से कॉलेज के सभा भवन में प्रेमचंद पर एक गोष्ठी थी । इस बीच ‘अभियान’ के एक कार्यकर्ता देवब्रत सेन ने प्रेमचंद का एक बड़ा चित्र तैयार कर लिया था । वह चित्र मंच के ठीक सामने लगा हुआ था । मोर्चे के अध्यक्ष राम नारायण शुक्ल उस गोष्ठी के प्रमुख वक्ता और अध्यक्ष थे । उन्होंने प्रेमचंद के चित्र पर माल्यार्पण के बाद गोष्ठी का संचालन किया । अपने वक्तव्य में उन्होंने पहले के वक्ताओं की इस राय का खंडन किया कि प्रेमचंद के लेखन का उत्स गाँधीवाद था । उनके मुताबिक प्रेमचंद सत्य के लिये किसी की भी दुश्मनी मोल ले सकते थे इसीलिए ब्राह्मणवाद का विरोध उनके यहाँ अस्वाभाविक नहीं है । सत्य का पक्षधर होने के नाते ही वह अन्‍त में सशस्त्र क्रान्‍ति‍ का समर्थन करने लगे थे । सद्भावपूर्ण वातावरण में गोष्ठी समाप्त हुई । करीब 8 बजे से ‘अभियान’ का सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हुआ । शहर के 1200 लोग कार्यक्रम देख रहे थे । इनमें महिलाओं की उपस्थिति प्रगत्योन्मुख समाज का प्रमाण थी । ‘अभियान’ ने तीन नाटक व 12 गीत पेश किये । जनता का नाटक के व्यंग्य को समझते जाना प्रमाणित कर रहा था कि जनता का कलाकारों के साथ सीधा रिश्ता है । लोगों से प्राप्त आदर से भीगे हुए ‘अभियान’ के कलाकार कुछ नये अनुभवों के साथ वापस लौटे ।
तीसरा आमंत्रण लालगंज से मिला । गरीब जनता से चंदा माँगकर जुटाए गये धन का उपयोग जनता के लिये ही होना चाहिए यही सोचकर ‘अभियान’ को बुलाया गया था । 2 नवंबर की शाम को वाराणसी से चलकर कार्यकर्ता रात को लालगंज पहुँच गये । एक प्राइमरी स्कूल के सामने खाली जमीन पर मंच बनाया गया था । मोर्चे के सदस्य सुरेंद्र सिंह भी वहाँ मौजूद थे । 8 बजे से शुरू होकर कार्यक्रम 12 बजे रात खत्म हुआ । इस बीच आसपास के गाँवों के 3500 लोग कार्यक्रम देखते रहे । जनता का यह अपार धैर्य कार्यकर्ताओं में अपूर्व उत्साह का संचार कर रहा था । जनता की उन्नत राजनीतिक समझ का ही यह नतीजा था कि केवल जनवादी गीत और नाटक देखने सुनने के लिये गाँवों से लोग इतनी बड़ी संख्या में आये । इनमें से एक हजार लोग तो इतनी दूर से आये थे कि वहीं प्राइमरी स्कूल में रात सो रहे और सुबह होने के बाद घर लौटे । जनता से जुड़ने में अभियान के सामने सबसे बड़ी समस्या थी भाषा । इसे सुरेंद्र सिंह के साथियों ने हल किया । लोक धुनों पर रचे जनवादी गीत जनता के दुख-दर्द को स्वर दे रहे थे । तीनों नाटकों और कुछ गीतों के बाद अभियान के साथी उसी रात वापस लौट आए ।
हिन्‍दी साहित्य के गढ़ बनारस में ‘अभियान’ ने एक समय सांस्कृतिक हलचल पैदा की थी और आसपास के इलाकों में इसके नाटकों ने नया सांस्कृतिक बोध पैदा किया था ।     

वह झिझकती हुई अनौपचारिक मुलाकात : प्रकाश मनु


रघुवीर सहाय
‘दूसरा सप्तक’ के प्रमुख कवि‍ और साहि‍त्‍य अकादेमी पुरस्‍कार से सम्‍मानि‍त रघुवीर सहाय (9 दिसम्बर, 1929 – 30 दिसम्बर,1990) पर कथाकार प्रकाश मनु का संस्‍मरण-
‘देखिए, सबका अपना-अपना जीवन है, अपने विश्‍वास—यही सत्य है जीवन का! जीवन का कोई सत्य अन्‍ति‍म सत्य नहीं है, इसलिए यह जीवन अब तक टिका हुआ है और इसीलिये हमारे रचने के भी कुछ मानी हैं!’’
‘‘कविता भाषा के जरिये उसी सत्य की खोज है जो आत्म का होने के साथ-साथ, बल्कि इसीलिये पर का भी है। शायद इसीलिये कविता भाषा में जीना है, भाषा के साथ जीना है। कवि-कर्म इसीलिये आदमी को परिभाषित करना,  नये आदमी को बनाना भी है।”
एक भूरा-सा सँवलाया पहाड़ है, ऊपर से देखने पर कुछ-कुछ सूखा, चटियल, जिसके होंठ मैंने अभी-अभी हिलते देखे हैं।
पहाड़ सूखा भले हो, मगर भीतर उसके ‘पानी के संस्मरण’ हैं। शायद इसीलिये जब से उससे मिलकर आया हूँ, मैं भीतर से कुछ बदल-सा गया हूँ। चीजें अब ज्यादा साफ नजर आती हैं।
‘‘सबका अपना-अपना जीवन, अपने-अपने विश्‍वास हैं, अपने विश्‍वासों पर विश्‍वास!’’ मैं एक अजीब-सी लय में बुदबुदाने लगता हूँ, ‘‘वह कितना पुख्ता है, कितना सहज, इससे आप आँकिए लेखक को!’’
लेखक का जीवन, कवि का जीवन!
कवि का जीवन, कवि का…!
कुछ शब्द भीतर टुनटुनाए। उनकी गूँज तेज-तेजतर होती जा रही है और अब वे कुछ पंक्तियों की शक्ल में ढल गये हैं, ‘‘प्रिय पाठक, ये मेरे बच्चे हैं, कोई प्रतीक नहीं और इस कविता में मैं हूँ मैं, कोई रूपक नहीं।’’
‘‘मैं अपनी एक मूर्ति बनाता और एक ढहाता हूँ और आप कहते हैं कि कविता की है…!’’
‘‘लोकतंत्र—मोटे, बहुत मोटे तौर पर लोकतंत्र ने हमें इनसान की शानदार जिन्‍दगी और कुत्ते की मौत के बीच चाँप लिया है।’’
कुहासा अब छँट रहा है।
वह भूरा-सा सँवलाया पहाड़ अब धीरे-धीरे मनुष्याकृति में बदलता है। परिचित रेखाएँ—सख्त, कड़ी मुद्रा। फिर देखते ही देखते वह पिघलने लगता है—अरे, रघुवीर सहाय!

2

याद आ गई वह मुलाकात…!
याद भी क्या अजब बला है। अब जबकि वह नहीं हैं, अभी-अभी आँखों के आगे न जाने कहाँ से चला आया वह इतना सख्त आदमी। सख्त और कडिय़ल। चेहरे पर रेखाओं का ऐसा जाल, जैसे पत्थर पर पड़ जाती हैं लकीरें!
बाईस बरस! पूरे बाईस बरस हो गये उस मुलाकात को। उसके बाद भी दो-तीन दफा मिलना हुआ, पर वह मुलाकात! वह पहली मुलाकात कभी फीकी नहीं पड़ी, उसके रंग कभी धुँधलाए नहीं, ‘‘एक रंग होता है नीला और एक वह…!’’
गरमियाँ थीं, जून की गरम लू वाली दोपहर।
इतवार को ऐसी ही एक दोपहर में जब कपड़ों के भीतर जिस्म जलते हैं और चौतरफा सन्नाटा बज रहा होता है, मैं प्रेस एन्क्लेव यानी सहायजी के घर का पता पूछता-पूछता उनके पास पहुँचा था। दिल्ली के भूगोल से तब तो और भी कम परिचय था। यों अब भी कहाँ जान पाया हूँ!
मेरे हाथ में किताब थी, कविताओं की अपनी ताजी छपी किताब- ‘कविता और कविता के बीच’। मेरे मित्र देवेंद्र कुमार के साथ छपा साझा कविता-संकलन जो मैं अपने प्रिय लेखक को भेंट करना चाहता था। इंडो-बलगेरियन लिटरेरी क्लब ने उस पर एक गोष्ठी का आयोजन किया था जिसकी अध्यक्षता सहायजी को करनी थी। उन तक पुस्तक पहुँचाने का जिम्मा मेरा। सोचा था, इसी बहाने शायद उस कद्दावर लेखक से मुलाकात हो जाएगी, जिससे भीतर ही भीतर न जाने कितनी मुलाकातें हो चुकी थीं।
सुबह निकला था और बड़ी मुश्किलों-झंझटों से दो-चार होते हुये करीब-करीब बदहवास हालत में दोपहर तक पहुँचा था। और फिर वह मेरी पुरानी आदत, बगैर फोन…! जाने कब, कैसे मेरे दिमाग में बैठ गया है कि फोन करके होने वाली मुलाकातें ‘प्रायोजित’ होती हैं। तो सौ झंझट मंजूर हैं, मगर फोन नहीं।
भरी दोपहरी। धूप सीधी सिर पर गिर रही है—आग!
मैं पसीने-पसीने नीचे सडक़ पर खड़ा हूँ और ऊपर आँख किये नम्‍बर पहचान रहा हूँ, यही नम्‍बर लिखा था न डायरी में?
डायरी खोलता हूँ, बंद करता हूँ और सीढिय़ाँ चढ़ता हूँ।
सोच रहा हूँ—नहीं, नहीं, इस समय किसी भले आदमी को डिस्टर्ब करना ठीक नहीं है। बस, किताब देकर चला जाऊँगा।
दरवाजा खुलने पर जो युवती बाहर आई—शायद उनकी बेटी, उसे मैं किताब सौंपता हूँ। फिर ‘‘कृपया रघुवीर सहायजी को दे दीजिएगा!’’ कहकर जल्दी से सीढिय़ों की ओर कदम बढ़ाता हूँ।
‘‘क्या आप उनसे मिलना चाहेंगे?’’ सवाल मुझसे पूछा गया है।
अब मैं असमंजस में हूँ—कैसे कहूँ कि उनसे मिलना तो मेरे लिए सपना है। अपने प्रिय लेखक से कौन नहीं मिलना चाहेगा?
‘‘हाँ…नहीं, पर वे शायद व्यस्त होंगे। आप पूछ लीजिए उनसे।’’ घबराहट में मेरे मुँह से ऐसी भाषा निकलती है जिसका व्याकरण से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है।
मैं सीढिय़ों से नीचे की ओर निगाह गड़ाए खड़ा हूँ कि शायद ऐसा ही कोई जवाब आएगा और मैं झट चल पड़ूँगा। मेरे मन में कहीं न कहीं एक अक्खड़ छवि भी है रघुवीर सहाय की, एक साथ समाजवादी और एक स्नॉब आदमी। दोनों में से किसी से मेरा सीधा परिचय नहीं। एक को कविताओं से जानता हूँ, दूसरे को सुनी-सुनाई बातों से।
‘‘वे बुला रहे हैं…!’’
हाँ, यही मुझसे कहा गया है—वे बुला रहे हैं, वे…! और अगले ही क्षण मैं अपने प्रिय कवि के आगे था। वह कवि, जिसका काव्य-संसार मेरे लिए एक बीहड़ जंगल था। और वह जंगल मेरे लिए जीने की अनिवार्यता था। मैं उसमें घूमता, भटकता, साँस लेता था। सारे-सारे दिन वे मेरे साथ, मेरे भीतर उपस्थित रहते थे और सालों-साल हो गये थे हमें साथ-साथ रहते हुये। उनकी कविताओं से मुझे जीवन की खुराक मिलती थी, बल्कि जीने की तमीज मैंने उनसे सीखी।
वे मेरी कविताओं की किताब उलट-पलट रहे हैं। कभी शुरू से, कभी बीच-बीच से कुछ देखते हैं, फिर पलटते हैं, आगे बढ़ जाते हैं। फिर रुककर कुछ देखने लगते हैं। इस बीच मैं चोरी-चोरी कभी उनके चेहरे को, जिस पर एक हल्की-सी थकान साफ नजर आती है और कभी कमरे को देख जाता हूँ। कमरा क्या है, एक छोटा-सा केबिन, ढेर-ढेर किताबों से लबालब। लिखने की कुर्सी-मेज को छोडक़र बहुत कम जगह बची रहती है जिस पर पीछे की तरफ पैसेज-सा है, एक कमरे से दूसरे कमरे में जाने के लिए वहीं से गुजरना पड़ता है।
उन्होंने किताब एक ओर रख दी है, ‘‘मैं इसे पढ़ूँगा, फिर बात करेंगे कभी!’’ अब वे पूछ रहे हैं मेरे बारे में और बात वहाँ-वहाँ जा रही है, जहाँ का मैंने कभी सोचा ही नहीं था। मेरा ‘साइक्लॉजीकल फीवर’ कि जाने वे कैसे होंगे, उनसे कैसे बात करूँगा, अब गायब हो गया है। और मैं उनसे बात कर रहा हूँ, जैसे उम्र में बड़े अपने किसी दोस्त से बात कर रहा हूँ, अपने बड़े भाई से बात कर रहा हूँ। उससे जो उम्र और अनुभव दोनों में मुझसे बड़ा है और इस राह पर मुझसे पहले कई दफा आ-जा चुका है।
मैं बाल पत्रिका ‘नंदन’ में हूँ, यह पता चला तो सहायजी बाल साहित्य की चर्चा छेड़ देते हैं। पूछते हैं, ‘‘आप लिखते हैं बच्चों के लिए…?’’
‘‘जी, थोड़ा-सा। ज्यादातर कविताएँ।’’
मेरी बात सुनकर लगा, विचारों की एक दुनिया उनके भीतर बन रही है। फिर वे उससे निकले। गजब की मासूमियत के साथ कहते हैं, ‘‘मैं चाहकर भी कभी नहीं लिख सका बच्चों के लिये। मुझे बड़ा कठिन लगता है, हालाँकि इच्छा बराबर रहती है। पता नहीं, आप लोग कैसे लिख लेते हैं?’’
फिर याद करने लगते हैं, ‘‘एक जमाना था, बड़ों के लिये लिखने वाले सब लेखकों ने बच्चों के लिए लिखा। बांग्ला में आज भी यह परम्‍परा मिल जाएगी, लेकिन हिन्‍दी में…?’’ हल्का विषाद-सा उतर आया उनके चेहरे पर।
‘‘एक कारण शायद यह भी हो कि हिन्‍दी में बाल साहित्य का मौजूदा तालाब गँदला है। ज्यादातर छोटी प्रतिभा के लोग हैं और वे ऐसी आपाधापी मचाए रखते हैं कि कोई बड़ा लेखक इधर आए ही नहीं।’’ मैं थोड़ी तिक्‍तता से कहता हूँ।
‘‘शायद आप ठीक कह रहे हैं। इसीलिये बाल साहित्य से विरक्ति होती है। लोग कुछ भी लिख देते हैं, अनुवाद में तो और भी गड़बड़ है।’’ और सहायजी अपने कुछ कड़वे अनुभव सुनाने लगते हैं। फिर पूछते हैं, ‘‘आप बाल पत्रिका में कैसे?’’
‘‘इसलिये कि हमारे यहाँ ज्यादातर लोग ‘मिसफिट’ हैं और चुनने का अधिकार ज्यादातर लोगों के पास नहीं है।’’
अपने बारे में बताते-बताते मैं एकाएक दस वर्ष पीछे के एक निजी ‘महासमर’ में कूद जाता हूँ, ‘‘आपकी ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ ने एक तरह से मुझे आत्महत्या से बचाया था सहायजी।’’
‘‘क्यों, क्यों…कैसे?’’ वह एकाएक असहज हो उठे।
मैं कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में रिसर्च के दिनों के अपने हालात के बारे में बताता हूँ जब एक ओर कविता थी यानी कविता को शिद्दत से जीने की खुद्दारी, दूसरी ओर हैड का ‘गणित’, तीसरी ओर अंतरजातीय विवाह की अपनी भीषण मुश्किलें। ‘‘और मैंने—मैं जो कि दिन भर किताबें पढऩे वाला एक विचित्र एकांतिक जीव था, आखिर घबराकर आत्महत्या करने का फैसला कर लिया था। लगता था, मौत सामने खड़ी है, बुला रही है। बस, ब्रह्मसरोवर में कूदूँगा और खत्म—सब खत्म! और तब मुक्तिबोध और धूमिल के साथ-साथ ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ की कविताएँ थीं जिन्होंने मुझे आत्महत्या से बचाया। हालात सहते जाने की बजाय उन पर चोट करना सिखाया!
‘‘आपकी ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ से कविता का एक नया संस्कार, कविता की एक नई दुनिया मेरे भीतर बनी। मैं, जो छायावादी किस्म की चीज हुआ करता था और उसी के चलते मैं साहित्य में आया था, ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ से वह दुनिया टुकड़े-टुकड़े हो गई! एक तरह से अच्छा हुआ, इसलिए कि जहाँ वह रोमानी किस्म की कविता मेरी तकलीफों में मेरा साथ छोड़ गई—नाकाफी साबित हुई, वहाँ ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ ने मुझे बुरे से बुरे हालात में जीने का दर्शन दिया।’’
फिर मैं उस अनुभव के बारे में बताने लगता हूँ, जिसके बारे में सोचकर अब मैं खुद चकित रह जाता हूँ, ‘‘आपकी ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ किताब एक मित्र से लेकर पढ़ी थी, उस पर कीमत शायद पाँच रुपये पड़ी थी। मैं खरीदना चाहता था, तब एक दूसरा एडीशन आ गया था। उसका साइज बदल गया था और अक्षर भी शायद छोटे हो गये थे जो मुझे प्रिय नहीं थे। अकेली किताब प्रकाशक से माँगने की भी समस्या थी। लिहाजा मैंने पूरी किताब हाथ से लिखी। नहीं, पूरी नहीं, इसलिये कि मैंने और मेरी एक दोस्त ने, जो बाद में मेरी पत्नी बनी—उसे मिलकर लिखा था, भूमिका तक। पूरी किताब जस की तस हमने खुद तैयार कर ली। वह हस्तलिखित प्रति अब भी मेरे पास होगी। और यही नहीं, मुझे पूरी-पूरी कविताएँ याद थीं ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ की। मैं अकेले में उन्हें दोहराया करता था और विस्थितियों के खिलाफ खड़ा होने के लिये खुद को तैयार कर रहा था। फिर ‘हँसो, हँसो जल्दी हँसो’ आया तो उसकी भी तमाम कविताएँ मुझे अच्छी लगीं, याद भी हो गईं, पर उसके साथ वह रिश्ता नहीं बना जो ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ के साथ था। या फिर जो ‘सीढिय़ों पर धूप’ में की कविताओं के साथ था…खासकर उसकी पिता वाली कविता मुझे अद्भुत लगती है।’’
सहायजी गंभीर हैं, चकित भी। जैसे जो कुछ मैं कह रहा हूँ, उसकी लेखकीय सन्‍दर्भ में व्याख्या करने की कोशिश कर रहे हों।
फिर मैं उस दौर की अपनी मन:स्थिति के बारे में बताने लगता हूँ, ‘‘मैंने आपको शायद बताया था कि मैं उन दिनों प्रेम में था जब आपसे मुलाकात हुई थी, माने आपकी कविताओं में मुलाकात हुई थी। और सहायजी, हम दोनों ने साथ-साथ पढ़ी थीं ये कविताएँ। हम रिसर्च रूम के बाहर किसी पेड़ के नीचे बैठ जाते और ये कविताएँ पढ़ते और एक-दूसरे को सुनाते या डिस्कस करते। यानी इन कविताओं को पढक़र किया गया ‘प्रेम’। जाहिर है, हम बहुत सादे, बहुत सीधे, बहुत लड़ाकू थे, आपकी सपाटबयानी की तरह।’’

3

हँसते हैं सहायजी। उन्हें हँसता देखकर मेरा हौसला थोड़ा बढ़ता है और मैं आगे बढक़र थोड़ी छूट लेने की कोशिश करता हूँ, ‘‘उन दिनों आपकी कविता पढ़ी थी एक रंग होता है नीला…’’
पर बात अधूरी ही छूट गई क्योंकि इस बीच एक और कोशिश पास से गुजर रहे एक किशोर की शुरू हो जाती है जो मुझे उनके घर-परिवार का ही कोई आत्मीय सदस्य लग रहा है, ‘‘तो यह तय रहा न अंकल? परसों…!’’
‘‘हाँ-हाँ, परसों!’’
‘‘आप भूल तो नहीं जाएँगे?’’
‘‘नहीं।’’
‘‘नहीं-नहीं, आप भूल जाएँगे।’’
‘‘नहीं, मैं कोशिश करूँगा, बल्कि तय है…’’
वे उस बच्चे को जो कुछ पूछ रहा था, आश्वस्त करके मेरी ओर मुड़ते हैं, ‘‘आप…आप कुछ कह रहे थे?’’
‘‘हाँ, मैं कह रहा था कि…’’ मेरी अटपटाती लय फिर शुरू हो जाती है, ‘‘उन दिनों आपकी कविता पढ़ी थी, ‘एक रंग होता है नीला और एक वह जो तेरे जिस्म पर नीला होता है…’ तो बड़ा मजा आता था। उसके अर्थ खुलते थे बिलकुल अपनी तरह के। बिलकुल निजी बिम्‍बों का एक संसार मेरे भीतर बनता था। और वह दुनिया…वह दुनिया मैं आपको बताता हूँ, ‘नील परिधान बीच सुकुमार, खुल रहा मृदुल अधखुला अंग’ वाली प्रसादमय दुनिया से आगे, मीलों आगे की चीज थी।’’
बताते-बताते मैं शायद कुछ ज्यादा भावुक हो गया हूँ, ‘‘मैं कैसे बताऊँ आपको कि मेरे भीतर एक दुनिया एक और दुनिया को पछाड़ रही थी। कैसे बताऊँ कि यह कविता मैं उन दिनों पढ़ता था तो सोचता था कि यह कविता तो मैंने लिखी है, रघुवीर सहाय की कैसे हो सकती है यह कविता? क्योंकि इस कविता को जो मानी मैंने दिये हैं—मेरी प्रेमिका का जो ‘नीलापन’ और अनंत भगिमाएँ जुड़ गई हैं इसके साथ, वे उनको यानी रघुवीर सहाय को कैसे हो सकती हैं?…उनके लिये तो यह सब बिलकुल अज्ञात होगा। तो यह कविता उनकी कैसे हो सकती है?’’ कहते-कहते मुझे हँसी आ गई।
इस पर सहायजी भी खुलकर हँसते हैं तो मैं नोट करता हूँ, यह हँसी बहुत स्वादभरी, बहुत रंगभरी, बहुत अर्थभरी, बहुत अपनत्व भरी है।
इतने में श्रीमती सहाय पास से गुजरीं तो सहायजी परिचय कराते हैं, ‘‘आप…प्रकाश मनु। नई किताब आई है इनकी।’’
मैं हाथ जोडक़र नमस्कार करता हूँ।
‘‘आप कुछ लेंगे? ठंडा या गरम…?’’ सहायजी मेरी ओर देखकर पूछ रहे हैं।
‘‘चाय ले लूँगा।’’ मैं संकोच के साथ कहता हूँ।
‘‘मैं भी चाय पी लूँगा।’’ श्रीमती सहाय की ओर देखकर एक सादा घरेलू मुस्‍कान के साथ वे कहते हैं और उनके जाने के बाद मेरी और मुड़ते हैं। आँखों में गहरी चमक है, मुस्‍कराती हुई चमक, ‘‘ऐसा ही होता है। आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं। हर पाठक जो कविता को पढ़ता है और सचमुच कविता के अपने संसार, कवि के अपने रचना-क्षण से जुडक़र कविता को पढ़ता है, वह उसे एक नया अर्थ देता है। ऐसा अर्थ जो बहुत बार लेखक को भी अज्ञात होता है। यहाँ कविता कवि को उलाँघ जाती है, कवि से बड़ी हो जाती है, इसलिए कि वह कवि के अनुभव-संसार से निकलकर आपके अनुभव-संसार से जुड़ गई।’’
कहने के बाद सहायजी चुपचाप कुछ सोच रहे हैं। मैं कल्पना करता हूँ, उनके भीतर भी कोई और दुनिया बन रही होगी इसी तरह। वह दुनिया जिसमें एक लेखक के अलावा पाठक के तौर पर उनका अनुभव भी शामिल रहा होगा।
पर मेरे भीतर अब भी बहुत कुछ है, जो बाहर आने के लिए बेचैन है।
‘‘इसके अलावा सहायजी, जो बात उन दिनों आपकी कविताओं को पढ़ते हुए तीव्रता से महसूस हुई, वह आपको बताता हूँ। पहली दफा…मैं नहीं जानता कि इस बात को कैसे कहूँ, पहली दफा मैंने जाना कि कविताओं में लोग भी हो सकते हैं, या आ-जा सकते हैं, ठीक वैसे ही जैसे आपकी दुनिया में, दिल-दिमाग में…!’’
मैं जैसे अपने पाठकीय अनुभव को पूरी तरह कह डालने के लिए अकुला रहा हूँ, ‘‘मुझे अब भी याद है वह कविता—शायद ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ ही है शीर्षक उसका, जहाँ सत्ता के रोज-रोज के आतंक की काली छाया के बीच में छुटकी चली आती है अपना एक छोटा-सा सवाल लेकर कि क्या मामी को दो बार लिख सकते हैं कि आपकी याद आती है? इस एक सवाल ने कविता का अर्थ ही बदल दिया। उसमें एक अजब तरह की निजता आ गई जिसमें हमारी दुनिया का होना छिपा है। और एक और कविता में आपके बच्चे बिलकुल आपके बच्चों की तरह आते हैं और महसूस होते हैं, ‘‘छुओ इन्हें, छुओ…प्रिय पाठक, ये मेरे बच्चे हैं/कोई प्रतीक नहीं।’’
बोलते-बोलते मेरा स्वर अजीब ढंग से करुणाद्र हो आया है, ‘‘मैंने शायद हजार बार इन लाइनों को दोहराया होगा—हजार बार। मैं असल में समीक्षा-वमीक्षा की भाषा नहीं जानता। मैं सिर्फ इतना जानता हूँ कि ये लाइनें हैं जो मेरे भीतर से मरते दम तक नहीं जाएँगी।’’
रघुवीर सहाय इतने गम्‍भीर हैं, इतने जैसे मेरे सामने कोई व्यक्ति नहीं, कोई पहाड़ बैठा है। वे मेरी सारी गतियों को खुद में समेटकर स्थिर हैं, अचल समाधि। फिर अचानक पहाड़ के होंठ हिलते हैं और वह बोलने लगता है, ‘‘लेकिन…आपने ठीक समझा। यह कवि के रचना-क्षण के करीब जाकर उसे समझना है, लेकिन यह संवेदनशीलता—एक नई तरह की संवेदनशीलता, यूनिवर्सिटी के आचार्यों में नहीं है, ज्यादातर आलोचकों में भी नहीं है। यहाँ तक कि नामवर जी भी मेरी बहुत-सी कविताओं को नहीं समझ पाये। वे मेरे मित्र हैं, फिर भी कह रहा हूँ—और विश्‍वविद्यालयों के आचार्य तो कविता की व्याख्या करके उसकी सरासर हत्या ही करते हैं। मसलन मेरी एक कविता है जिसमें किसी पेड़ के पत्ते गिरने के जिक्र के साथ ‘पेड़ रच रहा होगा…’ पंक्ति आती है, तो इसमें पेड़ को पहले तो प्रतीक बनाना और फिर इसे रचना-प्रक्रिया के बिम्‍ब के रूप में देखना, यानी एक तरह से कविता की खींचतान करके उसे बिलकुल निरानंद कर दिया गया है। जबकि मेरे जेहन में तो पेड़ का मतलब पेड़ है। उसका रचना सचमुच पेड़ का रचना है और उसका अपना अर्थ, अपना सौंदर्य है।’’ कह लेने के बाद वह भूरा, अनगढ़ पहाड़ चुप है जिस पर घने पेड़ हैं, जंगली हवाएँ और एक अजब रूखापन। पानी जो भी हो, वह कहीं भीतर होगा जिसकी बूँदें, कभी-कभी हल्की बौछारें भी शब्दों में छलछला आती हैं।

4

चाय आ जाती है। वही बच्चा जो अपनी किसी समस्या से सहायजी को उलझाने की कोशिश कर रहा था, चाय रख गया है।
चाय का कप उठाते-उठाते मैं एक क्षण में अगले सवाल के लिए खुद को तैयार कर लेता हूँ और एक चौकन्नी पूछताछ शुरू कर देता हूँ—यह सावधानी बरतते हुए कि वे कहीं ‘हर्ट’ न हों।
‘‘सहायजी, आपकी बाद की कविताएँ—खासकर ‘हँसो, हँसो जल्दी हँसो’ के बाद जो संग्रह आये, उनके बारे में मुझे कुछ कहना है। ये कविताएँ दुखी आदमी के साथ, लड़ते हुये आदमी के साथ खड़ी नहीं हो पातीं, तो इसकी वजह क्या है?’’
‘‘आपको ऐसा लगा?’’ चाय पीते-पीते उनके माथे पर सलवटें नजर आईं। वे कुछ सोचने लगे हैं।
‘‘जी।’’ अपने संकोच से मुक्त होकर मैंने कहा, ‘‘लगता है, ये भीतरी गणित में ज्यादा उलझ गई हैं। भीतर के उलझाव, भीतर की गाँठें, अस्पष्ट प्रश्‍न और बुद्धिजीवी दिक्कतें—यही सब ज्यादा है। मुझे तो कम से कम यही लगा है, आपके पाठक के तौर पर। बीच-बीच में साफ लाइनें आती हैं जिनमें बड़ा दर्द, बड़ी समस्याएँ हैं, अनुभूति-विस्तार है, मगर यह सब कहीं-कहीं। ज्यादातर तो गोल-मोल है, एक छोटा दर्द उठाकर दूर तक उसकी चीरफाड़ है जैसा अज्ञेय के यहाँ हुआ करता था या दूसरे कलावादियों के यहाँ!’’
कहते-कहते मैं सीधा प्रश्‍न कर बैठता हूँ, ‘‘सहायजी, अच्छा, आपको ऐसा लगता नहीं कि आप कहीं उलझ गये हैं?’’
सहायजी के चेहरे पर एक सख्त-सा भाव आता है, जिसे खेल-खेल में वे जज्ब कर जाते हैं और अब वे सहज हैं, ‘‘आपकी बात शायद मैं समझ रहा हूँ। ‘आत्महत्‍या के विरुद्ध’ की जिन कविताओं की आप तारीफ कर रहे हैं, वे आपकी तरह मुझे भी पसंद हैं, बेहद पसंद हैं। पर इसका यह मतलब नहीं कि मैं उन्हें रिपीट करना शुरू कर दूँ—यानी वैसी ही एक और कविता बनाऊँ। यह कविता तो होगी नहीं, एक भौंडी चीज होगी…यानी ज्यादा से ज्यादा पहले वाली कविता की पैरोडी! तो मैं उसे बनाऊँ क्यों और आप उसे पढ़ेंगे किसलिये? मेरी बात शायद आपकी समझ में आ गई होगी।’’
‘‘निश्‍चि‍त रूप से, निश्‍चि‍त रूप से मैं समझ गया आपकी बात सहायजी। पर मैं कुछ और कहना चाहता हूँ।’’ मैं साहस बटोकर कहता हूँ, ‘‘शायद मैं अपनी बात आपको समझा नहीं सका। देखिए, ऐसा है सहायजी, ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ जब आपका संग्रह आया था, तब जो लड़ाइयाँ थीं समाज के हर स्तर पर, राजनीति का भदेसपना, क्रूरताएँ, गरीबी, शोषण आदि—तो संग्रह आने के बाद वे नहीं रहीं, ऐसा तो नहीं। बल्कि कई चीजें तो और उग्र हुई हैं, पहले से ज्यादा। अब हम ये जो लड़ाइयाँ हैं—आगे की लड़ाइयाँ, इनकी छोडक़र कहीं और जा बैठें तो इसे क्या कहेंगे? एक लेखक का काम तो यह नहीं हो सकता।’’
‘‘आप इसे दूसरी तरह से देखिए’’, सहायजी बगैर तैश में आये जवाब देते हैं, ‘‘एक लेखक के अनुभवों का, चेतना और सम्‍वेदना का लगातार विस्तार होता है—अगर वह सच में लेखक है, और यह जो विकास है किसी न किसी तरह से उसकी रचनाओं में भी आता है। क्या आपको यह विकास मेरी काव्य-यात्रा में दिखाई नहीं पड़ता?’’
चाय खत्म हो चुकी है—क्या अब मुझे उठना चाहिए? पर मैं अभी थोड़ा और बहसने के मूड में हूँ। इसलिए कुछ ज्यादा साफगोई से काम लेते हुए कहता हूँ, ‘‘मैं नहीं जानता कि इसे ठीक-ठीक विकास कहेंगे या कुछ और? मैं…सिर्फ एक बात आपके पाठक के तौर पर जो आपको बेहद-बेहद प्यार करता है, जानता हूँ—कि वे रघुवीर सहाय तो कहीं खो-से गये हैं जिन्हें मैंने आज के पूरे शोषण-तंत्र के खिलाफ, दोनों हाथों से और पूरे हौसले से लड़ते हुये देखा था। मैं नहीं जानता सहायजी कि और लोगों ने आपको इस बारे में कुछ कहा या नहीं—क्योंकि हिन्‍दी में साफ बात कहने का रिवाज नहीं है, निरी गिरोहबंदियाँ, तुमुलनाद और मुँहदेखी ही ज्यादा है। लोग शायद सच कहना नहीं चाहते। जो महसूस करते हैं, बार-बार महसूस करते हैं, वह तक नहीं कहते। तो एक पाठक की राय, एक बहुत साधारण पाठक की राय भी कहीं दर्ज कर ले आप।’’
मैंने इतनी देर में पहली बार उन्हें इस कदर खुश पाया है। इस पर फिर वही खिली हुई मुसकराहट, ‘‘ठीक है, मैंने दर्ज कर ली, लेकिन आप भी कहीं दर्ज करें मेरी बात!’’
‘‘क्या…?’’ मुझे इस खेल में मजा आ रहा है।
‘‘वह यह कि मैं चुका नहीं हूँ—और मैं चुकूँगा भी नहीं क्योंकि कवि का जीवन जीना मैंने बन्‍द नहीं किया। दूसरे शब्दों में, मैं चूँकि कवि का जीवन जी रहा हूँ, तो जो लिखूँगा, वह कविता होगी।’’
‘‘कवि का जीवन…?’’ मैं जोर देता हूँ। दरअसल मैं अकुला रहा हूँ—ऐसा क्या है जो उनके होंठों पर आते-जाते भीतर गुम हुआ जा रहा है। मेरे भीतर छोटी-छोटी घंटियाँ टुनटुना रही हैं। क्या पता था कि बरसों बाद भी यह प्रभाव जस का तस मेरे भीतर बना रहेगा और उनकी गूँजें मुझे बार-बार इसी चटियल पहाड़ की ओर खींच ले जाएँगी।
‘‘मैं फिर कभी इसके बारे में आप से चर्चा करूँगा, अगली मुलाकात के लिये इसे रखिए।’’ रघुवीर सहायजी यहीं ‘खेल’ खत्म करना चाहते हैं। एक प्यारी-सी कोशिश। जैसे बचपन में हम किसी को खासा पिदाने के बाद गिल्ली-डंडा लेकर निकल भागते थे!
‘‘नहीं, मैं इतनी आसानी से टल नहीं सकता। अब तो…आपने इतनी उत्सुकता पैदा कर दी।’’ मैं कल्पना में एक छोटा, जिद्दी बच्चा बन गया हूँ और सहायजी के कंधों पर लटक गया हूँ कि चिज्जी दें तो मानूँगा!
अब वे ‘चिज्जी’ लेकर आगे-आगे भाग रहे हैं, मैं पीछे-पीछे। वे आगे-आगे, मैं पीछे-पीछे! यह खेल मेरी कल्पना में देर तक चलता है और मुझे सुख और रोमांच से भर जाता है।
आखिर वे मान जाते हैं। राज खुलने की तैयारी। मैं साँस रोककर उनके शब्दों को पीने के लिए व्यग्र हूँ।
‘‘देखो भाई मनु,’’ कहने के बाद एक क्षण, सिर्फ एक क्षण के लिये वे अपने भीतर एक डुबकी लेते हैं और बाहर आते हैं। उनके स्वर में जो गम्‍भीरता है, वह भाषा को रस्सी की तरह बँट रही हैं, ‘‘असल में…होता यह है कि लिखते-लिखते एक सीमा के बाद लेखक में चालाकियाँ आ जाती हैं। लेखन के गुर…और आप कह सकते हैं, ढंग वह सीख जाता है। उसे चीजों को शक्ल देकर कविता या कविता जैसा बनाना आ जाता है, तो यह अहंकार भी साथ-साथ उसके भीतर आता है कि अब मुझे जीवन में कदम-कदम पर इतना जूझने, तकलीफें सहने, विद्रोह और छटपटाहट की जरूरत क्या है? कविता तो मैं विद्रोह की इसके बगैर भी लिख ही सकता हूँ—केवल अभ्यास से, कोरे अभ्यास से! तो जहाँ विस्थितियों के खिलाफ खड़े होने की, सख्त प्रतिक्रिया की जरूरत होगी, वहाँ वह चुप रहेगा। जहाँ व्यक्तिगत जीवन में ईमानदारी की बात होगी, वहाँ से वह खिसकेगा और अपने तर्क गढ़ लेगा, सुविधापूर्ण जीवन जीने के। यानी कुल मिलाकर अन्याय के खिलाफ उसकी लड़ाई कविता में तो होगी, जीवन में नहीं। जीवन में तो यही नजरिया उसका बनेगा कि आखिर क्या फर्क पड़ता है अगर अन्याय के खिलाफ लडऩे वालों में मैं शामिल न हुआ तो? और तो बहुत-से हैं ही…!’’
सहायजी रुककर मुझ पर दृष्टि गड़ा देते हैं, ‘‘आप समझ रहे हैं न!’’
‘‘हाँ।’’ मैं धीरे से फुसफुसाता हूँ। मैं जैसे जादू के प्रभाव में हूँ। शब्दों का जादू!
‘‘तो यह होता है! इस तरह धीरे-धीरे आप सिमटते जाते हैं कविता में ओर जीवन से कटते जाते हैं। आप सोचते हैं कि आप सिर्फ उस समय सम्‍वेदनशील रहें जब कविता लिख रहे हों, बाकी समय ठुल और ठस और दुनियादार रहें बाकी लोगों की तरह तो बुरा क्या है? इसे कवि के जीवन का चुकना कह सकते हैं। और अगर आप उम्र भर अपने जीन की छोटी-बड़ी घटनाओं में भी वही सम्‍वेदनशीलता दिखाएँगे जो आपकी कविताओं में है, वैसी ही प्रतिक्रियाएँ आपकी होंगी जैसी आपकी कविताओं में हैं और उसी जिम्मेदारी और जुझारूपन से आप जीवन जिएँगे, तो यह मेरा मानना है कि कवि का जीवन है। किसी के कवि होने का मतलब असल में यह कवि का जीवन जीना ही है।’’ कहने के साथ-साथ वह हौले से थाप लगा देते हैं, ‘‘मैं समझता हूँ, मैंने अभी कवि का जीवन जीना बंद नहीं किया, इसलिये मैं इतनी आसानी से मरूँगा नहीं।’’
अब वे मेरी ओर देखते हैं—एक ऐसे गुरु की भाँति जिसने अपनी सबसे बड़ी और ‘गोपन’ सिद्धि अपने शिष्य को दे दी हो। मैं आश्‍वस्त हूँ और मुस्‍करा रहा हूँ। मेरी मुस्‍कराहट ने शायद उन्हें भी आश्‍वस्त किया होगा। उनके चेहरे पर अब हल्कापन है और मुझे यह अच्छा लगता है।
उनकी कविताओं के प्रूफ पास ही मेज पर पड़े हैं। कई बार मेरी आँखें वहाँ से टकराकर लौट आई हैं।
‘‘आपके शायद नए कविता-संग्रह की तैयारी…?’’
‘‘हाँ।’’ वे प्रूफ उठाकर पढऩे लगते हैं। होंठ फिर उसी तरह हिल रहे हैं, जैसे किसी बड़े कवि के हिलते हैं जिसकी कविताएँ अपने समय का सच होती हैं।
‘‘मेरी इच्छा है सहायजी, आप कुछ कविताएँ मुझे सुनाएँ। मेरा यह सौभाग्य होगा।’’ अब मैं सहायजी से नहीं, अपने बड़े भाई से कह रहा हूँ।
”अच्छा, लेकिन एक सुनाऊँगा सिर्फ एक।’’ जिद क्या सहायजी नहीं कर सकते?
‘‘अच्छा, ठीक!’’
और वे सुनाना शुरू कर देते हैं।
मैं कविता सुन रहा हूँ, मगर शब्दों से अधिक उनका सुनाने का ढंग, उनकी आवाज, उनका चेहरा, उनकी चमकती हुई आँखें मेरे भीतर खुबती चली जाती हैं।
वे सुना रहे हैं और कसकर मुझे देख रहे हैं, मेरे चेहरे के छोटे से छोटे एक्सप्रेशन को जैसे जज्ब कर लेना चाहते हों। मैं बोल नहीं रहा, तो जैसे मेरे होंठों की अस्फुट ध्वनियों के अलावा मेरे चेहरे पर आता यही खिंचाव उन्हें मेरी प्रतिक्रिया समझने में मदद दे रहा है।
मेरा कविता में इस कदर डूबा होना शायद उन्हें अच्छा लगा हो, इसलिए वे एक और कविता सुनाते हैं। फिर एक और…!
मुझे भीष्म की प्रतिज्ञा का टूटना अच्छा लग रहा है। उन्होंने तो सिर्फ एक कविता सुनाने के लिए कहा था न! फिर मैं उनसे सीढिय़ों पर धूप में की ‘शक्ति दो, बल दो, हे पिता/…पैरों में कुली की-सी चाल छटपटाय…’ कविता पढऩे का आग्रह करता हूँ, ‘‘यह मुझे बहुत प्रिय है।’’
सहायजी एक स्निग्ध दृष्टि मुझ पर डालते हैं। जैसे कह रहे हों, ‘यह तो मुझे भी इतनी ही प्रिय है!’ और पास ही रैक में रखा संग्रह उठाकर पढऩा शुरू कर देते हैं। एक सादी, लेकिन गहरी आत्मीयता से लिपटी लय।
कविता पूरी होते ही मैं किसी कृपण की तरह जो कुछ मिला, उसे झोली में समेटकर उठ खड़ा होता हूँ, ‘‘अब चलूँगा।’’
यह क्षण मेरे जीवन के सबसे समृद्ध, भरे-पूरे क्षणों में से एक है। मैं आँधियों में हरहराते पेड़ जैसा था और आँधियाँ गुजर जाने के बाद पेड़ पर जो खरोंचें छूट जाती हैं, जो सहनशक्ति और भराव आता है, उसे कैसे कहूँ? और वे, ‘‘आप कैसे जाएँगे?’’ पूछने के बाद खुद-ब-खुद बताना शुरू कर देते हैं कि मैं कैसे बस टर्मिनल तक पहुँच सकता हूँ और वहाँ से किस-किस नम्‍बर की बस मिल जाएगी।
मैं हाथ जोडक़र वापस मुड़ता हूँ और सीढिय़ाँ उतरने लगता हूँ।

5

ताज्जुब है, पिछले दिनों ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ की हाथ से लिखी प्रति उठाकर पलट रहा था तो अचानक लगा, इसमें गुजरे हुए दिनों के दुख-पीड़ाओं और स्मृतियों की गंध के साथ-साथ एक और गंध आकर शामिल हो गई है—उस मुलाकात की गंध! और इस दुनिया के भीतर एक छोटी, मगर जीवंत दुनिया जो मैंने बना रखी थी, जहाँ सोते-जागते, चलते-फिरते कविता की पंक्तियाँ मेरा पीछा करती थीं, उस दुनिया के तमाम-तमाम अनकहे बिम्‍बों में एक बिम्‍ब आकर और जुड़ गया है। एक भूरे-सँवलाए, चटियल पहाड़ वाला बिम्‍ब, जिसमें बाहरी रूखेपन के भीतर बहुत कुछ लहर-लहर बह रहा है। और वहाँ पेड़ बहुत हैं, रंग और हरियाली भी। और उसके साथ ही वह पूरी मुलाकात याद आ जाती है, वह रोमांच…वही कशिश!
अचानक मेरे होंठों पर रघुवीर सहाय की कविता की लाइनें चली आती हैं। वह कविता जो एक समय था, मेरे खून में रच-बस गई थी और अब भी वह कहीं न कहीं खून की लय में ताल देती है—
एक रंग होता है नीला
और एक वह जो तेरे जिस्म पर नीला होता है
इसी तरह लाल भी लाल नहीं है
बल्कि एक शरीर के रंग पर एक रंग
दरअसल कोई रंग कोई रंग नहीं है
सिर्फ तेरे कंधों की रोशनी है
और कोई एक रंग जो उस पर पड़ा हुआ है
कंधों पर पड़े इस रंग की याद में खोया नहीं कि अनचाहा दृश्य एकाएक पलटता है और सहायजी अपनी ‘सपाटबयानी’ के मायने बताते नजर आते हैं। कुछ ऐसे कि सपाटबयानी के भीतर की अकुलाहट उसे चीरती हुई बाहर आ जाती है और कविता ‘हाथ की छटपटाहट’ बन जाती है—
न सही यह कविता
न सही यह कविता
यह मेरे हाथ की छटपटाहट सही
यह कि मैं घोर उजाले में खोजता हूँ
आग
जबकि हर अभिव्यक्ति
व्यक्ति नहीं
अभिव्यक्ति
जली हुई लकड़ी है न कोयला न राख।
लग रहा था, रघुवीर सहाय के दो विरोधी—नहीं, विरोधी लगते मूड्स हैं ये, और रघुवीर सहाय इनके बीच कहीं हैं।
नहीं-नहीं, रघुवीर सहाय को पाना इतना आसान नहीं। इसलिए कि हर बार वे आपकी बनाई हुई हदों को फलाँग जाते हैं, किसी भी बड़े कवि की तरह। किसी भी भाषा में हर दौर में ऐसे कुछ ही कवि होते हैं जो एक मूर्ति बनाते, एक ढहाते हैं। और जो सिर्फ ‘ढहाते’ हैं या जो सिर्फ बनाए चले जाने का भ्रम पाले बैठे हैं, उनका तो कहना ही क्या!

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इस मुलाकात के बाद की भी तमाम स्मृतियाँ हैं। ‘कविता और कविता के बीच’ पर हुई उस गोष्ठी की भी, जिसमें रघुवीर सहाय इस कविता-संग्रह से शुरू करके आज की कविता की मुश्किलों और एक ईमानदार कवि के सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में खुलकर और पूरे तरन्नुम में बोले थे। साहित्य अकादेमी में हुई कवि-गोष्ठी की भी याद है जिसमें सहायजी के अलावा गिरिजाकुमार माथुर, विष्णु खरे, कन्हैयालाल नंदन, गोपीचंद नारंग, अमृता प्रीतम वगैरह शामिल थे और जिस पर एक अप्रत्याशित रूप से कठोर टिप्पणी उन्होंने जनसत्ता के ‘अर्थात’ कॉलम में लिखी थी, ‘कृपया चुप रहिए।’ अंतिम याद उनकी मृत्यु से सिर्फ चार-पाँच दिन पहले की है। मैंने ‘अर्थात’ की उनकी एक टिप्पणी, जो प्रकाशन विभाग की पत्रिका ‘आजकल’ के बारे में थी—के बारे में पूछा था। और उन्होंने ‘जनसत्ता’ में सुरेश शर्मा से मिलने के लिये कहा था, ‘‘वह जरूर आपकी मदद कर देंगे। पर वे ‘जनसत्ता’ छोडक़र कहीं और जॉइन करने वाले हैं। आप जल्दी कीजिए, जल्दी!’’
उनकी आवाज में एक आसामान्य किस्म का उतावलापन था, जो पहले जब भी मिला या सुना, कतई नजर नहीं आया था। और उसके चार या पाँच रोज बाद ही, उनके निधन का समाचार आया तो उस ‘जल्दी कीजिए, जल्दी…!’ का एक बिलकुल ही दूसरा अर्थ समझ में आया। उस समय जब उनका स्वर सुनकर चौंका था, तब नहीं दिखा था कि वे जल्दी, बहुत जल्दी सब कुछ पीछे छोडक़र चले जाने वाले हैं।
रघुवीर सहाय हमारे युग के उन थोड़े-से लेखकों में से थे जिन्होंने सत्ता के आगे ‘हें-हें’ करने वाले लेखकों से अलग लेखक की इमेज बनाने की चिन्‍ता में जीवन-भर संघर्ष किया। सत्ताप्रिय ‘गद्गदायमान’ लेखकों की भीड़ में वह ‘एक भयानक बात कहकर बैठ जाने वाले’ लेखक थे। शायद इसीलिए उन्होंने प्यार नहीं, नफरत को भी एक रचनात्मक अर्थ दिया, ‘‘एक मेरी मुश्किल है जनता जिससे मुझे नफरत है, सच्ची और निस्संग!’’ हालाँकि यह नफरत ऐसी है जिस पर सौ प्यार न्योछावर हैं।
उन्होंने इसी दुनिया के बीच लेखक की एक दुनिया बनाने की चिन्‍ता की और शायद इसीलिए, वे उन लोगों में से थे जिनके बारे में बिना शक कहा जा सकता है कि उनका जीना-मरना, बोलना, चलना, फिरना कुछ भी साहित्य से अलग नहीं था। और आखिर में, जैसी कि उनकी प्रतिज्ञा थी, वह मरे भी इसी दुनिया में, इसी दुनिया के लिये! और मुझे याद आते हैं उनके शब्द—
‘‘…सबसे मुश्किल और एक ही सही रास्ता है कि मैं सब सेनाओं में लड़ूँ—किसी में ढाल सहित, किसी में निष्कवच होकर—मगर अपने को अन्‍त में मरने सिर्फ अपने मोर्चे पर दूँ—अपनी भाषा के, शिल्प के और उस दोतरफा जिम्मेदारी के मोर्चे पर जिसे साहित्य कहते हैं।…भाइयो, अगर हम अपनी दुनिया में जूझते-जूझते जिन्‍दा नहीं रह सकते तो कम से कम इतना करें, जब मरना पड़े तो उसी में मरने की कोशिश करें।’’
आज भी जब कभी किसी नैतिक संकट या सृजन की मुश्किल में पड़ता हूँ, अपने ‘सेनानायक’ के ये शब्द अँधेरे को चीरती रोशनी की शहतीर की तरह याद आते हैं। बहुत…बहुत याद आते हैं।
(हाल ही में प्रकाशित संस्मरणों की पुस्तक ‘यादों का कारवाँ’ से साभार। प्रकाशक: शान्‍ति‍ पुस्‍तक मन्‍दि‍र, 71 ब्‍लॉक-के, लाल क्‍वार्टर, कृष्‍णा नगर, दि‍ल्‍ली-91)

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