बुधवार, 31 अगस्त 2011

प्रेस क्लब / अनामी शरण बबल-6






बस जल्द ही बढ़ने  वाला है रेल किराया

जनता जर्नादन होशियार,  बा मुलाहिजा सावधान । लालू ममता की दया धार अब बंद होने वाली है। सात साल के बाद एक बार फिर रेल किराया में बढ़ने का दौर चालू होने जा रहा है। बिहार को रसातल में ले जाने के लिए कुख्यात बदनाम लालू राबड़ी राज का कलंक अभी तक बरकरार है, इसके बावजूद एक रेल मंत्री के रूप में लालू ने कमाल किया और लगातार पांच साल तक रेल किराये को बढ़ने नहीं दिया। आय के अन्य संसाधनों को बढ़ाकर रेलवे को घाटे में नहीं आने दिया। लालू के बाद ममता बनर्जी ने भी लालू के पदचिन्हों पर चली, और किराये को नहीं बढ़ाया। मगर ममता पार्टी के प्रेशर से रेल मंत्री बने दिनेश त्रिवेदी ने दया करूणा प्रेम ममता और संवेदना को दरकिनार करते हुए रेल भाड़ा बढ़ाने का गेम चालू कर दिया है। संसाधनों को तलाश कर आय में चौतरफा बढ़ोतरी के उपायों में जुट गए है। रेल घाटे से बेहाल है, क्योंकि ममता दीदी ने रेल की बजाय वेस्ट बंगाल पर तो ध्यान दिया, मगर रेल को लेकर अपने कर्तव्य भूल गई। देश यूपीए और सरदार जी की गद्दी पर कोई खास संकट (अन्नामय की तरह) नहीं आया तो साल 2011 के अंत तक देश की जीवनरेखा माने जाने वाली रेल में सफर करना पहले से कुछ महंगा जरूर हो जाएगा।



युवराज की छवि संवारने और दिखाने की मुहिम

अन्ना अनशन में देश एकजुट हो गया, मगर हमेशा की तरह दिल्ली में मौनी बाबा बने रहने वाले अपने युवराज यानी राहुल बाबा इस बार भी खामोशी के साथ हंगामा देखते रहे। देखते रहे अपनी पार्टी और पीएम की फजीहत। एक तरफ सरकार की पैंट गिल्ली होती रही तो दूसरी तरफ अन्ना की आंधी से पूरी सरकार का दम उखड़ती रही। हालात को हाथ से बाहर होते देख पर्दे के पीछे से कमान थामे राहुल बाबा को संसद में पूरा पक्ष रखना पड़ा। अन्ना के सामने सरकार को मत्था टेकना पड़ा। हालांकि ये सब हुआ तो राहुल बाबा के निर्देश पर ही। मगर जब पूरा देश अन्नामय होकर उल्लास मना रहा है तो सरकार को अगले साल होने वाले कई चुनावों की चिंता सताने लगी। लिहाजा लोकपाल बिल पर सरकार कोशिश करसरही है कि कुछ चक्कर इस तरह का चलाए कि लोकपाल मामले में अन्ना की जगह राहुल बाबा को भी पूरा श्रेय मिले, ताकि पार्टी सीना चौड़ा करके अन्ना का काउंटर कर सके।


भाई ने भाई को मारा( पछाड़ा)


कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी किसी भी पार्टी के नेता से मात खा जाए या पस्त हो जाए तो चलता है। मगर खासतौर पर अपने चचेरे भाई वरूण गांधी से पस्त हो जाए यह खुद राहुल प्रियंका सोनिया समेत पार्टी को कतई बर्दाश्त नहीं होता। कई मामलों में वरूण से मात गए राहुल बाबा  की अपने भाई के सामने बोलती ही बंद हो गई। खासकर कई साल तक इंतजार के बाद भी शादी नहीं करने पर इसी साल छोटे भाई ने बनारस में शादी करके बड़ी मम्मी के दुखते रग पर हाथ रख दिया। पूरे देश में इस शादी से ज्यादा चर्चा सोनिया राहुल प्रियंका के इसमें शरीक नहीं होने से हुआ। अब ताजा मामला अन्ना आंदोलन का है कि युवा भीड़ अंत तक अपने युवा नेता राहुल बाबा को तलाशती ही रही, मगर वे नहीं आए, मगर वरूण की सक्रिय मौजूदगी ने एक बार फिर अपने बड़े भाई को पछाड़ ही दिया।.


बहनजी की सक्रियता आई काम

पंजा पार्टी में मैडम अम्मा हैं तो प्रियंका वाड्रा गांधी पूरे पार्टी के लिए बहनजी है। हालांकि वे राहुल गांधी की सगी बहन है, पर पूरे पार्टी ने इन्हें अपनाया और माना। इस समय पार्टी सुप्रीमों और इनका मम्मी जब देश से बाहर है तो पार्टी का सारा काम पर्दे के पीछे बहनजी के हाथ में है। देश की जनता के मूड को भांपना और अन्ना की ताकत के सामने सरकार के घुटने टेकने की कवायद और चालाकी सब भाई-बहनों के निर्देश पर हुए। हालांकि पार्टी सुप्रीमों द्वारा गठित कोर कमेटी को साथ लेकर तमाम फैसले हुए मगर कुल मिलाकर पार्टी और टीम पीएम के कोरे ज्ञान ने दिखा और बता दिया कि अपन सरदार जी विवेक पूर्वक और अपने मन से काम करने में एकदम कोरे कागज है। पीएम के नासमझी पर बहनजी ने कई बार रोष भी जताया। अब देखना है कि देश में खराब हुई पार्टी और सरकार की छवि को युवराज के सहारे ठीक करने की मुहिम में क्या अपने सरदार जी भी कदमताल कर पाएंगे ?  

पार्टी का आत्ममंथन

अन्ना हजारे का अनशन भले ही खत्म हो गया हो, मगर पंजा पार्टी में आत्ममंथन का दौर चालू हो गया है। अन्ना हजारे को हल्केपन से आंकने की भूल से लेकर अनशन के दौरान गलत बयानी और नेताओं के उग्र तेवर से होने वाले नुकसाल की समीक्षा की जा रही है। कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी,से लेकर प्रणव मुखर्जी,लुबोधकांत सहाय दिग्गी राजा से लेकर तमाम नेताओं के बयानों पर यही वोग समीक्षा करने में लगे है। खासकर प्रियंका और राहुल नेताओं द्वारा अन्ना की फौज को कमतर आंकने की भूल को माफ करने के मूड में नहीं है। अगले साल होने वाले यबपी समेत कई राज्यों के चुनाव और समाज में पार्टी की इमेज को लेकर एक गुप्त रिपोर्ट मंगवा रही है। इस बाबत एक सर्वे भी कराने पर जोर दिया जा रहा है। खासकर यूपी में अन्ना के बाद की हालात को जानने के लिए बाबा उतावले है कि सालों की मेहनत का कोई असर अभी बाकी है या अन्ना की आंधी में सब धुल(उखड़) गया। (खबर लिखने के बाद पता चला कि बेकाबू होकर बोलने में उस्ताद अपने मनीष तिवारी पर कैंची चल गई है)


अन्ना के सामने सब ढेर


महाराष्ट्र में जनसंघर्ष करने वाले अन्ना हजारे की मार्च 2011 तक नेशनल इमेज होने के बाद भी लोकप्रिय नहीं थे। खासकर धाक और प्रभाव के मामले में भी अन्ना को कोई खास महत्व नहीं दिया जाता था। मगर, एक गांधीवादी अहिंसक आंदोलनकारी की साफ सुथरी छवि होने के कारण ही दिल्ली के नेताओं को अन्ना की जरूरत पड़ी। अप्रैल में अपने मजबूत इरादे और आत्मबल से सरकार को मजबूर करने वाले अन्ना रातोरात इतने लोकप्रिय हो गए कि लोग इन्हें आज तो गांधी जैसा मानने लगे है। देश विदेश की मीडिया में सराहे जा रहे अन्ना के सामने सारे धूमिल से हो गए है। चाहे खिलाड़ी हो या अभिनेता कोई भी इनके सामने टीक नहीं पा रहा । अन्ना के पीछे पूरा देश देखकर तो सारे हैरान है कि इस 74 साल के नौजवान ने इतनी बड़ी लकीर खिंच दी है कि इसके सामने तो अभी कोई नहीं ठहरता।
           
ये तो होना ही था

अन्ना हजारे की दादागिरी नुमा गांधीगिरी जिसे अब अन्नागिरी के नाम से पुरा देश जानता, मानता और अपनाया है। अन्ना की छवि देश के दूसरे गांधी के रूप में उभरी। लोकप्रियता के चरम पर स्थापित अन्ना की इस लोकप्रियता से बौखलाए टीम अन्ना के (खुद को अन्ना से ज्यादा महान मानने वाले) सदस्यों में स्वामी अग्निवेश और रामदेव बाबा का हश्र सारा देश देख रहा है।  बंधुआ मुक्ति मोर्चा और अंग्रेजी विरोध समेत पांच तारा होटलों के बाहर प्रदर्शन करने वाले को तरजीह देने की बजाय अन्नागान सो तो बौखलाना ही था। इस भीड़ में कोई घास भी ना डाले इससे बेहतर है कि कपिल (?) मुनि की गोद में बैठकर मलाई ही चाटे। यही हाव योगगुरू रामदेव का हुआ। अन्ना के अप्रैल वाले अन्नागिरी से परेशान बाबा कालाधन के खिलाफ जोरदार हंगामे के साथ अन्ना को डाउन दिखाना चाहते थे। पर रामलीला मैदान में राम(देव) लीला क्या हुआ  यह सारा देश जानता है। अपने लालच और स्वार्थ वश अन्ना के साथ आने वालों का राज खुल गया। वाचाल रामदेव की बोलती ही बंद हो गई है। देखना है कि सरकारी मेहमान बनने की लालसा वाले अग्निवेश का क्या होता है। चाहे जो हो , मगर बंधुआ मुक्ति मोर्चा के पुरोधा अब खुद सरकारी बंधुआ होते जा रहे है।

मनमोहन पर मनमोहनी कविता

अन्ना आंदोलन के दौरान युवाओं ने कविता पैरोडी और हास्य व्यंग्य से जमकर उल्लास मनाया। अपने सरदारजी यानी पीएम मनमोहन सिंह सबों के सबसे पंसदीदा थे। मुन्नी बदनाम होने के बाद मुन्ना बदनाम हुआ की तर्ज पर लोगों ने अपने मुन्ना यानी मनमोहन जी पर कुछ इस तरह वार किया।

मुन्ना बदनाम हुआ मैडमजी आईसी(कांग्रेस आई) के लिए।
अपनी इज्जत का फलूदा बनाया मैडमजी आईसी के लिए।।

 राजा ने जमकर टूजी मे इजी करप्शन किया
 सुरेश शीला पर आपने एक्शन नहीं लेने दिया
 सालों की इमेज का काम तमाम किया मैडमजी आईसी के लिए।।

मनमोहन पर एक और गाने का मजा ले

अली बाबा 40 चोर की बात हुई पुरानी।
नए जमाने में है अब तो नयी कहानी .।।
मॅाल मोबाइल मेट्रो की मौज है
और सबसे ईमानदार पीएम की टोली में 40 चोरों की फौज है।।  



और जो अन्नागिरी से बच गए (लात जूता खाने से)

अन्ना हजारे भले ही सरकार के लिए सिरदर्द बन गए हो, मगर कुछेक लोगों के लिए तो अन्ना तारणहार बन गए। उनके मन में यह सोचकर ही दिल बैठ जाएगा कि यदि अन्ना महाराज का अनशन नहीं चल रहा होता तो इंगलैंड में गोरों के हाथों बुरी तरह शर्मनाक मात खाने के बाद अपन हिन्दुस्तान के पागल क्रिकेट प्रेमी इन क्तिकेटरों की क्या गत करते। अगर आपको कुछ याद नहीं है तो 2007 में विश्वकप के पहले ही दौर में बाहर होने के बाद तो सारे क्रिकेटरों को अपने फैन से चोर की तरह छिपछिपा कर घर पहुंचना  पड़ा था। किसी के घर के बाहर होलिका दहन की गई को किसी के घर को ही फूंकने की कोशिश की गई। मगर धोनी के धुरंधरों का ये सौभाग्य ही रहा कि हारे भी इस कदर कि खुद ही शर्मसार हो गए मगर अन्ना की आंधी में ज्यादातर भारतीय युवाओं ने क्रिकेट में देश की भारी पराजय को कोई भाव ही नहीं दिया।

कामनवेल्थ के चोरों मिला जीवनदान

पानी अब इतना महंगा औक दुर्लभ होता जा रहा है कि पानी की तरह पैसा बर्बाद करने का मुहाबरा भी गलत दिखने लगा है। सरकारी पैसे को अनाप शनाप खर्चे करने वालों में दिल्ली की सीएम शीला दीक्षित भी अन्ना अनशन से बच गई। एक तरफ अन्ना और दूसरी तरफ सोनिया का इलाज कराने अमरीका जाना भी शीला को लाईफ मिलने का कारण बन गया। अपन पीएम साहब तो दबंग है नहीं कि मैडम के बगैर कुछ कर सके। यानी अन्ना को सरकार चाहे जितना कोस ले मगर वाकई अन्ना कितनों के लिए धन्ना बन गए। जय हो जय हो अन्ना हजारे जी जय हो।



नवाकुंरों के जज्बे को सलाम

करीब पांच माह (एक्जाम और एडमिशन) के अंतराल के बाद वर्ष 2011-12 में मीडिया छात्रों को पढ़ाने का खाता दयालबाग एजूकेशनल इंस्टीट्यूट (डीइआई) से शुरू हुआ। दिल्ली की अपेक्षा छोटे और मीडिया के लिहाज से बेहद कम साधनों वाले शहर में रहकर  मीडिया में कैरियर बनाने की तैयारी करना हमेशा कठिन होता है। पत्रकारिता के बारे में सैद्धांतिक तौर से ज्यादा नहीं जानने के बाद भी इनके उत्साह और कुछ कर गुजरने की लालसा देखकर मन संतुष्ट हुआ। चाहे अतुल से लेकर पवन बघेल, पूजा मनवानी, मोनिका ककरवानी, श्वेता सारस्वत, रेणु सिंह, अंशिका चतुर्वेदी हो या नेहा सिंह। यानी कुल आठ छात्रों के मिजाज को देखना उत्साहवर्द्धक लगा। वहीं मीडिया के प्रति लड़कियों की जीवटता उत्साह (भले ही लगन कहना अभी जल्दबाजी होगी) को देखना और भी ज्यादा अनोखा और सुखद लगा कि इस बार आठ छात्रों में छह लड़कियां है। इनके जज्बे को सलाम करता हूं। साथ ही इनके हेड ज्योति कुमार वर्मा जी और इनके तमाम साथियों से  अपेक्षा करूंगा कि वे इन्हें इस तरह तराशें ताकि उत्साह ज्ञान और अनुभव से ये भावी पत्रकार खुद को निखार सके। सबों के उज्जवल और बेहतर भविष्य की कामना के साथ मीडिया या पत्रकारिता में स्वागत है।

भारत में सूर्य मंदिरों की सूची

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यह सूची भारत में सूर्य - मंदिरों की है:-

कोणार्क में सूर्य देव

मार्तंड, कश्मीर
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देव सूर्य मंदिर


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यह बिहार के देव (औरंगाबाद जिला) में स्थित सूर्य मंदिर है। यह मंदिर पूर्वाभिमुख ना होकर पश्चिमाभिमुख है। यह मंदिर अपनी अनूठी शिल्प कला के लिए प्रख्यात है। पत्थरों को तराश कर बनाए गए इस मंदिर की नक्काशी उत्कृष्ट शिल्प कला का नमूना है। यहाँ छठ पर्व के अवसर पर भारी भीड़ उमड़ती है।

अनुक्रम

[छुपाएँ]

[संपादित करें] मंदिर का निर्माण

प्रचलित मान्यता के अनुसार इसका निर्माण स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने किया है। इस मंदिर के बाहर संस्कृत में लिखे श्लोक के अनुसार 12 लाख 16 हजार वर्ष त्रेतायुग के गुजर जाने के बाद राजा इलापुत्र पुरूरवा ऐल ने इस सूर्य मंदिर का निर्माण प्रारम्भ करवाया था। शिलालेख से पता चलता है कि पूर्व 2007 में इस पौराणिक मंदिर के निर्माणकाल का एक लाख पचास हजार सात वर्ष पूरा हुआ। पुरातत्वविद इस मंदिर का निर्माण काल आठवीं-नौवीं सदी के बीच का मानते हैं।

[संपादित करें] स्थापत्य

कहा जाता है कि सूर्य मंदिर के पत्थरों में विजय चिन्हकलश अंकित हैं। विजय चिन्ह यह दर्शाता है कि शिल्प के कलाकार ने सूर्य मंदिर का निर्माण कर के ही शिल्प कला पर विजय प्राप्त की थी। देव सूर्य मंदिर के स्थापत्य कला के बारे में कई तरह की किंवदंतियाँ है।
मंदिर के स्थापत्य से प्रतीत होता है कि मंदिर के निर्माण में उड़िया स्वरूप नागर शैली का समायोजन किया गया है। नक्काशीदार पत्थरों को देखकर भारतीय पुरातत्व विभाग के लोग मंदिर के निर्माण में नागर एवं द्रविड़ शैली का मिश्रित प्रभाव वाली वेसर शैली का भी समन्वय बताते है।

[संपादित करें] प्रतिमाएँ

मंदिर के प्रांगण में सात रथों से सूर्य की उत्कीर्ण प्रस्तर मूर्तियां अपने तीनों रूपों उदयाचल, मध्याचल तथा अस्ताचल के रूप में विद्यमान हैं। इसके साथ ही वहाँ अद्भुत शिल्प कला वाली दर्जनों प्रतिमाएं हैं। मंदिर में शिव के जांघ पर बैठी पार्वती की प्रतिमा है। सभी मंदिरों में शिवलिंग की पूजा की जाती है। इसलिए शिव पार्वती की यह दुर्लभ प्रतिमा श्रद्धालुओं को खासी आकर्षित करती है।

[संपादित करें] मंदिर का स्वरूप

मंदिर का शिल्प उड़ीसा के कोणार्क सूर्य मंदिर से मिलता है। देव सूर्य मंदिर दो भागों में बना है। पहला गर्भ गृह जिसके ऊपर कमल के आकार का शिखर है और शिखर के ऊपर सोने का कलश है। दूसरा भाग मुखमंडप है जिसके ऊपर पिरामिडनुमा छत और छत को सहारा देने के लिए नक्काशीदार पत्थरों का बना स्तम्भ है। तमाम हिन्दू मंदिरों के विपरीत पश्चिमाभिमुख देव सूर्य मंदिर देवार्क माना जाता है जो श्रद्धालुओं के लिए सबसे ज्यादा फलदायी एवं मनोकामना पूर्ण करने वाला है।

[संपादित करें] रख-रखाव

इस मंदिर के देखभाल का दायित्व देव सूर्य मंदिर न्यास समिति का है।

शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

प्रेस क्लब / अनामी शरण बबल-5





युवराज की फटकार के बाद  जागी टीम मनमोहन

अन्ना की आंधी इतनी विकराल होगी, शायद इसका अनुमान तो टीम अन्ना समेत अन्ना को भी नहीं थी। दिल्ली पुलिस द्वारा तमाम नियम कानून को ठेंगे पर ऱखकर जो कुछ किया गया, उसके खिलाफ देशव्यापी जनसैलाब को देखकर भी पहले तो वकील साहब ने मनुजी को यकीन दिला दिया कि बस चार छह घंटे का ये तमाशा है शाम ढलते-ढलते सब कुछ सामान्य हो जाएगा। अपने बेस्ट माइंड पर भरोसा करके मनु साहब बेफ्रिक थे, मगर पूरे देश में आंधी देखकर टीम मनमोहन का दम उखड़ने लगा। अपने युवराज को भी मुगली घूंटी 555 की तरह हर बार समझा बूझा लेने वाले वकील साहब ने इस बार भी राहुल बाबा को कोरा बाबा मानकर दिलासा बंधाया। मगर बेकाबू हाल देखकर अपने सौम्य और सुकुमार बाबा का खून खौला और शाम की मीटिंग में सबको जमकर लताड़ा। लताड़ के बाद ही अपने चेहरे पर मुस्कान लपेटकर टीम मनु की त्रिमूर्ति सोनी पी.चिंद और वकील साहब प्रेस के सामने आकर डैमेज कंट्रोल में लगे कैमरों के सामने मुस्कुराते दिखे। खासकर वकील साहब का खिलखिलाता स्माईली फेस (चेहरा) देखना तो वाकई हैरतनाक लगा।

कहां से कहां तक

एक कहावत मशहूर है कि चौबे जी गए छौब्बे बनने और दुबे होकर लौटे। इसका सार ये है कि चालाकी के फेर में बेवकूफ बने। कमसे कम अन्ना के मामल में सरकार और इसकी पीछलग्गू दिल्ली पुलिस को एक बार फिर ( दो माह में दूसरी बार)  किरकिरी का सामना करना पड़ा। मगर मरता क्या नहीं करता। सरकारी नौकरी जो ठहरी। सरकार के आदेश का तो पालन करना ही था। सरकारी निर्देश पर ही रामदेव को चूहा बनाया गया  और अन्ना को भी चूहेदानी में बंद करने के लिए ही आमादा अहिंसा प्रिय मनमोहन साहब ने तो अन्ना को मयूर विहार से ही उठाकर मुबंई भेजने की योजना तय कर रखी थी। जिसमें पुलिस ही फेल हो गई. तिहाड में भी किसी बहाने गाड़ी में बैठाकर दिल्ली से बाहर करने की सरकारी षड़यंत्र का पर्दाफाश हो गया। अपने सबसे ईमानदार पीएम की ईमानदारी का दम पूरी तरह जगजाहिर हो गया। लोग तो यह कहने भी लगे है कि जब मैडम के फरमान के बगैर पीएम साहब सांस नहीं ले सकते तो आपके लिए आपके साथ दिल्ली पलिस की क्या मजाल कि वो अपने मन से अन्ना को छू ले। यानी अन्ना लहर में यूपीए और युवराज के डैमेज कंट्रोल की सारी नौटंकी पर से राज उठ गया है कि सबकुछ सरकार के संकेत पर ही हो रहा था।

जिद्दी नहीं संजीदा बने अन्ना

यूपीए सरकार का बाजा बजाने और तमाम नेताओ और नौकरशाहों को चूहा बना देने के बाद अब बारी आपकी है अन्ना। एक माह के अनशन से भी जनता में वो मैसेज नहीं जाता जो मात्र 48 घंटे में हो गया। अब जब सरकार घुटनों के बल आ गई है तो फिर क्यों जिद्द ? सरकार ने बिना शर्ते जब 15 दिन की मोहलत दी है तो इसमें भूखे रहने से ज्यादा जरूरी है जनलोकपाल बिल को बहस का एक मुद्दा बनाया जाए। सभी दलों को इसमें संशोधन और बेहतर बनानेकी पहल शुरू कराने की। अब अपनी टीम के साथ इसको सर्वमान्य बनाने पर जोर देने की ताकि सरकार को एक मजबूत लोकपाल लाना पड़े। अन्ना दा एक कहावत है काठ की हांड़ी बार बार नहीं। एक ही मुद्दे पर देश भर में बारम्बार खून नहीं खौलता। इस बार जब सारा देश आपके पीछे है तो अनशन, अन् जल त्याग से भी ज्यादा जरूरी है इस मौके को सार्थक बनाने की, जिसका मौका समय हर बार नहीं देता है ना देगा।


अपने ही फंदे में सरकार

रंग बदलने में गिरगिट को भी मात देने वाले तेज (स्मार्ट) कांग्रेसियो ने यह पूरे देश को जता दिया कि मनमोहन सरकार में कौशल पूर्ण रणनीति बनाने वालों का वाकई अकाल हो गया है। कमसे कम अन्ना हजारे के आंदोलन के मामले में तो पीएम से लेकर वकालती अंदाज में पोलटिक्स करने वाले नेताओ तक में समय की नब्ज भांपने की कितनी कमी है। रामदेव को कुचलने वाली यूपीए सरकार के हौसले नादिरशाहों जैसी हो गई थी। लगता था मानो एचएमवी की मुद्रा में बैठी दिल्ली पुलिस से वो कोई भी जुल्म को समय की मांग बताकर करवा लेंगे। अन्ना की आंधी को रोकने के लिए मनु सरकार ने योजना तो सुपर बनाई थी, मगर अपनी टीम में रामदेव एकल थे जिन्हें पुलिसिया शिकार बनना पड़ा, मगर अन्ना की टीम के लोगों को देखकर मनु जी अपने ही फंदे में फंस गए। सरकार की फजीहत देखकर तो वाकई सोनिया की सेहत खराब हो जाती। सचमुच विदेश में जाकर इलाज कराने का कारण अब पता चल गया कि मनु के भरोसे देश को तो छोड़ा जा सकता है, मगर किसी बीमार को नहीं।

यह कैसी चुनौती ?

अपने दिवगंत पिताजी के नाम और काम की वैशाखी पर सवार होकर जिस उम्र में सचिन पायलट मंत्री बन गए है, अगर उनके पीछे पापा की लाठी नहीं होती तो शायद दर्जनों जूतियां घीस जाने के बाद भी वे सांसद तो दूर विधायक बनना भी बस सपना ही रहता। योगगुरू रामदेव आज भले ही मात खा गए हो, मगर लोकप्रियता और असर के मामले में तो वो राजेश पायलट पर भी भारी ही पड़ते। बच्चा पायलट ने रामदेव को संसदीय चुनाव में खड़ा होने की चुनौती देकर अपने आपको जता दिया कि बाप के नाम का साथ होना एक बात है, मगर मंजा होना अलग बात है। रामदेव को तो छोड़ो ( वो तो देश के किसी भी क्षेत्र से किसी के लि्ए भी आज बड़ी चुनौती बन सकते है) मगर फारूक अब्दुल्ला के दामाद पायलट साहब गैर गूर्जर वोट वाले देश के किसी भी संसदीय इलाके से अपनी किस्मत ही आजमा कर तो दिखा दे कि क्या वहां से (पर) पायलट साहब की उड़ान मुमकिन हो पाएगी या......?

कांग्रेस के असली दुश्मन

कांग्रेस के असली दुशमन रामदेव अन्ना हजारे या विपक्षी दल के वो नेता तो कतई नहीं है, जिससे मनु सरकार की नींद हराम हो गई है। मनु सरकार को दरअसल सबसे ज्यादा नुकसान करने वालो में वकील कपिल सिब्बल, दिग्गी राजा(बिना किसी स्टेट के ), मनीष तिवारी है। बगैर कुछ सोचे समझे बेकाबू होकर बोलने वाले इन नेताओं से मनु जी के  साथ युवराज बाबा सोनिया गांधी से लेकर हर उस आदमी को निराशा हो रही , जिसने मनु सरकार से अपनी उम्मीदें बांध रखी थी। सच में मनु जी आप थोड़ा बोलने का रियाज करें, ताकि मौके पर लोग आपकी वाणी सुनकर आपके मुखार बिंद को पहचानने लगे। बोलने के नाम पर रोने वाले मनु जी कुछ करो । अपनी नहीं तो देश के बारे में विचार करे, जिसकी इज्जत का गुब्बारा खतरे में है।

जनता के बीच जाना है

अन्ना हजारे ने नेताओं को एकसूत्र में बांधकर एक कतार में अपने लिए खड़ा कर दिया। कल तक अन्ना के आंदोलन की खिल्ली उड़ा रहे लालू भाई भी सोनिया का दामन छोड़कर अपना सूर बदल दिया। मुलायम, मायावती और लेफ्ट तो पहले ही आ चुके थे। कमल छाप भी शुरू से अन्ना के साथ था। गैर यूपीए के तमाम घटक एक साथ हो गए। खासकर चारा मामले में अभी तक फंसे और जगन्नाथ मिश्र के साथ एक और मामले में नवाजे गए लालू के बदले रूख पर मैं चौंक गया। पाला बदल पर लालू ने कहा क्या करे चुनाव में तो जनता के बीच जाना होता है, और अन्ना की आंधी से बचना ही इस समय की पोलिटिकल मांग है.....।

कुछ करिए गुलाम जी

लोकसभा में केवल रोने और मगरमच्छ वाला आंसू बहाने से काम नहीं चलेगा। सरकार से कोई जीत सकता है क्या ? अगर डाक्टरी की पढ़ाई के बाद कोई एक साल के लिए भी गांवों में नहीं जाता है तो यह आपके और आपकी सरकार के लिए ज्यादा शर्मनाक है। एडमिशन के समय ही एक साल का एग्रीमेंट और पालन नहीं करने पर अयोग्य करार कर देने की चेतावनी का अनिवार्य कानून बना देने के बाद गुलाम साहब क्या मजाल कि कोई गांव में ना जाए ? मगर गावों को तो आप और आपकी सरकार ने केवल चुनाव के समय देखा और रोया। फिर भूल गए। गावों में संसाधन देने के नाम पर मनु साहब का बजट खराब होने लगता है, और प्रणव दा के टसूए चूने लगते है। अस्पतालों की बेहतर हालात और डाक्टरों की सुरक्षा की पूरी व्यवस्था रहे तो आज का युवा अपनी मिट्टी से तो जुड़ना चाहता है, मगर सरकार की नीतियों से जमीन क्रंकीट में बदलते जा रहे है। सारा विकास शहरी हो गया है, वहां पर जान जोखिम में डालकर कौन जाएगा गुलाम साहब ?  रोने की बजाय अपने गिरेबान में झांककर देखेंगे तो आजाद ख्याल के गुलाम साहब असलीयत का अंदाजा लगेगा।


फेसबुकिया दोस्ती से जरा बचके

निसंदेह फेसबुक लोगों को जोड़ने का एक बड़ा माध्यम बन चुका है। नए दोस्तों के साथ पुराने लोग भी एक जीवंत रिश्तों से जुड़ जाते हैं। मगर अपन 46 साल के कलम घिस्सू को बड़े बुरे अनुभव से गुजरना पड़ा। पंजाब के एक इंजीनियरिंग कालेज की एक 24 साल की लड़की (शायद वो लड़का हो) नीरू शर्मा ने दोस्ती मैसेज में रिलेशन बनाने का आफर दिया। वहीं, अभी चार पांच दिन पहले राकेश गर्ग नामक एक युवक ने फ्रेंडशिप करके रोजाना चैट करने लगा। और चौथे या पांचवे दिन गर्ग ने कहा कि क्या हमलोग सेक्स की बाते कर सकते है ? मेरे द्वारा लताड़ने और फिर बात ना करने की हिदायत पर कहीं पिंड छूटा। अपने से 20-22 साल कम उम्र के युवाओं से इस तरह की बातें सुनकर खुद पर शर्म आती है। प्लीज फेसबुक(पर) से जरा बच के भी रहना दोस्तों।

और क्रिकेट की आंधी थम गई

अन्ना की जोरदार आंधी में यह खबर दब गई कि बिहार की तरफ से रणजी खेलने वाले ताबड़तोड़ खब्बू बल्लेबाज रमेश सक्सेना की टाटा( जमशेदपुर) में गुमनाम सी मौत हो गई। हालांकि कई सीएम और खिलाड़ियों ने शोक जताया। आज से 42-44 साल पहले 1967 में इंग्लैंड़ के खिलाफ एकमात्र टेस्ट खेलने वाले(17 और 16 रन)  रमेश ने कोई धमाका तो नहीं किया, मगर दो तीन साल तक कई देशों में टीम के साथ ले जाए जाने के बाद भी फिर कभी मौका नहीं मिला। युसूफ पठान धोनी और याद करे कपिलदेव की हंटर बल्लेबाजी(175 रन)  से भी उम्दा खेलने वाले रमेश के पीछे कोई (गाड) फादर नहीं होना ही इसकी चमक को खा गया। मुझे जमशेदपुर मे आज से 30 साल पहले कालीचरण की वेस्टइंडीज टीम  के खिलाफ सक्सेना की खेली धुंआधार पारी आज भी याद है (तब मैं केवल 15 साल का था और जिद करके घर से 350 किलोमीटर दूर टाटा केवल मैच देखने गया था) कि सक्सेना की 86 रनों की पारी में हर छक्के( 8 छक्के) पर कप्तान कालीचरण सक्सेना के बल्ले को आकर बार बार देखते थे। और जब सक्सेना आऊट हुए तो कालीचरण ने उन्हें अपनी बांहों में जकड़ लिया। आज अगर सक्सेना खेल रहे होते तो इसमें कोई शक नहीं कि इन्हें अपनी टीम में ऱखने के लिए विजय माल्या और शाहरूख खान के बीच करोड़ों की जंग होती। गुमनामी के बाद भी केवल 149 मैचों में 17 शतक और 61 अर्द्धशतक की मदद से 8141 बनाने वाले सक्सेना के दमदार रिकार्ड आज भी चयनकर्ताओं को शर्मसार करने लिए काफी है। बिहार के इस चमकदार और मेरे हीरो रहे रमेश सक्सेना को श्रद्धासुमन के साथ नमन। 

नोट-- एक सप्ताह के लिए मैं दिल्ली से बाहर (असली भारत) में रहूंगा, जहां पर आज भी कम्प्यूटर और लाईट का होना एक स्वप्न है। लिहाजा प्रेसक्लब-6 समय पर प्रस्तुत नहीं कर सकता। इसका इलसा पोस्ट दो या तीन सितम्बर को करूंगा। इसके लिए क्षमायाचना सहित --सधन्यबाद
आपका 
अनामी शरण बबल
20.09.2011 सुबह 3.23 मिनट

गुरुवार, 18 अगस्त 2011

शंकर दयाल सिंह


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शंकर दयाल सिंह (१९३७-१९९५)
शंकर दयाल सिंह (१९३७-१९९५) (अंग्रेजी: Shankar Dayal Singh) भारत के राजनेता तथा हिन्दी साहित्यकार थे। वे राजनीति व साहित्य दोनों क्षेत्रों में समान रूप से लोकप्रिय थे। उनकी असाधारण हिन्दी सेवा के लिये उन्हें सदैव स्मरण किया जाता रहेगा। उनके सदाबहार बहुआयामी व्यक्तित्व में ऊर्जा और आनन्द का अजस्र स्रोत छिपा हुआ था। उनका अधिकांश जीवन यात्राओं में ही बीता और यह भी एक विचित्र संयोग ही है कि उनकी मृत्यु यात्रा के दौरान उस समय हुई जब वे अपने निवास स्थान पटना से भारतीय संसद के शीतकालीन अधिवेशन में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने दिल्ली आ रहे थे। नई-दिल्ली रेलवे स्टेशन पर २७ नवम्बर १९९५ की सुबह ट्रेन से कहकहे लगाते हुए शंकर दयाल सिंह तो नहीं उतरे, अपितु बोझिल मन से उनके परिजनों ने उनके शव को उतारा।

अनुक्रम

[छुपाएँ]

[संपादित करें] जन्म और जीवन

बिहार के औरंगाबाद जिले के भवानीपुर गाँव में २७ दिसम्बर १९३७ को प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी, साहित्यकार व बिहार विधान परिषद के सदस्य स्व० कामताप्रसाद सिंह के यहाँ जन्मे बालक के माता-पिता ने अपने आराध्य देव शंकर की दया का प्रसाद समझ कर उसका नाम शंकर दयाल रखा जो जाति सूचक शब्द के संयोग से शंकर दयाल सिंह हो गया। छोटी उम्र में ही माता का साया सिर से उठ गया अत: दादी ने उनका पालन पोषण किया। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक (बी०ए०) तथा पटना विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर (एम०ए०) की उपाधि (डिग्री) लेने के पश्चात १९६६ में वह अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य बने और १९७१ में सांसद चुने गये। एक पाँव राजनीति के दलदल में सनता रहा तो दूसरा साहित्य के कमल की पांखुरियों को कुरेद-कुरेद कर उसका सौरभ लुटाता रहा। श्रीमती कानन बाला जैसी सुशीला प्राध्यापिका पत्नी, दो पुत्र - रंजन व राजेश तथा एक पुत्री - रश्मि; और क्या चाहिये सब कुछ तो उन्हें अपने जीते जी मिल गया था तिस पर मृत्यु भी मिली तो इतनी नीरव, इतनी शान्त कि शरीर को एक पल का भी कष्ट नहीं होने दिया। 26 नवंबर 1995 को पटना से नई दिल्ली जाते हुए रेल यात्रा में टूंडला रेलवे स्टेशन पर हृदय गति के अचानक रुक जाने की वज़ह से उनका देहान्त हो गया।

[संपादित करें] विविधि कार्य

समाचार भारती के निदेशक पद से प्रारम्भ हुई शंकर दयाल सिंह की जीवन-यात्रा संसदीय राजभाषा समिति, दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी, भारतीय रेल परामर्श समिति, भारतीय अनुवाद परिषद, केन्द्रीय हिन्दी सलाहकार समिति जैसे अनेक पडावों को पार करती हुई देश-विदेश की यात्राओं का भी आनन्द लेती रही और अपने सहयात्रियों के साथ उन्मुक्त ठहाके लगाकर उनका रक्तवर्धन भी करती रही। और अन्त में उनकी यह यात्रा रेलवे के वातानुकूलित शयनयान में गहरी नींद सोते हुए २७ नवम्बर १९९५ को उस समय समाप्त हो गयी जब उनके जन्म दिन की षष्टिपूर्ति में मात्र एक मास शेष रह गया था। यदि २७ दिसम्बर १९९५ के बाद भी उनकी यात्रा जारी रहती तो वे अपना ५८वाँ जन्म-दिन उन्हीं ठहाकों के बीच मनाते जिसके लिये वे अपने मित्रों के बीच जाने जाते थे। उनकी एक विशेषता यह भी रही कि उन्होंने जीवन पर्यन्त भारतीय जीवन मूल्यों की रक्षा के साथ-साथ भारतीय संस्कृति का पोषण किया भले ही इसके लिये उन्हें कई बार उलझना भी पडा किन्तु अपने विशिष्ट व्यवहार के कारण वे उन तमाम वाधाओं पर एक अपराजेय योद्धा की तरह विजय पाते रहे।

[संपादित करें] राजनीति की धूप

शंकर दयाल सिंह लोकसभाराज्यसभा दोनों के सदस्य रहे किन्तु चूँकि मूलत: वे एक साहित्यकार थे अत: राजनीति में होने वाले दाव पेंच उन्हें रास नहीं आते थे और वे उसकी तेज धूप से बचने के लिये बहुधा साहित्य का छाता तान लिया करते थे। कहने का तात्पर्य यह है कि वे अपने लेखों में उन सबकी बखिया उधेड कर रख देते थे जो उनके शुद्ध अन्त:करण को नीति विरुद्ध लगते थे। जैसे सरकार की ग्रामोत्थान के प्रति तटस्थता का भाव उन्हें सालता था तो वह संसद की चर्चाओं में तो अपनी बात रखते ही थे विविध पत्र-पत्रिकाओं में लेख भी लिखते थे जिन्हें पढकर विरोधी-पक्ष खुश और सत्ता-पक्ष (कांग्रेस), जिसके वे स्वयं सांसद हुआ करते थे, नाखुश रहता था। देखा जाये तो राजनीति में, आज जहाँ प्रत्येक पार्टी ने केवल चाटुकारों की चण्डाल-चौकडी का मजमा जमा कर रक्खा है जिसके कारण राजनीति के तालाब में स्वच्छ जल की जगह कीचड ही कीचड नजर आ रही है; वहाँ के प्रदूषित वातावरण में शंकरदयाल सिंह सरीखे कमल की कमी वास्तव में खलती है। उन्होंने लगभग २५ लेख राजनीतिक उठापटक को लेकर ही लिखे जो तत्कालीन समाचारों की सुर्खियाँ तो बने ही, पुस्तकाकार रूप में पुस्तकालयों में उपलब्ध भी हैं।

[संपादित करें] साहित्य की छाँव

जीवन को धूप-छाँव का खेल मानने वाले शंकर दयाल सिंह का यह मानना एक दम सही था कि जिस प्रकार प्रकृति अपना संतुलन अपने आप कर लेती है उसी प्रकार राजनीति में काम करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को साहित्यकार होना पहली योग्यता का मापदण्ड होना चाहिये। वे अपने से पूर्ववर्ती सभी दिग्गज राजनीतिक व्यक्तियों का उदाहरण प्राय: दिया करते थे और बताते थे कि वे सभी दिग्गज लोग साहित्यकार पहले थे बाद में राजनीतिकार या कुछ भी; जिसके कारण उनके जीवन में निरन्तर सन्तुलन बना रहा और वे देश के साथ कभी धोखा नहीं कर पाये। आज जिसे देखो वही राजनीति को व्यवसाय की तरह समझता है सेवा की तरह नहीं; यही कारण है कि सर्वत्र अशान्ति का साम्राज्य है। हालात यह हैं कि आजकल राजनीति की धूप में नेताओं के पाँव कम, जनता के अधिक झुलस रहे हैं। उन्हीं के शब्दों में - "मैंने स्वयं राजनीति से आसव ग्रहण कर उसकी मस्ती साहित्य में बिखेरी है। अनुभव वहाँ से लिये, अनुभूति यहाँ से। मरण वहाँ से वरण किया जीवन यहाँ से। वहाँ की धूप में जब-जब झुलसा,छाँव के लिये इस ओर भागा। लेकिन यह सही है कि धूप्-छाँव का आनन्द लेता रहा, आँख-मिचौनी खेलता रहा।" (उद्धरण:-राजनीति की धूप : साहित्य की छाँव शंकर दयाल सिंह पृष्ठ ११७ से)

[संपादित करें] भाषा की भँवर में

भारतवर्ष को स्वतन्त्रता के पश्चात यदि कोई एक नीति एकजुट रख सकती थी तो वह केवल एक भाषागत राष्ट्रीय-नीति ही रख सकती थी किन्तु हमारे देश के कर्णधारों ने इस ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया अपितु एक के बजाय अनेक भाषाओं के भँवर-जाल में उलझाकर डूब मरने के लिये विवश कर दिया है। जब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम अथवा हमारी आजादी का युद्ध एक भाषा हिन्दी के माध्यम से लडा गया, उसमें किसी भी प्रान्त-भाषा-भाषी ने यह अडंगा नहीं लगाया कि पहले उनकी भाषा सीखो तभी वे एकजुट होकर तुम्हारा साथ देंगे अन्यथा नहीं देंगे। इस तरह यदि करते तो क्या कभी १९४७ में हिन्दुस्तान आजाद हो सकता था? कदापि नहीं। राष्ट्रभाषा तो एक ही हो सकती है अनेक तो नहीं हो सकतीं। यदि राष्ट्र-भाषायें एक के स्थान पर १५ या २० कर दी जायेंगी तो निश्चित मानिये प्रान्तीयता का भाव प्रत्येक के मन में पैदा होगा और उसका दुष्परिणाम यह होगा कि यह राष्ट्र विखण्डन की ओर अग्रसर होगा, एकता की ओर नहीं।

[संपादित करें] यायावरी के अनुभव

शंकर दयाल सिंह चूँकि सांसद भी रहे और संसदीय कार्य-समितियों में उनकी पैठ भी बराबर बनी रही अतएव उन्हें सरकारी संसाधनों के सहारे विभिन्न देशों व स्थानों की यात्रायें करने का सुख भी उपलब्ध हुआ। परन्तु उन्होंने वह सुख अकेले न उठाकर अपने साहित्यिक मित्रों को भी उपलब्ध कराया तथा लेखों के माध्यम से अपने पाठकों को भी पहुँचाया। सोवियत संघ की राजधानी मास्को से लेकर सूरीनाम और त्रिनिदाद तक की महत्वपूर्ण यात्राओं के वृतान्त पढकर हमें यह लगता ही नहीं कि शंकर दयाल सिंह हमारे बीच नहीं हैं। अपितु कभी-कभी तो ऐसा आभास-सा होता है जैसे वह हमारे इर्द-गिर्द घूमते हुए लट्टू की भाँति गतिमान इस भूमण्डल के चक्कर अभी भी लगा रहे हैं। पारिजात प्रकाशन, पटना से प्रथम बार सन् १९९२ में प्रकाशित पुस्तक राजनीति की धूप : साहित्य की छाँव में पृष्ठ ३०१ से ३३१ तक लेखों के माध्यम से दिये गये उनकी यायावरी (घुमक्कडी वृत्ति) के अनुभव बडे ही रोचक हैं।

[संपादित करें] रचना संसार

सन १९७७ से 'सोशलिस्ट भारत' में उनके लेख प्रकशित होने प्रारम्भ हुए जो सन १९९२ तक अनवरत रूप से छपते ही रहे ऐसा उल्लेख उनकी बहुचर्चित पुस्तक राजनीति की धूप : साहित्य की छाँव में पृष्ठ ३४४-३४५ पर मिलता है। इसी के आगे दी गयी शंकरदयाल सिंह की प्रकाशित पुस्तकों की सूची इस प्रकार है:
  1. राजनीति की धूप:साहित्य की छाँव
  2. इमर्जेन्सी:क्या सच,क्या झूठ
  3. परिवेश का सुख
  4. मैने इन्हें जाना
  5. यदा-कदा
  6. भीगी धरती की सोंधी गन्ध
  7. अपने आपसे कुछ बातें
  8. आइये कुछ दूर हम साथ चलें
  9. कहीं सुबह:कहीं छाँव
  10. जनतन्त्र के कठघरे में
  11. जो साथ छोड गये
  12. भाषा और साहित्य
  13. मेरी प्रिय कहानियाँ
  14. एक दिन अपना भी
  15. कुछ बातें:कुछ लोग
  16. कितना क्या अनकहा
  17. पह्ली बारिस की छिटकती बूँदें
  18. बात जो बोलेगी
  19. मुरझाये फूल:पंखहीन
  20. समय-सन्दर्भ और गान्धी
  21. समय-असमय
  22. यादों की पगडण्डियाँ
  23. कुछ ख्यालों में:कुछ ख्वाबों में
  24. पास-पडोस की कहानियाँ
  25. भारत छोडो आन्दोलन

[संपादित करें] सम्मान व पुरस्कार

राष्ट्रभाषा हिन्दी के लिये शंकर दयाल सिंह ने आजीवन आग्रह भी किया, युद्ध भी लडा और यदा-कदा आहत भी हुए। इस सबके बावजूद उन्हें सन् १९९३ में हिन्दी सेवा के लिये अनन्तगोपाल शेवडे हिन्दी सम्मान तथा सन् १९९५ में गाडगिल राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा गया परन्तु इससे वे मानसिक रूप से पूर्णत: सन्तुष्ट कभी नहीं हुए। निस्सन्देह शंकर दयाल सिंह पुरस्कार या सम्मान पाकर अपनी बोलती बन्द रखने वालों की श्रेणी के व्यक्ति नहीं, अपितु और अधिक प्रखरता से मुखर होने वालों की श्रेणी के व्यक्ति थे। यही कारण था कि प्रतिष्ठित लेखक के रूप में केन्द्र सरकार ने भले ही कोई पुरस्कार या सम्मान न दिया हो, जिसके वे वास्तविक रूप से अधिकारी थे; परन्तु पूरे भारतवर्ष से कई संस्थाओं, संगठनों व राज्य-सरकारों से उन्हें अनेकों पुरस्कार प्राप्त हुए।

[संपादित करें] सन्दर्भ एवम् आभार

  1. राजनीति की धूप : साहित्य की छाँव शंकर दयाल सिंह १९९२ पारिजात प्रकाशन पटना-१
  2. मेरे ये आदरणीय और आत्मीय आशा रानी व्होरा २००२ नमन प्रकाशन नई दिल्ली-२ ISBN : 8187368071
  3. http://krantmlverma.blogspot.com/2011/07/shankar-dayal-singh.html
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नामस्थान
संस्करण

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